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अब ऊंचे पहाड़ी इलाकों में भी चीनी टैंकों की खैर नहीं! प्रचंड हेलीकॉप्टर को मिलेंगी घातक हेलिना-ध्रुवास्त्र मिसाइलें

Prachand HELINA Dhruvastra missile

Prachand HELINA Dhruvastra missile: भारत का स्वदेशी लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर प्रचंड अब एक नए और ज्यादा घातक अवतार में सामने आने वाला है। अब तक पहाड़ी इलाकों में फुर्तीले हमलों और सपोर्ट रोल के लिए पहचाने जाने वाले प्रचंड को जल्द ही एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल से लैस किया जाएगा। एचएएल की तरफ से हेलिना और ध्रुवास्त्र मिसाइलों को प्रचंड हेलीकॉप्टर पर इंटीग्रेट करने की तैयारी की जा रही है।

Prachand HELINA Dhruvastra missile: 156 प्रचंड का मेगा कॉन्ट्रैक्ट

पिछले साल 28 मार्च को रक्षा मंत्रालय ने 156 लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर प्रचंड की खरीद के लिए हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के साथ एक बड़ा करार किया था। इस सौदे की कुल कीमत करीब 62,700 करोड़ रुपये है। इस ऑर्डर में भारतीय सेना के लिए 90 और भारतीय वायुसेना के लिए 66 हेलीकॉप्टर शामिल हैं।

इससे पहले लिमिटेड सीरीज प्रोडक्शन के तहत 15 प्रचंड हेलीकॉप्टर पहले ही सर्विस में आ चुके हैं। इनमें वायुसेना के पास 10 और सेना के पास 5 हेलीकॉप्टर हैं। हालांकि ये हेलीकॉप्टर ऑपरेशनल तो हैं, लेकिन अभी तक इन पर मुख्य रूप से 70 एमएम रॉकेट, 20 एमएम नोज गन और कुछ एयर-टू-एयर मिसाइलों का ही इस्तेमाल किया जा रहा है। लेकिन असली टैंक-किलर हथियार अब तक शामिल नहीं हो पाए थे। (Prachand HELINA Dhruvastra missile)

हेलिना और ध्रुवास्त्र क्या हैं

हेलिना और ध्रुवास्त्र असल में एक ही मिसाइल के दो नाम हैं। यह मिसाइल नाग एंटी टैंक मिसाइल का हेलीकॉप्टर से दागा जाने वाला वर्जन है। सेना इसे हेलिना कहती है, जबकि वायुसेना के लिए यही मिसाइल ध्रुवास्त्र नाम से जानी जाती है।

यह एक पूरी तरह फायर-एंड-फॉरगेट मिसाइल है। यानी पायलट को टारगेट लॉक करने के बाद मिसाइल छोड़नी होती है, उसके बाद हेलीकॉप्टर को दुश्मन के सामने रुके रहने की जरूरत नहीं होती। मिसाइल खुद टारगेट तक पहुंचती है।

इसकी मारक क्षमता बेहद ज्यादा है। यह मिसाइल 7 से 10 किलोमीटर तक के टारगेट को भेद सकती है और आधुनिक टैंकों के मजबूत कवच को भी तोड़ने में सक्षम है। इसमें टैंडम हाई-एक्सप्लोसिव एंटी-टैंक वारहेड लगा है, जो पहले टैंक की सुरक्षा को तोड़ता है और फिर अंदर तक वार करता है। (Prachand HELINA Dhruvastra missile)

लद्दाख में हो चुके हैं ट्रायल

हेलिना और ध्रुवास्त्र मिसाइलों के यूजर ट्रायल्स 2022-23 में पूरे किए गए थे। खास बात यह रही कि इनका परीक्षण लद्दाख जहां पतली हवा और बेहद कम तापमान जैसे ऊंचे और ठंडे इलाकों में किया गया।

इन ट्रायल्स में मिसाइलों ने न सिर्फ टारगेट को सही तरीके से लॉक किया, बल्कि उसे पूरी तरह तबाह भी किया। भारत डायनामिक्स लिमिटेड ने साफ कहा है कि यह सिस्टम अब पूरी तरह तैयार है और इंटीग्रेशन का इंतजार कर रहा है। (Prachand HELINA Dhruvastra missile)

अब प्रचंड पर होगा असली इंटीग्रेशन

अब अगला और सबसे अहम कदम इन मिसाइलों को प्रचंड हेलीकॉप्टर पर इंटीग्रेट करना है। एचएएल की योजना के मुताबिक, 2026 के आखिर या 2027 की शुरुआत में प्रचंड से हेलिना और ध्रुवास्त्र के फ्लाइट ट्रायल्स शुरू किए जाएंगे।

इन ट्रायल्स का मकसद सिर्फ मिसाइल दागना नहीं होगा, बल्कि यह देखना होगा कि ऊंचाई पर उड़ते हुए, सेंसर और हेलमेट-माउंटेड साइटिंग सिस्टम के साथ मिलकर मिसाइल कितनी सटीक काम करती है। प्रचंड की खासियत यह है कि वह 21,000 फीट तक ऑपरेट कर सकता है, जो उसे पहाड़ी इलाकों में बेहद खास बनाता है।

सेना और वायुसेना की कोशिश है कि जब नई 156 प्रचंड हेलीकॉप्टरों की डिलीवरी 2027-28 से शुरू हो, तब वे पहले दिन से ही पूरी तरह कॉम्बैट-रेडी हों। पुराने प्रोजेक्ट्स में हथियारों की कमी बाद में पूरी की जाती थी, लेकिन इस बार वह गलती नहीं दोहराई जाएगी। (Prachand HELINA Dhruvastra missile)

और भी होंगे कई अपग्रेड्स

नई खेप के प्रचंड हेलीकॉप्टरों में सिर्फ हेलिना या ध्रुवास्त्र ही नहीं, बल्कि कई और अहम अपग्रेड भी शामिल होंगे। इनमें आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट, न्यूक्लियर-बायोलॉजिकल-केमिकल डिटेक्शन सिस्टम और ऑब्स्टेकल अवॉइडेंस सिस्टम शामिल हैं, जो पहाड़ों में लो-लेवल फ्लाइंग को ज्यादा सुरक्षित बनाएंगे।

भविष्य की योजना में लॉइटरिंग म्यूनिशन और एयर-लॉन्च्ड ड्रोन को भी प्रचंड से जोड़ने पर काम चल रहा है, ताकि वह सिर्फ हमला ही नहीं, बल्कि निगरानी और सटीक स्ट्राइक में भी माहिर बन सके। (Prachand HELINA Dhruvastra missile)

क्यों माना जा रहा है इसे गेमचेंजर

हेलिना और ध्रुवास्त्र के आने के बाद प्रचंड सिर्फ एक लाइट अटैक हेलीकॉप्टर नहीं रहेगा, बल्कि एक पूरी तरह सक्षम टैंक-किलर प्लेटफॉर्म बन जाएगा। खास तौर पर पहाड़ी सीमाओं पर, जहां भारी हेलीकॉप्टर ऑपरेट नहीं कर पाते, वहां प्रचंड अपनी ताकत दिखाएगा।

सबसे बड़ी बात यह है कि यह पूरा सिस्टम पूरी तरह स्वदेशी है। डिजाइन से लेकर निर्माण तक, इसमें देश की ही कंपनियां शामिल हैं। इससे न सिर्फ आत्मनिर्भर भारत को मजबूती मिलेगी, बल्कि सेना और वायुसेना को एक भरोसेमंद, लंबे समय तक साथ निभाने वाला हथियार मिलेगा। (Prachand HELINA Dhruvastra missile)

भारत के फिफ्थ-जेनरेशन फाइटर AMCA के लिए तीन कंसोर्टियम शॉर्टलिस्ट, जल्द जारी होगी RFP

AMCA fighter jet
AMCA fighter jet

AMCA fighter jet: भारत के सबसे महत्वाकांक्षी रक्षा प्रोजेक्ट्स में शामिल एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) को लेकर बड़ी खबर सामने आई है। स्वदेशी फिफ्थ-जेनरेशन स्टेल्थ फाइटर जेट को भारतीय वायुसेना की आने वाली पीढ़ियों की रीढ़ माना जा रहा है। हाल ही में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह के मुताबिक एएमसीए के लिए सामने आए 7 इंडस्ट्री कंसोर्टियम में से 3 को शॉर्टलिस्ट कर लिया गया है। इस प्री-क्वालिफिकेशन प्रोसेस में कंपनियों को टेक्निकल क्षमता, फाइनेंशियल स्ट्रेंथ और हाई-एंड एयरोस्पेस मैन्युफैक्चरिंग को ध्यान में रखा कर चुना गया है।

हालांकि अभी तक आधिकारिक तौर पर शॉर्टलिस्टेड कंपनियों के नामों का खुलासा नहीं हुआ है, लेकिन डिफेंस इंडस्ट्री से जुड़े सूत्रों और हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इसमें एलएंडटी, टाटा ग्रुप, अदाणी डिफेंस, और कल्याणी ग्रुप (भारत फोर्ज) जैसे बड़े नाम शामिल हो सकते हैं। यह साफ है कि इस बार सरकार ने सिर्फ सरकारी कंपनियों तक सीमित रहने के बजाय निजी क्षेत्र को भी बराबरी से मैदान में उतारा है। (AMCA fighter jet)

AMCA fighter jet: जल्द जारी होगी आरएफपी

रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, शॉर्टलिस्ट किए गए तीनों कंसोर्टियम को आरएफपी यानी रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल अगले 2 से 3 महीनों में जारी किया जाएगा। इसका मतलब है कि मार्च-अप्रैल 2026 तक यह प्रक्रिया शुरू हो सकती है। आरएफपी के जरिए इन कंपनियों से एएमसीए के डेवलपमेंट, प्रोटोटाइप बिल्डिंग और शुरुआती प्रोडक्शन के लिए फाइनेंशियल और टेक्निकल बिड मांगी जाएगी।

इसके बाद इन तीनों में से एल1 यानी सबसे कम लागत और योग्य प्रस्ताव देने वाले कंसोर्टियम को चुना जाएगा। रक्षा सचिव के अनुसार, यह पूरी प्रक्रिया लगभग तीन महीनों में फाइनल हो सकती है।

एएमसीए प्रोजेक्ट के लिए कुल सात इंडस्ट्री कंसोर्टियम ने अपनी बिड्स सबमिट की थीं। यह प्रक्रिया अक्टूबर 2025 में पूरी हुई थी। अगर कंपनियों की बात करें, तो इस प्रोजेक्ट में भारत की लगभग सभी बड़ी डिफेंस और एयरोस्पेस कंपनियां किसी न किसी रूप में शामिल रही हैं। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड इस प्रोग्राम की रीढ़ मानी जा रही है और वह कई कंसोर्टियम में लीड या पार्टनर के तौर पर मौजूद है। (AMCA fighter jet)

