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Explainer: कैंटोनमेंट से लेकर बीटिंग रिट्रीट तक: पढ़ें- कैसे तीनों सेनाओं ने मिटाई ब्रिटिश दौर की छाप

Indian Army colonial names removed

Indian Army colonial names removed: भारत को आजाद हुए सात दशक से ज्यादा बीत चुके हैं, लेकिन आज भी देश की कई संस्थाओं में ब्रिटिश दौर की छाप कहीं-न-कहीं दिखाई देती रही है। खासकर सेना के कैंटोनमेंट इलाकों में ऐसी सड़कें, इमारतें और कॉलोनियां थीं, जिनके नाम सीधे तौर पर औपनिवेशिक शासन की याद दिलाते थे। अब इसी विरासत को पीछे छोड़ते हुए भारतीय सेना ने एक बड़ा फैसला लिया है।

भारतीय सेना ने देशभर में अपने इस्टैब्लिशमेंट्स के भीतर मौजूद 246 सड़कों, इमारतों, कॉलोनियों और मिलिट्री फैसिलिटीज के नाम बदल दिए हैं। खास बात यह है कि इनके नाम ब्रिटिश काल से जुड़े हुए थे। भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने यह फैसला औपनिवेशिक मानसिकता से पूरी तरह बाहर निकलने और भारतीय वीरता, बलिदान और सैन्य परंपरा को पहचान देने के मकसद से उठाया है। (Indian Army colonial names removed)

Indian Army colonial names removed: क्यों जरूरी था नाम बदलने का यह फैसला?

आज भी कई कैंटोनमेंट इलाकों में मॉल रोड, क्वींस लाइन, किर्बी प्लेस, मैल्कम लाइंस जैसे ब्रिटिश नाम मौजूद थे। ये नाम उस दौर की याद दिलाते हैं, जब भारत पर ब्रिटिश शासन था और भारतीय सैनिक विदेशी हुक्मरानों के अधीन काम करते थे।

सेना के अधिकारियों का मानना है कि जब एक सैनिक रोज ऐसी सड़कों पर चलता है या ऐसी इमारतों में रहता है, जिनके नाम औपनिवेशिक अतीत से जुड़े हों, तो यह अनजाने में ही उस मानसिकता को आगे बढ़ाता है। इसलिए जरूरत महसूस की गई कि सैनिकों के रहने, ट्रेनिंग और काम करने की जगहों पर भारत के अपने नायकों और परंपराओं की छाप हो।

इस बदलाव के जरिए सेना यह संदेश देना चाहती है कि भारत की सेनाएं अब पूरी तरह अपनी जड़ों से जुड़कर आगे बढ़ रही हैं। ब्रिटिश शासन की याद दिलाने वाले नामों की जगह अब ऐसे नाम होंगे, जो भारतीय वीरों, युद्ध नायकों और महान सैन्य नेतृत्व को सम्मान देते हैं। (Indian Army colonial names removed)

246 नामों में क्या-क्या बदला गया?

भारतीय सेना के अनुसार, कुल 246 नामों में बदलाव किया गया है। इन्हें चार मुख्य कैटेगरीज में बांटा गया है। इनमें 124 सड़कें, 77 कॉलोनियां (रिहायशी इलाके), 27 इमारतें और अन्य सैन्य सुविधाएं, और 18 अन्य स्थान, जैसे पार्क, ट्रेनिंग एरिया, स्पोर्ट्स ग्राउंड, गेट, हेलीपैड आदि शामिल हैं।

भारतीय सेना के अनुसार, यह बदलाव देशभर के अलग-अलग कैंटोनमेंट और सैन्य स्टेशनों में लागू किया गया है। इसमें सड़कों, रिहायशी कॉलोनियों, इमारतों और कई अन्य सुविधाओं के नाम शामिल हैं। मकसद यह था कि केवल किसी एक जगह नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम में एक समान बदलाव दिखे।

सेना का कहना है कि जहां-जहां ब्रिटिश अधिकारियों, शाही परिवार या औपनिवेशिक प्रतीकों से जुड़े नाम थे, उन्हें हटाकर भारतीय पहचान से जुड़े नाम रखे गए हैं। (Indian Army colonial names removed)

दिल्ली कैंटोनमेंट में बदले ये नाम

दिल्ली कैंटोनमेंट में अधिकारियों के रहने की जगह किर्बी प्लेस को अब केनुगुरुसे विहार नाम दिया गया है। यह नाम परम वीर चक्र विजेता कैप्टन नियोटेनो केनुगुरुसे के सम्मान में रखा गया है। इसी तरह, दिल्ली की जानी-पहचानी मॉल रोड अब अरुण खेत्रपाल मार्ग के नाम से जानी जाएगी, जो 1971 के युद्ध में शहीद हुए सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की वीरता के प्रति सम्मान है।

दिल्ली कैंटोनमेंट की सड़कों की बात करें तो यहां कुछ सड़कों के नाम पहले जैसे ही रखे गए हैं, जबकि कई प्रमुख सड़कों को नए भारतीय नाम दिए गए हैं। पोलो रोड और परेड रोड के नामों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। वहीं टिग्रिस रोड को अब होशियार सिंह मार्ग कहा जाएगा।

कैसल रोड अब मानेकशॉ मार्ग के नाम से जानी जाएगी, जो फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ के सम्मान में है। मॉड रोड (डीसीबी रोड) को थिमय्या मार्ग का विस्तार नाम दिया गया है। लॉरी रोड अब रामास्वामी परमेश्वरन मार्ग कहलाएगी, जबकि जिमनैजियम रोड का नया नाम पद्मपाणि आचार्य मार्ग रखा गया है। तिमारपुर इलाके की प्रोबिन रोड को अब शैतान सिंह मार्ग नाम दिया गया है और कोतवाली रोड को कैप्टन अनुज नय्यर रोड कहा जाएगा। (Indian Army colonial names removed)

दिल्ली कैंटोनमेंट की रिहायशी कॉलोनियों में भी कई पुराने नाम बदले गए हैं। अधिकारियों के लिए बनी बेयर्ड प्लेस कॉलोनी को अब अनुज नय्यर विहार नाम दिया गया है। इसी तरह किर्बी प्लेस को पहले ही केनुगुरुसे विहार नाम दिया जा चुका है। टुबरक लाइन/टोब्रुक लाइन (जो सेबर मेस के पीछे स्थित है) को अब गुरदयाल विहार कहा जाएगा।

वहीं, तिमारपुर की किंग्सवे कैंप कॉलोनी का नाम बदलकर जोगिंदर सिंह विहार कर दिया गया है। निकलसन लाइन अब दिगेंद्र कुमार विहार कहलाएगी, जबकि निकलसन रेंज को नया नाम टॉरस बैटल रेंज दिया गया है। खैबर लाइन (एमसी के पीछे) को अब्दुल हमीद विहार नाम दिया गया है, जो 1965 के युद्ध के नायक कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद के सम्मान में है। टिग्रिस मॉड लाइन (कैवेलरी रोड पर) अब जदुनाथ विहार के नाम से जानी जाएगी और पोल्ट्री फार्म (डिफेंस सिविल एरिया) को राम चंदर विहार नाम दिया गया है।

इसके अलावा, अन्य सैन्य परिसरों में भी नाम बदले गए हैं। ऑचिनलेक सैनिक आरामगृह को अब सोमनाथ सैनिक आरामगृह कहा जाएगा। (Indian Army colonial names removed)

दूसरे शहरों के कैंटोनमेंट्स के भी बदले नाम

अंबाला कैंटोनमेंट में पैटरसन रोड क्वार्टर्स का नाम बदलकर धन सिंह थापा एन्क्लेव कर दिया गया है। यह नाम परम वीर चक्र विजेता मेजर धन सिंह थापा की बहादुरी की याद दिलाएगा। मथुरा कैंटोनमेंट में मौजूद न्यू हॉर्न लाइन अब अब्दुल हमीद लाइंस कहलाएगी, जो 1965 के युद्ध में दुश्मन के टैंकों को नष्ट करने वाले कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद को समर्पित है।

जयपुर कैंटोनमेंट में क्वींस लाइन रोड का नाम बदलकर सुंदर सिंह मार्ग रखा गया है। वहीं, बरेली कैंटोनमेंट में न्यू बर्डवुड लाइन अब थिमय्या कॉलोनी के नाम से जानी जाएगी, जो भारतीय सेना के प्रतिष्ठित जनरल के.एस. थिमय्या की याद में है।

मध्य प्रदेश के महू कैंटोनमेंट में मैल्कम लाइंस को अब पीरू सिंह लाइंस नाम दिया गया है। यह नाम परम वीर चक्र विजेता कंपनी हवलदार मेजर पीरू सिंह की वीरता की याद दिलाएगी। (Indian Army colonial names removed)

देहरादून स्थित इंडियन मिलिट्री अकादमी में भी ब्रिटिश दौर के नाम बदले गए हैं। यहां कोलिन्स ब्लॉक को नुब्रा ब्लॉक और किंग्सवे ब्लॉक को कारगिल ब्लॉक नाम दिया गया है, जो भारतीय सैन्य इतिहास के महत्वपूर्ण अध्यायों से जुड़े हैं।

कोलकाता में मौजूद ऐतिहासिक फोर्ट विलियम का नाम अब विजय दुर्ग कर दिया गया है। यह बदलाव खास तौर पर प्रतीकात्मक माना जा रहा है, क्योंकि यह औपनिवेशिक सत्ता के प्रतीक रहे किले को भारतीय विजय और संप्रभुता से जोड़ता है।

नागालैंड के रंगापहार मिलिट्री स्टेशन में स्थित स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स को अब लैशराम ज्योतिन सिंह स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स नाम दिया गया है, जबकि जखामा मिलिट्री स्टेशन में स्पीयर लेक मार्ग अब हंगपन दादा मार्ग के नाम से जाना जाएगा। ये दोनों नाम अशोक चक्र विजेताओं की बहादुरी को सम्मान देते हैं। (Indian Army colonial names removed)

सिर्फ नाम नहीं, सोच बदलने की कोशिश

सेना का मानना है कि इस बदलाव का सबसे बड़ा असर मनोवैज्ञानिक स्तर पर होगा। जब कोई जवान “अब्दुल हमीद लाइंस” या “अरुण खेत्रपाल मार्ग” में रहता है, तो उसे रोज उन नायकों की कहानी याद आती है, जिन्होंने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।

सेना की यह पहल नई पीढ़ी के सैनिकों को यह सिखाने का तरीका भी है कि सेना की परंपरा सिर्फ हथियारों और वर्दी तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें इतिहास, बलिदान और मूल्य भी शामिल हैं। (Indian Army colonial names removed)

नेवी और एयर फोर्स में भी बदलाव

जहां सेना ने बड़े पैमाने पर नाम बदलने का अभियान चलाया है, वहीं भारतीय नेवी और भारतीय एयर फोर्स ने भी औपनिवेशिक विरासत को हटाने के लिए कदम उठाए हैं, लेकिन उनका तरीका थोड़ा अलग रहा है।

नेवी ने 2022 में नेवल एन्साइन बदला गया और ब्रिटिश प्रतीक हटाए गए। नौसेना ने सैंट जॉर्ज क्रॉस हटाया गया। वहीं, अब नौसेना का झंडा भारतीय परंपरा और छत्रपति शिवाजी महाराज से प्रेरित है। इसके अलावा कई ब्रिटिश काल की रस्मों और प्रतीकों को भी धीरे-धीरे बदला जा रहा है।

