Home Blog Page 49

Theatre Command: CDS चौहान ने कहा- ऑपरेशन सिंदूर से मिले पाठ थिएटराइजेशन में होंगे शामिल, एयर चीफ बोले- विचार-विमर्श के बाद ही बढ़ें आगे

Theatre Command
CDS Gen Anil Chauhan and IAF chief AP Singh at the India Defence Conclave organised by BharatShakti

Theatre Command: चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर से भारतीय सेनाओं को कई अहम सबक मिले हैं, जिन्हें थिएटराइजेशन मॉडल में शामिल किया जाएगा। उन्होंने इंडिया डिफेंस कॉन्क्लेव में बताया कि यह अनुभव थिएटर कमांड का स्ट्रक्चर बनाने में काम आएगा। वहीं, भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह कहना है कि भारतीय वायुसेना को थिएटर कमांड के गठन से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन इसे पर्याप्त विचार-विमर्श के बाद ही आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

Differences on Theatre Commands: क्या थिएटर कमांड को लेकर सेनाओं में बढ़ रहे हैं मतभेद? CDS जनरल चौहान ने कैसे निकाला बीच का रास्ता?

कार्यक्रम में जनरल चौहान ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने यह दिखाया कि इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस को दुश्मन की सीमा के पार भी प्रभावी तरीके से तैनात किया जाना चाहिए और यह अब न्यू नॉर्मल होना चाहिए। सीडीएस ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने यह भी सिखाया कि सर्विस चीफ्स की भूमिका अहम है और चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी की भूमिका को फिर से परिभाषित करने की जरूरत है। उन्होंने बताया कि जॉइंट कमांडर कॉन्क्लेव से मिले अनुभवों को मिलाकर एक ऐसा आर्गेनाइजेशनल स्ट्रक्चर तैयार किया जा रहा है जो हर परिस्थिति के लिए काम आएगा।

थिएटराइजेशन योजना के तहत देश को कई संयुक्त थिएटर कमांड्स में बांटा जाएगा, जिनमें थलसेना, नौसेना और वायुसेना की यूनिटें एक साथ काम करेंगी। ये कमांड अपने-अपने भौगोलिक इलाकों की सुरक्षा और रणनीतिक अभियानों के लिए जिम्मेदार होंगी।

जनरल चौहान ने हंसते हुए कहा, “ऑपरेशन सिंदूर के बाद सबसे बड़ी चुनौती यह है कि चारों शीर्ष अधिकारी तीनों सेनाओं के प्रमुख और सीडीएस को एक साथ दिल्ली में मिलना मुश्किल हो गया है।”

जनरल चौहान ने आगे कहा कि नए मॉडल में एयर डिफेंस, काउंटर-यूएएस और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर को अहम जगह दी जाएगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि भविष्य में मोबाइल टारगेट्स से निपटना भी जरूरी होगा और तकनीकी रूप से दुश्मन से आगे रहने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि थिएटराइजेशन से हर क्षेत्र के लिए अलग-अलग कमांड नहीं बल्कि एक कोआर्डिनेटेड कमांड मिलेगी, जहां थल, नौ और वायु सेनाएं एक साथ काम करेंगी।

सीडीएस ने बताया कि उरी, बालाकोट, गलवान और डोकलाम से मिली सीखों से मिले अनुभव नया आर्गेनाइजेशनल मॉडल तय करने में मदद करेंगे। उन्होंने यह भी बताया कि अब चौथे स्तरीय मुद्दा यह है कि शीर्ष नेतृत्व के साथ कैसे संवाद और रणनीतिक फैसले लिए जाएं, इस पर भी काम किया जा रहा है।

IAF Chief on Drones: वायुसेना प्रमुख बोले- युद्ध में जीत नहीं दिला सकते ड्रोन, पारंपरिक फाइटर जेट्स की बनी रहेगी अहमियत

वहीं, इसी कार्यक्रम में वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने कहा कि वायुसेना नई मिलिट्री फॉर्मेशंस बनाने के विरोध में नहीं है, लेकिन इसे पूरी चर्चा के बाद ही आगे बढ़ाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि थिएटर कमांड जैसे स्ट्रक्चर तभी कारगर होंगं, जब वे भारत की जरूरतों के अनुरूप हों और विदेश के किसी मॉडल की नकल न हों। एयर चीफ ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने ट्राई-सर्विसेज सिनर्जी को दिखाया, पर औपचारिक स्ट्रक्चर से यह कॉर्डिनेशन और मजबूत होगा।

उन्होंने कहा कि तीनों सेनाओं थलसेना, वायुसेना और नौसेना के बीच बेहतर तालमेल के लिए एक जॉइंट स्ट्रक्चर बनाया जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने यह सुझाव दिया कि इस स्ट्रक्चर में पैरामिलिट्री फोर्सेज और सिविल एजेंसियों को भी शामिल किया जाए।

उन्होंने आगे कहा कि हाल ही में हुए ऑपरेशन सिंदूर ने दिखाया कि तीनों सेनाएँ एकजुट होकर कितनी प्रभावी कार्रवाई कर सकती हैं। “शायद इस बार हमारे व्यक्तिगत तालमेल से यह संभव हुआ, लेकिन भविष्य में मतभेद भी हो सकते हैं। इसलिए अगर कोई फॉर्मल स्ट्रक्चर होगा, तो यह हमारे लिए सहायक होगा।”

सितंबर में एयर चीफ मार्शल सिंह ने थिएटर कमांड योजना पर विचार-विमर्श की जरूरत पर बल देते हुए कहा था कि जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं होना चाहिए। उन्होंने यह भी सुझाव दिया था कि दिल्ली में एक संयुक्त योजना और समन्वय केंद्र बनाया जाए, जिससे तीनों सेनाओं के बीच बेहतर समन्वय हो सके।

