Pakistan terrorism intellectuals: The reality of Pakistan’s Kashmir policy has come up once again. On one hand Islamabad claims to stand up with Kashmiris by celebrating the so-called "K Solidarity Day" on February 5 every year, on the other hand, his intelligence agency and terrorist proxy are targeting the same Kashmiris, which are uttered against violence and terrorism. The recent Pakistan-backed terror network has threatened pro-India and anti-Terrorist Kashmiri intellectuals to death directly.
Sources associated with security agencies and international think-tanks say that it is part of a well-planned strategy, through which Pakistan wants to sniff the voices that his "Kannada Neratives are exposed to the world. He says that this case is not only the security of a person, but the attack on that whole thinking, which speaks of peace, dialogue and democratic values in Kashmir. Kashmiri intellectuals
Pakistan terror fraudi intellectuals: threatening fear spreading and stealing
The counter-terrism of a major Kashmiri origin was threatened to kill the Expert directly in January 2026. This threat was sent through the end-to-end encrypted messaging platform with the branding of the terrorist organization being visible clean. Not just in the message, they were called the "winter" but also wrote that they will not have any hesitation in killing.
Sources reported that this threat Lustful ए तैयबा के प्रॉक्सी संगठन द रजिस्टेंट फ्रंट यानी टीआरएफ ने जुनैद कुरैशी को एंड-टू-एंड एनक्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म (जैसे टेलीग्राम या सिग्नल) के जरिए दी थी। बता दें कि जुनैद कुरैशी यूरोपियन फाउंडेशन फॉर साउथ एशियन स्टडीज (EFSAS) के डायरेक्टर हैं।
सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, यह पिछले कुछ महीनों में दूसरी ऐसी घटना है, जब पाकिस्तान समर्थित आतंकी नेटवर्क ने उन कश्मीरी बुद्धिजीवियों को निशाना बनाया है, जो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के खिलाफ बोल रहे हैं। धमकी की भाषा और उसमें इस्तेमाल किए गए शब्द इस बात का संकेत देते हैं कि इसका मकसद डर फैलाना और चुप कराना है। (Pakistan terror proxies Kashmiri intellectuals)
रावलपिंडी से ऑपरेट हो रहा अकाउंट
धमकी पाने वाले विशेषज्ञ जुनैद कुरैशी ने मीडिया से बातचीत में सीधे तौर पर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI पर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि यह धमकी लश्कर ए तैयबा के कमांडर शेख सज्जाद गुल के जरिए आई। खास बात यह ही धमकी में जिन जानकारियों का जिक्र किया गया, वे सार्वजनिक नहीं थीं और सिर्फ सीमित लोगों तक ही पहुंच रखती थीं। क्योंकि मैसेज में एक प्रस्तावित कश्मीरी इंटेलेक्चुअल थिंक टैंक की संवेदनशील जानकारी थी, जो पब्लिक डोमेन में नहीं है। इससे यह आशंका और मजबूत हो जाती है कि इस पूरे मामले के पीछे संगठित खुफिया नेटवर्क काम कर रहा है।