वहीं, एयर फोर्स में आजादी के बाद ही 1950 में “रॉयल इंडियन एयर फोर्स” से “रॉयल” शब्द हटाया गया था। वहीं, इंसिग्निया में टूडर क्राउन की जगह अशोक शेर और अन्य भारतीय प्रतीक लगाए गए। इसके अलावा परेड, संगीत और परंपराओं में भारतीय तत्वों को बढ़ावा दिया जा रहा है। साथ ही, रैंक नामों और प्रक्रियाओं को लेकर भी चर्चा चल रही है। (Indian Army colonial names removed)

राष्ट्रपति भवन में लगी परम वीर दीर्घा गैलरी

16 दिसंबर 2025 को विजय दिवस के मौके पर, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रपति भवन में 21 परम वीर चक्र से सम्मानित वीरों की नई गैलरी परम वीर दीर्घा का उद्घाटन किया। पुरानी व्यवस्था में राष्ट्रपति भवन के गलियारों में पहले 96 ब्रिटिश एड-डी-कैंप्स (एडीसी) की पोर्ट्रेट्स लगी हुई थीं। जो ब्रिटिश काल के दौरान वायसराय या गवर्नर-जनरल के सहायक अधिकारी होते थे, और उनके पोर्ट्रेट्स औपनिवेशिक युग की याद दिलाते थे। (Indian Army colonial names removed)

बीटिंग रिट्रीट समारोह भी ब्रिटिश दौर की छाया से निकला बाहर

बीटिंग रिट्रीट समारोह में सबसे बड़ा और सबसे ज्यादा चर्चा में रहा बदलाव ब्रिटिश क्रिश्चियन हिम्न ‘Abide with Me’ को हटाना रहा। यह गीत 1950 से हर साल समारोह के आखिर में बजता था, जब सूरज ढलता था और झंडे को उतारा जाता था। इसे महात्मा गांधी का पसंदीदा गीत माना जाता था, इसलिए यह परंपरा दशकों तक चली। लेकिन 2022 से यह गीत पूरी तरह हटा दिया गया। उसकी जगह ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ को शामिल किया गया, जो 1962 के युद्ध में शहीद हुए भारतीय सैनिकों को समर्पित है।

बीटिंग रिट्रीट में पहले सिर्फ ‘Abide with Me’ ही नहीं, बल्कि कई और विदेशी और ब्रिटिश दौर की मार्चिंग ट्यून्स भी बजती थीं। इनमें कर्नल बोगी मार्च, संस ऑफ द ब्रेव और कुछ स्कॉटिश पाइप धुनें शामिल थीं। हालांकि, इन्हें एक झटके में नहीं हटाया गया। 2011 के बाद से ही धीरे-धीरे विदेशी धुनों को कम किया जाने लगा। 2016 तक आते-आते, ज्यादातर परफॉर्मेंस भारतीय संगीतकारों और भारतीय धुनों पर आधारित हो गई थीं। लेकिन अब बीटिंग रिट्रीट पूरी तरह भारतीय संगीत पर टिका हुआ समारोह बन चुका है। (Indian Army colonial names removed)

114 राफेल जेट डील पर बड़ा फैसला! मैक्रों का भारत दौरा भारतीय वायुसेना के लिए बन सकता है गेमचेंजर

114 Rafale Jet Deal

114 Rafale Jet Deal: फरवरी का तीसरा हफ्ता भारत की डिफेंस पॉलिसी के लिहाज से काफी अहम माना जा रहा है। वजह है फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों 18 से 20 फरवरी के बीच भारत आ सकते हैं। इस दौरे का मुख्य कार्यक्रम भले ही एआई इम्पैक्ट समिट हो, लेकिन इसके ठीक पहले और दौरान भारत और फ्रांस के बीच एक बहुत बड़ी डिफेंस डील को अमली जामा पहनाया जा सकता है। यह डील भारतीय वायुसेना के लिए 114 राफेल फाइटर जेट्स की है, जिसकी अनुमानित कीमत करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये बताई जा रही है। (114 Rafale Jet Deal)

114 Rafale Jet Deal: क्या है 114 राफेल जेट्स की यह डील?

इस प्रस्ताव के तहत भारतीय वायुसेना को कुल 114 मल्टी-रोल राफेल फाइटर जेट्स मिलेंगे। इनमें 88 सिंगल-सीटर विमान होंगे, जो सीधे कॉम्बैट मिशन में इस्तेमाल किए जाएंगे, जबकि 26 ट्विन-सीटर जेट्स होंगे, जिनका इस्तेमाल ट्रेनिंग के साथ-साथ कुछ ऑपरेशनल रोल में भी किया जा सकेगा।

खास बात यह है कि इस बार राफेल की खरीद सिर्फ “बाय एंड फ्लाई” तक सीमित नहीं रहेगी। सरकार की योजना है कि इनमें से 80 फीसदी से ज्यादा विमान भारत में ही बनाए जाएं। यानी करीब 96 राफेल जेट्स देश में असेंबल और मैन्युफैक्चर किए जाएंगे। शुरुआत में कुछ विमान फ्रांस से सीधे आएंगे, ताकि वायुसेना को जल्दी ताकत मिल सके, लेकिन उसके बाद पूरा फोकस मेक इन इंडिया पर रहेगा। (114 Rafale Jet Deal)

भारत में कैसे बनेंगे राफेल?

इस डील में फ्रांस की कंपनी दसॉ एविएशन भारतीय कंपनियों के साथ मिलकर काम करेगी। नागपुर में पहले से मौजूद दसॉ-रिलायंस एयरोस्पेस लिमिटेड की फैसिलिटी को इस प्रोजेक्ट में अहम भूमिका मिलने की संभावना है। इसके अलावा एचएएल और अन्य प्राइवेट कंपनियां भी सप्लाई चेन और मैन्युफैक्चरिंग में शामिल हो सकती हैं।

योजना यह है कि राफेल के अलग-अलग पार्ट्स, सब-सिस्टम और मेंटेनेंस से जुड़ा काम भारत में हो। धीरे-धीरे लोकल कंटेंट 30 फीसदी से बढ़कर 60 फीसदी तक ले जाने की तैयारी है। इससे न सिर्फ लागत कम होगी, बल्कि भारत में हाई-स्किल जॉब्स और टेक्नोलॉजी का ट्रांसफर भी होगा। (114 Rafale Jet Deal)

अभी किस स्टेज पर है डील?

फरवरी 2026 तक की जानकारी के मुताबिक, इस प्रस्ताव को जनवरी में डिफेंस प्रोक्योरमेंट बोर्ड की शुरुआती मंजूरी मिल चुकी है। अब अगला कदम रक्षा मंत्रालय की हाई-लेवल मीटिंग है, जिसमें इस पर विस्तार से चर्चा होगी। इसके बाद इसे डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल और फिर कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी के सामने रखा जाएगा।

अगर सब कुछ योजना के मुताबिक चलता है, तो फ्रांसीसी राष्ट्रपति की भारत यात्रा के दौरान या उसके आसपास इस डील का औपचारिक ऐलान या समझौता हो सकता है। डिलीवरी की बात करें तो पहले राफेल जेट्स 2030 के आसपास मिलने शुरू हो सकते हैं। (114 Rafale Jet Deal)

भारतीय वायुसेना के लिए यह डील क्यों जरूरी है?

आज भारतीय वायुसेना के सामने सबसे बड़ी चुनौती फाइटर स्क्वाड्रन की कमी है। वायुसेना के पास इस समय करीब 29 से 30 स्क्वाड्रन ही बचे हैं, जबकि अप्रूव्ड संख्या 42 स्क्वाड्रन की है। पुराने मिग-21, जगुआर और कुछ अन्य विमान रिटायर हो रहे हैं, लेकिन उनकी जगह नए जेट्स उतनी तेजी से नहीं आ पा रहे।

तेजस मार्क-1ए प्रोजेक्ट में देरी, इंजन सप्लाई की समस्याएं और प्रोडक्शन धीमे होने से स्थिति और मुश्किल हो गई है। ऐसे में राफेल जैसे साबित हो चुके फाइटर जेट्स वायुसेना को तुरंत और लंबे समय तक ताकत दे सकते हैं। (114 Rafale Jet Deal)

हर मोर्चे पर भरोसेमंद फाइटर्स की जरूरत

पिछले कुछ वर्षों में भारत की सुरक्षा चिंताएं बढ़ी हैं। पाकिस्तान और चीन के बीच सैन्य तालमेल, बांग्लादेश के साथ पाकिस्तान की नजदीकियां और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की आक्रामक गतिविधियां भारत के लिए चुनौती हैं। ऐसे माहौल में वायुसेना को ऐसे फाइटर चाहिए, जो हर मोर्चे पर भरोसेमंद हों।

राफेल पहले ही भारतीय वायुसेना में अपनी क्षमता साबित कर चुका है। लंबी रेंज, एडवांस सेंसर, आधुनिक हथियार और मल्टी-रोल क्षमता इसे आज के समय का एक मजबूत फाइटर बनाती है। (114 Rafale Jet Deal)

भारत और फ्रांस के रक्षा रिश्ते पहले से मजबूत रहे हैं। 2016 में 36 राफेल जेट्स की डील हुई थी और हाल ही में नौसेना के लिए 26 राफेल मरीन विमानों को भी मंजूरी मिली है। 114 राफेल की यह नई डील से यह साझेदारी औऱ मजबूत होगी। (114 Rafale Jet Deal)

यह सौदा दुनिया में राफेल का अब तक का सबसे बड़ा सिंगल ऑर्डर माना जा रहा है। इससे फ्रांस के साथ भारत का रणनीतिक भरोसा मजबूत होगा और भारत को हाई-एंड एयरोस्पेस टेक्नोलॉजी में आत्मनिर्भर बनने का मौका मिलेगा।

हालांकि इस डील की लागत बहुत ज्यादा है, जिस पर सरकार को संतुलन बनाना होगा। इसके अलावा टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, लोकल मैन्युफैक्चरिंग और समय पर डिलीवरी जैसे मुद्दों पर भी कड़ी बातचीत चल रही है। लेकिन रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा सुरक्षा हालात में यह निवेश जरूरी है। (114 Rafale Jet Deal)

पीएम मोदी के मलेशिया दौरे में डिफेंस डील्स पर फोकस, डॉर्नियर विमान से लेकर सुखोई पर होगी बातचीत

India Malaysia defence cooperation
File Photo

India Malaysia defence cooperation: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आगामी मलेशिया दौरे को दोनों देशों रक्षा सहयोग के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। 7-8 फरवरी को होने वाले इस दौरे के दौरान भारत की नजर मलेशिया को डॉर्नियर एयरक्राफ्ट बेचने, स्कॉर्पीन सबमरीन के मेंटेनेंस और सुखोई-30 फाइटर जेट्स के अपग्रेडेशन जैसे अहम रक्षा सौदों पर टिकी हुई है।

दौरे से पहले राजधानी में आयोजित विशेष मीडिया ब्रीफिंग में विदेश मंत्रालय में ईस्ट मामलों के सचिव पी. कुमारन ने कहा कि भारत और मलेशिया के बीच रक्षा सहयोग की अपार संभावनाएं हैं। उन्होंने साफ किया कि आने वाले दिनों में डिफेंस सेक्टर दोनों देशों के रिश्तों का एक मजबूत शुरुआत हो सकती है। (India Malaysia defence cooperation)