वायु प्रमुख ने आत्मनिर्भरता पर कहा कि देश सही दिशा में बढ़ रहा है पर रफ्तार बढ़ाने की जरूरत है। उन्होंने रेगुलेटरी एंड पॉलिसी अकोमोडेशंस का जिक्र करते हुए कहा कि निजी उद्योग और छोटे उद्यम भी रक्षा क्षेत्र में सक्रिय रूप से जुड़ सकें। एयर चीफ ने जोर दिया कि जहां देश की विशेषज्ञता कम है, वहां सही साझेदारी करके क्षमता बढ़ाई जानी चाहिए।

IAF Chief on Drones: वायुसेना प्रमुख बोले- युद्ध में जीत नहीं दिला सकते ड्रोन, पारंपरिक फाइटर जेट्स की बनी रहेगी अहमियत

IAF Chief on Drones
IAF chief AP Singh at the India Defence Conclave organised by BharatShakti

IAF Chief on Drones: भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने मंगलवार को कहा कि ड्रोन की आजकल हर कोई चर्चा कर रहा है, लेकिन केवल ड्रोन के दम पर युद्ध नहीं जीता जा सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि मानव चलित पारंपरिक एयरक्राफ्ट आने वाले समय में भी बेहद जरूरी रहेंगे।

Tejas MK1A Delivery Delay: बिना तेजस की डिलीवरी के सूनी रही IAF की दीपावली, HAL ने फिर तोड़ा वादा, ये है वजह

भारत शक्ति द्वारा आयोजित इंडिया डिफेंस कॉन्क्लेव में एयर चीफ सिंह ने कहा कि “ड्रोन नई तकनीक हैं और ये युद्ध के दौरान भ्रम पैदा कर सकते हैं या मदद कर सकते हैं, लेकिन असली लड़ाई जीतने के लिए अब भी ऐसे हथियारों की जरूरत होती है जो दुश्मन के अंदर तक जाकर सटीक हमला करें। फिलहाल ड्रोन अभी उस स्तर पर नहीं पहुंचे हैं।”

उन्होंने आगे कहा कि “अगर किसी लक्ष्य को पूरी तरह नष्ट करना है या दुश्मन की सीमा के भीतर गहराई तक वार करना है, तो इसके लिए भारी हथियारों से लैस विमान की जरूरत होती है। भविष्य में भी इंसान की भूमिका खत्म नहीं होगी, क्योंकि मुश्किल हालात में हमेशा ‘मैन इन द लूप’ यानी इंसानी कंट्रोल जरूरी होता है।”

एयर चीफ सिंह ने बताया कि दुनिया के कई देश इस समय छठी पीढ़ी के विमान बना रहे हैं, जो मैन्ड और बिना पायलट वाले विमानों के मिश्रण पर आधारित हैं। उन्होंने कहा, “इससे साफ है कि मैनड एयरक्राफ्ट कहीं नहीं जा रहे।”

वहीं, जब उनसे पूछा गया कि क्या लंबी दूरी के मिसाइलें ही भविष्य हैं, तो उन्होंने कहा कि यह हालात और टारगेट पर निर्भर करता है। “हर हालात में लंबी दूरी का हथियार जरूरी नहीं होता। कुछ जगहों पर कम नुकसान वाला हथियार चाहिए होता है। इसलिए हमें हर तरह के हथियारों का मिश्रण चाहिए यानी हर बीमारी की दवा पैरासिटामोल नहीं हो सकती।”

देश में आत्मनिर्भरता के प्रयासों पर बात करते हुए एयर चीफ ने कहा कि भारत रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में सही दिशा में आगे बढ़ रहा है, लेकिन रफ्तार बढ़ाने की जरूरत है। “हम अंधेरे में नहीं टटोल रहे, पर हमें और तेजी से काम करना होगा। नीतियों और नियमों को इस दिशा में लाया जा रहा है कि निजी क्षेत्र को अधिक मौके मिलें।”

उन्होंने यह भी कहा कि भारत को सब कुछ अकेले करने की जिद नहीं रखनी चाहिए। “जहां हमें विशेषज्ञता की कमी है, वहां हमें साझेदारी करनी चाहिए। अच्छी तकनीक के लिए सही भागीदारों के साथ काम करने से ही हम आत्मनिर्भर बन सकते हैं।”

ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए एयर चीफ मार्शल सिंह ने कहा कि दुनिया को इससे यह सीख लेनी चाहिए कि संघर्ष को सही समय पर खत्म करना बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा, “दुनिया भर में कई जगह लक्ष्य तय कर लिए जाते हैं, लेकिन समय के साथ लोग यह भूल जाते हैं कि उन्होंने किस मकसद से लड़ाई शुरू की थी। इसके बाद युद्ध केवल अहंकार या राजनीतिक बयानबाजी का रूप ले लेता है।”

उन्होंने कहा कि कि भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के पहले ही दिन अपने लक्ष्य हासिल कर लिए थे, लेकिन पाकिस्तान युद्ध को बढ़ाना चाहता था। उन्होंने कहा, “जब भी दुश्मन ने युद्ध विराम की बात की, भारत ने उसे स्वीकार किया, और यह बिल्कुल सही फैसला था।”

जिस Project Yojak के तहत बनी रोहतांग अटल टनल, पूरे हुए उसके पांच साल, BRO ने मनाया स्थापना दिवसr

Project Yojak 5th Raising Day
Project Yojak 5th Raising Day

Project Yojak: भारतीय सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) ने अपने प्रोजेक्ट योजक का पांचवां स्थापना दिवस हिमाचल प्रदेश के सोलंग वैली में मनाया। इस मौके पर संगठन ने पिछले चार वर्षों की अपनी प्रमुख उपलब्धियों को साझा किया, जिनमें सड़कों, पुलों और टनलों का निर्माण शामिल है जो देश की सामरिक और सामाजिक दृष्टि से बेहद अहम हैं।

BRO Project Arunank: बीआरओ ने अरुणाचल प्रदेश में मनाया प्रोजेक्ट अरुणांक का 18वां स्थापना दिवस

