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Operation Sindoor vs Balakot Strike: बालाकोट से क्या सीखा भारत ने, ऑपरेशन सिंदूर में इन बातों का रखा ध्यान, मिला फायदा

Operation Sindoor vs Balakot Strike: Lessons Learned, Precision Delivered

Operation Sindoor vs Balakot Strike: भारत ने बुधवार को “ऑपरेशन सिंदूर” के तहत पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओके) में 9 आतंकी ठिकानों पर सटीक हमले किए। यह ऑपरेशन 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले का जवाब था, जिसमें 26 लोग मारे गए थे। साथ ही, यह पिछले दो दशकों के पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद, जैसे संसद हमला (2001), मुंबई हमला (2008), उरी (2016), और पुलवामा (2019) के खिलाफ भारत की निर्णायक कार्रवाई थी। लेकिन यह ऑपरेशन 2019 की बालाकोट एयर स्ट्राइक से कई मायनों में अलग है। बालाकोट से मिली सीख ने ऑपरेशन सिंदूर को और प्रभावी और सटीक बनाया। आइए, जानते हैं कि दोनों में क्या अंतर है और भारत ने बालाकोट से क्या सबक लिया?

Operation Sindoor vs Balakot Strike: बालाकोट स्ट्राइक

14 फरवरी 2019 को पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर आत्मघाती हमला हुआ था, जिसमें 40 जवान शहीद हुए थे। इसके जवाब में 26 फरवरी 2019 को भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में बालाकोट के जैश-ए-मोहम्मद (JeM) के आतंकी प्रशिक्षण शिविर पर हवाई हमला किया। इस ऑपरेशन में मिराज-2000 लड़ाकू विमानों ने 1000 किलोग्राम के स्पाइस-2000 बमों का इस्तेमाल किया, जिससे जैश का शिविर तबाह हो गया। भारत ने दावा किया कि 300 से अधिक आतंकी मारे गए, हालांकि पाकिस्तान ने इसे खारिज किया।

बालाकोट स्ट्राइक ने दिखाया कि आतंकवाद के खिलाफ भारत जीरो टॉलरेंस नीति रखता है। यह पहली बार था जब भारतीय वायुसेना ने एलओसी को पार करके पाकिस्तान में घुसकर हमला किया। लेकिन इस ऑपरेशन में कुछ चुनौतियां भी सामने आईं, जिन्हें भारत ने ऑपरेशन सिंदूर में सुधारा।

ऑपरेशन सिंदूर

ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय वायुसेना ने राफेल, मिराज, मिग-29 औऱ जैगुआर लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल किया गया। इस हमले में स्कैल्प क्रूज मिसाइलों औऱ हैमर बमों का इस्तेमाल किया। बुधवार तड़के 1:44 बजे नौ आतंकी ठिकानों पर हमले किए गए, जिनमें बहावलपुर (जैश-ए-मोहम्मद का मुख्यालय) और मुरीदके (लश्कर-ए-तैयबा का आधार) शामिल थे। बहावलपुर को राफेल ने निशाना बनाया, तो बाकी आतंकी अड्डों को नेस्तानाबूद करने में मिराज, मिग-29 औऱ जैगुआर लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल किया गया।

Operation Sindoor vs Balakot Strike: Lessons Learned, Precision Delivered

विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने बताया कि इन हमलों में 90 से अधिक आतंकी मारे गए और 60 से ज्यादा घायल हुए। हालांकि बालाकोट की तरह इस हमले में भी किसी भी पाकिस्तानी सैन्य ठिकाने को निशाना नहीं बनाया गया।

बालाकोट और ऑपरेशन सिंदूर में क्या है अंतर

बालाकोट में मिराज-2000 विमानों ने एक बड़े आतंकी शिविर को निशाना बनाया, लेकिन हमले के बाद पाकिस्तान ने नुकसान को कम करके दिखाया। जबकि ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने 9 ठिकानों को निशाना बनाया। स्कैल्प मिसाइलों ने छोटे-छोटे ठिकानों को भी सटीकता से नष्ट किया। इसके अलावा भारत ने इस बार ड्रोन और सैटेलाइट इमेजरी का भी बेहतर इस्तेमाल किया, जिससे खुफिया जानकारी अधिक विश्वसनीय थी।

बालाकोट स्ट्राइक के बाद भारत ने अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देशों को जानकारी दी, लेकिन कुछ देशों ने इसकी आलोचना की थी। लेकिन ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने पहले से ही वैश्विक समुदाय को भरोसे में लिया। हमले के तुरंत बाद अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, चीन और सऊदी अरब को कार्रवाई की जानकारी दी गई। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) के 25 अप्रैल के बयान, जिसमें आतंकवादियों को जवाबदेह ठहराने की बात थी, को भारत ने अपने पक्ष में इस्तेमाल किया।

इसके अलावा सबसे बड़ी बात यह कि बालाकोट स्ट्राइक का उद्देश्य आतंकियों को चेतावनी देना था, लेकिन इसका दायरा सीमित था। ऑपरेशन सिंदूर ने न केवल पहलगाम हमले का जवाब दिया, बल्कि दो दशकों के आतंकवाद का हिसाब भी लिया। प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिखाए गए 1 मिनट 40 सेकंड के वीडियो ने 2001 से 2025 तक के हमलों को सबसे सामने रखा, जिससे भारत ने वैश्विक स्तर पर पाकिस्तान को बेनकाब किया।

इस बार तुरंत सामने रखे सबूत

बालाकोट के बाद सबूतों की मांग ने सरकार को बैकफुट पर ला दिया था। विपक्ष ने सवाल उठाए, और पाकिस्तान ने प्रचार किया कि कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ। लेकिन ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने पहले ही सबूत तैयार रखे। हमले के कुछ घंटों बाद ही प्रेस विज्ञप्ति और सुबह प्रेस कॉन्फ्रेंस में सैटेलाइट तस्वीरें और वीडियो पेश किए गए। इससे न केवल विपक्ष के सवालों को ऑपरेशन की सफलता पर सवाल उठाने का मौका ही नहीं मिला, साथ ही वीडियो और फोटोग्राफ के जरिए पाकिस्तान के झूठ को भी बेनकाब किया गया।

सटीक खुफिया जानकारी

बालाकोट में खुफिया जानकारी पर कुछ सवाल उठे थे, क्योंकि पाकिस्तान ने नुकसान को कम करके दिखाया था। साथ ही उस समय हमारे पास सीधे विजुअल्स नहीं थे। जिससे पाकिस्तान स्ट्राइक की सफलता पर सवाल उठा रहा था। लेकिन ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने राष्ट्रीय तकनीकी अनुसंधान संगठन (एनटीआरओ), रॉ, और सैन्य खुफिया एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय किया। सैटेलाइट इमेज और ड्रोन ने ठिकानों की सटीक जानकारी दी, जिससे हमले अधिक प्रभावी हुए।

मीडिया और जनता को विश्वास में लिया

बालाकोट में सबूतों की देरी ने विपक्ष और पाकिस्तान को सवाल उठाने का मौका दिया। बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद भारत सरकार की ओर से आधिकारिक प्रेस कॉन्फ्रेंस 26 फरवरी 2019 को दोपहर में हुई थी। प्रेस कॉन्फ्रेंस में विदेश सचिव विजय गोखले ने स्ट्राइक के बारे में जानकारी दी थी, लेकिन सार्वजनिक रूप से कोई ठोस सबूत, जैसे सैटेलाइट तस्वीरें, ड्रोन फुटेज, या वीडियो, नहीं दिखाए थे। गोखले ने बताया था कि भारतीय वायुसेना ने खैबर पख्तूनख्वा के बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी शिविर पर सटीक हमला किया, जिसमें “बड़ी संख्या में आतंकी, प्रशिक्षक, और कमांडर” मारे गए। उन्होंने यह भी कहा कि यह कार्रवाई खुफिया जानकारी के आधार पर की गई थी, जिसके अनुसार जैश भारत में और हमले की योजना बना रहा था। हालांकि, प्रेस कॉन्फ्रेंस में केवल मौखिक बयान दिए गए, और कोई दृश्य सबूत (जैसे तस्वीरें या वीडियो) साझा नहीं किए गए। इसकी वजह से पाकिस्तान और भारत के कुछ विपक्षी दलों ने सबूतों की मांग की थी।

वहीं, ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने तथ्यों के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस की। वीडियो और खुफिया जानकारी साझा करके सरकार ने जनता का भरोसा जीता।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने बालाकोट की कमियों को सुधारकर ऑपरेशन सिंदूर को एक मॉडल ऑपरेशन बनाया। रक्षा विशेषज्ञ राहुल बेदी ने कहा, “ऑपरेशन सिंदूर भारत की सैन्य और कूटनीतिक परिपक्वता को दर्शाता है। यह दिखाता है कि भारत अब पहले से ज्यादा तैयार और आत्मविश्वास से भरा है।”

Operation Sindoor: 20 साल के जख्मों का एक जवाब, आतंक की जड़ें हिलाकर रख दीं!

ऑपरेशन सिंदूर को देश भर में समर्थन मिला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “हमारे सैनिकों ने आतंकियों को उनके घर में घुसकर सजा दी। यह भारत की नई ताकत है।” कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी ने भी सेना की कार्रवाई की सराहना की। खड़गे ने कहा, “आतंकवाद के खिलाफ भारत एकजुट है।”

Air Defence System: भारत-पाकिस्तान तनाव के बीच भारतीय सेना का बड़ा फैसला, खरीदेगी 48 VSHORADS लॉन्चर और 85 मिसाइलें

Air Defence System: Indian Army to be equipped with VSHORADS missiles

Air Defence System: भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव के बीच रक्षा मंत्रालय ने भारतीय सेना को और मजबूत करने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। मंत्रालय ने शनिवार को वेरी शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस सिस्टम (नेक्स्ट जनरेशन) यानी VSHORADS (NG) की खरीद के लिए रिक़्वेस्ट फॉर प्रपोजल (RFP) जारी किया है। इसके तहत सेना को 48 लॉन्चर, 48 नाइट विजन साइट्स, 85 मिसाइलें और 1 मिसाइल टेस्ट स्टेशन मिलेगा। यह खरीद DAP-2020 के तहत बाय (इंडियन) कैटेगरी में होगी, यानी इसमें मेक इन इंडिया को बढ़ावा दिया जाएगा। यह खबर ऐसे समय में आई है, जब 22 अप्रैल को कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद दोनों देशों के रिश्तों में तनाव चरम पर है।

Air Defence System: क्या होता है VSHORADS?

VSHORADS को आम भाषा में मैनपैड्स (मैन-पोर्टेबल एयर डिफेंस सिस्टम – Air Defence System) भी कहते हैं, एक ऐसा हथियार है जो कम दूरी पर दुश्मन के हवाई हमलों को नाकाम कर सकता है। यह हथियार खास तौर पर उन विमानों और ड्रोन्स को निशाना बनाता है जो नीची उड़ान भरते हैं, जैसे हेलिकॉप्टर, छोटे लड़ाकू विमान और मानव रहित हवाई वाहन (UAV)। इसे “फायर एंड फॉरगेट” हथियार कहा जाता है, यानी एक बार मिसाइल दागने के बाद यह अपने आप निशाने को ढूंढ लेती है और उसे तबाह कर देती है।

रक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “यह मिसाइल (Air Defence System) इन्फ्रारेड होमिंग तकनीक पर काम करती है। यह तकनीक विमान के इंजन से निकलने वाली गर्मी को ट्रैक करती है। एक बार फायर होने के बाद इसकी मारक क्षमता 95% तक होती है। यह हथियार नीची उड़ान भरने वाले विमानों के खिलाफ सबसे ज्यादा प्रभावी है।”

क्यों पड़ी VSHORADS की जरूरत?

