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Ran Samwad told Vice Admiral Tarun Sobti in 2025, Operations were deployed on INS Vincir in Sindoor 15 Mig-29 Fighter Jets, these 9 trends will decide the future wars

Ran Samwad 2025 Vice Admiral Tarun Sobti Future Wars Analysis
Naval Staff Indian Navy analyses global conflicts and their lessons for India.

Ran Samwad 2025: Indian Navy Deputy Chief Vice Admiral Tarun Sobti says that the operation was not only an operation but a glimpse of the future war. The learnings from this helped the Indian Navy and the three forces to understand that the wars in the coming time will be fought not only from guns, tanks and ships, but also by drones, cyber wars, satellites, artificial intelligence and natural controls.

Ran Samwad 2025 Training Reforms: Preparation of major changes in Indian Army, now training will include drones and cyber warfare

Ran Samwad 2025: Larger learning from operation syntre

The Vice Admiral Tarun Sobti, speaking at the Ran Dialogue 2025 event held at the Army War College of Mau, acknowledged that Operation Sitter gave several important lessons to the Indian Navy. He pointed out that when Pakistani terrorists in Jammu and Kashmir’s wrestling, carried out the terror attack and then when the recent war moves, the navy had completed its entire preparation within just 96 hours.

Ran Samwad 2025: Pakistani army prisoned in its own ports

He told the defence news that the navy does theater-level exercise Tropex every two years. This year was also practiced between January to March. The advantage of the same preparation was that when the situation worsened, the navy was immediately prepared to descend to the sea. All ships and submarines were immediately equipped with ammunition. He reported that the 15 Mig-29 fighter aircraft were deployed on the Aircraft Carrier INS Vikrant and the entire navy became active on the western beach.

उद्देश्य स्पष्ट था फॉरवर्ड पोस्टचर और डिटरेंस, ताकि पाकिस्तान किसी भी हाल में भारत की समुद्री सीमाओं, व्यापारिक मार्गों या तटवर्ती क्षेत्रों को खतरा न पहुंचा सके। इस तेज और संगठित कार्रवाई का नतीजा यह हुआ कि पाकिस्तान की नौसेना अरब सागर से बाहर निकल ही नहीं पाई। वाइस एडमिरल सोबती ने गर्व से कहा, “हमने उन्हें उनके ही बंदरगाहों में कैद कर दिया। वे बाहर निकलने की हिम्मत नहीं जुटा पाए।”

Ran Samwad 2025: कैसा होगा भविष्य का युद्ध?

सोबती ने कहा कि इतिहास गवाह है कि हर बड़ी तकनीकी क्रांति ने युद्ध का चेहरा बदला है। तलवार से तोप तक, टैंक से परमाणु बम तक, हर युग में तकनीक ने निर्णायक भूमिका निभाई। आज हम एक साथ कई तकनीकी क्रांतियों के बीच खड़े हैं।

उन्होंने बताया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग, सैटेलाइट कम्युनिकेशन, साइबर ऑपरेशंस और ड्रोन टेक्नोलॉजी ने युद्ध को पूरी तरह बदल दिया है। खास बात यह है कि ये तकनीकें अब बहुत तेजी से विकसित हो रही हैं, सस्ती हो गई हैं और हर किसी के लिए उपलब्ध हैं। सोबती ने कहा कि अब युद्ध का आधार केवल संख्या नहीं बल्कि स्पीड और सटीकता (Precision) है।

उन्होंने कहा कि आज की निर्णायक शक्ति ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और रियल-टाइम कम्युनिकेशन है। उनका कहना था कि सिविल सोर्स तकनीक जैसे Starlink सैटेलाइट इंटरनेट, AI आधारित डेटा एनालिटिक्स और ऑफ-द-शेल्फ ड्रोन अब युद्ध के मैदान पर हथियार के रूप में इस्तेमाल हो रहे हैं। इसका असर यह है कि युद्ध केवल सेनाओं के बीच नहीं, बल्कि तकनीक को अपनाने और इस्तेमाल करने की क्षमता पर निर्भर हो गया है।

Ran Samwad 2025: प्रिसिजन-गाइडेड म्युनिशन से कम कॉलेटरल डैमेज

वाइस एडमिरल सोबती ने रूस-यूक्रेन युद्ध और गाजा संघर्ष का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि ड्रोन अब युद्ध के सबसे बड़े हथियार बन गए हैं। ईरान-इजरायल संघर्ष में लंबी दूरी से की गई स्ट्राइक और प्रिसिजन-गाइडेड म्युनिशन (PGMs) ने युद्ध की दिशा बदल दी। प्रिसिजन-गाइडेड म्युनिशन का इस्तेमाल करते हुए कम से कम कॉलेटरल डैमेज के साथ दुश्मन के मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया।

वाइस एडमिरल सोबती ने कहा कि अब ये हथियार केवल टैक्टिकल लग्जरी नहीं बल्कि रणनीतिक जरूरत बन चुके हैं।

उन्होंने बताया कि यूक्रेन युद्ध ने दिखा दिया कि कम लागत वाले ड्रोन अब बड़े हथियारों के बराबर असर डाल सकते हैं। साधारण क्वाडकॉप्टर को बम गिराने और आत्मघाती (Kamikaze) मिशनों के लिए बदला गया। रूसी टैंकों और आर्मर्ड कॉलम्स को ड्रोन और सैटेलाइट से पहले पहचानकर यूक्रेनी सेना ने सटीक हमले किए। यमन के हूती विद्रोहियों ने रेड सी और गल्फ ऑफ एडन में सस्ते UAVs का इस्तेमाल कर बड़े जहाजों और व्यापारिक मार्गों को चुनौती दी। सोबती ने कहा कि अब ड्रोन स्वॉर्म्स (झुंड) हाई टेक्नोलॉजी वेपंस और जहाजों को टक्कर दे रहे हैं।

Ran Samwad 2025: स्पेस: वॉर का नया डोमेन

सोबती ने कहा कि अब अंतरिक्ष केवल वैज्ञानिक गतिविधियों तक सीमित नहीं रहा। युद्ध में यह सबसे अहम साधन बन चुका है। यूक्रेन को Maxar और Planet Labs जैसी कंपनियों से रियल टाइम सैटेलाइट इमेजरी मिली। Starlink इंटरनेट नेटवर्क ने उन्हें सेफ कम्युनिकेशन उपलब्ध कराया, जबकि रूस लगातार इलेक्ट्रॉनिक जामिंग कर रहा था। इसी तरह गाजा में इजरायल ने सैटेलाइट से हमास की सुरंगों और ठिकानों का पता लगाकर चुनिंदा हमले किए। उन्होंने कहा कि इससे साफ है कि आधुनिक युद्ध में स्पेस-बेस्ड एसेट्स निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं।

Ran Samwad 2025: इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर का बढ़ता दबदबा

वाइस एडमिरल सोबती ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर (EW) आज की लड़ाई का अहम हिस्सा बन गया है। रूस ने यूक्रेनी ड्रोन और GPS आधारित हथियारों को जैमिंग और स्पूफिंग से बेकार कर दिया। उन्होंने कहा कि भारत को भी जॉइंट इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर एसेट्स तैयार करने होंगे क्योंकि आज “जो स्पेक्ट्रम को कंट्रोल करता है, वही युद्ध को कंट्रोल करता है।”

इनफॉरमेशन वॉर और नैरेटिव कंट्रोल

वाइस एडमिरल सोबती ने बताया कि युद्ध केवल मैदान में नहीं बल्कि लोगों के दिमाग में भी लड़ा जाता है। रूस और यूक्रेन दोनों ने अपने-अपने पक्ष में नैरेटिव बनाने के लिए मीडिया लीक, सोशल मीडिया, वीडियो और प्रोपेगैंडा का इस्तेमाल किया। उन्होंने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर में भी दुश्मन ने दुष्प्रचार फैलाने की कोशिश की, लेकिन भारतीय सेना ने समय रहते इसका जवाब दिया। उनका कहना है, “नैरेटिव कंट्रोल अब युद्ध का जरूरी हिस्सा बन चुका है।”

बता दें कि सीडीएस अनिल चौहान ने कहा था कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान लगभग 15 प्रतिशत ऊर्जा दुश्मन के झूठे नैरेटिव और दुष्प्रचार को रोकने में लग गई। यही कारण है कि ऑपरेशन के बाद भारत ने अपनी बात मजबूत ढंग से रखी और वैश्विक स्तर पर समर्थन हासिल किया।

साइबर ऑपरेशंस का रोल

वाइस एडमिरल सोबती के मुताबिक साइबर अटैक युद्ध का हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन अभी तक निर्णायक नहीं साबित हुए हैं। रूस ने यूक्रेन की पावर ग्रिड और कम्युनिकेशन सिस्टम को निशाना बनाया, वहीं ईरान समर्थित हैकर्स ने इजरायल की वाटर सप्लाई और एनर्जी फैसिलिटी पर हमला किया। हालांकि, यूक्रेन रेडंडेंसी और बैकअप सिस्टम के जरिए ऐसे हमलों से जल्दी उबर गया। लेकिन इन हमलों का असर लंबे समय तक नहीं रहा। उन्होंने कहा कि साइबर हमले सहयोगी तो हैं लेकिन निर्णायक नहीं हैं। लेकिन उन्हें नजरअंदाज करना खतरनाक होगा।

नेटवर्क-इंटीग्रेटेड फोर्स स्ट्रक्चर

उन्होंने कहा कि भारत को नेटवर्क-इंटीग्रेटेड फोर्स स्ट्रक्चर की ओर बढ़ना होगा, जहां सेंसर और शूटर अलग-अलग होकर भी डेटा शेयर कर सकें और तुरंत हमला कर सकें। सोबती ने कहा कि आधुनिक युद्ध ने यह साबित कर दिया है कि अब केवल सैनिकों की संख्या से जीत नहीं मिलती। बल्कि स्पीड, एक्यूरेसी और टेक्निकल ऑप्टिमाइजेशन ही युद्ध में जीत दिला सकते हैं।

उन्होंने सुझाव दिया कि भारतीय सेनाओं को मॉड्यूलर, टेक-एनेबल्ड और एगाइल फोर्स पैकेजेज अपनाने होंगे। युद्ध अब “Mass vs Mass” नहीं बल्कि “Fast vs Fast” हो गया है। उन्होंने कहा कि अब भारत को अपने डॉक्ट्रिन्स (सैन्य सिद्धांतों) में मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस शामिल करने होंगे, ताकि थल, जल, नभ, अंतरिक्ष और साइबर हर क्षेत्र में एक साथ तालमेल बनाया जा सके।

Ran Samwad 2025 Training Reforms: Preparation of major changes in Indian Army, now training will include drones and cyber warfare

Ran Samwad 2025 Training Reforms in Indian Army tech-centric
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Ran Samwad 2025 Training Reforms: Joint Ran Dialogue of the Three Forces at the Mau-based Army War College of Madhya Pradesh discusses the new outline of the future war in 2025 Seminar. Focus was, moving from traditional training to technology-based training model. During the Ran Dialogue, Defence Minister Rajnath Singh said that every young Indian army will be trained by 2027. At the same time, the Commandant of the School of Artillery Lt. Gen. NS Sarna said that the future war will not be traditional but technical and for this we have to train the soldiers with new skills.

Ran Samwad 2025 Doctrine: The battlefield will fight such corrosion from the human minds of the Younger of Special Forces! New work assigned after the operation shifter

Ran Samwad 2025 Training Reforms: Must Change Training Structure

The recent rusts around the world have been seen in the last decade that the use of drones, cyber attacks, electronic warfare and artificial intelligence (AI) has grown rapidly. General Sarna said that the next war will be fought against these techniques. He said we have to completely change our training structure if we have to be prepared for the coming struggles.

Lieutenant General NS Sarna speaks on ‘Integrating Technology for Warfighting Through Training Initiatives’ that time has now come to our Military Training Institutes not only limiting physical capacity and traditional warfare and also prepare for Technology Warfare.

He said that most military academies still train based on the traditional war, where there is much emphasis on physical fitness and basic strategy. But now it’s not enough. New time demands that young cyber security, drone operation, information warfare and electronic warfare also become experts.

He said it is imperative to develop such training systems for the soldiers looking at the future wars, which can be agile and adaptable and move along the changing technique. He had to say that the training institutions of the Army should be developed as Technical Training Centre (Technology Training Hubs). He described the simulation-based course, Artificial Intelligence (AI) Wargming and Joint Training Initiative a major transformative step in traditional military education. Also he recommended to create a National Military Digital Knowledge Store (Military Digital Knowledge Repository), so that modern knowledge and technical experience can be preserved and shared in the institutional framework.