प्रोजेक्ट योजक ने बीते चार वर्षों में 351.45 किलोमीटर सड़कें, 295.88 मीटर लंबे प्रमुख पुल, और 171 मीटर टनल का निर्माण किया है। ये सभी प्रोजेक्ट देश के सबसे दुर्गम और ऊंचाई वाले इलाकों में पूरे किए गए हैं। इन निर्माण कार्यों ने न केवल सीमावर्ती इलाकों को देश से जोड़ने में मदद की है, बल्कि स्थानीय लोगों के जीवन को भी आसान बनाया है।

इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी उपलब्धियों में अटल टनल, रोहतांग का निर्माण शामिल है, जो दुनिया की सबसे ऊंचाई पर बनी टनल मानी जाती है। इसके अलावा, निम्मू–पदम–दर्चा रोड पर 26 मार्च 2024 को कनेक्टिविटी बना कर इस प्रोजेक्ट ने एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की। वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 26 जुलाई 2024 को शिंकुन ला टनल की आधारशिला रखी, जो बनने के बाद दुनिया की सबसे ऊंची टनल होगी।

Project Yojak 5th Raising Day
Project Yojak 5th Raising Day

इसका अलावा प्रोजेक्ट योजक के तहत पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी बीआरओ ने सराहनीय कदम उठाए हैं। “एक पेड़ मां के नाम” अभियान के तहत हिमाचल प्रदेश के कई इलाकों में 550 पौधे लगाए गए। संगठन का उद्देश्य निर्माण कार्यों से होने वाले पर्यावरणीय प्रभाव को कम करना और हरियाली को बढ़ावा देना है।

Project Yojak 5th Raising Day
Project Yojak 5th Raising Day

बीआरओ ने अपने कैजुअल पेड लेबरर्स के लिए भी कई कल्याणकारी योजनाएं शुरू की हैं, जिनमें बेहतर आवास, गर्म कपड़े, स्वास्थ्य शिविर और बच्चों की शिक्षा की सुविधा शामिल हैं।

बीआरओ के प्रोजेक्ट योजक की शुरुआत 4 मार्च 2010 को प्रोजेक्ट रोहतांग टनल के तौर पर हुई थी। अटल टनल के सफल निर्माण के बाद इसे 4 नवंबर 2021 को “प्रोजेक्ट योजक” नाम दिया गया।

Indian Army Sports Conclave 2025: भारतीय सेना ने मिशन ओलंपिक 2036 के लिए कसी कमर, अब झोली भर-भर कर आएंगे मेडल

Indian Army Sports Conclave 2025

Indian Army Sports Conclave 2025: भारतीय सेना ने सोमवार को राजधानी दिल्ली के मानेकशॉ सेंटर में आर्मी स्पोर्ट्स कॉन्क्लेव 2025 का आयोजन किया। यह कार्यक्रम भारत के खेल इतिहास में एक अहम कदम माना जा रहा है, जिसका उद्देश्य मिशन ओलंपिक 2036 को आगे बढ़ाना है।

Indian Army Drone Capability Drive: आत्मनिर्भर भारत के तहत भारतीय सेना की ड्रोन क्षमता में बड़ी छलांग

कार्यक्रम की शुरुआत में डायरेक्टर जनरल इंटीग्रेटेड ट्रेनिंग लेफ्टिनेंट जनरल अजय रामदेव ने कहा कि यह कॉन्क्लेव “उद्देश्य और जुनून का संगम” है, जहां सेना के खिलाड़ी देश की खेल महत्वाकांक्षाओं को साकार करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने मिशन ओलंपिक विंग और पैराअथलीट्स की सराहना की और वैज्ञानिक व डेटा-बेस्ड ट्रेनिंग पर जोर दिया।

कार्यक्रम में खेल मंत्रालय में सचिव हरि रंजन रावने कहा कि भारतीय सेना विश्वस्तरीय खिलाड़ियों को तैयार करने में लगातार योगदान दे रही है। उन्होंने टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम, खेलो इंडिया और स्पोर्ट्स साइंस इंटीग्रेशन जैसी सरकारी योजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि देश को ओलंपिक 2036 के लिए दीर्घकालिक योजना पर काम करना होगा और इसके लिए सभी स्टेकहोल्डर्स में सामंजस्य बनाने की जरूरत है।

वहीं, कार्यक्रम में डिप्टी चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ (इंफॉर्मेशन सिस्टम्स एंड ट्रेनिंग) लेफ्टिनेंट जनरल राकेश कपूर ने अपने विचार रखते हुए कहा कि सेना और खेलों का रिश्ता फिटनेस, अनुशासन और टीमवर्क पर आधारित है। उन्होंने सेना की प्रमुख खेल पहलों पर प्रकाश डाला और कहा कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से तैयार ट्रेनिंग ही सफलता की कुंजी है। उन्होंने सेना, भारतीय खेल प्राधिकरण, निजी क्षेत्र और शिक्षा जगत के बीच तालमेल का आग्रह करते हुए भारत के ओलंपिक मिशन 2036 के लिए सामूहिक संकल्प का आह्वान किया।

इस कॉन्क्लेव में दो मुख्य विषयों “इंस्टीट्यूशनल सिनर्जी” और “एथलीट 360” पर चर्चा की गई, जिनका उद्देश्य खिलाड़ियों के समग्र विकास और संस्थागत सहयोग को मजबूत करना था।

Indian Army Sports Conclave 2025
Indian Army Hosts Army Sports Conclave 2025 to Drive India’s Olympic Mission 2036

कार्यक्रम में तीन दिग्गज खिलाड़ियों को आर्मी स्पोर्ट्स लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। इनमें कर्नल (से.नि.) बलबीर सिंह कुल्लर (ओलंपिक ब्रॉन्ज, हॉकी 1968), मुरलीकांत पेटकर (पैरालंपिक गोल्ड 1972) और ऑनरी कैप्टन विजय कुमार शर्मा (ओलंपिक सिल्वर, शूटिंग 2012) शामिल रहे।

