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Ran Samwad 2025 में वाइस एडमिरल तरुण सोबती ने बताया, ऑपरेशन सिंदूर में INS विक्रांत पर तैनात थे 15 मिग-29 फाइटर जेट, ये 9 ट्रेंड्स तय करेंगे भविष्य के युद्धों की बिसात

Ran Samwad 2025 Vice Admiral Tarun Sobti Future Wars Analysis
VAdm Tarun Sobti, Deputy Chief of Naval Staff Indian Navy analyses Global conflicts and their Lessons for India.

Ran Samwad 2025: भारतीय नौसेना के डिप्टी चीफ वाइस एडमिरल तरुण सोबती का कहना है कि ऑपरेशन सिंदूर केवल एक ऑपरेशन नहीं था, बल्कि भविष्य के युद्ध की झलक थी। इससे मिली सीखों ने भारतीय नौसेना और तीनों सेनाओं को यह समझने में मदद की कि आने वाले समय में युद्ध केवल बंदूकों, टैंकों और जहाजों से नहीं, बल्कि ड्रोन, साइबर युद्ध, सैटेलाइट, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और नैरेटिव कंट्रोल से भी लड़े जाएंगे।

Ran Samwad 2025 Training Reforms: भारतीय सेना में बड़े बदलाव की तैयारी, अब ट्रेनिंग में ड्रोन और साइबर वॉरफेयर होंगे शामिल

Ran Samwad 2025: ऑपरेशन सिंदूर से मिली बड़ी सीख

मऊ के आर्मी वॉर कॉलेज में आयोजित रण संवाद 2025 कार्यक्रम में बोलते हुए वाइस एडमिरल तरुण सोबती ने स्वीकार किया कि ऑपरेशन सिंदूर ने भारतीय नौसेना को कई अहम सबक दिए। उन्होंने बताया कि जब जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में पाकिस्तानी आतंकियों ने आतंकी हमले को अंजाम दिया और उसके बाद जब हालात युद्ध की ओर बढ़े, तब नौसेना ने मात्र 96 घंटे के भीतर अपनी पूरी तैयारी पूरी कर ली थी।

Ran Samwad 2025: अपने ही बंदरगाहों में कैद हुई पाकिस्तानी सेना

उन्होंने रक्षा समाचार को बताया कि नौसेना हर दो साल में थिएटर-लेवल एक्सरसाइज Tropex करती है। इस साल भी जनवरी से मार्च के बीच यह अभ्यास हुआ था। उसी तैयारी का फायदा यह हुआ कि जब हालात बिगड़े, तो नौसेना तुरंत समुद्र में उतरने के लिए तैयार थी। सभी जहाजों और पनडुब्बियों को तुरंत गोला-बारूद से लैस किया गया। उन्होंने बताया कि एयरक्राफ्ट कैरियर INS विक्रांत पर 15 मिग-29 लड़ाकू विमान तैनात किए गए और पूरी नौसेना पश्चिमी समुद्र तट पर सक्रिय हो गई।

उद्देश्य स्पष्ट था फॉरवर्ड पोस्टचर और डिटरेंस, ताकि पाकिस्तान किसी भी हाल में भारत की समुद्री सीमाओं, व्यापारिक मार्गों या तटवर्ती क्षेत्रों को खतरा न पहुंचा सके। इस तेज और संगठित कार्रवाई का नतीजा यह हुआ कि पाकिस्तान की नौसेना अरब सागर से बाहर निकल ही नहीं पाई। वाइस एडमिरल सोबती ने गर्व से कहा, “हमने उन्हें उनके ही बंदरगाहों में कैद कर दिया। वे बाहर निकलने की हिम्मत नहीं जुटा पाए।”

Ran Samwad 2025: कैसा होगा भविष्य का युद्ध?

सोबती ने कहा कि इतिहास गवाह है कि हर बड़ी तकनीकी क्रांति ने युद्ध का चेहरा बदला है। तलवार से तोप तक, टैंक से परमाणु बम तक, हर युग में तकनीक ने निर्णायक भूमिका निभाई। आज हम एक साथ कई तकनीकी क्रांतियों के बीच खड़े हैं।

उन्होंने बताया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग, सैटेलाइट कम्युनिकेशन, साइबर ऑपरेशंस और ड्रोन टेक्नोलॉजी ने युद्ध को पूरी तरह बदल दिया है। खास बात यह है कि ये तकनीकें अब बहुत तेजी से विकसित हो रही हैं, सस्ती हो गई हैं और हर किसी के लिए उपलब्ध हैं। सोबती ने कहा कि अब युद्ध का आधार केवल संख्या नहीं बल्कि स्पीड और सटीकता (Precision) है।

उन्होंने कहा कि आज की निर्णायक शक्ति ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और रियल-टाइम कम्युनिकेशन है। उनका कहना था कि सिविल सोर्स तकनीक जैसे Starlink सैटेलाइट इंटरनेट, AI आधारित डेटा एनालिटिक्स और ऑफ-द-शेल्फ ड्रोन अब युद्ध के मैदान पर हथियार के रूप में इस्तेमाल हो रहे हैं। इसका असर यह है कि युद्ध केवल सेनाओं के बीच नहीं, बल्कि तकनीक को अपनाने और इस्तेमाल करने की क्षमता पर निर्भर हो गया है।

Ran Samwad 2025: प्रिसिजन-गाइडेड म्युनिशन से कम कॉलेटरल डैमेज

वाइस एडमिरल सोबती ने रूस-यूक्रेन युद्ध और गाजा संघर्ष का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि ड्रोन अब युद्ध के सबसे बड़े हथियार बन गए हैं। ईरान-इजरायल संघर्ष में लंबी दूरी से की गई स्ट्राइक और प्रिसिजन-गाइडेड म्युनिशन (PGMs) ने युद्ध की दिशा बदल दी। प्रिसिजन-गाइडेड म्युनिशन का इस्तेमाल करते हुए कम से कम कॉलेटरल डैमेज के साथ दुश्मन के मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया।

वाइस एडमिरल सोबती ने कहा कि अब ये हथियार केवल टैक्टिकल लग्जरी नहीं बल्कि रणनीतिक जरूरत बन चुके हैं।

उन्होंने बताया कि यूक्रेन युद्ध ने दिखा दिया कि कम लागत वाले ड्रोन अब बड़े हथियारों के बराबर असर डाल सकते हैं। साधारण क्वाडकॉप्टर को बम गिराने और आत्मघाती (Kamikaze) मिशनों के लिए बदला गया। रूसी टैंकों और आर्मर्ड कॉलम्स को ड्रोन और सैटेलाइट से पहले पहचानकर यूक्रेनी सेना ने सटीक हमले किए। यमन के हूती विद्रोहियों ने रेड सी और गल्फ ऑफ एडन में सस्ते UAVs का इस्तेमाल कर बड़े जहाजों और व्यापारिक मार्गों को चुनौती दी। सोबती ने कहा कि अब ड्रोन स्वॉर्म्स (झुंड) हाई टेक्नोलॉजी वेपंस और जहाजों को टक्कर दे रहे हैं।

Ran Samwad 2025: स्पेस: वॉर का नया डोमेन

सोबती ने कहा कि अब अंतरिक्ष केवल वैज्ञानिक गतिविधियों तक सीमित नहीं रहा। युद्ध में यह सबसे अहम साधन बन चुका है। यूक्रेन को Maxar और Planet Labs जैसी कंपनियों से रियल टाइम सैटेलाइट इमेजरी मिली। Starlink इंटरनेट नेटवर्क ने उन्हें सेफ कम्युनिकेशन उपलब्ध कराया, जबकि रूस लगातार इलेक्ट्रॉनिक जामिंग कर रहा था। इसी तरह गाजा में इजरायल ने सैटेलाइट से हमास की सुरंगों और ठिकानों का पता लगाकर चुनिंदा हमले किए। उन्होंने कहा कि इससे साफ है कि आधुनिक युद्ध में स्पेस-बेस्ड एसेट्स निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं।

Ran Samwad 2025: इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर का बढ़ता दबदबा

वाइस एडमिरल सोबती ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर (EW) आज की लड़ाई का अहम हिस्सा बन गया है। रूस ने यूक्रेनी ड्रोन और GPS आधारित हथियारों को जैमिंग और स्पूफिंग से बेकार कर दिया। उन्होंने कहा कि भारत को भी जॉइंट इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर एसेट्स तैयार करने होंगे क्योंकि आज “जो स्पेक्ट्रम को कंट्रोल करता है, वही युद्ध को कंट्रोल करता है।”

इनफॉरमेशन वॉर और नैरेटिव कंट्रोल

वाइस एडमिरल सोबती ने बताया कि युद्ध केवल मैदान में नहीं बल्कि लोगों के दिमाग में भी लड़ा जाता है। रूस और यूक्रेन दोनों ने अपने-अपने पक्ष में नैरेटिव बनाने के लिए मीडिया लीक, सोशल मीडिया, वीडियो और प्रोपेगैंडा का इस्तेमाल किया। उन्होंने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर में भी दुश्मन ने दुष्प्रचार फैलाने की कोशिश की, लेकिन भारतीय सेना ने समय रहते इसका जवाब दिया। उनका कहना है, “नैरेटिव कंट्रोल अब युद्ध का जरूरी हिस्सा बन चुका है।”

बता दें कि सीडीएस अनिल चौहान ने कहा था कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान लगभग 15 प्रतिशत ऊर्जा दुश्मन के झूठे नैरेटिव और दुष्प्रचार को रोकने में लग गई। यही कारण है कि ऑपरेशन के बाद भारत ने अपनी बात मजबूत ढंग से रखी और वैश्विक स्तर पर समर्थन हासिल किया।

साइबर ऑपरेशंस का रोल

वाइस एडमिरल सोबती के मुताबिक साइबर अटैक युद्ध का हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन अभी तक निर्णायक नहीं साबित हुए हैं। रूस ने यूक्रेन की पावर ग्रिड और कम्युनिकेशन सिस्टम को निशाना बनाया, वहीं ईरान समर्थित हैकर्स ने इजरायल की वाटर सप्लाई और एनर्जी फैसिलिटी पर हमला किया। हालांकि, यूक्रेन रेडंडेंसी और बैकअप सिस्टम के जरिए ऐसे हमलों से जल्दी उबर गया। लेकिन इन हमलों का असर लंबे समय तक नहीं रहा। उन्होंने कहा कि साइबर हमले सहयोगी तो हैं लेकिन निर्णायक नहीं हैं। लेकिन उन्हें नजरअंदाज करना खतरनाक होगा।

नेटवर्क-इंटीग्रेटेड फोर्स स्ट्रक्चर

उन्होंने कहा कि भारत को नेटवर्क-इंटीग्रेटेड फोर्स स्ट्रक्चर की ओर बढ़ना होगा, जहां सेंसर और शूटर अलग-अलग होकर भी डेटा शेयर कर सकें और तुरंत हमला कर सकें। सोबती ने कहा कि आधुनिक युद्ध ने यह साबित कर दिया है कि अब केवल सैनिकों की संख्या से जीत नहीं मिलती। बल्कि स्पीड, एक्यूरेसी और टेक्निकल ऑप्टिमाइजेशन ही युद्ध में जीत दिला सकते हैं।

उन्होंने सुझाव दिया कि भारतीय सेनाओं को मॉड्यूलर, टेक-एनेबल्ड और एगाइल फोर्स पैकेजेज अपनाने होंगे। युद्ध अब “Mass vs Mass” नहीं बल्कि “Fast vs Fast” हो गया है। उन्होंने कहा कि अब भारत को अपने डॉक्ट्रिन्स (सैन्य सिद्धांतों) में मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस शामिल करने होंगे, ताकि थल, जल, नभ, अंतरिक्ष और साइबर हर क्षेत्र में एक साथ तालमेल बनाया जा सके।

Ran Samwad 2025 Training Reforms: भारतीय सेना में बड़े बदलाव की तैयारी, अब ट्रेनिंग में ड्रोन और साइबर वॉरफेयर होंगे शामिल

Ran Samwad 2025 Training Reforms in Indian Army tech-centric
Lt Gen NS Sarna, Commandant School of Artillery Indian Army, deliberating on 'Integrating Technology for Warfighting Through Training Initiatives'.

Ran Samwad 2025 Training Reforms: मध्यप्रदेश के मऊ स्थित आर्मी वॉर कॉलेज में तीनों सेनाओं के संयुक्त रण संवाद 2025 सेमीनार में भारतीय सेना के टॉप अफसरों ने भविष्य के युद्ध की नई रूपरेखा पर चर्चा की। फोकस था, पारंपरिक ट्रेनिंग से आगे बढ़कर टेक्नोलॉजी-बेस्ड ट्रेनिंग मॉडल की ओर बढ़ना। रण संवाद के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि 2027 तक भारतीय सेना के हर जवान को ड्रोन तकनीक की ट्रेनिंग दी जाएगी। वहीं, स्कूल ऑफ आर्टिलरी के कमांडेंट लेफ्टिनेंट जनरल एनएस सरना ने कहा कि भविष्य का युद्ध पारंपरिक नहीं बल्कि तकनीकी होगा और इसके लिए हमें सैनिकों को नए स्किल्स की ट्रेनिंग देनी होगी।

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Ran Samwad 2025 Training Reforms: बदलना होगा ट्रेनिंग स्ट्रक्चर

पिछले एक दशक में दुनिया भर में हुई हालिया जंगों में देखा गया है कि ड्रोन, साइबर हमले, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। जनरल सरना ने कहा कि यह संकेत है कि अगला युद्ध इन्हीं तकनीकों के इर्द-गिर्द लड़ा जाएगा। उन्होंने कहा कि अगर हमें आने वाले संघर्षों के लिए तैयार रहना है तो हमें अपने ट्रेनिंग स्ट्रक्चर को पूरी तरह बदलना होगा।

लेफ्टिनेंट जनरल एनएस सरना ने ‘इंटीग्रेटिंग टेक्नोलॉजी फॉर वॉरफाइटिंग थ्रू ट्रेनिंग इनिशिएटिव्स’ पर बोलते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि हमारी मिलिट्री ट्रेनिंग इंस्टीट्यूशंस केवल शारीरिक क्षमता और पारंपरिक युद्ध तक सीमित न रहकर टेक्नोलॉजी वॉरफेयर के लिए भी तैयार हों।

उन्होंने कहा कि अधिकांश सैन्य अकादमियां अभी भी पारंपरिक युद्ध पर आधारित प्रशिक्षण देती हैं, जहां शारीरिक फिटनेस और बुनियादी रणनीति पर ज्यादा जोर होता है। लेकिन अब यह काफी नहीं है। नए समय की मांग है कि जवान साइबर सिक्योरिटी, ड्रोन ऑपरेशन, इंफॉर्मेशन वॉरफेयर और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर जैसे विषयों में भी एक्सपर्ट बनें।