Ran Samwad 2025 Training Reforms: Focus on Theory, Organization and Training

The deputy Chief of the Integrated Defence Staff (HQ-IDS) (Doctrine, & Training) Lt. General People Singhal said that the basis of victory in future wars will be jointness and organization synergy. "The strategic solidarity and shared training between Aramie, Navy and Airforce will lead us to future security challenges. ""

उन्होंने कहा कि सैन्य प्रशिक्षण को लगातार अपडेट करते रहना होगा ताकि वह तकनीकी बदलावों के साथ तालमेल बना सके। उनके अनुसार, युद्ध की तैयारी के तीन स्तंभ हैं Doctrine (सिद्धांत), Organisation (संगठन) और Training (प्रशिक्षण)। इन तीनों का तालमेल ही कॉम्बैट रेडीनेस यानी युद्ध के लिए तैयार रहने की गारंटी है। उन्होंने कहा कि इससे न केवल प्रशिक्षण को तकनीकी रूप से आधुनिक बनाया जा सकेगा, बल्कि विभिन्न सेनाओं के बीच अनुभवों का आदान-प्रदान भी आसान होगा।

Ran Samwad 2025 Training Reforms: तीन प्रमुख क्षेत्रों पर दे ध्यान

सेंट्रल कमांड यानी सूर्या कमांड के जनरल ऑफिसर कमांडिंग लेफ्टिनेंट जनरल सेनगुप्ता ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान दुश्मन की तरफ से बड़े पैमाने पर ड्रोन का इस्तेमाल देखने के बाद भारत अब तीन प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान दे रहा है। पहला, काउंटर-ड्रोन सिस्टम विकसित करना ताकि दुश्मन के ड्रोन खतरों को तुरंत न्यूट्रलाइज किया जा सके। दूसरा, ज्यादा से ज्यादा सैनिकों को ड्रोन चलाने और टैक्टिकल बैटल एरिया में इस्तेमाल करने का प्रशिक्षण देना। तीसरा, ऑटोनोमस हवाई हमलों के तरीके तैयार करना, ताकि दुश्मन की रणनीतियों का प्रभावी जवाब दिया जा सके। उन्होंने कहा कि अब ड्रोन कोई विकल्प नहीं रह गए हैं, बल्कि युद्ध के मैदान में प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं।

जनरल सेनगुप्ता ने कहा, “तकनीक को केवल सेंट्रल कमांड में ही नहीं, बल्कि पूरी भारतीय सेना में अपनाया जा रहा है। हर कमांड अपने ऑपरेशनल माहौल और चुनौतियों के हिसाब से इसे लागू कर रही है।” उन्होंने आगे कहा कि रण संवाद अब भारतीय सेनाओं के लिए गहन चर्चा, जॉइंट रिसर्च और मल्टी-डोमेन चैलेंजेस की तैयारी का अहम मंच बन चुका है। उन्होंने आगे कहा कि इस सेमिनार से मिले अनुभव और निष्कर्ष भारतीय सशस्त्र बलों को मानवीय जिम्मेदारियों और युद्धक तैयारी (combat readiness) के बीच संतुलन साधने में अहम भूमिका निभाएंगे।

ड्रोन और ऑटोमेटेड वेपन सिस्टम पर जोर

आर्मी ट्रेनिंग कमांड के ब्रिगेडियर रेवती भंडारी ने अनमैन्ड ऑटोनॉमस सिस्टम्स (UAS) यानी ड्रोन और ऑटोमेटेड वेपन सिस्टम पर बोलते हुए कहा कि ह्यूमन-मशीन टीमिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सिस्टम मैनेजमेंट और लॉजिस्टिक्स सपोर्ट के लिए ड्रोन का इस्तेमाल आने वाले समय में युद्ध का अहम हिस्सा बनेगा।

उन्होंने यह भी बताया कि कई देशों ने पहले ही सर्विलांस, टारगेटिंग और सप्लाई के लिए बड़े पैमाने पर ड्रोन और बिना चालक वाले वाहन (UAVs) को शामिल कर लिया है। भारत को भी इसी दिशा में तेज कदम उठाने होंगे।

ब्रिगेडियर भंडारी ने दुनिया भर के मिलिट्री स्ट्रक्चर का उदाहरण देते हुए कहा कि अब वॉर स्ट्रक्चर्स को चरणबद्ध तरीके से सेमी-ऑटोनॉमस से पूरी तरह ऑटोनॉमस सिस्टम्स की ओर ले जाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि अगर भारत को 2035 तक ऑटोनॉमस कैपेबिलिटी हासिल करनी है तो उसे अभी से अपने ट्रेनिंग, डॉक्ट्रिन और स्ट्रक्चर में बदलाव करना होगा।

उन्होंने चेतावनी दी कि ऑटोनॉमस सिस्टम्स के इस्तेमाल से कई कानूनी और नैतिक प्रश्न भी उठेंगे। ऐसे में प्रशिक्षण में इन पहलुओं को भी शामिल करना होगा।

सेना प्रमुख ने कही थी ये बात

बता दे कि इसी महीने चार अगस्त को सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने आईआईटी मद्रास में ‘अग्निशोध’ रिसर्च सेंटर के उद्घाटन के दौरान ‘बूट्स से बॉट्स’ की कॉन्सेप्ट पर जोर दिया था। उन्होंने कहा था कि भारतीय सेनाएं अब पारंपरिक सैन्य शक्ति (बूट्स) से तकनीक-आधारित युद्ध (बॉट्स) की ओर बढ़ रहे हैं, जिसमें नॉन कॉन्टैक्ट वॉर, स्ट्रेजेटिज मूमेंटम और आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल शामिल है। उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर का उदाहरण देते हुए कहा था कि यह एक शतरंज के खेल की तरह था, जहां स्ट्रेटेजिकल और टेक्टिकल प्लानिंग के साथ दुश्मन को शह और मात दी गई। ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, और अन्य तकनीकों का इस्तेमाल कर सेना ने आतंकी ठिकानों को नष्ट किया। उन्होंने यह भी कहा कि नैरेटिव मैनेजमेंट के जरिए जनता तक सही संदेश पहुंचाना महत्वपूर्ण है, और इसके लिए सोशल मीडिया का उपयोग किया गया।

Ran Samwad 2025 Doctrine: ‘Human minds made by the battlefield’ will fight such corrosion. Young of Special Forces! New work assigned after the operation shifter

Ran Samwad 2025 Doctrine: Indian Special Forces Information Warfare
AI Image

Ran Samwad 2025 Doctrine: A milestone in Indian defence history has proved to be held at the Army War College of Madhya Pradesh. This two-day tri services seminar took part in the top officers of the Army, Naval and Air Force as well as Industry, Academia and Strategic Experts. Chief of Defence Staff General Anil Chauhan released Joint Doctor (Joint Doctrine for Special Forces Operations) for the first time for Indian Special Forces.

Rajnath Singh Ran Samwad 2025: Defence Minister Rajnath Singh Bole- "India never started war, but always prepared for security"

This doctor explains that no longer special forces have to be active only in new areas such as traditional battlefields, land, air and sea but also information warfare and natural management. In the country’s first publicly available Joint Special Forces policy, it is said that Special Forces will now have to create a strategy to combat promotions, control information, and deliver correct messages in society. The information war in this policy has been recognized as an important battlefield, which is as essential as traditional military actions.

Ran Samwad 2025 Doctrine: Human Brain Made Battlefield

"Inson’s mind has also become a battlefield" in modern times. Anti-country can influence the publicity through social media, deep fake technology and psychological campaigns and create instability in society.

So Indian Special Forces will now be enabled in both aggressive and defensive types of Info Warfare. They will not only have to stop the propaganda of the enemy, but also make strong narratives in favor of India.

Ran Samwad 2025 Doctrine: Learning Lessons From Operation Sitter

The biggest reference operation of the new Docktrin is central, showing that the war can be won or defeated not only from the bullets and missiles, but also from the inforumation and perception. This operation made it clean that it is equally necessary to deliver the right message in the battlefield as well as in the minds of the people. In May 2025, the Indian forces had taken a swipe against the terror on Pakistan. At that time, General Chauhan reported that about 15 percent of energy spent preventing false information and misconduct of the enemy.

He also said that misinformation is not limited to an event but it is constantly moving. So it is important to answer this in an extremely careful and restrained way, so that the enemy does not have a chance to nurture.

मई 2025 में पाकिस्तान के खिलाफ चले इस ऑपरेशन में भारत ने हवाई, थल और नौसैनिक तीनों मोर्चों पर निर्णायक बढ़त हासिल की थी। लेकिन इस दौरान दुश्मन ने सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर झूठे नैरेटिव फैलाने की कोशिश की। पाकिस्तान ने यह प्रचारित किया कि उसने भारत को भारी नुकसान पहुंचाया, जबकि हकीकत इसके बिल्कुल उलट थी।

Ran Samwad 2025 Doctrine: “विक्ट्री इज इन द माइंड”- जनरल उपेंद्र द्विवेदी

सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने हाल हाल ही में कहा था कि आज की लड़ाई केवल जमीन पर जीतने से तय नहीं होती, बल्कि जनता के दिमाग में भी लड़ी जाती है। उन्होंने याद दिलाया कि पाकिस्तान ने ऑपरेशन सिंदूर में हार के बावजूद यह प्रचार किया कि उसने ऑपरेशन सिंदूर जीता, और वहां की जनता भी यही मानने लगी। जबकि सच्चाई इसके बिल्कुल विपरीत थी।

जनरल द्विवेदी ने कहा कि अगर आप किसी पाकिस्तानी से पूछें कि ऑपरेशन सिंदूर में उनकी हार हुई या जीत, तो वह कहेगा, “हमारे प्रमुख को फील्ड मार्शल बनाया गया है, हमने तो जीत हासिल की।” इस घटना से यह साफ होता है कि लोगों के परसेप्शन को कंट्रोल करना अब युद्ध का एक अभिन्न हिस्सा बन चुका है। उन्होंने एक “मैसेज मैनेजमेंट सिस्टम” की जरूरत पर भी जोर दिया ताकि इनफॉरमेशन और परसेप्शन वॉर को और मजबूत किया जा सके।

Ran Samwad 2025 Doctrine: Indian Special Forces Information Warfare
General Anil Chauhan, Chief of Defence Staff along with Admiral Dinesh Kumar Tripathi #CNS, Air Chief Marshal AP Singh CAS and Lt Gen PP Singh VCOAS released two joint doctrines on ‘Special Forces Operations’ and
‘Airborne & Heliborne Operations’ during RAN SAMWAD 2025, at the Army War College.

Ran Samwad 2025 Doctrine: स्पेशल फोर्सेज की नई भूमिका

भारतीय स्पेशल फोर्सेज जिनमें आर्मी के पैरा एसएफ (Para SF), नौसेना की मरीन कमांडो यूनिट्स (MARCOS) और वायुसेना की गरुड़ कमांडो फोर्स शामिल हैं, उन्हें अब एक नए बैटलफील्ड में काम करना होगा।

नई डॉक्ट्रिन कहती है कि स्पेशल फोर्सेज को सांस्कृतिक समझ, रणनीतिक संवाद और मनोवैज्ञानिक दृढ़ता (Psychological Resilience) की भी ट्रेनिंग दी जाएगी। यह स्किल उन्हें दुश्मन की प्रचार मशीनरी का मुकाबला करने और अपने संदेश को सही रूप में दुनिया तक पहुंचाने में मदद करेगी।

हाइब्रिड वॉरफेयर की तैयारी

डॉक्ट्रिन ने यह भी साफ किया है कि भविष्य का युद्ध केवल पारंपरिक हथियारों से नहीं लड़ा जाएगा। इसे हाइब्रिड वॉरफेयर कहा जाता है। इसमें पारंपरिक सैन्य बलों के साथ-साथ साइबर हमले, आर्थिक दबाव, फर्जी सूचनाएं और प्रॉक्सी संगठनों का इस्तेमाल किया जाएगा।

इसलिए भारतीय स्पेशल फोर्सेज को मल्टी-डोमेन यानी जमीन, हवा, समुद्र, अंतरिक्ष, साइबर और सूचना हर क्षेत्र में तैयार रहना होगा।

पहली स्वतंत्र स्पेशल ऑपरेशंस कमांड!

