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Pakistan Air Defence: पाक एयर डिफेंस की 2022 की चूक बनी भारत की जीत का हथियार! ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस के आगे क्यों फेल हुआ पाकिस्तान का सुरक्षा कवच?

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पाकिस्तान के पास उस समय HQ-9 और HQ-16 (जिसे LY-80 भी कहा जाता है) जैसे एयर डिफेंस सिस्टम थे। लेकिन ये ब्रह्मोस जैसी सुपरसोनिक मिसाइलों को रोकने में नाकामयाब रहे। HQ-9 की क्रूज मिसाइलों के खिलाफ प्रभावी रेंज केवल 25 किमी के आसपास है, जो ब्रह्मोस की रफ्तार और रेंज (290-500 किमी) के सामने बेकार है...

📍नई दिल्ली | 15 May, 2025, 3:31 PM

Pakistan Air Defence: भारतीय सेनाओं में एक किताब अवश्य पढ़ाई जाती है, Sun Tzu की “The Art of War”। Sun Tzu एक प्राचीन चीनी सैन्य रणनीतिकार, दार्शनिक और लेखक थे। उन्होंने अपनी किताब में लिखा है, “लोगों को वही दिखाओ जिसकी उन्हें अपेक्षा हो। इससे वे आपके फैंके जाल में फंस जाते हैं, और तुम उस क्षण की प्रतीक्षा कर सकते हो जिसकी वे कल्पना भी नहीं कर सकते।” वहीं, उन्होंने एक जगह यह भी लिखा है, “युद्ध की सर्वोच्च कला यह है कि बिना लड़े ही दुश्मन को पराजित कर दिया जाए।” कुछ ऐसा ही पाकिस्तान के साथ हुआ है। 2022 में हुई एक घटना जिसे बेहद सामान्य मान कर पाकिस्तान ने इग्नोर कर दिया था, उसका खामियाजा आज उसे ऑपरेशन सिंदूर में अपने 11 एयरबेसों पर हुई सटीक मिसाइल स्ट्राइक के तौर पर भुगतना पड़ा और बिना लड़े ही घुटने टेकने पड़े।

Pakistan Air Defence: क्या हुआ 9 मार्च, 2022 को?

9 मार्च 2022 को एक खबर आई थी कि ब्रह्मोस मिसाइल पाकिस्तानी इलाके (Pakistan Air Defence) में आ कर गिरी है। उस दौरान पाकिस्तान के इंटर-सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस (ISPR) के महानिदेशक मेजर जनरल बाबर इफ्तिखार ने 10 मार्च 2022 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया था कि पाकिस्तान वायु सेना (PAF) के एयर डिफेंस ऑपरेशंस सेंटर ने 9 मार्च 2022 को शाम 6:43 बजे भारतीय क्षेत्र के अंदर एक “हाई-स्पीड फ्लाइंग ऑब्जेक्ट” को ट्रैक किया था। मिसाइल को हरियाणा के सिरसा से लॉन्च किया गया था। उनके अनुसार, मिसाइल ने अपनी तय दिशा से अचानक पाकिस्तानी क्षेत्र की ओर रुख किया और शाम 6:50 बजे मियां चन्नू, खानेवाल जिला, पंजाब में दुर्घटनाग्रस्त हो गई। पाकिस्तान ने कहा कि मिसाइल ने 124 किमी तक पाकिस्तानी क्षेत्र में 3 मिनट 44 सेकंड तक उड़ान भरी थी।

वहीं, 11 मार्च 2022 को, इस घटना के लगभग 48 घंटे बाद, भारत के रक्षा मंत्रालय ने एक संक्षिप्त बयान जारी किया था। इसमें कहा गया, “9 मार्च 2022 को, नियमित रखरखाव के दौरान एक तकनीकी खराबी के कारण एक मिसाइल गलती से लॉन्च हो गई। यह मिसाइल पाकिस्तान के एक क्षेत्र में गिरी। भारत ने इस घटना पर खेद जताया था और कहा था कि यह राहत की बात है कि इससे किसी की जान नहीं गई।”

