📍नई दिल्ली | 10 Feb, 2026, 10:22 PM
DAP 2026 Draft: देश की रक्षा तैयारियों को और मजबूत बनाने के लिए रक्षा मंत्रालय ने डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर 2026 (डीएपी-2026) का ड्राफ्ट तैयार कर लिया है और इसे सार्वजनिक सुझावों के लिए मंत्रालय की वेबसाइट पर अपलोड कर दिया है। नया ड्राफ्ट मौजूदा डीएपी-2020 की जगह लेगा, जो अभी लागू है। मंत्रालय ने साफ किया है कि यह ड्राफ्ट ‘ईयर ऑफ रिफॉर्म्स’ के तहत तैयार किया गया है और इसका उद्देश्य खरीद प्रक्रिया को तेज, पारदर्शी और आत्मनिर्भर बनाना है।
DAP 2026 Draft: क्या है डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर?
डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर यानी डीएपी वह डॉक्यूमेंट है, जिसके तहत सेना, नौसेना और वायुसेना के लिए बड़े हथियार, प्लेटफॉर्म, सिस्टम और उपकरण खरीदे जाते हैं। यह पूंजीगत बजट (कैपिटल बजट) से होने वाली खरीद पर लागू होती है।
ड्राफ्ट में स्पष्ट किया गया है कि डीएपी 2026 रक्षा बलों को समय पर, बेहतर गुणवत्ता वाले और आधुनिक उपकरण उपलब्ध कराने का आधार है। वहीं, मेंटेनेंस और मरम्मत जैसे राजस्व खर्च से जुड़े मामलों के लिए अलग से डिफेंस प्रोक्योरमेंट मैनुअल 2025 (डीपीएम-2025) लागू है। (DAP 2026 Draft)
आत्मनिर्भर भारत पर सबसे ज्यादा जोर
डीएपी-2026 का सबसे बड़ा फोकस “आत्मनिर्भर भारत” है। ड्राफ्ट के प्रस्तावना भाग में साफ लिखा गया है कि अब लक्ष्य सिर्फ मेड इन इंडिया नहीं, बल्कि ओन्ड बाय इंडिया है। इसका मतलब यह है कि अब सिर्फ विदेशी तकनीक लाकर भारत में असेंबली करने से काम नहीं चलेगा। यह बदलाव ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी (टीओटी) मॉडल से आगे बढ़कर डिजाइन, सोर्स कोड, बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) और अपग्रेड का अधिकार भारतीय संस्थाओं के पास होना चाहिए। (DAP 2026 Draft)
स्वदेशी डिजाइन और इंडिजिनस कंटेंट अनिवार्य
ड्राफ्ट में “इंडिजिनस डिजाइन (आईडी)” और “इंडिजिनस कंटेंट (आईसी)” को बेहद स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है। आईसी यानी कुल कॉन्ट्रैक्ट कीमत में कितना हिस्सा भारत में खर्च हुआ। इसके लिए एक फार्मूला भी दिया गया है, जिसके अनुसार विदेशी सामग्री की लागत घटाकर प्रतिशत निकाला जाएगा। अब हर कैटेगरी में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि कितना हिस्सा भारत में बना होना चाहिए।
सबसे पहले, बाय (इंडियन-आईडीडीएम) कैटेगरी की बात करें तो इसमें स्वदेशी डिजाइन, डेवलपमेंट और मैन्युफैक्चरिंग पर सबसे ज्यादा जोर है। इस कैटेगरी में ट्रायल के समय कम से कम 30 फीसदी इंडिजिनस कंटेंट होना जरूरी होगा। यानी जब सिस्टम या उपकरण का परीक्षण होगा, तब उसका कम से कम 30 फीसदी हिस्सा भारत में बना होना चाहिए। अंतिम कॉन्ट्रैक्ट साइन होने तक यह हिस्सा बढ़कर कम से कम 60 प्रतिशत होना अनिवार्य होगा। मतलब साफ है कि आखिरी चरण में आधे से ज्यादा नहीं, बल्कि कम से कम 60 फीसदी उत्पाद पूरी तरह देश में तैयार होना चाहिए। (DAP 2026 Draft)