उन्होंने कहा कि भविष्य के युद्धों को देखते हुए सैनिकों के लिए ऐसा ट्रेनिंग सिस्टम डेवलप करना जरूरी है, जो चुस्त और अनुकूलनशील हो और बदलती तकनीक के साथ कदम मिला सके। उनका कहना था कि सेना के प्रशिक्षण संस्थानों को तकनीकी प्रशिक्षण केंद्र (Technology Training Hubs) के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। उन्होंने सिमुलेशन बेस्ड पाठ्यक्रम, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) वारगेमिंग और जॉइंट ट्रेनिंग इनिशिएटिव को पारंपरिक सैन्य शिक्षा में बड़ा परिवर्तनकारी कदम बताया। साथ ही उन्होंने एक राष्ट्रीय सैन्य डिजिटल ज्ञान भंडार (Military Digital Knowledge Repository) बनाने की सिफारिश की, ताकि आधुनिक ज्ञान और तकनीकी अनुभव को संस्थागत ढांचे में संरक्षित और साझा किया जा सके।

Ran Samwad 2025 Training Reforms: सिद्धांत, संगठन और ट्रेनिंग पर फोकस

इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (HQ-IDS) के डिप्टी चीफ (Doctrine, Organisation & Training) लेफ्टिनेंट जनरल विपुल सिंघल ने कहा कि भविष्य के युद्धों में जीत का आधार जॉइंटनेस और ऑर्गनाइजेशन तालमेल होगा। उन्होंने कहा, “आर्मी, नेवी और एयरफोर्स के बीच सामरिक एकजुटता और साझा प्रशिक्षण ही हमें भविष्य की सुरक्षा चुनौतियों में बढ़त दिलाएगा।”

उन्होंने कहा कि सैन्य प्रशिक्षण को लगातार अपडेट करते रहना होगा ताकि वह तकनीकी बदलावों के साथ तालमेल बना सके। उनके अनुसार, युद्ध की तैयारी के तीन स्तंभ हैं Doctrine (सिद्धांत), Organisation (संगठन) और Training (प्रशिक्षण)। इन तीनों का तालमेल ही कॉम्बैट रेडीनेस यानी युद्ध के लिए तैयार रहने की गारंटी है। उन्होंने कहा कि इससे न केवल प्रशिक्षण को तकनीकी रूप से आधुनिक बनाया जा सकेगा, बल्कि विभिन्न सेनाओं के बीच अनुभवों का आदान-प्रदान भी आसान होगा।

Ran Samwad 2025 Training Reforms: तीन प्रमुख क्षेत्रों पर दे ध्यान

सेंट्रल कमांड यानी सूर्या कमांड के जनरल ऑफिसर कमांडिंग लेफ्टिनेंट जनरल सेनगुप्ता ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान दुश्मन की तरफ से बड़े पैमाने पर ड्रोन का इस्तेमाल देखने के बाद भारत अब तीन प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान दे रहा है। पहला, काउंटर-ड्रोन सिस्टम विकसित करना ताकि दुश्मन के ड्रोन खतरों को तुरंत न्यूट्रलाइज किया जा सके। दूसरा, ज्यादा से ज्यादा सैनिकों को ड्रोन चलाने और टैक्टिकल बैटल एरिया में इस्तेमाल करने का प्रशिक्षण देना। तीसरा, ऑटोनोमस हवाई हमलों के तरीके तैयार करना, ताकि दुश्मन की रणनीतियों का प्रभावी जवाब दिया जा सके। उन्होंने कहा कि अब ड्रोन कोई विकल्प नहीं रह गए हैं, बल्कि युद्ध के मैदान में प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं।

जनरल सेनगुप्ता ने कहा, “तकनीक को केवल सेंट्रल कमांड में ही नहीं, बल्कि पूरी भारतीय सेना में अपनाया जा रहा है। हर कमांड अपने ऑपरेशनल माहौल और चुनौतियों के हिसाब से इसे लागू कर रही है।” उन्होंने आगे कहा कि रण संवाद अब भारतीय सेनाओं के लिए गहन चर्चा, जॉइंट रिसर्च और मल्टी-डोमेन चैलेंजेस की तैयारी का अहम मंच बन चुका है। उन्होंने आगे कहा कि इस सेमिनार से मिले अनुभव और निष्कर्ष भारतीय सशस्त्र बलों को मानवीय जिम्मेदारियों और युद्धक तैयारी (combat readiness) के बीच संतुलन साधने में अहम भूमिका निभाएंगे।

ड्रोन और ऑटोमेटेड वेपन सिस्टम पर जोर

आर्मी ट्रेनिंग कमांड के ब्रिगेडियर रेवती भंडारी ने अनमैन्ड ऑटोनॉमस सिस्टम्स (UAS) यानी ड्रोन और ऑटोमेटेड वेपन सिस्टम पर बोलते हुए कहा कि ह्यूमन-मशीन टीमिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सिस्टम मैनेजमेंट और लॉजिस्टिक्स सपोर्ट के लिए ड्रोन का इस्तेमाल आने वाले समय में युद्ध का अहम हिस्सा बनेगा।

उन्होंने यह भी बताया कि कई देशों ने पहले ही सर्विलांस, टारगेटिंग और सप्लाई के लिए बड़े पैमाने पर ड्रोन और बिना चालक वाले वाहन (UAVs) को शामिल कर लिया है। भारत को भी इसी दिशा में तेज कदम उठाने होंगे।

ब्रिगेडियर भंडारी ने दुनिया भर के मिलिट्री स्ट्रक्चर का उदाहरण देते हुए कहा कि अब वॉर स्ट्रक्चर्स को चरणबद्ध तरीके से सेमी-ऑटोनॉमस से पूरी तरह ऑटोनॉमस सिस्टम्स की ओर ले जाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि अगर भारत को 2035 तक ऑटोनॉमस कैपेबिलिटी हासिल करनी है तो उसे अभी से अपने ट्रेनिंग, डॉक्ट्रिन और स्ट्रक्चर में बदलाव करना होगा।

उन्होंने चेतावनी दी कि ऑटोनॉमस सिस्टम्स के इस्तेमाल से कई कानूनी और नैतिक प्रश्न भी उठेंगे। ऐसे में प्रशिक्षण में इन पहलुओं को भी शामिल करना होगा।

सेना प्रमुख ने कही थी ये बात

बता दे कि इसी महीने चार अगस्त को सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने आईआईटी मद्रास में ‘अग्निशोध’ रिसर्च सेंटर के उद्घाटन के दौरान ‘बूट्स से बॉट्स’ की कॉन्सेप्ट पर जोर दिया था। उन्होंने कहा था कि भारतीय सेनाएं अब पारंपरिक सैन्य शक्ति (बूट्स) से तकनीक-आधारित युद्ध (बॉट्स) की ओर बढ़ रहे हैं, जिसमें नॉन कॉन्टैक्ट वॉर, स्ट्रेजेटिज मूमेंटम और आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल शामिल है। उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर का उदाहरण देते हुए कहा था कि यह एक शतरंज के खेल की तरह था, जहां स्ट्रेटेजिकल और टेक्टिकल प्लानिंग के साथ दुश्मन को शह और मात दी गई। ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, और अन्य तकनीकों का इस्तेमाल कर सेना ने आतंकी ठिकानों को नष्ट किया। उन्होंने यह भी कहा कि नैरेटिव मैनेजमेंट के जरिए जनता तक सही संदेश पहुंचाना महत्वपूर्ण है, और इसके लिए सोशल मीडिया का उपयोग किया गया।

Ran Samwad 2025 Doctrine: ‘युद्ध का मैदान बने इंसानी दिमाग’ से ऐसे जंग लड़ेंगे स्पेशल फोर्सेज के जवान! ऑपरेशन सिंदूर के बाद सौंपा गया नया काम

Ran Samwad 2025 Doctrine: Indian Special Forces Information Warfare
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Ran Samwad 2025 Doctrine: मध्यप्रदेश के मऊ स्थित आर्मी वॉर कॉलेज में आयोजित रण संवाद 2025 भारतीय रक्षा इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुआ है। इस दो दिवसीय ट्राई सर्विसेज सेमिनार में सेना, नौसेना और वायुसेना के टॉप अफसरों के साथ-साथ इंडस्ट्री, एकेडमिशियंस और रणनीतिक विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। इसी मौके पर चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने भारतीय स्पेशल फोर्सेज के लिए पहली बार जॉइंट डॉक्ट्रिन (Joint Doctrine for Special Forces Operations) जारी की।

Rajnath Singh Ran Samwad 2025: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह बोले- “भारत ने कभी नहीं की युद्ध की शुरुआत, पर सुरक्षा के लिए हमेशा तैयार”

यह डॉक्ट्रिन बताती है कि अब स्पेशल फोर्सेज को केवल पारंपरिक युद्धक्षेत्रों जमीन, हवा और समुद्र में ही नहीं बल्कि सूचना युद्ध (Information Warfare) और नैरेटिव प्रबंधन (Narrative Management) जैसे नए क्षेत्रों में भी एक्टिव रहना होगा। देश की पहली सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जॉइंट स्पेशल फोर्सेस पॉलिसी में यह साफ कहा गया है कि स्पेशल फोर्सेस को अब प्रचार का मुकाबला करने, सूचनाओं को नियंत्रित करने और समाज में सही संदेश पहुंचाने की रणनीति तैयार करनी होगी। इस नीति में सूचना युद्ध को एक महत्वपूर्ण युद्धक्षेत्र के रूप में मान्यता दी गई है, जो पारंपरिक सैन्य कार्रवाइयों जितना ही जरूरी है।

Ran Samwad 2025 Doctrine: ह्यूमन ब्रेन बना बैटलफील्ड

डॉक्ट्रिन में कहा गया है कि आधुनिक समय में “इंसान का दिमाग भी युद्धक्षेत्र बन चुका है”। सोशल मीडिया, डीप फेक तकनीक और मनोवैज्ञानिक अभियानों के जरिए विरोधी देश जनमत को प्रभावित कर सकते हैं और समाज में अस्थिरता पैदा कर सकते हैं।

इसलिए भारतीय स्पेशल फोर्सेज को अब आक्रामक और रक्षात्मक दोनों प्रकार के इन्फो वॉरफेयर में सक्षम बनाया जाएगा। उन्हें न केवल दुश्मन के प्रोपेगेंडा को रोकना होगा, बल्कि भारत के पक्ष में मजबूत नैरेटिव तैयार करके उसे दुनियाभर में पहुंचाना भी होगा।

Ran Samwad 2025 Doctrine: ऑपरेशन सिंदूर से सीखे सबक

नई डॉक्ट्रिन का सबसे बड़ा संदर्भ ऑपरेशन सिंदूर है, जिसने दिखा दिया कि युद्ध केवल गोलियों और मिसाइलों से नहीं, बल्कि इनफॉरमेशन और परसेप्शन से भी जीता या हारा जा सकता है। इस ऑपरेशन ने यह साफ कर दिया कि युद्ध के मैदान में जीत के साथ-साथ लोगों के दिमाग में सही संदेश पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है। मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय सेनाओं ने पाकिस्तान पर आतंक के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की थी। उस समय जनरल चौहान ने बताया था कि लगभग 15 फीसदी ऊर्जा दुश्मन की झूठी सूचनाओं और दुष्प्रचार को रोकने में खर्च हुई।

उन्होंने यह भी कहा था कि मिसइन्फॉर्मेशन (गलत सूचना) किसी एक घटना तक सीमित नहीं होती बल्कि यह लगातार चलती रहती है। इसलिए इसका जवाब भी बेहद सावधानीपूर्वक और संयमित तरीके से देना जरूरी है, ताकि दुश्मन को नैरेटिव बनाने का मौका न मिल सके।

मई 2025 में पाकिस्तान के खिलाफ चले इस ऑपरेशन में भारत ने हवाई, थल और नौसैनिक तीनों मोर्चों पर निर्णायक बढ़त हासिल की थी। लेकिन इस दौरान दुश्मन ने सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर झूठे नैरेटिव फैलाने की कोशिश की। पाकिस्तान ने यह प्रचारित किया कि उसने भारत को भारी नुकसान पहुंचाया, जबकि हकीकत इसके बिल्कुल उलट थी।

Ran Samwad 2025 Doctrine: “विक्ट्री इज इन द माइंड”- जनरल उपेंद्र द्विवेदी

सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने हाल हाल ही में कहा था कि आज की लड़ाई केवल जमीन पर जीतने से तय नहीं होती, बल्कि जनता के दिमाग में भी लड़ी जाती है। उन्होंने याद दिलाया कि पाकिस्तान ने ऑपरेशन सिंदूर में हार के बावजूद यह प्रचार किया कि उसने ऑपरेशन सिंदूर जीता, और वहां की जनता भी यही मानने लगी। जबकि सच्चाई इसके बिल्कुल विपरीत थी।

जनरल द्विवेदी ने कहा कि अगर आप किसी पाकिस्तानी से पूछें कि ऑपरेशन सिंदूर में उनकी हार हुई या जीत, तो वह कहेगा, “हमारे प्रमुख को फील्ड मार्शल बनाया गया है, हमने तो जीत हासिल की।” इस घटना से यह साफ होता है कि लोगों के परसेप्शन को कंट्रोल करना अब युद्ध का एक अभिन्न हिस्सा बन चुका है। उन्होंने एक “मैसेज मैनेजमेंट सिस्टम” की जरूरत पर भी जोर दिया ताकि इनफॉरमेशन और परसेप्शन वॉर को और मजबूत किया जा सके।

Ran Samwad 2025 Doctrine: Indian Special Forces Information Warfare
General Anil Chauhan, Chief of Defence Staff along with Admiral Dinesh Kumar Tripathi #CNS, Air Chief Marshal AP Singh CAS and Lt Gen PP Singh VCOAS released two joint doctrines on ‘Special Forces Operations’ and
‘Airborne & Heliborne Operations’ during RAN SAMWAD 2025, at the Army War College.