लार्सन एंड टुब्रो (एलएंडटी) भी एक मजबूत दावेदार के रूप में उभरी है, जिसने भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड और डायनामैटिक टेक्नोलॉजीज के साथ मिलकर कंसोर्टियम बनाया है। इसी तरह टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड, जो टाटा ग्रुप की डिफेंस शाखा है, एयरोस्पेस सेक्टर में अपने अनुभव के चलते इस रेस में अहम खिलाड़ी मानी जा रही है।

अदाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस ने भी इस प्रोजेक्ट के लिए गंभीर दावेदारी पेश की है। उसने हैदराबाद की एमटीएआर टेक्नोलॉजीज के साथ मिलकर कंसोर्टियम बनाया है। वहीं कल्याणी स्ट्रैटेजिक सिस्टम्स, यानी भारत फोर्ज के नेतृत्व वाला समूह, डेटा पैटर्न्स और बीईएमएल के साथ मिलकर इस प्रोजेक्ट में शामिल हुआ है। इसके अलावा ब्रह्मोस एयरोस्पेस तिरुवनंतपुरम लिमिटेड, एक्सिसकेड्स टेक्नोलॉजीज और कुछ अन्य कंपनियों के कंसोर्टियम भी शुरुआती दौर में मुकाबले में थे। (AMCA fighter jet)

दिलचस्प बात यह है कि एएमसीए प्रोजेक्ट के शुरुआती ईओआई फेज में 28 से ज्यादा प्राइवेट कंपनियों ने एचएएल के साथ काम करने में रुचि दिखाई थी, लेकिन कड़ी जांच और मूल्यांकन के बाद अंतिम बिड्स सिर्फ सात कंसोर्टियम तक सीमित रहीं। इससे साफ है कि सरकार इस प्रोजेक्ट में सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि गुणवत्ता और क्षमता को प्राथमिकता दे रही है।

पूरे प्रोग्राम में डीआरडीओ और एडीए डिजाइन और टेक्नोलॉजी की कमान संभाल रहे हैं, जबकि चुनी गई इंडस्ट्री कंपनियां प्रोटोटाइप निर्माण, ग्राउंड और फ्लाइट टेस्टिंग, और आगे चलकर सीरियल प्रोडक्शन में योगदान देंगी। यह मॉडल तेजस प्रोजेक्ट से अलग और कहीं ज्यादा व्यापक माना जा रहा है। (AMCA fighter jet)

पांच प्रोटोटाइप बनाए जाएंगे

एएमसीए प्रोग्राम के मौजूदा प्लान के मुताबिक, चुनी गई इंडस्ट्री पार्टनरशिप के तहत 5 प्रोटोटाइप एयरक्राफ्ट बनाए जाएंगे। इनमें से पहला प्रोटोटाइप 3 से 4 साल में तैयार होने की उम्मीद है। यानी अगर सब कुछ योजना के मुताबिक चलता है, तो 2029 के आसपास एएमसीए की पहली उड़ान देखने को मिल सकती है। इस प्रोटोटाइप फेज के लिए सरकार ने 15,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की फंडिंग तय की है।

रक्षा सचिव ने साफ कहा है कि प्रोटोटाइप फेज अपेक्षाकृत छोटा होगा, लेकिन फुल-स्केल प्रोडक्शन तक पहुंचने में करीब 10 साल का समय लग सकता है। यह टाइमलाइन किसी भी फिफ्थ-जेनरेशन फाइटर प्रोग्राम के लिए सामान्य मानी जाती है। (AMCA fighter jet)

शुरुआत में जीई एफ-414 इंजन

एएमसीए के शुरुआती वर्जन यानी पहले दो स्क्वाड्रन में जीई एफ-414 इंजन का इस्तेमाल किया जाएगा। यह इंजन अमेरिका की कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक का है और इसे फिलहाल इंपोर्ट किया जाएगा। यही इंजन तेजस मार्क-2 के लिए भी चुना गया है।

रक्षा अधिकारियों के मुताबिक, शुरुआती चरण में विदेशी इंजन का इस्तेमाल इसलिए जरूरी है ताकि प्रोग्राम में देरी न हो और एयरफोर्स को समय पर फाइटर मिल सके। हालांकि, यह व्यवस्था स्थायी नहीं होगी। (AMCA fighter jet)

स्वदेशी हाई-थ्रस्ट इंजन पर भी काम

लॉन्ग-टर्म प्लान में एएमसीए को 120 किलो न्यूटन क्लास के स्वदेशी इंजन से लैस करने की योजना है। इस इंजन का डेवलपमेंट 2036–37 के आसपास पूरा होने की उम्मीद जताई जा रही है। इसके लिए भारत फ्रांस की सफरान जैसी कंपनियों के साथ को-डेवलपमेंट मॉडल पर काम कर रहा है। भविष्य में भारत की योजना है कि सबसे क्रिटिकल टेक्नोलॉजी यानी इंजन भी पूरी तरह भारत के नियंत्रण में हो। (AMCA fighter jet)

एएमसीए में क्या होगा खास

एएमसीए को शुरू से ही एक नेटिव स्टेल्थ प्लेटफॉर्म के तौर पर डिजाइन किया जा रहा है। इसमें लो ऑब्जर्वेबल शेप, इंटरनल वेपन बे, एडवांस्ड सेंसर फ्यूजन, एआई-इनेबल्ड एवियोनिक्स, और सुपरक्रूज क्षमता जैसे फीचर्स शामिल होंगे।

इसका मतलब यह है कि एएमसीए बिना आफ्टरबर्नर के भी सुपरसोनिक स्पीड बनाए रख सकेगा और दुश्मन के रडार से बचते हुए अंदर तक जा कर हमला कर सकेगा।

भारतीय वायुसेना को अगले दो दशकों में बड़ी संख्या में पुराने मिराज, मिग-29 और जगुआर जैसे विमानों को रिटायर करना है। ऐसे में एएमसीए वह प्लेटफॉर्म है, जो 2035 के बाद एयरफोर्स की एयर सुपीरियॉरिटी बनाए रखने में अहम भूमिका निभाएगा। योजना के मुताबिक, वायुसेना कम से कम 125 एएमसीए फाइटर जेट्स शामिल कर सकती है, जिन्हें 7 स्क्वाड्रन में तैनात किया जाएगा। यह संख्या भविष्य में बढ़ भी सकती है। (AMCA fighter jet)

भारतीय वायुसेना निभाएगी आध्यात्मिक मिशन, भगवान बुद्ध के पावन अवशेषों को लेकर जाएगी श्रीलंका

Indian Air Force Buddha relics Sri Lanka

IAF Buddha relics Sri Lanka: भारतीय वायुसेना एक बार फिर सिर्फ देश की सुरक्षा ही नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत की जिम्मेदारी भी निभाने जा रही है। भगवान बुद्ध से जुड़े अत्यंत पवित्र देवनीमोरी अवशेषों को पूरे राजकीय सम्मान के साथ श्रीलंका ले जाया जाएगा। इन अवशेषों को सार्वजनिक दर्शन के लिए 4 फरवरी से 10 फरवरी 2026 तक कोलंबो में रखे जाएंगे। इसके बाद 11 फरवरी को ये पवित्र अवशेष वापस भारत लौटेंगे।

IAF Buddha relics Sri Lanka: कोलंबो के गंगारामय मंदिर में होंगे दर्शन

खास बात यह है कि इन पवित्र अवशेषों को एक विशेष विमान से भारतीय वायुसेना श्रीलंका ले जाएगी। श्रीलंका में भगवान बुद्ध के देवनीमोरी अवशेषों को कोलंबो के प्रसिद्ध गंगारामय मंदिर में रखा जाएगा। यह मंदिर श्रीलंका के सबसे प्रतिष्ठित बौद्ध धार्मिक स्थलों में से एक माना जाता है। यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में देवनीमोरी अवशेषों का यहां रखा जाना श्रीलंकाई बौद्ध समाज के लिए बेहद खास अवसर होगा।

श्रीलंका में बौद्ध धर्म न सिर्फ एक धार्मिक आस्था है, बल्कि वहां की संस्कृति, परंपरा और जीवनशैली का भी अहम हिस्सा है। ऐसे में भारत से आए भगवान बुद्ध के अवशेष वहां के लोगों के लिए भावनात्मक और आध्यात्मिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण होंगे। (IAF Buddha relics Sri Lanka)

गुजरात से जुड़े हैं देवनीमोरी अवशेष

भगवान बुद्ध के ये पवित्र अवशेष गुजरात के अरावली जिले में श्यामलाजी के पास स्थित देवनीमोरी पुरातात्विक स्थल से जुड़े हैं। इस स्थल की खुदाई वर्ष 1957 में की गई थी, जिसमें बौद्ध स्तूप और कई महत्वपूर्ण अवशेष मिले थे। इन्हीं में से एक स्तूप में भगवान बुद्ध के अस्थि अवशेष पाए गए थे।

यह अवशेष एक हरे रंग के पत्थर से बने पात्र में रखे गए थे, जिस पर ब्राह्मी लिपि में संस्कृत भाषा का लेख भी अंकित था। इस लेख का अर्थ बताया गया है- “दशबल शारीर निलय”, यानी भगवान बुद्ध के शरीर के अवशेषों का निवास स्थान। इस पात्र के भीतर तांबे का एक छोटा बॉक्स था, जिसमें पवित्र राख, रेशमी कपड़ा और मनके सुरक्षित रखे गए थे। (IAF Buddha relics Sri Lanka)

बेहद सुरक्षित तरीके से रखे गए हैं अवशेष

वर्तमान में इन पवित्र अवशेषों को एक विशेष एयरटाइट कांच के डिब्बे में सुरक्षित रखा गया है, ताकि समय के साथ इनमें किसी तरह की क्षति न हो। इन्हें कपास के आधार पर रखा गया है, जिससे नमी या तापमान का असर न पड़े। जब इन्हें श्रीलंका ले जाया जाएगा, तब भी पूरी सुरक्षा और धार्मिक मर्यादा का पालन किया जाएगा। (IAF Buddha relics Sri Lanka)