India Malaysia defence cooperation: डॉर्नियर विमान की बिक्री पर भारत की नजर

सरकारी सूत्रों के मुताबिक, भारत मलेशिया को डॉर्नियर एयरक्राफ्ट बेचने की संभावनाएं तलाश रहा है। डॉर्नियर विमान छोटे और मध्यम दूरी के लिए इस्तेमाल होने वाले मल्टी-रोल एयरक्राफ्ट हैं, जिनका इस्तेमाल ट्रांसपोर्ट, सर्विलांस और समुद्री इलाकों की निगरानी में किया जाता है। भारत पहले ही कई मित्र देशों को डॉर्नियर विमान सप्लाई कर चुका है और अब मलेशिया इस सूची में शामिल हो सकता है।

विदेश मंत्रालय के मुताबिक, मलेशिया की भौगोलिक स्थिति और उसकी समुद्री जरूरतों को देखते हुए डॉर्नियर एयरक्राफ्ट उसके लिए एक उपयोगी विकल्प साबित हो सकते हैं। इससे न सिर्फ भारत के रक्षा निर्यात को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि दोनों देशों के बीच रणनीतिक भरोसा भी मजबूत होगा। (India Malaysia defence cooperation)

स्कॉर्पीन सबमरीन में सहयोग की संभावना

रक्षा सहयोग का दूसरा अहम पहलू स्कॉर्पीन सबमरीन से जुड़ा है। भारत और मलेशिया दोनों ही इस श्रेणी की सबमरीन ऑपरेट करते हैं। सचिव पी. कुमारन ने बताया कि मलेशिया अपने स्कॉर्पीन सबमरीन के लिए मिड-लाइफ अपग्रेड और रेट्रोफिटिंग जैसे विकल्पों पर विचार कर रहा है।

भारत ने इस क्षेत्र में सहयोग का प्रस्ताव दिया है। खासतौर पर भारतीय नौसेना के स्कॉर्पीन प्रोजेक्ट के बाद भारतीय शिपयार्ड्स और डिफेंस कंपनियों के पास अब सबमरीन मेंटेनेंस और अपग्रेड का अच्छा अनुभव है। ऐसे में भारत मलेशिया के लिए एक भरोसेमंद मेंटेनेंस और टेक्निकल पार्टनर बन सकता है। (India Malaysia defence cooperation)

सुखोई-30 फाइटर जेट्स पर भी बातचीत

भारत और मलेशिया दोनों ही सुखोई-30 फाइटर जेट्स का इस्तेमाल करते हैं। विदेश मंत्रालय के अनुसार, भारत ने मलेशिया को सुखोई-30 विमानों के मॉडिफिकेशन, अपग्रेडेशन और मिड-लाइफ मेंटेनेंस से जुड़े प्रस्ताव दिए हैं।

भारत में सुखोई-30 एमकेआई का मेंटेनेंस और अपग्रेडेशन बड़े पैमाने पर किया जाता है। ऐसे में मलेशिया के विमानों के लिए भारत एक किफायती और तकनीकी रूप से मजबूत विकल्प बनकर उभर सकता है। (India Malaysia defence cooperation)

भारतीय शिपयार्ड्स से नेवल प्लेटफॉर्म की सप्लाई

डिफेंस सहयोग को और आगे बढ़ाते हुए भारत मलेशिया को नेवल प्लेटफॉर्म सप्लाई करने की संभावनाएं भी तलाश रहा है। सचिव पी. कुमारन ने उम्मीद जताई कि भारतीय शिपयार्ड्स के जरिए मलेशिया को पेट्रोलिंग शिप या अन्य नौसैनिक प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराए जा सकते हैं। यह कदम भारत की डिफेंस इंडस्ट्री के लिए एक और बड़ा अवसर खोल सकता है। (India Malaysia defence cooperation)

भारत-मलेशिया रक्षा संबंध बेहद पुराने

भारत और मलेशिया के बीच रक्षा संबंध कोई नए नहीं हैं। दोनों देशों के बीच 1993 में डिफेंस कोऑपरेशन पर एमओयू साइन हुआ था, जिसे इन रिश्तों की नींव माना जाता है। इस समझौते के तहत संयुक्त परियोजनाओं, ट्रेनिंग, लॉजिस्टिक सपोर्ट और मेंटेनेंस जैसे क्षेत्रों में सहयोग का रास्ता खुला था।

समय के साथ यह सहयोग और मजबूत हुआ है। अगस्त 2024 में मलेशियाई प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम के भारत दौरे के दौरान दोनों देशों के रिश्तों को कम्प्रिहेंसिव स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप का दर्जा दिया गया था। (India Malaysia defence cooperation)

पीएम मोदी का दौरा क्यों है अहम

विदेश मंत्रालय के मुताबिक, प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी, विजन महासागर और इंडो-पैसिफिक रणनीति के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। मलेशिया आसियान का संस्थापक सदस्य है और 2025 में उसकी अध्यक्षता भी कर रहा है।

इस दौरे के दौरान दोनों प्रधानमंत्रियों के बीच व्यापार, निवेश, रक्षा, सुरक्षा, सेमीकंडक्टर, डिजिटल टेक्नोलॉजी, रिन्यूएबल एनर्जी, शिक्षा, हेल्थकेयर और लोगों के बीच संपर्क जैसे विषयों पर विस्तृत चर्चा होने की उम्मीद है। (India Malaysia defence cooperation)

सेमीकंडक्टर और अन्य एमओयू भी एजेंडे में

डिफेंस के अलावा सेमीकंडक्टर सेक्टर भी बातचीत का बड़ा विषय रहेगा। मलेशिया का सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम काफी मजबूत माना जाता है और उसके कुल निर्यात का बड़ा हिस्सा इसी सेक्टर से आता है। भारत और मलेशिया इस क्षेत्र में सरकार-से-सरकार समझौते, इंडस्ट्री सहयोग और रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर साथ काम करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।

इसके अलावा डिजास्टर मैनेजमेंट, ऑडियो-विजुअल को-प्रोडक्शन, सीफेरर्स की ट्रेनिंग, एंटी-करप्शन सहयोग, हेल्थकेयर और टेक्निकल ट्रेनिंग जैसे विषयों पर भी कई एमओयू पर चर्चा चल रही है। (India Malaysia defence cooperation)

रनवे की जरूरत खत्म! पानी और जमीन दोनों से उड़ेंगे विमान, भारत में डिफेंस से टूरिज्म तक गेमचेंजर बनेंगे एम्फिबियन एयरक्राफ्ट

Amphibious Aircraft India

Amphibious Aircraft India: भारत में पहली बार एंफीबियन एयरक्राफ्ट के लिए बड़ी पहल हुई है। भारत में डिफेंस और सिविल एविएशन मार्केट की जरूरतों को देखते हुए ऑस्ट्रेलिया की कंपनी एम्फीबियन एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज (एएआई) और भारत की अपोजी एयरोस्पेस के बीच एक बड़ी रणनीतिक साझेदारी हुई है। इस समझौते के तहत अपोजी एयरोस्पेस ने 15 अल्बाट्रॉस 2.0 एम्फिबियन एयरक्राफ्ट के लिए करीब 3,500 करोड़ रुपये का ऑर्डर दिया है। यह डील सिर्फ एयरक्राफ्ट खरीद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ भारत में मैन्युफैक्चरिंग, मेंटेनेंस, ट्रेनिंग और टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट का पूरा इकोसिस्टम खड़ा करने की योजना भी है।

Amphibious Aircraft India: एम्फिबियन एयरक्राफ्ट क्या होते हैं और क्यों हैं खास

एम्फिबियन एयरक्राफ्ट ऐसे विमान होते हैं, जो रनवे के साथ-साथ वाटर से भी टेक-ऑफ और लैंडिंग कर सकते हैं। इन्हें आम भाषा में सी-प्लेन भी कहा जाता है। भारत जैसे देश के लिए, जहां लंबी समुद्री तटरेखा, सैकड़ों द्वीप, बड़ी नदियां और दूर-दराज के इलाके हैं, ऐसे विमान बेहद उपयोगी साबित हो सकते हैं।

अब तक भारत में इस तरह के विमानों का इस्तेमाल सीमित रहा है। लेकिन सरकार की रीजनल कनेक्टिविटी, ब्लू इकॉनमी, सागरमाला प्रोग्राम और द्वीप विकास योजनाओं को देखते हुए एम्फिबियन एयरक्राफ्ट की जरूरत तेजी से महसूस की जा रही थी। इस डील का मकसद भारत के डिफेंस और सिविल एविएशन बाजार में अपनी मौजूदगी बढ़ाना है। (Amphibious Aircraft India)

अल्बाट्रॉस 2.0: पुराने नाम में नई तकनीक

अल्बाट्रॉस 2.0 कोई बिल्कुल नया नाम नहीं है। यह मशहूर ग्रुमैन एचयू-16 अल्बाट्रॉस से प्रेरित आधुनिक एयरक्राफ्ट है, जिसे आज की जरूरतों के हिसाब से पूरी तरह नया डिजाइन दिया गया है।

अल्बाट्रॉस 2.0 की खास बात यह है कि यह दुनिया का पहला और इकलौता ऐसा एम्फिबियन एयरक्राफ्ट है, जिसे ट्रांसपोर्ट कैटेगरी में एफएए या ईएएसए सर्टिफिकेशन मिला है और जिसमें 19 से ज्यादा, यानी 28 यात्रियों तक बैठने की क्षमता है।

यह एयरक्राफ्ट सिर्फ टूरिज्म या सिविल फ्लाइट्स के लिए नहीं, बल्कि डिफेंस, कोस्ट गार्ड, नेवी, सर्च एंड रेस्क्यू और मेडिकल इवैक्यूएशन जैसे मिशनों के लिए भी तैयार किया गया है। (Amphibious Aircraft India)

भारत में 500 करोड़ रुपये का निवेश

इस डील का सबसे अहम हिस्सा सिर्फ 15 एयरक्राफ्ट नहीं हैं, बल्कि भारत में होने वाला निवेश है। भारतीय पार्टनर कंपनी अपोजी एयरोस्पेस के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर (रिटायर्ड) विंग कमांडर एमवीएन साई ने बताया कि उनकी कंपनी वह 500 करोड़ रुपये तक का निवेश करेगी। इस निवेश से भारत में टेल-सेक्शन मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी, मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल (एमआरओ) सेंटर, ट्रेनिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और सिस्टम्स इंटीग्रेशन की सुविधाएं डेवलप की जाएंगी। इसके अलावा मिलिट्री वर्जन के लिए एडवांस्ड सिस्टम्स इंटीग्रेशन की सुविधा डेवलप होगी। इसका मतलब यह है कि आने वाले समय में अल्बाट्रॉस 2.0 के कई अहम पार्ट्स और सर्विसेज भारत में ही तैयार होंगी।

उन्होंने बताया कि यह पहल भारत के एयरोस्पेस और डिफेंस सेक्टर में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के साथ-साथ रीजनल एयर कनेक्टिविटी को मजबूत करने में मदद करेगी। (Amphibious Aircraft India)

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डिफेंस सेक्टर के लिए क्यों अहम है यह डील

डिफेंस सेक्टर को लेकर कंपनी ने साफ किया कि वह आने वाले सरकारी खरीद कार्यक्रमों में हिस्सा लेगी। इससे पहले 10 जनवरी को आई रिपोर्ट के मुताबिक, रक्षा मंत्रालय पहले ही भारतीय नौसेना के लिए चार फिक्स्ड-विंग एम्फिबियन एयरक्राफ्ट को वेट लीज पर लेने के लिए रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन (आरएफआई) जारी कर चुका है। जिसकी खबर सबसे पहले रक्षा समाचार ने ब्रेक की थी। इन विमानों का इस्तेमाल रिकॉनिसेंस, सर्विलांस और सर्च एंड रेस्क्यू के लिए किया जाना है।