22 अप्रैल को कश्मीर के पहलगाम में आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा पर तनाव चल रहा है। इस हमले में कई पर्यटकों की जान चली गई थी। भारत ने इस हमले के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया, जिसके बाद दोनों देशों की सीमा पर तनाव बढ़ गया। सीजफायर (Air Defence System)  उल्लंघन की घटनाएं भी बढ़ी हैं, और दोनों तरफ से छोटे हथियारों से गोलीबारी की खबरें आ रही हैं। ऐसे में भारतीय सेना को अपनी हवाई सुरक्षा को मजबूत करने की जरूरत महसूस हुई।

सूत्रों का कहना है, “पाकिस्तान की तरफ से ड्रोन हमले और नीची उड़ान भरने वाले विमानों (Air Defence System) का खतरा बढ़ रहा है। VSHORADS जैसे हथियार हमें इन खतरों से निपटने में मदद करेंगे। यह हथियार बेहद हल्का और मोबाइल है। इसे एक सैनिक आसानी से कंधे पर ले जा सकता है और पहाड़ी इलाकों, वाहनों या किसी भी जगह से इस्तेमाल कर सकता है।”

VSHORADS की खासियतें

VSHORADS हथियार (Air Defence System) की कई खासियतें हैं, जो इसे भारतीय सेना के लिए खास बनाती हैं। अगर दो मिसाइलें एक साथ दागी जाएं, तो यह 85% से ज्यादा की मारक क्षमता रखती है, खासकर तेज रफ्तार से उड़ने वाले लड़ाकू विमानों के खिलाफ। वहीं, इसकी न्यूनतम रेंज 500 मीटर और अधिकतम रेंज 6 किलोमीटर है। यानी यह 6 किमी के दायरे में आने वाले किसी भी हवाई खतरे को खत्म कर सकता है। हर मिसाइल की लंबाई 1.85 मीटर से ज्यादा नहीं होगी, जिससे इसे ले जाना आसान हो। खास बात यह है कि इसे एक सैनिक अकेले इस्तेमाल कर सकता है। लॉन्चर को कंधे पर रखा जाता है, और सैनिक अपने पीठ पर दो मिसाइलें ले जा सकता है। VSHORADS सिस्टम इन्फ्रारेड होमिंग तकनीक पर काम करती है, जो विमान के इंजन की गर्मी को ट्रैक करती है। वहीं अगर एक बार मिसाइल फायर हो जाए, तो यह अपने आप निशाने को ढूंढ लेती है।

VSHORADS सिस्टम में तीन मुख्य हिस्से होते हैं। इसके मिसाइल (Air Defence System) वाले हिस्से में विस्फोटक होता है जो निशाने को तबाह करता है। इसकी लॉन्च ट्यूब में मिसाइल को फायर करने का सिस्टम होता है। वहीं इसकी बैटरी यूनिट बिजली पैदा करती है, ताकि मिसाइल सही तरीके से काम कर सके।

105 देशों की सेनाओं के पास यह हथियार

मैनपैड्स (Air Defence System) का इस्तेमाल दुनिया भर में पिछले कई दशकों से हो रहा है। करीब 105 देशों की सेनाओं के पास यह हथियार है, लेकिन इसे बनाने वाले देशों की संख्या सिर्फ 12 है, जिनमें भारत भी शामिल है। सबसे मशहूर मैनपैड्स में अमेरिका का स्टिंगर, रूस का 9K32 स्ट्रेला-2 (SA-7) और हाल ही में चीन का FN-16 शामिल है।

मैनपैड्स का सबसे ज्यादा इस्तेमाल 1980 के दशक में अफगानिस्तान में मुजाहिदीनों (Air Defence System) ने किया था। उन्हें अमेरिका ने स्टिंगर मिसाइलें दी थीं। इन मिसाइलों ने सोवियत हेलिकॉप्टरों और नीची उड़ान भरने वाले विमानों को भारी नुकसान पहुंचाया था। बाद में तालिबान ने भी इन हथियारों का इस्तेमाल अमेरिकी सेना के खिलाफ किया और उनके हेलिकॉप्टरों को निशाना बनाया।

डीआरडीओ ने बनाया स्वदेशी VSHORADS

हालांकि भारत अभी VSHORADS (Air Defence System) की खरीद कर रहा है, लेकिन देश में इस तरह के हथियार को बनाने की कोशिश भी हो रही है। डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (DRDO) ने हाल ही में स्वदेशी VSHORADS सिस्टम को विकसित किया है। इसकी टेस्टिंग पिछले कुछ सालों से चल रही है, और अक्टूबर 2024 में इसके आखिरी टेस्ट सफल रहे। DRDO का दावा है कि यह मिसाइल ड्रोन, हेलिकॉप्टर और लड़ाकू विमानों को आसानी से निशाना बना सकती है।

लेकिन स्वदेशी VSHORADS अभी पूरी तरह तैयार नहीं है। इसे ऊंचे इलाकों जैसे लद्दाख में टेस्ट करना बाकी है। साथ ही, सेना के इस्तेमाल के लिए बड़े पैमाने पर इसका उत्पादन शुरू होने में अभी समय लगेगा। इसलिए रक्षा मंत्रालय ने तुरंत जरूरत को पूरा करने के लिए RFP जारी किया है।

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RFP की शर्तें और मेक इन इंडिया

रक्षा मंत्रालय ने RFP में साफ कहा है कि यह खरीद DAP-2020 के तहत होगी, जिसमें मेक इन इंडिया (Air Defence System) को प्राथमिकता दी जाती है। इसका मतलब है कि जो भी कंपनी इस हथियार को सप्लाई करेगी, उसे भारत में ही इसका कुछ हिस्सा बनाना होगा। मंत्रालय ने यह भी कहा है कि कॉन्ट्रैक्ट साइन होने के एक साल के अंदर सारी डिलीवरी पूरी करनी होगी। इसका मतलब है कि सेना को जल्द से जल्द यह हथियार चाहिए, ताकि सीमा पर बढ़ते खतरे से निपटा जा सके।

Pahalgam Revenge: बहावलपुर या मुरिदके पर गिर सकती है भारत की गाज, बिना बड़ी जंग के होगा करारा वार

Pahalgam Revenge: Bahawalpur or Muridke Likely Indian Targets, No War Needed

Pahalgam Revenge: जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल 2025 को हुए आतंकी हमले के बाद भारत अब जवाबी कार्रवाई की तैयारी में है। इस हमले में 26 पर्यटकों की जान गई थी, जिसके लिए भारत ने पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और उसकी शाखा द रेसिस्टेंस फ्रंट (TRF) को जिम्मेदार ठहराया। भारत सरकार ने साफ कर दिया है कि इस हमले का जवाब जरूर दिया जाएगा, लेकिन यह जवाब सधी हुई रणनीति के साथ होगा, ताकि बड़ा युद्ध न छिड़े।

Pahalgam Revenge: Bahawalpur or Muridke Likely Indian Targets, No War Needed

रक्षा मंत्रालय और सेना के सूत्रों के मुताबिक, भारत लाइन ऑफ कंट्रोल (LoC) पार किए बिना लंबी दूरी के हथियारों से सीमित हमले (Pahalgam Revenge) करने की योजना बना रहा है। इस बीच, पाकिस्तान ने भी भारत को चेतावनी दी है कि अगर हमला हुआ, तो उसका जवाब कड़ा होगा।

Pahalgam Revenge: कैबिनेट कमेटी की बैठक में जवाबी कार्रवाई की रणनीति

पहलगाम हमले के बाद 23 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की पहली बैठक हुई थी। इस बैठक में कई कूटनीतिक कदमों (Pahalgam Revenge) का ऐलान किया गया। बैठक में इंडस वाटर ट्रीटी को निलंबित करना, पाकिस्तानी हाई कमीशन को छोटा करना, और भारत में मौजूद सभी पाकिस्तानी नागरिकों के वीजा रद्द करना जैसे फैसले लिए गए। इसके बाद 30 अप्रैल को दूसरी CCS बैठक हुई, जिसमें जवाबी कार्रवाई की सैन्य रणनीति पर चर्चा हुई।

प्रधानमंत्री मोदी ने सेना के प्रमुखों को साफ निर्देश दिए कि उनके पास “पूरी ऑपरेशनल आजादी” है। यानी वे यह तय कर सकते हैं कि जवाबी कार्रवाई (Pahalgam Revenge) का तरीका, टारगेट, और समय क्या होगा। एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी ने बताया, “यह सवाल अब यह नहीं है कि सैन्य कार्रवाई होगी या नहीं, बल्कि यह है कि यह कब होगी। हमारा जवाब जल्दबाजी में नहीं, बल्कि सोच-समझकर, विश्वसनीय और सधी हुई रणनीति के साथ दिया जाएगा। हम बड़े युद्ध की तरफ नहीं जाएंगे।”

पाकिस्तान की जवाबी हमले की धमकी

पाकिस्तान ने भारत को कड़ी चेतावनी दी है। पाकिस्तानी सेना ने कहा कि अगर भारत ने कोई हमला किया, तो उसका जवाब बहुत सख्त होगा। पाकिस्तान ने अपनी सेना को अलर्ट पर रखा है और अपनी पूरे एय़र डिफेंस सिस्टम को एक्टिव कर दिया है। एक सैन्य अधिकारी ने बताया कि पिछले छह दिनों से LoC पर दोनों देशों (Pahalgam Revenge) की सेनाओं के बीच लगातार गोलीबारी हो रही है। पाकिस्तान कुपवाड़ा, बारामूला, उरी से लेकर नौशेरा, सुंदरबानी, अखनूर और पुंछ में सीजफायर का उल्लंघन कर रहा है। इतना ही नहीं, जम्मू में 198 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा (IB) पर भी गोलीबारी शुरू हो गई है।

29 अप्रैल को भारतीय सेना ने डीजीएमओ हॉटलाइन के जरिए पाकिस्तानी सेना (Pahalgam Revenge) को चेतावनी दी कि वह LoC पर “बिना उकसावे की गोलीबारी” बंद करे। लेकिन रात में पाकिस्तानी सेना ने फिर सीजफायर तोड़ा। उसने जम्मू के परगवाल सेक्टर में गोलीबारी शुरू कर दी। जिसका भारतीय सेना ने दोगुनी ताकत से जवाब दिया। एक अधिकारी ने कहा, “हमारी सेना हर सीजफायर उल्लंघन का मुंहतोड़ जवाब दे रही है।”

LoC पार किए बिना हमला

भारत की सैन्य रणनीति (Pahalgam Revenge) इस बार साफ है, जवाबी कार्रवाई LoC पार किए बिना होगी, ताकि बड़ा युद्ध न छिड़े। इसके लिए लंबी दूरी के हथियारों का इस्तेमाल किया जाएगा। रक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि भारत 155 मिमी आर्टिलरी गन, 120 मिमी मोर्टार, और एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलों से पाकिस्तानी सेना के ठिकानों और “आतंकी लॉन्च पैड्स” पर हमला कर सकता है। ये लॉन्च पैड LoC के पास बने हैं, जहां से आतंकी भारत में घुसपैठ करते हैं।

अधिकारी ने कहा, “LoC पार किए बिना भी हम लंबी दूरी के हथियारों से पाकिस्तानी सेना को भारी नुकसान पहुंचा सकते हैं। हमें खबरें मिली हैं कि पाकिस्तानी सेना के पास 155 मिमी आर्टिलरी गोले की कमी है। उन्होंने अपना रिजर्व स्टॉक तीसरे पक्ष के जरिए यूक्रेन भेजा है, ताकि वे पैसे कमा सकें।” इसका मतलब है कि भारत की इस रणनीति से पाकिस्तानी सेना पर दबाव बढ़ सकता है।

भारत के पास और क्या हैं विकल्प

भारत के पास और भी सैन्य विकल्प हैं, जो सधी हुई कार्रवाई (Pahalgam Revenge) के तहत इस्तेमाल किए जा सकते हैं। एक विकल्प है सर्जिकल स्ट्राइक, जैसी 2016 में उरी हमले के बाद की गई थी। उरी में 19 भारतीय सैनिकों की शहादत के बाद भारतीय सेना की पैरा-स्पेशल फोर्स ने LoC के पास चार अलग-अलग जगहों पर आतंकी लॉन्च पैड्स को नष्ट कर दिया था। इस बार भी ऐसी कार्रवाई की जा सकती है, जिसमें छोटे पैमाने पर सीमा पार जाकर हमले किए जाएं।

दूसरा विकल्प है हवाई हमले, जैसा 2019 में बालाकोट (Pahalgam Revenge) में किया गया था। बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद (JeM) के आतंकी ठिकाने पर भारतीय वायु सेना (IAF) ने हमला किया था। एक सैन्य अधिकारी ने बताया कि इस बार वायु सेना के पास पहले से ज्यादा ताकतवर हथियार और विमान हैं। 2019 में बालाकोट हमले के दौरान वायु सेना के पास 4.5 जेनरेशन राफेल फाइटर जेट्स नहीं थे, लेकिन अब वे मौजूद हैं। इसके अलावा, मिराज-2000, सुखोई-30 MKI जैसे विमान फ्रांस की ‘स्काल्प’ एयर-टु-ग्राउंड क्रूज मिसाइल, इजरायल की क्रिस्टल मेज मिसाइल, और स्पाइस-2000 प्रिसिजन गाइडेड बम से लैस हैं।

अधिकारी ने कहा, “इस बार टारगेट JeM का मुख्यालय बहावलपुर या LeT का मुख्यालय मुरिदके हो सकता है। ये दोनों संगठन पहलगाम हमले में शामिल थे।” लेकिन हवाई हमले एक जोखिम भरा कदम हो सकता है, क्योंकि इससे तनाव बढ़ने की आशंका है।

Coup in Pakistan?: पाकिस्तान में सैन्य तख्तापलट की आहट? ISI प्रमुख असीम मलिक को इसलिए बनाया NSA! इमरान खान की बढ़ेंगी मुसीबतें

पाकिस्तान को हमले का डर

पाकिस्तान को भारत की जवाबी कार्रवाई (Pahalgam Revenge) का डर सता रहा है। उसने अपनी सेना को हाई अलर्ट पर रखा है और अपने एय़र डिफेंस सिस्टम को एक्टिव कर दिया है। लेकिन भारत की रणनीति साफ है – जवाबी कार्रवाई सधी हुई होगी, ताकि बड़ा युद्ध न छिड़े। भारत का मकसद पाकिस्तान को यह संदेश देना है कि वह आतंकवाद को बर्दाश्त नहीं करेगा, लेकिन साथ ही वह तनाव को बढ़ने से रोकना चाहता है।

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Coup in Pakistan? ISI Chief Asim Malik's surprise appointment as NSA raises coup fears

Coup in Pakistan?: पाकिस्तान की सियासत में एक बार फिर से बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। सरकार ने 29 अप्रैल 2025 को एक अधिसूचना जारी कर ISI (इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस) के डायरेक्टर जनरल लेफ्टिनेंट जनरल मोहम्मद असीम मलिक को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) का अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया। यह पहली बार है, जब एक सक्रिय ISI प्रमुख को NSA की जिम्मेदारी दी गई है। हालांकि इस कदम को भारत-पाक के बीच चल रहे तनाव से जोड़ कर देखा जा रहा है। लेकिन जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति को देखते हुए किया गया है। वहीं, कई विशेषज्ञ इसे सैन्य तख्तापलट की आहट मान रहे हैं, खासकर तब जब पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान जेल में हैं और उनकी पार्टी PTI पर दबाव बढ़ता जा रहा है।

Coup in Pakistan? ISI Chief Asim Malik's surprise appointment as NSA raises coup fears

Coup in Pakistan?: NSA का पद कब से खाली था?