उच्चस्तरीय भारतीय प्रतिनिधिमंडल भी होगा साथ

इस पवित्र यात्रा में भारत का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल भी शामिल होगा। इस दल का नेतृत्व गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत और गुजरात के उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी करेंगे। उनके साथ वरिष्ठ बौद्ध भिक्षु और सरकारी अधिकारी भी मौजूद रहेंगे। यह प्रतिनिधिमंडल कोलंबो में होने वाले धार्मिक और आधिकारिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेगा। (IAF Buddha relics Sri Lanka)

भारत-श्रीलंका रिश्तों में आध्यात्मिक सेतु

देवनीमोरी अवशेषों को दर्शन के लिए रखा जाना सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक कूटनीति का भी अहम हिस्सा है। भारत, जहां बौद्ध धर्म का जन्म हुआ, आज भी पूरी दुनिया में अपनी इस विरासत को साझा करता रहा है। इससे पहले भी भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेष थाईलैंड, मंगोलिया, वियतनाम, रूस और भूटान जैसे देशों में प्रदर्शित किए जा चुके हैं।

श्रीलंका में यह आयोजन भारत और श्रीलंका के बीच लोगों से लोगों के रिश्तों को और गहरा करेगा। यह दोनों देशों के बीच भरोसे, सम्मान और साझा मूल्यों को मजबूत करने वाला कदम माना जा रहा है। (IAF Buddha relics Sri Lanka)

भारत की सांस्कृतिक कूटनीति का मजबूत आधार

यह पहली बार नहीं है जब भारतीय वायुसेना भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों को किसी देश में ले जा रही है। इन अवशेषों को आमतौर पर भारतीय वायुसेना के विशेष विमानों जैसे सी-17 ग्लोबमास्टर या सी-130 से ले जाया जाता है। श्रीलंका के अलावा, भारतीय वायुसेना मंगोलिया, थाईलैंड, वियतनाम, भूटान, रूस (काल्मिकिया गणराज्य), सिंगापुर और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों को ले जा चुकी है। मंगोलिया में 1993 और 2022 में, थाईलैंड में 1995 और 2024 में, वियतनाम में 2025 के वेसाक समारोह के दौरान और भूटान व रूस में 2025 में इन अवशेषों को सुरक्षित ले जा चुकी है। (IAF Buddha relics Sri Lanka)

डीआरडीओ का बड़ा ब्रेकथ्रू, रैमजेट टेक्नोलॉजी से बदलेंगे एयर कॉम्बैट के नियम, अस्त्र मार्क-3 को मिलेगी नई ताकत

DRDO SFDR Technology
DRDO Achieves Major Breakthrough with SFDR Technology, Boosting India’s Air-to-Air Missile Capability

DRDO SFDR Technology: डीआरडीओ ने मंगलवार को ऐसे तकनीक का सफल परीक्षण किया, जिसके बाद एयर कॉम्बैट के नियम पूरी तरह से बदल जाएंगे। डीआरडीओ ने सॉलिड फ्यूल डक्टेड रामजेट यानी एसएफडीआर टेक्नोलॉजी का सफल टेस्ट किया। यह एक ऐसी एडवांस्ड तकनीक है, जो भारतीय वायुसेना को बेहद लंबी दूरी तक मार करने वाली, लगातार हाई-स्पीड बनाए रखने वाली और आखिरी पल तक घातक एयर-टू-एयर मिसाइल देने वाली है। यह टेस्ट भारत के एयर डोमिनेंस की दिशा में एक बड़ी छलांग मानी जा रही है।

डीआरडीओ ने यह टेस्ट ओडिशा के चांदीपुर स्थित इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज से किया गया। सुबह करीब 10 बजकर 45 मिनट पर हुए इस फ्लाइट डेमॉन्स्ट्रेशन ने यह साबित कर दिया कि भारत अब उन चुनिंदा देशों की कतार में खड़ा हो चुका है, जिनके पास एडवांस्ड रैमजेट मिसाइल टेक्नोलॉजी मौजूद है। (DRDO SFDR Technology)

DRDO SFDR Technology: क्या हुआ इस टेस्ट में

डीआरडीओ के मुताबिक, इस डेमॉन्स्ट्रेशन में एसएफडीआर से जुड़े सभी अहम सब-सिस्टम्स ने उम्मीद के मुताबिक काम किया। शुरुआत में मिसाइल को एक ग्राउंड बूस्टर से लॉन्च किया गया, जिसने उसे जरूरी मैक स्पीड तक पहुंचाया। इसके बाद डक्टेड रैमजेट मोड एक्टिव हुआ और मिसाइल ने लगातार हाई स्पीड पर उड़ान जारी रखी।

इस पूरे टेस्ट के दौरान नोजल-लेस बूस्टर, सॉलिड फ्यूल डक्टेड रैमजेट मोटर और फ्यूल फ्लो कंट्रोलर की परफॉर्मेंस को बारीकी से मॉनिटर किया गया। बंगाल की खाड़ी के ऊपर उड़ रही मिसाइल के हर मूवमेंट को रडार, टेलीमेट्री और अन्य ट्रैकिंग सिस्टम्स से रिकॉर्ड किया गया, जिससे यह पता लगा कि सिस्टम पूरी तरह स्टेबल और कंट्रोल में था। (DRDO SFDR Technology)

एसएफडीआर आखिर है क्या

आसान शब्दों में समझें तो एसएफडीआर टेक्नोलॉजी पारंपरिक रॉकेट इंजन से काफी अलग है। आम रॉकेट मिसाइलों में फ्यूल और ऑक्सीडाइजर दोनों मिसाइल के अंदर ही होते हैं। इससे वजन बढ़ जाता है और रेंज सीमित हो जाती है।

लेकिन रैमजेट टेक्नोलॉजी में मिसाइल हवा से ऑक्सीजन लेती है और सिर्फ फ्यूल अपने साथ रखती है। एसएफडीआर में यह फ्यूल सॉलिड फॉर्म में होता है। यही वजह है कि मिसाइल हल्की होती है, ज्यादा दूरी तय कर सकती है और लंबे समय तक तेज रफ्तार बनाए रखती है।

इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि मिसाइल आखिरी स्टेज यानी एंड-गेम में भी अपनी एनर्जी नहीं खोती। यानी टारगेट के पास पहुंचते समय भी उसकी स्पीड और मारक क्षमता बनी रहती है, जिससे दुश्मन के फाइटर जेट या सपोर्ट एयरक्राफ्ट के बचने की संभावना बेहद कम हो जाती है। (DRDO SFDR Technology)

भारतीय वायुसेना के लिए क्यों है गेमचेंजर

एसएफडीआर टेक्नोलॉजी का सीधा फायदा भारतीय वायुसेना को मिलने वाला है। डीआरडीओ इसी तकनीक के आधार पर अगली पीढ़ी की एयर-टू-एयर मिसाइल डेवलप कर रहा है, जिसे अस्त्र मार्क-3 या गंडिव भी कहा जा रहा है।

अभी भारतीय वायुसेना के पास अस्त्र मार्क-1 और अस्त्र मार्क-2 जैसी मिसाइलें हैं, जिनकी रेंज क्रमशः करीब 110 किलोमीटर और 150 से 200 किलोमीटर के आसपास मानी जाती है। लेकिन एसएफडीआर आधारित अस्त्र मार्क-3 की रेंज 300 किलोमीटर से भी ज्यादा हो सकती है।

इसका मतलब यह हुआ कि अब भारतीय लड़ाकू विमान दुश्मन के एयरबोर्न अर्ली वॉर्निंग सिस्टम, टैंकर एयरक्राफ्ट और फाइटर जेट्स को बहुत दूर से ही निशाना बना सकेंगे। इससे न सिर्फ वायुसेना को रणनीतिक बढ़त मिलेगी, बल्कि युद्ध के शुरुआती चरण में ही दुश्मन की एयर ताकत कमजोर की जा सकेगी। (DRDO SFDR Technology)

विदेशी निर्भरता होगी कम

अब तक लंबी दूरी की एयर-टू-एयर मिसाइलों के लिए भारत को विदेशी सिस्टम्स पर निर्भर रहना पड़ता था। फ्रांस की मेटियोर मिसाइल इसका उदाहरण है। लेकिन एसएफडीआर के सफल टेस्ट के बाद यह साफ हो गया है कि भारत अब इस अहम तकनीक में आत्मनिर्भर बनने की ओर बढ़ रहा है।

इससे न सिर्फ विदेशी आयात पर खर्च कम होगा, बल्कि भविष्य में भारत खुद ऐसी एडवांस्ड मिसाइलें एक्सपोर्ट करने की स्थिति में भी आ सकता है। (DRDO SFDR Technology)

किन वैज्ञानिकों और लैब्स ने निभाई भूमिका

इस टेस्ट को डीआरडीओ की कई प्रमुख प्रयोगशालाओं के वैज्ञानिकों ने मिलकर अंजाम दिया। डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट लैबोरेटरी, हाई एनर्जी मटीरियल्स रिसर्च लैबोरेटरी, रिसर्च सेंटर इमारत और आईटीआर के वैज्ञानिकों ने पूरे मिशन को मॉनिटर किया।

यह टेक्नोलॉजी कोई एक-दो साल की मेहनत का नतीजा नहीं है। डीआरडीओ पिछले एक दशक से ज्यादा समय से रैमजेट और हाई-स्पीड प्रोपल्शन सिस्टम पर काम कर रहा है। यह सफल डेमॉन्स्ट्रेशन उसी लंबी मेहनत का परिणाम माना जा रहा है।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस उपलब्धि पर डीआरडीओ और इंडस्ट्री को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह सफलता भारत की रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

वहीं, डीआरडीओ के चेयरमैन समीर वी कामत ने भी इस फ्लाइट टेस्ट से जुड़े सभी वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की तारीफ की। उनके मुताबिक, एसएफडीआर टेक्नोलॉजी का सफल प्रदर्शन भारत को भविष्य की एयर-टू-एयर मिसाइलों के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने में अहम भूमिका निभाएगा। (DRDO SFDR Technology)

अस्त्र मार्क-3 का पूरा सिस्टम होगा टेस्ट

अब अगला कदम इस टेक्नोलॉजी को पूरी मिसाइल सिस्टम में इंटीग्रेट करना होगा। माना जा रहा है कि आने वाले कुछ सालों में अस्त्र मार्क-3 का पूरा सिस्टम टेस्ट किया जाएगा और फिर उसे भारतीय वायुसेना में शामिल किया जाएगा।

अगर सब कुछ योजना के मुताबिक चलता है, तो 2028-29 के आसपास भारतीय वायुसेना को एसएफडीआर आधारित लंबी दूरी की एयर-टू-एयर मिसाइल मिल सकती है। यह न सिर्फ भारत की एयर डोमिनेंस को मजबूत करेगी, बल्कि क्षेत्रीय स्तर पर भी भारत की सामरिक स्थिति को और मजबूत बनाएगी। (DRDO SFDR Technology)