सम्मान समारोह का आयोजन दक्षिण ब्लॉक में किया गया, जहां सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने इन खिलाड़ियों को सम्मानित किया। कार्यक्रम का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि भारतीय सेना देश को ओलंपिक मिशन 2036 के लिए और मजबूत बनाएगी, ताकि भारत खेलों में विश्व स्तर पर अपनी पहचान बना सके।

Indian Army Drone Capability Drive: आत्मनिर्भर भारत के तहत भारतीय सेना की ड्रोन क्षमता में बड़ी छलांग

Indian Army Drone Capability Drive

Indian Army Drone Capability Drive: भारतीय सेना ने आत्मनिर्भर भारत के विजन को साकार करते हुए अपनी ड्रोन क्षमता को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। साउदर्न कमांड ने “Eagle on Every Arm” के मंत्र के साथ एक स्वदेशी इकोसिस्टम तैयार किया है, जो कॉम्बैट-रेडी ड्रोन के डिजाइन, निर्माण और बड़े पैमाने पर उत्पादन करेगाा।

Pakistan drone smugglers: भारत-पाक सीमा पर चल रहा है टॉम एंड जेरी! भारतीय एंटी-ड्रोन सिस्टम से कैसे आंख मिचौली खेल रहे हैं पाकिस्तानी ड्रोन

इस पहल में सेना के कॉर्प्स ऑफ ईएमई और देश के एमएसएमई सेक्टर की कंपनियों की भागीदारी है। ये ड्रोन हब्स आधुनिक अनमैन्ड एरियल सिस्टम तैयार कर रहे हैं, जिनका इस्तेमाल निगरानी, सटीक हमलों और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर जैसी भूमिकाओं में किया जाएगा।

हाल ही में ये स्वदेशी ड्रोन एक्सरसाइज त्रिशूल के दौरान सफलतापूर्वक परखे गए, जहां उन्होंने कठिन युद्ध परिस्थितियों में अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया। इन ड्रोन का प्रदर्शन भारतीय सेना के लिए एक अहम उपलब्धि माना जा रहा है।

भारतीय सेना की यह पहल न केवल तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम है, बल्कि यह दर्शाती है कि देश की सेना अब भविष्य की युद्ध स्थितियों के लिए पूरी तरह तैयार हो रही है। साउदर्न कमांड इस बदलाव के अग्रणी मोर्चे पर खड़ी है और इनोवेशन, स्वदेशी उद्योग सहयोग तथा सामरिक तैयारी को एक साथ जोड़ रही है।

AMCA Project के लिए लार्सन एंड टूब्रो और BEL ने डायनामाइट टेक्नोलॉजीज बनाया एक्सक्लूसिव पार्टनर

AMCA fighter jet
AMCA fighter jet

AMCA Project: भारत के 5वीं पीढ़ी के फाइटर एयरक्राफ्ट प्रोजेक्ट AMCA को लेकर लार्सन एंड टूब्रो और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड के गठबंधन में अब एक नया नाम जुड़ गया है। दोनों ने डायनामाइट टेक्नोलॉजीज को इस प्रोजेक्ट का एक्सक्लूसिव पार्टनर बनाया है।

Indian AMCA fighter jet: स्वदेशी 5वीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान प्रोजेक्ट पकड़ेगा रफ्तार, इसके डेवलपमेंट के लिए कई भारतीय कंपनियों ने दिए प्रस्ताव

एल एंड टी की तरफ से जारी प्रेस रिलीज के मुताबिक यह सहयोग भारत के एयरक्राफ्ट मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। डायनामाइट टेक्नोलॉजीज की एयरोस्ट्रक्चर और सब-सिस्टम मैन्युफैक्चरिंग में विशेषज्ञता है, वहीं लार्सन एंड टूब्रो की इंजीनियरिंग क्षमता और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड की एडवांस इलेक्ट्रॉनिक्स टेक्नोलॉजी, इन तीनों की ताकत अब एक साथ मिलकर एएमसीए के डेवलपमेंट में योगदान देगी।

लार्सन एंड टूब्रो के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और हेड, प्रिसिशन इंजीनियरिंग एंड सिस्टम्स, अरुण रामचंदानी ने कहा, “डायनामाइट टेक्नोलॉजीज के जुड़ने से हमारी टीम में एक नई ऊर्जा आई है। यह साझेदारी सिर्फ अगली पीढ़ी का फाइटर जेट बनाने का मिशन नहीं, बल्कि भारतीय एयरोस्पेस इंडस्ट्री को नए स्तर पर ले जाने का कदम है।”

वहीं, डायनामाइट टेक्नोलॉजीज के सीईओ और मैनेजिंग डायरेक्टर उदयंत मल्होत्रा ने कहा, “हम तीन दशकों से सुपरसोनिक एयरक्राफ्ट स्ट्रक्चर बनाने के अग्रणी रहे हैं। अब लार्सन एंड टूब्रो और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड के साथ जुड़कर भारत के 5वीं पीढ़ी के फाइटर विमान के निर्माण में योगदान देना हमारे लिए गर्व की बात है।”

एएमसीए प्रोजेक्ट भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका उद्देश्य एक ऐसा फाइटर जेट तैयार करना है जो स्टेल्थ टेक्नोलॉजी, सुपरक्रूज क्षमता, एडवांस एवियोनिक्स सिस्टम, और नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर के मुताबिक हो।

वहीं, इस साझेदारी से भारत में एडवांस एयरोस्पेस टेक्नोलॉजी, फाइटर जेट कंपोनेंट डिजाइन, और हाई-प्रिसिशन मैन्युफैक्चरिंग क्षमताओं को मजबूत करने में मदद मिलेगी।

Trump Pakistan Nuclear Bluff: ट्रंप हर बार फंस जाते हैं पाकिस्तान के परमाणु झांसे में, पीएम मोदी तो पहले ही कर चुके हैं बेनकाब