Ran Samwad 2025 Doctrine: स्पेशल फोर्सेज की नई भूमिका

भारतीय स्पेशल फोर्सेज जिनमें आर्मी के पैरा एसएफ (Para SF), नौसेना की मरीन कमांडो यूनिट्स (MARCOS) और वायुसेना की गरुड़ कमांडो फोर्स शामिल हैं, उन्हें अब एक नए बैटलफील्ड में काम करना होगा।

नई डॉक्ट्रिन कहती है कि स्पेशल फोर्सेज को सांस्कृतिक समझ, रणनीतिक संवाद और मनोवैज्ञानिक दृढ़ता (Psychological Resilience) की भी ट्रेनिंग दी जाएगी। यह स्किल उन्हें दुश्मन की प्रचार मशीनरी का मुकाबला करने और अपने संदेश को सही रूप में दुनिया तक पहुंचाने में मदद करेगी।

हाइब्रिड वॉरफेयर की तैयारी

डॉक्ट्रिन ने यह भी साफ किया है कि भविष्य का युद्ध केवल पारंपरिक हथियारों से नहीं लड़ा जाएगा। इसे हाइब्रिड वॉरफेयर कहा जाता है। इसमें पारंपरिक सैन्य बलों के साथ-साथ साइबर हमले, आर्थिक दबाव, फर्जी सूचनाएं और प्रॉक्सी संगठनों का इस्तेमाल किया जाएगा।

इसलिए भारतीय स्पेशल फोर्सेज को मल्टी-डोमेन यानी जमीन, हवा, समुद्र, अंतरिक्ष, साइबर और सूचना हर क्षेत्र में तैयार रहना होगा।

पहली स्वतंत्र स्पेशल ऑपरेशंस कमांड!

2018 में गठित और 2019 में पूरी तरह एक्टिव हुई आर्मर्ड फोर्सेस स्पेशल ऑपरेशन डिविजन (AFSOD) भारत की पहली ट्राई सर्विसेज स्पेशल ऑपरेशन यूनिट है। इसमें लगभग 3,000 कमांडो शामिल हैं, जो अलग-अलग सेवाओं से आते हैं। नई डॉक्ट्रिन में संकेत दिया गया है कि भविष्य में AFSOD का दायरा और स्ट्रक्चर बढ़ाया जा सकता है। इसे एक फुल-फ्लेज्ड कमांड का रूप दिया जा सकता है, जो सीधे चीफ ऑफ स्टााफ कमेटी (COSC) के तहत काम करेगा। वहीं, अगर ऐसा होता है तो भारत धीरे-धीरे उस दिशा में बढ़ेगा, जहां एक स्वतंत्र स्पेशल ऑपरेशंस कमांड (SOC) बनाया जा सके।

ट्रेनिंग सिस्टम में बड़ा बदलाव

इस डॉक्ट्रिन में ट्रेनिंग को लेकर भी अहम सुधारों की बात कही गई है। अभी तक तीनों सेनाओं की अपनी-अपनी ट्रेनिंग इंस्टीट्यूशंस और स्कूल हैं। लेकिन अब इन्हें अपग्रेड करके जॉइंट सर्विस ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट्स (JSTIs) बनाने की योजना है। हर JSTI को किसी खास कौशल (Core Competency) जैसे माउंटेन वॉर, समुद्री अभियान या साइबर ऑपरेशंस में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनाया जाएगा। हालांकि इन संस्थानों का प्रशासनिक नियंत्रण संबंधित मूल सेना के पास ही रहेगा।

सूचना की जंग पर खुलेगा मोर्चा

यह डॉक्ट्रिन ऑपरेशन सिंदूर के बाद जारी की गई है। जिसने भारतीय सैन्य रणनीति को यह बड़ा सबक दिया कि युद्ध केवल हथियारों से नहीं जीते जाते। इस ऑपरेशन में भारत ने दिखाया कि कैसे भारचीय मिसाइलों ने दुश्मन की सीमा के अंदर तक प्रहार किया, नौसेना ने अरब सागर में पाकिस्तान की गतिविधियों को रोका और थल सेना ने सीमा पर मोर्चा संभाला।

लेकिन इसके साथ ही एक और जंग लड़ी गई सूचना की जंग। पाकिस्तान ने फर्जी वीडियो, मनगढ़ंत खबरें और सोशल मीडिया ट्रेंड्स के जरिए यह दिखाने की कोशिश की कि भारत को नुकसान हुआ है। भारतीय सेना और सरकार ने इस प्रोपेगेंडा का समय रहते जवाब दिया और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सही तस्वीर रखी। यही वजह है कि अब डॉक्ट्रिन में इसे “ऑपरेशनल इम्पेरेटिव” यानी युद्ध का जरूरी हिस्सा माना गया है।

Differences on Theatre Commands: क्या थिएटर कमांड को लेकर सेनाओं में बढ़ रहे हैं मतभेद? CDS जनरल चौहान ने कैसे निकाला बीच का रास्ता?

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General Anil Chauhan, Chief of Defence Staff along with Admiral Dinesh Kumar Tripathi #CNS, Air Chief Marshal AP Singh CAS and Lt Gen PP Singh VCOAS released two joint doctrines on 'Special Forces Operations' and 'Airborne & Heliborne Operations' during RAN SAMWAD 2025, at the Army War College.

Differences on Theatre Commands: भारतीय सेनाओं की टॉप लीडरशिप में थिएटर कमांड के स्ट्रक्चर को लेकर मतभेद सामने आ गए हैं। जहां नौसेना प्रमुख एडमिरल डीके त्रिपाठी ने बुधवार को थिएटराइजेशन की पैरवी की। तो वहीं, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान ने यह स्वीकार किया कि इस मुद्दे पर असहमतियां हैं, लेकिन उन्होंने भरोसा दिलाया कि इसे जल्द ही सुलझा लिया जाएगा। इससे एक दिन पहले ही एयरफोर्स चीफ एपी सिंह ने थिएटर कमांड को लेकर जल्दबाजी नहीं करने की बात कही थी।

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Differences on Theatre Commands: क्या कहा था एयरफोर्स चीफ ने?

मऊ के आर्मी वॉर कालेज में आयोजित दो दिवसीय रण संवाद कार्यक्रम में बोलते हुए वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने थिएटर कमांड के प्रस्तावित स्ट्रक्चर को लेकर अलग बात कही थी। उन्होंने सुझाव दिया कि मिलिट्री कॉर्डिनेशन का स्स्ट्रक्चर ऐसा होना चाहिए जिसे सीधे तीनों सेनाओं के प्रमुख मिलकर ऑपरेट करें। वायुसेना प्रमुख का कहना था कि इस स्तर पर जॉइंट प्लानिंग और फैसले अधिक व्यावहारिक होंगे और इससे अनावश्यक नई परतें जोड़ने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने यह भी कहा था कि अभी थिएटर कमांड लागू करने का समय नहीं है। उन्होंने समझाया कि इस तरह की जल्दबाजी से तीनों सेनाओं की कोर स्ट्रेंथ को नुकसान हो सकता है।

एयर चीफ का कहना था कि “हमें अभी किसी नए स्ट्रक्चर की जरूरत नहीं है। जो सिस्टम मौजूद है, उसी के जरिए बेहतर काम हो सकता है। हमें दिल्ली में एक जॉइंट प्लानिंग और कॉर्डिनेशन सेंटर बनाना चाहिए, जहां से योजनाएं तैयार हों और फिर उनका क्रियान्वयन अलग-अलग स्तरों पर किया जाए।”

वायुसेना की चिंता यह है कि उसके पास सीमित संख्या में विमान, रिफ्यूलर और निगरानी प्रणाली (AWACS) हैं। अगर हवाई संसाधन अलग-अलग थिएटर कमांड को दे दिए गए, तो वायुसेना तेजी से किसी भी मोर्चे पर अपने संसाधन नहीं भेज पाएगी। वर्तमान में वायुसेना सिर्फ 48 घंटों में अपने संसाधनों को किसी भी हिस्से में भेज सकती है, और यही उसकी सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत है।

Differences on Theatre Commands: नौसेना प्रमुख ने किया समर्थन

वहीं नौसेना प्रमुख एडमिरल डीके त्रिपाठी ने थिएटराइजेशन का खुलकर समर्थन किया। उन्होंने कहा कि नौसेना इस सुधार को आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। एडमिरल त्रिपाठी ने कहा, “हमारा लक्ष्य है कि तीनों सेनाओं के बीच कमांड, कंट्रोल, कम्युनिकेशन और कॉम्बैट यानी युद्धक क्षमता का बेहतर कॉर्डिनेशन हो। हमें एक साझा ऑपरेशनल पिक्चर और जॉइंट प्लानिंग बनाने की दिशा में आगे बढ़ना होगा।”

नौसेना प्रमुख ने ज़ोर देकर कहा कि वर्तमान में भी तीनों सेनाएं जॉइंटनेस और इंटीग्रेशन को मजबूत करने की दिशा में बड़े कदम उठा रही हैं। उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया आगे भी जारी रहेगी और थिएटर कमांड उसका अंतिम स्वरूप होगा।

नौसेना प्रमुख ने यह भी बताया कि समुद्री क्षेत्र में नए खतरे उभर रहे हैं। मछली पकड़ने वाली नावें और रिसर्च वेसल अब आधुनिक तकनीक से लैस होकर निगरानी और सूचनाएं इकट्ठा कर रहे हैं, जिन्हें सैन्य उद्देश्यों के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

CDS ने साधा संतुलन

दो सेनाओं के अलग-अलग विचार सामने आने के बाद, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान ने बीच का रास्ता अपनाने की बात कही। उन्होंने कहा कि मतभेद होना कोई बुरी बात नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि हम खुलकर चर्चा कर रहे हैं।

सीडीएस ने कहा, “अगर असहमति नज़र आ रही है तो यह अच्छी बात है, क्योंकि हम इसे देशहित में सुलझा लेंगे। सबसे बड़ी बात यह है कि तीनों सेनाओं में भरोसा है और हम एक-दूसरे की बात सुनने को तैयार हैं।”

उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि थिएटर कमांड पर काम तेज करना होगा। “शायद हमें यह काम 10 साल पहले ही शुरू कर देना चाहिए था। अब देर हो चुकी है, लेकिन हमें इस कमी को जल्द पूरा करना होगा।”

जनरल चौहान ने कहा, “सीडीएस बनने के बाद से मेरा उद्देश्य तीनों सेनाओं में जॉइंटनेस को बढ़ावा देना रहा है। आज हम खुलकर अपनी राय रखते हैं, मतभेदों पर चर्चा करते हैं और फिर भी एक साझा समाधान तक पहुंचते हैं। यही हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि है।” सीडीएस ने यह भी कहा कि विचार-विमर्श की यह परंपरा तीनों सेनाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे यह साबित होता है कि वे जॉइंटनेस और सहयोग के लिए गंभीर हैं।

उन्होंने कहा कि भविष्य में केवल सेना, वायुसेना और नौसेना ही नहीं, बल्कि खुफिया एजेंसियों, केंद्रीय अर्धसैनिक बलों और तकनीकी संगठनों के साथ भी गहन तालमेल जरूरी होगा।

गौरतलब है कि चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का पद औपचारिक रूप से 1 जनवरी 2020 को अस्तित्व में आया था, जब जनरल बिपिन रावत को देश का पहला सीडीएस नियुक्त किया गया। उनके निधन के बाद सितंबर 2022 में जनरल अनिल चौहान ने यह जिम्मेदारी संभाली। सरकार ने सीडीएस को थिएटर कमांड्स बनाने और तीनों सेनाओं के बीच तालमेल को मजबूत करने का जिम्मेदारी सौंपी है।

जनरल चौहान ने कहा कि थिएटर कमांड की दिशा में आगे बढ़ने की प्रक्रिया को और तेज करने की जरूरत है। उन्होंने कहा, “यकीन रखिए, हम पूरी कोशिश कर रहे हैं और इसे आगे ले जाएंगे।”

क्या है थिएटर कमांड?

थिएटर कमांड के कॉन्सेप्ट का मतलब है कि सेना, नौसेना और वायुसेना को एक ही कमांडर के अधीन रखा जाए। यह कमांडर किसी खास भौगोलिक क्षेत्र की सुरक्षा का जिम्मा संभाले और उसके पास सभी तरह के संसाधन जैसे टैंक, तोप, जहाज, विमान, हेलिकॉप्टर और सैनिक एक साथ हों।

अभी भारतीय सेना और वायुसेना के पास सात-सात कमांड हैं और नौसेना के पास तीन। यानी कुल 17 स्वतंत्र कमांड काम कर रहे हैं। चीन ने 2016 में अपने सात सैन्य क्षेत्रों को पांच थिएटर कमांड में बदल दिया था, जिनमें भारत से सटे इलाके उसके पश्चिमी थिएटर कमांड के अंतर्गत आते हैं।

भारत में डिफेंस रिफॉर्म्स 2019 में शुरू हुए थे, जब डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स का गठन हुआ और चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का पद सृजित किया गया। तब से लेकर अब तक थिएटर कमांड के कॉन्सेप्ट पर लगातार विचार-विमर्श चल रहा है।

भविष्य के युद्ध की नई तस्वीर

जनरल चौहान ने कहा कि आने वाले समय में युद्ध केवल जमीन या आसमान तक सीमित नहीं रहेंगे। अब यह घनी आबादी वाले शहरों, रेगिस्तानों, समुद्र के भीतर, अंतरिक्ष और साइबर स्पेस तक फैलेगा। उन्होंने उदाहरण दिया कि शहरी इलाकों में आतंकवाद विरोधी अभियानों के लिए हल्के ड्रोन, डिटेक्शन सिस्टम और नई तकनीक निर्णायक साबित होंगी।

उन्होंने यह भी कहा कि अब युद्ध केवल संगठित सेनाओं के बीच नहीं हो रहे। आज पैरामिलिट्री फोर्स, निजी सुरक्षा कंपनियां, भाड़े के सैनिक और टेक्नोलॉजी आधारित हथियार प्रणाली भी सक्रिय हैं। आने वाले समय में रोबोट और स्वचालित हथियार भी युद्ध का हिस्सा बन सकते हैं।

सीडीएस ने कहा कि आज हमें सिर्फ स्कॉलर वॉरियर ही नहीं, बल्कि टेक वॉरियर और इंफ्लुएंस वॉरियर की भी जरूरत है। जहां स्कॉलर वॉरियर युद्ध की कला और विज्ञान को समझेगा। तो टेक वॉरियर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर और अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करेगा। जबकि इंफ्लुएंस वॉरियर नैरेटिव, सूचना और जनमत को नियंत्रित करेगा।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बढ़ेगी भूमिका

जनरल चौहान ने तकनीकी विकास को युद्ध का निर्णायक पहलू बताया। आधुनिक युद्ध में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और बिग डेटा एनालिटिक्स निर्णायक भूमिका निभाएंगे। डायरेक्टेड एनर्जी वेपन और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर युद्धक्षेत्र की दिशा को पूरी तरह बदल देंगे।

