📍लेह/नई दिल्ली | 12 Nov, 2025, 7:29 PM
Nyoma Airfield: पूर्वी लद्दाख में चीन सीमा के करीब बना भारत का सबसे ऊंचा न्योमा एयरबेस अब पूरी तरह ऑपरेशनल हो गया है। यह एयरबेस 13,700 फीट की ऊंचाई पर स्थित है और एलएसी से मात्र 23-30 किलोमीटर की दूरी पर है। बुधवार को भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने खुद सी-130जे ‘सुपर हरक्यूलिस’ विमान उड़ाकर यहां लैंडिंग की और एयरबेस का औपचारिक उद्घाटन किया। उनके साथ वेस्टर्न एयर कमांड प्रमुख एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा भी मौजूद थे।
न्योमा एयरफील्ड के शुरू होने से न केवल भारत की हवाई क्षमता बढ़ेगी, बल्कि सीमाई इलाकों में सैनिकों और सैन्य साजोसामान की तैनाती भी पहले से कहीं तेजी से हो सकेगी।
यह एयरफील्ड पूर्वी लद्दाख के मुध-न्योमा क्षेत्र में बनाया गया है। 218 करोड़ रुपये की लागत से बने इस एयरबेस का निर्माण कार्य 12 सितंबर 2023 को शुरू हुआ था और 12 अक्टूबर 2024 को यह पूरी तरह तैयार कर लिया गया। लद्दाख में छह महीने तक बर्फ जमने और रास्ते बंद रहने के कारण यह प्रोजेक्ट सिर्फ सात महीनों में मिशन मोड पर पूरा किया गया।
सूत्रों के मुताबिक यहाां असल काम का समय केवल सात महीने का ही था। यहां सितंबर और अक्टूबर के बीच ही काम करना संभव होता है, इसलिए इस प्रोजेक्ट को मिशन मोड में पूरा किया गया।
निर्माण में शामिल एक अधिकारी ने कहा, “हमने दिन-रात काम किया। कठिन मौसम और ऊंचाई के बावजूद, काम की क्वॉलिटी से कोई समझौता नहीं किया गया।”
इस एयरबेस में 2.7 किलोमीटर लंबा कंक्रीट रनवे बनाया गया है, जिस पर अब लड़ाकू विमान, ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और हेलीकॉप्टर आराम से लैंड कर सकेंगे। यहां एयर ट्रैफिक कंट्रोल टावर, हैंगर, रिफ्यूलिंग बे और चालक दल के ठहरने की सुविधाएं भी उपलब्ध कराई गई हैं, जिससे यह बेस लंबे समय तक ऑपरेशनल रह सकेगा। इस रनवे पर अब लड़ाकू विमान, हेलिकॉप्टर और ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट आसानी से उड़ान भर सकेंगे और लैंड कर सकेंगे।
इस एयर फील्ड को कई सैन्य मानवरहित, रोटरी-विंग, फिक्स्ड-विंग विमानों को रखने के लिए डिजाइन किया गया है, जिनमें सी-17 ग्लोबमास्टर III जैसे भारी परिवहन विमान और सुखोई-30 जैसे लड़ाकू जेट शामिल हैं।
बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन ने इस प्रोजेक्ट को अपने प्रोजेक्ट हिमांक के तहत पूरा किया है। इसकी अगुवाई उसकी महिला अधिकारियों की टीम ने की है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सितंबर 2023 में इसका शिलान्यास किया था और इसे “भारतीय सेना के लिए गेम-चेंजर” बताया था।
1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद, न्योमा हवाई पट्टी दशकों तक उपयोग में नहीं रही, और 2009 में भारतीय वायु सेना के ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट एएन-32 के पहली बार यहां उतरने के बाद इसे फिर से एक्टिव किया गया।
बीआरओ के प्रोजेक्ट हिमांक के चीफ इंजीनियर ब्रिगेडियर विशाल श्रीवास्तव ने इस सफलता पर गर्व जताते हुए कहा कि उनकी टीम ने बेहद कठिन परिस्थितियों में असाधारण काम किया है। उन्होंने बताया कि न्योमा का यह रनवे न सिर्फ सामरिक दृष्टि से, बल्कि स्थानीय लोगों की आवाजाही और आपातकालीन राहत कार्यों के लिए भी अहम साबित होगा।