भारत में हर साल बनेंगे 100 मिलिट्री हेलीकॉप्टर, अदाणी-लियोनार्डो समझौते से बदलेगी सेनाओं की तस्वीर

Adani Leonardo helicopter manufacturing India
Adani Defence–Leonardo MoU to Build Integrated Helicopter Manufacturing Ecosystem in India

Adani Leonardo helicopter manufacturing India: वह जिन दूर नहीं जब भारतीय सेनाओं की जरूरतों को पूरा करने के लिए हर साल 100 मिलिट्री हेलीकॉप्टर्स बनाए जाएंगे। इसी कड़ी में देश की प्राइवेट सेक्टर की टॉप कंपनी अदाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस और इटली की दिग्गज एयरोस्पेस कंपनी लिओनार्डो के बीच 3 फरवरी, मंगलवार को एक अहम समझौते (एमओयू) पर दस्तखत किए। इस समझौते का मकसद भारत में एक ऐसा मजबूत और पूरी तरह इंटीग्रेटेड हेलीकॉप्टर मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम तैयार करना है, जो आने वाले सालों में भारतीय सेनाओं की जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ देश को ग्लोबल लेवल पर एक भरोसेमंद डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग हब बना सके।

Adani Leonardo helicopter manufacturing India: सिर्फ हेलीकॉप्टर नहीं, पूरी सोच बदलने वाला समझौता

अदाणी डिफेंस का कहना है कि यह समझौता सिर्फ हेलीकॉप्टर खरीद या असेंबली तक सीमित नहीं है। इसका दायरा कहीं ज्यादा बड़ा है। इस साझेदारी के तहत भारत में हेलीकॉप्टर का डिजाइन, मैन्युफैक्चरिंग, असेंबली, मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल यानी एमआरओ, पायलट ट्रेनिंग और सप्लाई चेन डेवलपमेंट तक का पूरा इकोसिस्टम तैयार किया जाएगा। (Adani Leonardo helicopter manufacturing India)

अब तक भारत को अपनी सैन्य जरूरतों के लिए बड़ी संख्या में हेलीकॉप्टर विदेशों से आयात करने पड़ते थे। इससे न सिर्फ लागत बढ़ती थी, बल्कि स्पेयर पार्ट्स, रिपेयर और अपग्रेड के लिए भी विदेशों पर निर्भरता बनी रहती थी। अदाणी और लियोनार्डो की यह साझेदारी इसी निर्भरता को धीरे-धीरे खत्म करने की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है। (Adani Leonardo helicopter manufacturing India)

किन हेलीकॉप्टरों पर होगा फोकस

इस एमओयू के तहत शुरुआत में दो मॉडर्न मिलिट्री हेलीकॉप्टरों पर खास फोकस किया जाएगा। इनमें पहला है AW169M। यह एक लाइट ट्विन-इंजन मल्टी-रोल हेलीकॉप्टर है, जिसे खासतौर पर सैन्य जरूरतों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है। यह ट्रूप ट्रांसपोर्ट, मेडिकल इवैक्यूएशन, सर्च एंड रेस्क्यू, सर्विलांस और सीमित अटैक रोल में इस्तेमाल किया जा सकता है। यह हेलीकॉप्टर हाई-एल्टिट्यूड एरिया में भी बेहतर परफॉर्मेंस देने के लिए जाना जाता है, जो भारतीय सेना के लिए बेहद अहम है। (Adani Leonardo helicopter manufacturing India)

दूसरा हेलीकॉप्टर है AW109 ट्रेकर-एम। यह स्किड-लैंडिंग गियर वाला हेलीकॉप्टर है, जो पहाड़ी, जंगल और दुर्गम इलाकों में ऑपरेशन के लिए ज्यादा उपयुक्त माना जाता है। इसका इस्तेमाल पेट्रोलिंग, रेकॉनिसेंस, लाइट यूटिलिटी और वीआईपी मूवमेंट जैसे कामों में किया जा सकता है। इसकी स्पीड और मैन्यूवरेबिलिटी इसे खास बनाती है।

लिओनार्डो हेलीकॉप्टर्स के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट सेसारे कैसिया ने बताया कि इस एमओयू का मकसद भारतीय सशस्त्र बलों की तत्कालिक जरूरतों को पूरा करना है, जिसमें नए नेवल यूटिलिटी और टोही और निगरानी हेलीकॉप्टर फ्लीट शामिल हैं, और भारत के सर्कुलर अलायंस पॉलिसी फ्रेमवर्क और लॉन्ग-टर्म विजन में योगदान देना है। उन्होंने बताया कि उनका फ्लीट 130 से ज्यादा देशों में उड़ता है, और उनके पास सबसे आधुनिक प्रोडक्ट रेंज में से एक है जो मिलिट्री और सिविल दोनों तरह के इस्तेमाल के लिए सभी मुख्य मार्केट सेगमेंट को कवर करती है। (Adani Leonardo helicopter manufacturing India)

उन्होंने बताया कि उनकी कंपनी के अभी भारत में लगभग 50 हेलीकॉप्टर हैं जो एनर्जी ऑफशोर और पैसेंजर ट्रांसपोर्ट में काम कर रहे हैं। लिओनार्डो के पास हेलीकॉप्टर बनाने का 70 से ज्यादा सालों का अनुभव है और वे ट्रांसमिशन और ब्लेड जैसे जरूरी कंपोनेंट्स से लेकर हेलीकॉप्टर डिजाइन, इंटीग्रेशन और लाइफ साइकिल सपोर्ट तक पूरी वैल्यू चेन को कंट्रोल करते हैं। (Adani Leonardo helicopter manufacturing India)

देश की रणनीतिक जरूरतों से जुड़ा हुआ कदम

अदाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस के डायरेक्टर जीत अदाणी ने इस मौके पर कहा, “लियोनार्डो के साथ यह पार्टनरशिप, जैसा कि हमने पिछले हफ्ते एम्ब्रेयर के साथ किया था, यह दिखाता है कि हम भारत में मिलिट्री और सिविल एविएशन इकोसिस्टम का एक अहम हिस्सा बनने के लिए बहुत कमिटेड हैं।” उन्होंने कहा, यह साझेदारी सिर्फ एक कारोबारी करार नहीं है, बल्कि देश की रणनीतिक जरूरतों से जुड़ा हुआ कदम है। उन्होंने कहा कि भारत की सेनाएं बेहद कठिन परिस्थितियों में देश की रक्षा करती हैं और उनकी जरूरतों के मुताबिक क्षमताओं का विकास करना उद्योग की जिम्मेदारी है।

उनके मुताबिक, अदाणी ग्रुप डिफेंस को सिर्फ एक सेक्टर के तौर पर नहीं, बल्कि एक समग्र रणनीतिक जरूरत के रूप में देखता है। इस साझेदारी के जरिए भारत में मैन्युफैक्चरिंग, ट्रेनिंग और सपोर्ट का ऐसा स्ट्रक्चर खड़ा किया जाएगा, जो लंबे समय तक देश की जरूरतों को पूरा कर सके। (Adani Leonardo helicopter manufacturing India)

वहीं, लियोनार्डो हेलीकॉप्टर्स के मैनेजिंग डायरेक्टर जियान पिएरो कुटिलो ने कहा, “हम अदाणी के साथ जुड़कर बेहद खुश हैं। यह साझेदारी भारत के रोटरक्राफ्ट इंडस्ट्री को और मजबूत बनाने की उसकी सोच में योगदान देगी। हमारा लक्ष्य भारत को वही आधुनिक तकनीक और ऑपरेशनल क्षमता उपलब्ध कराना है, जिसकी उसे जरूरत है।”

आत्मनिर्भर भारत को जमीन पर उतारने वाला एमओयू

इस कार्यक्रम में विशेष तौर पर मौजूद रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने कहा, अदाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस और लियोनार्डो के बीच हुआ यह एमओयू भारत में रोटरी विंग यानी हेलीकॉप्टर इकोसिस्टम बनाने की दिशा में एक दूरदर्शी और अहम कदम है। उन्होंने कहा कि यह समझौता दो प्रतिष्ठित औद्योगिक संस्थाओं के एक साथ आने का प्रतीक है और भारत-ईयू के बीच हाल ही में हुए सुरक्षा और रक्षा रणनीतिक साझेदारी को जमीन पर उतारने वाला प्रयास है।

रक्षा सचिव ने स्पष्ट किया कि आत्मनिर्भर भारत का मतलब पूरी तरह आयात बंद करना नहीं, बल्कि चरणबद्ध तरीके से आयात पर निर्भरता कम करना और भारत में वैश्विक स्तर की प्रतिस्पर्धी औद्योगिक क्षमता खड़ी करना है। उन्होंने कहा कि हेलीकॉप्टर सेगमेंट भारत की रक्षा तैयारियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है और अब निजी क्षेत्र व अंतरराष्ट्रीय साझेदारों की भागीदारी से इस क्षेत्र को और मजबूत किया जाएगा।

उन्होंने यह भी साफ किया कि 100 प्रतिशत आत्मनिर्भरता तुरंत संभव नहीं होती, लेकिन ऐसे कदम निर्भरता को लगातार कम करते हैं। उनके अनुसार, रोटरी विंग यानी हेलीकॉप्टर इकोसिस्टम का भारत में विकास सेनाओं की ऑपरेशनल तैयारियों को मजबूत करेगा और देश को लॉन्ग-टर्म स्ट्रैटेजिक फायदा देगा।

उन्होंने कहा कि ऐसी साझेदारियां न सिर्फ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और कंपीटिशन को बढ़ावा देंगी, बल्कि रक्षा बजट के बेहतर उपयोग और भारत में एक मजबूत, विविध और आधुनिक रक्षा एयरोस्पेस इंडस्ट्रियल बेस के निर्माण में भी निर्णायक भूमिका निभाएंगी। (Adani Leonardo helicopter manufacturing India)

हिमालय से समुद्री तटों तक जोड़ेगी साझेदारी

भारत में इटली के राजदूत एंतोनियो एनरिको बार्तोली ने कहा कि अदाणी डिफेंस और लियोनार्डो की साझेदारी भारत के एयरोस्पेस सफर में एक ऐतिहासिक मोड़ है। उन्होंने इसे आत्मनिर्भर भारत की दिशा में हेलीकॉप्टर सेगमेंट में एक बड़ा कदम बताया। राजदूत के अनुसार, यह साझेदारी सिर्फ मशीनें बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत जैसे विशाल देश को हिमालय से लेकर समुद्री तटों तक जोड़ने का माध्यम बनेगी।