उन्होंने यह भी कहा कि आज साइबर वारफेयर, ऑनलाइन प्रोपेगैंडा और नैरेटिव ऑपरेशंस व्यक्तिगत स्तर तक पहुंच चुके हैं। आम नागरिक भी अब युद्ध का हिस्सा बन गए हैं और सोशल मीडिया, साइबर अभियानों तथा ऑनलाइन नैरेटिव्स के जरिए सीधे प्रभावित हो रहे हैं।

रण संवाद से मिली सीख

रण संवाद 2025 के दो दिनों की चर्चा का सार प्रस्तुत करते हुए सीडीएस ने कहा कि असमानता अब शक्ति संतुलन का नया आधार बन चुकी है। सटीकता पारंपरिक भारी बल प्रयोग की जगह ले रही है। युद्ध धीरे-धीरे मानव संचालित से मशीन संचालित होता जा रहा है, जिससे नैतिक सवाल भी उठेंगे। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि नैरेटिव बिल्डिंग अब केवल मीडिया का हिस्सा नहीं है, बल्कि युद्ध का निर्णायक पहलू बन गई है।

जनरल चौहान ने यह भी कहा कि युद्ध में काइनेटिक ऑपरेशंस और इंफॉर्मेशन ऑपरेशंस का इंटीग्रेशन अब अनिवार्य हो गया है। उन्होंने भरोसा जताया कि रण संवाद जैसे मंच भविष्य के युद्धों को समझने और भारतीय सेनाओं की तैयारियों को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाएंगे।

 

IAF Chief AP Singh On Theatre Command: रण संवाद में एयर फोर्स चीफ ने थिएटर कमांड को लेकर कह दी ये बड़ी बात, सामने बैठे थे CDS, रहे चुप

IAF Chief AP Singh on Theatre Command: Warns Against Rushed Theaterisation
File Photo

IAF Chief AP Singh On Theatre Command: भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने कहा है कि थिएटर कमांड (Theaterisation) की प्रक्रिया को जल्दबाजी में लागू करना सही कदम नहीं होगा। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि भारत को किसी दूसरे देश का मॉडल नहीं अपनाना चाहिए बल्कि अपनी जरूरतों के हिसाब से फैसला लेना होगा।

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अपनी बेबाक और सीधे-सपाट शब्दों में अपनी बाात कहने के लिए मशहूर एयर चीफ मार्शल एपी सिंह मंगलवार को मध्यप्रदेश के डॉ. भीमराव अंबेडकर नगर (मऊ) स्थित आर्मी वॉर कॉलेज में आयोजित रण संवाद 2025 कार्यक्रम के फायर साइट चैट कार्यक्रम में बोल रहे थे। यह ट्राई सर्विसेज (थलसेना, नौसेना और वायुसेना) का जॉइंट सेमिनार है, जिसमें वॉर, वॉर फाइटिंग और भविष्य की सैन्य चुनौतियों पर चर्चा की जा रही है।

IAF Chief AP Singh On Theatre Command: सामने बैठे थे जनरल अनिल चौहान

वर्तमान में सेना के सात, वायुसेना के सात और नौसेना के तीन कमांड अलग-अलग काम करते हैं, लेकिन इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड से सभी सेवाओं के संसाधनों को एक ही कमांडर के अधीन इंटीग्रेट किया जाएगा। यह सुधार 2019 में सैन्य मामलों के विभाग के गठन और चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की नियुक्ति से शुरू हुआ था।

मध्यप्रदेश के डॉ. अंबेडकर नगर (मऊ) में आर्मी वॉर कॉलेज में आयोजित रण संवाद 2025 के दौरान भारतीय वायुसेना के प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने थिएटर कमांड पर बोलते हुए उन्होंने मौजूदा मिलिट्री फॉरमेशंस में जल्दबाजी से बदलाव न करने की बीत कही। उनका कहना था कि सेनाओं के कोर स्किल्स को बनाए रखते हुए ही कोई फैसला लिया जाना चाहिए।

खास बात यह है कि जब एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने यह खरा-खरा बयान दिया तो दर्शक दीर्घा में सीडीएस जनरल अनिल चौहान भी बैठे हुए उन्हें सुन रहे थे और उनके बयान पर वे सिर्फ मुस्कुरा कर रह गए और कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। बता दें कि रण संवाद कार्यक्रम को सीडीएस अनिल चौहान की पहल के बाद बाद ही आयोजित किया गया है।

IAF Chief AP Singh On Theatre Command: अतिरिक्त लेयर्स न जोड़ी जाएं

वायुसेना प्रमुख एपी सिंह ने जोर दिया कि कंबाइंड स्ट्रक्चर्स में फैसला लेने की प्रक्रिया में अतिरिक्त लेयर्स न जोड़ी जाएं, क्योंकि इससे कमांडर स्तर पर जल्दी फैसला लेना मुश्किल हो जाता है। वायुसेना प्रमुख ने कहा कि थिएटर कमांड का उद्देश्य फटाफट फैसला लेना है, लेकिन इसके लिए मौजूदा व्यवस्था को बिना सोचे-समझे बदलना ठीक नहीं।

उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर का उदाहरण देते हुए कहा कि इस अभियान में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ ने चार वरिष्ठ अधिकारियों – सीडीएस और तीनों सेवाओं के प्रमुखों के बीच कॉर्डिनेशन का बड़ा काम किया। सिंह ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान केवल चार लोगों की जॉइंट प्लानिंग से कोई कमी नहीं आई। सब कुछ व्यवस्थित तरीके से हो गया। इस ऑपरेशन के दौरान चारों शीर्ष सैन्य अधिकारी सीडीएस जनरल अनिल चौहान और तीनों सेवा प्रमुख—साथ मिलकर काम कर रहे थे। इसलिए, उन्होंने टॉप लेवल पर जॉइंट प्लानिंग और क्रियान्वयनपर जोर दिया।

सिंह ने यह भी कहा कि कुछ छोटी-मोटी चुनौतियां जरूर सामने आईं, लेकिन उन्हें तुरंत हल कर लिया गया। इसका सबसे बड़ा सबक यह था कि दिल्ली में एक ज्वॉइंट प्लानिंग और कोऑर्डिनेशन सेंटर स्थापित होना चाहिए, जिसे सीडीएस और चीफ़्स ऑफ़ स्टाफ कमिटी के अधीन रखा जाए।

IAF Chief AP Singh On Theatre Command: गंभीर समस्याएं खड़ी होंगी

सिंह ने कहा कि “कोई भी नया स्ट्रक्चर निर्णय प्रक्रिया को लंबा नहीं करे। ओओडीए लूप (OODA Loop – Observe, Orient, Decide, Act) जितना छोटा रहेगा, युद्धक निर्णय उतने तेज होंगे।” उन्होंने यह भी जोर दिया कि हर सेवा की मुख्य क्षमता (Core Competence) बरकरार रहनी चाहिए। अगर थलसेना का कार्य वायुसेना को सौंपा जाएगा या नौसेना का कार्य किसी अन्य सेवा को, तो इससे गंभीर समस्याएं खड़ी हो सकती हैं।

“नए स्ट्रक्चर की अभी जरूरत नहीं”

एयर चीफ ने दोहराया कि भारत को अमेरिका या चीन के मॉडल की नकल नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा, “हर देश की अपनी जरूरतें होती हैं। चीन ने अपने हिसाब से थिएटर कमांड बनाए, अमेरिका ने अपने हिसाब से। लेकिन भारत को वही करना चाहिए जो हमारी स्थिति और जरूरत के अनुसार सही हो। सिर्फ दबाव में आकर अभी तुरंत इसे लागू करना ठीक नहीं है।”

उन्होंने यह भी कहा कि अगर थिएटर कमांडर कहीं और बैठकर केवल फोन पर आदेश देंगे, तो यह व्यवस्था कारगर नहीं होगी। युद्ध के दौरान वास्तविक समय (Real-time) पर कॉर्डिनेशन होना जरूरी है।

कल के युद्ध की आज करनी होगी तैयारी

रण संवाद में एयर चीफ ने कहा कि भारत को कल के युद्ध की तैयारी आज करनी होगी। आधुनिक तकनीकें जैसे साइबर युद्ध, अंतरिक्ष निगरानी (Space Surveillance), इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भविष्य की लड़ाई का अहम हिस्सा होंगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत को स्टार्टअप्स और स्वदेशी टेक्नोलॉजी में निवेश करना चाहिए ताकि रक्षा क्षेत्र में इनोवेशंस को बढ़ावा मिले।

भारत में थिएटर कमांड की बहस 2019 के बाद तेज हुई, जब सरकार ने डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स (DMA) बनाया और सीडीएस का पद सृजित किया। वर्तमान में भारतीय थलसेना और वायुसेना की सात-सात कमांड हैं जबकि नौसेना की तीन कमांड हैं। योजना यह है कि इन्हें मिलाकर इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड बनाए जाएं।

चीन की तर्ज पर थिएटर कमांड

चीन ने 2016 में अपनी सात सैन्य क्षेत्रों को पांच थिएटर कमांड में बदला था, जिसमें भारत से लगती सीमा का दायित्व वेस्टर्न थिएटर कमांड को सौंपा गया।

लेकिन भारत में इस स्ट्रक्चर को लागू करने पर कई बार सवाल उठते रहे हैं। खासकर वायुसेना ने चिंता जताई है कि उसकी सीमित स्क्वॉड्रन, एयरबोर्न वार्निंग सिस्टम (AWACS) और मिड-एयर रीफ्यूलर को विभिन्न थिएटरों में बांटने से फ्लेक्सिबिलिटी घट सकती है।

वायुसेना का तर्क है कि उसके पास पूरे देश में 48 घंटे के भीतर रिसोर्सेस को कहीं भी तैनात करने की क्षमता है। अगर इन्हें थिएटरों में बांट दिया गया तो यह रणनीतिक लाभ कम हो जाएगा।

दुनियाभर में हो रहे संघर्षों पर हुई चर्चा

रण संवाद में सिर्फ ऑपरेशन सिंदूर ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय युद्धों जैसे रूस-यूक्रेन संघर्ष और पश्चिम एशिया की लड़ाइयों के अनुभवों पर भी चर्चा हुई।

एयर चीफ मार्शल सिंह ने कहा कि युद्ध की प्रकृति बदल रही है। आज प्लेटफॉर्म महत्वपूर्ण हैं लेकिन उससे भी ज्यादा अहम है उनका रैप-अराउंड इकोसिस्टम जैसे साइबर, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और स्पेस टेक्नोलॉजी। उन्होंने स्वीकार किया कि भारत इन क्षेत्रों में पर्याप्त तेजी से आगे नहीं बढ़ रहा है और जरूरत है कि इन्हें प्राथमिकता दी जाए।

Ran Samwad 2025: सीडीएस चौहान बोले- ऑपरेशन सिंदूर से मिली सीखों को अमल में ला रही सेना, ताकत के बिना शांति असंभव

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CDS General Anil Chauhan in Ran Samwad 2025

Ran Samwad 2025: मध्यप्रदेश के महू में स्थित आर्मी वॉर कॉलेज में आयोजित रण संवाद 2025 के उद्घाटन सत्र में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल अनिल चौहान ने भारतीय सेनाओं की प्राथमिक जिम्मेदारी और बदलती युद्ध रणनीति पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में भारत की प्रतिक्रिया तेज, निर्णायक और संयुक्त होनी चाहिए क्योंकि युद्ध का स्वरूप बदल रहा है और भविष्य के युद्ध केवल जमीन, समुद्र और आसमान तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि साइबर और अंतरिक्ष जैसे डोमेन भी शामिल होंगे।

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उन्होंने कहा कि यह सेमिनार शक्ति प्रदर्शन का मंच नहीं बल्कि उद्देश्य की स्पष्टता और साझा समझ विकसित करने का एक प्रयास है। उनके अनुसार, “हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी वॉर और वॉर फाइटिंग की समझ विकसित करना है। कई बार हम कूटनीति, भू-राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अधिक ध्यान देते हैं और मूल विषय यानी युद्ध की तैयारी को नजरअंदाज कर देते हैं। रण संवाद का मकसद इस सोच को बदलना है।”

उन्होंने कहा कि पिछले दो सालों से उनकी कोशिश रही है कि सेनाओं का ध्यान वॉर और वॉर फाइटिंग पर केंद्रित हो। वॉर फाइटिंग केवल सिद्धांतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह तकनीक, रणनीति और टैक्टिक्स (युद्ध कौशल) के वास्तविक इस्तेमाल से जुड़ा हुआ है।

Ran Samwad 2025: पहली बार भारतीय मिलिट्री कॉन्क्लेव

जनरल चौहान मध्यप्रदेश के महू स्थित आर्मी वॉर कॉलेज में आयोजित ट्राई सर्विसेज रण संवाद 2025 मिलिट्री कॉन्क्लेव को संबोधित कर रहे थे। यह सेमिनार 26–27 अगस्त तक आयोजित हो रहा है और इसे मुख्य रूप से हेडक्वार्टर इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (IDS) और आर्मी वॉर कॉलेज ने मिलकर तैयार किया है।

सीडीएस ने कहा, “जॉइंटमैनशिप अब कोई कल्पना नहीं रही। यह हमारे मौजूदा परिवर्तन की नींव है, जिसमें थिएटराइजेशन, इंटीग्रेटेड लॉजिस्टिक्स और जॉइंट ट्रेनिंग शामिल हैं।” उन्होंने कहा कि यह सेमिनार शक्ति प्रदर्शन का मंच नहीं बल्कि उद्देश्य की स्पष्टता और साझा समझ विकसित करने का एक प्रयास है।

Ran Samwad 2025: तकनीक ने रणनीति और युद्धकला को बदला

रण संवाद का मुख्य विषय है – युद्ध पर तकनीकी प्रगति का प्रभाव। इस दौरान वरिष्ठ सैन्य अफसर हाल में हुए संघर्षों का अध्ययन करेंगे और बताएंगे कि कैसे तकनीक ने रणनीति और युद्धकला को बदला है। चर्चा के प्रमुख बिंदुओं में शामिल हैं – उभरती तकनीकें, आधुनिक युद्ध की चुनौतियां, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल, समुद्री अभियानों में ड्रोन स्वॉर्म, लैंड वॉरफेयर में यूएवी का इस्तेमाल, ट्रेनिंग में टेक्नोलॉजी का इंटीग्रेशन और 2035 तक नई युद्ध संरचनाओं की योजना।