2018 में गठित और 2019 में पूरी तरह एक्टिव हुई आर्मर्ड फोर्सेस स्पेशल ऑपरेशन डिविजन (AFSOD) भारत की पहली ट्राई सर्विसेज स्पेशल ऑपरेशन यूनिट है। इसमें लगभग 3,000 कमांडो शामिल हैं, जो अलग-अलग सेवाओं से आते हैं। नई डॉक्ट्रिन में संकेत दिया गया है कि भविष्य में AFSOD का दायरा और स्ट्रक्चर बढ़ाया जा सकता है। इसे एक फुल-फ्लेज्ड कमांड का रूप दिया जा सकता है, जो सीधे चीफ ऑफ स्टााफ कमेटी (COSC) के तहत काम करेगा। वहीं, अगर ऐसा होता है तो भारत धीरे-धीरे उस दिशा में बढ़ेगा, जहां एक स्वतंत्र स्पेशल ऑपरेशंस कमांड (SOC) बनाया जा सके।

ट्रेनिंग सिस्टम में बड़ा बदलाव

इस डॉक्ट्रिन में ट्रेनिंग को लेकर भी अहम सुधारों की बात कही गई है। अभी तक तीनों सेनाओं की अपनी-अपनी ट्रेनिंग इंस्टीट्यूशंस और स्कूल हैं। लेकिन अब इन्हें अपग्रेड करके जॉइंट सर्विस ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट्स (JSTIs) बनाने की योजना है। हर JSTI को किसी खास कौशल (Core Competency) जैसे माउंटेन वॉर, समुद्री अभियान या साइबर ऑपरेशंस में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनाया जाएगा। हालांकि इन संस्थानों का प्रशासनिक नियंत्रण संबंधित मूल सेना के पास ही रहेगा।

सूचना की जंग पर खुलेगा मोर्चा

यह डॉक्ट्रिन ऑपरेशन सिंदूर के बाद जारी की गई है। जिसने भारतीय सैन्य रणनीति को यह बड़ा सबक दिया कि युद्ध केवल हथियारों से नहीं जीते जाते। इस ऑपरेशन में भारत ने दिखाया कि कैसे भारचीय मिसाइलों ने दुश्मन की सीमा के अंदर तक प्रहार किया, नौसेना ने अरब सागर में पाकिस्तान की गतिविधियों को रोका और थल सेना ने सीमा पर मोर्चा संभाला।

लेकिन इसके साथ ही एक और जंग लड़ी गई सूचना की जंग। पाकिस्तान ने फर्जी वीडियो, मनगढ़ंत खबरें और सोशल मीडिया ट्रेंड्स के जरिए यह दिखाने की कोशिश की कि भारत को नुकसान हुआ है। भारतीय सेना और सरकार ने इस प्रोपेगेंडा का समय रहते जवाब दिया और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सही तस्वीर रखी। यही वजह है कि अब डॉक्ट्रिन में इसे “ऑपरेशनल इम्पेरेटिव” यानी युद्ध का जरूरी हिस्सा माना गया है।

Differences on Theatre Commands: What are the differences in the forces ranging from the theater command? How did CDS General Chouhan take the middle way?

Differences on Theatre Commands iaf navy cds ran samwad 2025
Anil Chauhan, Chief of Defence Staff along with Admiral Dinesh Kumar Tripathi #CNS, Air Chief Marshal AP Singh CAS and Lt Gen PP Singh VCOAS released two joint techniques on ‘Special Forces Operations’ and ‘Airborne & Heliborne Operations’ during RAN SAMWAD 2025, at the Army War College.

Differences on Theatre Commands: Differences have come up with the structure of the theater command in the top leadership of Indian forces. Where Naval Chief Admiral DK Tripathi lobbyed theaterization on Wednesday. So, Chief of Defence Staff (CDS) General Anil Chauhan acknowledged that there are disagreements on the issue, but he relied that it will be resolved soon. Earlier a day, Airforce Chief AP Singh spoke of not rushing about the theatre command.

IAF Chief AP Singh On Theatre Command: Air Force Chief in the Ran Dialogue called Theatre Command. These big things were sitting in front of CDS, remained silent

Differences on Theatre Commands: What did Airforce Chief say?

Speaking at the two-day ray dialogue program held at the Army War College of Mau, Air Force Chief Marshal AP Singh spoke differently about the proposed structure of the theater command. He suggested that the structure of the Military Chordination should be the one that directly operates the head of the three forces. Air Force chief said that the joint planning and decisions at this stage will be more practical and will not need to add unnecessary new layers.

Air Force chief Air Chief Marshal AP Singh also said that there is no time to implement the theater command right now. He explained that such a hurry can harm the core strength of the three forces.

"We don’t just need a new structure," Air Chief said. The system that exists can work better. We must create a Joint Planning and Chordination Centre in Delhi from where the plans are prepared and then their implementation is done at different levels. ""

Air Force concerns that he has a limited number of aircraft, refuelers and monitoring systems (AWACS). If the air resources were given to different theatre commands, the air Force will not be able to send its resources on any front faster. At present, Air Force can send its resources to any part in just 48 hours, and that’s the biggest strategic strength.

Differences on Theatre Commands: Naval Head Supported

While Naval Chief Admiral DK Tripathi openly supported theaterization. He said that the navy is fully committed to furthering this reform. Admiral Tripathi said, "Our goal is to be the better chordination of commands, controls, communications and Combats between the three forces. We have to proceed towards creating a shared operational picture and joint planning. ""

The Navy chief stressed that the three forces are currently taking big steps towards strengthening the jointness and integration. He said that this process will continue further and the theater command will be his final appearance.

Naval chief also reported that new threats are emerging in the marine sector. Fishing boats and research Vessels are now equipped with modern technology and gathering monitoring and information that can also be used for military purposes.

CDS balance

दो सेनाओं के अलग-अलग विचार सामने आने के बाद, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान ने बीच का रास्ता अपनाने की बात कही। उन्होंने कहा कि मतभेद होना कोई बुरी बात नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि हम खुलकर चर्चा कर रहे हैं।

सीडीएस ने कहा, “अगर असहमति नज़र आ रही है तो यह अच्छी बात है, क्योंकि हम इसे देशहित में सुलझा लेंगे। सबसे बड़ी बात यह है कि तीनों सेनाओं में भरोसा है और हम एक-दूसरे की बात सुनने को तैयार हैं।”

उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि थिएटर कमांड पर काम तेज करना होगा। “शायद हमें यह काम 10 साल पहले ही शुरू कर देना चाहिए था। अब देर हो चुकी है, लेकिन हमें इस कमी को जल्द पूरा करना होगा।”

जनरल चौहान ने कहा, “सीडीएस बनने के बाद से मेरा उद्देश्य तीनों सेनाओं में जॉइंटनेस को बढ़ावा देना रहा है। आज हम खुलकर अपनी राय रखते हैं, मतभेदों पर चर्चा करते हैं और फिर भी एक साझा समाधान तक पहुंचते हैं। यही हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि है।” सीडीएस ने यह भी कहा कि विचार-विमर्श की यह परंपरा तीनों सेनाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे यह साबित होता है कि वे जॉइंटनेस और सहयोग के लिए गंभीर हैं।

उन्होंने कहा कि भविष्य में केवल सेना, वायुसेना और नौसेना ही नहीं, बल्कि खुफिया एजेंसियों, केंद्रीय अर्धसैनिक बलों और तकनीकी संगठनों के साथ भी गहन तालमेल जरूरी होगा।

गौरतलब है कि चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का पद औपचारिक रूप से 1 जनवरी 2020 को अस्तित्व में आया था, जब जनरल बिपिन रावत को देश का पहला सीडीएस नियुक्त किया गया। उनके निधन के बाद सितंबर 2022 में जनरल अनिल चौहान ने यह जिम्मेदारी संभाली। सरकार ने सीडीएस को थिएटर कमांड्स बनाने और तीनों सेनाओं के बीच तालमेल को मजबूत करने का जिम्मेदारी सौंपी है।

जनरल चौहान ने कहा कि थिएटर कमांड की दिशा में आगे बढ़ने की प्रक्रिया को और तेज करने की जरूरत है। उन्होंने कहा, “यकीन रखिए, हम पूरी कोशिश कर रहे हैं और इसे आगे ले जाएंगे।”

क्या है थिएटर कमांड?

थिएटर कमांड के कॉन्सेप्ट का मतलब है कि सेना, नौसेना और वायुसेना को एक ही कमांडर के अधीन रखा जाए। यह कमांडर किसी खास भौगोलिक क्षेत्र की सुरक्षा का जिम्मा संभाले और उसके पास सभी तरह के संसाधन जैसे टैंक, तोप, जहाज, विमान, हेलिकॉप्टर और सैनिक एक साथ हों।

अभी भारतीय सेना और वायुसेना के पास सात-सात कमांड हैं और नौसेना के पास तीन। यानी कुल 17 स्वतंत्र कमांड काम कर रहे हैं। चीन ने 2016 में अपने सात सैन्य क्षेत्रों को पांच थिएटर कमांड में बदल दिया था, जिनमें भारत से सटे इलाके उसके पश्चिमी थिएटर कमांड के अंतर्गत आते हैं।

भारत में डिफेंस रिफॉर्म्स 2019 में शुरू हुए थे, जब डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स का गठन हुआ और चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का पद सृजित किया गया। तब से लेकर अब तक थिएटर कमांड के कॉन्सेप्ट पर लगातार विचार-विमर्श चल रहा है।

भविष्य के युद्ध की नई तस्वीर

जनरल चौहान ने कहा कि आने वाले समय में युद्ध केवल जमीन या आसमान तक सीमित नहीं रहेंगे। अब यह घनी आबादी वाले शहरों, रेगिस्तानों, समुद्र के भीतर, अंतरिक्ष और साइबर स्पेस तक फैलेगा। उन्होंने उदाहरण दिया कि शहरी इलाकों में आतंकवाद विरोधी अभियानों के लिए हल्के ड्रोन, डिटेक्शन सिस्टम और नई तकनीक निर्णायक साबित होंगी।

उन्होंने यह भी कहा कि अब युद्ध केवल संगठित सेनाओं के बीच नहीं हो रहे। आज पैरामिलिट्री फोर्स, निजी सुरक्षा कंपनियां, भाड़े के सैनिक और टेक्नोलॉजी आधारित हथियार प्रणाली भी सक्रिय हैं। आने वाले समय में रोबोट और स्वचालित हथियार भी युद्ध का हिस्सा बन सकते हैं।

सीडीएस ने कहा कि आज हमें सिर्फ स्कॉलर वॉरियर ही नहीं, बल्कि टेक वॉरियर और इंफ्लुएंस वॉरियर की भी जरूरत है। जहां स्कॉलर वॉरियर युद्ध की कला और विज्ञान को समझेगा। तो टेक वॉरियर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर और अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करेगा। जबकि इंफ्लुएंस वॉरियर नैरेटिव, सूचना और जनमत को नियंत्रित करेगा।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बढ़ेगी भूमिका

जनरल चौहान ने तकनीकी विकास को युद्ध का निर्णायक पहलू बताया। आधुनिक युद्ध में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और बिग डेटा एनालिटिक्स निर्णायक भूमिका निभाएंगे। डायरेक्टेड एनर्जी वेपन और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर युद्धक्षेत्र की दिशा को पूरी तरह बदल देंगे।

उन्होंने यह भी कहा कि आज साइबर वारफेयर, ऑनलाइन प्रोपेगैंडा और नैरेटिव ऑपरेशंस व्यक्तिगत स्तर तक पहुंच चुके हैं। आम नागरिक भी अब युद्ध का हिस्सा बन गए हैं और सोशल मीडिया, साइबर अभियानों तथा ऑनलाइन नैरेटिव्स के जरिए सीधे प्रभावित हो रहे हैं।

रण संवाद से मिली सीख

रण संवाद 2025 के दो दिनों की चर्चा का सार प्रस्तुत करते हुए सीडीएस ने कहा कि असमानता अब शक्ति संतुलन का नया आधार बन चुकी है। सटीकता पारंपरिक भारी बल प्रयोग की जगह ले रही है। युद्ध धीरे-धीरे मानव संचालित से मशीन संचालित होता जा रहा है, जिससे नैतिक सवाल भी उठेंगे। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि नैरेटिव बिल्डिंग अब केवल मीडिया का हिस्सा नहीं है, बल्कि युद्ध का निर्णायक पहलू बन गई है।

जनरल चौहान ने यह भी कहा कि युद्ध में काइनेटिक ऑपरेशंस और इंफॉर्मेशन ऑपरेशंस का इंटीग्रेशन अब अनिवार्य हो गया है। उन्होंने भरोसा जताया कि रण संवाद जैसे मंच भविष्य के युद्धों को समझने और भारतीय सेनाओं की तैयारियों को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाएंगे।

 

IAF Chief AP Singh On Theatre Command: Air Force Chief in the Ran Dialogue called Theatre Command. These big things were sitting in front of CDS, remained silent

IAF Chief AP Singh on Theatre Command: Warns Against Rushed Theaterisation
File Photo

IAF Chief AP Singh On Theatre Command: Indian Air Force chief Air Chief Marshal AP Singh said that Theatre Command (Theaterisation Applying the procedure in a hurry will not be the right step. He said in a clean manner that India should not adopt a model of another country but decide on their needs.