पाकिस्तान में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) का पद 3 अप्रैल 2022 से खाली था। इस दिन मोईद यूसुफ ने NSA पद से इस्तीफा दे दिया था। मोईद यूसुफ को 17 मई 2021 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान ने NSA नियुक्त किया था। वह पाकिस्तान के 9वें NSA थे और उनके पास फेडरल कैबिनेट मिनिस्टर का दर्जा था। मोईद यूसुफ ने इस्तीफा अप्रैल 2022 में इमरान खान की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव (Coup in Pakistan) और सत्ता परिवर्तन के बाद दिया था। 10 अप्रैल 2022 को इमरान खान की सरकार गिर गई, और शहबाज शरीफ नए प्रधानमंत्री बने। जिसके बाद मोईद यूसुफ ने पद छोड़ दिया, क्योंकि वह खान के करीबी माने जाते थे।

इसके बाद 3 अप्रैल 2022 से 30 अप्रैल 2025 तक, यानी लगभग 3 साल और 27 दिन (करीब 37 महीने) तक NSA का पद खाली रहा। इस दौरान शहबाज शरीफ सरकार ने किसी को भी इस पद पर नियुक्त नहीं किया।

Coup in Pakistan?: क्यों नहीं भरा ये पद?

हालांकि शहबाज शरीफ सरकार ने NSA पद को खाली रखने का कोई आधिकारिक कारण (Coup in Pakistan) तो जाहिर नहीं किया, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह सेना और सरकार के बीच तनाव का नतीजा था। सेना का प्रभाव बढ़ने और सरकार की कमजोर स्थिति के चलते यह पद रिक्त रहा। इसके अलावा, इमरान खान और उनकी पार्टी PTI पर दबाव डालने के लिए भी सेना इस पद को भरने से बचती रही, ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े फैसले सीधे सेना के नियंत्रण में रहें। वहीं अब आईएसआई चीफ मलिक की नियुक्ति से यह नियंत्रण और मजबूत हो गया है।

क्या था अधिसूचना में?

पाकिस्तान सरकार के कैबिनेट सचिवालय ने 29 अप्रैल 2025 को एक अधिसूचना जारी की, जिसमें कहा गया कि लेफ्टिनेंट जनरल मोहम्मद असीम मलिक, जो ISI के डायरेक्टर जनरल (DG ISI) हैं, को तत्काल प्रभाव से राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) का अतिरिक्त प्रभार (Coup in Pakistan) दिया गया है। अधिसूचना पर कैबिनेट सेक्रेटरी कमरान अली अफजल और सेक्शन ऑफिसर मुहम्मद मीसम ने दस्तखत किए हैं। यह अधिसूचना गजट ऑफ पाकिस्तान में प्रकाशित की जाएगी और इसे सभी मंत्रालयों, प्रांतों और संबंधित विभागों को भेजा गया है।

असीम मलिक की यह नियुक्ति इसलिए भी खास है, क्योंकि वह अख्तर अब्दुर रहमान खान (जिन्होंने 1979-1987 तक ISI प्रमुख और सिक्योरिटी एडवाइजर के तौर पर जिया-उल-हक के साथ काम किया) के बाद दूसरे ऐसे सैन्य अधिकारी बन गए हैं, जिन्हें यह दोहरी जिम्मेदारी दी गई है।

पहलगाम हमले का असर

यह नियुक्ति ऐसे समय में हुई है, जब भारत और पाकिस्तान (Coup in Pakistan) के बीच तनाव चरम पर है। 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 पर्यटकों की जान गई थी। इस हमले की जिम्मेदारी द रेसिस्टेंस फ्रंट (TRF) ने ली थी, जो लश्कर-ए-तैयबा (LeT) का एक मुखौटा संगठन माना जाता है। भारत ने इस हमले के लिए पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद को जिम्मेदार ठहराया और इंडस वाटर ट्रीटी को निलंबित करना, वाघा-अटारी सीमा को बंद करना, और पाकिस्तानी नागरिकों के वीजा रद्द करना जैसे कदम कई कड़े उठाए।

वहीं भारत के इन कदमों और संभावित सैन्य जवाब (जैसे सर्जिकल स्ट्राइक) ने पाकिस्तान में खलबली मचा दी। सूचना मंत्री अत्ताउल्लाह तरार ने दावा किया कि भारत अगले 24-36 घंटों में हमला कर सकता है। रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने तो यह तक कहा कि अगर भारत ने हमला किया, तो पाकिस्तान परमाणु हथियारों का इस्तेमाल कर सकता है। ऐसे संकट के बीच असीम मलिक की नियुक्ति को भारत के खिलाफ रणनीति बनाने के तौर पर देखा जा रहा है।

सैन्य तख्तापलट की आशंका

पाकिस्तान मामलों के जानकार प्रोफेसर सूर्य मलिक ने इस नियुक्ति को सैन्य तख्तापलट (Coup in Pakistan) की आहट बताया। उन्होंने कहा कि असीम मलिक का रिटायरमेंट अक्टूबर 2025 में और सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर का रिटायरमेंट नवंबर 2025 में होने वाला है। ऐसे में यह नियुक्ति एक सैन्य तख्तापलट की तैयारी हो सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि मलिक की दोहरी भूमिका (ISI और NSA) मिलने के बाद पाकिस्तानी सेना राष्ट्रीय सुरक्षा नीतियों (Coup in Pakistan) को अपने हिसाब से कंट्रोल कर सकती है। उनका कहना है कि इससे यह भी साबित होता है कि सरकार पर इस समय पर सेना का पूरा नियंत्रण है। शहबाज शरीफ कमजोर प्रधानमंत्री हैं। उन्होंने इसे “नागरिक संस्थानों का सैन्यीकरण” बताया, जो पाकिस्तान की लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए खतरनाक हो सकता है।

इमरान खान और PTI पर बढ़ा दबाव

कुछ विशेषज्ञ इसे पहलगाम हमले (Pahalgam Attack) के बाद इमरान खान के बयान से जोड़ कर देख रहे हैं। इस हमले के बाद पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान, जो इस समय जेल में हैं, उन्होंने अपने आधिकारिक X अकाउंट के जरिए एक बयान जारी किया। यह बयान 29 अप्रैल 2025 को सामने आया, जिसमें खान ने हमले की निंदा की, भारत को चेतावनी दी, और शांति पर जोर दिया। इमरान खान ने अपने बयान में पहलगाम हमले (Coup in Pakistan) को “बेहद परेशान करने वाला और दुखद” बताया। उन्होंने हमले में मारे गए लोगों के प्रति संवेदना व्यक्त की और भारत पर कई गंभीर आरोप लगाए। वहीं, खान ने अपने देश की स्थिति पर भी टिप्पणी की और कहा, “दुख की बात है कि एक फर्जी फॉर्म-47 चुनाव परिणामों के जरिए थोपी गई अवैध सरकार ने राष्ट्र को बांट दिया है।”

वहीं इमरान खान (Coup in Pakistan) के इस बयान के बाद ही नया एनएसए नियुक्त करने का फैसला लिया गया। इस नियुक्ति का एक बड़ा असर इमरान खान और उनकी पार्टी PTI पर पड़ सकता है। इमरान खान इस समय जेल में हैं, और PTI पर सैन्य और सरकारी दबाव बढ़ता जा रहा है। एक सूत्र ने दावा किया कि सेना और सरकार इमरान खान को जेल में खत्म करने की योजना बना रहे हैं, जिसमें PTI के नेता अली अमीन गंडापुर की मदद ली जा रही है। दावा किया जा रहा है कि गंडापुर को जल्द ही PTI का नया अध्यक्ष बनाया जा सकता है, ताकि खान का प्रभाव खत्म हो।

असीम मलिक ने पहले भी PTI के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। 2023 में मई 9 दंगों (जो खान की गिरफ्तारी के बाद भड़के थे) की जांच मलिक ने ही की थी, जिसमें PTI के कई नेताओं और समर्थकों को गिरफ्तार किया गया। उनकी NSA नियुक्ति से PTI पर दबाव और बढ़ सकता है। NSA के तौर पर वह राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर PTI के प्रदर्शनों को और दबा सकते हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि सेना भारत के साथ तनाव का इस्तेमाल खान की रिहाई की मांग को दबाने के लिए कर रही है। उनकी नियुक्ति से PTI को और सख्ती का सामना करना पड़ सकता है। वहीं, PTI समर्थक मलिक को “मुनीर का हथियार” मानते हैं, जो खान की रिहाई और उनकी पार्टी की गतिविधियों को रोकने के लिए काम करेगा।

पाकिस्तान में आंतरिक अस्थिरता

पाकिस्तान इस समय कई आंतरिक चुनौतियों (Coup in Pakistan) से जूझ रहा है। बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में आतंकवादी हमले बढ़ रहे हैं। हाल ही में बलूच विद्रोहियों ने एक ट्रेन को हाईजैक कर 25 यात्रियों की हत्या कर दी थी। इसके अलावा, आर्थिक संकट ने भी सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। ऐसे में सेना और ISI की भूमिका और मजबूत हो गई है।

असीम मलिक की नियुक्ति को सेना की उस रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें वह भारत के साथ तनाव को बढ़ाकर जनता का ध्यान आंतरिक समस्याओं से हटाना चाहती है। सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर पर भी अपनी छवि सुधारने का दबाव है, क्योंकि खान की गिरफ्तारी के बाद उनकी लोकप्रियता में कमी आई है। मलिक की नियुक्ति से मुनीर को एक भरोसेमंद सहयोगी मिल गया है, जो उनकी रणनीतियों को लागू कर सकता है।

पहला PhD धारक ISI प्रमुख

असीम मलिक ISI के पहले डायरेक्टर जनरल हैं, जिनके पास डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी (PhD) की डिग्री है। उन्होंने नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी (NDU), इस्लामाबाद से अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों पर शोध करके यह डिग्री हासिल की। मलिक ने अमेरिका के फोर्ट लेवनवर्थ में पढ़ाई के दौरान “माउंटेन वॉरफेयर: द नीड फॉर स्पेशलिस्ट ट्रेनिंग” शीर्षक से एक थीसिस लिखी। यह थीसिस पहाड़ी क्षेत्रों में युद्ध की रणनीतियों पर केंद्रित थी। भारत-पाकिस्तान सीमा, खासकर लाइन ऑफ कंट्रोल (LoC) और PoK जैसे इलाकों से भी इसे जोड़ कर देखा जा रहा है।

मलिक एक सैन्य परिवार से आते हैं। उनके पिता, लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) गुलाम मोहम्मद मलिक (जिन्हें “जनरल GM” कहा जाता था), 1990 के दशक में 10 कोर, रावलपिंडी के कमांडर थे और कश्मीर में LoC की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार थे। अपने पिता के नक्शे कदम पर चल कर मलिक ने फौज ज्वॉइन की। उन्होंने पाकिस्तान मिलिट्री एकेडमी (PMA) के 80वें लॉन्ग कोर्स में स्वॉर्ड ऑफ ऑनर जीता। रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल नईम खालिद लोधी ने मलिक को “शांत लेकिन सम्मानित” अधिकारी बताया था।

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वहीं, मलिक ने एडजुटेंट जनरल (AG) के तौर पर मई 9, 2023 के दंगों की जांच की थी, जो इमरान खान की गिरफ्तारी के बाद भड़के थे। उन्होंने पूर्व ISI प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल फैज हमीद के खिलाफ कोर्ट मार्शल की प्रक्रिया शुरू की और उसकी निगरानी की। हमीद पर भ्रष्टाचार और सैन्य अनुशासन तोड़ने के आरोप थे।

Explained NSAB: राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड में बड़ा बदलाव, रॉ चीफ की वापसी और तीनों सेनाओं के वेटरंस शामिल, भारत की सुरक्षा रणनीति को कैसे मिलेगा फायदा?

Explained NSAB: Major revamp, ex-RAW chief to lead, veterans join, what it means for India’s security

Explained NSAB: 30 अप्रैल 2025 को भारत सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड (NSAB) का पुनर्गठन कर एक महत्वपूर्ण कदम उठाया। इस बोर्ड के नए अध्यक्ष के रूप में पूर्व रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (R&AW) प्रमुख अलोक जोशी को नियुक्त किया गया है। सात सदस्यीय इस बोर्ड में तीन सैन्य सेवानिवृत्त अधिकारी, दो भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के सेवानिवृत्त अधिकारी, और एक भारतीय विदेश सेवा (IFS) का सेवानिवृत्त अधिकारी शामिल हैं। इस बोर्ड के पुनर्गठन का समय बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि हाल ही में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले और भारत-पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव ने राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं।

Explained NSAB: Major revamp, ex-RAW chief to lead, veterans join, what it means for India’s security

Explained NSAB: क्या है और क्या करता है?