ब्रिगेडियर श्रीवास्तव ने कहा, “इस एयरबेस का नाम पास के मुध गांव के नाम पर रखा गया है, जो इस इलाके की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को दर्शाता है।” उन्होंने बताया कि सर्दियों में यहां का तापमान माइनस 30 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है और कई महीनों तक सड़कें पूरी तरह बर्फ से ढकी रहती हैं। इसके बावजूद, बीआरओ की टीम ने आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर तय समय पर रनवे तैयार कर दिया।
इस एयरबेस के तैयार होने के बाद लद्दाख में वायुसेना के अब चार प्रमुख एयरबेस लेह, कारगिल, थोएस और अब न्योमा पूरी तरह ऑपरेशनल हैं। इसके अलावा, दौलत बेग ओल्डी में भी विशेष ऑपरेशन विमानों के लिए रनवे मौजूद है।
न्योमा एयरबेस के ऑपरेशनल होने से भारत को चीन सीमा पर जबरदस्त बढ़त मिलेगी। अब वायुसेना पैंगोंग त्सो, देमचोक और देपसांग जैसे अग्रिम इलाकों में सैनिकों और उपकरणों को बहुत तेजी से तैनात कर सकेगी। यह एयरबेस लड़ाकू विमानों के ऑपरेशन, ट्रांसपोर्ट मिशनों और आपातकालीन राहत अभियानों के लिए भी उपयोगी रहेगा।
रक्षा सूत्रों के मुताबिक, इस एयरबेस की भूमिका अगले वर्ष की शुरुआत में लड़ाकू विमान अभियानों में भी होगी। इसके साथ ही चीन की ओर से पिछले पांच वर्षों में सीमा के पार नए एयरबेस, बंकर, मिसाइल साइट्स और हेलीपैड्स बनाए गए हैं।
रक्षा विशेषज्ञ एयर मार्शल (सेवानिवृत्त) अनिल चोपड़ा के अनुसार, “न्योमा एयरबेस की भौगोलिकता इसे रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बनाती है। यह लेह से भी अधिक प्लेन घाटी में है और एलएसी के अधिक करीब है। यह तेजी से इंटरडिक्शन स्ट्राइक्स और सैनिकों की तैनाती में मदद करेगा।”
भारत ने पिछले कुछ सालों में एलएसी के पास तेजी से इंफ्रास्ट्रक्चर विकास किया है। सड़कों, पुलों और सुरंगों के साथ अब एयरफील्ड का नेटवर्क भी मजबूत किया जा रहा है। न्योमा एयरफील्ड इसके तहत एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
यह एयरफील्ड न केवल सैन्य दृष्टि से बल्कि स्थानीय लोगों की जिंदगी में भी बड़ा बदलाव लाएगा। भविष्य में यहां से सिविल उड़ानें शुरू होने की संभावना है, जिससे लद्दाख के दूरदराज इलाकों के लोगों को बेहतर कनेक्टिविटी और आर्थिक अवसर मिल सकेंगे।
भारतीय वायुसेना का कहना है कि न्योमा एयरफील्ड का निर्माण भारत की सामरिक तैयारियों को और मजबूती देता है। एलएसी पर किसी भी आपात स्थिति में यह एयरफील्ड सैनिकों, उपकरणों और राहत सामग्री की तुरंत तैनाती में अहम भूमिका निभाएगा।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि न्योमा एयरफील्ड भारत की सामरिक ताकत का नया प्रतीक है। इसकी मदद से पूर्वी लद्दाख में भारतीय सेना और वायुसेना को चीन की सीमा पर निगरानी, आपूर्ति और प्रतिक्रिया में तेजी मिलेगी। भारतीय वायुसेना के लिए यह एयरफील्ड एक “गेम चेंजर” साबित हो सकता है क्योंकि अब भारत के पास एक ऐसा हाई-एल्टीट्यूड एयरबेस है जो किसी भी मौसम या परिस्थिति में ऑपरेशनल रह सकता है।