Trump Pakistan Nuclear Bluff

Trump Pakistan Nuclear Bluff: अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सीबीएस (CBS) इंटरव्यू में किए गए दावों से फिर एक बार यह संकेत मिलता है कि वाशिंगटन अभी भी पाकिस्तान की परमाणु रणनीति से प्रभावित है। ट्रंप ने दावा किया कि भारत और पाकिस्तान मई 2025 में एक परमाणु युद्ध के बहुत करीब पहुंच गए थे और उन्होंने खुद हस्तक्षेप करके इसे टाल दिया था। उनका कहना था कि उन्होंने दोनों देशों को चेतावनी दी कि अगर वे तुरंत नहीं रुके तो अमेरिका उनके साथ व्यापार संबंधों को खत्म कर देगा।

Pakistan Nuclear Test: ट्रंप का दावा- पाकिस्तान और चीन कर रहे गुप्त परमाणु परीक्षण, भारत में चिंता बढ़ी

लेकिन इस दावे ने भारत और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों के बीच गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं क्योंकि वे इसे पाकिस्तान के परमाणु ब्लैकमेल की रणनीति का हिस्सा मानते हैं। उनका कहना है कि ट्रंप ने उस रणनीति को वैधता दे दी है, जिसे भारत पहले ही कई बार उजागर कर चुका है।

Trump Pakistan Nuclear Bluff: क्या कहा ट्रंप ने इंटरव्यू में

इंटरव्यू दौरान ट्रंप ने एक कागज की शीट पढ़ते हुए अपनी उपलब्धियों का जिक्र किया, जिसमें पाकिस्तान और भारत को आठवां पॉइंट बताया। उन्होंने कहा, “मैंने आठ युद्धों को रोका। भारत और पाकिस्तान वाला तो ‘ब्यूटी’ था। वे न्यूक्लियर युद्ध के कगार पर थे। हवाई जहाजों को इधर-उधर गिराया जा रहा था। मैंने दोनों को फोन किया– नरेंद्र मोदी और शहबाज शरीफ को और कहा, ‘अगर आप नहीं रुके, तो अमेरिका के साथ कोई व्यापार नहीं होगा।'” ट्रंप ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शरीफ का हवाला देते हुए जोड़ा, “उन्होंने कहा कि अगर डोनाल्ड ट्रंप न शामिल होते, तो लाखों लोग मर चुके होते।”

ट्रंप ने दावा करते हुए कि रूस, चीन, उत्तर कोरिया और पाकिस्तान गुप्त रूप से अंडरग्राउंड परमाणु टेस्ट कर रहे हैं। “हम इकलौते देश हैं जो टेस्ट नहीं करते। पाकिस्तान टेस्ट कर रहा है, लेकिन कोई बात नहीं करता।”

Trump Pakistan Nuclear Bluff: पाकिस्तान की परमाणु ‘डर’ की रणनीति

लंबे समय से पाकिस्तान अपने परमाणु हथियारों की धमकी का इस्तेमाल राजनीतिक और रणनीतिक दबाव बनाने के लिए करता रहा है। इस रणनीति के तहत हर बार जब भारत सीमा क्षेत्र में कार्रवाई करता है, पाकिस्तान परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की चेतावनी देता है। इस तरह के बयान अक्सर अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान को समर्थन दिलाते हैं और अमेरिका जैसे देशों को दखल देने के लिए प्रेरित करते हैं।

विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिका इस तरह के परमाणु डराने वाले बयान से कई बार फंसा है और संतुलन बनाने की कोशिश में रहा है। वह भारत को नियंत्रित रखना चाहता है और पाकिस्तान को किसी बड़े संघर्ष में नहीं पड़ने देना चाहता है। ट्रंप का हालिया बयान उसी सोच को दर्शाता है जिसमें अमेरिका ने भारत को “आक्रामक” और पाकिस्तान को “संवेदनशील परमाणु शक्ति” बताया है।

पीएम मोदी ने पहले ही पाकिस्तानी ब्लफ को किया बेनकाब

भारत ने पिछले कुछ वर्षों में कई बार यह दिखा दिया है कि पाकिस्तान का परमाणु खतरा असल में खोखली बयानबाजी है। कारगिल युभारत द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक 2016, बालाकोट एयरस्ट्राइक 2019 और ऑपरेशन सिंदूर 2025 के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि पाकिस्तान ने अपनी परमाणु चेतावनियों को आगे बढ़ाने का साहस नहीं दिखाया। वहीं, भारत अब पाकिस्तान की “न्यूक्लियर ब्लैकमेल डिप्लोमेसी” से बाहर निकल चुका है।

इस तरह भारत ने यह संदेश दिया कि वह डर या धमकी के आधार पर पीछे नहीं हटेगा। इसके उलट, पाकिस्तान की रणनीति नियमित रूप से परमाणु हथियारों को राजनीतिक बयानबाजी के तौर पर इस्तेमाल करती आई है।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद 12 मई को प्रधानमंत्री मोदी ने अपने राष्ट्रीय संबोधन में कहा था, “भारत किसी भी परमाणु ब्लैकमेल को बर्दाश्त नहीं करेगा। हम आतंकवाद और उसके संरक्षक पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई करते हुए किसी धमकी से नहीं डरेंगे।”

इसके बाद इसके बाद 15 अगस्त 2025 को लाल किला से स्वतंत्रता दिवस के भाषण में मोदी ने कहा, “भारत ने तय कर लिया है कि अब परमाणु धमकियों के आगे नहीं झुकेगा। हमारी सेनाओं ने आतंक के आकाओं को ऐसी सजा दी है जो वे कभी सोच भी नहीं सकते थे। खून और पानी साथ नहीं बह सकते।”

वहीं, 29 जुलाई को लोकसभा में प्रधानमंत्री ने फिर दोहराया, “पहलगाम हमले के बाद पाकिस्तान ने परमाणु धमकियां शुरू कीं, लेकिन अब कोई ब्लैकमेल काम नहीं करेगा। हम आतंक समर्थक सरकारों और उनके नेताओं में भेद नहीं करेंगे।”

