📍नई दिल्ली | 12 Feb, 2026, 2:53 PM
DAC Meeting: देश की रक्षा तैयारियों को मजबूत करने के लिए रक्षा अधिग्रहण परिषद यानी डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) की गुरुवार को अहम बठक हुई। इस बैठक में कई बड़े फैसले लिए गए। इन प्रस्तावों की कुल अनुमानित कीमत लगभग 3.60 लाख करोड़ रुपये है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में भारतीय वायुसेना के लिए 114 मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (एमआरएफए) खरीद कार्यक्रम को “एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी” यानी एओएन दी गई। इसके साथ ही भारतीय नौसेना के लिए 6 अतिरिक्त पी-8आई मैरिटाइम पेट्रोल एयरक्राफ्ट खरीदने के प्रस्ताव को भी मंजूरी मिल गई। इसके अलावा फ्रांस से बड़ी संख्या में स्कैल्प क्रूज मिसाइल खरीदने का फैसला भी किया गया है। साथ ही, डीएसी ने हाई-एल्टीट्यूड प्लेटफॉर्म सिस्टम यानी हैप्स विमान के लिए लगभग 15,000 करोड़ रुपये के प्रस्ताव को एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी (एओएन) दी है।
इसके बाद इस खरीद को अंतिम मंजूरी कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) से ली जाएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अध्यक्षता में होने वाली सीसीएस की बैठक शुक्रवार को होने की संभावना है। (DAC Meeting)
DAC Meeting: क्या है डीएसी है और एओएन का मतलब
डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल रक्षा मंत्रालय की सर्वोच्च खरीद का फैसला लेने वाली बॉडी है। सेना, नौसेना और वायुसेना के लिए होने वाली बड़ी पूंजीगत खरीद का पहला औपचारिक कदम इसी परिषद से गुजरता है।
जब किसी प्रस्ताव को “एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी” यानी एओएन मिलती है, तो इसका मतलब होता है कि सैद्धांतिक रूप से सरकार मान चुकी है कि यह खरीद जरूरी है। इसके बाद टेक्निकल इवैल्यूएशन, कमर्शियल निगोशिएशन और अंत में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) से अंतिम मंजूरी ली जाती है। यानी एओएन मिलना बहुत बड़ा और अहम चरण माना जाता है। (DAC Meeting)
#DAC gives green signal to the much-awaited #MRFA deal 🚨
Acceptance of Necessity (AON) has now been granted — a major step forward for the Indian Air Force’s long-pending fighter modernisation.
The #Rafale journey has seen nearly 25 years of delays, debates, policy shifts and… pic.twitter.com/Krsz4YYifE— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) February 12, 2026
3.25 लाख करोड़ रुपये में 114 राफेल की मेगा डील
एमआरएफए कार्यक्रम के तहत भारतीय वायुसेना 114 नए मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट खरीदना चाहती है। इस कार्यक्रम में फ्रांस की डसॉल्ट एविएशन का राफेल लड़ाकू विमान सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है।
इस प्रस्तावित सौदे की अनुमानित लागत लगभग 3.25 लाख करोड़ रुपये बताई जा रही है। अगर यह डील पूरी होती है तो यह भारत का अब तक का सबसे बड़ा फाइटर जेट सौदा होगा।
योजना के मुताबिक लगभग 18 विमान सीधे फ्रांस से तैयार हालत में आएंगे। बाकी करीब 96 विमानों का निर्माण भारत में “मेक इन इंडिया” के तहत किया जाएगा। इसमें भारतीय निजी कंपनियों और रक्षा उद्योग की बड़ी भागीदारी होगी।
इससे देश में तकनीक हस्तांतरण, रोजगार और मेंटेनेंस, रिपेयर एंड ओवरहॉल (एमआरओ) सुविधाओं का विकास होगा। (DAC Meeting)
राफेल की जरूरत क्यों?