एम्फिबियन एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज के प्रेसिडेंट और सीईओ गोपी रेड्डी ने कहा कि उनकी भारतीय पार्टनर कंपनी अपोजी एयरोस्पेस इस बिडिंग प्रक्रिया में हिस्सा लेगी। उन्होंने बताया कि अल्बाट्रॉस 2.0 एक पूरी तरह प्रोवेन एयरक्राफ्ट है और भारतीय नौसेना इसे पहले दिन से ऑपरेट कर सकती है। उन्होंने बताया कि आने वाले 18 से 24 महीनों में पहला अल्बाट्रॉस 2.0 भारत में ऑपरेशन में आ सकता है। उनका दावा है कि जहां दूसरे विकल्पों जैसे शिनमयवा US-2 की कीमत 100 मिलियन डॉलर से ज्यादा है, वहीं अल्बाट्रॉस 2.0 की बेस कीमत करीब 25 मिलियन डॉलर के आसपास है। (Amphibious Aircraft India)

सिविल एविएशन और टूरिज्म को भी मिलेगा फायदा

सिर्फ डिफेंस ही नहीं, सिविल सेक्टर में भी इस एयरक्राफ्ट की बड़ी भूमिका देखी जा रही है। अल्बाट्रॉस 2.0 वर्जन 28 यात्रियों को ले जा सकता है या फिर 4.5 टन कार्गो ढो सकता है। सााथ ही, लास्ट माइल कनेक्टिविटी द्वीपों, पहाड़ी इलाकों और नदी-तटीय क्षेत्रों को जोड़ सकता है

अंडमान-निकोबार, लक्षद्वीप, पूर्वोत्तर भारत और तटीय राज्यों में यह विमान टूरिज्म और कनेक्टिविटी को नई रफ्तार दे सकता है। खास बात यह है कि इसे बड़े एयरपोर्ट या रनवे की जरूरत नहीं होती, यानी यह जीरो इंफ्रास्ट्रक्चर से ऑपरेट हो सकता है। (Amphibious Aircraft India)

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भारत को ग्लोबल हब बनाने की योजना

एम्फीबियन एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज (AAI) के एग्जीक्यूटिव चेयरमैन खोआ होआंग ने साफ कहा है कि कंपनी का अंतिम लक्ष्य भारत में दूसरी पूरी मैन्युफैक्चरिंग और असेंबली लाइन स्थापित करना है। फिलहाल AAI की मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी अमेरिका में है, लेकिन भारत को भविष्य का बड़ा सेंटर माना जा रहा है।

अगर यह योजना साकार होती है, तो भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल हो सकता है, जहां से एम्फिबियन एयरक्राफ्ट का निर्माण, मेंटेनेंस और एक्सपोर्ट किया जाएगा। (Amphibious Aircraft India)

आत्मनिर्भर भारत और बजट सपोर्ट

दिलचस्प बात यह है कि यह डील ऐसे समय पर हुई है, जब केंद्रीय बजट 2026-27 में सरकार ने सी-प्लेन और एम्फिबियन एयरक्राफ्ट के स्वदेशी निर्माण को बढ़ावा देने की बात कही है। बजट में सी-प्लेन वीजीएफ स्कीम लाने का भी ऐलान किया गया है, जिससे इनके ऑपरेशन को सपोर्ट मिलेगा। (Amphibious Aircraft India)

क्यों माना जा रहा है इसे गेम-चेंजर

इस पूरे समझौते को इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि यह भारत की डिफेंस और सिविल एविएशन जरूरतों को एक साथ पूरा करता है। यह एयरक्राफ्ट पानी और जमीन दोनों से ऑपरेट कर सकता है, जिससे यह भारतीय सशस्त्र बलों की जरूरतों के लिए काफी उपयोगी बन जाता है। साथ ही, कंपनी मिलिट्री वर्जन के लिए पूरे सिस्टम्स इंटीग्रेशन की सुविधा भी दे रही है। सरकार की मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत को मजबूत करता है।

सिविल एविएशन की बात करें तो अल्बाट्रॉस 2.0 में 28 यात्री या 4.5 टन कार्गो ले जाने की क्षमता है। इस वजह से यह द्वीपों, तटों और दूरदराज इलाकों के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर-फ्री कनेक्टिविटी देता है, जो सरकार की रीजनल कनेक्टिविटी योजनाओं का अहम हिस्सा है। इसके अलावा भारत को एम्फिबियन एविएशन का ग्लोबल हब बनाने की दिशा में ले जाता है। (Amphibious Aircraft India)

HAL का बड़ा खुलासा; 5 तेजस Mk-1A पूरी तरह तैयार, 9 अमेरिका से इंजन के इंतजार में, क्या IAF रिव्यू से बढ़ी टेंशन?

Tejas Mk-1A delivery delay

Tejas Mk-1A delivery delay: तेजस एलसीए मार्क-1ए की डिलीवरी को लेकर हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) ने कहा है कि प्रोजेक्ट पर काम जारी है और कंपनी तय लक्ष्यों को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। एचएएल का कहना है कि इस समय पांच तेजस मार्क-1ए लड़ाकू विमान पूरी तरह तैयार हैं और डिलीवरी के लिए उपलब्ध हैं, जबकि नौ अन्य विमान इंजन सप्लाई का इंतजार कर रहे हैं।

यह बयान ऐसे वक्त आया है, जब तेजस मार्क-1ए की डिलीवरी में देरी को लेकर भारतीय वायुसेना, रक्षा मंत्रालय और एचएएल के बीच तालमेल और समयसीमा को लेकर सवाल उठ रहे हैं। एचएएल ने साफ किया है कि वह सभी स्टेकहोल्डर्स को सही जानकारी देना चाहती है, ताकि किसी तरह की गलतफहमी न रहे। (Tejas Mk-1A delivery delay)

Tejas Mk-1A delivery delay: पांच विमान पूरी तरह तैयार, नौ इंजन का इंतजार

एचएएल के मुताबिक, इस समय पांच तेजस मार्क-1ए फाइटर जेट्स पूरी तरह तैयार हैं। इन विमानों में वे सभी प्रमुख क्षमताएं शामिल की जा चुकी हैं, जिन पर कॉन्ट्रैक्ट के तहत सहमति बनी थी। यानी डिजाइन, सिस्टम्स और हथियारों से जुड़ी जरूरी चीजें इन विमानों में मौजूद हैं।

इसके अलावा नौ और तेजस मार्क-1ए विमान बनाए जा चुके हैं और उनकी उड़ान भी हो चुकी है। हालांकि इन विमानों को अभी डिलीवरी के लिए इसलिए तैयार नहीं किया जा सका है, क्योंकि इनमें इस्तेमाल होने वाले इंजन अभी उपलब्ध नहीं हैं। जैसे ही इंजन की सप्लाई होती है, इन विमानों को भी तेजी से डिलीवरी के लिए तैयार कर दिया जाएगा। (Tejas Mk-1A delivery delay)

इंजन सप्लाई को लेकर क्या है स्थिति

तेजस मार्क-1ए में इस्तेमाल होने वाला इंजन अमेरिका की कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक का एफ-404 इंजन है। पिछले कुछ समय से इंजन की सप्लाई में देरी प्रोजेक्ट के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।

एचएएल ने बताया है कि अब तक उसे जनरल इलेक्ट्रिक से पांच इंजन मिल चुके हैं। कंपनी का कहना है कि आगे की सप्लाई को लेकर स्थिति सकारात्मक है और आने वाले समय में इंजन की डिलीवरी एचएएल की योजना के मुताबिक होती नजर आ रही है। एचएएल को उम्मीद है कि जैसे-जैसे इंजन मिलते जाएंगे, वैसे-वैसे तैयार विमानों की संख्या भी तेजी से बढ़ेगी। (Tejas Mk-1A delivery delay)

डिजाइन और डेवलपमेंट से जुड़े मुद्दों पर काम जारी

एचएएल ने यह भी साफ किया है कि तेजस मार्क-1ए के डिजाइन और डेवलपमेंट से जुड़े जो भी मामले सामने आए हैं, उन्हें तेजी से सुलझाया जा रहा है। कंपनी का दावा है कि सभी तकनीकी दिक्कतों पर काम चल रहा है और उन्हें प्राथमिकता के आधार पर पूरा किया जा रहा है।

इस प्रक्रिया में एचएएल और भारतीय वायुसेना के बीच लगातार बातचीत हो रही है। दोनों पक्ष मिलकर यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि विमान पूरी तरह ऑपरेशनल कॉन्फिगरेशन में ही वायुसेना को सौंपे जाएं, ताकि बाद में किसी तरह की कमी न रह जाए। (Tejas Mk-1A delivery delay)

डिलीवरी को लेकर वायुसेना की है ये योजना

रक्षा और सुरक्षा से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, वायुसेना चाहती है कि तेजस मार्क-1ए को औपचारिक रूप से शामिल करने से पहले सभी जरूरी सर्टिफिकेशन और ऑपरेशनल क्लियरेंस पूरे हों। इसमें सिर्फ हथियारों की टेस्टिंग ही नहीं, बल्कि एवियोनिक्स, सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम, फ्लाइट एनवेलप और मेंटेनबिलिटी जैसे पहलू भी शामिल हैं।

यही वजह है कि भले ही एचएएल पांच विमानों को “रेडी” बता रहा है, वायुसेना उनकी स्वीकृति से पहले एक बार पूरे प्रोजेक्ट की समीक्षा करना चाहती है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मई 2026 में इस प्रोजेक्ट का रिव्यू हो सकता है, जिसके बाद नई डिलीवरी टाइमलाइन तय की जा सकती है। (Tejas Mk-1A delivery delay)

पहले ही दो साल से ज्यादा की देरी

तेजस मार्क-1ए प्रोग्राम पहले ही अपने तय शेड्यूल से काफी पीछे चल रहा है। शुरुआती योजना के मुताबिक, इन विमानों की डिलीवरी 2023-24 के आसपास शुरू हो जानी थी। बाद में यह समयसीमा 2025 तक खिसकी और अब मार्च 2026 के बाद भी देरी की आशंका जताई जा रही है।

इस देरी की कई वजहें रही हैं। इंजन सप्लाई में बाधा, नए रडार और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम का इंटीग्रेशन, और जरूरी सर्टिफिकेशन में लगने वाला समय – इन सबने मिलकर प्रोग्राम की रफ्तार को धीमा किया है। (Tejas Mk-1A delivery delay)

ऑर्डर कितना बड़ा है, चुनौती भी उतनी

हालांकि, रक्षा से जुड़े सूत्रों का कहना है कि GE F404 इंजनों की सप्लाई में देरी के कारण तेजस मार्क-1A की डिलीवरी शेड्यूल प्रभावित हुई है। भारतीय वायुसेना ने तेजस मार्क-1ए के लिए कुल 180 विमानों का ऑर्डर दिया है। यह ऑर्डर दो हिस्सों में दिया गया है। पहला कॉन्ट्रैक्ट 2021 में 83 विमानों के लिए हुआ था, जिसकी कीमत करीब 48,000 करोड़ रुपये है। इसके बाद 2025 में 97 और विमानों को मंजूरी दी गई, जिनकी अनुमानित लागत 66,500 करोड़ रुपये बताई जाती है।