Ran Samwad 2025: इस बार सर्विंग अफसर हैं स्पीकर

जनरल चौहान ने बताया कि पहले ऐसे सेमिनारों में मुख्य वक्ता (स्पीकर) रिटायर्ड अफसर होते थे और दर्शकों में सर्विंग अफसर होते थे। लेकिन उन्होंने इस परंपरा को उलट दिया है। इस बार वर्तमान में सेवा दे रहे अधिकारी ही मुख्य वक्ता हैं, जबकि पूर्व अधिकारी अपने अनुभव साझा करेंगे। उनका मानना है कि नई पीढ़ी तकनीक और आधुनिक युद्ध पद्धतियों के प्रति ज्यादा जागरूक है और उनके विचारों को सुना जाना जजरूरी है।

सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने कहा कि भारत प्राचीन काल से ही विचारों और ज्ञान का केंद्र रहा है। उन्होंने कौटिल्य का उल्लेख करते हुए कहा कि हमारे यहां हमेशा से बौद्धिक परंपरा रही है, लेकिन भारतीय युद्धों के गहन विश्लेषण या रणनीति पर शैक्षणिक विमर्श से जुड़ा साहित्य बहुत कम उपलब्ध है। उन्होंने कहा, “युद्ध के विभिन्न आयामों, नेतृत्व, प्रेरणा, मनोबल और तकनीक पर गंभीर शोध की आवश्यकता है। भारत को सशक्त, सुरक्षित, आत्मनिर्भर और विकसित बनाना है। यह तभी संभव है जब सभी हितधारक मिलकर भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार सेनाओं के निर्माण की प्रक्रिया में सामूहिक रूप से भाग लें।”

सीडीएस चौहान ने कहा कि आज युद्ध और शांति के बीच का फर्क धुंधला हो गया है। आधुनिक युग में संकट, संघर्ष और युद्ध एक-दूसरे से जुड़ गए हैं। उन्होंने कहा कि पहले जीत का पैमाना इलाके पर कब्जा या युद्धबंदियों की संख्या होती थी, लेकिन अब जीत का अर्थ है तेज और प्रभावी कार्रवाई, मानसिक और मनोवैज्ञानिक बढ़त, और तकनीकी श्रेष्ठता।

उनके अनुसार, आज की लड़ाइयां केवल भौतिक नुकसान पर नहीं बल्कि नैरेटिव कंट्रोल पर भी निर्भर करती हैं। यही कारण है कि पारंपरिक हथियार के साथ सूचना युद्ध (information warfare) और साइबर अभियान (cyber ops) उतने ही अहम हो गए हैं।

Ran Samwad 2025: “जो सबसे तेज है वही आगे रहेगा”

सीडीएस चौहान ने कहा कि रण संवाद का उद्देश्य है भविष्य के युद्धों पर चर्चा करना। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में युद्ध का स्वरूप और तकनीकी का इस्तेमाल इतना मुश्किल हो जाएगा कि सेनाओं को हर क्षेत्र में बराबरी से तैयार रहना होगा।
उन्होंने कहा, “हम एक ऐसी दौड़ में हैं जहां जो सबसे तेज है वही आगे रहेगा। लेकिन यह दौड़ केवल रफ्तार की नहीं है, बल्कि नई तकनीकों और नए क्षेत्रों में कूदने की भी है। भारत को इस दौड़ में पीछे नहीं रहना चाहिए।”

सीडीएस चौहान ने आगे कहा, देश हमेशा शांति के पक्ष में खड़ा रहा है। “हम एक शांति-प्रिय राष्ट्र हैं, लेकिन गलती से हमें निष्क्रियतावादी (Pacifist) न समझा जाए। मेरा मानना है कि ताकत के बिना शांति केवल एक कल्पना है। एक लैटिन कहावत है, जिसका अर्थ है- यदि आप शांति चाहते हैं, तो युद्ध की तैयारी करें।”

उन्होंने आगे कहा कि भारत ने हमेशा ‘शस्त्र’ और ‘शास्त्र’ को एक साथ जोड़ा है, जो वास्तव में एक ही तलवार की दो धार हैं। शांति के लिए युद्ध लड़ना ही होगा। उन्होंने अंत में कहा कि भारतीय सेनाओं को सौ प्रतिशत तैयारी रखनी होगी क्योंकि भविष्य के युद्ध बहुआयामी होंगे और उनका स्वरूप पहले से कहीं अधिक जटिल होगा।

Ran Samwad 2025: ऑपरेशन सिंदूर से मिले सबक

सीडीएस ने अपने भाषण में मई 2025 के ऑपरेशन सिंदूर का भी उल्लेख किया। यह ऑपरेशन पहलगाम आतंकी हमले के बाद शुरू किया गया था। इसमें भारतीय सेनाओं ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकी ठिकानों और सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेनाओं ने 9 आतंकी कैंप और 13 पाकिस्तानी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया था। इसमें कम से कम 100 आतंकियों के मारे जाने की पुष्टि हुई थी। भारतीय वायुसेना ने कई हवाई अड्डों और सैन्य ठिकानों को टारगेट किया। सेना ने पाक अधिकृत कश्मीर में कई लॉन्चपैड नष्ट किए। सीडीएस ने कहा कि इस ऑपरेशन से भारतीय सेनाओं ने कई सबक लिए हैं और उनमें से अधिकांश को लागू किया जा चुका है।

मिशन सुदर्शन चक्र का जिक्र

अपने संबोधन में सीडीएस चौहान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस पर किए गए मिशन सुदर्शन चक्र के एलान का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यह भारत के पास अपना आयरन डोम जैसा एयर डिफेंस सिस्टम, जो दुश्मन के हवाई हमलों से न सिर्फ रक्षा करेगा बल्कि जवाबी कार्रवाई भी करेगा।

उन्होंने कहा कि इसके लिए भारी स्तर पर इंटीग्रेशन की जजरूरत होगी। इसमें जमीन, समुद्र, वायु, अंतरिक्ष और साइबर सभी क्षेत्रों के सेंसर और निगरानी तंत्र को जोड़ा जाएगा। रियल टाइम प्रतिक्रिया के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्वांटम कंप्यूटिंग का इस्तेमाल करना होगा।

DRDO का सफल परीक्षण

23 अगस्त को DRDO ने ओडिशा तट पर Integrated Air Defence Weapon System (IADWS) का पहला सफल परीक्षण किया था। इस स्वदेशी सिस्टम में QRSAM, VSHORADS और हाई-पावर लेज़र आधारित Directed Energy Weapon शामिल हैं। परीक्षण के दौरान तीन अलग-अलग टारगेट्स—दो हाई-स्पीड UAV और एक मल्टी-कॉप्टर ड्रोन को एक साथ नष्ट किया गया।

CDS चौहान ने कहा कि यह सिस्टम भविष्य के सुदर्शन चक्र का हिस्सा होगा। DRDO प्रमुख डॉ. समीर वी. कामत ने भी इस सफलता को ऐतिहासिक बताया था।

आकाशतीर सिस्टम की भूमिका

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने अपने स्वदेशी एयर डिफेंस नेटवर्क आकशतीर का इस्तेमाल किया था। इस सिस्टम ने पाकिस्तानी हमलों को रोकने में अहम योगदान दिया। आकसटीर ने तेजी से दुश्मन के मिसाइल और ड्रोन का पता लगाकर उन्हें निष्क्रिय किया। इसे भारतीय वायुसेना के इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS) से जोड़ा गया था।

गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, चार दिन तक चले ऑपरेशन सिंदूर ने दिखाया था कि भारत की नई एयर डिफेंस क्षमता कितनी मजबूत हो चुकी है।

Nyoma Airstrip Eastern Ladakh: पीएम मोदी करेंगे न्योमा एयरबेस का उद्घाटन! बीआरओ ने चीन सीमा पर मात्र सात महीने में तैयार किया गेम चेंजर रनवे

Nyoma Airstrip Eastern Ladakh

Nyoma Airstrip Eastern Ladakh: पूर्वी लद्दाख के न्योमा इलाके में बन रहा मुद न्योमा एयरबेस भारत की सैन्य ताकत को नई ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए तैयार है। सूत्रों के मुताबिक इस अत्याधुनिक एडवांस लैंडिंग ग्राउंड (ALG) का उद्घाटन अक्टूबर 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कर सकते हैं। वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) से महज 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह एयरबेस समुद्र तल से 13,700 फीट की ऊंचाई पर है। यह भारत का सबसे ऊंचा एयरबेस और दुनिया में पांचवां सबसे ऊंचा हवाई अड्डा होगा।

Nyoma Airstrip in Eastern Ladakh: एलएसी पर चीन को टक्कर देने की तैयारी, अक्टूबर तक न्योमा एयरस्ट्रिप पर लैंड कर सकेंगे मिग-29 और सुखोई-30 फाइटर जेट

Nyoma Airstrip Eastern Ladakh: केवल सात महीने में बनकर हुआ तैयार

न्योमा एयरबेस का निर्माण बॉर्डर रोड्स ऑर्गेनाइजेशन (BRO) ने किया है, जिसने कठिन भौगोलिक और मौसमी चुनौतियों के बावजूद इस परियोजना को समय से पहले पूरा किया। सूत्रों ने बताया कि इसके रनवे का काम 12 सितंबर 2023 को शुरू हुआ था और 12 अक्टूबर 2024 को इसे पूरी तरह तैयार कर लिया गया। चूंकि लद्दाख छह महीने तक पूरी तरह से बर्फ से ढका रहता है और रास्ते पूरी तरह से बंद हो जाते हैं, तो ऐसे में यह रनवे प्रभावी रूप से केवल सात महीने में बनकर तैयार हुआ है। उन्होंने बताया कि यहां सितंबर-अक्टूबर तक ही काम किया जा सकता है। इस प्रोजेक्ट को मिशन मोड में पूरा किया गया। उन्होंने कहा, “हमने दिन-रात काम किया और कठिन परिस्थितियों में भी क्वॉलिटी से कोई समझौता नहीं किया।”

सूत्रों ने बताया कि भारतीय वायुसेना के तय मानकों के मुताबिक एयर स्ट्रिप बनाई गई है और थोड़ा जरूरी काम अभी बाकी है। वहीं अक्तूबर तक न्योमा एयर बेस पर फुल इमर्जेंसी लैंडिंग के लिए सभी तैयारियां और इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने का काम पूरा हो जाएगा। यह रन 2.7 किलोमीटर लंबा है और पूरी तरह से कंक्रीट से बना है।

Nyoma Airstrip Eastern Ladakh: पीएम मोदी करेंगे उद्घाटन!

सूत्रों के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस साल अक्तूबर के दूसरे हफ्ते में पूर्वी लद्दाख के रणनीतिक न्योमा एयरबेस का उद्घाटन कर सकते हैं। यह एयरबेस समुद्र तल से 13,700 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। न्योमा एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउंड का इस्तेमाल 2020 में चीन और भारत के बीच लद्दाख में हुए सीमा विवाद के दौरान बड़े पैमाने पर किया गया था। उस समय इस एयरस्ट्रिप ने भारतीय सेना के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यहां से सैनिकों और सैन्य साजोसामान तेसी से एलएसी तक पहुंचाया गया था। लेह तक हैवी लिफ्ट ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट के जरिए जवानों को लाया गया और फिर न्योमा से उन्हें ऊंचाई वाले मोर्चों तक भेजा गया। इसके लिए भारतीय वायुसेना ने सी-130 जे सुपर हरक्यूलिस और चिनूक हेलिकॉप्टर का इस्तेमाल किया था।

Nyoma Airstrip Eastern Ladakh: फाइटर जेट्स भर सकेंगे उड़ान

यह एयरबेस रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यह लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल यानी वास्तविक नियंत्रण रेखा से लगभग 25-30 किमी की दूरी पर है। और डेमचोक जैसे संवेदनशील इलाके के करीब है। डेमचोक और डेपसांग जैसे इलाके भारत और चीन के बीच तनाव की बड़ी वजह रहे हैं। 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद भारत ने एलएसी के पास अपनी सैन्य तैयारियों को तेज कर दिया है। न्योमा एयरबेस के चालू होने से भारतीय वायुसेना मिग-29 और सुखोई-30 एमकेआई जैसे फाइटर जेट्स को यहां से ऑपरेट कर सकेगी। इसके अलावा, सी-17 ग्लोबमास्टर और सी-130जे जैसे ट्रांसपोर्ट विमान भी यहां से सैनिकों, हथियारों और राशन को जल्दी पहुंचा सकेंगे।

भारतीय सेना की सप्लाई चेन में आएगा बड़ा बदलाव

न्योमा एयरबेस लद्दाख में भारत का चौथा वायुसेना अड्डा होगा। इससे पहले लेह, कारगिल और परतापुर (थॉईस) में दो फाइटर एयरफील्ड मौजूद हैं। दौलत बेग ओल्डी (DBO) में एक मिट्टी का रनवे है, जो विशेष अभियानों के लिए उपयोग होता है। फुकचे और चुशूल में भी छोटे रनवे हैं, लेकिन युद्ध जैसे हालात में इनका उपयोग सीमित है। न्योमा एयरबेस के बन जाने के बाद यह लद्दाख के डाउनहिल फ्लैट प्लेन्स (नीचे के समतल क्षेत्र) में स्थित दक्षिणी क्षेत्र का पहला वायुसेना अड्डा होगा। वहीं, न्योमा एयरबेस की खासियत यह है कि यह अपेक्षाकृत कम ऊंचाई पर स्थित है, जिससे फिक्स्ड-विंग एयरक्राफ्ट के लिए यह अधिक उपयुक्त है।

न्योमा एयरबेस के एक्टिव हो जाने के बाद भारतीय सेना की सप्लाई चेन में बड़ा बदलाव आएगा। अभी तक लेह से न्योमा तक सड़क मार्ग से लॉजिस्टिक सप्लाई पहुंचाने में छह घंटे लगते हैं, लेकिन अब दिल्ली या चंडीगढ़ से विमान सीधे यहां तक डेढ़ से दो घंटे में पहुंच सकेंगे। इसका फायदा सैनिकों, गोला-बारूद, हथियारों और मेडिकल सपोर्ट को तेजी से आगे तक पहुंचाने में मिलेगा।

माइनस 30 डिग्री तक गिर जाता है तापमान

बीआरओ के प्रोजेक्ट हिमांक के चीफ इंजीनियर ब्रिगेडियर विशाल श्रीवाास्तव ने इस उपलब्धि पर गर्व जताते हुए कहा, “हमारी टीम ने कठिन परिस्थितियों में असाधारण काम किया है। न्योमा का यह रनवे न केवल सैन्य दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह स्थानीय लोगों के लिए बेहतर कनेक्टिविटी प्रदान करेगा और आपात स्थिति में राहत सामग्री को जल्दी पहुंचाने में मदद करेगा। न्योमा के पास मुद गांव के नाम पर इस एयरबेस का नाम रखा गया है, जो इस क्षेत्र की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को भी दर्शाता है। उन्होंने बताया कि इस क्षेत्र में सर्दियों में तापमान माइनस 30 डिग्री तक गिर जाता है, और छह महीने तक सड़कें बर्फ से ढक जाती हैं। इसके बावजूद, बीआरओ ने आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करके इस एयरबेस को समय पर पूरा किया।

