📍नई दिल्ली | 4 Nov, 2025, 11:07 AM
Pakistan Hangor Submarines: भारतीय नौसेना को अगले साल से एक नई चुनौती मिलने वाली है। पाकिस्तान अगले साल से चीन की बनाई हैंगोर क्लास (Hangor Class) डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों को अपनी नौसेना में शामिल करना शुरू करेगा। ये आठ एडवांस पनडुब्बियां चीन और पाकिस्तान, दोनों जगह तैयार हो रही हैं। इनमें से चार चीन में और चार ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी के तहत कराची शिपयार्ड में बनेंगी।
पाकिस्तान नौसेना प्रमुख एडमिरल नविद अशरफ ने चीनी सरकारी मीडिया को दिए इंटरव्यू में पुष्टि की है कि पहली हैंगोर क्लास पनडुब्बी अगले साल सेवा में शामिल होगी। इस परियोजना की कुल लागत लगभग 5 अरब डॉलर (41,000 करोड़ रुपये) है और सभी आठ पनडुब्बियां 2028 तक मिल जाएंगी। यह डील 2015 में हुई थी।
इन पनडुब्बियों के शामिल होने से पाकिस्तान नौसेना की अरब सागर और हिंद महासागर में निगरानी और हमलावर क्षमता में बड़ा इजाफा होगा।
Pakistan Hangor Submarines: एंटी-एक्सेस/एरिया डिनायल क्षमता बढ़ेगी
भारत के खिलाफ रणनीतिक बढ़त पाने के लिए चीन और पाकिस्तान का सैन्य सहयोग अब समुद्री क्षेत्र तक फैल चुका है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय नौसेना ने अरब सागर में अपनी जबरदस्त ताकत दिखाई थी, लेकिन अब पाकिस्तान चीन और तुर्की की मदद से अपनी नौसैनिक क्षमताओं को तेजी से सुधार रहा है।
भारतीय रक्षा अधिकारियों के मुताबिक, हैंगोर क्लास पनडुब्बियों के आने से पाकिस्तान की ए2/एडी (एंटी-एक्सेस/एरिया डिनायल) क्षमता बढ़ेगी। यानी वह अरब सागर में भारतीय नौसेना की पहुंच और कार्रवाई को सीमित करने की कोशिश करेगा।
एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, “यह भारत के लिए नई चुनौती होगी, लेकिन हमें इसका समाधान खोजना होगा। चीन हमेशा पाकिस्तान की मदद करता रहा है और यह ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी साफ दिखा था।”
Pakistan Hangor Submarines: हैंगोर क्लास पनडुब्बियों की खूबियां
हैंगोर या टाइप 039A युआन क्लास पनडुब्बियां चीन की अत्याधुनिक तकनीक से लैस हैं। इनमें एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन सिस्टम लगा है, जिससे ये पानी के अंदर लगभग 2 से 3 हफ्ते तक रह सकती हैं।
आम डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों को हर दो-तीन दिन में सतह पर आकर ऑक्सीजन लेकर बैटरियां चार्ज करनी पड़ती हैं, लेकिन एआईपी तकनीक से ये बिना सतह पर आए ज्यादा देर तक रह सकती हैं। इससे इनकी स्टेल्थ और युद्ध क्षमता काफी बढ़ जाती है।
फिलहाल भारतीय नौसेना के पास कोई भी पारंपरिक एआईपी पनडुब्बी नहीं है। भारत के महत्वकांक्षी पनडुब्बी परियोजना प्रोजेक्ट 75-आई के तहत छह नई एआईपी पनडुब्बियां बनाने की योजना है, जो अभी कॉन्ट्रैक्ट के स्तर तक भी नहीं पहुंची है।
Pakistan Hangor Submarines: हैंगोर में लगे हैं चीनी इंजन
मूल योजना के तहत इन सबमरीन में जर्मन एमटीयू-396 इंजन लगाए जाने थे, लेकिन जर्मनी ने पाकिस्तान को एक्सपोर्ट लाइसेंस देने से साफ इनकार कर दिया। इसके बाद चीन ने अपने सीएचडी-620 इंजन लगाने का फैसला किया, जो तकनीकी रूप से अनटेस्टेड और कम भरोसेमंद माने जा रहे हैं।