इंजनों की देरी भारत के लिए परेशानी का कारण बन गई है। पिछले साल जुलाई में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपने अमेरिकी समकक्ष से इंजनों की सप्लाई तेज करने की मांग भी की थी।

एचएएल की मौजूदा फाइटर जेट प्रोडक्शन क्षमता करीब 24 विमान प्रति वर्ष है। इस रफ्तार से पूरे 180 विमान तैयार करने में सात साल से ज्यादा का समय लग सकता है। ऐसे में अगर डिलीवरी की शुरुआत और पीछे खिसकती है, तो वायुसेना को अपने स्क्वाड्रन स्ट्रेंथ को बनाए रखने में और मुश्किलें आ सकती हैं। (Tejas Mk-1A delivery delay)

वायुसेना के पास लगभग 29 फाइटर स्क्वाड्रन

वर्तमान में भारतीय वायुसेना के पास लगभग 29 फाइटर स्क्वाड्रन हैं, जबकि स्वीकृत संख्या 42 से ज्यादा की है। पुराने मिग-21, मिग-27 और जगुआर जैसे विमानों के रिटायर होने से यह कमी और बढ़ी है। ऐसे में तेजस मार्क-1ए को इस गैप को भरने वाला सबसे अहम स्वदेशी प्लेटफॉर्म माना जा रहा है।

यही वजह है कि वायुसेना तेजस को जल्द से जल्द शामिल करना चाहती है, लेकिन किसी भी तरह की जल्दबाजी में वह गुणवत्ता या ऑपरेशनल क्षमता से समझौता करने को तैयार नहीं है।

एचएएल ने भरोसा दिलाया है कि वह चालू वित्त वर्ष के लिए तय किए गए लक्ष्यों को पूरा करेगी। कंपनी का कहना है कि इंजन सप्लाई की स्थिति सुधरने के साथ ही डिलीवरी की रफ्तार भी बढ़ेगी।

इसके साथ-साथ एचएएल अन्य बड़े प्रोजेक्ट्स पर भी काम कर रही है, जिनमें तेजस मार्क-2, इंडियन मल्टी रोल हेलीकॉप्टर और कॉम्बैट एयर टीमिंग सिस्टम जैसे कार्यक्रम शामिल हैं। हालांकि ये सभी प्रोजेक्ट 2032 के बाद ही प्रोडक्शन फेज में पहुंचेंगे। (Tejas Mk-1A delivery delay)

तेजस Mk-1A पर फिर उठे सवाल; मई 2026 में IAF करेगी बड़ा रिव्यू, डिलीवरी में और हो सकती है देरी

Tejas Mk-1A delivery delay

Tejas Mk-1A delivery delay: भारतीय वायुसेना के स्वदेशी फाइटर जेट एलसीए तेजस मार्क-1ए की डिलीवरी को लेकर अभी भी असमंजस बरकरार है। इंडियन एयर फोर्स मई 2026 में इस पूरे प्रोजेक्ट की एक विस्तृत समीक्षा करने जा रही है। यह रिव्यू इसलिए अहम माना जा रहा है, क्योंकि इसी के बाद तय होगा कि तेजस मार्क-1ए की डिलीवरी कब और किस रफ्तार से शुरू होगी।

यह खबर ऐसे समय सामने आई है, जब एचएएल लगातार यह दावा कर रहा है कि उसके पास पांच तेजस मार्क-1ए विमान तैयार हालत में मौजूद हैं और वह इस साल मार्च तक इनकी डिलीवरी कर देगा। इसके बावजूद, वायुसेना ने साफ कर दिया है कि वह किसी भी विमान को तभी स्वीकार करेगी, जब वह पूरी तरह ऑपरेशनल कॉन्फिगरेशन में होगा और सभी तय मानकों पर खरा उतरेगा। इसी वजह से डिलीवरी में और देरी होने की आशंका जताई जा रही है। (Tejas Mk-1A delivery delay)

Tejas Mk-1A delivery delay: मई 2026 में क्यों अहम है वायुसेना का रिव्यू

सूत्रों के मुताबिक, वायुसेना ने तेजस मार्क-1ए प्रोजेक्ट पर दिसंबर 2025 में भी एक विस्तृत चर्चा की थी। उस बैठक में कई तकनीकी और ऑपरेशनल पहलुओं पर बात हुई थी। अब अप्रैल 2026 तक विमान से जुड़े ज्यादातर तकनीकी माइलस्टोन पूरे होने की उम्मीद है। इसके बाद मई में होने वाला रिव्यू यह तय करेगा कि वायुसेना इन विमानों को स्वीकार करने के लिए तैयार है या नहीं।

वायुसेना का रुख इस बार पहले से ज्यादा सख्त बताया जा रहा है। उसकी मांग है कि जो भी तेजस मार्क-1ए विमान उसे सौंपे जाएं, वे सीधे स्क्वाड्रन में शामिल होकर ऑपरेशनल ड्यूटी निभाने लायक हों। यानी बाद में उनमें किसी बड़े अपग्रेड या सुधार की जरूरत न पड़े। (Tejas Mk-1A delivery delay)

एचएएल का दावा: पांच विमान तैयार, पंद्रह लाइन में

एचएएल के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि कंपनी के पास इस समय पांच तेजस मार्क-1ए फाइटर जेट पूरी तरह तैयार हैं। इनमें रडार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट और हथियारों का इंटीग्रेशन पूरा किया जा चुका है। इसके अलावा सूत्रों के मुताबिक, हाल के ट्रायल्स में विमान से दो मिसाइलों की फायरिंग की गई और एक लेजर-गाइडेड बम भी सफलतापूर्वक गिराया गया, जो एक बड़ा माइलस्टोन माना जा रहा है।

एचएएल यह भी कह रही है कि उसके पास लगभग 15 विमान रेडी कॉन्फिगरेशन में हैं और साल के अंत तक यह संख्या 20 तक पहुंच सकती है। कंपनी चाहती है कि वायुसेना जल्द से जल्द इन विमानों की डिलीवरी हो, ताकि प्रोजेक्ट में आई देरी का असर कुछ हद तक कम किया जा सके। (Tejas Mk-1A delivery delay)

फिर भी क्यों जताई जा रही देरी की आशंका?

वायुसेना और एचएएल के बीच सबसे बड़ा फर्क “तैयार” शब्द की परिभाषा को लेकर है। एचएएल जहां तकनीकी रूप से तैयार होने की बात कर रही है, वहीं वायुसेना का कहना है कि फुली ऑपरेशनल स्टेटस हासिल करना जरूरी है।

इसमें केवल हथियारों का परीक्षण ही नहीं, बल्कि कई और चीजें शामिल होती हैं- जैसे पूरे फ्लाइट एनवेलप की वैलिडेशन, एवियोनिक्स और सेंसर की परफॉर्मेंस, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम की प्रभावशीलता, मेंटेनेंस से जुड़े पैरामीटर और लंबे समय तक ऑपरेशन की विश्वसनीयता जैसे पैरामीटर्स शामिल होते हैं।

जब तक ये सभी ऑपरेशनल पैरामीटर्स पूरी तरह साबित और प्रमाणित नहीं हो जाते, तब तक वायुसेना तेजस मार्क-1ए को औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं करेगी। (Tejas Mk-1A delivery delay)

180 विमानों का बड़ा ऑर्डर

तेजस मार्क-1ए प्रोजेक्ट का महत्व इस बात से समझा जा सकता है कि वायुसेना ने इसके कुल 180 विमानों का ऑर्डर दिया है। पहली किश्त में 2021 में 83 विमानों का करार हुआ था, जिसकी कीमत करीब 48 हजार करोड़ रुपये है। इसके बाद दूसरी किश्त में 97 और विमानों को मंजूरी दी गई, जिसकी अनुमानित लागत 66,500 करोड़ रुपये बताई जाती है।

शुरुआती योजना के मुताबिक, इन विमानों की डिलीवरी 2023-24 के आसपास शुरू हो जानी चाहिए थी। लेकिन पहले यह समयसीमा 2025 तक खिसकी और अब 2026 के बाद भी देरी की संभावना जताई जा रही है। (Tejas Mk-1A delivery delay)

इंजन बना सबसे बड़ी बाधा

तेजस मार्क-1ए की देरी की सबसे बड़ी वजह जीई एफ-404 इंजन की सप्लाई में आई दिक्कतें रही हैं। यह इंजन अमेरिकी कंपनी जीई एयरोस्पेस बनाती है। 2024 और 2025 के दौरान इंजन सप्लाई चेन में आई समस्याओं की वजह से एचएएल को प्रोडक्शन धीमा करना पड़ा। बिना इंजन के विमान तैयार होने के बावजूद उड़ान और ट्रायल आगे नहीं बढ़ पाए।

हालांकि बाद में इंजन सप्लाई में कुछ सुधार हुआ, लेकिन तब तक प्रोजेक्ट की टाइमलाइन काफी पीछे जा चुकी थी। (Tejas Mk-1A delivery delay)

नई प्रोडक्शन लाइन, फिर भी चुनौती बरकरार

तेजस प्रोग्राम की रफ्तार बढ़ाने के लिए एचएएल ने अपनी प्रोडक्शन क्षमता बढ़ाने की कोशिश की है। बेंगलुरु में पहले से मौजूद दो प्रोडक्शन लाइनों के अलावा नासिक में तीसरी प्रोडक्शन लाइन तैयार की गई। अक्टूबर 2025 में इसी नासिक फैसिलिटी से पहले तेजस मार्क-1ए प्रोटोटाइप की पहली उड़ान हुई थी, जिसे एक बड़ा माइलस्टोन माना गया।

इसके बावजूद, एचएएल की कुल उत्पादन क्षमता सालाना करीब 24 विमान बताई जाती है। इस रफ्तार से पूरे 180 विमानों की आपूर्ति में सात से आठ साल लग सकते हैं। (Tejas Mk-1A delivery delay)

तेजस मार्क-1ए क्यों जरूरी है वायुसेना के लिए

तेजस मार्क-1ए को भारतीय वायुसेना अपने पुराने मिग-21, मिग-27 और जगुआर जैसे विमानों के विकल्प के तौर पर देखती है। यह एक 4.5 जेनरेशन फाइटर जेट है, जिसमें इंडिजिनस उत्तम एईएसए रडार, आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट और लंबी दूरी की अस्त्र बीवीआर मिसाइल जैसी क्षमताएं शामिल हैं।

वर्तमान में वायुसेना के पास करीब 29-30 स्क्वाड्रन हैं, जबकि स्वीकृत संख्या 42 से ज्यादा है। ऐसे में तेजस मार्क-1ए की समय पर डिलीवरी वायुसेना के लिए बेहद अहम है। (Tejas Mk-1A delivery delay)

देरी का सीधा असर स्क्वाड्रन स्ट्रेंथ पर

अगर तेजस मार्क-1ए की डिलीवरी और आगे खिसकती है, तो वायुसेना की स्क्वाड्रन स्ट्रेंथ पर इसका सीधा असर पड़ेगा। पुराने विमानों के रिटायर होने की रफ्तार तेज है, लेकिन नए विमानों की एंट्री उतनी तेज नहीं हो पा रही। यही वजह है कि वायुसेना लगातार स्वदेशी प्रोजेक्ट्स को समय पर पूरा करने पर जोर दे रही है। (Tejas Mk-1A delivery delay)