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड (National Security Advisory Board – NSAB) भारत की सुरक्षा से जुड़ा एक बहुत महत्वपूर्ण समूह है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (NSC) को सलाह देता है, जिसके प्रमुख खुद प्रधानमंत्री होते हैं। NSC देश की सुरक्षा और विदेश नीति के बड़े फैसले लेता है, और NSAB उसे लंबे समय तक चलने वाली योजनाएं और सुझाव देता है। इस बोर्ड का काम है कि यह आतंकवाद, सीमा की सुरक्षा, साइबर खतरों और पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों जैसे मुद्दों पर सरकार को रास्ता दिखाए।

NSAB की शुरुआत 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने की थी। इसमें आमतौर पर सेना, खुफिया एजेंसी, पुलिस और विदेश सेवा के रिटायर्ड विशेषज्ञ शामिल होते हैं। यह बोर्ड सरकार से थोड़ा अलग काम करता है, ताकि वह निष्पक्ष और भविष्य को ध्यान में रखकर सलाह दे सके। उदाहरण के लिए, 2001 में NSAB ने भारत की परमाणु नीति बनाई थी और 2002 में रक्षा से जुड़े बड़े दस्तावेज तैयार किए थे।

Explained NSAB: सात लोगों का नया बोर्ड बनाया

इस बार सरकार ने NSAB को और मजबूत करने के लिए सात लोगों का नया बोर्ड बनाया है। इसका नेतृत्व अलोक जोशी कर रहे हैं, जो R&AW के पूर्व प्रमुख हैं। जोशी ने अपने करियर में कई बड़े खुफिया ऑपरेशन को अंजाम दिया है, और उनकी नियुक्ति से भारत की खुफिया और बाहरी सुरक्षा को नई ताकत मिलेगी। जोशी गहरी रणनीतिक सोच और कूटनीतिक समझ रखते हैं। साथ ही, भारत की विदेश नीति और खुफिया रणनीति को लेकर लंबा अनुभव है।

Explained NSAB: Major revamp, ex-RAW chief to lead, veterans join, what it means for India’s security
Former RAW Chief Alok Joshi

बोर्ड के बाकी छह सदस्य इस प्रकार हैं:

  • एयर मार्शल पी.एम. सिन्हा (रिटायर्ड) वायुसेना के वेस्टर्न एयर कमांड के पूर्व प्रमुख रहे हैं, जो वायुसेना की ताकत और एयर स्ट्रैटेजी में विशेषज्ञता रखते हैं।
  • लेफ्टिनेंट जनरल ए.के. सिंह (रिटायर्ड) थलसेना के साउदर्न आर्मी कमांडर के रूप में सेवा दे चुके हैं, और थल सेना के रणनीतिक अभियानों में लंबा अनुभव है।
  • रियर एडमिरल मॉन्टी खन्ना (रिटायर्ड) नौसेना के वरिष्ठ अधिकारी हैं, जो समुद्री सुरक्षा व हिंद महासागर क्षेत्र की रणनीति के जानकार हैं।
  • राजीव रंजन वर्मा (रिटायर्ड IPS) पुलिस के पूर्व अधिकारी हैं और रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स के पूर्व महानिदेशक भी रहे हैं। उन्हें आंतरिक सुरक्षा और लॉ एंड ऑर्डर का लंबा अनुभव है।
  • मनमोहन सिंह (रिटायर्ड IPS) सशस्त्र सीमा बल (SSB) के पूर्व महानिदेशक रह चुके हैं। साथ ही, वे भारत-नेपाल और भारत-भूटान सीमा सुरक्षा के विशेषज्ञ भी हैं।
  • बी. वेंकटेश वर्मा (रिटायर्ड IFS) पूर्व राजनयिक हैं, रूस में पूर्व राजदूत रह चुके हैं। उनका रक्षा और परमाणु कूटनीति में विशेष योगदान रहा है।

इस बोर्ड में सेना, पुलिस और विदेश सेवा के लोग शामिल हैं, जो इसे हर तरह की सुरक्षा चुनौतियों से निपटने में सक्षम बनाएगा। यह बोर्ड आतंकवाद, साइबर हमले और पड़ोसी देशों के साथ तनाव जैसे मुद्दों पर एक साथ काम करेगा।

Explained NSAB: क्यों हुआ यह पुनर्गठन?

NSAB का नया स्वरूप ऐसे समय में सामने आया है, जब भारत को कई तरह की सुरक्षा समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 लोग मारे गए, जिनमें ज्यादातर पर्यटक थे। भारत ने इस हमले के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि यह सीमा पार से आतंकवाद का हिस्सा है। इसके बाद भारत ने इंडस वाटर ट्रीटी को रोक लगा दी, सीमा पर सैनिकों की संख्या बढ़ा दी और पाकिस्तान के साथ हवाई यात्रा और व्यापार पर पाबंदी लगा दी। इसके अलावा साइबर हमले और हाइब्रिड वॉर का खतरा भी बढ़ रहा है। ऐसे में भारत को एक ऐसे रणनीतिक सलाहकार ढांचे की जरूरत थी जो केवल कागजी न रहकर जमीनी, खुफिया, तकनीकी और कूटनीतिक मोर्चों पर सरकार की मदद कर सके।

इन सभी घटनाओं के बीच, NSAB का पुनर्गठन भारत की सुरक्षा को और मजबूत करने का एक जरूरी कदम है। यह फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की बैठक के बाद लिया गया, जिसमें आतंकवाद और सीमा सुरक्षा पर गहन चर्चा हुई थी।

NSAB के पुनर्गठन से क्या फायदे होंगे?

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड (NSAB) आतंकवाद, उग्रवाद, साइबर सुरक्षा, समुद्री सुरक्षा, परमाणु नीति, विदेश नीति में रणनीति, सैन्य आधुनिकीकरण, सीमा प्रबंधन, और रक्षा अनुसंधान व विकास पर सलाह देता है। यह भारत की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए दीर्घकालिक रणनीतियां बनाता है।

NSAB का नया स्वरूप भारत की सुरक्षा को कई तरह से मजबूत करेगा। यह बोर्ड देश को मौजूदा और भविष्य की चुनौतियों से निपटने में मदद करेगा। नए बोर्ड में हर क्षेत्र के विशेषज्ञ एक साथ हैं। इसमें सेना, पुलिस, खुफिया और विदेश सेवा के अनुभवी लोग हैं। नए बोर्ड को हर तरह की समस्या को अलग-अलग नजरिए से देखने और हल करने की ताकत मिलेगी। मिसाल के तौर पर, अलोक जोशी खुफिया जानकारी जुटाने और आतंकवाद से निपटने की योजना बनाएंगे। सैन्य अधिकारी युद्ध और रक्षा की रणनीति पर काम करेंगे, जबकि राजनयिक विदेश नीति को बेहतर बनाएंगे।

पहलगाम हमले ने दिखाया कि आतंकवाद अब भी भारत के लिए बड़ा खतरा है। NSAB का नया बोर्ड आतंकवाद के खिलाफ लंबे समय तक चलने वाली योजनाएं बनाएगा। यह बोर्ड सरकार को सलाह देगा कि पाकिस्तान से आने वाले आतंकवाद को कैसे रोका जाए, खुफिया जानकारी को कैसे बेहतर किया जाए और आतंकवादियों को पकड़ने के लिए क्या कदम उठाए जाएं।

पड़ोसी देशों के साथ तनाव से निपटने में भी यह बोर्ड मदद करेगा। NSAB का बोर्ड इन समस्याओं का गहराई से विश्लेषण करेगा और भारत को सैन्य और कूटनीतिक रणनीति सुझाएगा। मिसाल के तौर पर, अगर पाकिस्तान आतंकियों की मदद कर रहा है, तो बोर्ड भारत को जवाबी कदम उठाने की सलाह दे सकता है।

आज युद्ध सिर्फ बंदूक और टैंक से नहीं, बल्कि कंप्यूटर और ड्रोन से भी लड़ा जाता है। NSAB का नया बोर्ड साइबर हमलों, ड्रोन युद्ध और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे नए खतरों से निपटने की योजना बनाएगा। अलोक जोशी जैसे विशेषज्ञ साइबर खुफिया जानकारी को और मजबूत करेंगे, ताकि भारत के बैंक, बिजली ग्रिड और सरकारी सिस्टम सुरक्षित रहें।

NSAB के पुलिस अधिकारी, जैसे राजीव रंजन वर्मा और मनमोहन सिंह, देश की पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को बेहतर बनाने की सलाह देंगे। यह बोर्ड केंद्र और राज्य सरकारों के बीच सुरक्षा को लेकर तालमेल बढ़ाने में भी मदद करेगा।

इसके अलावा NSAB का बोर्ड भारत को दुनिया के मंच पर और मजबूत बनाएगा। यह संयुक्त राष्ट्र और अन्य जगहों पर भारत की सुरक्षा नीतियों को सही तरीके से पेश करने की रणनीति बनाएगा। मिसाल के तौर पर, यह बोर्ड पाकिस्तान के आतंकवाद समर्थन को दुनिया के सामने लाने के लिए ठोस सबूत और रास्ते सुझा सकता है।

NSAB का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह भविष्य को ध्यान में रखकर योजनाएं बनाता है। यह बोर्ड अगले 10-20 साल में भारत को किन खतरों का सामना करना पड़ सकता है, जैसे जलवायु परिवर्तन, पानी की कमी या पड़ोसी देशों की नीतियां, इन पर सलाह देगा। इससे भारत पहले से तैयार रहेगा।

क्यों जरूरी था बदलाव?

2020 के बाद भारत ने देखा कि चीन और पाकिस्तान के साथ सीमाओं पर तनाव बढ़ा है। साइबर हमले और हाइब्रिड वॉर का खतरा भी गहराया है। ऐसे में भारत को एक ऐसे रणनीतिक सलाहकार ढांचे की जरूरत थी जो केवल कागज़ी न रहकर जमीनी, खुफिया, तकनीकी और कूटनीतिक मोर्चों पर सरकार की मदद कर सके।

अजीत डोभाल को करता है रिपोर्ट

NSAB सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल को रिपोर्ट करता है। इसका फीडबैक प्रधानमंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद को जाता है। इसका काम है नीतिगत सिफारिशें तैयार करना, जिन पर राष्ट्रीय स्तर पर फैसले लिए जा सकते हैं।

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क्यों भारत के लिए है Gamechange?

भारत आज जिस जियोपॉलिटिकल टकराव के दौर से गुजर रहा है, उसमें NSAB जैसे रणनीतिक सलाहकार बोर्ड का मजबूत और अनुभवी होना जरूरी है। RAW के पूर्व प्रमुख से लेकर सेना और विदेश सेवा के दिग्गजों की मौजूदगी यह सुनिश्चित करेगी कि भारत की सुरक्षा नीतियां व्यापक, व्यावहारिक और भविष्य के प्रति सोच रखते हों। यह बोर्ड न सिर्फ सरकार को सही सलाह देगा, बल्कि भारत की रणनीतिक तैयारी और प्रतिक्रिया क्षमता को भी सुदृढ़ करेगा। बदलते वैश्विक समीकरणों में यह बदलाव भारत के लिए “रणनीतिक आत्मनिर्भरता” की दिशा में एक अहम कदम है।

India-Pak tension: Pahalgam हमले के बाद पाकिस्तान को भारतीय सेनाओं का खौफ, जंग हुई तो उतारेगा ‘प्राइवेट आर्मी’!

India-Pak Tension: Pak Plans to Deploy Private Army Amid Pahalgam Fallout
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India-Pak tension: पहलगाम आतंकी हमले में पाकिस्तान का हाथ होने के सबूतों के बाद अंतरराष्ट्रीय सीमा यानी आईबी और एलओसी पर तनाव चरम पर है। पिछले चार दिनों से लगातार पाकिस्तान की तरफ से सीज फायर तोड़ा जा रहा है और भारतीय ठिकानों पर जमकर गोलाबारी की जा रही है। हालांकि इन हमलों का भारतीय सेना मुंहतोड़ जवाब भी दे रही है। पाकिस्तान को इस बात की दहशत है कि भारत कभी भी हमला कर सकता है, इसके लिए उसने विदेशी निजी सैन्य कंपनी को भी हायर किया है। सूत्रों ने बताया कि पाकिस्तानी सेना ने प्राइवेट मिलिट्री कंपनी (PMC) के करार किया है। कहा जा रहा है कि अगर भारत-पाक के बीच युद्ध के हालात बनते हैं, तो यह कंपनी पाकिस्तान सेना की मदद करेगी।

India-Pak Tension: Pak Plans to Deploy Private Army Amid Pahalgam Fallout
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India-Pak tension: क्या होती हैं पीएमसी?