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मंत्रालय ने यह भी बताया कि सरकार ने इस मामले को गंभीरता से लिया है और एक उच्च-स्तरीय जांच समिति (Court of Enquiry) का गठन किया है। हालांकि इस बयान में मिसाइल के प्रकार का उल्लेख नहीं किया गया, लेकिन बाद में सूत्रों ने पुष्टि की कि यह भारत-रूस द्वारा संयुक्त रूप से विकसित ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल थी। 15 मार्च 2022 को, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भारतीय संसद में इस मुद्दे पर बोलते हुए कहा, “नियमित रखरखाव और निरीक्षण के दौरान एक मिसाइल का अनजाने में लॉन्च हो जाना एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी। हमें बाद में पता चला कि मिसाइल पाकिस्तान (Pakistan Air Defence) के क्षेत्र में गिरी।” उन्होंने दोहराया कि यह घटना “खेदजनक” थी और सरकार ने इसे रोकने के लिए प्रक्रियाओं की समीक्षा शुरू कर दी है।

तब भी पाकिस्तानी एयर डिफेंस सिस्टम हुआ था फेल

हालांकि पाकिस्तान ने दावा किया कि उसने मिसाइल को ट्रैक किया, लेकिन सूत्रों का का कहना है कि पाकिस्तान का एयर डिफेंस सिस्टम (Pakistan Air Defence) उस समय भी फेल हो गया था। उस समय भी पाकिस्तान के पास चीनी मूल के HQ-9 और HQ-16 (LY-80) सिस्टम शामिल थे औऱ वे इस सुपरसोनिक मिसाइल को प्रभावी ढंग से ट्रैक करने या रोकने में असमर्थ रहे। सूत्रों ने बताया कि पाकिस्तान के चीनी रडार सिस्टम ने मिसाइल को किसी भी चरण में डिटेक्ट नहीं किया, और केवल इसके दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद ही पाकिस्तानी सेना ने इसकी जानकारी दी।

सूत्रों ने बताया कि अगर पाकिस्तान ने मिसाइल को ट्रैक किया था, तो उसने इसे इंटरसेप्ट क्यों नहीं किया, खासकर जब यह न्यूक्लियर-कैपेबल मिसाइल थी। उस समय भी पाकिस्तान टुडे की एक रिपोर्ट में इस ओर इशारा किया गया था और पाकिस्तान के एय़र डिफेंस सिस्टम (Pakistan Air Defence) पर सवाल उठाए गए थे कि मियां चन्नू में दुर्घटनाग्रस्त होने से पहले ही मिसाइल को क्यों नहीं रोका गया था।

भारतीय सैन्य सूत्रों ने बताया कि समझदार के लिए इशारा ही काफी है। उस समय दोनों देशों के बीच कोई जंग तो छिड़ी नहीं थी। ऐसे में मिसाइल की स्टेल्थ कैपेबिलिटी को टेस्ट करने का इससे बेहतर तरीका क्या हो सकता था। गलती मान ली और बात रफादफा हो गई। उन्होंने दावा किया कि मिसाइल का लॉन्च “आकस्मिक” नहीं, बल्कि जानबूझकर पाकिस्तान की प्रतिक्रिया समय और रक्षा क्षमताओं का टेस्टिंग करने के लिए किया गया था।

ब्रह्मोस की रफ्तार और रेंज के आगे हुए फेल

पाकिस्तान के पास उस समय HQ-9 और HQ-16 (जिसे LY-80 भी कहा जाता है) जैसे एय़र डिफेंस सिस्टम (Pakistan Air Defence) थे। लेकिन ये ब्रह्मोस जैसी सुपरसोनिक मिसाइलों को रोकने में नाकामयाब रहे। HQ-9 की क्रूज मिसाइलों के खिलाफ प्रभावी रेंज केवल 25 किमी के आसपास है, जो ब्रह्मोस की रफ्तार और रेंज (290-500 किमी) के सामने बेकार है। हालांकि 2022 की घटना के बाद पाकिस्तान ने अपने LY-80 सिस्टम में 388 तकनीकी दिक्कतों की एक सूची चीन को सौंपी थी, जिनमें से 255 में तत्काल सुधार की जरूरत थी। हालांकि 2024 में पाकिस्तान ने HQ-16FE जैसे एयर डिफेंस सिस्टम को शामिल करने की पहल की थी।