नौसेना को मिलेंगे 6 नए P-8I एयरक्राफ्ट, भारत-अमेरिका के बीच जल्द हो सकती है 25 हजार करोड़ की डील

India US P-8I deal

India US P-8I deal: भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील होते ही डिफेंस सहयोग एक बार फिर रफ्तार पकड़ता दिख रहा है। दोनों देशों के बीच करीब 3 अरब डॉलर, यानी लगभग 25 हजार करोड़ रुपये की एक बड़ी डिफेंस डील पर सहमति बन सकती है। यह डील भारतीय नौसेना के लिए पी-8आई एंटी-सबमरीन वॉरफेयर और मैरीटाइम सर्विलांस एयरक्राफ्ट की खरीद से जुड़ी है। जानकारी के मुताबिक, भारत छह अतिरिक्त पी-8आई विमान खरीदने जा रहा है।

कहा जा रहा है कि हाल ही में भारत और अमेरिका के बीच हुई ट्रेड डील के बाद दोनों देशों के रिश्तों में जो गर्मजोशी आई है, उसी का असर इस डिफेंस डील पर भी दिखाई दे रहा है। बीते कुछ सालों से यह सौदा कीमत को लेकर अटका हुआ था, लेकिन अब बातचीत फिर से पटरी पर लौटती नजर आ रही है। (India US P-8I deal)

India US P-8I deal: ट्रेड डील के बाद क्यों बढ़ी रफ्तार

पिछले कुछ समय में भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक रिश्तों को लेकर तनाव की खबरें सामने आती रही थीं। टैरिफ और कीमतों से जुड़े मुद्दों के चलते कई डिफेंस डील्स भी लटक गई थीं। पी-8आई विमान की यह डील भी उन्हीं में से एक थी।

लेकिन फरवरी 2026 में भारत-अमेरिका के बीच जो नई ट्रेड डील फाइनल हुई, उसके बाद दोनों देशों ने एक-दूसरे के साथ व्यापार और रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाने का साफ संदेश दिया है। इसी के बाद रक्षा सहयोग से जुड़े पुराने प्रस्तावों पर भी दोबारा गंभीरता से विचार शुरू हो गया है। पी-8आई डील उसी का नतीजा मानी जा रही है।

सरकारी सूत्रों के मुताबिक, अब यह प्रस्ताव जल्द ही रक्षा मंत्रालय के सामने रखा जाएगा। वहां से मंजूरी मिलने के बाद इसे कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी के पास भेजा जाएगा। अगर सब कुछ योजना के मुताबिक रहा, तो आने वाले महीनों में इस डील पर अंतिम मुहर लग सकती है। (India US P-8I deal)

पी-8आई आखिर है क्या

पी-8आई कोई साधारण विमान नहीं है। यह एक ऐसा एयरक्राफ्ट है, जिसे खासतौर पर समुद्र के ऊपर लंबी दूरी तक निगरानी और दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने के लिए डिजाइन किया गया है। इसे अमेरिकी कंपनी बोइंग ने तैयार किया है और यह पी-8 पोसाइडन का भारतीय वर्जन है।

सरल शब्दों में कहें तो पी-8आई भारतीय नौसेना की आंख और कान है। यह हजारों किलोमीटर तक उड़ान भरकर समुद्र के ऊपर होने वाली हर गतिविधि पर नजर रख सकता है। दुश्मन की पनडुब्बी चाहे पानी के नीचे कितनी ही गहराई में क्यों न हो, यह विमान उसे पकड़ने की क्षमता रखता है। (India US P-8I deal)

खासियत इसकी लॉन्ग रेंज और एडवांस्ड सेंसर्स

पी-8आई की सबसे बड़ी खासियत इसकी लॉन्ग रेंज और एडवांस्ड सेंसर्स हैं। यह विमान करीब 7500 किलोमीटर से ज्यादा की दूरी तक उड़ सकता है और कई घंटों तक समुद्र के ऊपर पेट्रोलिंग कर सकता है। इसकी रफ्तार भी काफी तेज है, जिससे जरूरत पड़ने पर यह तुरंत किसी इलाके में पहुंच सकता है।

इस विमान में लगे आधुनिक रडार, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल कैमरे और साउंड डिटेक्शन सिस्टम समुद्र के अंदर और ऊपर दोनों जगह की गतिविधियों को पकड़ सकते हैं। पनडुब्बियों की पहचान के लिए इसमें खास तरह के सोनार बुआय लगाए जाते हैं, जो पानी के अंदर आवाजों को पकड़कर विमान तक जानकारी भेजते हैं।

जरूरत पड़ने पर यह विमान टॉरपीडो, डेप्थ चार्ज और एंटी-शिप मिसाइल भी दाग सकता है। यानी यह सिर्फ निगरानी ही नहीं करता, बल्कि सीधे कार्रवाई भी कर सकता है। (India US P-8I deal)

भारतीय नौसेना के पास पहले से मौजूद बेड़ा

हालांकि भारतीय नौसेना के बेड़े में पहले से ही पी-8आई विमान शामिल हैं। भारत ने सबसे पहले साल 2009 में इन विमानों की खरीद का फैसला किया था। उस समय आठ पी-8आई विमान खरीदे गए थे, जिनकी डिलीवरी 2013 से शुरू हुई।

इसके बाद साल 2016 में चार और विमान खरीदे गए। इस तरह फिलहाल भारतीय नौसेना के पास कुल 12 पी-8आई विमान ऑपरेशनल स्थिति में हैं। ये विमान तमिलनाडु के अरक्कोनम और गोवा के हंसा एयरबेस से उड़ान भरते हैं और भारत के पूर्वी और पश्चिमी समुद्री इलाकों पर नजर रखते हैं।

इन विमानों ने पिछले कुछ सालों में अपनी उपयोगिता कई बार साबित की है। हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती नौसैनिक गतिविधियों पर नजर रखने में इनकी भूमिका बेहद अहम रही है। (India US P-8I deal)

छह और विमान क्यों जरूरी

अब सवाल उठता है कि जब पहले से 12 पी-8आई मौजूद हैं, तो छह और की जरूरत क्यों पड़ी। इसका जवाब हिंद महासागर में तेजी से बदलते हालात में छुपा है।

चीन की नौसेना लगातार अपनी मौजूदगी बढ़ा रही है। चीनी पनडुब्बियां और युद्धपोत अब अक्सर हिंद महासागर क्षेत्र में देखे जा रहे हैं। इसके अलावा पाकिस्तान की पनडुब्बी क्षमता भी धीरे-धीरे मजबूत हो रही है। ऐसे में भारत के लिए समुद्री निगरानी और एंटी-सबमरीन क्षमता को और मजबूत करना जरूरी हो गया है।

छह नए पी-8आई विमानों के आने से भारतीय नौसेना की पकड़ और मजबूत होगी। इससे पूर्वी अफ्रीका से लेकर मलक्का स्ट्रेट तक के विशाल समुद्री इलाके पर बेहतर नजर रखी जा सकेगी। (India US P-8I deal)

क्यों अटकी थी यह डील

इस डील की कहानी नई नहीं है। साल 2019 में ही भारतीय नौसेना ने छह अतिरिक्त पी-8आई विमानों की जरूरत बताई थी। इसके बाद 2021 में अमेरिका ने इस सौदे को मंजूरी भी दे दी थी। उस वक्त इसकी कीमत करीब 2.4 अरब डॉलर आंकी गई थी।

लेकिन इसके बाद कीमतों को लेकर बातचीत अटक गई। वैश्विक महंगाई, सप्लाई चेन की दिक्कतों और टैरिफ बढ़ने की वजह से कीमत बढ़ती चली गई। कुछ रिपोर्ट्स में यह कीमत 3.5 से 4 अरब डॉलर तक पहुंचने की बात कही गई। इसी वजह से भारत ने सौदे को आगे बढ़ाने में सावधानी बरती और मामला ठंडे बस्ते में चला गया।

अब ट्रेड डील के बाद दोनों देश फिर से बीच का रास्ता निकालने की कोशिश कर रहे हैं। (India US P-8I deal)

नौसेना की ताकत में होगा बड़ा इजाफा

अगर यह डील फाइनल होती है, तो भारतीय नौसेना के लिए यह एक बड़ा बूस्ट साबित होगी। पी-8आई विमान नौसेना की एंटी-सबमरीन वॉरफेयर क्षमता की रीढ़ हैं। इनके साथ-साथ भारत आने वाले वर्षों में सी गार्डियन ड्रोन और अन्य निगरानी प्लेटफॉर्म भी शामिल कर रहा है।

मानव चालित विमानों और ड्रोन की यह जुगलबंदी समुद्री सुरक्षा को नई ऊंचाई पर ले जाएगी। दुश्मन की हर हरकत पर नजर रखना और जरूरत पड़ने पर तुरंत जवाब देना आसान हो जाएगा। (India US P-8I deal)

भारत-किर्गिस्तान स्पेशल फोर्सेस की एक्सरसाइज खंजर असम में शुरू, एलिट पैराशूट रेजिमेंट ले रही हिस्सा

India Kyrgyzstan Exercise KHANJAR

India Kyrgyzstan Exercise KHANJAR: भारत और किर्गिस्तान के बीच जॉइंट स्पेशल फोर्सेस एक्सरसाइज खंजर का 13वां संस्करण असम के मिसामारी में शुरू हो गया है। यह सैन्य अभ्यास 4 फरवरी से 17 फरवरी तक चलेगा। यह अभ्यास हर साल भारत और किर्गिस्तान में बारी-बारी से आयोजित किया जाता है। खंजर का पिछला संस्करण मार्च 2025 में किर्गिस्तान में हुआ था।

इस अभ्यास में भारतीय सेना और किर्गिस्तान की स्पेशल फोर्सेस के जवान हिस्सा ले रहे हैं। दोनों देशों की सेनाएं इस दौरान आतंकवाद विरोधी अभियानों और विशेष सैन्य अभियानों से जुड़े अनुभव साझा करेंगी। अभ्यास का मकसद शहरी और पहाड़ी इलाकों में संयुक्त सैन्य क्षमताओं को बेहतर बनाना है।

भारतीय सेना की ओर से 20 जवान इस अभ्यास में शामिल हैं। ये जवान पैराशूट रेजिमेंट (स्पेशल फोर्सेज) से हैं, जो भारतीय सेना की एलिट स्पेशल फोर्स यूनिट मानी जाती है। किर्गिस्तान की ओर से भी 20 जवान भाग ले रहे हैं, जो आईएलबीआरआईएस स्पेशल फोर्सेज ब्रिगेड से हैं। (India Kyrgyzstan Exercise KHANJAR)

India Kyrgyzstan Exercise KHANJAR

India Kyrgyzstan Exercise KHANJAR: मिसामारी में क्यों हो रहा है अभ्यास

यह संयुक्त सैन्य अभ्यास असम के मिसामारी इलाके में आयोजित किया जा रहा है। यह इलाका पहाड़ी और घने जंगलों वाला है। यह क्षेत्र शहरी और पर्वतीय दोनों तरह के सैन्य अभ्यास के लिए उपयुक्त माना जाता है। यहां जवानों को वास्तविक युद्ध जैसी परिस्थितियों में ट्रेनिंग मिलती है, जिससे उनकी ऑपरेशनल तैयारी को मजबूती मिलती है। (India Kyrgyzstan Exercise KHANJAR)