उन्होंने बताया कि वैश्विक हेलीकॉप्टर बाजार तेजी से बढ़ रहा है और आने वाले वर्षों में भारत इसमें एक अहम हिस्सेदार बन सकता है। सैन्य आधुनिकीकरण और सिविल एविएशन की बढ़ती जरूरतें इस विकास को रफ्तार देंगी। उन्होंने रक्षा मंत्रालय की नीतियों, बजट में बढ़े पूंजीगत आवंटन और सुधारों की सराहना की, जिनसे उद्योग, स्टार्टअप्स और एमएसएमई को बढ़ावा मिल रहा है।

राजदूत ने कहा कि लियोनार्डो की विश्वस्तरीय डिजाइन और अदाणी की औद्योगिक क्षमता मिलकर भारत में ऐसा इकोसिस्टम बनाएगी, जहां हेलीकॉप्टर भारत में, भारतीय हाथों से और भारत के भविष्य के लिए तैयार होंगे। (Adani Leonardo helicopter manufacturing India)

अगले दशक में 1000 से ज्यादा हेलीकॉप्टरों की जरूरत

अदाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस के सीईओ आशीष राजवंशी ने इस साझेदारी के व्यावहारिक पहलुओं पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “भारतीय सशस्त्र बलों ने अगले एक दशक में एक हजार से ज्यादा हेलीकॉप्टरों की जरूरत का अनुमान जताया है। उन्होंने कहा कि जल्दी ही भारतीय सेनाओं की जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत में ही हर साल 100 हेलीकॉप्टर बनाएं जाएंगे। उन्होंने आगे कहा, यह साझेदारी हमारी उस सोच को साकार करती है, जिसमें भारत में इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी डेवलप करना लक्ष्य है।”

उन्होंने बताया कि इस साझेदारी से इंडिजिनाइजेशन तेज होगा, सप्लाई चेन मजबूत होगी और भारत को विश्व-स्तरीय प्रोडक्शन बेस बनाने में मदद मिलेगी। उनके अनुसार, यह सिर्फ वर्तमान जरूरतों का समाधान नहीं है, बल्कि भविष्य की मांगों को ध्यान में रखकर उठाया गया कदम है। (Adani Leonardo helicopter manufacturing India)

पुरानी पड़ चुकी फ्लीट के लिए नए ऑप्शन

आशीष राजवंशी ने बताया कि भारतीय सेनाओं के पास अभी भी बड़ी संख्या में पुराने चेतक और चीता जैसे हेलीकॉप्टर सेवा में हैं, जो दशकों पहले शामिल किए गए थे। समय के साथ-साथ इनकी मेंटेनेंस कॉस्ट बढ़ गई है और ऑपरेशनल सीमाएं भी सामने आने लगी हैं। ऐसे में AW169M और AW109 ट्रेकर-एम जैसे आधुनिक हेलीकॉप्टर इनकी जगह लेने के मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं।

वहीं, इन नए हेलीकॉप्टरों के आने से सेना, नौसेना और वायुसेना तीनों की ऑपरेशनल फ्लेक्सिबिलिटी बढ़ेगी। सीमावर्ती इलाकों में तेज मूवमेंट, आपात स्थिति में रेस्क्यू और लॉजिस्टिक सपोर्ट कहीं ज्यादा आसान हो जाएगा। (Adani Leonardo helicopter manufacturing India)

भारत में बनेगा मैन्युफैक्चरिंग और एमआरओ हब

सीईओ आशीष राजवंशी के मुताबिक इस साझेदारी का सबसे अहम पहलू यह है कि हेलीकॉप्टर सिर्फ भारत में असेंबल नहीं होंगे, बल्कि धीरे-धीरे उनका मैन्युफैक्चरिंग कंटेंट भी देश के अंदर बढ़ाया जाएगा। इसे फेज्ड इंडिजिनाइजेशन कहा जा रहा है। शुरुआती चरण में कुछ अहम कंपोनेंट्स विदेश से आ सकते हैं, लेकिन समय के साथ-साथ ज्यादा से ज्यादा पार्ट्स भारत में ही बनाए जाएंगे।

उन्होंने बताया कि इसके साथ-साथ भारत में ही एमआरओ फैसिलिटी विकसित की जाएगी। इस एमआरओ में सिविल और मिलिट्री दोनों तरह के एप्लीकेशन में रोटरी प्लेटफॉर्म की सर्विसिंग और मेंटेनेंस का काम कर सकेंगे। जिसका मतलब यह होगा कि हेलीकॉप्टरों की रिपेयर और ओवरहॉल के लिए अब उन्हें विदेश भेजने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इससे समय और पैसे दोनों की बचत होगी और ऑपरेशनल रेडीनेस भी बेहतर बनी रहेगी। (Adani Leonardo helicopter manufacturing India)

पैदा होंगी बंपर नौकरियां

इस हेलीकॉप्टर इकोसिस्टम के बनने से हजारों हाई-स्किल नौकरियां पैदा होने की उम्मीद है। इंजीनियरिंग, मैन्युफैक्चरिंग, लॉजिस्टिक्स, ट्रेनिंग और मेंटेनेंस जैसे क्षेत्रों में युवाओं के लिए नए अवसर खुलेंगे। इसके अलावा, जब भारत में मैन्युफैक्चरिंग मजबूत होगी, तो भविष्य में इन हेलीकॉप्टरों का निर्यात भी संभव हो सकेगा। इससे विदेशी मुद्रा आएगी और भारत की पहचान एक ग्लोबल डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग हब के तौर पर मजबूत होगी। (Adani Leonardo helicopter manufacturing India)

पहली बार आर्मेनिया पहुंचे CDS जनरल अनिल चौहान, डिफेंस डील्स और ट्रेनिंग पर फोकस

CDS Anil Chauhan Armenia visit

CDS Anil Chauhan Armenia visit: सीडीएस जनरल अनिल चौहान चार दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर आर्मेनिया पहुंचे हैं। यह यात्रा 1 से 4 फरवरी तक चलेगी और खास बात यह है कि किसी भारतीय चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) की यह आर्मेनिया की पहली आधिकारिक यात्रा है। रक्षा और सुरक्षा के लिहाज से इसे भारत-आर्मेनिया रिश्तों में एक बड़ा और निर्णायक मील का पत्थर माना जा रहा है।

CDS Anil Chauhan Armenia visit: येरेवन में भव्य स्वागत, हाई-लेवल डेलिगेशन साथ

सीडीएस जनरल अनिल चौहान के नेतृत्व में एक उच्चस्तरीय भारतीय रक्षा प्रतिनिधिमंडल 1 फरवरी को आर्मेनिया की राजधानी येरेवन पहुंचा। वहां उनका स्वागत भारत की आर्मेनिया में राजदूत निलाक्षी साहा सिन्हा और आर्मेनियाई सशस्त्र बलों के डिप्टी चीफ मेजर जनरल टेमुर शाहनजारयान ने किया। यह स्वागत अपने आप में इस बात का संकेत था कि आर्मेनिया भारत को एक भरोसेमंद और रणनीतिक रक्षा साझेदार के रूप में देख रहा है। (CDS Anil Chauhan Armenia visit)

क्यों अहम है यह यात्रा

यह यात्रा ऐसे समय पर हो रही है, जब आर्मेनिया अपनी सेनाओं को आधुनिक बनाने के लिए नए और भरोसेमंद पार्टनर्स की तलाश में है। नागोर्नो-काराबाख संघर्ष और अजरबैजान-तुर्की धुरी के साथ तनाव के बाद आर्मेनिया पारंपरिक सप्लायर्स से आगे बढ़कर विकल्प खोज रहा है। भारत इस जरूरत को समझते हुए तेजी से एक मजबूत रक्षा साझेदार के रूप में उभरा है।

भारत और आर्मेनिया के बीच पिछले कुछ वर्षों में रक्षा सहयोग में लगातार बढ़ोतरी हुई है। आर्टिलरी गंस, मल्टी-बैरेल रॉकेट लॉन्चर, एयर डिफेंस सिस्टम, रडार, स्नाइपर राइफल और गोला-बारूद जैसे कई सिस्टम पहले ही भारत से आर्मेनिया को सप्लाई किए जा चुके हैं। ऐसे में सीडीएस स्तर की यह यात्रा दोनों देशों के बीच भरोसे और रणनीतिक समझ को और गहरा करने का प्रयास है। (CDS Anil Chauhan Armenia visit)

पिनाका डील के बाद बढ़ा भरोसा

जनवरी 2026 में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने आर्मेनिया के लिए पिनाका गाइडेड रॉकेट सिस्टम की पहली खेप को रवाना किया था। यह डील भारत के रक्षा निर्यात इतिहास में एक बड़ी उपलब्धि मानी गई। पिनाका जैसे स्वदेशी सिस्टम की सप्लाई ने यह साबित कर दिया कि भारत न सिर्फ अपने लिए, बल्कि मित्र देशों के लिए भी आधुनिक हथियार बनाने और सप्लाई कर सकता है। माना जा रहा है कि सीडीएस की इस यात्रा का फोकस लॉन्ग-टर्म डिफेंस कोऑपरेशन, ट्रेनिंग और टेक्नोलॉजी शेयरिंग पर है। (CDS Anil Chauhan Armenia visit)

क्या है यात्रा का एजेंडा

सूत्रों के मुताबिक, जनरल अनिल चौहान की इस यात्रा के दौरान आर्मेनिया के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व के साथ कई अहम बैठकें प्रस्तावित हैं। इनमें आर्मेनिया के प्रधानमंत्री निकोल पशिनयान से मुलाकात भी शामिल है। इन बैठकों में दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को नई ऊंचाई देने पर चर्चा होनी है।

मुख्य फोकस क्षेत्रों में सर्विलांस, स्पेस, साइबर सिक्योरिटी, स्ट्रैटेजिक कम्युनिकेशन, डिफेंस सिस्टम्स और मिलिट्री ट्रेनिंग शामिल हैं। इसके अलावा यह भी समझने की कोशिश की जा रही है कि आर्मेनिया की भविष्य की जरूरतें क्या हैं और भारत उन्हें किस तरह पूरा कर सकता है। (CDS Anil Chauhan Armenia visit)

आर्मेनिया भारत से क्या चाहता है

रक्षा सूत्रों के अनुसार, आर्मेनिया भारत से और अधिक आधुनिक हथियार और सिस्टम खरीदने में दिलचस्पी दिखा रहा है। इसमें इंडिजिनस मिसाइल सिस्टम, एयर डिफेंस और संभवतः फाइटर एयरक्राफ्ट से जुड़े अपग्रेड शामिल हो सकते हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, आर्मेनिया ने अपनी सुखोई-30 फ्लीट के लिए भारतीय अस्त्र बियॉन्ड विजुअल रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल में भी रुचि दिखाई है।