Ran Samwad 2025: CDS Chauhan Bole- The Army, bringing learns from the operation shift, peace without strength impossible

The famous Air Chief Marshal AP Singh was speaking in the fire site chat program of the 2025 programme held at the Army War College, Dr. Bhimrao Ambedkar Nagar (Mau) of Madhya Pradesh on Tuesday. This is the Joint Seminar of Tri Services (Thalsena, Naval and Air Force), which is being discussed on war, warfighting and future military challenges.

IAF Chief AP Singh On Theatre Command: Face Sitting General Anil Chauhan

At present seven of the army, seven of the air force and three commands of the navy work differently, but the resources of all services from the Integrated Theater command will be integrated under the same commander. This reform began in 2019 by the formation of the Department of Military Affairs and the appointment of Chief of Defence Staff.

The Indian Air Force Chief Marshal AP Singh, headed by the Indian Air Force during 2025, held at the Army War College in Dr. Ambedkar Nagar (MoU) in Madhya Pradesh, spoke to the theatre command, he said not to make changes in the current military operations quickly. He said that any decision should be taken while maintaining the core skills of the forces.

खास बात यह है कि जब एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने यह खरा-खरा बयान दिया तो दर्शक दीर्घा में सीडीएस जनरल अनिल चौहान भी बैठे हुए उन्हें सुन रहे थे और उनके बयान पर वे सिर्फ मुस्कुरा कर रह गए और कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। बता दें कि रण संवाद कार्यक्रम को सीडीएस अनिल चौहान की पहल के बाद बाद ही आयोजित किया गया है।

IAF Chief AP Singh On Theatre Command: अतिरिक्त लेयर्स न जोड़ी जाएं

वायुसेना प्रमुख एपी सिंह ने जोर दिया कि कंबाइंड स्ट्रक्चर्स में फैसला लेने की प्रक्रिया में अतिरिक्त लेयर्स न जोड़ी जाएं, क्योंकि इससे कमांडर स्तर पर जल्दी फैसला लेना मुश्किल हो जाता है। वायुसेना प्रमुख ने कहा कि थिएटर कमांड का उद्देश्य फटाफट फैसला लेना है, लेकिन इसके लिए मौजूदा व्यवस्था को बिना सोचे-समझे बदलना ठीक नहीं।

उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर का उदाहरण देते हुए कहा कि इस अभियान में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ ने चार वरिष्ठ अधिकारियों – सीडीएस और तीनों सेवाओं के प्रमुखों के बीच कॉर्डिनेशन का बड़ा काम किया। सिंह ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान केवल चार लोगों की जॉइंट प्लानिंग से कोई कमी नहीं आई। सब कुछ व्यवस्थित तरीके से हो गया। इस ऑपरेशन के दौरान चारों शीर्ष सैन्य अधिकारी सीडीएस जनरल अनिल चौहान और तीनों सेवा प्रमुख—साथ मिलकर काम कर रहे थे। इसलिए, उन्होंने टॉप लेवल पर जॉइंट प्लानिंग और क्रियान्वयनपर जोर दिया।

सिंह ने यह भी कहा कि कुछ छोटी-मोटी चुनौतियां जरूर सामने आईं, लेकिन उन्हें तुरंत हल कर लिया गया। इसका सबसे बड़ा सबक यह था कि दिल्ली में एक ज्वॉइंट प्लानिंग और कोऑर्डिनेशन सेंटर स्थापित होना चाहिए, जिसे सीडीएस और चीफ़्स ऑफ़ स्टाफ कमिटी के अधीन रखा जाए।

IAF Chief AP Singh On Theatre Command: गंभीर समस्याएं खड़ी होंगी

सिंह ने कहा कि “कोई भी नया स्ट्रक्चर निर्णय प्रक्रिया को लंबा नहीं करे। ओओडीए लूप (OODA Loop – Observe, Orient, Decide, Act) जितना छोटा रहेगा, युद्धक निर्णय उतने तेज होंगे।” उन्होंने यह भी जोर दिया कि हर सेवा की मुख्य क्षमता (Core Competence) बरकरार रहनी चाहिए। अगर थलसेना का कार्य वायुसेना को सौंपा जाएगा या नौसेना का कार्य किसी अन्य सेवा को, तो इससे गंभीर समस्याएं खड़ी हो सकती हैं।

“नए स्ट्रक्चर की अभी जरूरत नहीं”

Air Chief ने दोहराया कि भारत को अमेरिका या चीन के मॉडल की नकल नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा, “हर देश की अपनी जरूरतें होती हैं। चीन ने अपने हिसाब से थिएटर कमांड बनाए, अमेरिका ने अपने हिसाब से। लेकिन भारत को वही करना चाहिए जो हमारी स्थिति और जरूरत के अनुसार सही हो। सिर्फ दबाव में आकर अभी तुरंत इसे लागू करना ठीक नहीं है।”

उन्होंने यह भी कहा कि अगर थिएटर कमांडर कहीं और बैठकर केवल फोन पर आदेश देंगे, तो यह व्यवस्था कारगर नहीं होगी। युद्ध के दौरान वास्तविक समय (Real-time) पर कॉर्डिनेशन होना जरूरी है।

कल के युद्ध की आज करनी होगी तैयारी

रण संवाद में एयर चीफ ने कहा कि भारत को कल के युद्ध की तैयारी आज करनी होगी। आधुनिक तकनीकें जैसे साइबर युद्ध, अंतरिक्ष निगरानी (Space Surveillance), इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भविष्य की लड़ाई का अहम हिस्सा होंगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत को स्टार्टअप्स और स्वदेशी टेक्नोलॉजी में निवेश करना चाहिए ताकि रक्षा क्षेत्र में इनोवेशंस को बढ़ावा मिले।

भारत में थिएटर कमांड की बहस 2019 के बाद तेज हुई, जब सरकार ने डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स (DMA) बनाया और सीडीएस का पद सृजित किया। वर्तमान में भारतीय थलसेना और वायुसेना की सात-सात कमांड हैं जबकि नौसेना की तीन कमांड हैं। योजना यह है कि इन्हें मिलाकर इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड बनाए जाएं।

चीन की तर्ज पर थिएटर कमांड

चीन ने 2016 में अपनी सात सैन्य क्षेत्रों को पांच थिएटर कमांड में बदला था, जिसमें भारत से लगती सीमा का दायित्व वेस्टर्न थिएटर कमांड को सौंपा गया।

लेकिन भारत में इस स्ट्रक्चर को लागू करने पर कई बार सवाल उठते रहे हैं। खासकर वायुसेना ने चिंता जताई है कि उसकी सीमित स्क्वॉड्रन, एयरबोर्न वार्निंग सिस्टम (AWACS) और मिड-एयर रीफ्यूलर को विभिन्न थिएटरों में बांटने से फ्लेक्सिबिलिटी घट सकती है।

वायुसेना का तर्क है कि उसके पास पूरे देश में 48 घंटे के भीतर रिसोर्सेस को कहीं भी तैनात करने की क्षमता है। अगर इन्हें थिएटरों में बांट दिया गया तो यह रणनीतिक लाभ कम हो जाएगा।

दुनियाभर में हो रहे संघर्षों पर हुई चर्चा

रण संवाद में सिर्फ ऑपरेशन सिंदूर ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय युद्धों जैसे रूस-यूक्रेन संघर्ष और पश्चिम एशिया की लड़ाइयों के अनुभवों पर भी चर्चा हुई।

एयर चीफ मार्शल सिंह ने कहा कि युद्ध की प्रकृति बदल रही है। आज प्लेटफॉर्म महत्वपूर्ण हैं लेकिन उससे भी ज्यादा अहम है उनका रैप-अराउंड इकोसिस्टम जैसे साइबर, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और स्पेस टेक्नोलॉजी। उन्होंने स्वीकार किया कि भारत इन क्षेत्रों में पर्याप्त तेजी से आगे नहीं बढ़ रहा है और जरूरत है कि इन्हें प्राथमिकता दी जाए।

Ran Samwad 2025: CDS Chauhan Bole- The Army, bringing learns from the operation shift, peace without strength impossible

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CDS General Anil Chauhan in Ran Samwad 2025

Ran Samwad 2025: Chief of Defence Staff (CDS) General Anil Chauhan spoke in detail on the primary responsibility of Indian forces and the changing war strategy in the inauguration session of the Ran Communication 2025 held at the Army War College in the Mah of Madhya Pradesh. He said that in the coming time India’s response should be fast, decisive and combined because the format of the war is changing and the future war will not be limited only to the ground, sea and sky, but also domains such as cyber and space.

Ran Samwad-2025: How technology has done in operation shifts to Amazing, Tri Services seminars will discuss, many countries will also include Defence Attaches

He said that this seminar is an effort to develop clarity and shared understanding of power performance but not the objective. According to them, "Our greatest responsibility is to develop an understanding of war and warfighting. Many times we pay more attention to diplomacy, geopolicy, and international issues and ignore the basic topic i.e. war preparation. The motive of the ray dialogue is to change this thinking. ""

He has been trying for the last two years to focus on War and War Fighting. Warfighting is not limited to the principles only, but it is associated with the real use of technology, strategy and tactics (warm skills).

Ran Samwad 2025: First Time Indian Military Conclave

जनरल चौहान मध्यप्रदेश के महू स्थित आर्मी वॉर कॉलेज में आयोजित ट्राई सर्विसेज रण संवाद 2025 मिलिट्री कॉन्क्लेव को संबोधित कर रहे थे। यह सेमिनार 26–27 अगस्त तक आयोजित हो रहा है और इसे मुख्य रूप से हेडक्वार्टर इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (IDS) और आर्मी वॉर कॉलेज ने मिलकर तैयार किया है।

सीडीएस ने कहा, “जॉइंटमैनशिप अब कोई कल्पना नहीं रही। यह हमारे मौजूदा परिवर्तन की नींव है, जिसमें थिएटराइजेशन, इंटीग्रेटेड लॉजिस्टिक्स और जॉइंट ट्रेनिंग शामिल हैं।” उन्होंने कहा कि यह सेमिनार शक्ति प्रदर्शन का मंच नहीं बल्कि उद्देश्य की स्पष्टता और साझा समझ विकसित करने का एक प्रयास है।

Ran Samwad 2025: तकनीक ने रणनीति और युद्धकला को बदला

रण संवाद का मुख्य विषय है – युद्ध पर तकनीकी प्रगति का प्रभाव। इस दौरान वरिष्ठ सैन्य अफसर हाल में हुए संघर्षों का अध्ययन करेंगे और बताएंगे कि कैसे तकनीक ने रणनीति और युद्धकला को बदला है। चर्चा के प्रमुख बिंदुओं में शामिल हैं – उभरती तकनीकें, आधुनिक युद्ध की चुनौतियां, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल, समुद्री अभियानों में ड्रोन स्वॉर्म, लैंड वॉरफेयर में यूएवी का इस्तेमाल, ट्रेनिंग में टेक्नोलॉजी का इंटीग्रेशन और 2035 तक नई युद्ध संरचनाओं की योजना।

Ran Samwad 2025: इस बार सर्विंग अफसर हैं स्पीकर

जनरल चौहान ने बताया कि पहले ऐसे सेमिनारों में मुख्य वक्ता (स्पीकर) रिटायर्ड अफसर होते थे और दर्शकों में सर्विंग अफसर होते थे। लेकिन उन्होंने इस परंपरा को उलट दिया है। इस बार वर्तमान में सेवा दे रहे अधिकारी ही मुख्य वक्ता हैं, जबकि पूर्व अधिकारी अपने अनुभव साझा करेंगे। उनका मानना है कि नई पीढ़ी तकनीक और आधुनिक युद्ध पद्धतियों के प्रति ज्यादा जागरूक है और उनके विचारों को सुना जाना जजरूरी है।

सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने कहा कि भारत प्राचीन काल से ही विचारों और ज्ञान का केंद्र रहा है। उन्होंने कौटिल्य का उल्लेख करते हुए कहा कि हमारे यहां हमेशा से बौद्धिक परंपरा रही है, लेकिन भारतीय युद्धों के गहन विश्लेषण या रणनीति पर शैक्षणिक विमर्श से जुड़ा साहित्य बहुत कम उपलब्ध है। उन्होंने कहा, “युद्ध के विभिन्न आयामों, नेतृत्व, प्रेरणा, मनोबल और तकनीक पर गंभीर शोध की आवश्यकता है। भारत को सशक्त, सुरक्षित, आत्मनिर्भर और विकसित बनाना है। यह तभी संभव है जब सभी हितधारक मिलकर भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार सेनाओं के निर्माण की प्रक्रिया में सामूहिक रूप से भाग लें।”