निजी सैन्य कंपनियां (पीएमसी) ऐसी निजी फर्में हैं जो सैन्य और सुरक्षा सेवाएं देती हैं। ये सरकारी (India-Pak tension) सेनाओं, निजी कंपनियों, या गैर-राज्य संगठनों के लिए काम करती हैं। वैगनर ग्रुप (रूस), वेस्टर्न पीएमसी, मोजार्ट ग्रुप और ब्लैकवाटर (अमेरिका) जैसी पीएमसी ने यूक्रेन, सीरिया, और इराक जैसे संघर्षों में हिस्सा लिया है। पीएमसी में अक्सर पूर्व सैनिक, खासकर विशेष बलों के, शामिल होते हैं, क्योंकि उनकी ट्रेनिंग और अनुभव उच्च स्तर का होता है। डेल्टा पीएमसी में ब्रिटिश सेना के पूर्व स्पेशल फोर्सेस (एसएएस) के जवान शामिल हैं। हालांकि पीएमसी बेहद महंगी होती हैं। वैगनर के सैनिकों को प्रति माह 2500-3000 डॉलर मिलते हैं। इसके अलावा 1989 के यूएन मर्सिनरी कन्वेंशन में भाड़े के सैनिकों की भर्ती और इस्तेमाल पर रोक है। लेकिन पाकिस्तान ने इस पर दस्तखत नहीं किए हैं।

India-Pakistan tension: पाकिस्तानी सेना की काबिलियत पर भरोसा नहीं

सूत्रों ने दावा किया है कि पाकिस्तानी हुक्मरानों (India-Pak tension) में इस कदर दहशत है कि उन्हें पाकिस्तानी सेना की काबिलियत पर भरोसा नहीं हो रहा है। जिस तरह से बलुचिस्तान में वहां की बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) ने 11 मार्च 2025 को जाफर एक्सप्रेस ट्रेन का अपहरण किया था, जिसमें 100 से अधिक पाकिस्तानी सैनिकों को बंधक बना लिया गया था। इस घटना के बाद बंधकों को छुड़ाने में पाकिस्तानी सेना के हाथ पैर फूल गए थे। इस घटना के बाद पाकिस्तानी हुक्मरानों का भरोसा अपनी ही सेना से डगमगा गया था। जिसके बाद माना जा रहा है कि उन्होंने प्राइवेट मिलिट्री कंपनी की सेवाएं लेने का फैसला किया हो। हालांकि सूत्रों का यह भी कहना है कि ये भाड़े के सैनिक शायद ही सीधे एलओसी पर तैनात हों। लेकिन हो सकता है कि वे पाकिस्तानी सेना को लॉजिस्टिक्स या ट्रेनिंग में मदद करें। इस बात के भी कयास हैं कि युद्ध के हालात में जब पाकिस्तानी सेना बॉर्डर पर तैनात हो, तो ये पाकिस्तान के अहम मिलिट्री प्रतिष्ठानों और महत्वपूर्ण लोगों की सुरक्षा में तैनात हों।

India-Pakistan tension: तुर्किए से भी मांगी मदद

हालांकि पाकिस्तान सेना में 6.5 लाख सक्रिय सैनिक और स्पेशल सर्विस ग्रुप हैं। लेकिन फिर भी पाकिस्तानी सरकार (India-Pak tension) को उन पर भरोसा नहीं है। पाकिस्तानी पहले ही तुर्किए से सैन्य मदद मांगी, जिसके बाद तुर्किए ने पहलगाम हमले के बाद कई सैन्य कार्गो विमान पाकिस्तान भेजे, जिनमें युद्ध उपकरण और हथियार शामिल थे। एक तुर्की वायुसेना का C-130 हरक्यूलिस कार्गो विमान कराची में उतरा, जिसमें अज्ञात युद्ध उपकरण थे। इसके अलावा, छह अन्य C-130 विमान इस्लामाबाद के एक सैन्य अड्डे पर उतरे। इन विमानों में ड्रोन, केमानकेस क्रूज मिसाइलें, और अन्य एडवांस वीपेंस शामिल थे।

CPEC की सुरक्षा करती हैं प्राइवेट सिक्योरिटी फर्म्स

हालांकि यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान (India-Pak tension) ने प्राइवेट सिक्योरिटी फर्म्स की मदद ली हो। इससे पहले 2024 में, ग्वादर पोर्ट की सुरक्षा के लिए पाकिस्तान ने निजी सुरक्षा कंपनियों (प्राइवेट सिक्योरिटी फर्म्स) को शामिल किया था। जिन्हें खौस तौर पर चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) से जुड़े प्रोजेक्ट्स और चीनी नागरिकों की सुरक्षा के लिए तैनात किया था। ग्वादर पोर्ट CPEC का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और बलूचिस्तान के पास है, जो रणनीतिक रूप से बेहद अहम है।

दरअसल ग्वादर पोर्ट (India-Pak tension) और CPEC प्रोजेक्ट्स पर बार-बार आतंकी हमले हुए हैं। इसे बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) और अन्य आतंकी समूहों से लगातार खतरा रहता है। मई 2019 में ग्वादर के पर्ल कॉन्टिनेंटल होटल पर BLA ने हमला किया था, और अक्टूबर 2024 में बलूचिस्तान में दो चीनी नागरिकों को निशाना बनाया गया। पाकिस्तान ने CPEC की सुरक्षा के लिए 2016 में एक विशेष सुरक्षा डिवीजन (SSD) बनाई, जिसमें 15,000 सैनिक और पुलिसकर्मी शामिल हैं। इसके बावजूद, आतंकी हमले नहीं रुके।

जिसके बाद पाकिस्तान (India-Pak tension) ने ग्वादर पोर्ट और CPEC प्रोजेक्ट्स की सुरक्षा के लिए तीन चीनी निजी सुरक्षा कंपनियों को तैनात करने का फैसला किया था। इनमें ड्यूई सिक्योरिटी फ्रंटियर सर्विस ग्रुप, चाइना ओवरसीज सिक्योरिटी ग्रुप, और हुआक्सिन झोंगशान सिक्योरिटी सर्विस शामिल हैं। ये कंपनियां चीनी पीपल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के रिटायर्ड अधिकारियों से जुड़ी हैं और इनका मुख्य काम चीनी नागरिकों, बुनियादी ढांचे, और ग्वादर पोर्ट जैसे संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा करना है। इनमें हुआक्सिन झोंगशान सिक्योरिटी सर्विस विशेष रूप से समुद्री सुरक्षा में माहिर है और ग्वादर पोर्ट की सुरक्षा में अहम भूमिका है।

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इसके अलावा पाकिस्तान (India-Pak tension) की अपनी निजी सुरक्षा कंपनियां, जैसे अस्करी गार्ड्स लिमिटेड (AGL) और ज़िम्स सिक्योरिटी, भी ग्वादर और CPEC प्रोजेक्ट्स में सुरक्षा सेवाएं देती हैं। AGL, जो पाकिस्तान सेना के आर्मी वेलफेयर ट्रस्ट की सहायक कंपनी है, देश की सबसे बड़ी निजी सुरक्षा फर्मों में से एक है। इसके 20,000 से अधिक प्रशिक्षित कर्मचारी हैं, जो ग्वादर जैसे रणनीतिक स्थानों पर संपत्ति सुरक्षा, नकद परिवहन, और अन्य सुरक्षा सेवाएं प्रदान करते हैं।

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Pahalgam Terror Attack: Will India Opt for Surgical Strike or Airstrike Again?

Pahalgam terror attack: पहलगाम में हुए आतंकी हमले के जवाब में केंद्र सरकार ने पाकिस्तान में मौजूद आतंकी ढांचे को नेस्तनाबूद करने के लिए एक चार-स्तरीय रणनीति तैयार की है। इस रणनीति के तहत न केवल आतंकवाद के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी, बल्कि स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एकजुटता को भी बढ़ावा मिलेगा। केंद्र सरकार की इस नई रणनीति का मकसद पाकिस्तान में मौजूद आतंकी संगठनों का समूल नाश करना है।

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Pahalgam terror attack: पहला कदम: स्थानीय मददगारों पर नकेल

सरकार ने सबसे पहले कश्मीर घाटी में मौजूद उन स्थानीय नेटवर्कों को तोड़ने पर फोकस किया है, जो आतंकवादियों को मदद दे रहे हैं। सुरक्षा बल आतंकियों के लोकल ओवरग्राउंड वर्कर्स (OGWs) का पता लगा रहे हैं। जैसे ही सुरक्षा बलों को किसी कई ओवरग्राउंड वर्कर्स के पुख्ता सबूत मिलते हैं, तो उनके घरों को ध्वस्त किया जा रहा है। वहीं, इस कार्रवाई में स्थानीय जनता भी सहयोग कर रही है। क्योंकि पहलगाम हमले (Pahalgam terror attack) के बाद से घाटी के लोग भी आतंकवाद के खिलाफ एकजुट हुए हैं। हालांकि, यह कार्रवाई बहुत सावधानी से की जा रही है ताकि स्थानीय लोगों की भावनाओं को ठेस न पहुंचे। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि जब आतंकी नेटवर्क के जमीनी मददगार खत्म होंगे, तो आतंकियों का लॉजिस्टिक सपोर्ट और सुरक्षित पनाहगाहें भी खत्म हो जाएंगी।

सूत्रों का कहना है कि सरकार घाटी के अंदर और बाहर आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता का माहौल बना रही है। स्थानीय लोगों को आतंकवाद के खिलाफ जागरूक किया जा रहा है और उन्हें यह समझाया जा रहा है कि आतंकवाद न केवल कश्मीर, बल्कि पूरे देश के लिए खतरा है। क्योंकि आतंकवाद के खिलाफ किसी भी रणनीति की सफलता तभी संभव है, जब स्थानीय लोग इसमें सक्रिय रूप से शामिल हों।

Pahalgam terror attack: दूसरा कदम: सीमा पर संभाला मोर्चा

पाकिस्तान के साथ लगी नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर तनाव बढ़ रहा है। पाकिस्तानी सेना ने (Pahalgam terror attack) लगातार चौथी रात को कुपवाड़ा, पुंछ और अखनूर सेक्टरों में बिना उकसावे के गोलीबारी की। हालांकि इसमें छोटे हथियारों का इस्तेमाल किया गया। भारतीय सेना ने हर बार इन हमलों का मजबूती से जवाब दिया। यह रणनीति इसलिए भी अहम है क्योंकि इससे भारतीय सेना न केवल पाकिस्तानी सेना को इंगेज रख रही है, बल्कि किसी भी बड़े हमले के लिए पूरी तरह तैयार है। भारत एलओसी पर मौजूदा तनाव का फायदा उठाना चाहता है, ताकि भारतीय खुफिया और आतंकवाद-रोधी एजेंसियां आतंकियों के खिलाफ गुप्त योजनाएं बना सकें।

Pahalgam terror attack: तीसरा कदम: आतंकवाद के खिलाफ पूरे राष्ट्र को एकजुट करना

पहली बार सरकार ने सिर्फ सैन्य प्रतिक्रिया तक सीमित न रहकर सिविल सोसायटी और आम जनता (Pahalgam terror attack) को भी आतंकवाद के खिलाफ एकजुट करने की रणनीति अपनाई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में पहलगाम हमले की कड़ी निंदा की और पूरे देश से आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने की अपील की। कई राज्यों में छोटे-छोटे कैंडल मार्च और शांति यात्राएं आयोजित की जा रही हैं, ताकि पूरे भारत में आतंकवाद विरोधी भावना को मजबूती मिले। सरकार का उद्देश्य है कि कश्मीर का सामान्य नागरिक भी आतंकवाद के खिलाफ खड़ा हो और अलगाववादी सोच पूरी तरह हाशिये पर चली जाए।

सरकार के इन प्रयासों का मकसद जम्मू-कश्मीर को देश के साथ पूरी तरह जोड़ना और आतंकवाद को हराने के लिए एक राष्ट्रीय संकल्प (Pahalgam terror attack) को मजबूत करना है। सरकार का मानना है कि जब पूरा देश एक साथ खड़ा होगा, तभी आतंकवादियों का मनोबल पूरी तरह टूटेगा। यह कदम न केवल घाटी में शांति स्थापित करने में मदद करेगा, बल्कि यह भी सुनिश्चित करेगा कि आतंकवाद को लोगों का समर्थन न मिले।

Pahalgam terror attack: चौथा कदम: अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान को बेनकाब करना

पहलगाम हमले के बाद भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की भूमिका को दुनिया के सामने लाने के लिए कूटनीतिक पहल शुरू की है। अमेरिका, यूरोपीय संघ, रूस, सऊदी अरब समेत कई देशों को पाकिस्तान के आतंकी नेटवर्क की जानकारी दी जा रही है। भारत ने यह साफ कर दिया है कि पहलगाम हमला (Pahalgam terror attack) पाकिस्तान की जमीं में पल रहे आतंकी संगठनों की साजिश नतीजा है। वैश्विक स्तर पर पाकिस्तान की छवि को चोट पहुंचाने के लिए लगातार प्रयास जारी हैं। भारत ने दुनिया को बताया है कि कैसे पाकिस्तान आतंकी संगठनों को पनाह देकर उन्हें भारत के खिलाफ प्रॉक्सी युद्ध लड़ने के लिए भड़का रहा है।

विदेश मंत्रालय और भारतीय दूतावास इस दिशा में सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं ताकि वैश्विक समुदाय (Pahalgam terror attack) पाकिस्तान पर दबाव बनाए। सूत्रों का कहना है कि आतंकवाद के खिलाफ लंबे समय तक सफलता तभी मिलेगी, जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय भारत के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा होगा। भारत ने पहले भी बालाकोट हवाई हमले जैसे कदमों के जरिए यह दिखाया है कि वह आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करने में सक्षम है। इस बार भी भारत का लक्ष्य आतंकी ठिकानों को नष्ट कर उनके आकाओं को बेनकाब करना है।

Pahalgam terror attack: बालाकोट का एक्सपीरियंस आएगा काम

सूत्रों के मुताबिक, भारत के पास पहले से ही बालाकोट (Pahalgam terror attack) जैसी कार्रवाई के अनुभव हैं, जब 2019 में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी शिविरों को निशाना बनाकर ध्वस्त किया गया था। उस समय भारतीय खुफिया एजेंसियों ने एक डोजियर तैयार किया था, जिसमें यह साबित हुआ था कि पाकिस्तानी अधिकारी बालाकोट में चल रहे आतंकी प्रशिक्षण शिविरों से वाकिफ थे। इस शिविर में जैश-ए-मोहम्मद के 42 बड़े आतंकियों को प्रशिक्षण दिया जा रहा था। टेक्निकल एविडेंसेज में मसूद अजहर और अन्य आतंकी नेताओं के भड़काऊ भाषणों के सबूत भी शामिल थे।