Trump Pakistan Nuclear Bluff: आज भी पुरानी सोच में उलझा हुआ है अमेरिका

भारत ने हमेशा से स्पष्ट किया है कि वह सैन्य कार्रवाई पर भरोसा करता है और आतंकवाद तथा सीमावर्ती चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार है, अमेरिका की नीति आज भी पाकिस्तान की परमाणु रणनीति से प्रभावित नजर आती है। अमेरिकी रणनीति में अब भी यह धारणा है कि पाकिस्तान “एक अस्थिर परमाणु शक्ति” है और उसे संतुलित रखना दक्षिण एशिया की शांति के लिए जरूरी है।

ट्रंप ने इस धारणा को अपने बयान में दोहराया, उन्होंने कहा कि अगर भारत और पाकिस्तान ने नियंत्रण नहीं किया तो अमेरिका को हस्तक्षेप करना पड़ेगा। इस तरह का कथन यह संकेत देता है कि अमेरिका आज भी पाकिस्तान द्वारा पेश की जाने वाली परमाणु धमकी को गंभीरता से ले रहा है और उसकी नीति उसी जोखिम का सामना नहीं कर पा रही है जिसे भारत ने बेहतर तरह से मैनेज किया है।

भारत के रक्षा विश्लेषक एवं रणनीतिक मामलों के जानकार ब्रह्मा चेलानी ने ट्रंप के इस बयान को “राजनीतिक प्रदर्शन” कहा है। उनका मानना है कि अमेरिका बार-बार पाकिस्तान की परमाणु बयानबाजी में फंस जाता रहा है, जबकि भारत ने उस बयानबाजी को सफलता पूर्वक चुनौती दी है।

विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप का बयान न सिर्फ भारत के रणनीतिक दृष्टिकोण को गलत तरीके से प्रस्तुत करता है बल्कि पाकिस्तान को राजनीतिक लाभ भी देता है क्योंकि वह फिर से अपनी परमाणु रणनीति को वैश्विक मंच पर हावी कर पाता है।

संयुक्त राष्ट्र समर्थित संस्था सीटीबी के रिकॉर्ड ट्रंप के इस दावे का समर्थन नहीं करते। सीटीबीटी की रिपोर्ट के अनुसार, 1996 में इस संधि के लागू होने के बाद से दुनिया में दस से भी कम आधिकारिक परमाणु परीक्षण हुए हैं। इनमें केवल उत्तर कोरिया को छोड़कर किसी अन्य देश रूस, चीन या पाकिस्तान ने कोई नया परीक्षण नहीं किया है।

सीटीबीटी का मुख्यालय वियना में है और यह संस्था दुनिया में परमाणु परीक्षणों की निगरानी के लिए बनाई गई है। इसका इंटरनेशनल मॉनिटरिंग सिस्टम दुनिया का सबसे एडवांस सिस्टम है। इस सिस्टम में 337 मॉनिटरिंग स्टेशन और 16 विशेष प्रयोगशालाएं शामिल हैं, जो धरती के हर कोने में स्थापित हैं। यह नेटवर्क परमाणु विस्फोटों के बेहद छोटे संकेतों को भी पकड़ सकता है।

कैसे काम करता है इंटरनेशनल मॉनिटरिंग सिस्टम

इंटरनेशनल मॉनिटरिंग सिस्टम में कई तकनीकी सेंसर और डिटेक्टर शामिल हैं। इसका एयर-टेस्टिंग स्टेशन, जो वातावरण में रेडियोएक्टिव तत्वों की मामूली मात्रा का पता लगाते हैं। जबकि अंडरवॉटर हाइड्रो-अकॉस्टिक स्टेशन, समुद्र के नीचे हुए विस्फोटों की ध्वनि तरंगें पकड़ते हैं। वहीं, इंफ्रासाउंड डिटेक्टर, जो वायुमंडल में हुए बड़े धमाकों की कम आवृत्ति वाली गूंज को भी रिकॉर्ड करते हैं। सीस्मोमीटर भूमिगत परमाणु परीक्षणों से उत्पन्न झटकों को मापते हैं। ये सभी उपकरण मिलकर धरती पर कहीं भी होने वाले परमाणु विस्फोटों के संकेत पहचान सकते हैं।

हाल ही में प्रकाशित एक रिसर्च के अनुसार, जब किसी परमाणु विस्फोट के कंपन किसी भूकंप की तरंगों से मिल जाते हैं, तो उन्हें पहचानना कठिन हो जाता है। 1.7 टन के भूमिगत विस्फोट को 97 फीसदी सटीकता से पहचाना जा सकता है, लेकिन यदि यह किसी भूकंप की तरंगों के भीतर छिप जाए, तो सफलता दर घटकर 37 फीसदी रह जाती है।

इसके बावजूद, सीटीबीटी का कहना है कि उनका निगरानी सिस्टम इतना संवेदनशील है कि वह किसी भी “गंभीर” परमाणु विस्फोट को पहचान सकती है, और हाल के सालों में पाकिस्तान या चीन से कोई ऐसा संकेत नहीं मिला है।

चीन ने किया खंडन, पाकिस्तान खामोश

ट्रंप के दावे के बाद चीन ने तुरंत प्रतिक्रिया दी और इन आरोपों को बेसलेस और इररेस्पॉन्सिबल बताया। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने कहा, “चीन ने हमेशा परमाणु परीक्षणों पर रोक का पालन किया है और वैश्विक प्रतिबंधों का सख्ती से समर्थन करता है।”

दूसरी ओर, पाकिस्तान ने इस पूरे विवाद पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। केवल विदेश मंत्रालय की  वेबसाइट पर एक बयान डाला है, “पाकिस्तान, भले ही व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि पर हस्ताक्षर करने वाला देश नहीं है, लेकिन वह इस संधि के उद्देश्यों और सिद्धांतों का समर्थन करता है। वह दक्षिण एशिया में स्थिरता बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। हमने परीक्षणों पर मोराटोरियम घोषित किया है और यह प्रतिबद्धता जारी रहेगी। हम क्षेत्र में परमाणु परीक्षण फिर से शुरू करने वाले पहले देश नहीं होंगे।”

हालांकि इस्लामाबाद की इस चुप्पी को लेकर रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान इस विषय पर सीधे जवाब देने से बच रहा है, क्योंकि उसके पास ऐसे परीक्षणों के किसी भी प्रमाण का अभाव है। इसलिए वह जानबूझ कर खामोश है क्योंकि उसके बोलते ही न्यूक्लियर ब्लफ वाला पिटारा खुल जाएगा।

Pakistan Hangor Submarines: अगले साल से पाकिस्तान को मिलेंगी नई हैंगोर क्लास चीनी AIP पनडुब्बियां, भारतीय नौसेना है 7 साल पीछे?