रक्षा विश्लेषकों के अनुसार, यही इंजन थाईलैंड के एस-26टी सबमरीन प्रोजेक्ट में भी लगाया गया था, जिसे 2023 में “मैकेनिकल फेल्योर” की वजह से अस्थायी रूप से रद्द कर दिया गया था। थाईलैंड ने बाद में चीनी दबाव के बाद इसे दोबारा शुरू किया, लेकिन अब भी उसमें तकनीकी अड़चनें बनी हुई हैं।
Pakistan Hangor Submarines: कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम में खराबी
हैंगोर क्लास सबमरीन का कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम, जिसे पनडुब्बी का “दिमाग” कहा जाता है, सही तरीके से काम नहीं कर रहा। इस सिस्टम में सेंसर, सोनार और हथियारों के बीच कॉर्डिनेशन की भी दिक्कतें हैं। यहां तक कि पाकिस्तान को कई बार ट्रायल्स बीच में रोकने पड़े क्योंकि सेंसर और हथियारों का इंटीग्रेशन पूरा नहीं हुआ था।
यह पहली बार नहीं है जब चीन की बनाई पनडुब्बियों की विश्वसनीयता पर सवाल उठे हों। म्यांमार ने 2022 में चीन से ली गई युआन क्लास सबमरीन को बार-बार “मैकेनिकल फेल्योर” की वजह से वापस कर दिया था। बांग्लादेश की दो मिंग-क्लास सबमरींस, जो 1970 के दशक की तकनीक पर आधारित हैं, बार-बार इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम फेलियर और कंट्रोल गड़बड़ियों का सामना कर रही हैं।
Pakistan Hangor Submarines: भारत की पनडुब्बी परियोजनाओं में हो रही देरी
भारतीय नौसेना के पास इस समय केवल छह फ्रेंच मूल की स्कॉर्पीन क्लास पनडुब्बियां हैं, जिन्हें मझगांव डॉकयार्ड ने बनाया है। इनके अलावा छह पुरानी रूसी किलो-क्लास और चार जर्मन एचडीडब्ल्यू पनडुब्बियां हैं।
भारत के पास दो न्यूक्लियर ऑपरेटेड पनडुब्बियां आईएनएस अरिहंत और आईएनएस अरिघात हैं, जबकि तीसरी पनडुब्बी आईएनएस अरिधमन अगले साल नौसेना में शामिल होगी।
प्रोजेक्ट 75-आई के तहत छह नई जर्मन डिजाइन की डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां मझगांव डॉकयार्ड में बनने वाली हैं। इस वर्ष जनवरी में मझगांव डॉकयार्ड लिमिटेड और जर्मनी की थाइसनक्रुप मरीन सिस्टम्स को इस 70,000 करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट के लिए चुना गया। टीकेएमएस डिजाइन और तकनीकी मदद देगा, जबकि निर्माण कार्य भारत में मझगांव डॉकयार्ड द्वारा किया जाएगा। प्रस्तावित पनडुब्बी टाइप 214 क्लास पर आधारित होगी, जिसे भारतीय जरूरतों के अनुसार मॉडिफाई किया जाएगा।
योजना के अनुसार, कॉन्ट्रैक्ट साइन होने के सात साल बाद पहली पनडुब्बी तैयार होगी, जिसमें 45 फीसदी स्वदेशी सामग्री होगी। इसके बाद हर साल एक नई पनडुब्बी बनेगी, जब तक कि स्वदेशीकरण का स्तर 60 फीसदी तक नहीं पहुंच जाता।
इसका मतलब है कि अगर कोई देरी न हुई तो पहली एआईपी पनडुब्बी 2032 तक नौसेना को मिलेगी। लेकिन फिलहाल यह परियोजना बातचीत के चरण में है, यानी निर्माण कार्य शुरू होने में अभी भी वक्त लगेगा।
एआईपी में लिथियम-आयन बैटरी और फ्यूल सेल तकनीक