भारतीय वायुसेना की स्वीकृत स्क्वाड्रन संख्या 42.5 है, लेकिन वर्तमान में यह घटकर लगभग 29 स्क्वाड्रन रह गई है। कई पुराने मिग-21 और अन्य विमान रिटायर हो चुके हैं या होने वाले हैं।
राफेल 4.5 पीढ़ी का ओम्नी-रोल फाइटर है। यह एयर सुपीरियोरिटी, ग्राउंड अटैक, लंबी दूरी की स्ट्राइक, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और न्यूक्लियर डिलीवरी जैसे कई मिशन एक साथ कर सकता है।
राफेल ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इससे इसकी प्रभावशीलता और विश्वसनीयता को लेकर भरोसा बढ़ा है। (DAC Meeting)
स्कैल्प मिसाइल का बड़ा ऑर्डर
फ्रांस से स्कैल्प क्रूज मिसाइलों की खरीद को मंजूरी मिली है। स्कैल्प एक लंबी दूरी की प्रिसीजन गाइडेड क्रूज मिसाइल है, जिसे राफेल से दागा जाता है। यह दुश्मन के ठिकानों, एयरबेस और हाई वैल्यू टारगेट पर सटीक हमला करने में सक्षम है।
स्कैल्प क्रूज मिसाइल (पूरा नाम – स्कैल्प-ईजी) एक लंबी दूरी की ऐसी मिसाइल है जिसे लड़ाकू विमान से दागा जाता है। इसे फ्रांस और ब्रिटेन की कंपनी एमबीडीए ने बनाया है। ब्रिटेन में यही मिसाइल स्टॉर्म शैडो नाम से जानी जाती है।
यह मिसाइल भारतीय वायुसेना के राफेल लड़ाकू विमानों के साथ जुड़ी हुई है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि राफेल दुश्मन की सीमा में घुसे बिना ही बहुत दूर से हमला कर सकता है। इसे “स्टैंड-ऑफ स्ट्राइक” कहा जाता है, यानी सुरक्षित दूरी से सटीक वार। (DAC Meeting)
स्कैल्प की मारक क्षमता लगभग 250 किलोमीटर से ज्यादा है। कुछ रिपोर्टों में इसकी रेंज इससे भी अधिक बताई गई है।
यह मिसाइल कई तरह की आधुनिक नेविगेशन तकनीक का इस्तेमाल करती है, जैसे इनर्शियल नेविगेशन, जीपीएस और इंफ्रारेड सीकर। इसका मतलब है कि यह अपने लक्ष्य को बेहद सटीकता से पहचानकर उस पर वार करती है।
यह बहुत कम ऊंचाई पर उड़ती है और जमीन की बनावट के साथ चलते हुए रडार से बचने की कोशिश करती है। इसलिए इसे पकड़ना आसान नहीं होता। (DAC Meeting)
इसमें खास तरह का वारहेड लगा होता है, जो पहले मजबूत बंकर या कंक्रीट की दीवार में छेद करता है और फिर अंदर जाकर विस्फोट करता है। इसलिए यह कमांड सेंटर, एयरबेस, हथियार डिपो जैसे मजबूत ठिकानों को नष्ट करने में सक्षम है।
भारत ने 2016 में राफेल सौदे के साथ लगभघ 150 स्कैल्प मिसाइलें भी खरीदी थीं। 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान राफेल से स्कैल्प मिसाइल दागी गई थीं। इनसे दुश्मन के आतंकी ठिकानों और सैन्य ढांचे को सटीक निशाना बनाया गया। इसके बाद वायुसेना ने इन मिसाइलों की संख्या बढ़ाने की मांग की थी। (DAC Meeting)
सेना के लिए एक लाख विभव माइंस खरीदने की तैयारी
सबसे अहम मंजूरी एंटी-टैंक माइन “विभव” की बड़ी संख्या में खरीद के लिए दी गई है। विभव एक स्वदेशी पॉइंट-अटैक एंटी-टैंक माइन है, जिसे डीआरडीओ ने विकसित किया है। यह दुश्मन के टैंक और बख्तरबंद वाहनों को रोकने के लिए बनाई गई है। पहले 2023 में 600 विभव माइंस इंडक्ट हो चुकी हैं।