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ऑपरेशन सिंदूर में मिला ‘गलती’ का फायदा

सूत्रों ने बताया कि ‘गलती’ से ब्रह्मोस मिसाइल गिरने से भारत ने बहुत कुछ सीखा और ऑपरेशन सिंदूर में इसका जबरदस्त फायदा मिला। भारतीय वायुसेना ने 7 से 10 मई के बीच पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकवादी और सैन्य ठिकानों पर सटीक हमले किए। ये हमले तब किए गए जब भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के एयर डिफेंस (AD) सिस्टम (Pakistan Air Defence) को जाम कर दिया।

सरकारी बयान के मुताबिक, भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान की एयर डिफेंस (Pakistan Air Defence) को जाम कर 23 मिनट के भीतर मिशन पूरा किया। इन हमलों में नौ आतंकवादी शिविरों को नष्ट किया गया। रात 9-10 मई को, IAF ने रफीकी, मुरिद, चकलाला, रहीम यार खान, सियालकोट, सक्कर, स्कार्दू, सर्गोधा, जैकोबाबाद, कराची के भोलारी और मलिर कैंट सहित 13 एयरबेस पर हमले किए। खास बात यह रही कि इन हमलों में ब्रह्मोस मिसाइल का इस्तेमाल किया गया। यह 1971 के युद्ध के बाद पाकिस्तान पर सबसे बड़ा हमला था।

भारतीय वायुसेना ने चीनी HQ-9 एयर डिफेंस सिस्टम (Pakistan Air Defence) को जाम कर दिया, जिससे पाकिस्तान के रडार को सिग्नल नहीं मिला, और भारतीय विमानों को टारगेट करने में फेल हो गए। यही नहीं, भारत ने पहली बार इतने व्यापक स्तर पर लोइटरिंग म्यूनिशन (आत्मघाती ड्रोन) का इस्तेमाल किया, जिससे दुश्मन के हाई-वैल्यू टारगेट जैसे रडार और मिसाइल यूनिट तबाह कर दिए गए। ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय वायुसेना ने इलैक्ट्रॉनिक वॉरफेयर स्ट्रेटेजी का इस्तेमाल किया और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध तकनीकों, जैसे डिकॉय, सिग्नल ब्लॉकिंग और रडार जैमिंग का इस्तेमाल किया। SEAD (Suppression of Enemy Air Defenses) रणनीति के तहत हार्पी ड्रोन ने पाकिस्तानी रडार और मिसाइल सिस्टम को नष्ट किया। लाहौर, सियालकोट और कराची में तैनात रडार यूनिट्स पूरी तरह बेकार हो गईं।

23 मिनट में पूरा किया मिशन

वायुसेना सूत्रों का कहना है, भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के चीनी एय़र डिफेंस सिस्टम (Pakistan Air Defence) को नाकाम और जाम कर दिया, मात्र 23 मिनट में मिशन पूरा किया। जामिंग के चलते दुश्मन के रडार कन्फ्यूज हो गए और मिसाइलों को डिटेक्ट नहीं कर पाए। सूत्रों ने बताया कि 2022 तो छोड़िए 2019 में भी पुलवामा आतंकी हमले के बाद जब भारतीय फाइटर जेट बालाकोट में घुसे थे, तो भी पाकिस्तान का एयर डिफेंस सिस्टम उन्हें ट्रैक नहीं कर पाया था।