सीडीएस चौहान ने कहा कि आज युद्ध और शांति के बीच का फर्क धुंधला हो गया है। आधुनिक युग में संकट, संघर्ष और युद्ध एक-दूसरे से जुड़ गए हैं। उन्होंने कहा कि पहले जीत का पैमाना इलाके पर कब्जा या युद्धबंदियों की संख्या होती थी, लेकिन अब जीत का अर्थ है तेज और प्रभावी कार्रवाई, मानसिक और मनोवैज्ञानिक बढ़त, और तकनीकी श्रेष्ठता।

उनके अनुसार, आज की लड़ाइयां केवल भौतिक नुकसान पर नहीं बल्कि नैरेटिव कंट्रोल पर भी निर्भर करती हैं। यही कारण है कि पारंपरिक हथियार के साथ सूचना युद्ध (information warfare) और साइबर अभियान (cyber ops) उतने ही अहम हो गए हैं।

Ran Samwad 2025: “जो सबसे तेज है वही आगे रहेगा”

सीडीएस चौहान ने कहा कि रण संवाद का उद्देश्य है भविष्य के युद्धों पर चर्चा करना। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में युद्ध का स्वरूप और तकनीकी का इस्तेमाल इतना मुश्किल हो जाएगा कि सेनाओं को हर क्षेत्र में बराबरी से तैयार रहना होगा।
उन्होंने कहा, “हम एक ऐसी दौड़ में हैं जहां जो सबसे तेज है वही आगे रहेगा। लेकिन यह दौड़ केवल रफ्तार की नहीं है, बल्कि नई तकनीकों और नए क्षेत्रों में कूदने की भी है। भारत को इस दौड़ में पीछे नहीं रहना चाहिए।”

सीडीएस चौहान ने आगे कहा, देश हमेशा शांति के पक्ष में खड़ा रहा है। “हम एक शांति-प्रिय राष्ट्र हैं, लेकिन गलती से हमें निष्क्रियतावादी (Pacifist) न समझा जाए। मेरा मानना है कि ताकत के बिना शांति केवल एक कल्पना है। एक लैटिन कहावत है, जिसका अर्थ है- यदि आप शांति चाहते हैं, तो युद्ध की तैयारी करें।”

उन्होंने आगे कहा कि भारत ने हमेशा ‘शस्त्र’ और ‘शास्त्र’ को एक साथ जोड़ा है, जो वास्तव में एक ही तलवार की दो धार हैं। शांति के लिए युद्ध लड़ना ही होगा। उन्होंने अंत में कहा कि भारतीय सेनाओं को सौ प्रतिशत तैयारी रखनी होगी क्योंकि भविष्य के युद्ध बहुआयामी होंगे और उनका स्वरूप पहले से कहीं अधिक जटिल होगा।

Ran Samwad 2025: ऑपरेशन सिंदूर से मिले सबक

सीडीएस ने अपने भाषण में मई 2025 के ऑपरेशन सिंदूर का भी उल्लेख किया। यह ऑपरेशन पहलगाम आतंकी हमले के बाद शुरू किया गया था। इसमें भारतीय सेनाओं ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकी ठिकानों और सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेनाओं ने 9 आतंकी कैंप और 13 पाकिस्तानी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया था। इसमें कम से कम 100 आतंकियों के मारे जाने की पुष्टि हुई थी। भारतीय वायुसेना ने कई हवाई अड्डों और सैन्य ठिकानों को टारगेट किया। सेना ने पाक अधिकृत कश्मीर में कई लॉन्चपैड नष्ट किए। सीडीएस ने कहा कि इस ऑपरेशन से भारतीय सेनाओं ने कई सबक लिए हैं और उनमें से अधिकांश को लागू किया जा चुका है।

मिशन सुदर्शन चक्र का जिक्र

अपने संबोधन में सीडीएस चौहान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस पर किए गए मिशन सुदर्शन चक्र के एलान का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यह भारत के पास अपना आयरन डोम जैसा एयर डिफेंस सिस्टम, जो दुश्मन के हवाई हमलों से न सिर्फ रक्षा करेगा बल्कि जवाबी कार्रवाई भी करेगा।

उन्होंने कहा कि इसके लिए भारी स्तर पर इंटीग्रेशन की जजरूरत होगी। इसमें जमीन, समुद्र, वायु, अंतरिक्ष और साइबर सभी क्षेत्रों के सेंसर और निगरानी तंत्र को जोड़ा जाएगा। रियल टाइम प्रतिक्रिया के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्वांटम कंप्यूटिंग का इस्तेमाल करना होगा।

DRDO का सफल परीक्षण

23 अगस्त को DRDO ने ओडिशा तट पर Integrated Air Defence Weapon System (IADWS) का पहला सफल परीक्षण किया था। इस स्वदेशी सिस्टम में QRSAM, VSHORADS और हाई-पावर लेज़र आधारित Directed Energy Weapon शामिल हैं। परीक्षण के दौरान तीन अलग-अलग टारगेट्स—दो हाई-स्पीड UAV और एक मल्टी-कॉप्टर ड्रोन को एक साथ नष्ट किया गया।

CDS चौहान ने कहा कि यह सिस्टम भविष्य के सुदर्शन चक्र का हिस्सा होगा। DRDO प्रमुख डॉ. समीर वी. कामत ने भी इस सफलता को ऐतिहासिक बताया था।

आकाशतीर सिस्टम की भूमिका

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने अपने स्वदेशी एयर डिफेंस नेटवर्क आकशतीर का इस्तेमाल किया था। इस सिस्टम ने पाकिस्तानी हमलों को रोकने में अहम योगदान दिया। आकसटीर ने तेजी से दुश्मन के मिसाइल और ड्रोन का पता लगाकर उन्हें निष्क्रिय किया। इसे भारतीय वायुसेना के इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS) से जोड़ा गया था।

गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, चार दिन तक चले ऑपरेशन सिंदूर ने दिखाया था कि भारत की नई एयर डिफेंस क्षमता कितनी मजबूत हो चुकी है।

Nyoma Airstrip Eastern Ladakh: PM Modi will inaugurate Neoma Airbase! BRO prepared in just seven months on China border Game Changer Runway

Nyoma Airstrip Eastern Ladakh

Nyoma Airstrip Eastern Ladakh: Mud Neyoma Airbase, being in the Neyama terrain of Eastern Ladakh, is willing to take India’s military strength to new heights. This state-of-the-art advance landing ground (as per sources)Algae Inauguration of Prime Minister Narendra Modi Tax in October 2025 Can. Genuine Control Line (LAC This airbase is at a height of 13,700 feet from the sea level, located at a distance of 30 kilometres. It will be India’s highest airbase and the fifth highest airspace in the world.

Nyoma Airstrip in Eastern Ladakh: Preparation of collision to China on the LAC, Landing on the Neoma Airstrip by October Mig-29 and Sukhoi-30 Fighter Jets

Nyoma Airstrip Eastern Ladakh: Only 7 months ago

Construction of Neoma Airbase Border Roads Organization (BRO Have done, which completed this project prematurely despite the tough geographical and seasonal challenges. The sources pointed out that the work of its runway started on 12 September 2023 and was fully prepared on 12 October 2024. Since Ladakh is completely covered with snow for six months and the way is completely closed, in such a runway is effectively prepared only in seven months. He told that the work can be done until September-October. The project was completed in mission mode. He said, "We worked day and night and did not compromise the quality even in difficult situations. ""

सूत्रों ने बताया कि भारतीय वायुसेना के तय मानकों के मुताबिक एयर स्ट्रिप बनाई गई है और थोड़ा जरूरी काम अभी बाकी है। वहीं अक्तूबर तक न्योमा एयर बेस पर फुल इमर्जेंसी लैंडिंग के लिए सभी तैयारियां और इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने का काम पूरा हो जाएगा। यह रन 2.7 किलोमीटर लंबा है और पूरी तरह से कंक्रीट से बना है।

Nyoma Airstrip Eastern Ladakh: पीएम मोदी करेंगे उद्घाटन!

सूत्रों के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस साल अक्तूबर के दूसरे हफ्ते में पूर्वी लद्दाख के रणनीतिक न्योमा एयरबेस का उद्घाटन कर सकते हैं। यह एयरबेस समुद्र तल से 13,700 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। न्योमा एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउंड का इस्तेमाल 2020 में चीन और भारत के बीच लद्दाख में हुए सीमा विवाद के दौरान बड़े पैमाने पर किया गया था। उस समय इस एयरस्ट्रिप ने भारतीय सेना के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यहां से सैनिकों और सैन्य साजोसामान तेसी से एलएसी तक पहुंचाया गया था। लेह तक हैवी लिफ्ट ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट के जरिए जवानों को लाया गया और फिर न्योमा से उन्हें ऊंचाई वाले मोर्चों तक भेजा गया। इसके लिए भारतीय वायुसेना ने सी-130 जे सुपर हरक्यूलिस और चिनूक हेलिकॉप्टर का इस्तेमाल किया था।

Nyoma Airstrip Eastern Ladakh: फाइटर जेट्स भर सकेंगे उड़ान

यह एयरबेस रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यह लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल यानी वास्तविक नियंत्रण रेखा से लगभग 25-30 किमी की दूरी पर है। और डेमचोक जैसे संवेदनशील इलाके के करीब है। डेमचोक और डेपसांग जैसे इलाके भारत और चीन के बीच तनाव की बड़ी वजह रहे हैं। 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद भारत ने एलएसी के पास अपनी सैन्य तैयारियों को तेज कर दिया है। न्योमा एयरबेस के चालू होने से भारतीय वायुसेना मिग-29 और सुखोई-30 एमकेआई जैसे फाइटर जेट्स को यहां से ऑपरेट कर सकेगी। इसके अलावा, सी-17 ग्लोबमास्टर और सी-130जे जैसे ट्रांसपोर्ट विमान भी यहां से सैनिकों, हथियारों और राशन को जल्दी पहुंचा सकेंगे।

भारतीय सेना की सप्लाई चेन में आएगा बड़ा बदलाव

न्योमा एयरबेस लद्दाख में भारत का चौथा वायुसेना अड्डा होगा। इससे पहले लेह, कारगिल और परतापुर (थॉईस) में दो फाइटर एयरफील्ड मौजूद हैं। दौलत बेग ओल्डी (DBO) में एक मिट्टी का रनवे है, जो विशेष अभियानों के लिए उपयोग होता है। फुकचे और चुशूल में भी छोटे रनवे हैं, लेकिन युद्ध जैसे हालात में इनका उपयोग सीमित है। न्योमा एयरबेस के बन जाने के बाद यह लद्दाख के डाउनहिल फ्लैट प्लेन्स (नीचे के समतल क्षेत्र) में स्थित दक्षिणी क्षेत्र का पहला वायुसेना अड्डा होगा। वहीं, न्योमा एयरबेस की खासियत यह है कि यह अपेक्षाकृत कम ऊंचाई पर स्थित है, जिससे फिक्स्ड-विंग एयरक्राफ्ट के लिए यह अधिक उपयुक्त है।

न्योमा एयरबेस के एक्टिव हो जाने के बाद भारतीय सेना की सप्लाई चेन में बड़ा बदलाव आएगा। अभी तक लेह से न्योमा तक सड़क मार्ग से लॉजिस्टिक सप्लाई पहुंचाने में छह घंटे लगते हैं, लेकिन अब दिल्ली या चंडीगढ़ से विमान सीधे यहां तक डेढ़ से दो घंटे में पहुंच सकेंगे। इसका फायदा सैनिकों, गोला-बारूद, हथियारों और मेडिकल सपोर्ट को तेजी से आगे तक पहुंचाने में मिलेगा।

माइनस 30 डिग्री तक गिर जाता है तापमान

बीआरओ के प्रोजेक्ट हिमांक के चीफ इंजीनियर ब्रिगेडियर विशाल श्रीवाास्तव ने इस उपलब्धि पर गर्व जताते हुए कहा, “हमारी टीम ने कठिन परिस्थितियों में असाधारण काम किया है। न्योमा का यह रनवे न केवल सैन्य दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह स्थानीय लोगों के लिए बेहतर कनेक्टिविटी प्रदान करेगा और आपात स्थिति में राहत सामग्री को जल्दी पहुंचाने में मदद करेगा। न्योमा के पास मुद गांव के नाम पर इस एयरबेस का नाम रखा गया है, जो इस क्षेत्र की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को भी दर्शाता है। उन्होंने बताया कि इस क्षेत्र में सर्दियों में तापमान माइनस 30 डिग्री तक गिर जाता है, और छह महीने तक सड़कें बर्फ से ढक जाती हैं। इसके बावजूद, बीआरओ ने आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करके इस एयरबेस को समय पर पूरा किया।