Nyoma Airstrip Eastern Ladakh: एयरफोर्स कर चुकी है टेस्टिंग

वहीं पिछले साल वायुसेना की एक विशेष टीम ने न्योमा रनवे का निरीक्षण भी किया था। टीम में पायलटों के साथ एयर ट्रैफिक कंट्रोलर और तकनीकी स्टाफ शामिल थे। हर पहलू की जांच के बाद रनवे को ऑपरेशनल घोषित किया गया। इसके बाद सी-130 जे सुपर हरक्यूलिस ने न्योमा ALG पर टेस्ट फ्लाइट की थी। इस ट्रायल में विमान ने रनवे के ऊपर से लो ओवरशूट किया, यानी लैंडिंग गियर खोलकर बिना टच किए रनवे के बिल्कुल नजदीक से उड़ान भरी। यह ट्रायल को एयर ट्रैफिक कंट्रोल की गाइडेंस में सफलतापूर्वक पूरा किया गया था।

बीआरओ के बजट में भारी इजाफा

2020 के गलवान संघर्ष के बाद भारत ने अपनी सीमा पर बुनियादी ढांचे के विकास को प्राथमिकता दी है। सरकार ने बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन के बजट में भी भारी इजाफा किया है। जहां 12-15 साल पहले इसका वार्षिक बजट केवल 4,000 करोड़ रुपये था, वहीं अब यह बढ़कर 18,700 करोड़ रुपये हो गया है। इस बढ़े हुए बजट का सीधा असर सीमा क्षेत्रों में नई सड़कों और एयरफील्ड्स के निर्माण में दिखाई दे रहा है। इस बढ़े हुए बजट ने सड़कों, पुलों और हवाई अड्डों के निर्माण में तेजी लाई है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हमेशा कहा है कि सरकार सीमा पर इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के लिए हर संभव मदद देगी। इसका परिणाम यह है कि भारत ने एलएसी के पास सड़कों का जाल बिछा दिया है, जिसमें हानले-चुमार रोड और सासोमा-डीबीओ रोड जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट शामिल हैं।

चुशूल-डेमचोक-फुकचे-डम रोड भी तैयार

हानले-चुमार रोड, जो 16,500 फीट की ऊंचाई पर सल्सा पास से होकर गुजरती है, अब हानले से चुमार तक की दूरी को छह घंटे से घटाकर केवल एक घंटे 45 मिनट तक रह गई है। इसी तरह, चुशूल-डेमचोक-फुकचे-डम रोड (CDFD) एलएसी के समानांतर चलती है और डेमचोक जैसे संवेदनशील क्षेत्रों तक तेजी से पहुंच मिलती है। सूत्रों ने बताया कि यह सड़क 14,000 से 15,000 फीट की ऊंचाई पर बनाई गई है, जहां तापमान माइनस 35 डिग्री तक गिर जाता है। उन्होंने कहा, “हमने कई चुनौतियों का सामना किया, लेकिन इस सड़क को समय पर पूरा करना हमारी प्राथमिकता थी।”

गेम-चेंजर साबित होगा न्योमा एयरबेस

न्योमा एयरबेस का निर्माण भारत की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत वह LAC पर चीन की सैन्य तैनाती का मुकाबला करने के लिए तैयार है। चीन ने अपनी तरफ 3,488 किलोमीटर लंबी सीमा पर कई अग्रिम हवाई अड्डे विकसित किए हैं। अप्रैल 2020 में चीनी सेना की भारी तैनाती को देखते हुए भारत ने भी अपनी तैयारियों को तेज किया। न्योमा एयरबेस के चालू होने से भारत को तेजी से सैन्य उपकरण और सैनिकों को तैनात करने की क्षमता मिलेगी, जो युद्ध की स्थिति में गेम-चेंजर साबित हो सकता है।

AMCA Engine Deal: पहली बार भारत को मिलेगा फाइटर जेट इंजन का मालिकाना हक, फ्रांस के साथ समझौते से बनेगा डुअल इंजन इकोसिस्टम

India-France AMCA Engine Deal indigenous fighter jet

AMCA Engine Deal: एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी AMCA के इंजन को लेकर भारत और फ्रांस के बीच हुई नई रक्षा साझेदारी को देश की डिफेंस हिस्ट्री में सबसे बड़ा मोड़ माना जा रहा है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हाल ही में घोषणा की कि भारत का पहला पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान अब अपने इंजन के साथ पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक पर खड़ा होगा। इस प्रोजेक्ट के तहत भारत और फ्रांस की राफेल का इंजन बनाने वाली कंपनी सफरान मिलकर नया स्वदेशी इंजन बनाएंगे। लेकिन इस बार सबसे बड़ी खासियत यह है कि इस इंजन का मालिकाना हक यानी बौद्धिक संपदा अधिकार (IP Ownership) भारत के पास होगी।

AMCA jet engine: भारत-फ्रांस मिलकर बनाएंगे पांचवी पीढ़ी का स्वदेशी इंजन, राजनाथ सिंह किया बड़ा एलान, राफेल बनाने वाली कंपनी सफरान के साथ होगी साझेदारी

AMCA Engine Deal: क्या कहा पीएम मोदी और रक्षा मंत्री ने

हाल ही में 15 अगस्त को लाल किला के प्राचीर से प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था, “आज मैं युवा वैज्ञानिकों, प्रतिभाशाली युवाओं, इंजीनियरों, पेशेवरों और सरकार के सभी विभागों से आग्रह करता हूं कि हमारे पास अपने स्वयं के मेड इन इंडिया लड़ाकू विमानों के लिए जेट इंजन होने चाहिए।

वहीं उसके बाद 22 अगस्त को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एलान किया, “आज हम पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान बनाने की दिशा में भी आगे कदम बढ़ा चुके हैं। हम एयरक्राफ्ट का इंजन भी भारत में ही बनाने की तरफ बढ़ चुके हैं। हम लोग फ्रेंच कंपनी सफरान के साथ इंजन मेकिंग का काम भारत में शुरू करने जा रहे हैं।”

AMCA Engine Deal: 100 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर

अब तक भारत जिन लड़ाकू विमानों का निर्माण कर रहा था, उनके लिए विदेशी इंजन पर निर्भर रहना पड़ता था। तेजस विमान में इस्तेमाल होने वाले इंजन अमेरिका की जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी से खरीदे जाते हैं। वहीं रूस से मिले मिग और सुखोई के इंजन भी वर्षों से भारतीय वायुसेना की रीढ़ बने हुए हैं। लेकिन इस बार भारत सिर्फ इंजन (AMCA Engine Deal) बनाएगा ही नहीं बल्कि उसका मालिक भी होगा। यह पहली बार होगा जब भारत के पास दुनिया के सबसे एडवांस्ड जेट इंजनों में से एक का IP होगा। यह ऐसा अधिकार है जो आज तक भारत को किसी भी रक्षा सौदे में नहीं मिला है। सफरान के साथ इंजन डील में 100 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, भारत का IP राइट्स पर पूरा मालिकाना हक़, और AMCA के लिए हाई-थ्रस्ट इंजन का डेवलपमेंट शामिल है।

इस साझेदारी में सफरान और भारत की हिंदुस्तान एयरनॉटिक्स लिमिटेड मुख्य भूमिका निभाएगी। इसके साथ ही डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन का गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट (GTRE) भी इस प्रोजेक्ट में शामिल होगा।

AMCA Engine Deal: इंजन तकनीक में भारत की सबसे बड़ी छलांग

24 टन कैटेगरी वाले एएमसीए प्रोजेक्ट (AMCA Engine Deal) को भारत के सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स में गिना जा रहा है। यह एक स्टील्थ यानी अदृश्य क्षमता वाला लड़ाकू विमान होगा, जिसमें दो इंजन होंगे। स्टील्थ होने की वजह से इसे रडार पर पकड़ना बेहद मुश्किल होगा। लेकिन ऐसे विमानों की असली ताकत उनके इंजन में छुपी होती है। अब तक भारत अपनी लड़ाकू विमानों के लिए खुद का इंजन नहीं बना पाया था। कई बार कोशिशें हुईं, डीआरडीओ ने कावेरी भी बनाया, लेकिन तकनीकी बाधाओं, खासकर थ्रस्ट-टू-वेट रेश्यो जैसी दिक्कतों के चलते इंजन डेवलप नहीं हो पाया।

यही वजह है कि सफरान के साथ हुआ यह करार केवल एक तकनीकी सहयोग नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक स्थिति को भी मजबूत करेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि जब भारत को इंजन के डिजाइन, निर्माण और उत्पादन की पूरी तकनीक मिल जाएगी और उसके सारे अधिकार भारत के पास होंगे, तो यह आत्मनिर्भर भारत अभियान के सबसे बड़े मील के पत्थरों में गिना जाएगा।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह डील भारत के “मेक इन इंडिया” पहल को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगी। इसके लिए भारत में एक पूरी इंजन बनाने की व्यवस्था तैयार की जाएगी, जिसमें निजी कंपनियों को भी मौका मिलेगा। इससे नौकरियों का सृजन होगा और देश की अर्थव्यवस्था को भी फायदा पहुंचेगा।”

वहीं इसका सीधा असर भारत के डिफेंस एक्सपोर्ट्स पर पड़ेगा क्योंकि भविष्य में भारत इस इंजन को अन्य देशों को बेच भी सकता है, और यह सिर्फ अपने विमानों में इस्तेमाल करने तक सीमित नहीं रहेगा।

AMCA Engine Deal: पहली बार डुअल इंजन इकोसिस्टम

स्वदेशी लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट तेजस (AMCA Engine Deal) के लिए अभी तक भारत सिर्फ अमेरिकी जनरल इलेक्ट्रिक के इंजनों पर निर्भर था। तेजस एमके-2 और नौसेना के ट्विन-इंजन डेक-बेस्ड (TEDBF) नेवी फाइटर के लिए जीई का F414 इंजन इस्तेमाल किया जाना है। लेकिन अब सफरान के साथ मिलकर एएमसीए के लिए नया इंजन तैयार किया जाएगा। इसका मतलब है कि भारत के पास पहली बार एक साथ दो इंजन इकोसिस्टम होंगे।

सफरान पहले से ही राफेल इंजन (M88) और हेलिकॉप्टर इंजनों में भारत का पार्टनर है। इस डील के बाद भारत के दो अलग-अलग इंजन इकोसिस्टम तेजस/एएमसीए (सफरान वाला) और GE F414 (तेजस एमके2) एकसाथ तैयार हो रहे हैं। यह डुअल इंजन इकोसिस्टम भारत को दुनिया के चुनिंदा देशों की श्रेणी में खड़ा करेगा जहां एक साथ पश्चिमी और स्वदेशी इंजन प्रोग्राम समानांतर रूप से आगे बढ़ेंगे।

AMCA Engine Deal: सफरान और जीई में कॉम्पिटिशन?

जीई के साथ तेजस एमके-2 के लिए F414 इंजन देने के लेकर बातचीत चल रही है। जिन्हें एचएएल और जीई दोनों कंपनियां मिल कर भारत में बनाएंगी। हालांकि हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स और जीई ने भारत में 98 किलोन्यूटन थ्रस्ट कैटेगरी में जीई-एफ414 इंजन के को-प्रोडक्शन के लिए अभी तक अंतिम सौदा नहीं हुआ है, जिसमें लगभग 1.5 बिलियन डॉलर में 80 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर होगा।

खास बात यह होगी कि सफरान (AMCA Engine Deal) का 120 किलोन्यूटन (kN) थ्रस्ट वाला इंजन होगा जबकि जीई का F414 इंजन 98 किलोन्यूटन थ्रस्ट का होगा। सफरान का इंजन AMCA के दूसरे चरण (Mk-2) के लिए डिजाइन किया जाएगा। इस इंजन का विकास 10 साल में पूरा होने की उम्मीद है, और यह पूरी तरह से नई डिज़ाइन पर आधारित होगा, जो राफेल के M88 इंजन से अलग होगा। यह इंजन AMCA को सुपरक्रूज और बेहतर थ्रस्ट-टू-वेट रेश्यो देगा।

जीई का F414 इंजन तेजस मार्क-2 और AMCA के पहले चरण (Mk-1) के लिए चुना गया है। यह इंजन एफ/ए-18 सुपर हॉर्नेट में इस्तेमाल होता है। जीई ने भारत को 80 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की सहमति दी है, जिसमें सिंगल क्रिस्टल ब्लेड और सेरामिक मैट्रिक्स कॉम्पोनेंट्स जैसे महत्वपूर्ण तकनीकी पहलू शामिल हैं। हालांकि, इस डील में कुछ संवेदनशील तकनीकों तक पहुंच नहीं है, जिसमें अमेरिकी निर्यात नियमों (ITAR) आड़े आ रहे हैं।

मौजूदा समय-सीमा के अनुसार, अपेक्षित थ्रस्ट-टू-वेट रेश्यो, एडवांस सेंसर फ्यूजन और इंटरनल वेपन बे और “सर्पेंट-टाइन एयर-इन्टेक” जैसी स्टील्थ सुविधाओं के साथ AMCA 2035 तक ही प्रोडक्शन के लिए तैयार हो पाएगा।

बता दें कि भारतीय वायुसेना ने एएमसीए के सात स्क्वाड्रन (126 जेट) शामिल करने की योजना बनाई है, जिनमें से पहले दो स्क्वाड्रन अमेरिकी जीई-एफ414 इंजन से ऑपरेट होंगे और अगले पांच स्क्वाड्रन 120 किलोन्यूटन इंजन से ऑपरेट होंगे।

सिर्फ डिफेंस नहीं, स्पेस और सिविल एविएशन पर भी असर

सफरान (AMCA Engine Deal) सिर्फ लड़ाकू विमान इंजन बनाने वाली कंपनी नहीं है। वह स्पेस प्रोप्ल और सिविल एविएशन सेक्टर में भी अग्रणी है। कंपनी पहले से ही इसरो के साथ कई प्रोजेक्ट्स में सहयोग कर चुकी है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि एएमसीए इंजन प्रोजेक्ट का असर भविष्य में भारत के स्पेस प्रोग्राम और डोमेस्टिक पैसेंजर्स एयरक्राफ्ट के विकास पर भी पड़ेगा।

इसका मतलब है कि भारत सिर्फ लड़ाकू विमान इंजन बनाने तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि आने वाले सालों में सिविल एयरक्राफ्ट और स्पेस एयरक्राफ्ट के लिए भी एडवांस इंजन डेवलप कर सकेगा।

फ्रांस क्यों हुआ तैयार?

