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डीआरडीओ का बड़ा ब्रेकथ्रू, रैमजेट टेक्नोलॉजी से बदलेंगे एयर कॉम्बैट के नियम, अस्त्र मार्क-3 को मिलेगी नई ताकत

एसएफडीआर टेक्नोलॉजी का सीधा फायदा भारतीय वायुसेना को मिलने वाला है। डीआरडीओ इसी तकनीक के आधार पर अगली पीढ़ी की एयर-टू-एयर मिसाइल डेवलप कर रहा है, जिसे अस्त्र मार्क-3 या गंडिव भी कहा जा रहा है...

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📍नई दिल्ली | 3 Feb, 2026, 8:48 PM

DRDO SFDR Technology: डीआरडीओ ने मंगलवार को ऐसे तकनीक का सफल परीक्षण किया, जिसके बाद एयर कॉम्बैट के नियम पूरी तरह से बदल जाएंगे। डीआरडीओ ने सॉलिड फ्यूल डक्टेड रामजेट यानी एसएफडीआर टेक्नोलॉजी का सफल टेस्ट किया। यह एक ऐसी एडवांस्ड तकनीक है, जो भारतीय वायुसेना को बेहद लंबी दूरी तक मार करने वाली, लगातार हाई-स्पीड बनाए रखने वाली और आखिरी पल तक घातक एयर-टू-एयर मिसाइल देने वाली है। यह टेस्ट भारत के एयर डोमिनेंस की दिशा में एक बड़ी छलांग मानी जा रही है।

डीआरडीओ ने यह टेस्ट ओडिशा के चांदीपुर स्थित इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज से किया गया। सुबह करीब 10 बजकर 45 मिनट पर हुए इस फ्लाइट डेमॉन्स्ट्रेशन ने यह साबित कर दिया कि भारत अब उन चुनिंदा देशों की कतार में खड़ा हो चुका है, जिनके पास एडवांस्ड रैमजेट मिसाइल टेक्नोलॉजी मौजूद है। (DRDO SFDR Technology)

DRDO SFDR Technology: क्या हुआ इस टेस्ट में

डीआरडीओ के मुताबिक, इस डेमॉन्स्ट्रेशन में एसएफडीआर से जुड़े सभी अहम सब-सिस्टम्स ने उम्मीद के मुताबिक काम किया। शुरुआत में मिसाइल को एक ग्राउंड बूस्टर से लॉन्च किया गया, जिसने उसे जरूरी मैक स्पीड तक पहुंचाया। इसके बाद डक्टेड रैमजेट मोड एक्टिव हुआ और मिसाइल ने लगातार हाई स्पीड पर उड़ान जारी रखी।

इस पूरे टेस्ट के दौरान नोजल-लेस बूस्टर, सॉलिड फ्यूल डक्टेड रैमजेट मोटर और फ्यूल फ्लो कंट्रोलर की परफॉर्मेंस को बारीकी से मॉनिटर किया गया। बंगाल की खाड़ी के ऊपर उड़ रही मिसाइल के हर मूवमेंट को रडार, टेलीमेट्री और अन्य ट्रैकिंग सिस्टम्स से रिकॉर्ड किया गया, जिससे यह पता लगा कि सिस्टम पूरी तरह स्टेबल और कंट्रोल में था। (DRDO SFDR Technology)

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एसएफडीआर आखिर है क्या

आसान शब्दों में समझें तो एसएफडीआर टेक्नोलॉजी पारंपरिक रॉकेट इंजन से काफी अलग है। आम रॉकेट मिसाइलों में फ्यूल और ऑक्सीडाइजर दोनों मिसाइल के अंदर ही होते हैं। इससे वजन बढ़ जाता है और रेंज सीमित हो जाती है।

लेकिन रैमजेट टेक्नोलॉजी में मिसाइल हवा से ऑक्सीजन लेती है और सिर्फ फ्यूल अपने साथ रखती है। एसएफडीआर में यह फ्यूल सॉलिड फॉर्म में होता है। यही वजह है कि मिसाइल हल्की होती है, ज्यादा दूरी तय कर सकती है और लंबे समय तक तेज रफ्तार बनाए रखती है।

इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि मिसाइल आखिरी स्टेज यानी एंड-गेम में भी अपनी एनर्जी नहीं खोती। यानी टारगेट के पास पहुंचते समय भी उसकी स्पीड और मारक क्षमता बनी रहती है, जिससे दुश्मन के फाइटर जेट या सपोर्ट एयरक्राफ्ट के बचने की संभावना बेहद कम हो जाती है। (DRDO SFDR Technology)