Nyoma Airstrip Eastern Ladakh: एयरफोर्स कर चुकी है टेस्टिंग

वहीं पिछले साल वायुसेना की एक विशेष टीम ने न्योमा रनवे का निरीक्षण भी किया था। टीम में पायलटों के साथ एयर ट्रैफिक कंट्रोलर और तकनीकी स्टाफ शामिल थे। हर पहलू की जांच के बाद रनवे को ऑपरेशनल घोषित किया गया। इसके बाद सी-130 जे सुपर हरक्यूलिस ने न्योमा Algae पर टेस्ट फ्लाइट की थी। इस ट्रायल में विमान ने रनवे के ऊपर से लो ओवरशूट किया, यानी लैंडिंग गियर खोलकर बिना टच किए रनवे के बिल्कुल नजदीक से उड़ान भरी। यह ट्रायल को एयर ट्रैफिक कंट्रोल की गाइडेंस में सफलतापूर्वक पूरा किया गया था।

बीआरओ के बजट में भारी इजाफा

2020 के गलवान संघर्ष के बाद भारत ने अपनी सीमा पर बुनियादी ढांचे के विकास को प्राथमिकता दी है। सरकार ने बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन के बजट में भी भारी इजाफा किया है। जहां 12-15 साल पहले इसका वार्षिक बजट केवल 4,000 करोड़ रुपये था, वहीं अब यह बढ़कर 18,700 करोड़ रुपये हो गया है। इस बढ़े हुए बजट का सीधा असर सीमा क्षेत्रों में नई सड़कों और एयरफील्ड्स के निर्माण में दिखाई दे रहा है। इस बढ़े हुए बजट ने सड़कों, पुलों और हवाई अड्डों के निर्माण में तेजी लाई है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हमेशा कहा है कि सरकार सीमा पर इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के लिए हर संभव मदद देगी। इसका परिणाम यह है कि भारत ने एलएसी के पास सड़कों का जाल बिछा दिया है, जिसमें हानले-चुमार रोड और सासोमा-डीबीओ रोड जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट शामिल हैं।

चुशूल-डेमचोक-फुकचे-डम रोड भी तैयार

हानले-चुमार रोड, जो 16,500 फीट की ऊंचाई पर सल्सा पास से होकर गुजरती है, अब हानले से चुमार तक की दूरी को छह घंटे से घटाकर केवल एक घंटे 45 मिनट तक रह गई है। इसी तरह, चुशूल-डेमचोक-फुकचे-डम रोड (CDFD) एलएसी के समानांतर चलती है और डेमचोक जैसे संवेदनशील क्षेत्रों तक तेजी से पहुंच मिलती है। सूत्रों ने बताया कि यह सड़क 14,000 से 15,000 फीट की ऊंचाई पर बनाई गई है, जहां तापमान माइनस 35 डिग्री तक गिर जाता है। उन्होंने कहा, “हमने कई चुनौतियों का सामना किया, लेकिन इस सड़क को समय पर पूरा करना हमारी प्राथमिकता थी।”

गेम-चेंजर साबित होगा न्योमा एयरबेस

न्योमा एयरबेस का निर्माण भारत की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत वह LAC पर चीन की सैन्य तैनाती का मुकाबला करने के लिए तैयार है। चीन ने अपनी तरफ 3,488 किलोमीटर लंबी सीमा पर कई अग्रिम हवाई अड्डे विकसित किए हैं। अप्रैल 2020 में चीनी सेना की भारी तैनाती को देखते हुए भारत ने भी अपनी तैयारियों को तेज किया। न्योमा एयरबेस के चालू होने से भारत को तेजी से सैन्य उपकरण और सैनिकों को तैनात करने की क्षमता मिलेगी, जो युद्ध की स्थिति में गेम-चेंजर साबित हो सकता है।

AMCA Engine Deal: The first time India will find the owner of the fighter jet engine, will be made of agreement with France Dual Engine Ecosystem

India-France AMCA Engine Deal indigenous fighter jet

AMCA Engine Deal: एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी AMCA के इंजन को लेकर भारत और फ्रांस के बीच हुई नई रक्षा साझेदारी को देश की डिफेंस हिस्ट्री में सबसे बड़ा मोड़ माना जा रहा है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हाल ही में घोषणा की कि भारत का पहला पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान अब अपने इंजन के साथ पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक पर खड़ा होगा। इस प्रोजेक्ट के तहत भारत और फ्रांस की राफेल का इंजन बनाने वाली कंपनी सफरान मिलकर नया स्वदेशी इंजन बनाएंगे। लेकिन इस बार सबसे बड़ी खासियत यह है कि इस इंजन का मालिकाना हक यानी बौद्धिक संपदा अधिकार (IP Ownership) भारत के पास होगी।

AMCA jet engine: India-France will consist of Fifth generation indigenous engine, Rajnath Singh’s big allan, with Rafale’s company Travelling Partnership

AMCA Engine Deal: क्या कहा पीएम मोदी और रक्षा मंत्री ने

हाल ही में 15 अगस्त को लाल किला के प्राचीर से प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था, “आज मैं युवा वैज्ञानिकों, प्रतिभाशाली युवाओं, इंजीनियरों, पेशेवरों और सरकार के सभी विभागों से आग्रह करता हूं कि हमारे पास अपने स्वयं के मेड इन इंडिया लड़ाकू विमानों के लिए जेट इंजन होने चाहिए।

वहीं उसके बाद 22 अगस्त को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एलान किया, “आज हम पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान बनाने की दिशा में भी आगे कदम बढ़ा चुके हैं। हम एयरक्राफ्ट का इंजन भी भारत में ही बनाने की तरफ बढ़ चुके हैं। हम लोग फ्रेंच कंपनी सफरान के साथ इंजन मेकिंग का काम भारत में शुरू करने जा रहे हैं।”

AMCA Engine Deal: 100 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर

अब तक भारत जिन लड़ाकू विमानों का निर्माण कर रहा था, उनके लिए विदेशी इंजन पर निर्भर रहना पड़ता था। तेजस विमान में इस्तेमाल होने वाले इंजन अमेरिका की जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी से खरीदे जाते हैं। वहीं रूस से मिले मिग और सुखोई के इंजन भी वर्षों से भारतीय वायुसेना की रीढ़ बने हुए हैं। लेकिन इस बार भारत सिर्फ इंजन (AMCA Engine Deal) बनाएगा ही नहीं बल्कि उसका मालिक भी होगा। यह पहली बार होगा जब भारत के पास दुनिया के सबसे एडवांस्ड जेट इंजनों में से एक का IP होगा। यह ऐसा अधिकार है जो आज तक भारत को किसी भी रक्षा सौदे में नहीं मिला है। सफरान के साथ इंजन डील में 100 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, भारत का IP राइट्स पर पूरा मालिकाना हक़, और AMCA के लिए हाई-थ्रस्ट इंजन का डेवलपमेंट शामिल है।

इस साझेदारी में सफरान और भारत की हिंदुस्तान एयरनॉटिक्स लिमिटेड मुख्य भूमिका निभाएगी। इसके साथ ही डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन का गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट (GTRE) भी इस प्रोजेक्ट में शामिल होगा।

AMCA Engine Deal: इंजन तकनीक में भारत की सबसे बड़ी छलांग

24 टन कैटेगरी वाले एएमसीए प्रोजेक्ट (AMCA Engine Deal) को भारत के सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स में गिना जा रहा है। यह एक स्टील्थ यानी अदृश्य क्षमता वाला लड़ाकू विमान होगा, जिसमें दो इंजन होंगे। स्टील्थ होने की वजह से इसे रडार पर पकड़ना बेहद मुश्किल होगा। लेकिन ऐसे विमानों की असली ताकत उनके इंजन में छुपी होती है। अब तक भारत अपनी लड़ाकू विमानों के लिए खुद का इंजन नहीं बना पाया था। कई बार कोशिशें हुईं, डीआरडीओ ने कावेरी भी बनाया, लेकिन तकनीकी बाधाओं, खासकर थ्रस्ट-टू-वेट रेश्यो जैसी दिक्कतों के चलते इंजन डेवलप नहीं हो पाया।

यही वजह है कि सफरान के साथ हुआ यह करार केवल एक तकनीकी सहयोग नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक स्थिति को भी मजबूत करेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि जब भारत को इंजन के डिजाइन, निर्माण और उत्पादन की पूरी तकनीक मिल जाएगी और उसके सारे अधिकार भारत के पास होंगे, तो यह आत्मनिर्भर भारत अभियान के सबसे बड़े मील के पत्थरों में गिना जाएगा।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह डील भारत के “मेक इन इंडिया” पहल को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगी। इसके लिए भारत में एक पूरी इंजन बनाने की व्यवस्था तैयार की जाएगी, जिसमें निजी कंपनियों को भी मौका मिलेगा। इससे नौकरियों का सृजन होगा और देश की अर्थव्यवस्था को भी फायदा पहुंचेगा।”

वहीं इसका सीधा असर भारत के डिफेंस एक्सपोर्ट्स पर पड़ेगा क्योंकि भविष्य में भारत इस इंजन को अन्य देशों को बेच भी सकता है, और यह सिर्फ अपने विमानों में इस्तेमाल करने तक सीमित नहीं रहेगा।

AMCA Engine Deal: पहली बार डुअल इंजन इकोसिस्टम

स्वदेशी लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट तेजस (AMCA Engine Deal) के लिए अभी तक भारत सिर्फ अमेरिकी जनरल इलेक्ट्रिक के इंजनों पर निर्भर था। तेजस एमके-2 और नौसेना के ट्विन-इंजन डेक-बेस्ड (TEDBF) नेवी फाइटर के लिए जीई का F414 इंजन इस्तेमाल किया जाना है। लेकिन अब सफरान के साथ मिलकर एएमसीए के लिए नया इंजन तैयार किया जाएगा। इसका मतलब है कि भारत के पास पहली बार एक साथ दो इंजन इकोसिस्टम होंगे।

सफरान पहले से ही राफेल इंजन (M88) और हेलिकॉप्टर इंजनों में भारत का पार्टनर है। इस डील के बाद भारत के दो अलग-अलग इंजन इकोसिस्टम तेजस/एएमसीए (सफरान वाला) और GE F414 (तेजस एमके2) एकसाथ तैयार हो रहे हैं। यह डुअल इंजन इकोसिस्टम भारत को दुनिया के चुनिंदा देशों की श्रेणी में खड़ा करेगा जहां एक साथ पश्चिमी और स्वदेशी इंजन प्रोग्राम समानांतर रूप से आगे बढ़ेंगे।

AMCA Engine Deal: सफरान और जीई में कॉम्पिटिशन?