नई पनडुब्बियों में लिथियम-आयन बैटरी और फ्यूल सेल आधारित एआईपी सिस्टम होगा। इस तकनीक से पनडुब्बी लंबे समय तक पानी के अंदर रह सकेगी और तेज रफ्तार से चल सकेगी। विशेषज्ञों के मुताबिक, इससे भारतीय नौसेना बंगाल की खाड़ी से लेकर अरब सागर तक बिना सतह पर आए लंबी दूरी तय कर सकेगी। यह सिस्टम चीन और पाकिस्तान की हैंगोंर क्लास या युआन क्लास पनडुब्बियों की तुलना में ज्यादा एडवांस हैं।
जर्मन टाइप 214 बनाम पाकिस्तानी हैंगोर क्लास
भारतीय नौसेना के लिए प्रस्तावित टाइप 214 सबमरीन का डिस्प्लेसमेंट 1,860 टन और लंबाई 65 मीटर होगी, जबकि पाकिस्तान की हांगोर क्लास का डिस्प्लेसमेंट 2,250 टन और लंबाई 74.9 मीटर है।
वहीं, भारतीय नौसेना की आने वाली टाइप 214 पनडुब्बियां गहरे समुद्र में अधिक गहराई तक जा सकेंगी क्योंकि इनमें सिमेन्स हाइड्रोजन फ्यूल सेल लगे होंगे, जो पॉलिमर इलेक्ट्रोलाइट मेम्ब्रेन तकनीक पर आधारित हैं। ये पनडुब्बियां वॉटर-रैम एक्सपल्शन सिस्टम से टॉरपीडो लॉन्च कर सकेंगी, जो उन्हें अत्यधिक स्टेल्थ बनाता है। इनके शोर, तापीय और चुंबकीय सिग्नेचर को भी न्यूनतम रखा गया है ताकि दुश्मन की निगरानी से बचा जा सके।
Pakistan Hangor Submarines: बाबर-3 क्रूज मिसाइलों से लैस कर रहा पाकिस्तान
पाकिस्तान की नौसेना के पास फिलहाल तीन फ्रेंच अगस्ता-90बी और दो अगस्ता-70 पनडुब्बियां हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, पाकिस्तान अपनी अगस्ता-90बी पनडुब्बियों को 450 किलोमीटर रेंज की बाबर-3 क्रूज मिसाइलों से लैस कर रहा है।
अधिकारियों का कहना है कि नई हैंगोर क्लास पनडुब्बियां भी बाबर-3 मिसाइल से लैस होंगी, जिससे पाकिस्तान अपने न्यूक्लियर ट्रायड (परमाणु त्रिकोण) का तीसरा चरण पूरा करना चाहता है। यानी जमीन, हवा और समुद्र से परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की क्षमता डेवलप करना चाहता है।
आईएनएस खांदेरी पर 2026 में लगेगा पहला एआईपी सिस्टम
योजना के अनुसार, यह सिस्टम सबसे पहले आईएनएस खांदेरी पर लगेगा, जो भारतीय नौसेना की दूसरी कलवरी-क्लास पनडुब्बी है। इस पर 2026 में उसके निर्धारित रिफिट के दौरान लगाया जाएगा। इसके बाद सिस्टम का परीक्षण होगा और सफल रहने पर इसे बाकी स्कॉर्पीन पनडुब्बियों में लगाया जाएगा।
हालांकि, यह परियोजना 2014 में स्वीकृत हुई थी और इसे 2017 तक पूरा किया जाना था। अब यह लगभग आठ साल पीछे चल रही है, जिससे भारतीय नौसेना के आधुनिकीकरण की गति पर असर पड़ा है।
भारतीय नौसेना है तैयार
भारतीय नौसेना के पास अमेरिकी मूल के पी-8ऐ पोसीडन लॉन्ग रेंज एंटी-सबमरीन विमान और एम-60आर सीहॉक हेलीकॉप्टर हैं, जो समुद्र में पनडुब्बियों की खोज और नष्ट करने में सक्षम हैं। इसके अलावा नौसेना के पास एडवांस एंटी-सबमरीन वारशिप, राडार, सोनार, टॉरपीडो और मिसाइल सिस्टम भी हैं।
हालांकि, नौसेना के अधिकारियों का मानना है कि भारत की अंडरवाटर फ्लीट में कमी एक गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है। चीन के पास फिलहाल 50 से अधिक डीजल-इलेक्ट्रिक और 10 परमाणु पनडुब्बियां हैं, जबकि पाकिस्तान की संख्या भी अब तेजी से बढ़ रही है।
रक्षा सूत्रों का कहना है, “भारत को अब अरब सागर में एक और विजिलेंट मॉनिटरिंग नेटवर्क तैयार करना होगा, क्योंकि चीन और पाकिस्तान का यह नौसैनिक गठजोड़ भविष्य में समुद्री क्षेत्र की स्थिरता पर असर डाल सकता है।”