यह यात्रा इसी उद्देश्य से भी अहम मानी जा रही है कि दोनों पक्ष एक-दूसरे की क्षमताओं और जरूरतों को बेहतर तरीके से समझ सकें। (CDS Anil Chauhan Armenia visit)

भारत के लिए रणनीतिक फायदा

आर्मेनिया भारत के लिए सिर्फ एक रक्षा ग्राहक नहीं है, बल्कि साउथ कॉकस इलाके में रणनीतिक मौजूदगी का एक अहम जरिया भी है। जहां अमेरिका और फ्रांस जैसे देश आर्मेनिया को समर्थन दे रहे हैं, वहीं भारत का वहां मजबूत होना वैश्विक स्तर पर उसकी छवि को एक जिम्मेदार रक्षा निर्यातक के तौर पर स्थापित करेगी।

भारत के लिए यह भी खास है कि आर्मेनिया भारत से सिर्फ पार्ट्स या कंपोनेंट्स नहीं खरीद रहा बल्कि पूरे सिस्टम खरीद रहा है। इससे भारत की डिफेंस इंडस्ट्री को बड़ा बाजार मिलता है और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को भी मजबूती मिलती है। (CDS Anil Chauhan Armenia visit)

ट्रेनिंग और नॉलेज शेयरिंग पर जोर

इस यात्रा का एक अहम पहलू मिलिट्री-टू-मिलिट्री रिश्तों को मजबूत करना है। भविष्य में जॉइंट ट्रेनिंग, मिलिट्री एजुकेशन और ऑपरेशनल एक्सपीरियंस शेयरिंग जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ सकता है। यह सहयोग सिर्फ हथियारों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सोच, रणनीति और आधुनिक युद्ध के अनुभवों तक फैलेगा। (CDS Anil Chauhan Armenia visit)

डिफेंस डिप्लोमेसी में नया संकेत

सीडीएस जनरल अनिल चौहान की यह यात्रा यह साफ संकेत देती है कि भारत अब रक्षा कूटनीति को बेहद गंभीरता से ले रहा है। भारत सिर्फ खरीददार नहीं, बल्कि भरोसेमंद सप्लायर और रणनीतिक साझेदार बनना चाहता है। आर्मेनिया के साथ बढ़ता रक्षा सहयोग इसी सोच का उदाहरण है।

चार दिनों की इस यात्रा से भले ही कोई तुरंत बड़ी घोषणा न हो, लेकिन यह साफ है कि भारत-आर्मेनिया रक्षा संबंध अब एक नए और गहरे दौर में प्रवेश कर चुके हैं। आने वाले वर्षों में इसके असर हथियार सौदों, ट्रेनिंग प्रोग्राम्स और रणनीतिक तालमेल के रूप में साफ दिख सकते हैं। (CDS Anil Chauhan Armenia visit)

यंत्र इंडिया लिमिटेड को मिला मिनीरत्न-I का दर्जा, 4 साल में बनी मुनाफे वाली कंपनी

Yantra India Limited Miniratna Status

Yantra India Limited Miniratna Status: देश की रक्षा उत्पादन व्यवस्था में एक अहम उपलब्धि दर्ज करते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने यंत्र इंडिया लिमिटेड को मिनीरत्न कैटेगरी-I का दर्जा देने की मंजूरी दे दी है। यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब यंत्र इंडिया लिमिटेड ने बहुत कम समय में खुद को एक सरकारी संगठन से मुनाफा कमाने वाली मजबूत कॉरपोरेट इकाई के तौर पर स्थापित किया है।

रक्षा मंत्री ने इस मौके पर यंत्र इंडिया लिमिटेड की उपलब्धियों की सराहना करते हुए कहा कि कंपनी ने करीब चार साल के भीतर जिस तरह से अपना कारोबार बढ़ाया है, स्वदेशी उत्पादन पर जोर दिया है और प्रदर्शन के तय मानकों को पूरा किया है, वह प्रशंसनीय है। यही वजह है कि कंपनी को मिनीरत्न कैटेगरी-I का दर्जा दिया गया है।

Yantra India Limited Miniratna Status: कम समय में बड़ी छलांग

यंत्र इंडिया लिमिटेड की स्थापना अक्टूबर 2021 में हुई थी, जब पुराने ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड को सात नई रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में बदला गया। उस समय कई लोगों को शक था कि यह बदलाव कितना सफल होगा, लेकिन यंत्र इंडिया लिमिटेड ने अपने प्रदर्शन से इन शंकाओं को गलत साबित कर दिया।

कंपनी की बिक्री में जबरदस्त बढ़ोतरी देखने को मिली है। वित्त वर्ष 2021-22 की दूसरी छमाही में जहां कंपनी का टर्नओवर करीब 956 करोड़ रुपये था, वहीं वित्त वर्ष 2024-25 में यह बढ़कर 3,108 करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया। यानी कुछ ही वर्षों में कारोबार तीन गुना से भी अधिक बढ़ गया।

निर्यात के मोर्चे पर भी मजबूती

सिर्फ घरेलू बाजार ही नहीं, बल्कि निर्यात के क्षेत्र में भी यंत्र इंडिया लिमिटेड ने मजबूत पहचान बनाई है। शुरुआत में जहां कंपनी का निर्यात शून्य था, वहीं वित्त वर्ष 2024-25 तक यह बढ़कर करीब 322 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। यह दिखाता है कि भारतीय रक्षा उत्पाद अब अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अपनी जगह बना रहे हैं।

क्या बनाती है यंत्र इंडिया लिमिटेड

यंत्र इंडिया लिमिटेड रक्षा क्षेत्र से जुड़े कई अहम उत्पाद तैयार करती है। इसमें कार्बन फाइबर कंपोजिट्स, मीडियम और लार्ज कैलिबर एम्युनिशन के असेंबली प्रोडक्ट्स, आर्मर्ड व्हीकल्स के हिस्से, आर्टिलरी गंस और मेन बैटल टैंक्स के लिए जरूरी कंपोनेंट्स शामिल हैं। इसके अलावा कंपनी ग्लास कंपोजिट्स और एल्यूमिनियम एलॉय जैसे आधुनिक मटेरियल पर भी काम कर रही है, जो आज की जरूरत बन चुके हैं।

मिनीरत्न कैटेगरी-I का क्या मतलब है

मिनीरत्न कैटेगरी-I का दर्जा मिलने के बाद यंत्र इंडिया लिमिटेड को ज्यादा वित्तीय और प्रशासनिक स्वतंत्रता मिलेगी। अब कंपनी का बोर्ड बिना सरकार की पूर्व अनुमति के 500 करोड़ रुपये तक का पूंजीगत खर्च कर सकेगा। इसका इस्तेमाल नए प्रोजेक्ट शुरू करने, मशीनरी खरीदने, तकनीक को अपग्रेड करने और उत्पादन क्षमता बढ़ाने में किया जा सकेगा।

इस फैसले से कंपनी की निर्णय लेने की रफ्तार तेज होगी और वह बाजार की जरूरतों के मुताबिक जल्दी कदम उठा सकेगी। रक्षा उत्पादन जैसे क्षेत्र में यह स्वतंत्रता बेहद अहम मानी जाती है।

रक्षा सुधारों की दिशा में बड़ा कदम

सरकार ने अक्टूबर 2021 में ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड का कॉरपोरेटाइजेशन इसलिए किया था, ताकि रक्षा उत्पादन क्षेत्र में दक्षता बढ़ाई जा सके, इनोवेशन को बढ़ावा मिले और कंपनियां व्यावसायिक तरीके से काम कर सकें। यंत्र इंडिया लिमिटेड उन्हीं नई कंपनियों में से एक है, जो रक्षा उत्पादन विभाग के प्रशासनिक नियंत्रण में काम कर रही है।

इससे पहले मई 2025 में तीन अन्य रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को भी मिनीरत्न-I का दर्जा दिया गया था। अब यंत्र इंडिया लिमिटेड का नाम भी इस सूची में जुड़ गया है।

आ रही है ब्रह्मोस की ‘बाप’, भारत की नई हाइपरसोनिक मिसाइल क्यों है चीन के एयरक्राफ्ट कैरियर के लिए बुरी खबर

India Hypersonic Missile LR-AShM

India Hypersonic Missile LR-AShM: भारत की मिसाइल ताकत अब एक नए दौर में प्रवेश करने जा रही है। जिस ब्रह्मोस मिसाइल को अब तक भारत की सबसे घातक और तेज मिसाइल माना जाता रहा है, उससे भी कहीं ज्यादा ताकतवर और तेज एक नई मिसाइल तैयार की जा रही है। यह खुलासा खुद डीआरडीओ यानी रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन के चेयरमैन डॉ. समीर वी. कामत ने किया है। उन्होंने बताया कि भारत की लॉन्ग रेंज एंटी-शिप हाइपरसोनिक मिसाइल (LR-AShM) का विकास तेजी से आगे बढ़ रहा है और यह भविष्य में भारतीय सेनाओं के लिए एक “गेमचेंजर” साबित होगी।

डॉ. समीर कामत ने मीडिया से बातचीत के दौरान साफ शब्दों में कहा कि यह नई हाइपरसोनिक मिसाइल मौजूदा ब्रह्मोस से कहीं ज्यादा तेज, ज्यादा दूर तक मार करने वाली और ज्यादा घातक होगी। यही वजह है कि रक्षा विशेषज्ञ इसे अनौपचारिक तौर पर “ब्रह्मोस की बाप” कहकर संबोधित कर रहे हैं। (India Hypersonic Missile LR-AShM)

India Hypersonic Missile LR-AShM: दो सफल परीक्षण, तीसरा जल्द

डीआरडीओ प्रमुख ने जानकारी दी कि इस हाइपरसोनिक मिसाइल के अब तक दो डेवलपमेंट ट्रायल सफलतापूर्वक पूरे किए जा चुके हैं। तीसरा डेवलपमेंट ट्रायल जल्द ही किया जाएगा। उन्होंने कहा कि जैसे ही ये डेवलपमेंट ट्रायल्स पूरे होंगे, इस मिसाइल को यूजर इवैल्यूएशन ट्रायल के लिए भारतीय सेनाओं को सौंप दिया जाएगा।