ऑपरेशन सिंदूर की प्रेस कॉन्फ्रेंस में सरकार ने बताया था कि मिशन के दौरान हमले में स्कैल्प क्रूज मिसाइलों का इस्तेमाल किया था। ये मिसाइलें राफेल लड़ाकू विमानों में लगाई गई थीं। ये फ्रांसीसी मूल की मिसाइलें चुपचाप हमला करने के लिए जानी जाती हैं और 500 किलोमीटर से अधिक की रेंज और जमीन के करीब उड़ान भरने की खबियों के लिए जानी जाती हैं। इन मिसाइलों ने पाकिस्तानी हवाई क्षेत्र में बिना रडार की पकड़ में आए निशाने पर सटीक वार किया। एक भी मिसाइल को रडार डिटेक्ट नहीं कर पाए।

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सूत्रों का कहना है कि कई सालों की खरीद और अपग्रेड के बावजूद, पाकिस्तान का इंटीग्रेटेड एय़र डिफेंस नेटवर्क (Pakistan Air Defence) उस समय पूरी तरह विफल हो गया जब उसकी असली परीक्षा थी। HQ-9 स्कैल्प मिसाइलों को ट्रैक ही नहीं कर पाया। पाकिस्तान को समझना चाहिए कि जिस बीजिंग के हथियारों के भरोसे वह जंग के मैदान में उतरा है, वह कितने कारगर हैं।

एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा दे सकती है ब्रह्मोस

सूत्रों ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान के एयर डिफेंस (Pakistan Air Defence) के जाम होने का फायदा ब्रह्मोस को मिला और वे उसे डिटेक्ट नहीं कर पाए। बता दें कि ब्रह्मोस की रफ्तार लगभग 2.8 से 3.5 मैक है, जो दुनिया की सबसे तेज़ क्रूज मिसाइलों में से एक है। इस तेज रफ्तार के कारण दुश्मन के रडार और एयर डिफेंस सिस्टम को प्रतिक्रिया देने के लिए बहुत कम समय मिलता है। 290 किमी की रेंज वाली ब्रह्मोस कुछ ही मिनटों में लक्ष्य तक पहुंच सकती है, जिससे इंटरसेप्शन मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा ब्रह्मोस समुद्र की सतह से 3-10 मीटर की ऊंचाई पर उड़ान भर सकती है (सी-स्किमिंग) और जमीनी लक्ष्यों के लिए इलाके के करीब (टेरेन-हगिंग) उड़ान भरती है। इससे रडार इसका पता नहीं पाते क्योंकि क्योंकि कम ऊंचाई पर रडार की लाइन-ऑफ-साइट सीमित होती है।

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इसके अलावा ब्रह्मोस विभिन्न फ्लाइट पाथ, जैसे कि ऊंची उड़ान, सीधी गोता (Steep Dive), और समुद्र-स्तर की उड़ान, का उपयोग कर सकती है। इस ट्रैजेक्टरी के चलते एयर डिफेंस सिस्टम के लिए इसे ट्रैक करना और इंटरसेप्ट करना मुश्किल हो जाता है। साथ ही, ब्रह्मोस में भी स्टील्थ खूबियां हैं, जो इसके रडार क्रॉस-सेक्शन को कम करती हैं। इससे यह रडार द्वारा आसानी से डिटेक्ट नहीं होती। ब्रह्मोस-एनजी (नेक्स्ट जेनरेशन) में यह खूबी और एडवांस होगी, जिससे इसे डिटेक्ट करना और मुश्किल होगा। ब्रह्मोस में इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम (INS), जीपीएस/ग्लोनास, और एक्टिव/पैसिव रडार सीकर का कॉन्बिनेशन है। जो इसे इलेक्ट्रॉनिक काउंटरमेज़र्स (ECCM) के खिलाफ ताकतवर बनाता है, क्योंकि यह दुश्मन के जैमिंग प्रयासों को नजरअंदाज कर लक्ष्य को भेद सकता है।

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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