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IAF IACCS modernisation: ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय वायुसेना का बड़ा कदम, डिफेंस शील्ड अब होगा और ज्यादा घातक

इस अपग्रेड का सबसे बड़ा मकसद है बियॉन्ड विजुअल रेंज इंटरसेप्शन। अब एयरफोर्स सिर्फ उन टारगेट्स पर निर्भर नहीं रहेगी, जो पायलट को दिखाई दे रहे हों...

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📍नई दिल्ली | 22 Dec, 2025, 4:51 PM

IAF IACCS modernisation: भारतीय वायुसेना इन दिनों अपने एयर डिफेंस सिस्टम को मजबूती देने में जुटी है। एयरफोर्स का इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम, मतलब आईएसीसीएस, अब पहले से कहीं ज्यादा आधुनिक और ताकतवर बन रहा है। हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर में यही सिस्टम एयरफोर्स का असली “नर्व सेंटर” था, यहीं से हर पाकिस्तान की हर हरकत पर नजर रखी गई, हर पल की अपडेट मिली।

अभी आईएसीसीएस तीसरे फेज के अपग्रेडेशन और मॉडर्नाइजेशन से गुजर रहा है। इस बार फोकस है – लॉन्ग रेंज खतरों का पता लगाना, नेटवर्क सेंट्रिक वॉरफेयर, और बियॉन्ड विजुअल रेंज (बीवीआर) क्षमता को बढ़ाना। अब दुश्मन सिर्फ आंखों के सामने नहीं, बल्कि काफी दूर से भी ट्रैक और इंटरसेप्ट हो सकता है। (IAF IACCS modernisation)

IAF IACCS modernisation: आईएसीसीएस आखिर है क्या और क्यों इतना जरूरी है?

असल में, आईएसीसीएस वायुसेना का ऐसा डिजिटल नेटवर्क है जो रडार, एयर डिफेंस सिस्टम, फाइटर जेट्स, मिसाइल यूनिट्स और कमांड सेंटर, सभी को एक साथ जोड़ देता है। सीधी बात करें तो, ये सिस्टम आसमान में उड़ती हर चीज की पहचान करता है, तय करता है कि वो खतरा है या नहीं, और अगर है, तो उसे कब, कैसे और किस हथियार से रोका जाए। (IAF IACCS modernisation)

इसकी शुरुआत 1995 में हुई थी, जब पश्चिम बंगाल के पुरुलिया में एक विमान से अवैध हथियार गिराए गए थे। उस घटना ने एयरफोर्स को एहसास कराया कि बिना एक मजबूत रियल-टाइम कमांड सिस्टम के, आसमान में हर हलचल पर नजर रख पाना नामुमकिन है। फिर 2000 के आसपास इसे एयरफोर्स की पावर डॉक्ट्रिन में शामिल किया गया, और 2022 में सिस्टम को और अपडेट किया गया। (IAF IACCS modernisation)

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क्या बदल रहा है अब तीसरे फेज में?

इस बार कई बड़े बदलाव हो रहे हैं। नए ऑटोमेटेड थ्रेट इवैल्युएशन मॉड्यूल्स जोड़े जा रहे हैं, जो खुद तय करेंगे कि किस खतरे से सबसे पहले निपटना है। मतलब, अगर एक साथ कई मिसाइलें, ड्रोन या फाइटर जेट्स आते हैं, तो सिस्टम खुद तय करेगा किसे पहले रोकना है।

साथ में, स्टैंडऑफ वेपन लॉन्च डिटेक्शन सिस्टम को भी और मजबूत किया जा रहा है। स्टैंडऑफ अटैक मतलब, दुश्मन काफी दूर से मिसाइल या हथियार दागता है ताकि खुद सुरक्षित रहे। अब आईएसीसीएस ऐसे लॉन्च को काफी पहले पहचान लेगा और उसी के मुताबिक जवाब देगा। (IAF IACCS modernisation)

इस अपग्रेड का सबसे बड़ा मकसद है बियॉन्ड विजुअल रेंज इंटरसेप्शन। अब एयरफोर्स सिर्फ उन टारगेट्स पर निर्भर नहीं रहेगी, जो पायलट को दिखाई दे रहे हों। आज के दौर में मिसाइल और ड्रोन इतनी दूर से आते हैं कि आंखों से उन्हें देखना नामुमकिन है। लेकिन आईएसीसीएस की मदद से दुश्मन को काफी पहले ट्रैक किया जा सकता है।