यूजर इवैल्यूएशन ट्रायल का मतलब होता है कि सेना खुद इस मिसाइल को अलग-अलग हालात में टेस्ट करेगी। अगर ये परीक्षण सफल रहते हैं, तो इसके बाद इस मिसाइल को आधिकारिक तौर पर भारतीय सेना या नौसेना में शामिल किया जाएगा। (India Hypersonic Missile LR-AShM)

ब्रह्मोस से कहीं ज्यादा ताकतवर

डॉ. समीर कामत ने स्पष्ट किया कि यह हाइपरसोनिक मिसाइल ब्रह्मोस से कई मामलों में आगे होगी। उन्होंने कहा कि ब्रह्मोस जहां मैक 3 की रफ्तार से उड़ती है, वहीं यह नई मिसाइल मैक 5 से लेकर मैक 10 से भी ज्यादा स्पीड हासिल कर सकती है। इतनी तेज रफ्तार से उड़ने वाली मिसाइल को दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम के लिए रोक पाना बेहद मुश्किल हो जाता है।

इसके साथ ही इस मिसाइल की रेंज भी ब्रह्मोस से कहीं ज्यादा होगी। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसकी रेंज 1,500 किलोमीटर से ज्यादा हो सकती है। यानी भारत अपने समुद्री इलाकों से ही दुश्मन के एयरक्राफ्ट कैरियर और बड़े युद्धपोतों को बहुत दूर से निशाना बना सकेगा। (India Hypersonic Missile LR-AShM)

समुद्र में दुश्मन के लिए बड़ी चुनौती

यह मिसाइल खास तौर पर एंटी-शिप रोल के लिए डिजाइन की गई है। यानी इसका मुख्य लक्ष्य दुश्मन के जहाज, एयरक्राफ्ट कैरियर और नेवल टास्क फोर्स होंगे। मौजूदा दौर में समुद्री ताकत किसी भी देश की मिलिटरी पावर का अहम हिस्सा बन चुकी है।

हाइपरसोनिक मिसाइल की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि यह बेहद तेज रफ्तार से उड़ते हुए बीच रास्ते में अपना रास्ता बदल सकती है। इससे दुश्मन के रडार और मिसाइल डिफेंस सिस्टम भ्रमित हो जाते हैं। यही वजह है कि अमेरिका, चीन और रूस जैसे देश हाइपरसोनिक हथियारों पर भारी निवेश कर रहे हैं। अब भारत भी इस एलीट क्लब में शामिल होने जा रहा है। (India Hypersonic Missile LR-AShM)

पूरी तरह स्वदेशी तकनीक

डीआरडीओ की यह हाइपरसोनिक मिसाइल पूरी तरह स्वदेशी तकनीक पर आधारित है। इसका विकास हैदराबाद स्थित डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम मिसाइल कॉम्प्लेक्स में किया जा रहा है। इसमें बूस्ट-ग्लाइड टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया है, जिसमें मिसाइल को पहले रॉकेट से ऊंचाई तक ले जाया जाता है और फिर वह हाइपरसोनिक स्पीड पर ग्लाइड करती हुई अपना टारगेट तक पहुंचती है।

इस तकनीक की वजह से मिसाइल की ट्रैजेक्टरी यानी उड़ान का रास्ता अनुमान लगाना बेहद कठिन हो जाता है। यही कारण है कि इसे भविष्य के युद्धों का सबसे खतरनाक हथियार माना जा रहा है। (India Hypersonic Missile LR-AShM)

लैंड अटैक और एयर लॉन्च वर्जन भी प्लान में

डीआरडीओ प्रमुख ने यह भी बताया कि फिलहाल एंटी-शिप वर्जन सबसे आगे है, लेकिन इसी मिसाइल के लैंड अटैक वर्जन पर भी काम चल रहा है। यानी भविष्य में यही मिसाइल जमीन पर मौजूद दुश्मन के ठिकानों को भी निशाना बना सकेगी।

इसके अलावा, एयर लॉन्च वर्जन पर भी योजना बनाई जा रही है। हालांकि डॉ. कामत ने साफ किया कि एयर लॉन्च वर्जन पर काम बाद में होगा। पहले जमीन से और जहाज से लॉन्च होने वाले वर्जन को पूरी तरह तैयार किया जाएगा। (India Hypersonic Missile LR-AShM)

इंडो-पैसिफिक में भारत की बढ़ेगी ताकत

रणनीतिक नजरिए से देखें तो यह मिसाइल भारत के लिए बेहद अहम है। इंडो-पैसिफिक और हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती नौसैनिक मौजूदगी भारत के लिए लंबे समय से चिंता का विषय रही है। चीन लगातार नए एयरक्राफ्ट कैरियर और अत्याधुनिक युद्धपोत तैनात कर रहा है।

ऐसे में भारत की यह हाइपरसोनिक एंटी-शिप मिसाइल दुश्मन के लिए बड़ा डर साबित हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस मिसाइल के आने के बाद दुश्मन की कोई भी कैरियर स्ट्राइक ग्रुप भारतीय समुद्री सीमा के पास आने से पहले कई बार सोचेगी। (India Hypersonic Missile LR-AShM)

आत्मनिर्भर भारत की बड़ी छलांग

यह प्रोजेक्ट आत्मनिर्भर भारत की दिशा में भी एक बड़ा कदम है। अब तक भारत को हाइपरसोनिक हथियारों के मामले में विदेशी तकनीक पर निर्भर माना जाता था। लेकिन इस मिसाइल के जरिए भारत ने दिखा दिया है कि वह अत्याधुनिक और भविष्य की तकनीक खुद विकसित करने में सक्षम है।

डीआरडीओ प्रमुख ने भरोसा जताया कि यह मिसाइल भारतीय सेनाओं के आर्मरी में एक बड़ा और निर्णायक बदलाव लाएगी। उन्होंने कहा कि आने वाले सालों में भारत की सैन्य ताकत का स्वरूप पूरी तरह बदलने वाला है। (India Hypersonic Missile LR-AShM)

जल्द दिखेगा असर

अगर सब कुछ योजना के मुताबिक रहा, तो अगले कुछ वर्षों में यह हाइपरसोनिक मिसाइल भारतीय नौसेना और अन्य सेनाओं का हिस्सा बन सकती है। इसके साथ ही भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो जाएगा, जिनके पास हाइपरसोनिक स्ट्राइक क्षमता है। (India Hypersonic Missile LR-AShM)

संसद में जनरल नरवणे के संस्मरण को लेकर बड़ा बवाल, राहुल गांधी के बयान पर सदन में हंगामा

General Naravane memoir controversy

General Naravane memoir controversy: लोकसभा में बजट सत्र के दौरान सोमवार, 2 फरवरी को उस वक्त बड़ा राजनीतिक हंगामा देखने को मिला, जब राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव यानी मोशन ऑफ थैंक्स पर चर्चा के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे के एक कथित संस्मरण से जुड़ा हवाला दिया। इस पर सत्ता पक्ष ने कड़ा विरोध जताया और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह तथा गृह मंत्री अमित शाह ने इसे संसद की मर्यादा और नियमों के खिलाफ बताया।

यह पूरा विवाद एक मैगजीन आर्टिकल से जुड़ा है, जो जनरल नरवणे के अब तक अप्रकाशित संस्मरण पर आधारित बताया जा रहा है। इस आर्टिकल को लेकर पहले से ही राजनीतिक हलकों में चर्चा थी, लेकिन जब इसका हवाला नेताा प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने संसद के पटल पर दिया, तो इस पर बवाल मच गया। (General Naravane memoir controversy)

General Naravane memoir controversy: किस आर्टिकल से शुरू हुआ विवाद

1 फरवरी को एक अंग्रेजी मैगजीन में “नरवणेज मोमेंट ऑफ ट्रुथ” शीर्षक से एक लेख प्रकाशित हुआ। इस लेख में दावा किया गया कि यह पूर्व आर्मी चीफ जनरल एमएम नरवणे के अभी तक प्रकाशित न हुए संस्मरण पर आधारित है। लेख में भारत-चीन सीमा से जुड़े कुछ घटनाक्रमों, खासकर डोकलाम गतिरोध और गलवान घाटी संघर्ष का उल्लेख किया गया था।

लेख में यह लिखा गया कि 2020 में हुए गलवान संघर्ष के दौरान सीमा पर हालात को लेकर सरकार और सेना के आकलन में अंतर था और कुछ मौकों पर सरकार ने स्थिति को अलग तरीके से पेश किया। यही बातें राजनीतिक तौर पर संवेदनशील मानी गईं, क्योंकि सीमा और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दे संसद में हमेशा बेहद गंभीर माने जाते हैं। (General Naravane memoir controversy)

लोकसभा में राहुल गांधी का बयान

मोशन ऑफ थैंक्स पर चर्चा के दौरान राहुल गांधी ने अपने भाषण में इस लेख का हवाला दिया। उन्होंने सदन में मैगजीन की प्रिंटेड कॉपी दिखाते हुए कहा कि पूर्व आर्मी चीफ के संस्मरण में सीमा हालात को लेकर ऐसे तथ्य बताए गए हैं, जो सरकार के आधिकारिक दावों से मेल नहीं खाते।

राहुल गांधी ने कहा कि अगर सरकार को सच से डर नहीं है, तो उन्हें यह बातें सदन में पढ़ने दी जानी चाहिए। उन्होंने चीन सीमा से जुड़े मुद्दों, गलवान घाटी की घटना और सरकार के “एक इंच भी जमीन नहीं गई” वाले बयान पर सवाल उठाए। साथ ही उन्होंने अग्निपथ योजना को लेकर भी टिप्पणी की और कहा कि यह फैसला सेना पर अचानक थोपा गया। (General Naravane memoir controversy)

क्यों भड़का सत्ता पक्ष

राहुल गांधी के बयान के तुरंत बाद सत्ता पक्ष के सांसदों ने जोरदार आपत्ति जताई। उनका कहना था कि संसद में किसी ऐसी किताब या संस्मरण का हवाला नहीं दिया जा सकता, जो अभी प्रकाशित ही नहीं हुई है और जिसकी प्रामाणिकता की पुष्टि नहीं हुई है।

सत्ता पक्ष का तर्क था कि अनऑथेंटिकेटेड यानी गैर-प्रमाणित स्रोतों से कोट करना संसद के नियमों के खिलाफ है। हंगामा इतना बढ़ गया कि कई सांसद अपनी सीटों से खड़े हो गए और सदन में शोर-शराबा शुरू हो गया। (General Naravane memoir controversy)

स्पीकर को करना पड़ा हस्तक्षेप

हंगामे के बीच लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को हस्तक्षेप करना पड़ा। उन्होंने राहुल गांधी से कहा कि सदन के नियमों के तहत किसी अप्रकाशित और अप्रमाणित स्रोत से उद्धरण पढ़ने की अनुमति नहीं दी जा सकती। स्पीकर ने बार-बार सदन को शांत करने की कोशिश की, लेकिन हंगामा कुछ देर तक चलता रहा।