जांच से जुड़े सूत्र बताते हैं कि धमकी भेजने वाला अकाउंट पाकिस्तान के रावलपिंडी क्षेत्र से ऑपरेट हो रहा था और इसका इस्तेमाल पहले भी आतंकवादी प्रचार सामग्री फैलाने के लिए किया जा चुका है। यह अकाउंट 24 अगस्त 2025 को बनाया गया और टीआरएफ के प्रोपेगैंडा फोटोज, अपडेट्स फैलाने के लिए इस्तेमाल होता है। यह वही तरीका है, जिसे पाकिस्तान लंबे समय से अपनाता रहा है, वह आतंकवादी संगठनों को आगे रखकर खुद पर्दे के पीछे रहता है। (Pakistan terror proxies Kashmiri intellectuals)
जुनैद ने पिता की आतंकी विचारधारा को किया रिजेक्ट
जुनैद कुरैशी ने अपने एक्स अकाउंट @JQ_plaintalk पर पर पोस्ट किया कि धमकियां उन्हें शांति और टेररिज्म के खिलाफ काम करने से नहीं रोकेंगी। उन्होंने अपने काम को जारी रखने का ऐलान किया है। जुनैद कुरैशी कश्मीरी मूल के हैं और EFSAS के डायरेक्टर हैं। उनके पिता हाशिम कुरैशी 1971 में एयर इंडिया फ्लाइट IC-405 के हाईजैकर्स में से एक थे, लेकिन जुनैद ने सार्वजनिक रूप से अपने पिता की विचारधारा को रिजेक्ट करते हुए अपने जन्म से पहले हुए हाईजैकिंग कांड को टेररिज्म का ऐक्ट बताया थाा।
अपनी संस्था के जरिए, जुनैद अंतरराष्ट्रीय प्लेटफॉर्म्स (जैसे यूएन, यूरोपीय पार्लियामेंट) पर पाकिस्तान की स्टेट-स्पॉन्सर्ड टेररिज्म को एक्सपोज करते हैं। वे दिखाते हैं कि कश्मीर में “आजादी की लड़ाई” वास्तव में आईएसआई का चलाया हुआ कैंपेन है, जिसमें लश्कर ए तैयबा, हिजबुल मुजाहिदीन और जैश-ए-मोहम्मद शामिल हैं।
2019 में पुलवामा अटैक की निंदा करने के लिए जुनैद को एक ब्लॉग पर हिट-लिस्ट में शामिल किया गया था। उन्होंने एक्स पर कहा कि लश्कर ए तैयबा, हिजबुल मुजाहिदीन और जैश-ए-मोहम्मद आतंकी संगठन हैं जो कश्मीर को बांटते हैं, और धमकियां उन्हें चुप नहीं कराएंगी। (Pakistan terror proxies Kashmiri intellectuals)
आतंकवाद के खिलाफ बोलने की चुकानी पड़ी कीमत
पाकिस्तान-समर्थित आतंकी संगठनों द्वारा कश्मीरी बुद्धिजीवियों और समाज के जागरूक वर्ग को निशाना बनाने का लंबा और खूनी इतिहास रहा है। दशकों से ऐसे कश्मीरी, जो आतंकवाद का विरोध करते हैं, लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करते हैं या भारत के साथ शांति और सह-अस्तित्व का समर्थन करते हैं, लगातार इन टेरर प्रॉक्सीज के टारगेट पर रहे हैं।
आकंड़ों के मुताबिक 1989 से 2020 के बीच पाकिस्तान-समर्थित आतंकी संगठनों ने 5000 से ज्यादा कश्मीरी नागरिकों, पत्रकारों, नेताओं और बुद्धिजीवियों की हत्या की थी। इनमें वे लोग शामिल थे, जिन्होंने खुले तौर पर आतंकवाद का विरोध किया या कश्मीर में पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल उठाए। लश्कर-ए-तैयबा, हिजबुल मुजाहिदीन और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठन इस पूरे दौर में इस खूनखराबे के प्रमुख जिम्मेदार रहे।
साल 2018 में इस पैटर्न का एक बेहद चौंकाने वाला उदाहरण तब सामने आया, जब ‘राइजिंग कश्मीर’ के संपादक शुजात बुखारी की श्रीनगर में गोली मारकर हत्या कर दी गई। उन्हें महीनों से धमकियां मिल रही थीं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें सरेआम मार दिया गया। इस हत्या ने साफ कर दिया कि जो भी कश्मीर में हिंसा और आतंक के खिलाफ बोलता है, वह सीधे आतंकी संगठनों के निशाने पर आ जाता है।
साल 2018 में इस पैटर्न का एक बेहद चौंकाने वाला उदाहरण तब सामने आया, जब ‘राइजिंग कश्मीर’ के संपादक शुजात बुखारी की श्रीनगर में गोली मारकर हत्या कर दी गई। उन्हें महीनों से धमकियां मिल रही थीं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें सरेआम मार दिया गया। इस हत्या ने साफ कर दिया कि जो भी कश्मीर में हिंसा और आतंक के खिलाफ बोलता है, वह सीधे आतंकी संगठनों के निशाने पर आ जाता है। (Pakistan terror proxies Kashmiri intellectuals)