आतंकवाद विरोधी अभियानों पर फोकस

खंजर अभ्यास का मुख्य उद्देश्य आतंकवाद से निपटने से जुड़े अनुभवों और सर्वोत्तम तरीकों का आदान-प्रदान करना है। इस दौरान दोनों देशों के स्पेशल फोर्सेस जवान शहरी इलाकों में आतंकवाद विरोधी अभियान, पहाड़ी क्षेत्रों में मूवमेंट और रणनीति, तथा विशेष सैन्य कार्यों से जुड़े अभ्यास करेंगे।

इस अभ्यास में स्नाइपिंग, मु्श्किल इमारतों में प्रवेश और उन्हें सुरक्षित करने की तकनीक, तथा पहाड़ी युद्ध कौशल पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इन गतिविधियों के जरिए जवानों को अलग-अलग परिस्थितियों में मिलकर काम करने का अवसर मिलेगा। (India Kyrgyzstan Exercise KHANJAR)

2011 में शुरू हुई थी खंजर एक्सरसाइज

भारत और किर्गिस्तान के बीच खंजर अभ्यास की शुरुआत वर्ष 2011 में हुई थी। इसका पहला संस्करण हिमाचल प्रदेश के नाहन में आयोजित किया गया था। शुरुआती दौर में यह अभ्यास सीमित स्तर पर था, लेकिन समय के साथ इसका दायरा बढ़ता गया।

2015 के बाद से यह अभ्यास हर साल आयोजित किया जाने लगा और इसे वार्षिक अभ्यास का रूप दिया गया। तब से यह भारत और किर्गिस्तान के बीच सबसे महत्वपूर्ण स्पेशल फोर्सेस अभ्यास बन चुका है। हर संस्करण में दोनों देशों के लगभग 20-20 जवान हिस्सा लेते हैं। (India Kyrgyzstan Exercise KHANJAR)

पिछले सालों में खंजर अभ्यास भारत और किर्गिस्तान दोनों में आयोजित किया गया है। भारत में यह अभ्यास हिमाचल प्रदेश, मिजोरम और अब असम जैसे इलाकों में हुआ है, जबकि किर्गिस्तान में यह टोकमोक और अन्य सैन्य प्रशिक्षण क्षेत्रों में आयोजित किया गया। हर बार अभ्यास के दौरान आतंकवाद विरोधी अभियान, पहाड़ी युद्ध और स्पेशियल मिलिट्री स्किल्स पर फोकस रखा गया। (India Kyrgyzstan Exercise KHANJAR)

AMCA प्रोजेक्ट से बाहर कर क्या सरकार तोड़ रही HAL का दबदबा, कैसे एक नियम ने बदली 5th जेनरेशन फाइटर की कहानी

HAL AMCA disqualification

HAL AMCA disqualification: बुधवार का दिन हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के लिए आसान नहीं रहा। ट्रेडिंग सेशन के दौरान एचएएल के शेयर करीब 8 फीसदी तक टूट गए और दिन के निचले स्तर 4100.15 रुपये तक पहुंच गए। यह गिरावट उस वक्त देखने को मिली, जब बाजार में यह खबर तेजी से फैली कि एचएएल को भारत के सबसे महत्वाकांक्षी रक्षा प्रोजेक्ट पांचवी पीढ़ी के फाइटर जेट एएमसीए की रेस से बाहर कर दिया गया है।

शेयर बाजार खुलते ही एचएएल का स्टॉक 4220 रुपये पर ओपन हुआ था, जो पिछले बंद भाव 4470 रुपये से काफी नीचे था। शुरुआती कुछ मिनटों में ही बिकवाली का दबाव बढ़ गया और शेयर फिसलते-फिसलते दिन के लो तक पहुंच गया। निवेशकों और बाजार विश्लेषकों के बीच यह चर्चा तेज हो गई कि एएमसीए प्रोजेक्ट से बाहर होने की खबरें ही इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह हैं। (HAL AMCA disqualification)

हालांकि इस पूरे घटनाक्रम में एक अहम बात यह भी है कि अब तक न तो रक्षा मंत्रालय, न ही डीआरडीओ या एरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (एडीए) की तरफ से एचएएल के बाहर होने का कोई औपचारिक एलान किया गया है। खुद एचएएल ने भी साफ कहा है कि उसे इस बारे में कोई आधिकारिक सूचना नहीं मिली है। (HAL AMCA disqualification)

HAL AMCA disqualification: क्या है एचएएल का आधिकारिक स्टैंड?

एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी एएमसीए प्रोग्राम को लेकर मीडिया में चल रही खबरों पर एचएएल ने अपनी बात रखी है। कंपनी का कहना है कि उसे इस संबंध में अभी तक कोई भी आधिकारिक सूचना प्राप्त नहीं हुई है। ऐसे में मौजूदा समय में इन मीडिया रिपोर्ट्स पर कोई टिप्पणी करना संभव नहीं है। एचएएल ने यह भी कहा है कि जैसे ही कोई आधिकारिक जानकारी मिलेगी, वह सभी संबंधित पक्षों को पूरी तरह अवगत कराएगी।

एचएएल ने दोहराया है कि उसके पास इस समय मजबूत और पक्का ऑर्डर बुक मौजूद है, जिससे कंपनी की आय को लेकर स्पष्टता बनी हुई है। इसके साथ ही एचएएल का प्रोडक्शन और एक्जीक्यूशन प्लान 2032 तक मजबूत स्थिति में है।

कंपनी एक साथ कई रणनीतिक प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही है। इनमें इंडियन मल्टी रोल हेलीकॉप्टर (आईएमआरएच), एलसीए मार्क-2 और कॉम्बैट एयर टीमिंग सिस्टम (कैट्स) जैसे अहम प्रोग्राम शामिल हैं। ये सभी प्रोजेक्ट एचएएल की तकनीकी क्षमता को और मजबूत करेंगे और लंबे समय में कंपनी के विकास में अहम भूमिका निभाएंगे। इन प्रोग्राम्स के 2032 के बाद प्रोडक्शन में आने की उम्मीद है। (HAL AMCA disqualification)

इसके अलावा, एचएएल सिविल एविएशन सेक्टर में भी अपने काम का दायरा बढ़ा रही है। ध्रुव एनजी, हिंदुस्तान 228 और एसजे-100 जैसे प्लेटफॉर्म्स के जरिए कंपनी भविष्य में अपनी आय बढ़ाने और स्थायी विकास सुनिश्चित करने पर काम कर रही है।

एचएएल का कहना है कि कंपनी की आर्थिक स्थिति मजबूत है और वह लगातार बेहतर प्रदर्शन के जरिए हर साल स्थिर और टिकाऊ ग्रोथ हासिल करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। (HAL AMCA disqualification)

आखिर एएमसीए है क्या, जिसे लेकर इतना बड़ा हंगामा?

एएमसीए यानी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट भारत का फिफ्थ-जेनरेशन स्टेल्थ फाइटर जेट प्रोग्राम है। यह वही प्लेटफॉर्म है, जिसे भविष्य में भारतीय वायुसेना की एयर डॉमिनेंस की रीढ़ माना जा रहा है।

इस प्रोजेक्ट को एरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी लीड कर रही है, जो डीआरडीओ के तहत काम करती है। एएमसीए को पूरी तरह स्वदेशी डिजाइन पर तैयार किया जा रहा है, जिसमें स्टेल्थ शेपिंग, इंटरनल वेपन बे, एडवांस्ड एवियोनिक्स, सेंसर फ्यूजन और सुपरक्रूज जैसी क्षमताएं होंगी।

सरल शब्दों में कहें तो यह प्रोजेक्ट भारत को उन चुनिंदा देशों की कतार में खड़ा करने वाला है, जो खुद का फिफ्थ-जेनरेशन फाइटर बना सकते हैं। (HAL AMCA disqualification)

एचएएल से सबको क्यों थी उम्मीद?

एचएएल दशकों से भारत की सबसे बड़ी और सबसे भरोसेमंद एयरोस्पेस कंपनी मानी जाती रही है। तेजस एलसीए, सुखोई-30 एमकेआई, ध्रुव हेलीकॉप्टर, प्रचंड लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर जैसे प्लेटफॉर्म एचएएल ही बना रही है।

ऐसे में आम धारणा यही थी कि एएमसीए जैसे बड़े और टेक्निकली तौर पर अहम प्रोजेक्ट में एचएएल की भूमिका सबसे अहम होगी। यही वजह है कि जब एचएएल के बाहर होने की खबरें सामने आईं, तो बाजार और डिफेंस सर्कल दोनों चौंक गए। (HAL AMCA disqualification)

एएमसीए की बिडिंग प्रोसेस कैसे शुरू हुई?

एएमसीए के लिए सरकार ने इस बार एक नया रास्ता चुना। पहले जहां ऐसे बड़े एयरक्राफ्ट प्रोजेक्ट लगभग पूरी तरह एचएएल के भरोसे रहते थे, वहीं इस बार प्राइवेट सेक्टर को भी बराबरी का मौका दिया गया।

इसके तहत एडीए ने साल 2025 में एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी किया। इसका मकसद यह था कि प्रोटोटाइप डेवलपमेंट के लिए ऐसी कंपनियां या कंसोर्टियम चुने जाएं, जो तकनीकी रूप से सक्षम हों, आर्थिक रूप से मजबूत हों और समय पर डिलीवरी कर सकें।

इस प्रक्रिया में कुल 7 कंसोर्टियम मैदान में उतरे, जिनमें सरकारी और निजी दोनों तरह की कंपनियां शामिल थीं। (HAL AMCA disqualification)

वह एक शर्त, जिसने रोक दी एचएएल की राह

इस पूरी कहानी का सबसे अहम हिस्सा है ईओआई में रखी गई एक खास शर्त। इस शर्त के मुताबिक, किसी भी कंपनी का ऑर्डर बुक उसकी सालाना टर्नओवर से तीन गुना से ज्यादा नहीं होना चाहिए।

अगर किसी कंपनी का पेंडिंग ऑर्डर इस सीमा से ज्यादा निकलता है, तो उस पैरामीटर में उसे जीरो मार्क्स दिए जाते हैं। यह नियम पहले से दस्तावेज में लिखा हुआ था, लेकिन इसका असर अब जाकर सबके सामने आया।

इन सभी बिड्स का मूल्यांकन केवल नाम या पुराने अनुभव के आधार पर नहीं किया गया, बल्कि इसके लिए एक विस्तृत और सख्त इवैल्यूएशन फ्रेमवर्क अपनाया गया। कंपनियों को उनकी टेक्निकल कैपेबिलिटी, फाइनेंशियल स्टेबिलिटी, एयरोस्पेस प्रोजेक्ट्स का अनुभव और सबसे अहम, ऑर्डर बुक बनाम टर्नओवर रेशियो जैसे मानकों पर परखा गया। (HAL AMCA disqualification)

एचएएल इस शर्त पर क्यों फेल हुई?

एचएएल की वित्तीय स्थिति मजबूत है, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन समस्या यहीं से शुरू होती है। एचएएल की सालाना टर्नओवर करीब 30,000 करोड़ रुपये के आसपास है, जबकि उसकी कुल ऑर्डर बुक 2.5 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा बताई जाती है। इसका मतलब यह हुआ कि एचएएल के पास उसकी कमाई के मुकाबले लगभग आठ गुना ज्यादा काम पहले से ही लाइन में लगा है।

ईओआई की शर्तों के हिसाब से यह अनुपात तय सीमा से काफी ज्यादा था। नतीजा यह हुआ कि एचएएल को इस अहम फाइनेंशियल पैरामीटर में पूरे अंक नहीं मिल पाए, और कुल स्कोर में वह शॉर्टलिस्ट होने से चूक गई।

इस ईओआई के जवाब में कुल सात कंसोर्टियम सामने आए, जिनमें हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड, टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, लार्सन एंड टूब्रो, अदानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस, कल्याणी स्ट्रेटेजिक सिस्टम्स और ब्रह्मोस एयरोस्पेस जैसे बड़े नाम शामिल थे। (HAL AMCA disqualification)

सरकार ने ऐसा नियम क्यों रखा?