आखिरकार, स्पीकर ने राहुल गांधी से अपना भाषण समेटने और अगले वक्ता को बोलने का आग्रह किया, जिसके बाद संसद 3 बजे तक के लिए स्थगित कर दी गई। लेकिन जब 3 बजे जब संसद शुरू हुई तो फिर से राहुल गांधी ने उस विषय पर बोलना चाहा, जिसके बाद हंगामा बढ़ गया और स्पीकर ने संसद को चार बजे तक के लिए स्थगित कर दिया। (General Naravane memoir controversy)

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा संसदीय नियमों के खिलाफ

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सदन में स्पष्ट शब्दों में कहा कि नेता प्रतिपक्ष को ऐसे संस्मरण से कोट नहीं करना चाहिए, जो अभी प्रकाशित नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि यह न केवल नियमों के खिलाफ है, बल्कि सेना और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषयों पर भ्रम फैलाने जैसा भी है। उन्होंने दोहराया कि सरकार ने पहले भी संसद में साफ किया है कि सीमा पर भारत की एक इंच जमीन भी नहीं गई है।

गृह मंत्री अमित शाह ने जताया कड़ा ऐतराज

गृह मंत्री अमित शाह ने भी सदन में इस मुद्दे पर कड़ा ऐतराज जताया। उन्होंने स्पीकर से अपील की कि अनपब्लिश्ड और अनवेरिफाइड सामग्री को संसद की कार्यवाही का हिस्सा न बनने दिया जाए।

बाद में गृह मंत्री ने कहा कि संसद का विशेषाधिकार राष्ट्रीय हित में जिम्मेदार व्यवहार की अपेक्षा करता है। उनका कहना था कि सेना और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर गैर-जिम्मेदार बयान देश के खिलाफ नकारात्मक माहौल बना सकते हैं। (General Naravane memoir controversy)

अभी तक अप्रकाशित है जनरल एमएम नरवणे की किताब

दरअसल यह पूरा मामला पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे की एक अप्रकाशित आत्मकथा से जुड़ा है, जिसे लेकर संसद में विवाद हुआ। जनरल एमएम नरवणे की किताब का नाम “फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी: एन ऑटोबॉयोग्राफी” है, जिसे पेंग्विन रैंडम हाउस प्रकाशित करने वाली थी, लेकिन अभी तक यह किताब बाजार में नहीं आई है।

दरअसल, नियमों के मुताबिक पूर्व सेना प्रमुखों को अपनी किताब प्रकाशित करने से पहले रक्षा मंत्रालय से मंजूरी लेनी होती है। यह मंजूरी इसलिए जरूरी होती है ताकि कोई संवेदनशील या गोपनीय जानकारी सार्वजनिक न हो। जनरल नरवणे की यह किताब भी इसी मंजूरी के इंतजार में अटकी हुई है।

इस किताब में गलवान वैली संघर्ष, डोकलाम स्टैंडऑफ, अग्निपथ स्कीम और चीन सीमा से जुड़े अनुभवों का जिक्र है। कुछ अंश पहले मीडिया में आए थे, जिनमें सरकार की नीतियों पर सवाल उठते दिखे। इन्हीं अंशों पर आधारित एक मैगजीन लेख का हवाला राहुल गांधी ने संसद में दिया, जिससे हंगामा खड़ा हो गया। (General Naravane memoir controversy)

पहली बार दिखे सूर्यास्त्र के EXTRA और प्रेडेटर हॉक रॉकेट, 300 किमी तक करते हैं मार

Indian Army Suryastra
Indian Army Reviews Indigenous Suryastra PULS Rocket Launcher, EXTRA and Predator Hawk Systems at NIBE Facility in Pune

Indian Army Suryastra: आर्मी डे परेड और रिपब्लिक डे परेड में पहली बार दिखा सूर्यास्त्र यानी पल्स (प्रिसाइज एंड यूनिवर्सल लॉन्चिंग सिस्टम) आज भारतीय सेना की लॉन्ग-रेंज और हाई-प्रिसिजन स्ट्राइक क्षमता का नया चेहरा बनता जा रहा है। इसी आधुनिक और स्वदेशी सिस्टम से जुड़े EXTRA और प्रेडेटर हॉक जैसे एडवांस्ड रॉकेट और मिसाइल मॉडल्स को हाल ही में पुणे के चाकन में पहली बार शोकेस किया गया, जहां साउदर्न कमांड के आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ ने निबे लिमिटेड की डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी का दौरा किया। हाल ही में भारतीय सेना को इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट के तहत दो पल्स यानी सूर्यास्त्र यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर की डिलीवरी भी की गई है। (Indian Army Suryastra)

साउदर्न कमांड के आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ का यह दौरा ऐसे समय पर हुआ है, जब भारतीय सेना अपनी मारक क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य की ओर तेजी से आगे बढ़ रही है। चाकन स्थित इस फैसिलिटी में आर्मी कमांडर को उन आधुनिक तकनीकों और इंफ्रास्ट्रक्चर के बारे में जानकारी दी गई, जिनकी मदद से देश में ही मिशन-क्रिटिकल डिफेंस इक्विपमेंट तैयार किए जा रहे हैं। (Indian Army Suryastra)

Indian Army Suryastra: एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को किया शोकेस

दौरे के दौरान लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ ने निबे लिमिटेड की लीडरशिप और टेक्निकल टीम के साथ विस्तृत बातचीत की। उन्हें बताया गया कि कंपनी किस तरह प्रिसिजन कटिंग, ऑटोमेटेड वेल्डिंग, वर्टिकल और सीएनसी मशीनिंग जैसी अत्याधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल कर रही है।

कंपनी ने यह भी समझाया कि उसकी लार्ज स्ट्रक्चरल असेंबली लाइन किस तरह बड़े और जटिल मिलिटरी स्ट्रक्चर तैयार करने में सक्षम है। इन सुविधाओं की मदद से लॉन्चर असेंबली, स्ट्रक्चरल सब-सिस्टम और अन्य हाई-एंड डिफेंस कंपोनेंट्स बनाए जाते हैं, जिनका इस्तेमाल मिसाइल, रॉकेट और आर्टिलरी सिस्टम्स में होता है। (Indian Army Suryastra)

EXTRA और प्रेडेटर हॉक को पहली बार किया शोकेस

आर्मी कमांडर की इस विजिट के EXTRA और प्रेडेटर हॉक मॉडल्स का डिस्प्ले भी किया गया। ये दोनों लॉन्ग-रेंज और हाई-प्रिसिजन स्ट्राइक सिस्टम्स पहली बार इस स्तर पर सेना के वरिष्ठ नेतृत्व के सामने प्रदर्शित किए गए।

ये सिस्टम्स मल्टी-कैलिबर यूनिवर्सल लॉन्चर प्लेटफॉर्म का हिस्सा हैं, जिसे भारत में सूर्यास्त्र नाम से जाना जाता है। यह सिस्टम एक ही लॉन्चर से अलग-अलग रेंज और क्षमता वाले रॉकेट और मिसाइल फायर करने की सुविधा देता है। (Indian Army Suryastra)

EXTRA: लंबी दूरी तक सटीक हमला

EXTRA एक 306 एमएम कैलिबर का एक्सटेंडेड रेंज आर्टिलरी रॉकेट है। इसकी मारक क्षमता करीब 150 किलोमीटर तक मानी जाती है। इसमें करीब 120 किलोग्राम का वारहेड लगाया जा सकता है और इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी जबरदस्त सटीक स्ट्राइक क्षमता है। इसका सीईपी यानी सर्कुलर एरर प्रोबेबल 10 मीटर से भी कम बताया जाता है।

इसका मतलब यह है कि यह रॉकेट दुश्मन के हाई-वैल्यू टारगेट्स को बेहद सटीक तरीके से निशाना बना सकता है। एक लॉन्चर पर चार EXTRA रॉकेट्स लगाए जा सकते हैं, जिससे कम समय में कई टारगेट्स पर हमला संभव हो जाता है। (Indian Army Suryastra)

प्रेडेटर हॉक: 300 किलोमीटर तक मार

वहीं प्रेडेटर हॉक को और भी ज्यादा ताकतवर सिस्टम माना जाता है। इसका कैलिबर 370 एमएम है और इसकी रेंज करीब 300 किलोमीटर तक जाती है। यह लगभग एक टैक्टिकल बैलिस्टिक मिसाइल की तरह काम करता है, लेकिन इसे रॉकेट लॉन्चर प्लेटफॉर्म से दागा जाता है।

प्रेडेटर हॉक में करीब 140 किलोग्राम का यूनिटरी वारहेड होता है और यह मौसम से प्रभावित हुए बिना अपने लक्ष्य तक पहुंचने में सक्षम है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि लॉन्च के बाद महज कुछ ही मिनटों में यह दुश्मन के कमांड सेंटर, एयरफील्ड या अन्य अहम ठिकानों को निशाना बना सकता है। (Indian Army Suryastra)

टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के तहत देश में बनेंगे

EXTRA और प्रेडेटर हॉक मूल रूप से इजराइल की कंपनी एल्बिट सिस्टम्स के सिस्टम्स हैं, लेकिन निबे लिमिटेड ने टेक्नोलॉजी कोलैबोरेशन के तहत इन्हें भारत में मैन्युफैक्चर और इंटीग्रेट करने की क्षमता विकसित की है।

इस मॉडल के तहत लॉन्चर, स्ट्रक्चर और कई अहम कंपोनेंट्स भारत में बनाए जा रहे हैं, जबकि एडवांस्ड फायर कंट्रोल और गाइडेंस सिस्टम्स का इंटीग्रेशन किया जा रहा है। इससे न केवल विदेशी निर्भरता कम हुई है, बल्कि देश में डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को भी मजबूती मिलेगी। (Indian Army Suryastra)

आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत 2047 की दिशा में कदम

लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ ने इस दौरे के दौरान कहा कि भारतीय सेना और निजी रक्षा उद्योग के बीच इस तरह की साझेदारी भविष्य की जरूरत है। उन्होंने कहा कि आज की जियो-पॉलिटिकल स्थिति में देश को ऐसी क्षमताओं की जरूरत है, जो तेजी से विकसित हों और संकट के समय विदेशों पर निर्भर न रहें। उन्होंने यह भी कहा कि आत्मनिर्भर भारत सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि एक रणनीतिक जरूरत बन चुका है। (Indian Army Suryastra)