Pakistan Hangor Submarines

Pakistan Hangor Submarines: भारतीय नौसेना को अगले साल से एक नई चुनौती मिलने वाली है। पाकिस्तान अगले साल से चीन की बनाई हैंगोर क्लास (Hangor Class) डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों को अपनी नौसेना में शामिल करना शुरू करेगा। ये आठ एडवांस पनडुब्बियां चीन और पाकिस्तान, दोनों जगह तैयार हो रही हैं। इनमें से चार चीन में और चार ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी के तहत कराची शिपयार्ड में बनेंगी।

Indian Navy Submarines: भारतीय नौसेना को मिलेंगी 9 नई पनडुब्बियां, खास AIP तकनीक से होंगी लैस, चीन और पाकिस्तान के पास पहले से है ये टेक्नोलॉजी

पाकिस्तान नौसेना प्रमुख एडमिरल नविद अशरफ ने चीनी सरकारी मीडिया को दिए इंटरव्यू में पुष्टि की है कि पहली हैंगोर क्लास पनडुब्बी अगले साल सेवा में शामिल होगी। इस परियोजना की कुल लागत लगभग 5 अरब डॉलर (41,000 करोड़ रुपये) है और सभी आठ पनडुब्बियां 2028 तक मिल जाएंगी। यह डील 2015 में हुई थी।

इन पनडुब्बियों के शामिल होने से पाकिस्तान नौसेना की अरब सागर और हिंद महासागर में निगरानी और हमलावर क्षमता में बड़ा इजाफा होगा।

Pakistan Hangor Submarines: एंटी-एक्सेस/एरिया डिनायल क्षमता बढ़ेगी

भारत के खिलाफ रणनीतिक बढ़त पाने के लिए चीन और पाकिस्तान का सैन्य सहयोग अब समुद्री क्षेत्र तक फैल चुका है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय नौसेना ने अरब सागर में अपनी जबरदस्त ताकत दिखाई थी, लेकिन अब पाकिस्तान चीन और तुर्की की मदद से अपनी नौसैनिक क्षमताओं को तेजी से सुधार रहा है।

भारतीय रक्षा अधिकारियों के मुताबिक, हैंगोर क्लास पनडुब्बियों के आने से पाकिस्तान की ए2/एडी (एंटी-एक्सेस/एरिया डिनायल) क्षमता बढ़ेगी। यानी वह अरब सागर में भारतीय नौसेना की पहुंच और कार्रवाई को सीमित करने की कोशिश करेगा।

एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, “यह भारत के लिए नई चुनौती होगी, लेकिन हमें इसका समाधान खोजना होगा। चीन हमेशा पाकिस्तान की मदद करता रहा है और यह ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी साफ दिखा था।”

Pakistan Hangor Submarines: हैंगोर क्लास पनडुब्बियों की खूबियां

हैंगोर या टाइप 039A युआन क्लास पनडुब्बियां चीन की अत्याधुनिक तकनीक से लैस हैं। इनमें एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन सिस्टम लगा है, जिससे ये पानी के अंदर लगभग 2 से 3 हफ्ते तक रह सकती हैं।

आम डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों को हर दो-तीन दिन में सतह पर आकर ऑक्सीजन लेकर बैटरियां चार्ज करनी पड़ती हैं, लेकिन एआईपी तकनीक से ये बिना सतह पर आए ज्यादा देर तक रह सकती हैं। इससे इनकी स्टेल्थ और युद्ध क्षमता काफी बढ़ जाती है।

फिलहाल भारतीय नौसेना के पास कोई भी पारंपरिक एआईपी पनडुब्बी नहीं है। भारत के महत्वकांक्षी पनडुब्बी परियोजना प्रोजेक्ट 75-आई के तहत छह नई एआईपी पनडुब्बियां बनाने की योजना है, जो अभी कॉन्ट्रैक्ट के स्तर तक भी नहीं पहुंची है।

Pakistan Hangor Submarines: हैंगोर में लगे हैं चीनी इंजन

मूल योजना के तहत इन सबमरीन में जर्मन एमटीयू-396 इंजन लगाए जाने थे, लेकिन जर्मनी ने पाकिस्तान को एक्सपोर्ट लाइसेंस देने से साफ इनकार कर दिया। इसके बाद चीन ने अपने सीएचडी-620 इंजन लगाने का फैसला किया, जो तकनीकी रूप से अनटेस्टेड और कम भरोसेमंद माने जा रहे हैं।

रक्षा विश्लेषकों के अनुसार, यही इंजन थाईलैंड के एस-26टी सबमरीन प्रोजेक्ट में भी लगाया गया था, जिसे 2023 में “मैकेनिकल फेल्योर” की वजह से अस्थायी रूप से रद्द कर दिया गया था। थाईलैंड ने बाद में चीनी दबाव के बाद इसे दोबारा शुरू किया, लेकिन अब भी उसमें तकनीकी अड़चनें बनी हुई हैं।

Pakistan Hangor Submarines: कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम में खराबी

हैंगोर क्लास सबमरीन का कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम, जिसे पनडुब्बी का “दिमाग” कहा जाता है, सही तरीके से काम नहीं कर रहा। इस सिस्टम में सेंसर, सोनार और हथियारों के बीच कॉर्डिनेशन की भी दिक्कतें हैं। यहां तक कि पाकिस्तान को कई बार ट्रायल्स बीच में रोकने पड़े क्योंकि सेंसर और हथियारों का इंटीग्रेशन पूरा नहीं हुआ था।

