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INS Arihant K-4 SLBM: क्या भारत ने गुपचुप किया है INS अरिहंत से K-4 मिसाइल का टेस्ट? DRDO और रक्षा मंत्रालय ने क्यों नहीं किया सार्वजनिक एलान?

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📍नई दिल्ली | 28 Nov, 2024, 12:43 PM

INS Arihant K-4 SLBM: भारत ने 27 नवंबर से 30 नवंबर के बीच जारी किया गया “नोटिस टू एयरमेन” (NOTAM) अचानक वापस ले लिया है। यह कदम ऐसे समय में आया है जब अटकलें लगाई जा रही हैं कि 27 नवंबर, 2024 को INS अरिहंत से K-4 सबमरीन-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल (SLBM) का परीक्षण किया गया। हालांकि, भारतीय सरकार या रक्षा अधिकारियों की ओर से अभी तक इस पर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

INS Arihant K-4 SLBM: Has India Secretly Tested K-4 Missile from INS Arihant? No Official Confirmation Yet from DRDO or Defence Ministry

INS Arihant K-4 SLBM

K-4 मिसाइल को डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (DRDO) ने डेवलप किया है, जो भारत की समुद्र-आधारित परमाणु प्रतिरोध रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह मिसाइल लगभग 3,500 किलोमीटर की मारक क्षमता रखती है, जो इसे दुश्मन के सामरिक ठिकानों तक पहुंचने में सक्षम बनाती है। K-4 की खासियत यह है कि इसे पानी के भीतर से लॉन्च किया जा सकता है, जिससे इसे ढूंढ पाना बेहद मुश्किल हो जाता है।

6000 हजार टन वजनी INS अरिहंत सबमरीन, भारत की स्वदेशी रूप से विकसित परमाणु-संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी, K-4 मिसाइलों को ले जाने में सक्षम है। यह पनडुब्बी एक बार में चार K-4 मिसाइलें ले जा सकती है। वहीं अगर इस मिसाइल का परीक्षण सफल रहा है, तो यह भारत की “न्यूक्लियर ट्रायड” (थल, जल और वायु आधारित परमाणु हथियारों की प्रणाली) को मजबूती प्रदान करेगा और यह संकेत देगा कि भारत समुद्र-आधारित प्रतिरोध क्षमताओं को पूरी तरह से ऑपरेशनल करने की दिशा में बड़ा कदम उठाने के लिए बिल्कुल तैयार है।

NOTAM की वापसी: अटकलों का दौर

आमतैर पर जब भी K-4 जैसे रणनीतिक महत्व के हथियारों से जुड़े परीक्षण होते हैं, तो डीआरडीओ और सरकार की तरफ से मिसाइल परीक्षण के सफल होने का एलान किया जाता है। लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ है। लेकिन इस बार NOTAM को अचानक वापस लेना और कोई आधिकारिक बयान जारी न करना, इससे चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है।

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रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम “निचले प्रोफाइल” में टेस्ट करने की रणनीति हो सकती है ताकि क्षेत्रीय या वैश्विक स्तर पर बेवजह के ज्योपॉलिटिकल तनाव से बचा जा सके। INS अरिहंत जैसे प्लेटफॉर्म से इस तरह का परीक्षण समुद्र-आधारित परमाणु हमले की क्षमता को बढ़ाने में मदद करता है।

INS Arihant K-4 SLBM: Has India Secretly Tested K-4 Missile from INS Arihant? No Official Confirmation Yet from DRDO or Defence Ministry

INS अरिहंत और K-4 का महत्व

INS अरिहंत, भारत की पहली स्वदेशी परमाणु-संचालित पनडुब्बी है, जो देश के रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का प्रतीक है। यह पनडुब्बी परमाणु हथियारों से लैस होकर पानी के अंदर रहकर दुश्मन पर हमला करने की क्षमता रखती है।

K-4 जैसे मिसाइल भारत की दूसरी स्ट्राइक क्षमता को मजबूत करते हैं। इसका मतलब यह है कि अगर भारत पर कोई परमाणु हमला होता है, तो भी वह इस तरह के हथियारों की मदद से जवाबी हमला करने में सक्षम होगा। यह क्षमता “विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध” (Credible Minimum Deterrence) की भारत की परमाणु नीति का अभिन्न हिस्सा है।

भविष्य की रणनीति पर नजर

यदि यह परीक्षण सफल रहा है, तो यह भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी। समुद्र-आधारित मिसाइल प्रणाली का ऑपरेशनल होना भारत के लिए रणनीतिक स्थिरता बनाए रखने में सहायक होगा, खासकर ऐसे समय में जब क्षेत्रीय तनाव और भूराजनीतिक चुनौतियां बढ़ रही हैं।

इसके अलावा, K-4 मिसाइल के परीक्षण से यह स्पष्ट होता है कि भारत अपने परमाणु हथियारों की तैनाती को और अधिक सुरक्षित और प्रभावी बना रहा है। यह कदम चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों की चुनौतियों का सामना करने में भी मदद करेगा।

सरकार की चुप्पी और चर्चाओं का दौर

हालांकि, इस पूरे मामले में सरकार की चुप्पी ने चर्चाओं को और तेज कर दिया है। रक्षा मंत्रालय और DRDO जैसे संस्थान आमतौर पर इस तरह के परीक्षणों की जानकारी साझा करते हैं, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ।

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यह संभव है कि सरकार और सेना इसे रणनीतिक गोपनीयता के तहत रखना चाहती हो। परीक्षण की पुष्टि न करना और NOTAM को वापस लेना, दोनों कदम यह संकेत देते हैं कि भारत इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की ज्योपॉलिटिकल  प्रतिक्रिया से बचना चाहता है।

वहीं अगर INS अरिहंत से K-4 मिसाइल का परीक्षण यदि सफल हुआ है, तो यह भारत की परमाणु रणनीति में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी। यह कदम भारत को समुद्र-आधारित परमाणु शक्ति के क्षेत्र में एक मजबूत खिलाड़ी बना देगा।

भले ही सरकार ने इस पर कोई बयान नहीं दिया हो, लेकिन यह तय है कि ऐसे परीक्षण भारत की रक्षा क्षमताओं को नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगे। इसके साथ ही यह देश की आत्मनिर्भरता और DRDO जैसे संस्थानों की सफलता का प्रमाण भी है।

आने वाले दिनों में अगर इस परीक्षण की पुष्टि होती है, तो यह भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी ताकत दिखाने का एक और अवसर होगा। अब, पूरे देश की नजरें इस बात पर हैं कि सरकार कब और कैसे इस पर अपनी प्रतिक्रिया देती है।

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  • हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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