जीई के साथ तेजस एमके-2 के लिए F414 इंजन देने के लेकर बातचीत चल रही है। जिन्हें एचएएल और जीई दोनों कंपनियां मिल कर भारत में बनाएंगी। हालांकि हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स और जीई ने भारत में 98 किलोन्यूटन थ्रस्ट कैटेगरी में जीई-एफ414 इंजन के को-प्रोडक्शन के लिए अभी तक अंतिम सौदा नहीं हुआ है, जिसमें लगभग 1.5 बिलियन डॉलर में 80 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर होगा।

खास बात यह होगी कि सफरान (AMCA Engine Deal) का 120 किलोन्यूटन (kN) थ्रस्ट वाला इंजन होगा जबकि जीई का F414 इंजन 98 किलोन्यूटन थ्रस्ट का होगा। सफरान का इंजन AMCA के दूसरे चरण (Mk-2) के लिए डिजाइन किया जाएगा। इस इंजन का विकास 10 साल में पूरा होने की उम्मीद है, और यह पूरी तरह से नई डिज़ाइन पर आधारित होगा, जो राफेल के M88 इंजन से अलग होगा। यह इंजन AMCA को सुपरक्रूज और बेहतर थ्रस्ट-टू-वेट रेश्यो देगा।

जीई का F414 इंजन तेजस मार्क-2 और AMCA के पहले चरण (Mk-1) के लिए चुना गया है। यह इंजन एफ/ए-18 सुपर हॉर्नेट में इस्तेमाल होता है। जीई ने भारत को 80 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की सहमति दी है, जिसमें सिंगल क्रिस्टल ब्लेड और सेरामिक मैट्रिक्स कॉम्पोनेंट्स जैसे महत्वपूर्ण तकनीकी पहलू शामिल हैं। हालांकि, इस डील में कुछ संवेदनशील तकनीकों तक पहुंच नहीं है, जिसमें अमेरिकी निर्यात नियमों (ITAR) आड़े आ रहे हैं।

मौजूदा समय-सीमा के अनुसार, अपेक्षित थ्रस्ट-टू-वेट रेश्यो, एडवांस सेंसर फ्यूजन और इंटरनल वेपन बे और “सर्पेंट-टाइन एयर-इन्टेक” जैसी स्टील्थ सुविधाओं के साथ AMCA 2035 तक ही प्रोडक्शन के लिए तैयार हो पाएगा।

बता दें कि भारतीय वायुसेना ने एएमसीए के सात स्क्वाड्रन (126 जेट) शामिल करने की योजना बनाई है, जिनमें से पहले दो स्क्वाड्रन अमेरिकी जीई-एफ414 इंजन से ऑपरेट होंगे और अगले पांच स्क्वाड्रन 120 किलोन्यूटन इंजन से ऑपरेट होंगे।

सिर्फ डिफेंस नहीं, स्पेस और सिविल एविएशन पर भी असर

सफरान (AMCA Engine Deal) सिर्फ लड़ाकू विमान इंजन बनाने वाली कंपनी नहीं है। वह स्पेस प्रोप्ल और सिविल एविएशन सेक्टर में भी अग्रणी है। कंपनी पहले से ही इसरो के साथ कई प्रोजेक्ट्स में सहयोग कर चुकी है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि एएमसीए इंजन प्रोजेक्ट का असर भविष्य में भारत के स्पेस प्रोग्राम और डोमेस्टिक पैसेंजर्स एयरक्राफ्ट के विकास पर भी पड़ेगा।

इसका मतलब है कि भारत सिर्फ लड़ाकू विमान इंजन बनाने तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि आने वाले सालों में सिविल एयरक्राफ्ट और स्पेस एयरक्राफ्ट के लिए भी एडवांस इंजन डेवलप कर सकेगा।

फ्रांस क्यों हुआ तैयार?

अब सवाल उठता है कि फ्रांस ने इतनी संवेदनशील तकनीक (AMCA Engine Deal) भारत के साथ साझा करने का फैसला क्यों लिया। रक्षा मामलों के जानकारों का कहना है, फ्रांस भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन का सबसे बड़ा संतुलनकारी साझेदार मानता है। चीन की बढ़ती ताकत को रोकने के लिए पेरिस और नई दिल्ली के बीच रणनीतिक सहयोग लगातार बढ़ रहा है। यही वजह है कि पेरिस ने भारत को सिर्फ ग्राहक मानने के बजाय एक असली साझेदार का दर्जा दिया है। पहले राफेल डील और अब AMCA इंजन डीलके जरिए फ्रांस, भारत को इंडो-पैसिफिक में चीन को बैलेंस करने वाले देश के रूप में देख रहा है।

प्रधानमंत्री कार्यालय की सीधी नजर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने पिछले एक दशक में रक्षा उत्पादन पर लगातार ध्यान दिया है। तेजस विमान की भारी संख्या में खरीद, प्रचंड हेलिकॉप्टरों का बेड़ा, और ब्रह्मोस जैसी मिसाइलों के निर्यात ने भारत को रक्षा उत्पादन में नया आत्मविश्वास दिया है। अब एएमसीए इंजन प्रोजेक्ट में मिली यह सफलता प्रधानमंत्री कार्यालय की सीधी निगरानी में आगे बढ़ रही है। यही कारण है कि पिछले महीने प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव पीके मिश्रा ने भी एचएएल की सुविधाओं का दौरा किया और तेजस प्रोजेक्ट की स्थिति का जायजा लिया।

584 अरब का प्रोजेक्ट, खुलेंगी निर्यात की संभावनाएं

सूत्रों का कहना है कि इस प्रोजेक्ट की लागत करीब सात बिलियन डॉलर यानी 584 अरब रुपये के आसपास मानी जा रही है। इस लागत में इंजन का डिजाइन, परीक्षण, उत्पादन और पूरी सप्लाई चेन शामिल होगी। लेकिन इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि एक बार तकनीक भारत के पास आने के बाद देश स्वतंत्र रूप से इसका इस्तेमाल कर सकेगा। भारत चाहे तो भविष्य में इस इंजन को निर्यात भी कर सकेगा। अभी तक भारत हथियार और मिसाइलें निर्यात कर रहा था, लेकिन इंजन जैसे हाई-टेक सिस्टम का निर्यात एक नए युग की शुरुआत होगी।

भारत ने पिछले एक दशक में रक्षा निर्यात के क्षेत्र में जबरदस्त प्रगति की है। 2013-14 में जहां यह आंकड़ा सिर्फ 686 करोड़ रुपये था, वहीं 2024-25 में यह 23,000 करोड़ रुपये से भी ऊपर पहुंच गया। सरकार ने 2029 तक इसे 50,000 करोड़ तक ले जाने का लक्ष्य रखा है।

Agni-5 IRBM: Why the government told Fire-5 Missile Intermediate Range Missile, Multiple Warhead technology in how the enemy will dodge, Read Explaner

Agni-5 IRBM: Why the Government Calls It An Intermediate-Range Missile & © Copyright 2017 - All Rights Reserved. Ministry of Federal Affairs and Local Development (MoFALD). | Explainer

Agni-5 IRBM: India has successfully tested Fire-5 from the Integrated Test Range of Odisha Silverpur based on 20 August 2025. The missile successfully completed all operational and technical standards in this test. This missile is made by DRDO. This missile is a ballistic missile killing the ground from the ground which ranges over 5000 kilometres.

This test is especially because it happened in the last year after the first successful test of fire-5 with multiple Independent Target Re-entry Vehicle (MIRV) technology under the Mission Divyastra in March 2024. This technology included India in the list of select countries that have the ability to target multiple targets from a missile. But what is MIRV technology? Why is the government now calling the Intermediate Range Ballistic Missile (IRBM), while earlier it was called Intercontinental Ballistic Missile (ICBM)? Let's understand it in simple language.

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Agni-5 IRBM: What the government said in its statement

The Government of India has now officially placed the Fire-5 Missile (Agni-5 IRBM) in the category of IRBM. Fire-5 is also called IRBM in the press release released on behalf of the Government on August 20. There are many strategic ways of this change. The biggest reason could be that India wants to show itself as a different nation internationally and the ICBM tag puts directly into the league of nuclear powers.

The Ministry of Defence said that this test successfully validated all operational and technical parameters of the missile. This test was monitored by Stratgeic Forces Command (SFC), which is an important part of India’s Atomic Weapons delivery system. This missile is so fast that it is almost impossible to stop after the launch. Once the target is set it does not stop without destroying its goal.

Agni-5 IRBM: Equipped with Canister-Launch System

Fire-5 Missile (Agni-5 IRBM) has been developed under Integrated Missile Development Programme (IGMDP) launched in 1983. This missile weighs 50 tons and is 17 meters long, the thickness of which is about 2 meters. It can carry weapons up to 1,500 kg and is able to kill the ground from the ground. Its speed is 24 times faster than the speed of sound, i.e. it can move from the speed of Mac 24 to the target. It is typical that it can be easily transported on the road, as it is equipped with a canister-launch system. This means that the missile can be transported anywhere by placing in a special container, making it easy to deploy and hide.

Agni-5 IRBM: IRBM Verses ICBM

The first test of Fire-5 (Agni-5 IRBM) took place in 2012, and has been tested several times since then. Earlier it was called ICBM, as its range was more than 5,000 km, most of the cities in China come to the northern and eastern part, especially. But now the government is presenting it as an IRBM. IRBM i.e. intermediate range of ballistic missiles ranges from 3,000 to 5,500 kilometres, while the range of ICBM i.e. intercontinental ballistic missiles exceeds 5,500 kilometres. Some experts believe that the actual range of fire-5 can be up to 7,000 km after losing weight. In 2022, DRDO claimed to reduce the weight of the missile by 20 per cent, increasing its range to more than 7,000 km. Yet, the government is officially saying IRBM.

Agni-5 IRBM: MIRV Technology in Fire-5

MIRV Technology has been used in Fire-5 (Agni-5 IRBM). MIRV means Multiple Independent Target Re-entry Vehicle. This is a technology in which a missile can carry several nuclear weapons, and each weapon can be programmed for targeting different targets. These targets can be hundreds of kilometers away. For example, a fire-5 missile can take three to four nuclear weapons, and each can be left in different speeds and direction. Some experts say that this missile can also take 10-12 weapons. The specialty of this technique is that it can also dodge the enemy missile defense systems. MIRV-Lace missiles can also carry decoy i.e. fake weapons that confuse the enemy radar, making it difficult to prevent real weapons.

Agni-5 IRBM: Why MIRV Capacity

MIRV technology is not easy to develop. It requires small size of arms (miniatureization), light weight re-entry vehicle, and precise navigation systems. The sensor packages with indigenous avionics systems and more accuracy have been installed in fire-5, so that the arms hit their targets. The first successful test of this technique took place on 11 March 2024 under the Mission Divyastra, which DRDO launched from Dr. A.P.J Abdul Kalam Island in Odisha. This test was monitored by various telemetry and radar stations, and the missile completed all the scheduled parameters. Prime Minister Narendra Modi and Defence Minister Rajnath Singh appreciated the achievement of DRDO scientists.

Why is this technique important in India’s defence strategy? India’s nuclear policy is based on ‘no-first-use’ (not attacking earlier) and credible minimum distance. This means that India won’t attack the first nuclear, but if a country strikes nuclear on India, India will respond to its agreement. MIRV technology enhances this responsive ability, as a missile can destroy many goals. China already has a missile defense system like Hongki (HQ-19), MIRV technology helps India maintain strategic balance. China has put MIRV technology in some of its DF-5 missiles.

Fire-5 (Agni-5 IRBM) is specially designed to take into account the challenges that China meets. India’s second missiles, such as fire-1, fire-2, and fire-3, were created mainly by the threat of Pakistan. But the range of fire-5 enables it to reach the whole Asia, especially the northern and eastern parts of China, and parts of Europe. The first phase of the missile is taken from fire-3, while the composite material has been used to lighten the second and third phase. It becomes difficult from MIRV because the enemy does not know which is the real warhead and which direction will go. Real warheads are also left with multiple dummy warheads. This can break the enemy protection armor.

Continued Notm

The notum (Notice to Airman) was also released in the Gulf of Bengal for testing 20 August 2025, which informs aviation and marine traffic under international regulations. This test was monitored by scientists from Indian Navy ships and DRDO, who were deployed in many places in the Southern Indian Ocean.

MIRV Technology Near Five Countries

The MIRV technology was introduced by the US in the 1960s, when he used this technology in Minmann-III missile in 1970 and Posden missile in 1971. Today, US, Russia, China, France, and UK have this technology. Pakistan had also tested the MIRV technology in its Ababil missile in 2017, however the questions of its reliability have arisen.

Ring laser gyroscope and accelerometer have been used in the navigation and guidance system of fire-5. The missile is constructed from carbon composite material, which makes it lighter and enables to bear high temperature during re-enterance in the atmosphere. The formula explains that fire-5 also equipped with anti-satelite (ASAT) capacity. India had shown its ASAT capacity by destroying a satellite at a height of 300 km under the mission power in 2019. Experts say Fire-5 can be able to reach a height of 800 km, which can also be useful in destroying satellites.

Fire-5 (Agni-5 IRBM) is also part of India’s nuclear triangular capacity, including the ability to stain nuclear weapons from land, air, and sea. India had completed this triangle with the first diterence patrol of INS Arimant Submarine in 2018. The missile also strengthens India’s "Seconda Strike Capability", i.e. if India has nuclear attack, the respondent attack can be even more effective.

General Level Mechanism: Why China’s Foreign Minister Wang Yi and NSA Ajit Dowal made this new mechanism, how different from SHMC and WMCC, Read Explaner

shmc-wmcc differences 2025
National Security Adviser Ajit Doval was held in New Delhi.

General Level Mechanism: The discussion between India and China continues for the last several years to resolve the border dispute. On 19th August 2025, special representatives from both countries in New Delhi held 24th talks between China Foreign Minister Wang Yi and India Security Advisor Ajit Dowal. During this time, both countries took several important decisions to maintain peace on the border, increase business and strengthen mutual trust. But this time after the 24th round special representative negotiations that the consent has been revealed, it is already being considered different and significant. India and China for the first time in this meeting also "General Level Mechanism" (General Level Mechanism decided to make. But what is this mechanism? It already exists SHMC and WMCC How to distinguish from? Let's understand it in easy language.

India-China Border Dispute: Why did not change the real limits to today LAC? Why did 200-year-old nails entangle?