इस बार भी भारत लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों के आतंकियों और उनके आकाओं पर नजर रख रहा है। खुफिया एजेंसियां तकनीकी और मानवीय खुफिया जानकारी जुटा रही हैं, ताकि आतंकी ठिकानों (Pahalgam terror attack) को सटीक निशाना बनाया जा सके। सूत्रों का कहना है कि यह कार्रवाई छोटे आतंकियों तक सीमित नहीं होगी, बल्कि आतंकवाद के मूल स्रोत को खत्म करने पर ध्यान दिया जाएगा। सूत्रों ने बताया कि ड्रोन सर्विलांस, सैटेलाइट इमेजरी, और कम्युनिकेशन इंटरसेप्ट के जरिए पुख्ता सबूत जुटाए जा रहे हैं।

क्या भारत फिर करेगा सर्जिकल स्ट्राइक या एयरस्ट्राइक?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत फिर से सर्जिकल स्ट्राइक या एयरस्ट्राइक जैसे कदम उठाएगा? भारतीय सुरक्षा बलों और खुफिया एजेंसियों ने सभी विकल्प खुले रखे हैं। तीन तरह की संभावित कार्रवाइयों (Pahalgam terror attack) पर विचार किया जा रहा है। इनमें छोटे हमले (Targeted Strikes) शामिल हैं। जिनमें भारत आतंकी संगठनों के प्रमुख नेताओं या छोटे ठिकानों को निशाना बना सकता है। यह कार्रवाई सटीक और सीमित होगी, जिससे बड़े पैमाने पर तनाव बढ़ने की आशंका कम रहे।

इसके अलावा बड़े आतंकी शिविरों पर भी एयरस्ट्राइक की जा सकती है, जैसे 2019 के बालाकोट में की गई थी। इसमें भारत पाकिस्तान में मौजूद बड़े आतंकी प्रशिक्षण शिविरों को नष्ट करने के लिए हवाई हमले कर सकता है। इसके लिए खुफिया एजेंसियां पहले से ही तकनीकी और मानवीय जानकारी जुटा रही हैं। इसके अलावा एक अन्य विकल्प आतंकवादी संगठनों के आकाओं जैसे मसूद अजहर या हाफिज सईद जैसे लोगों को निशाना बनाया जा सकता है।

Pahalgam Terror Attack: भारत ने दुनिया को दिखाए पाकिस्तान के हाथ होने के सबूत, TRF के इलेक्ट्रॉनिक सिग्नेचर दो जगहों पर किए ट्रेस

इनमें से कौन सा विकल्प चुना जाएगा, इसे लेकर सरकार में मथंन जारी है। 30 अप्रैल को होने वाली सीसीएस की बैठक में इन विकल्पों पर चर्चा की जा सकती है। क्योंकि इस बार भारत का मकसद केवल जवाब देना नहीं है, बल्कि आतंकवाद के पूरे नेटवर्क को पूरी तरह उखाड़ फेंकना है।

Haji Pir Pass: भारतीय सेना ने दो बार जीता हाजी पीर दर्रा, लेकिन फिर लौटाया, आतंकी यहां से करते हैं घुसपैठ

Haji Pir Pass: Won Twice by India, Returned, Still a Key Route for Terror Infiltration

Haji Pir Pass: 22 अप्रैल 2025 को हुए पहलगाम आतंकी हमले से पूरा देश सदमे में है। बैसरन घाटी में हुए इस हमले में 26 लोग मारे गए थे। पाकिस्तान के आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा की शाखा द रेसिस्टेंस फ्रंट (TRF) ने इस हमले को अंजाम दिया। इस हमले की साजिश पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) के रावलाकोट में रची गई। संभावना जताई जा रही है कि आतंकियों ने हाजी पीर दर्रे के रास्ते घुसपैठ कर पहलगाम तक पहुंचे। यह दर्रा, जिसे भारत ने 1965 में जीता था लेकिन ताशकंद समझौते में पाकिस्तान को लौटा दिया, आज भी आतंकी घुसपैठ का मुख्य रास्ता बना हुआ है। पहलगाम आतंकी हमले ने 51 साल पुरानी उस रणनीतिक भूल पर फिर से बहस छेड़ दी है, जिसके परिणाम भारत आज भी भुगत रहा है।

Haji Pir Pass: Won Twice by India, Returned, Still a Key Route for Terror Infiltration

Haji Pir Pass: हाजी पीर और पहलगाम हमले का कनेक्शन

संभावना जताई जा रही है कि पहलगाम आतंकी हमले में भी हाजी पीर दर्रे का इस्तेमाल हुआ था। आतंकी इसी दर्रे के रास्ते किश्तवाड़ से कोकेरनाग होते हुए बैसरन पहुंचे। पाक अधिकृत कश्मीर के रावलाकोट के निवासी और मानवाधिकार कार्यकर्ता औऱ कश्मीर पीपल्स नेशनल पार्टी के नेता सरदार नासिर अजीज खान ने खुलासा किया कि हाजी पीर के आसपास कई आतंकी प्रशिक्षण शिविर चल रहे हैं। यदि हाजी पीर आज भारत के नियंत्रण में होता, तो आतंकी घुसपैठ को रोका जा सकता था। 1965 के पश्चिमी सेना कमांडर रहे लेफ्टिनेंट जनरल हरबख्श सिंह ने इसे “रणनीतिक मास्टरस्ट्रोक” बताया था, लेकिन ताशकंद ने इसे बेकार कर दिया। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जनवरी 2025 में कहा, “1948 और 1965 में हाजी पीर लौटाना भूल थी। यह आतंकवाद का रास्ता बंद कर सकता था।”

 2,637 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है Haji Pir Pass:

यह दर्रा पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) में स्थित है। हाजी पीर दर्रा पीर पंजाल रेंज पर 2,637 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और पुंछ-उरी-राजौरी मार्ग पर एक महत्वपूर्ण सड़क को जोड़ता है। यह जम्मू-कश्मीर के लिए सामरिक रूप से महत्वपूर्ण है। क्योंकि यदि भारत इस दर्रे को अपने नियंत्रण में रखता तो यह घुसपैठ के रास्ते बंद कर सकता है और पुंछ-उरी के बीच की दूरी को 282 किमी से 56 किमी तक कम कर सकता है। 1948 और 1965 के भारत-पाक युद्ध में इस दर्रे को जीतना भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि थी।

Haji Pir Pass: 1948: पहला कब्जा और वापसी

1947-48 के प्रथम भारत-पाक युद्ध में पाकिस्तान ने हाजी पीर दर्रा सहित 78,114 वर्ग किमी जम्मू-कश्मीर क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान ने कबाइली हमलावरों (पठान जनजातियों) और पाकिस्तानी सेना के समर्थन से कश्मीर पर हमला शुरू किया। इस ऑपरेशन गुलमर्ग का मकसद कश्मीर को बलपूर्वक हथियाना था। 26 अक्टूबर को महाराजा हरी सिंह ने भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए, और भारत ने सैन्य सहायता भेजी। हाजी पीर दर्रा, जो पुंछ-उरी-श्रीनगर मार्ग को जोड़ता है, इस युद्ध में एक महत्वपूर्ण लक्ष्य था। पाकिस्तानी घुसपैठिए और सेना ने इस क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था, क्योंकि यह कश्मीर घाटी में प्रवेश का एक प्रमुख रास्ता था। कबाइलियों और पाक सेना ने अक्टूबर 1947 में मुजफ्फराबाद, बारामूला, और उरी पर कब्जा कर लिया। हाजी पीर दर्रा भी उनके नियंत्रण में आ गया, क्योंकि यह रावलाकोट से कश्मीर घाटी तक का सबसे छोटा रास्ता था। दर्रे का नियंत्रण पाकिस्तान के लिए महत्वपूर्ण था, क्योंकि यह घुसपैठियों और हथियारों की आपूर्ति के लिए लॉजिस्टिक केंद्र था।

भारतीय सेना ने इसके जवाब में नवंबर 1947 से श्रीनगर और उरी को सुरक्षित करने के लिए सैन्य अभियान शुरू किया। 1 सिख रेजिमेंट और 4 कुमाऊं रेजिमेंट ने बारामूला और उरी को कबाइलियों के कब्जे से मुक्त कराया। जबकि पुंछ 1947 के अंत तक पाकिस्तानी घेराबंदी में था। इसके बाद भारतीय सेना ने ऑपरेशन ईजी (1948) शुरू किया, जिसका मकसद पुंछ को मुक्त कराना और हाजी पीर क्षेत्र पर नियंत्रण हासिल करना था। मई-जून 1948 में भारतीय सेना ने पुंछ के आसपास कई चोटियों पर कब्जा किया और हाजी पीर दर्रे तक पहुंची। 19 इन्फैंट्री ब्रिगेड और 161 इन्फैंट्री ब्रिगेड ने इस अभियान में हिस्सा लिया। जून 1948 तक भारतीय सेना ने हाजी पीर दर्रे पर कब्जा कर लिया। इलाका बेहद ऊबड़-खाबड़ था, और पाकिस्तानी सेना ने दर्रे पर भारी हथियार तैनात कर रखे थे। भारतीय सैनिकों ने सांक, लेदीवाली गली, और बेदोरी जैसी चोटियों को जीतकर दर्रे तक पहुंच बनाई। इस जीत ने पुंछ-उरी मार्ग को आंशिक रूप से बहाल किया और घुसपैठ को कम किया।

पाकिस्तानी सेना ने जुलाई-अगस्त 1948 में दर्रे को वापस लेने के लिए कई जवाबी हमले किए। इन हमलों में कबाइली लड़ाकों और पाकिस्तान के रेगुलर सैनिकों ने हिस्सा लिया। भारतीय सेना ने इन हमलों को विफल किया, लेकिन भारी नुकसान भी उठाया। पुंछ घेराबंदी नवंबर 1948 तक जारी रही, जब भारतीय सेना ने ऑपरेशन लिंक-अप के तहत पुंछ को पूरी तरह मुक्त कराया। ब्रिगेडियर प्रीतम सिंह और लेफ्टिनेंट कर्नल हरि सिंह जैसे अधिकारियों ने पुंछ और हाजी पीर अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

Haji Pir Pass: संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में युद्धविराम

1 जनवरी 1949 को संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में युद्धविराम लागू हुआ। नियंत्रण रेखा (LoC) स्थापित की गई, और हाजी पीर दर्रा पाकिस्तान के नियंत्रण में चला गया। भारत ने युद्ध में दर्रे पर कब्जा किया था, लेकिन युद्धविराम समझौते के तहत इसे वापस करना पड़ा। यह फैसला भारत के लिए रणनीतिक नुकसान साबित हुआ, क्योंकि हाजी पीर बाद में आतंकी घुसपैठ का केंद्र बन गया।

Haji Pir Pass: 1965 में दूसरा कब्जा

पाकिस्तान ने ऑपरेशन जिब्राल्टर शुरू किया, जिसमें हजारों घुसपैठिए (5,000-30,000) कश्मीर में दाखिल हुए ताकि विद्रोह भड़काया जाए। हाजी पीर दर्रा इस घुसपैठ का मुख्य केंद्र था। भारत ने जवाबी कार्रवाई में ऑपरेशन बख्शी और ऑपरेशन फौलाद शुरू किए। 1 पैरा बटालियन, मेजर (बाद में लेफ्टिनेंट जनरल) रणजीत सिंह दयाल और ब्रिगेडियर जोरावर चंद बख्शी के नेतृत्व में, ने 37 घंटे की भीषण लड़ाई के बाद सांक, लेदीवाली गली, और हाजी पीर दर्रा पर कब्जा किया। 28 अगस्त 1965 का दिन भारतीय सेना के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। बारिश, कीचड़, कोहरा, और दुश्मन की गोलाबारी के बावजूद 28 अगस्त को सुबह 10:30 बजे दर्रा भारत के नियंत्रण में था। उस दिन सुबह 10:30 बजे, मेजर रंजीत सिंह दयाल (बाद में लेफ्टिनेंट जनरल) के नेतृत्व में 1 पैरा के जांबाज सैनिकों ने जम्मू-कश्मीर में हाजी पीर दर्रे पर कब्जा कर लिया। यह हमला पांच इन्फैंट्री बटालियनों और दो आर्टिलरी रेजिमेंट्स की मदद से किया गया था।

यह दर्रा, जो 1947 के बंटवारे के बाद 18 साल तक पाकिस्तान के कब्जे में था, भारतीय सेना के लिए एक बड़ी जीत थी। अगले दिन पाकिस्तान ने जवाबी हमला किया, लेकिन भारतीय सैनिकों ने उसे नाकाम कर दिया। 30 अगस्त तक दर्रे और आसपास की चोटियों पर भारत का पूर्ण नियंत्रण था। 10 सितंबर को नजदीकी काहुता पर कब्जे के साथ हाजी पीर बल्ज को पूरी तरह सील कर दिया गया, और पाकिस्तानी ने पूरी तरह से घुटने टेक दिए थे। यह मिशन ऑपरेशन बख्शी का हिस्सा था, जिसने पाकिस्तान के ऑपरेशन जिब्राल्टर को विफल किया। हमले से पांच दिन पहले सेना प्रमुख जनरल जे.एन. चौधरी ने आक्रामक रुख अपनाने की जरूरत पर जोर दिया था, ताकि पाकिस्तान को जवाब देने के लिए मजबूर किया जाए।

Haji Pir Pass: पाकिस्तान का ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम

हाजी पीर पर कब्जे ने पाकिस्तान को झटका दिया, लेकिन तीन दिन बाद उसने ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम शुरू किया। 1 सितंबर को चंब-जौरियन सेक्टर में उसने टैंकों और पैदल सेना के साथ बड़ा हमला बोला, जिसका मकसद अखनूर का पुल और फिर जम्मू-पुंछ राजमार्ग पर कब्जा करना था। इससे वह जम्मू-श्रीनगर राजमार्ग पर नियंत्रण कर जम्मू-कश्मीर को भारत से काट सकता था। खुफिया जानकारी और तैयारी की कमी के कारण भारतीय सेना शुरू में दबाव में थी, लेकिन 6 सितंबर को भारतीय सेना के XI और I कोर ने पाकिस्तानी पंजाब में लाहौर और सियालकोट की ओर बढ़कर जवाब दिया। इससे पाकिस्तान को अपनी सेना वापस खींचनी पड़ी, और अखनूर का पुल आखिरी मौके पर बच गया।

Haji Pir Pass: ताशकंद समझौते में सोवियत दबाव

खास बात यह है कि 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में, जो 5 अगस्त को पाकिस्तानी घुसपैठियों की पहचान के साथ शुरू हुआ और 23 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र के युद्धविराम के साथ खत्म हुआ, यह भारतीय सेना की एकमात्र ऐसी आक्रामक कार्रवाई थी जो शुरू से अंत तक पूरी तरह सफल रही। मेजर रणजीत दयाल और ब्रिगेडियर बख्शी को महावीर चक्र मिला, और 1 पैरा को बैटल ऑनर हाजीपीर से सम्मानित किया गया। लेकिन ताशकंद समझौते (10 जनवरी 1966) में भारत ने हाजी पीर दर्रा और 1,920 वर्ग किमी क्षेत्र पाकिस्तान को लौटा दिया। यह फैसला सोवियत दबाव में लिया गया। पाकिस्तान ने चंब-जौरियन क्षेत्र में अखनूर के पास फटवाल रिज तक कब्जा कर लिया था, जो जम्मू के लिए खतरा था। भारत ने हाजी पीर के बदले चंब से पाकिस्तानी सेना को हटाने की शर्त मानी। यह फैसला कई सैन्य अधिकारियों को गलत लगा, क्योंकि इससे पाकिस्तानी सेना अखनूर से सिर्फ 4 किलोमीटर दूर रह सकती थी। कई विशेषज्ञों का मानना है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने पाकिस्तान के “युद्ध न करने” के वादे पर भरोसा किया। शास्त्री की ताशकंद में अचानक मृत्यु ने इस फैसले पर सवाल खड़े कर दिए।

1971 में क्यों नहीं किया कब्जा?

1971 के युद्ध में भारत ने 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों को बंदी बनाया और पूर्वी पाकिस्तान में मुक्ती बाहिनी की मदद की। जिसके बाद बांग्लादेश आजाद देश बना। हालांकि, उस दौरान भारत ने हाजी पीर दर्रे को फिर से कब्जाने की कोशिश की, लेकिन भारी नुकसान के चलते हमला वापस लेना पड़ा। मेजर रमेश बलदानी सहित कई सैनिक शहीद हुए। विश्लेषकों का कहना है कि भारत को फोकस पूर्वी मोर्चे पर था, और पश्चिमी मोर्चे पर हाजी पीर को प्राथमिकता नहीं दी। 1971 में भारत इस दर्रे को दोबारा हासिल करने का मौका चूक गया। बाद में मेजर से लेफ्टिनेंट जनरल बने रणजीत सिंह दयाल ने बाद में एक सााक्षात्कार में कहा था, “यह दर्रा भारत को रणनीतिक बढ़त दे सकता था। इसे लौटाना गलती थी। हमारे लोग नक्शे नहीं पढ़ते।”

Pahalgam Attack: सीमा पार से घुसपैठ को रोकने के लिए सेना बनाएगी अस्थायी ऑपरेटिंग बेस, ऊंचाई वाले इलाकों में तैनात होंगे सैनिक 

वहीं, लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) डी.बी. शेकटकर ने 23 सितंबर 2015 को एक बयान में कहा था, “हाजी पीर की वापसी ने आतंकवाद को बढ़ावा दिया”। उन्होंने विशेष रूप से कहा, “हमें यह नहीं पता कि हाजी पीर दर्रा, जो रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण था, उसे वापस करने के क्या कारण थे। आज कश्मीर में होने वाली सारी घुसपैठ उसी क्षेत्र से होती है। अगर हमने उस चौकी को, जिसे हमने कब्जा किया था, अपने पास रखा होता, तो चीजें अलग हो सकती थीं।”

Baisaran Terror Attack: बड़ा खुलासा! PoK का रावलाकोट है आतंक का एक्सपोर्ट हब, पहलगाम हमले के बाद जनरल असीम मुनीर ने किया था दौरा

Baisaran Terror Attack: PoK’s Rawalakot Emerges as Terror Export Hub

Baisaran Terror Attack: पहलगाम आतंकी हमले में पाकिस्तान के शामिल होने के लिंक सबके सामने हैं। यह आतंकी लिंक कितना गहरा और खतरनाक है, इसकी जांच-पड़ताल में चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम की बैसरन घाटी में हुए इस हमले में 26 लोग मारे गए थे, जिनमें ज्यादातर पर्यटक थे। जांच में अब सनसनीखेज खुलासा हुआ है कि इस कश्मीर आतंकी हमला की साजिश पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) के रावलाकोट शहर में रची गई थी। पहलगाम आतंकी हमला के पीछे लश्कर-ए-तैइबा (LeT), जैश-ए-मोहम्मद (JeM), और लश्कर की शाखा ‘द रेसिस्टेंस फ्रंट’ (TRF) का हाथ है, जिन्हें पाकिस्तानी सेना और ISI का पूरा सपोर्ट था। रावलाकोट में खुलेआम आतंकवादियों के ट्रेनिंग कैंप चल रहे हैं, जिनकी निगरानी पाकिस्तान की सेना करती है।

Baisaran Terror Attack: PoK’s Rawalakot Emerges as Terror Export Hub

Baisaran Terror Attack: आतंक का एक्सपोर्ट हब बना रावलाकोट

पाक अधिकृत कश्मीर के रावलाकोट के निवासी और मानवाधिकार कार्यकर्ता औऱ कश्मीर पीपल्स नेशनल पार्टी के नेता सरदार नासिर अजीज खान ने सनसनीखेज खुलासा किया है। नासिर, जो अब यूरोप में शरण लिए हुए हैं, उन्होंने बताया कि पहलगाम आतंकी हमला (Baisaran Terror Attack) की योजना रावलाकोट में एक गुप्त बैठक में बनाई गई। इस बैठक में लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, और ISI के अधिकारी शामिल थे। नासिर के पास एक वीडियो भी है, जिसमें आतंकी सरगनाओं और ISI के बीच साजिश की बातचीत दर्ज है। वीडियो में लश्कर के उपप्रमुख सैफुल्लाह और कमांडर अबू मूसा की भड़काऊ भाषणबाजी साफ सुनाई देती है।

18 अप्रैल को रावलाकोट के खाई गाला में आयोजित एक रैली में अबू मूसा ने कहा, “भारत ने अनुच्छेद 370 हटाकर कश्मीर की जनसांख्यिकी बदलने की कोशिश की। तुमने 10 लाख सैनिक तैनात किए। तुम पुलवामा, पुंछ, राजौरी में ‘राम राम’ की गूंज चाहते हो। लश्कर-ए-तैयबा तुम्हारी इस चुनौती को स्वीकार करता है। इंशाल्लाह, हम गोलियां बरसाएंगे, तुम्हारी गर्दनें काटेंगे और अपने शहीदों के बलिदान का सम्मान करेंगे।” यह भाषण पहलगाम हमले (Baisaran Terror Attack) से चार दिन पहले दिया गया था।

Baisaran Terror Attack: हमले के बाद गुपचुप PoK पहुंचे थे मुनीर

नासिर ने खुलासा किया कि जनरल असीम मुनीर 24 अप्रैल, 2025 को PoK के गिलगित-बल्तिस्तान क्षेत्र में पहुंचे। यह दौरा भारत द्वारा सिंधु जल संधि को निलंबित करने, अटारी बॉर्डर बंद करने, और पाकिस्तानी नागरिकों को 48 घंटे में देश छोड़ने के अल्टीमेटम के ठीक एक दिन बाद हुआ। मुनीर का यह दौरा गुप्त था, और इसे लेकर आधिकारिक तौर पर पाकिस्तानी सेना या सरकार की ओर से कोई बयान जारी नहीं किया गया। मुनीर ने वहां PoK में उच्च-स्तरीय सैन्य अधिकारियों और स्थानीय प्रशासन के साथ एक गुप्त बैठक की। इस बैठक का मकसद PoK में चल रहे आतंकी प्रशिक्षण शिविरों की स्थिति का जायजा लेना और भारत के कड़े कदमों के जवाब में रणनीति तैयार करना हो सकता है। वहीं, मुनीर का PoK जाना यह भी बताता है कि पाकिस्तान खुद को अंतरराष्ट्रीय आलोचना से बचाने के लिए ‘सुरक्षित लॉन्चिंग’ और ‘डिनायल नेटवर्क’ की रणनीति पर काम कर रहा है। यानी आतंकियों को सक्रिय तो रखा जाएगा, लेकिन सीधे तौर पर पाकिस्तानी सेना या आईएसआई के जुड़ाव के सबूत छोड़ने से बचने की कोशिश होगी।

नासिर का कहना है कि पूर्व पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने बीबीसी को दिए एक साक्षात्कार में स्वीकार किया था कि वे आतंकियों को प्रशिक्षण देते हैं और कश्मीर भेजते हैं। वर्तमान सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर भी इस नीति को जारी रखे हुए हैं।

बता दें कि जनरल असीम मुनीर हाल के महीनों में अपनी भड़काऊ बयानबाजी के लिए चर्चा में रहे हैं। 15 अप्रैल, 2025 को एक मदरसा छात्र के रूप में उन्होंने कश्मीर को पाकिस्तान की “गले की नस” बताया और दो-राष्ट्र सिद्धांत का समर्थन किया। 16 अप्रैल को दिए एक और भाषण में उन्होंने कहा कि हिंदू और मुसलमान कभी एक साथ नहीं रह सकते। एक पूर्व पाकिस्तानी सेना में अफसर रहे अफसर आदिल रजा ने दावा किया था कि यह हमला मुनीर के व्यक्तिगत आदेश पर हुआ, हालांकि उन्होंने इसे व्यक्तिगत कार्रवाई बताकर पाकिस्तानी सेना को जिम्मेदारी से मुक्त करने की कोशिश की। भारतीय खुफिया सूत्रों ने भी मुनीर को (Baisaran Terror Attack) हमले का मास्टरमाइंड बताया और कहा कि वह कश्मीर मुद्दे को प्राथमिकता देकर पाकिस्तान के आंतरिक संकटों से ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहे हैं।

खुफिया सूत्रों के अनुसार, PoK में वर्तमान में 42 आतंकी लॉन्च पैड सक्रिय हैं, जहां करीब 130 आतंकी मौजूद हैं। मुनीर का दौरा इन शिविरों की गतिविधियों को और तेज करने या उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने की कोशिश हो सकता है, खासकर तब जब भारत ने इन शिविरों को निशाना बनाने की बात कही है।

Baisaran Terror Attack: PoK’s Rawalakot Emerges as Terror Export Hub

Baisaran Terror Attack: खुले आम आतंकी निकालते हैं रैलियां

नासिर ने साफ शब्दों में कहा कि रावलाकोट और पीओके के दूसरे इलाकों को ‘लॉन्चिंग पैड’ के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। यहां से आतंकवादियों को ट्रेनिंग देकर भारतीय सीमा में घुसपैठ के लिए भेजा जाता है। उन्होंने बताया कि रावलाकोट और मुजफ्फराबाद में चल रहे आतंकी शिविरों को न केवल ISI बल्कि पाकिस्तानी सेना भी समर्थन देती है। उन्होंने बताया कि ये संगठन खुले तौर पर रैलियां निकालते हैं, हथियार लहराते हैं और भारत के खिलाफ जहर उगलते हैं। उन्होंने कहा, “अगर पाकिस्तानी सरकार नहीं चाहे, तो एक चिड़िया भी पर नहीं मार सकती। लेकिन ये आतंकी संगठन हजारों की संख्या में रैलियां निकालते हैं, हथियारों के साथ। यह साफ है कि उनके पीछे कौन है।”

Baisaran Terror Attack: PoK’s Rawalakot Emerges as Terror Export Hub

Baisaran Terror Attack: बच्चों का अपहरण कर बनाते हैं आतंकी

नासिर ने बताया कि रावलाकोट और मुजफ्फराबाद में आज भी आतंकी प्रशिक्षण शिविर सक्रिय हैं, जिन्हें पाकिस्तानी सेना ऑपरेट करती है। इन शिविरों में गरीब बच्चों को मदरसों से अपहरण कर प्रशिक्षण शिविरों में ले जाकर हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी जाती है और फिदायीन बनाया जाता है। उन्होंने बताया कि दो साल पहले रावलाकोट (Baisaran Terror Attack) के पास रावलाबाग से 22 किशोर बच्चे, जो मदरसों में पढ़ते थे, अचानक गायब हो गए। जब उनके माता-पिता ने विरोध शुरू किया, तो स्थानीय प्रशासन ने कहा कि बच्चे “प्रशिक्षण” के लिए गए हैं और जल्द लौट आएंगे। लेकिन उनमें से कोई भी बच्चा वापस नहीं लौटा। नासिर ने कहा, “ये बच्चे आतंकी बनाए जाते हैं। उनके नाम बदल दिए जाते हैं, और कई बार तो उन्हें प्रशिक्षण के दौरान ही मार दिया जाता है।” नासिर ने कहा, “ये बच्चे निर्दोष हैं। उन्हें ब्रेनवॉश कर फिदायीन बनाया जाता है। यह मानवता के खिलाफ अपराध है।”