भारतीय वायुसेना के लिए क्यों है गेमचेंजर

एसएफडीआर टेक्नोलॉजी का सीधा फायदा भारतीय वायुसेना को मिलने वाला है। डीआरडीओ इसी तकनीक के आधार पर अगली पीढ़ी की एयर-टू-एयर मिसाइल डेवलप कर रहा है, जिसे अस्त्र मार्क-3 या गंडिव भी कहा जा रहा है।

अभी भारतीय वायुसेना के पास अस्त्र मार्क-1 और अस्त्र मार्क-2 जैसी मिसाइलें हैं, जिनकी रेंज क्रमशः करीब 110 किलोमीटर और 150 से 200 किलोमीटर के आसपास मानी जाती है। लेकिन एसएफडीआर आधारित अस्त्र मार्क-3 की रेंज 300 किलोमीटर से भी ज्यादा हो सकती है।

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इसका मतलब यह हुआ कि अब भारतीय लड़ाकू विमान दुश्मन के एयरबोर्न अर्ली वॉर्निंग सिस्टम, टैंकर एयरक्राफ्ट और फाइटर जेट्स को बहुत दूर से ही निशाना बना सकेंगे। इससे न सिर्फ वायुसेना को रणनीतिक बढ़त मिलेगी, बल्कि युद्ध के शुरुआती चरण में ही दुश्मन की एयर ताकत कमजोर की जा सकेगी। (DRDO SFDR Technology)

विदेशी निर्भरता होगी कम

अब तक लंबी दूरी की एयर-टू-एयर मिसाइलों के लिए भारत को विदेशी सिस्टम्स पर निर्भर रहना पड़ता था। फ्रांस की मेटियोर मिसाइल इसका उदाहरण है। लेकिन एसएफडीआर के सफल टेस्ट के बाद यह साफ हो गया है कि भारत अब इस अहम तकनीक में आत्मनिर्भर बनने की ओर बढ़ रहा है।

इससे न सिर्फ विदेशी आयात पर खर्च कम होगा, बल्कि भविष्य में भारत खुद ऐसी एडवांस्ड मिसाइलें एक्सपोर्ट करने की स्थिति में भी आ सकता है। (DRDO SFDR Technology)

किन वैज्ञानिकों और लैब्स ने निभाई भूमिका

इस टेस्ट को डीआरडीओ की कई प्रमुख प्रयोगशालाओं के वैज्ञानिकों ने मिलकर अंजाम दिया। डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट लैबोरेटरी, हाई एनर्जी मटीरियल्स रिसर्च लैबोरेटरी, रिसर्च सेंटर इमारत और आईटीआर के वैज्ञानिकों ने पूरे मिशन को मॉनिटर किया।

यह टेक्नोलॉजी कोई एक-दो साल की मेहनत का नतीजा नहीं है। डीआरडीओ पिछले एक दशक से ज्यादा समय से रैमजेट और हाई-स्पीड प्रोपल्शन सिस्टम पर काम कर रहा है। यह सफल डेमॉन्स्ट्रेशन उसी लंबी मेहनत का परिणाम माना जा रहा है।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस उपलब्धि पर डीआरडीओ और इंडस्ट्री को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह सफलता भारत की रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

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वहीं, डीआरडीओ के चेयरमैन समीर वी कामत ने भी इस फ्लाइट टेस्ट से जुड़े सभी वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की तारीफ की। उनके मुताबिक, एसएफडीआर टेक्नोलॉजी का सफल प्रदर्शन भारत को भविष्य की एयर-टू-एयर मिसाइलों के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने में अहम भूमिका निभाएगा। (DRDO SFDR Technology)

अस्त्र मार्क-3 का पूरा सिस्टम होगा टेस्ट

अब अगला कदम इस टेक्नोलॉजी को पूरी मिसाइल सिस्टम में इंटीग्रेट करना होगा। माना जा रहा है कि आने वाले कुछ सालों में अस्त्र मार्क-3 का पूरा सिस्टम टेस्ट किया जाएगा और फिर उसे भारतीय वायुसेना में शामिल किया जाएगा।

अगर सब कुछ योजना के मुताबिक चलता है, तो 2028-29 के आसपास भारतीय वायुसेना को एसएफडीआर आधारित लंबी दूरी की एयर-टू-एयर मिसाइल मिल सकती है। यह न सिर्फ भारत की एयर डोमिनेंस को मजबूत करेगी, बल्कि क्षेत्रीय स्तर पर भी भारत की सामरिक स्थिति को और मजबूत बनाएगी। (DRDO SFDR Technology)

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