सूत्रों की मानें तो, नए सिस्टम के बाद एयरफोर्स दुश्मन के लॉन्ग रेंज वेक्टर जैसे क्रूज मिसाइल, ड्रोन स्वॉर्म या स्टैंडऑफ हथियार को ज्यादा इफेक्टिव तरीके से काउंटर कर पाएगी।

IAF IACCS modernisation

ऑपरेशन सिंदूर में आईएसीसीएस की ताकत खुलकर सामने आई थी। डिफेंस ही नहीं, बल्कि ऑफेंसिव ऑपरेशन्स में भी सिस्टम ने कमाल दिखाया। अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स से आ रही जानकारी एक जगह एकत्र हुई, कमांडर तक तुरंत पहुंची, और फैसले भी उतने ही तेजी से लिए गए। अब ये सिस्टम और स्मार्ट, और तेज हो जाएगा। (IAF IACCS modernisation)

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इस बड़े अपग्रेड के बाद भारत एशिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल हो जाएगा, जिनके पास एआई-एनेबल्ड, मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस की ताकत है। चीन, साउथ कोरिया और जापान के बाद भारत ने भी इस फील्ड में जबरदस्त छलांग लगाई है।

सीधे शब्दों में कहें तो, आईएसीसीएस का नया रूप वायुसेना की डिफेंस शील्ड को पहले से कहीं ज्यादा मजबूत बना देगा। बदलती चुनौतियों और लंबी दूरी से आने वाले हमलों के हिसाब से, ये अपग्रेडेशन वायुसेना के लिए बेहद जरूरी है। (IAF IACCS modernisation)

ये फाइटर जेट हैं आईएसीसीएस से कनेक्टेड

आईएसीसीएस यानि इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम इंडियन एयर फोर्स का पूरा ऑटोमेटेड ब्रेन है। लगभग सभी फाइटर जेट्स इस सिस्टम से कनेक्टेड हैं। एसयू-30 एमकेआई पूरी तरह इस सिस्टम से लिंक है। सुपर-30 अपग्रेड के बाद इसकी कनेक्टिविटी और बेहतर हो गई है, जिससे रियल-टाइम डेटा शेयर करना और टारगेट करना काफी आसान हो जाता है। (IAF IACCS modernisation)

एलसीए तेजस एमके-1 औऱ एमके-1ए पूरी तरह इंटीग्रेटेड है। इसे क्रॉस-प्लैटफॉर्म टेस्ट जैसे अस्त्र मिसाइल फायरिंग में भी इस्तेमाल किया जा चुका है। वहीं राफेल भी आईएसीसीएस से जुड़ा है। सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो (एसडीआर) के जरिए ये अब नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर का पूरा हिस्सा बन चुका है। मिग-29 यूपीजी में भी अपग्रेड के बाद एसडीआर के जरिए कनेक्टिविटी हो गई है। मिराज-2000 भी इसी तरह आईएसीसीएस के साथ इंटीग्रेटेड है। जैगुआर फाइटर जेट भी, डैरिन-3 अपग्रेड के बाद, इस नेटवर्क का हिस्सा बन चुका है। (IAF IACCS modernisation)

अब अवाक्स और एयर डिफेंस सिस्टम की बात करें तो फाल्कन और नेत्रा जैसे अवाक्स और एईडब्ल्यू एंड सी विमान इस पूरे सिस्टम के कोर हैं। ये आसमान में रहकर दूर-दूर तक नजर रखते हैं और लगातार रियल-टाइम डेटा भेजते रहते हैं। वहीं, जमीन पर तैनात एयर डिफेंस हथियार जैसे एस-400, आकाश, एमआरएसएएम, स्पाइडर और पेचोरा सभी आईएसीसीएस से जुड़े हैं। इनसे जरूरत पड़ने पर ऑटोनॉमस फायरिंग भी कर सकते हैं। (IAF IACCS modernisation)

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वहीं, अब ये सिस्टम सिर्फ एयर फोर्स तक सीमित नहीं रहा है। आर्मी का आकाशतीर और नेवी का त्रिगुण सिस्टम भी धीरे-धीरे इसमें शामिल हो रहे हैं। कुछ सिविल रडार्स को भी इसमें जोड़ा गया है, ताकि आसमान में होने वाली किसी भी हलचल का पहले ही पता लगाया जा सके। (IAF IACCS modernisation)

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  • News Desk

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