अब सवाल उठता है कि फ्रांस ने इतनी संवेदनशील तकनीक (AMCA Engine Deal) भारत के साथ साझा करने का फैसला क्यों लिया। रक्षा मामलों के जानकारों का कहना है, फ्रांस भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन का सबसे बड़ा संतुलनकारी साझेदार मानता है। चीन की बढ़ती ताकत को रोकने के लिए पेरिस और नई दिल्ली के बीच रणनीतिक सहयोग लगातार बढ़ रहा है। यही वजह है कि पेरिस ने भारत को सिर्फ ग्राहक मानने के बजाय एक असली साझेदार का दर्जा दिया है। पहले राफेल डील और अब AMCA इंजन डीलके जरिए फ्रांस, भारत को इंडो-पैसिफिक में चीन को बैलेंस करने वाले देश के रूप में देख रहा है।

प्रधानमंत्री कार्यालय की सीधी नजर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने पिछले एक दशक में रक्षा उत्पादन पर लगातार ध्यान दिया है। तेजस विमान की भारी संख्या में खरीद, प्रचंड हेलिकॉप्टरों का बेड़ा, और ब्रह्मोस जैसी मिसाइलों के निर्यात ने भारत को रक्षा उत्पादन में नया आत्मविश्वास दिया है। अब एएमसीए इंजन प्रोजेक्ट में मिली यह सफलता प्रधानमंत्री कार्यालय की सीधी निगरानी में आगे बढ़ रही है। यही कारण है कि पिछले महीने प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव पीके मिश्रा ने भी एचएएल की सुविधाओं का दौरा किया और तेजस प्रोजेक्ट की स्थिति का जायजा लिया।

584 अरब का प्रोजेक्ट, खुलेंगी निर्यात की संभावनाएं

सूत्रों का कहना है कि इस प्रोजेक्ट की लागत करीब सात बिलियन डॉलर यानी 584 अरब रुपये के आसपास मानी जा रही है। इस लागत में इंजन का डिजाइन, परीक्षण, उत्पादन और पूरी सप्लाई चेन शामिल होगी। लेकिन इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि एक बार तकनीक भारत के पास आने के बाद देश स्वतंत्र रूप से इसका इस्तेमाल कर सकेगा। भारत चाहे तो भविष्य में इस इंजन को निर्यात भी कर सकेगा। अभी तक भारत हथियार और मिसाइलें निर्यात कर रहा था, लेकिन इंजन जैसे हाई-टेक सिस्टम का निर्यात एक नए युग की शुरुआत होगी।

भारत ने पिछले एक दशक में रक्षा निर्यात के क्षेत्र में जबरदस्त प्रगति की है। 2013-14 में जहां यह आंकड़ा सिर्फ 686 करोड़ रुपये था, वहीं 2024-25 में यह 23,000 करोड़ रुपये से भी ऊपर पहुंच गया। सरकार ने 2029 तक इसे 50,000 करोड़ तक ले जाने का लक्ष्य रखा है।

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Agni-5 IRBM: भारत ने 20 अगस्त 2025 को ओडिशा के चांदीपुर स्थित इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज से अग्नि-5 का सफल परीक्षण किया गया। इस परीक्षण में मिसाइल ने सभी ऑपरेशनल और टेक्निकल स्टैंडर्ड्स को सफलतापूर्वक पूरा किया। इस मिसाइल को डीआरडीओ ने बनाया है। यह मिसाइल जमीन से जमीन पर मार करने वाली बैलिस्टिक मिसाइल है जिसकी रेंज 5000 किलोमीटर से अधिक है।

यह परीक्षण खास इसलिए है क्योंकि यह पिछले साल मार्च 2024 में मिशन दिव्यास्त्र के तहत मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टार्गेटेबल री-एंट्री व्हीकल (MIRV) टेक्नोलॉजी के साथ अग्नि-5 के पहले सफल परीक्षण के बाद हुआ। इस तकनीक ने भारत को उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल कर दिया, जिनके पास एक मिसाइल से कई लक्ष्यों को निशाना बनाने की क्षमता है। लेकिन MIRV तकनीक क्या है? सरकार अब अग्नि-5 को इंटरमीडिएट रेंज बैलिस्टिक मिसाइल (IRBM) क्यों कह रही है, जबकि पहले इसे इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) कहा जाता था? आइए, इसे सरल भाषा में समझते हैं।

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Agni-5 IRBM: क्या कहा सरकार ने अपने बयान में

भारत सरकार ने अब आधिकारिक तौर पर अग्नि-5 मिसाइल (Agni-5 IRBM) को IRBM की श्रेणी में रखा है। 20 अगस्त को सरकार की तरफ से जारी हुई प्रेस रिलीज में भी अग्नि-5 को IRBM कहा गया है। इस बदलाव के कई रणनीतिक मायने हैं। सबसे बड़ा कारण यह हो सकता है कि भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुद को डिफेंसिव राष्ट्र के रूप में दिखाना चाहता है और ICBM का टैग सीधे परमाणु महाशक्तियों की लीग में रख देता है।

रक्षा मंत्रालय ने अपने बयान में कहा कि इस परीक्षण ने मिसाइल के सभी ऑपरेशनल और टेक्निकल मापदंडों को सफलतापूर्वक मान्य किया। यह परीक्षण स्ट्रैटेजिक फोर्सेस कमांड (SFC) की निगरानी में हुआ, जो भारत के एटोमिक वेपंस डिलीवरी सिस्टम का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह मिसाइल इतनी तेज है कि लॉन्च होने के बाद इसे रोकना लगभग नामुमकिन है। एक बार टारगेट सेट कर देने के बाद यह अपने लक्ष्य को नष्ट किए बिना नहीं रुकती।

Agni-5 IRBM: कैनिस्टर-लॉन्च सिस्टम से लैस

अग्नि-5 मिसाइल (Agni-5 IRBM) को 1983 में शुरू हुए इंटीग्रेटेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम (IGMDP) के तहत विकसित किया गया है। यह मिसाइल 50 टन वजनी और 17 मीटर लंबी है, जिसकी मोटाई करीब 2 मीटर है। यह 1,500 किलोग्राम तक के हथियार ले जा सकती है और जमीन से जमीन पर मार करने में सक्षम है। इसकी रफ्तार ध्वनि की रफ्तार से 24 गुना तेज है, यानी यह मैक 24 की रफ्तार से लक्ष्य की ओर बढ़ सकती है। इसकी खासियत यह है कि इसे सड़क पर आसानी से ले जाया जा सकता है, क्योंकि यह कैनिस्टर-लॉन्च सिस्टम से लैस है। इसका मतलब है कि मिसाइल को एक विशेष कंटेनर में रखकर कहीं भी ले जाया जा सकता है, जिससे इसे तैनात करना और छिपाना आसान हो जाता है।

Agni-5 IRBM: IRBM वर्सेस ICBM

अग्नि-5 (Agni-5 IRBM) का पहला परीक्षण 2012 में हुआ था, और तब से इसकी कई बार टेस्टिंग हो चुकी है। पहले इसे ICBM कहा जाता था, क्योंकि इसकी रेंज 5,000 किमी से अधिक थी, इसकी जद में चीन के ज्यादातर शहर खासतौर पर उत्तरी और पूर्वी हिस्से आते हैं। लेकिन अब सरकार इसे IRBM के रूप में पेश कर रही है। IRBM यानी इंटरमीडिएट रेंज बैलिस्टिक मिसाइल की रेंज 3,000 से 5,500 किलोमीटर तक होती है, जबकि ICBM यानी इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल की रेंज 5,500 किलोमीटर से अधिक होती है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि वजन कम करने के बाद अग्नि-5 की वास्तविक रेंज 7,000 किमी तक हो सकती है। 2022 में DRDO ने मिसाइल का वजन 20 फीसदी तक कम करने का दावा किया था, जिससे इसकी रेंज बढ़कर 7,000 किमी से अधिक हो सकती है। फिर भी, सरकार इसे आधिकारिक तौर पर IRBM ही कह रही है।

Agni-5 IRBM: अग्नि-5 में MIRV टेक्नोलॉजी

अग्नि-5 (Agni-5 IRBM) में MIRV टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गयाा है। MIRV का मतलब है मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टार्गेटेबल री-एंट्री व्हीकल। यह एक ऐसी टेक्नोलॉजी है, जिसमें एक मिसाइल कई परमाणु हथियार ले जा सकती है, और प्रत्येक हथियार को अलग-अलग लक्ष्य पर निशाना साधने के लिए प्रोग्राम किया जा सकता है। ये लक्ष्य सैकड़ों किलोमीटर दूर हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, एक अग्नि-5 मिसाइल तीन से चार परमाणु हथियार ले जा सकती है, और प्रत्येक को अलग-अलग रफ्तार और दिशा में छोड़ा जा सकता है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि यह मिसाइल 10-12 हथियार भी ले जा सकती है। इस तकनीक की खासियत यह है कि यह दुश्मन के मिसाइल डिफेंस सिस्टम्स को भी चकमा दे सकती है। MIRV-लैस मिसाइलें डिकॉय यानी नकली हथियार भी ले जा सकती हैं, जो दुश्मन के रडार को भ्रमित करते हैं, जिससे असली हथियार को रोका जाना मुश्किल हो जाता है।

Agni-5 IRBM: क्यों जरूरी है MIRV क्षमता

MIRV तकनीक को विकसित करना आसान नहीं है। इसके लिए हथियारों का छोटा साइज (मिनिएचराइजेशन), हल्के वजन के री-एंट्री व्हीकल, और सटीक नेविगेशन सिस्टम की जरूरत होती है। अग्नि-5 में स्वदेशी एवियोनिक्स सिस्टम और ज्यादा सटीकता वाले सेंसर पैकेज लगाए गए हैं, ताकि हथियार अपने टारगेट पर हिट करे। इस तकनीक का पहला सफल परीक्षण 11 मार्च 2024 को मिशन दिव्यास्त्र के तहत हुआ, जिसे DRDO ने ओडिशा के डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम द्वीप से लॉन्च किया था। इस परीक्षण की निगरानी विभिन्न टेलीमेट्री और रडार स्टेशनों ने की, और मिसाइल ने सभी निर्धारित मापदंडों को पूरा किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने DRDO के वैज्ञानिकों की इस उपलब्धि की सराहना की।

यह तकनीक भारत की रक्षा रणनीति में क्यों महत्वपूर्ण है? भारत की परमाणु नीति ‘नो-फर्स्ट-यूज’ (पहले हमला न करना) और क्रेडिबल मिनिमम डिटरेंस पर आधारित है। इसका मतलब है कि भारत पहले परमाणु हमला नहीं करेगा, लेकिन अगर कोई देश भारत पर परमाणु हमला करता है, तो भारत इसका करारा जवाब देगा। MIRV तकनीक इस जवाबी क्षमता को बढ़ाती है, क्योंकि एक मिसाइल कई लक्ष्यों को नष्ट कर सकती है। चीन के पास पहले से ही हांगकी (HQ-19) जैसा मिसाइल डिफेंस सिस्टम है, MIRV तकनीक भारत को सामरिक संतुलन बनाए रखने में मदद करती है। चीन ने अपनी कुछ DF-5 मिसाइलों में MIRV तकनीक लगाई है।

अग्नि-5 (Agni-5 IRBM) को खासतौर पर चीन से मिलने वाली चुनौतियों को ध्यान में रखकर बनाया गया है। भारत की दूसरी मिसाइलें, जैसे अग्नि-1, अग्नि-2, और अग्नि-3, मुख्य रूप से पाकिस्तान से मिल रहे खतरे को देखते हुए बनाई गई थीं। लेकिन अग्नि-5 की रेंज इसे पूरे एशिया, विशेष रूप से चीन के उत्तरी और पूर्वी हिस्सों, और यूरोप के कुछ हिस्सों तक पहुंचने में सक्षम बनाती है। मिसाइल के पहले चरण को अग्नि-3 से लिया गया है, जबकि दूसरे और तीसरे चरण को हल्का करने के लिए कंपोजिट सामग्री का उपयोग किया गया है। MIRV से यह मुश्किल हो जाता है क्योंकि दुश्मन को पता नहीं चलता कि असली वारहेड कौन सा है और किस दिशा में जाएगा। कई डमी वॉरहेड्स के साथ असली वारहेड्स को भी छोड़ा जाता है। इससे दुश्मन का सुरक्षा कवच टूट सकता है।

जारी किया था नोटम

20 अगस्त 2025 के परीक्षण के लिए पहले ही बंगाल की खाड़ी में नोटम (नोटिस टू एयरमैन) भी जारी किया गया था, जो अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत विमानन और समुद्री यातायात को सूचित करता है। इस परीक्षण की निगरानी भारतीय नौसेना के जहाजों और DRDO के वैज्ञानिकों ने की, जो दक्षिणी हिंद महासागर में कई जगहों पर तैनात थे।

पांच देशों के पास है MIRV तकनीक

MIRV तकनीक की शुरुआत 1960 के दशक में अमेरिका ने की थी, जब उसने 1970 में मिनटमैन-III मिसाइल और 1971 में पॉसाइडन मिसाइल में इस तकनीक का उपयोग किया। आज अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, और यूके के पास यह तकनीक है। पाकिस्तान ने भी 2017 में अपनी अबाबील मिसाइल में MIRV तकनीक का परीक्षण किया था, हालांकि इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं।

अग्नि-5 के नेविगेशन और गाइडेंस सिस्टम में रिंग लेजर जायरोस्कोप और एक्सेलेरोमीटर का उपयोग किया गया है। मिसाइल का निर्माण कार्बन कंपोजिट सामग्री से किया गया है, जो इसे हल्का बनाता है और वायुमंडल में पुनः प्रवेश के दौरान उच्च तापमान को सहन करने में सक्षम बनाता है। सूत्र बताते हैं कि अग्नि-5 में एंटी-सैटेलाइट (ASAT) क्षमता से भी लैस है। 2019 में मिशन शक्ति के तहत भारत ने 300 किमी की ऊंचाई पर एक उपग्रह को नष्ट करके अपनी ASAT क्षमता दिखाई थी। विशेषज्ञों का कहना है कि अग्नि-5 को 800 किमी की ऊंचाई तक पहुंचने में सक्षम बनाया जा सकता है, जिससे यह उपग्रहों को नष्ट करने में भी उपयोगी हो सकता है।