Baisaran Terror Attack: PoK में चीनी कंपनियां कर रही हैं खनिजों की लूट

नासिर ने बताया कि PoK में प्राकृतिक संसाधनों की लूट हो रही है। रावलाकोट और गिलगित-बल्तिस्तान (Baisaran Terror Attack) में सोने की खदानें, यूरेनियम और अन्य कीमती खनिज पाए गए हैं। लेकिन इन संसाधनों का दोहन पाकिस्तान की सरकार और सेना चीनी कंपनियों के जरिए कर रही है। नासिर ने बताया कि संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के अनुसार, PoK एक विवादित क्षेत्र है, और पाकिस्तान का इन संसाधनों पर कोई कानूनी अधिकार नहीं है। फिर भी, पाकिस्तान ने चीनी कंपनियों को खनन, बांध निर्माण और बिजली परियोजनाओं के लिए खुली छूट दे रखी है। उन्होंने कहा, “पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति इतनी खराब है कि वह खुद इन परियोजनाओं को नहीं चला सकता। इसलिए उसने चीन को PoK में खुली छूट दी है।” उन्होंने कहा कि चीन की मौजूदगी PoK में न केवल खनन तक सीमित है, बल्कि CPEC परियोजनाओं और बांध निर्माण में भी उसकी भागीदारी है। नासिर ने कहा कि PoK की जनता को इन संसाधनों का कोई लाभ नहीं मिलता।

Baisaran Terror Attack: PoK में गरीबी और बेरोजगारी चरम पर

नासिर ने PoK की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर भी चिंता जताई। उन्होंने बताया कि PoK की कुल आबादी लगभग 50 लाख है, जिसमें से 20 लाख लोग रोजगार की तलाश में खाड़ी देशों और मध्य पूर्व में पलायन कर चुके हैं। वहां न उद्योग हैं, न रोजगार के अवसर। सरकारी नौकरियां केवल उन लोगों को मिलती हैं, जो पाकिस्तान के प्रति वफादारी की शपथ लेते हैं। सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की स्थिति बदहाल है। 2005 के भूकंप के बाद यूएई ने रावलाकोट और मुजफ्फराबाद में अस्पताल बनाए थे, लेकिन वहां की आधुनिक मशीनें भी हटा ली गईं, क्योंकि उन्हें चलाने वाला कोई नहीं था। नासिर ने कहा, “जो लोग विदेशों से पैसा कमाते हैं, वे निजी स्कूलों और अस्पतालों का खर्च उठा सकते हैं। लेकिन गरीबों के बच्चे या तो मदरसों में जाते हैं या आतंकी शिविरों में जबरन भेज दिए जाते हैं।”

सरदार नासिर अजीज खान ने भारत और खासकर कश्मीर के मुस्लिमों (Baisaran Terror Attack) की प्रशंसा करते हुए कहा कि भारतीय मुसलमानों ने हमेशा आतंकवाद के खिलाफ और शांति के पक्ष में खड़े होने का उदाहरण पेश किया है। उन्होंने कहा कि कश्मीर घाटी में “हिंदू-मुस्लिम भाईचारे” के नारे लगना इस साजिश का सबसे करारा जवाब है, जो पाकिस्तान रचने की कोशिश कर रहा है।

कोकेरनाग के रास्ते बैसरन पहुंचे थे आतंकी

बता दें कि पहलगाम हमले (Baisaran Terror Attack) में छह आतंकियों ने किश्तवाड़ से होते हुए कोकेरनाग के रास्ते बैसरन पहुंचकर 26 लोगों को गोलियों से भून डाला। ये आतंकी स्थानीय सहयोगियों यानी ओवरग्राउंड वर्कर्स (OGW) की मदद से पर्यटकों के बीच घुसे और इस हमले को अंजाम दिया। जांच में पता चला कि आतंकियों ने अप्रैल के पहले सप्ताह में पहलगाम के पर्यटक स्थलों और होटलों की रेकी की थी। पहलगाम हमले में आतंकियों ने अत्याधुनिक अमेरिकी हथियार M4 राइफल का इस्तेमाल किया, जो आमतौर पर अमेरिकी और नाटो सैनिकों द्वारा उपयोग किया जाता है। जांच एजेंसियों के मुताबिक, ये हथियार अफगानिस्तान से तस्करी के जरिए PoK पहुंचे। जब अमेरिका ने 2021 में अफगानिस्तान से अपनी सेना वापस बुलाई, तो लगभग 80 बिलियन डॉलर के हथियार वहां छोड़ दिए गए। तालिबान के कब्जे के बाद ये हथियार विभिन्न आतंकी संगठनों के हाथ लगे, जिन्हें ISI के जरिए PoK में सक्रिय आतंकियों तक पहुंचाया गया।

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‘अल्पाइन क्वेस्ट’ एप हो रही मददगार

जांच एजेंसियों ने खुलासा किया कि पहलगाम हमले (Baisaran Terror Attack) में आतंकियों ने ‘अल्पाइन क्वेस्ट’ नामक एक एन्क्रिप्टेड नेविगेशन ऐप का इस्तेमाल किया। यह एप एडवांस जीपीएस मैपिंग और ऑफलाइन ट्रैकिंग की सुविधा प्रदान करता है, जिसकी मदद से आतंकी घने जंगलों से होकर पहलगाम पहुंचे और भारतीय सुरक्षा बलों की नजरों से बचे रहे। सूत्रों के मुताबिक, इस एप को पाकिस्तानी सेना की देखरेख में बनाया गया था ताकि भारतीय खुफिया एजेंसियों की निगरानी से बचा जा सके। आतंकियों को इस एप के इस्तेमाल की विशेष ट्रेनिंग दी जाती है, ताकि वे मुश्किल इलाकों में आसानी से रास्ता ढूंढ सकें।

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Explained: Shimla Agreement- What It Means, Why It Matters, and What Happens If Pakistan Walks Away

इंदिरा गांधी ने शिमला समझौते (Shimla Agreement) के बाद कहा था: “We have taken the first step towards peace and cooperation. It is now up to both nations to build on this foundation for a lasting relationship.” यानी “हमने शांति और सहयोग की दिशा में पहला कदम उठाया है। अब यह दोनों देशों पर निर्भर है कि वे इस नींव पर एक स्थायी रिश्ता बनाएं।” हालांकि भारत ने हमेशा से ही इस समझौते का मान रखा, लेकिन पाकिस्तान अपने वादे पर अडिग नहीं रहा। चाहे 1999 का कारगिल युद्ध, 2008 का 26/11 मुंबई हमला, और पुलवामा हमला। पाकिस्तान ने हमेशा से ही इस समझौते के सम्मान को तार-तार करते हुए इसके कार्यान्वयन में चुनौतियां खड़ी कीं। लेकिन पहलगाम आतंकी हमले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया, जिसके बाद भारत को सिंधु जल संधि को निलंबित करने का फैसला करना पड़ा। जिसके जवाब में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी शिमला समझौते को स्थगित करने की धमकी दी है।

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Shimla Agreement: भारत-पाकिस्तान संबंधों का एक एतिहासिक दस्तावेज

शिमला समझौता भारत और पाकिस्तान के बीच 1972 में हुआ एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक समझौता है, जो दोनों देशों के संबंधों को परिभाषित करने और क्षेत्रीय शांति को बढ़ावा देने में एक आधारशिला रहा है। यह समझौता न केवल जम्मू-कश्मीर के मुद्दे को द्विपक्षीय बनाए रखता है, बल्कि दोनों देशों के बीच युद्ध और तनाव को कम करने का एक समाधान भी है। जब भी दोनों देशों के बीच तनाव पैदा होता है, तो हमेशा इस समझौते को ही बातचीत का आधार बनाया जाता है।

इतिहासकार और कूटनीतिक विश्लेषक एजी नूरानी ने शिमला समझौते के बारे में लिखा, “The Shimla Agreement was not just a ceasefire pact; it was a bold attempt to redefine India-Pakistan relations through dialogue and mutual respect, anchoring peace in the volatile subcontinent.” यानी “शिमला समझौता केवल एक युद्धविराम संधि नहीं था; यह भारत-पाकिस्तान संबंधों को बातचीत और पारस्परिक सम्मान के माध्यम से पुनर्परिभाषित करने का एक साहसिक प्रयास था, जो अस्थिर उपमहाद्वीप में शांति का आधार बना।”

क्या है Shimla Agreement?

शिमला समझौता 2 जुलाई, 1972 को भारत और पाकिस्तान के बीच हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में हुआ था। इस पर भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो ने दस्तखत किए थे। यह समझौता 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद हुआ, जिसमें पाकिस्तान की बुरी हार के बाद बांग्लादेश (पूर्वी पाकिस्तान) एक स्वतंत्र राष्ट्र बना। युद्ध के अंत में भारत ने 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों को बंदी बना गया था, और यह समझौता युद्ध के बाद की स्थिति को सामान्य करने और दोनों देशों के बीच शांति स्थापित करने का एक प्रयास था। यह समझौता पिछले 50 वर्षों से दोनों देशों के बीच तनाव को कम करने और बातचीत को बढ़ावा देने का आधार रहा है, भले ही कई बार इसका उल्लंघन हुआ हो।

Shimla Agreement की पृष्ठभूमि

1947 में भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद दोनों देशों के बीच जम्मू-कश्मीर को लेकर तनाव शुरू हो गया। 1947-48 के पहले भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से युद्धविराम रेखा (Line of Ceasefire) बनाई गई। 1965 के युद्ध और उसके बाद कराची समझौता (1966) भी तनाव को पूरी तरह खत्म नहीं कर पाया। लेकिन 1971 की जंग के बाद शिमला समझौते की नींव रखी गई। जब पाकिस्तान ने पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में बंगाली आबादी पर अत्याचार किए, और भारत ने हस्तक्षेप किया, जिसके बाद पाकिस्तान को घुटने टेकने पड़े।

युद्ध के बाद भारत के पास 93,000 पाकिस्तानी सैनिक बंदी थे, और 5,000 वर्ग मील पाकिस्तानी क्षेत्र पर उसका नियंत्रण था। दूसरी ओर, पाकिस्तान कमजोर स्थिति में था, क्योंकि उसने अपना पूर्वी हिस्सा खो दिया था। इस स्थिति में दोनों देशों को एक ऐसे समझौते की जरूरत थी, जो युद्ध के बाद की स्थिति को संभाले और भविष्य में टकराव होने से रोके। शिमला समझौता इसी जरूरत का परिणाम था।

Shimla Agreement के प्रमुख प्रावधान

शिमला समझौता में 12 अनुच्छेद हैं। इसके प्रमुख प्रावधान इस प्रकार हैं:

  • दोनों देश शांति और सहयोग के सिद्धांतों पर आधारित संबंध विकसित करेंगे। वे एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता, संप्रभुता, और स्वतंत्रता का सम्मान करेंगे।
  • भारत और पाकिस्तान अपने सभी विवादों, विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर से संबंधित मुद्दों, को बातचीत, मध्यस्थता, या अन्य शांतिपूर्ण तरीकों से हल करेंगे। इसमें तीसरे पक्ष (जैसे संयुक्त राष्ट्र) की मध्यस्थता को शामिल नहीं किया जाएगा।
  • जम्मू-कश्मीर में 17 दिसंबर, 1971 को स्थापित युद्धविराम रेखा को नियंत्रण रेखा (LoC) के रूप में मान्यता दी गई। दोनों देश इसका सम्मान करेंगे और इसे बदलने के लिए बल प्रयोग नहीं करेंगे।
  • दोनों देश एक-दूसरे के खिलाफ आतंकवाद, घुसपैठ, या शत्रुतापूर्ण प्रचार को बढ़ावा नहीं देंगे।
  • समझौते ने दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों, व्यापार, संचार, और सांस्कृतिक आदान-प्रदान की बहाली का रास्ता खोला।
  • भारत ने 93,000 पाकिस्तानी युद्धबंदियों को रिहा करने और कब्जाए गए क्षेत्रों को वापस करने का वादा किया, जबकि पाकिस्तान ने भी भारत के कब्जाए गए क्षेत्रों को लौटाया।
  • समझौते में प्रावधान था कि दोनों देशों के नेता नियमित रूप से मिलेंगे ताकि शांति और सहयोग को बढ़ावा दिया जा सके।
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शिमला समझौते का महत्व

शिमला समझौते का सबसे बड़ा फायदा कश्मीर मुद्दे को मिला। इसने कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों से हटाकर भारत और पाकिस्तान के बीच का मामला बनाया। पाकिस्तान ने माना कि कश्मीर विवाद को अंतरराष्ट्रीय नहीं, बल्कि भारत-पाक के बीच आपसी सहमति से ही सुलझाया जाना चाहिए। समझौते ने जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा (LoC) को 17 दिसंबर, 1971 की युद्धविराम रेखा का आधार बनाया, जिसने दोनों देशों के बीच सीमा विवाद को कम करने में मदद की। समझौते ने भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत का एक आधार दिया, जिसके तहत बाद में लाहौर घोषणा पत्र (1999) और आगरा शिखर सम्मेलन (2001) का आयोजन हुआ। साथ ही, इसने आतंकवाद और शत्रुतापूर्ण गतिविधियों को रोकने की प्रतिबद्धता जताई। वहीं, इस समझौते ने कूटनीतिक और व्यापारिक संबंधों को बहाल करने का रास्ता खोला। ये अलग बात है कि पाकिस्तान ने बातचीत का दिखावा करते हुए इस समझौते की हमेशा से ही धज्जियां उड़ाईं।