इसकी खास बात यह है कि यह एक तय समय के बाद खुद निष्क्रिय हो जाती है, जिससे सैनिकों की जान का खतरा कम रहता है। पहले भी इसकी सीमित संख्या सेना में शामिल की जा चुकी है। अब लगभग एक लाख विभव माइंस खरीदने की तैयारी है, जिससे सीमाओं पर रक्षा व्यवस्था और मजबूत होगी। (DAC Meeting)
इसके अलावा सेना के कुछ पुराने लेकिन महत्वपूर्ण वाहनों के ओवरहॉल को भी मंजूरी मिली है। इसमें आर्मर्ड रिकवरी व्हीकल, टी-72 टैंक और बीएमपी-2 इंफैंट्री कॉम्बैट व्हीकल शामिल हैं। ओवरहॉल का मतलब है इनके इंजन, चेसिस, ट्रांसमिशन और अन्य मुख्य हिस्सों की मरम्मत और सुधार करना, ताकि उनकी सेवा अवधि बढ़ाई जा सके। इससे सेना की तैयारियां मजबूत रहेंगी और नए उपकरण खरीदने की तुलना में समय और पैसा दोनों की बचत होगी। (DAC Meeting)
नौसेना को मिलेंगे 6 और पी-8आई विमान
डीएसी ने भारतीय नौसेना के लिए 6 अतिरिक्त पी-8आई लॉन्ग रेंज मैरिटाइम पेट्रोल एयरक्राफ्ट की खरीद को भी एओएन दी है। जिसकी कीमत लगभग 3 अरब डॉलर (करीब 25 हजार करोड़ रुपये से अधिक) बताई जा रही है।
इन दोनों सौदों का मकसद वायु और समुद्री सुरक्षा को और मजबूत बनाना है। (DAC Meeting)
वर्तमान में नौसेना के पास 12 पी-8आई विमान सेवा में हैं। 6 और शामिल होने के बाद इनकी संख्या 18 हो जाएगी। पी-8आई विमान का मुख्य काम समुद्र में लंबी दूरी तक निगरानी रखना और पनडुब्बियों का पता लगाना है। यह एंटी-सबमरीन वारफेयर, एंटी-सरफेस वारफेयर, सर्च एंड रेस्क्यू और इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस जैसे मिशन कर सकता है।
इसमें आधुनिक रडार, सोनाबॉय, टॉरपीडो और हार्पून मिसाइल जैसी क्षमताएं होती हैं। हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती गतिविधियों को देखते हुए यह क्षमता भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। (DAC Meeting)
हैप्स विमानों को मिली मंजूरी
डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) ने हाई-अल्टीट्यूड सुडो सैटेलाइट व्हीकल (हैप्स) यानी हैप्स विमान के लिए लगभग 15,000 करोड़ रुपये के प्रस्ताव को एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी (एओएन) दे दी है।
हैप्स दरअसल सोलर पावर से चलने वाला ऐसा मानवरहित विमान है, जो करीब 20 किलोमीटर ऊंचाई पर लंबे समय तक उड़ सकता है। यह स्ट्रैटोस्फीयर में रहकर निगरानी और टोही मिशन पूरा करता है। इसे सुडो सैटेलाइट यानी छद्म-उपग्रह भी कहा जाता है क्योंकि यह सैटेलाइट की तरह काम करता है, लेकिन सैटेलाइट की तुलना में यह सस्ता और ज्यादा आसान विकल्प है। इतनी ऊंचाई से यह सीमा क्षेत्रों और समुद्री इलाकों की लगातार निगरानी कर सकता है।
भारत में नेशनल एयरोस्पेस लेबोरेट्रीज ने इसका परीक्षण किया है, जबकि डीआरडीओ और बेंगलुरु की निजी कंपनी भी अपने मॉडल विकसित कर रही हैं। इससे सीमाओं और समुद्री क्षेत्रों की निगरानी और मजबूत होगी। (DAC Meeting)
सुदर्शन चक्र और गैस टरबाइन जेनरेटर को मिली हरी झंडी
डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल यानी डीएसी ने सुदर्शन चक्र और गैस टरबाइन जेनरेटर यानी जीटीजी के डिजाइन और विकास को भी मंजूरी दी है। इनमें सुदर्शन चक्र भारत का एक बड़ा एयर डिफेंस कार्यक्रम है। इसे दुश्मन की बैलिस्टिक मिसाइल, ड्रोन, हाइपरसोनिक हथियार और लड़ाकू विमानों से बचाव के लिए तैयार किया जा रहा है। यह एक मल्टी-लेयर्ड सुरक्षा ढांचा होगा, जिसमें आधुनिक रडार, सेंसर और अलग-अलग दूरी तक मार करने वाली मिसाइलें शामिल होंगी। डीएसी ने इसके लिए अतिरिक्त लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों की खरीद को मंजूरी दी है। इससे प्रोजेक्ट कुशा के तहत विकसित हो रही 150 से 350 किलोमीटर रेंज वाली मिसाइलों को और मजबूती मिलेगी। इससे सीमावर्ती क्षेत्रों और अहम सैन्य ठिकानों की सुरक्षा बढ़ेगी। (DAC Meeting)
साथ ही जीटीजी, यानी गैस टरबाइन जेनरेटर के विकास को भी हरी झंडी दी गई है। यह जहाजों, सबमरीन या बेस पर बिजली पैदा करने के लिए इस्तेमाल होगा। 4 मेगावाट मरीन गैस टरबाइन पावर जेनरेटर को “मेक-1” श्रेणी के तहत विकसित किया जाएगा। इसका मतलब है कि इसे भारत में ही डिजाइन और तैयार किया जाएगा। यह सिस्टम नौसेना के जहाजों पर बिजली बनाने के काम आएगा। अभी ऐसी तकनीक के लिए काफी हद तक विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहना पड़ता है। अगर यह जेनरेटर देश में ही बनेगा, तो विदेशी निर्भरता कम होगी और नौसेना अपनी जरूरत की बिजली खुद तैयार कर सकेगी। इससे नौसेना और अन्य बलों की ऊर्जा जरूरतें पूरी होंगी, और भारत आत्मनिर्भर बनेगा। (DAC Meeting)
कोस्ट गार्ड को मिलेंगे डॉर्नियर के लिए ईओ/आईआर सिस्टम
वहीं, भारतीय तटरक्षक बल यानी इंडियन कोस्ट गार्ड (आईसीजी) के लिए भी डीएसी ने डॉर्नियर विमान के लिए इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इंफ्रा-रेड यानी ईओ/आईआर सिस्टम खरीदने की जरूरत को स्वीकृति दी है।
ईओ/आईआर सिस्टम एक खास तरह का आधुनिक निगरानी उपकरण होता है। इसमें दो मुख्य हिस्से होते हैं। पहला है इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल कैमरा, जो दिन के समय दूर तक साफ तस्वीर और वीडियो रिकॉर्ड कर सकता है। दूसरा है इंफ्रा-रेड या थर्मल इमेजिंग सिस्टम, जो रात में या धुंध, धुआं और खराब मौसम में भी काम करता है। यह गर्मी के आधार पर जहाज, नाव या इंसान को पहचान सकता है। दोनों मिलकर एक ऐसा सेंसर बनाते हैं जो विमान के नीचे लगा होता है और चारों तरफ घूमकर निगरानी कर सकता है। यह ऑटो-ट्रैकिंग भी कर सकता है, यानी किसी संदिग्ध लक्ष्य को अपने आप फॉलो कर सकता है। (DAC Meeting)
इंडियन कोस्ट गार्ड डॉर्नियर 228 विमान का इस्तेमाल समुद्री निगरानी के लिए करता है। यह विमान हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) द्वारा भारत में ही बनाया जाता है। कोस्ट गार्ड के पास ऐसे कई विमान पहले से हैं। नए ईओ/आईआर सिस्टम से इन विमानों की क्षमता और बढ़ जाएगी।
इस सिस्टम की मदद से भारत के विशेष आर्थिक क्षेत्र यानी ईईजेड में बेहतर निगरानी की जा सकेगी। अवैध मछली पकड़ना, तस्करी, समुद्री डकैती या घुसपैठ जैसी गतिविधियों पर नजर रखना आसान होगा। खोज और बचाव अभियान यानी सर्च एंड रेस्क्यू और खासकर रात या खराब मौसम में भी यह बहुत काम आएगा। (DAC Meeting)