अग्नि-5 (Agni-5 IRBM) भारत की परमाणु त्रिकोणीय क्षमता का भी हिस्सा है, जिसमें जमीन, हवा, और समुद्र से परमाणु हथियार दागने की क्षमता शामिल है। भारत ने 2018 में INS अरिहंत पनडुब्बी के पहले डिटरेंस गश्त के साथ इस ट्राइंगल को पूरा किया था। यह मिसाइल भारत की “सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी” को भी मजबूत करती है, यानी अगर भारत पर परमाणु हमला होता है, तो जवाबी हमला और भी ज्यादा असरदार हो सकता है।

General Level Mechanism: चीन के विदेश मंत्री वांग यी और NSA अजीत डोवाल ने क्यों बनाया यह नया मैकेनिज्म, SHMC और WMCC से कैसे अलग, पढ़ें एक्सप्लेनर

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Member of the Political Bureau of the CPC Central Committee Wang Yi and India’s National Security Adviser Ajit Doval held the 24th Round of Talks Between the Special Representatives of China and India on the Boundary Question in New Delhi. (Photo- MEA)

General Level Mechanism: भारत और चीन के बीच सीमा विवाद को सुलझाने के लिए बातचीत का सिलसिला पिछले कई सालों से जारी है। 19 अगस्त 2025 को नई दिल्ली में दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों चीन के विदेश मंत्री वांग यी और भारत के सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल के बीच 24वीं वार्ता हुई। इस दौरान दोनों देशों ने सीमा पर शांति बनाए रखने, व्यापार बढ़ाने और आपसी विश्वास को मजबूत करने के लिए कई अहम फैसले लिए गए। लेकिन इस बार 24वें दौर की विशेष प्रतिनिधि वार्ता के बाद जो सहमति सामने आई है, वह पहले से अलग और महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इस बैठक में पहली बार भारत और चीन ने पूर्वी और मध्य सेक्टर में भी “जनरल लेवल मैकेनिज्म” (General Level Mechanism) बनाने का फैसला लिया है। लेकिन यह मैकेनिज्म क्या है? यह पहले से मौजूद SHMC और WMCC से कैसे अलग है? आइए, इसे आसान भाषा में समझते हैं।

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क्या है General Level Mechanism

दरअसल यह मैकेनिज्म (General Level Mechanism) सैन्य स्तर पर होने वाली कोर कमांडर स्तर की बैठकें हैं। 2020 के गलवान संघर्ष के बाद जब एलएसी (लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल) पर स्थिति बेहद तनावपूर्ण हो गई थी, तब पहली बार कोर कमांडर स्तर पर बैठकों का सिलसिला शुरू किया गया। इसका मकसद यह था कि दोनों देशों की सेनाओं के सीनियर अफसर सीधे बातचीत कर सकें और किसी भी विवाद या गतिरोध को बातचीत से सुलझाने का रास्ता निकाल सकें। 2020 में गलवान के बाद दोनों देशों ने फैसला किया कि छोटे स्तर के अधिकारियों की बजाय कोर कमांडर स्तर पर बातचीत होगी ताकि बड़े विवादों को जल्दी सुलझाया जा सके। भारतीय सेना की 14वीं कोर, जो पूर्वी लद्दाख की जिम्मेदारी देखती है, इस मैकेनिज्म का हिस्सा रही है।

अब यह व्यवस्था सिर्फ पश्चिमी सेक्टर यानी लद्दाख तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के इलाकों में भी लागू होगी। इसका मतलब यह है कि भविष्य में अगर किसी भी तरह की टकराव की स्थिति पूर्वी या मध्य सेक्टर में पैदा होती है, तो उसे भी कोर कमांडर स्तर पर सुलझाने की कोशिश होगी।

कहां-कहां है तनाव और क्या है मौजूदा स्थिति

भारत और चीन के बीच 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर विवाद तीन प्रमुख इलाकों पश्चिमी, मध्य, और पूर्वी में फैला है। इन इलाकों में दोनों देशों की अलग-अलग दावेदारी और एलएसी की अस्पष्ट के चलते बार-बार तनाव पैदा होता है। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद का आधार एलएसी है, जो दोनों देशों के बीच एक अस्थायी सीमा रेखा है। इस रेखा की कोई औपचारिक परिभाषा नहीं है, और दोनों देश इसे अलग-अलग नजरिए से देखते हैं। इसी के चलते दोनों देशों के सैनिकों की गश्त के दौरान टकराव आम है। एलएसी को तीन क्षेत्रों में बांटा गया है, पश्चिमी क्षेत्र (लद्दाख और अक्साई चिन), मध्य क्षेत्र (हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड), और पूर्वी क्षेत्र (अरुणाचल प्रदेश)।

पश्चिमी क्षेत्र, यानी लद्दाख और अक्साई चिन, इस विवाद का सबसे संवेदनशील हिस्सा है। भारत का दावा है कि 1865 में बनाई गई जॉनसन लाइन के अनुसार अक्साई चिन लद्दाख का हिस्सा है। यह इलाका करीब 38,000 वर्ग किलोमीटर का है और भारत इसे अपना मानता है। दूसरी ओर, चीन 1899 की मैकार्टनी-मैकडोनाल्ड लाइन को मानता है, जिसके अनुसार अक्साई चिन उसके शिनजियांग प्रांत का हिस्सा है। हकीकत यह है कि 1950 के दशक से अक्साई चिन पर चीन का नियंत्रण है। उसने यहां G219 राजमार्ग बनाया, जो उसके शिनजियांग और तिब्बत क्षेत्र को जोड़ता है।

मध्य क्षेत्र, यानी हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में सीमा विवाद अपेक्षाकृत कम है। यह एलएसी का सबसे छोटा हिस्सा है, जहां बाराहोती और नेलांग घाटी को लेकर विवाद है। इन इलाकों पर भारत का नियंत्रण है, लेकिन दोनों देशों की सेनाएं समय-समय पर गश्त करती हैं। इस क्षेत्र में तनाव लद्दाख या अरुणाचल की तुलना में कम हैं। फिर भी, छोटे-मोटे विवादों को सुलझाने के लिए स्थानीय स्तर पर बातचीत होती रहती है।

पूर्वी क्षेत्र, यानी अरुणाचल प्रदेश की बात करें, तो यहां लद्दाख के बाद सबसे ज्यादा तनाव है। भारत 1914 की शिमला संधि में बनी मैकमोहन लाइन को मान्यता देता है, जिसके अनुसार अरुणाचल प्रदेश भारत का हिस्सा है। यह क्षेत्र करीब 90,000 वर्ग किलोमीटर में फैला है और भारत इसे अपना पूर्ण राज्य मानता है। लेकिन चीन इस रेखा को “साम्राज्यवादी” बताकर खारिज करता है और अरुणाचल को “दक्षिण तिब्बत” के रूप में दावा करता है। यहां दोनों देशों की सेनाएं गश्त करती हैं, और कई बार टकराव की स्थिति बनती है। अरुणाचल में भारत ने सैन्य और बॉर्डर इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया है, जबकि चीन ने भी अपनी तरफ सैन्य ठिकानों और सड़कों का जाल बिछाया है।

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External Affairs Minister S Jaishankar emphasized that maintaining peace and tranquility along the India-China border is fundamental to improving bilateral relations (Photo: MEA)

क्या है SHMC?

भारत-चीन सीमा विवाद को सुलझाने के लिए पहले से दो सिस्टम काम कर रहे हैं। पहला है SHMC यानी सीनियर हाईएस्ट मिलिट्री कमांडर लेवल मीटिंग, जिसे साधारण भाषा में कोर कमांडर स्तर की बैठक कहा जाता है। यह व्यवस्था 2020 में गलवान झड़प के बाद शुरू हुई थी। 2020 से पहले एलएसी पर विवाद सुलझाने के लिए कर्नल या ब्रिगेडियर स्तर के अधिकारी बातचीत करते थे। लेकिन गलवान के बाद यह साफ हो गया कि बड़े विवादों को सुलझाने के लिए उच्च स्तर की बातचीत जरूरी है। इसलिए SHMC बनाया गया, जिसमें कोर कमांडर शामिल होते हैं। नया जनरल लेवल मैकेनिज्म SHMC का ही विस्तार है, लेकिन अब इसे पूरे LAC पर लागू किया जाएगा, न कि सिर्फ पूर्वी लद्दाख में।

WMCC के बारे में जानें?

वहीं, WMCC यानी मैकेनिज्म फॉर कंसल्टेशन एंड कोऑर्डिनेशन ऑन इंडिया-चाइना बॉर्डर अफेयर्स। यह एक डिप्लोमैटिक-मिलिट्री स्ट्रक्चर है, जिसमें दोनों देशों के विदेश मंत्रालय और सेना के अधिकारी शामिल होते हैं। WMCC की शुरुआत 2012 में हुई थी और इसका मकसद सीमा प्रबंधन के लिए नियमित संवाद बनाए रखना है। 1960 में दोनों देशों के बीच सीमा विवाद सुलझाने की कोशिश हुईं, लेकिन बातचीत नाकाम रही। 1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की चीन यात्रा के बाद जॉइंट वर्किंग ग्रुप बनाया गया। 1993 और 1996 में एलएसी पर शांति बनाए रखने के लिए समझौते हुए। 2003 में स्पेशल रिप्रजेंटेटिव सिस्टम शुरू हुआ, और 2005 में सीमा विवाद के हल के लिए मार्गदर्शक सिद्धांतों पर दस्तखत हुए। 2012 में WMCC बनाया गया, जो डिप्लोमैटिक लेवल पर बॉर्ड मैनेजमेंट का काम करता है। WMCC में सीमा से जुड़े बड़े नीतिगत फैसले लिए जाते हैं, जैसे कि तनाव कम करने की रणनीति बनाना या सीमा पर व्यापार और सहयोग बढ़ाने के तरीके तलाशना।

24वीं विशेष प्रतिनिधि वार्ता में WMCC के तहत दो नए समूह बनाने का फैसला हुआ। पहला है एक्सपर्ट ग्रुप, जो सीमा पर परिसीमन यानी बॉर्डर डिलिमिटेशन की संभावनाओं पर काम करेगा। दूसरा है वर्किंग ग्रुप, जो बॉर्डर मैनेजमेंट को और प्रभावी बनाने के लिए रणनीतियां तैयार करेगा। ये दोनों समूह WMCC के तहत काम करेंगे और डिप्लोमैटिक लेवल पर सीमा विवाद को सुलझाने में मदद करेंगे।

क्या SHMC का विस्तार है General Level Mechanism

हालांकि यह बात सही कि इतने मैकेनिज्म होने के बावजूद अभी तक एलएसी का कोई अंतिम परिसीमन या सीमा निर्धारण नहीं हुआ है। लेकिन उम्मीद जताई जा रही है कि भारत और चीन के बीच यह नया जनरल लेवल मैकेनिज्म (General Level Mechanism) एलएसी पर शांति और स्थिरता बनाए रखने में अहम भूमिका निभा सकता है। सही मायने में कहा जाए तो जनरल लेवल मैकेनिज्म (General Level Mechanism) दरअसल SHMC का ही विस्तार है, जो मिलिट्री लेवल पर काम करता है, और अब इसे पूर्वी और मध्य सेक्टर तक विस्तारित किया जा रहा है। यह न सिर्फ सैन्य अधिकारियों के बीच सीधी बातचीत को बढ़ाएगा, बल्कि इससे तनावपूर्ण स्थितियों का समाधान तेजी से निकाला जा सकेगा। जबकि WMCC डिप्लोमैटिक लेवल स्तर पर सीमा विवाद को सुलझाने का काम करता है। दोनों सिस्टम एक-दूसरे के पूरक हैं और मिलकर सीमा पर तनाव कम करने में मदद करेंगे।

बता दें कि सिक्किम में भारतीय सेना की जिम्मेदारी 33 कोर के पास है, जबकि अरुणाचल प्रदेश में 3 कोर और 4 कोर तैनात हैं। इन दोनों सेक्टरों में जनरल-लेवल मैकेनिज्म का उद्देश्य यह है कि अगर सीमा पर कोई विवाद पैदा होता है और वह जूनियर अफसरों की बातचीत से हल नहीं हो पाता, तो उसे कोर कमांडर स्तर की बातचीत में सुलझाने की कोशिश की जाए। पूर्वी लद्दाख के अनुभवों से यह साफ हुआ है कि सीनियर मिलिट्री कमांडर स्तर की वार्ताओं ने ही गतिरोध कम करने का रास्ता बनाया। यही वजह है कि भारत और चीन दोनों के स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव्स ने जनरल लेवल मैकेनिज्म को लेकर सहमति जताई।

वार्ता में बनी और भी सहमतियां

19 अगस्त 2025 को नई दिल्ली में हुई स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव स्तर की इस बैठक में दोनों देशों ने सीमा प्रबंधन और सीमा विवाद को लेकर कुल दस बिंदुओं पर सहमति जताई। जिसमें तीन पारंपरिक व्यापारिक बाजारों को फिर से खोलने का फैसला हुआ। ये बाजार हैं रेनक्विंगगांग-चांगगु, पुलान-गुंजी और जिउबा-नामग्या। ये ट्रेडिंग पॉइंट्स एलएसी के पास हैं और इनके खुलने से दोनों देशों के बीच व्यापार और आपसी संपर्क बढ़ेगा। साथ ही, दोनों देशों ने सीधी उड़ान सेवाएं शुरू करने और पर्यटकों, कारोबारियों और मीडिया के लिए वीजा प्रक्रिया को आसान बनाने पर सहमति जताई। वहीं, खास बात यह रही कि विशेष प्रतिनिधि वार्ता में दोनों देशों ने 2026 में चीन में 25वें दौर की वार्ता आयोजित करने पर भी सहमति जताई।

सीमा पार नदियों पर सहयोग भी एक अहम मुद्दा रहा। भारत ने यार्लंग त्सांगपो यानी ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन द्वारा बनाए जा रहे विशाल बांध को लेकर चिंता जताई। इस बांध का असर भारत के निचले तटवर्ती राज्यों पर पड़ सकता है। चीन ने आपात स्थिति में हाइड्रोलॉजिकल डाटा साझा करने का वादा किया, जो मानवीय आधार पर लिया गया फैसला है। दोनों देशों ने इस मुद्दे पर पहले से मौजूद एक्सपर्ट लेवल सिस्टम को और मजबूत करने का फैसला किया।

वहीं, आतंकवाद का मुद्दा भी इस बैठक में उठा। भारत ने सीमा पार आतंकवाद सहित हर तरह के आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख अपनाया। विदेश मंत्रालय ने साफ किया कि शंघाई सहयोग संगठन (SCO) का एक मूल उद्देश्य आतंकवाद से लड़ना है। भारत ने चीन से इस दिशा में और सहयोग की उम्मीद जताई।