दूसरी श्रेणी है बाय (इंडियन) एंड मैन्युफैक्चर इन इंडिया। इसमें भी स्वदेशी निर्माण पर जोर दिया गया है। खास तौर पर मैन्युफैक्चरिंग वाले हिस्से में कम से कम 60 प्रतिशत इंडिजिनस कंटेंट जरूरी रखा गया है। यानी अगर कोई सिस्टम विदेशी डिजाइन पर आधारित भी हो, तो उसका निर्माण भारत में बड़े स्तर पर होना चाहिए और उसमें ज्यादातर हिस्सा देश में तैयार किया जाना चाहिए।
तीसरी श्रेणी है बाय (ग्लोबल)। इसमें विदेशी कंपनियों से सीधे खरीद की अनुमति होती है, लेकिन यहां भी पूरी तरह बाहर से तैयार सामान लाने की छूट नहीं है। इस कैटेगरी में अधिकतम 30 प्रतिशत तक इंडिजिनस कंटेंट की अनुमति है। यानी इसमें भारतीय हिस्सेदारी सीमित रहेगी। (DAP 2026 Draft)
सबसे अहम बात यह है कि पहली बार इंडिजिनस कंटेंट की गणना, उसका सर्टिफिकेशन प्रमाणन और वैरिफिकेशन इतने विस्तार से तय किया गया है। अब केवल दावा करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि यह साबित करना होगा कि कितना हिस्सा भारत में बना है। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और आत्मनिर्भरता को असली मजबूती मिलेगी। (DAP 2026 Draft)
खरीद के लिए बनाई 3 कैटेगरीज
डीएपी-2026 में रक्षा खरीद प्रक्रिया को तीन बड़े हिस्सों बाय स्कीम, डेवलपमेंट स्कीम और एडिशनल प्रोसीजर में बांटा गया है। बाय स्कीम के तहत “बाय (इंडियन-आईडीडीएम)” को सबसे ऊंची प्राथमिकता दी गई है, यानी पहले स्वदेशी डिजाइन, डेवलपमेंट और मैन्युफैक्चरिंग को मौका मिलेगा। डेवलपमेंट स्कीम में मेक-1, मेक-2, मेक-3, “आईडेक्स” और “टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड” जैसी कैटेगरी शामिल हैं, जिनका मकसद नई तकनीक और इनोवेशन को बढ़ावा देना है। इससे साफ संकेत मिलता है कि सरकार स्टार्टअप, एमएसएमई और निजी कंपनियों को रक्षा उत्पादन में बड़ी और सक्रिय भूमिका देना चाहती है। (DAP 2026 Draft)
टेस्टेड एंड डेवलप्ड टेक्नोलॉजी को ही मंजूरी
ड्राफ्ट में टेक्नोलॉजी रेडीनेस लेवल यानी टीआरएल के बारे में लिखा गया है। टीआरएल से यह पता चलता है कि कोई तकनीक कितनी तैयार और मैच्योर है। यानी वह केवल लैब में है या वास्तव में उपयोग के लिए तैयार है। अलग-अलग खरीद श्रेणियों के लिए अलग टीआरएल तय किए गए हैं। उदाहरण के तौर पर, “बाय (इंडियन-आईडीडीएम)” श्रेणी में टीआरएल 5 से 9 के बीच की टेक्नोलॉजी ही स्वीकार की जाएगी। इसका सीधा मतलब है कि आधी-अधूरी या सिर्फ प्रयोगात्मक तकनीक पर जल्दबाजी में खरीद नहीं होगी, बल्कि टेस्टेड एंड डेवलप्ड टेक्नोलॉजी को ही मंजूरी मिलेगी। (DAP 2026 Draft)
फास्ट ट्रैक प्रोसीजर की जरूरत
ड्राफ्ट में साफ कहा गया है कि अब तेजी से बदलती तकनीक को देखते हुए रक्षा खरीद प्रक्रिया को और तेज बनाया जाएगा। आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन, क्वांटम कंप्यूटिंग और डायरेक्टेड एनर्जी वेपन जैसी नई तकनीकें तेजी से विकसित हो रही हैं, इसलिए लंबी और जटिल प्रक्रिया से काम नहीं चलेगा। इसी वजह से फास्ट ट्रैक प्रोसीजर को मजबूत किया गया है, ताकि जरूरी उपकरण जल्दी खरीदे जा सकें। इसके अलावा लो-कॉस्ट कैपिटल एक्विजिशन और लीजिंग जैसे विकल्प भी शामिल किए गए हैं, जिससे सेना जरूरत पड़ने पर उपकरण किराए पर लेकर तुरंत इस्तेमाल कर सके। (DAP 2026 Draft)
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