यह सवाल सबसे ज्यादा पूछा जा रहा है। सरकार और एडीए की सोच साफ मानी जा रही है। एएमसीए जैसे क्रिटिकल प्रोजेक्ट में देरी की कोई गुंजाइश नहीं है। एचएएल के पास पहले से तेजस मार्क-1ए, प्रचंड, सुखोई अपग्रेड, टीईडीबीएफ यानी ट्विन इंजन टेक बेस्ड फाइटर और कई अन्य बड़े प्रोजेक्ट्स हैं। इन सबकी डिलीवरी टाइमलाइन पहले ही खिंची हुई है। सरकार नहीं चाहती थी कि ज्यादा वर्कलोड के कारण एएमसीए भी उसी रास्ते पर चला जाए।

इसलिए ऐसी कंपनी को प्राथमिकता दी गई, जिसके पास बैलेंस्ड वर्कलोड हो और जो नए प्रोजेक्ट को पूरी फोकस के साथ आगे बढ़ा सके। (HAL AMCA disqualification)

क्या तेजस की देरी ने भी भूमिका निभाई?

आधिकारिक तौर पर ऐसा कुछ नहीं कहा गया है, लेकिन डिफेंस सर्कल में यह चर्चा जरूर है कि तेजस मार्क-1ए की डिलीवरी में हुई देरी, इंजन सप्लाई से जुड़ी समस्याएं और प्रोडक्शन स्लो होने जैसी बातें बैकग्राउंड में असर डाल सकती हैं।

हालांकि यह साफ है कि मुख्य वजह वही ऑर्डर बुक बनाम टर्नओवर वाला नियम रहा, न कि कोई अचानक लिया गया फैसला। (HAL AMCA disqualification)

एचएएल पूरी तरह बाहर हुई या नहीं?

यहां एक जरूरी क्लैरिटी समझनी होगी। एचएएल को पूरी तरह एएमसीए से बाहर नहीं किया गया है। अभी बात सिर्फ प्रोटोटाइप डेवलपमेंट फेज की है, जिसकी लागत करीब 15,000 करोड़ रुपये से ज्यादा मानी जा रही है।

भविष्य में जब प्रोटोटाइप्स के बाद, 2034-2035 से एएमसीए का फुल सीरियल प्रोडक्शन शुरू होगा, तब एचएएल की भूमिका फिर से सामने आ सकती है। एचएएल पहले से एएमसीए के डिजाइन और स्ट्रक्चर से जुड़े कुछ कामों में शामिल रही है। (HAL AMCA disqualification)

प्राइवेट सेक्टर की एंट्री से क्या बदलेगा?

एएमसीए प्रोजेक्ट में प्राइवेट सेक्टर की बड़ी एंट्री सरकार की उस नीति को दिखाती है, जिसमें डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग को एचएएल के मोनोपॉली से बाहर निकालकर ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनाना है। इससे एक तरफ जहां स्पीड और इनोवेशन बढ़ने की उम्मीद है, वहीं दूसरी तरफ यह भी सच है कि भारत में फाइटर जेट बनाने का सबसे ज्यादा अनुभव अभी भी एचएएल के पास ही है। यही वजह है कि कुछ एक्सपर्ट्स इस फैसले को रिस्की भी मान रहे हैं। (HAL AMCA disqualification)

एएमसीए की आगे की टाइमलाइन क्या है?

सूत्रों के मुताबिक एएमसीए के लिए तीन कंसोर्टियम को शॉर्टलिस्ट किया गया है। इनमें टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स एक स्वतंत्र दावेदार के तौर पर सामने आई, जबकि लार्सन एंड टूब्रो ने भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड के साथ मिलकर जगह बनाई। तीसरा शॉर्टलिस्टेड समूह कल्याणी स्ट्रेटेजिक सिस्टम्स के नेतृत्व में बना कंसोर्टियम था, जिसमें बीईएमएल और दाता पैटर्न्स शामिल थे।

मौजूदा योजना के मुताबिक, शॉर्टलिस्ट किए गए कंसोर्टियम को जल्द ही अप्रैल 2026 तक आरएफपी जारी किया जाएगा। इसके बाद फाइनल सेलेक्शन फाइनल सेलेक्शन जून-जुलाई 2026 में होगा और पांच प्रोटोटाइप बनाए जाएंगे।

पहला प्रोटोटाइप 2028-29 के आसपास रोल-आउट हो सकता है, जबकि पहली उड़ान 2029 में देखने को मिल सकती है। इंडक्शन का लक्ष्य 2035 के आसपास रखा गया है। (HAL AMCA disqualification)

PM मोदी का इजराइल दौरा इसी महीने संभव, मिडिल ईस्ट में भारत देगा बड़ा रणनीतिक संदेश

PM Modi Israel visit

PM Modi Israel visit: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस महीने के आखिर में इजराइल दौरे पर रवाना हो सकते हैं। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, फरवरी के आखिरी सप्ताह में यह यात्रा हो सकती है और इसके आधिकारिक कार्यक्रम की घोषणा जल्द किए जाने की उम्मीद है। अगर यह दौरा होता है, तो यह भारत-इजराइल रिश्तों में एक और अहम अध्याय जोड़ेगा, खासकर ऐसे समय में जब मिडिल ईस्ट में हालात तेजी से बदल रहे हैं।

सरकार के करीबी सूत्रों का कहना है कि भारत इस दौरे के जरिए यह संदेश देना चाहता है कि वह मिडिल ईस्ट में केवल एक दर्शक नहीं, बल्कि एक सक्रिय और जिम्मेदार भागीदार है। भारत टेक्नोलॉजी, सिक्योरिटी कोऑपरेशन और इकनॉमिक स्टेबिलिटी के जरिए क्षेत्रीय हालात को संतुलित करने में अपनी भूमिका निभा रहा है। (PM Modi Israel visit)

PM Modi Israel visit: क्यों अहम है यह यात्रा

भारत और इजराइल के रिश्ते बीते एक दशक में काफी मजबूत हुए हैं। खासतौर पर 2014 के बाद दोनों देशों के बीच डिफेंस, टेक्नोलॉजी और इनोवेशन के क्षेत्रों में सहयोग तेज हुआ है। प्रधानमंत्री मोदी पहले भी 2017 में इजराइल का ऐतिहासिक दौरा कर चुके हैं, जिसने द्विपक्षीय रिश्तों को नई ऊंचाई दी थी। अब एक बार फिर यह दौरा ऐसे वक्त में प्रस्तावित है, जब क्षेत्र में जियो-पॉलिटिकल अस्थिरता और सिक्योरिटी री-अलाइनमेंट देखने को मिल रहे हैं।

सूत्रों के मुताबिक, भारत इजराइल के साथ अपने रिश्तों को इस तरह आगे बढ़ाना चाहता है कि उसका संतुलन खाड़ी देशों के साथ मजबूत साझेदारी से भी बना रहे। यही वजह है कि नई दिल्ली इज़राइल के साथ रिश्तों को “बैलेंस्ड पार्टनरशिप” के तौर पर देखती है, न कि किसी एक धड़े के साथ खड़े होने के रूप में। (PM Modi Israel visit)

किन मुद्दों पर रहेगा फोकस

इस संभावित यात्रा का मुख्य एजेंडा भविष्य को ध्यान में रखकर तय किया गया है। बातचीत का केंद्र विज्ञान और टेक्नोलॉजी, डिफेंस इनोवेशन, क्वांटम टेक्नोलॉजी, साइबर सिक्योरिटी और एडवांस्ड एग्रीकल्चर जैसे क्षेत्र हो सकते हैं।

इजराइल की पहचान अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी, स्टार्ट-अप इकोसिस्टम और साइबर सिक्योरिटी में वैश्विक नेतृत्व के तौर पर है, जबकि भारत एक विशाल बाजार और तेजी से बढ़ती डिजिटल इकॉनमी है। दोनों देशों के लिए यह साझेदारी केवल खरीद-फरोख्त तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि नॉलेज-बेस्ड और लॉन्ग-टर्म स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप की दिशा में आगे बढ़ रही है।

सूत्रों का कहना है कि इस दौरान कई एमओयू पर भी हस्ताक्षर हो सकते हैं। इनमें संस्कृति, डिफेंस कोऑपरेशन, साइंस एंड टेक्नोलॉजी, साइबर सिक्योरिटी और क्वांटम रिसर्च जैसे विषय शामिल हो सकते हैं। (PM Modi Israel visit)

ट्रांजैक्शनल डिफेंस से स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप तक

भारत-इजराइल रिश्तों की शुरुआत मुख्य रूप से डिफेंस खरीद तक सीमित मानी जाती थी। लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, यह दौरा इस बदलाव को और मजबूत करेगा, जहां फोकस केवल हथियारों की खरीद पर नहीं, बल्कि संयुक्त रिसर्च, को-डेवलपमेंट और इनोवेशन पर होगा।

डिफेंस इनोवेशन, ड्रोन टेक्नोलॉजी, मिसाइल डिफेंस सिस्टम और साइबर वॉरफेयर जैसे क्षेत्रों में दोनों देश मिलकर काम कर रहे हैं। भारत चाहता है कि यह सहयोग ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे अभियानों के साथ जुड़कर आगे बढ़े। (PM Modi Israel visit)

मिडिल ईस्ट के लिए बड़ा संदेश

इस दौरे का असर सिर्फ भारत-इजराइल रिश्तों तक सीमित नहीं रहेगा। यह पूरे मिडिल ईस्ट के लिए एक मजबूत संदेश होगा कि भारत आत्मविश्वास के साथ इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है। भारत खुद को एक स्थिर, टेक्नोलॉजी-ड्रिवन और भरोसेमंद पार्टनर के तौर पर पेश कर रहा है।

सरकारी सूत्रों का कहना है कि खाड़ी देशों के साथ भारत की लगातार बातचीत और साझेदारी यह दिखाती है कि मिडिल ईस्ट अब भारत को हर अहम डेवलपमेंट में “इन द लूप” रखना चाहता है। इजराइल दौरा इसी व्यापक कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। (PM Modi Israel visit)

बता दें कि इस साल जनवरी में प्रधानमंत्री मोदी ने इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से फोन पर बात की थी। उस बातचीत में नए साल की शुभकामनाओं के साथ-साथ भारत-इजराइल स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप को और मजबूत करने के तरीकों पर चर्चा हुई थी। दोनों नेताओं ने क्षेत्रीय हालात पर भी विचार साझा किए थे।

इसके अलावा, नवंबर में केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल भी इजराइल के दौरे पर गए थे। उन्होंने वहां नेतन्याहू और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात कर आर्थिक, टेक्नोलॉजिकल और स्ट्रैटेजिक सहयोग को आगे बढ़ाने पर बातचीत की थी। इस दौरान बिजनेस फोरम और सीईओ फोरम में 60 से ज्यादा भारतीय उद्योगपतियों ने हिस्सा लिया था। (PM Modi Israel visit)