What is General Level Mechanism

Actually this mechanism (General Level Mechanism सैन्य स्तर पर होने वाली कोर कमांडर स्तर की बैठकें हैं। 2020 के गलवान संघर्ष के बाद जब एलएसी (लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल) पर स्थिति बेहद तनावपूर्ण हो गई थी, तब पहली बार कोर कमांडर स्तर पर बैठकों का सिलसिला शुरू किया गया। इसका मकसद यह था कि दोनों देशों की सेनाओं के सीनियर अफसर सीधे बातचीत कर सकें और किसी भी विवाद या गतिरोध को बातचीत से सुलझाने का रास्ता निकाल सकें। 2020 में गलवान के बाद दोनों देशों ने फैसला किया कि छोटे स्तर के अधिकारियों की बजाय कोर कमांडर स्तर पर बातचीत होगी ताकि बड़े विवादों को जल्दी सुलझाया जा सके। भारतीय सेना की 14वीं कोर, जो पूर्वी लद्दाख की जिम्मेदारी देखती है, इस मैकेनिज्म का हिस्सा रही है।

अब यह व्यवस्था सिर्फ पश्चिमी सेक्टर यानी लद्दाख तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के इलाकों में भी लागू होगी। इसका मतलब यह है कि भविष्य में अगर किसी भी तरह की टकराव की स्थिति पूर्वी या मध्य सेक्टर में पैदा होती है, तो उसे भी कोर कमांडर स्तर पर सुलझाने की कोशिश होगी।

कहां-कहां है तनाव और क्या है मौजूदा स्थिति

भारत और चीन के बीच 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC पर विवाद तीन प्रमुख इलाकों पश्चिमी, मध्य, और पूर्वी में फैला है। इन इलाकों में दोनों देशों की अलग-अलग दावेदारी और एलएसी की अस्पष्ट के चलते बार-बार तनाव पैदा होता है। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद का आधार एलएसी है, जो दोनों देशों के बीच एक अस्थायी सीमा रेखा है। इस रेखा की कोई औपचारिक परिभाषा नहीं है, और दोनों देश इसे अलग-अलग नजरिए से देखते हैं। इसी के चलते दोनों देशों के सैनिकों की गश्त के दौरान टकराव आम है। एलएसी को तीन क्षेत्रों में बांटा गया है, पश्चिमी क्षेत्र (लद्दाख और अक्साई चिन), मध्य क्षेत्र (हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड), और पूर्वी क्षेत्र (अरुणाचल प्रदेश)।

पश्चिमी क्षेत्र, यानी लद्दाख और अक्साई चिन, इस विवाद का सबसे संवेदनशील हिस्सा है। भारत का दावा है कि 1865 में बनाई गई जॉनसन लाइन के अनुसार अक्साई चिन लद्दाख का हिस्सा है। यह इलाका करीब 38,000 वर्ग किलोमीटर का है और भारत इसे अपना मानता है। दूसरी ओर, चीन 1899 की मैकार्टनी-मैकडोनाल्ड लाइन को मानता है, जिसके अनुसार अक्साई चिन उसके शिनजियांग प्रांत का हिस्सा है। हकीकत यह है कि 1950 के दशक से अक्साई चिन पर चीन का नियंत्रण है। उसने यहां G219 राजमार्ग बनाया, जो उसके शिनजियांग और तिब्बत क्षेत्र को जोड़ता है।

मध्य क्षेत्र, यानी हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में सीमा विवाद अपेक्षाकृत कम है। यह एलएसी का सबसे छोटा हिस्सा है, जहां बाराहोती और नेलांग घाटी को लेकर विवाद है। इन इलाकों पर भारत का नियंत्रण है, लेकिन दोनों देशों की सेनाएं समय-समय पर गश्त करती हैं। इस क्षेत्र में तनाव लद्दाख या अरुणाचल की तुलना में कम हैं। फिर भी, छोटे-मोटे विवादों को सुलझाने के लिए स्थानीय स्तर पर बातचीत होती रहती है।

पूर्वी क्षेत्र, यानी अरुणाचल प्रदेश की बात करें, तो यहां लद्दाख के बाद सबसे ज्यादा तनाव है। भारत 1914 की शिमला संधि में बनी मैकमोहन लाइन को मान्यता देता है, जिसके अनुसार अरुणाचल प्रदेश भारत का हिस्सा है। यह क्षेत्र करीब 90,000 वर्ग किलोमीटर में फैला है और भारत इसे अपना पूर्ण राज्य मानता है। लेकिन चीन इस रेखा को “साम्राज्यवादी” बताकर खारिज करता है और अरुणाचल को “दक्षिण तिब्बत” के रूप में दावा करता है। यहां दोनों देशों की सेनाएं गश्त करती हैं, और कई बार टकराव की स्थिति बनती है। अरुणाचल में भारत ने सैन्य और बॉर्डर इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया है, जबकि चीन ने भी अपनी तरफ सैन्य ठिकानों और सड़कों का जाल बिछाया है।

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External Affairs Minister S Jaishankar emphasized that maintaining peace and tranquility along the India-China border is fundamental to improving bilateral relations (Photo: MEA)

What is SHMC?

भारत-चीन सीमा विवाद को सुलझाने के लिए पहले से दो सिस्टम काम कर रहे हैं। पहला है SHMC यानी सीनियर हाईएस्ट मिलिट्री कमांडर लेवल मीटिंग, जिसे साधारण भाषा में कोर कमांडर स्तर की बैठक कहा जाता है। यह व्यवस्था 2020 में गलवान झड़प के बाद शुरू हुई थी। 2020 से पहले एलएसी पर विवाद सुलझाने के लिए कर्नल या ब्रिगेडियर स्तर के अधिकारी बातचीत करते थे। लेकिन गलवान के बाद यह साफ हो गया कि बड़े विवादों को सुलझाने के लिए उच्च स्तर की बातचीत जरूरी है। इसलिए SHMC बनाया गया, जिसमें कोर कमांडर शामिल होते हैं। नया जनरल लेवल मैकेनिज्म SHMC का ही विस्तार है, लेकिन अब इसे पूरे LAC पर लागू किया जाएगा, न कि सिर्फ पूर्वी लद्दाख में।

WMCC के बारे में जानें?

So, WMCC यानी मैकेनिज्म फॉर कंसल्टेशन एंड कोऑर्डिनेशन ऑन इंडिया-चाइना बॉर्डर अफेयर्स। यह एक डिप्लोमैटिक-मिलिट्री स्ट्रक्चर है, जिसमें दोनों देशों के विदेश मंत्रालय और सेना के अधिकारी शामिल होते हैं। WMCC की शुरुआत 2012 में हुई थी और इसका मकसद सीमा प्रबंधन के लिए नियमित संवाद बनाए रखना है। 1960 में दोनों देशों के बीच सीमा विवाद सुलझाने की कोशिश हुईं, लेकिन बातचीत नाकाम रही। 1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की चीन यात्रा के बाद जॉइंट वर्किंग ग्रुप बनाया गया। 1993 और 1996 में एलएसी पर शांति बनाए रखने के लिए समझौते हुए। 2003 में स्पेशल रिप्रजेंटेटिव सिस्टम शुरू हुआ, और 2005 में सीमा विवाद के हल के लिए मार्गदर्शक सिद्धांतों पर दस्तखत हुए। 2012 में WMCC बनाया गया, जो डिप्लोमैटिक लेवल पर बॉर्ड मैनेजमेंट का काम करता है। WMCC में सीमा से जुड़े बड़े नीतिगत फैसले लिए जाते हैं, जैसे कि तनाव कम करने की रणनीति बनाना या सीमा पर व्यापार और सहयोग बढ़ाने के तरीके तलाशना।

24वीं विशेष प्रतिनिधि वार्ता में WMCC के तहत दो नए समूह बनाने का फैसला हुआ। पहला है एक्सपर्ट ग्रुप, जो सीमा पर परिसीमन यानी बॉर्डर डिलिमिटेशन की संभावनाओं पर काम करेगा। दूसरा है वर्किंग ग्रुप, जो बॉर्डर मैनेजमेंट को और प्रभावी बनाने के लिए रणनीतियां तैयार करेगा। ये दोनों समूह WMCC के तहत काम करेंगे और डिप्लोमैटिक लेवल पर सीमा विवाद को सुलझाने में मदद करेंगे।

क्या SHMC का विस्तार है General Level Mechanism

हालांकि यह बात सही कि इतने मैकेनिज्म होने के बावजूद अभी तक एलएसी का कोई अंतिम परिसीमन या सीमा निर्धारण नहीं हुआ है। लेकिन उम्मीद जताई जा रही है कि भारत और चीन के बीच यह नया जनरल लेवल मैकेनिज्म (General Level Mechanism एलएसी पर शांति और स्थिरता बनाए रखने में अहम भूमिका निभा सकता है। सही मायने में कहा जाए तो जनरल लेवल मैकेनिज्म (General Level Mechanism दरअसल SHMC का ही विस्तार है, जो मिलिट्री लेवल पर काम करता है, और अब इसे पूर्वी और मध्य सेक्टर तक विस्तारित किया जा रहा है। यह न सिर्फ सैन्य अधिकारियों के बीच सीधी बातचीत को बढ़ाएगा, बल्कि इससे तनावपूर्ण स्थितियों का समाधान तेजी से निकाला जा सकेगा। जबकि WMCC डिप्लोमैटिक लेवल स्तर पर सीमा विवाद को सुलझाने का काम करता है। दोनों सिस्टम एक-दूसरे के पूरक हैं और मिलकर सीमा पर तनाव कम करने में मदद करेंगे।

बता दें कि सिक्किम में भारतीय सेना की जिम्मेदारी 33 कोर के पास है, जबकि अरुणाचल प्रदेश में 3 कोर और 4 कोर तैनात हैं। इन दोनों सेक्टरों में जनरल-लेवल मैकेनिज्म का उद्देश्य यह है कि अगर सीमा पर कोई विवाद पैदा होता है और वह जूनियर अफसरों की बातचीत से हल नहीं हो पाता, तो उसे कोर कमांडर स्तर की बातचीत में सुलझाने की कोशिश की जाए। पूर्वी लद्दाख के अनुभवों से यह साफ हुआ है कि सीनियर मिलिट्री कमांडर स्तर की वार्ताओं ने ही गतिरोध कम करने का रास्ता बनाया। यही वजह है कि भारत और चीन दोनों के स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव्स ने जनरल लेवल मैकेनिज्म को लेकर सहमति जताई।

वार्ता में बनी और भी सहमतियां

19 अगस्त 2025 को नई दिल्ली में हुई स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव स्तर की इस बैठक में दोनों देशों ने सीमा प्रबंधन और सीमा विवाद को लेकर कुल दस बिंदुओं पर सहमति जताई। जिसमें तीन पारंपरिक व्यापारिक बाजारों को फिर से खोलने का फैसला हुआ। ये बाजार हैं रेनक्विंगगांग-चांगगु, पुलान-गुंजी और जिउबा-नामग्या। ये ट्रेडिंग पॉइंट्स एलएसी के पास हैं और इनके खुलने से दोनों देशों के बीच व्यापार और आपसी संपर्क बढ़ेगा। साथ ही, दोनों देशों ने सीधी उड़ान सेवाएं शुरू करने और पर्यटकों, कारोबारियों और मीडिया के लिए वीजा प्रक्रिया को आसान बनाने पर सहमति जताई। वहीं, खास बात यह रही कि विशेष प्रतिनिधि वार्ता में दोनों देशों ने 2026 में चीन में 25वें दौर की वार्ता आयोजित करने पर भी सहमति जताई।

सीमा पार नदियों पर सहयोग भी एक अहम मुद्दा रहा। भारत ने यार्लंग त्सांगपो यानी ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन द्वारा बनाए जा रहे विशाल बांध को लेकर चिंता जताई। इस बांध का असर भारत के निचले तटवर्ती राज्यों पर पड़ सकता है। चीन ने आपात स्थिति में हाइड्रोलॉजिकल डाटा साझा करने का वादा किया, जो मानवीय आधार पर लिया गया फैसला है। दोनों देशों ने इस मुद्दे पर पहले से मौजूद एक्सपर्ट लेवल सिस्टम को और मजबूत करने का फैसला किया।

वहीं, आतंकवाद का मुद्दा भी इस बैठक में उठा। भारत ने सीमा पार आतंकवाद सहित हर तरह के आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख अपनाया। विदेश मंत्रालय ने साफ किया कि शंघाई सहयोग संगठन (SCO) का एक मूल उद्देश्य आतंकवाद से लड़ना है। भारत ने चीन से इस दिशा में और सहयोग की उम्मीद जताई।