इसके बाद 2019 में पुलवामा आतंकी हमले की निंदा करने पर जुनैद कुरैशी को आतंकियों की हिट-लिस्ट में डाल दिया गया। सिर्फ इसलिए कि उन्होंने खुले तौर पर आतंकवाद को गलत बताया और उसकी आलोचना की, उन्हें लश्कर-ए-तैयबा, हिजबुल मुजाहिदीन और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों से धमकियों का सामना करना पड़ा।
हिंसा का यह सिलसिला हाल के सालों में भी जारी रहा। साल 2025 में कुपवाड़ा में सामाजिक कार्यकर्ता गुलाम रसूल मैगरे की हत्या कर दी गई। शुरुआती जांच में इस हत्या के पीछे भी पाकिस्तान-समर्थित आतंकियों पर शक जताया गया। यह घटना इस बात का संकेत थी कि भले ही हालात बदले हों, लेकिन आतंक के जरिए डर फैलाने की नीति नहीं बदली है।
इन घटनाओं के बीच कुछ और खौफनाक मिसालें भी सामने आई हैं। 2019 में लश्कर-ए-तैयबा ने एक कश्मीरी लड़की को जबरन शादी के लिए बंधक बना लिया था और एक 12 साल के बच्चे की बेरहमी से हत्या कर दी थी। ऐसे मामलों ने यह साफ कर दिया कि आतंकी संगठनों के लिए न उम्र मायने रखती है, न इंसानियत। (Pakistan terror proxies Kashmiri intellectuals)
“सॉलिडैरिटी” की यह है सच्चाई
पाकिस्तान हर साल “कश्मीर सॉलिडैरिटी डे” के नाम पर रैलियां करता है, भाषण देता है और खुद को कश्मीरियों का हितैषी बताता है। लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। जिन कश्मीरियों की सोच पाकिस्तान की लाइन से मेल नहीं खाती, उन्हें या तो धमकाया जाता है या फिर हिंसा का शिकार बनाया जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह रणनीति केवल डर पैदा करने के लिए नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की आलोचना को कमजोर करना भी है। जब कश्मीरी मूल के लोग ही आतंकवाद को बेनकाब करते हैं, तो पाकिस्तान की पूरी कहानी ढहने लगती है। (Pakistan terror proxies Kashmiri intellectuals)
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बढ़ता असर
हाल के वर्षों में कई कश्मीरी बुद्धिजीवियों और शोधकर्ताओं ने यूरोप और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की भूमिका को दुनिया के सामने रखा है। उन्होंने दस्तावेजों और आंकड़ों के साथ यह दिखाया है कि कश्मीर में हिंसा किसी “जन आंदोलन” का नतीजा नहीं, बल्कि एक संगठित और प्रायोजित आतंकवादी अभियान है।
यही वजह है कि ऐसे लोगों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। जानकार मानते हैं कि यह पाकिस्तान की हताशा को दर्शाता है, क्योंकि उसकी कूटनीतिक रणनीति अब पहले जैसी असरदार नहीं रह गई है। (Pakistan terror proxies Kashmiri intellectuals)
भारत की सुरक्षा एजेंसियों की है नजर
सूत्रों के मुताबिक, भारतीय सुरक्षा एजेंसियां इस पूरे घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इन धमकियों को गंभीरता से लिया जा रहा है। यह सिर्फ भारत-पाकिस्तान का मामला नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई से जुड़ा मुद्दा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में अंतरराष्ट्रीय दबाव ही सबसे प्रभावी हथियार हो सकता है। जब तक आतंकवाद को प्रायोजित करने वाले ढांचे पर सीधा सवाल नहीं उठेगा, तब तक ऐसी धमकियां जारी रहेंगी। (Pakistan terror proxies Kashmiri intellectuals)


