यह पहली बार नहीं है जब चीन की बनाई पनडुब्बियों की विश्वसनीयता पर सवाल उठे हों। म्यांमार ने 2022 में चीन से ली गई युआन क्लास सबमरीन को बार-बार “मैकेनिकल फेल्योर” की वजह से वापस कर दिया था। बांग्लादेश की दो मिंग-क्लास सबमरींस, जो 1970 के दशक की तकनीक पर आधारित हैं, बार-बार इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम फेलियर और कंट्रोल गड़बड़ियों का सामना कर रही हैं।

Pakistan Hangor Submarines

Pakistan Hangor Submarines: भारत की पनडुब्बी परियोजनाओं में हो रही देरी

भारतीय नौसेना के पास इस समय केवल छह फ्रेंच मूल की स्कॉर्पीन क्लास पनडुब्बियां हैं, जिन्हें मझगांव डॉकयार्ड ने बनाया है। इनके अलावा छह पुरानी रूसी किलो-क्लास और चार जर्मन एचडीडब्ल्यू पनडुब्बियां हैं।

भारत के पास दो न्यूक्लियर ऑपरेटेड पनडुब्बियां आईएनएस अरिहंत और आईएनएस अरिघात हैं, जबकि तीसरी पनडुब्बी आईएनएस अरिधमन अगले साल नौसेना में शामिल होगी।

प्रोजेक्ट 75-आई के तहत छह नई जर्मन डिजाइन की डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां मझगांव डॉकयार्ड में बनने वाली हैं। इस वर्ष जनवरी में मझगांव डॉकयार्ड लिमिटेड और जर्मनी की थाइसनक्रुप मरीन सिस्टम्स को इस 70,000 करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट के लिए चुना गया। टीकेएमएस डिजाइन और तकनीकी मदद देगा, जबकि निर्माण कार्य भारत में मझगांव डॉकयार्ड द्वारा किया जाएगा। प्रस्तावित पनडुब्बी टाइप 214 क्लास पर आधारित होगी, जिसे भारतीय जरूरतों के अनुसार मॉडिफाई किया जाएगा।

योजना के अनुसार, कॉन्ट्रैक्ट साइन होने के सात साल बाद पहली पनडुब्बी तैयार होगी, जिसमें 45 फीसदी स्वदेशी सामग्री होगी। इसके बाद हर साल एक नई पनडुब्बी बनेगी, जब तक कि स्वदेशीकरण का स्तर 60 फीसदी तक नहीं पहुंच जाता।

इसका मतलब है कि अगर कोई देरी न हुई तो पहली एआईपी पनडुब्बी 2032 तक नौसेना को मिलेगी। लेकिन फिलहाल यह परियोजना बातचीत के चरण में है, यानी निर्माण कार्य शुरू होने में अभी भी वक्त लगेगा।

एआईपी में लिथियम-आयन बैटरी और फ्यूल सेल तकनीक

नई पनडुब्बियों में लिथियम-आयन बैटरी और फ्यूल सेल आधारित एआईपी सिस्टम होगा। इस तकनीक से पनडुब्बी लंबे समय तक पानी के अंदर रह सकेगी और तेज रफ्तार से चल सकेगी। विशेषज्ञों के मुताबिक, इससे भारतीय नौसेना बंगाल की खाड़ी से लेकर अरब सागर तक बिना सतह पर आए लंबी दूरी तय कर सकेगी। यह सिस्टम चीन और पाकिस्तान की हैंगोंर क्लास या युआन क्लास पनडुब्बियों की तुलना में ज्यादा एडवांस हैं।

जर्मन टाइप 214 बनाम पाकिस्तानी हैंगोर क्लास

भारतीय नौसेना के लिए प्रस्तावित टाइप 214 सबमरीन का डिस्प्लेसमेंट 1,860 टन और लंबाई 65 मीटर होगी, जबकि पाकिस्तान की हांगोर क्लास का डिस्प्लेसमेंट 2,250 टन और लंबाई 74.9 मीटर है।

वहीं, भारतीय नौसेना की आने वाली टाइप 214 पनडुब्बियां गहरे समुद्र में अधिक गहराई तक जा सकेंगी क्योंकि इनमें सिमेन्स हाइड्रोजन फ्यूल सेल लगे होंगे, जो पॉलिमर इलेक्ट्रोलाइट मेम्ब्रेन तकनीक पर आधारित हैं। ये पनडुब्बियां वॉटर-रैम एक्सपल्शन सिस्टम से टॉरपीडो लॉन्च कर सकेंगी, जो उन्हें अत्यधिक स्टेल्थ बनाता है। इनके शोर, तापीय और चुंबकीय सिग्नेचर को भी न्यूनतम रखा गया है ताकि दुश्मन की निगरानी से बचा जा सके।

Pakistan Hangor Submarines: बाबर-3 क्रूज मिसाइलों से लैस कर रहा पाकिस्तान

पाकिस्तान की नौसेना के पास फिलहाल तीन फ्रेंच अगस्ता-90बी और दो अगस्ता-70 पनडुब्बियां हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, पाकिस्तान अपनी अगस्ता-90बी पनडुब्बियों को 450 किलोमीटर रेंज की बाबर-3 क्रूज मिसाइलों से लैस कर रहा है।

अधिकारियों का कहना है कि नई हैंगोर क्लास पनडुब्बियां भी बाबर-3 मिसाइल से लैस होंगी, जिससे पाकिस्तान अपने न्यूक्लियर ट्रायड (परमाणु त्रिकोण) का तीसरा चरण पूरा करना चाहता है। यानी जमीन, हवा और समुद्र से परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की क्षमता डेवलप करना चाहता है।

आईएनएस खांदेरी पर 2026 में लगेगा पहला एआईपी सिस्टम

योजना के अनुसार, यह सिस्टम सबसे पहले आईएनएस खांदेरी पर लगेगा, जो भारतीय नौसेना की दूसरी कलवरी-क्लास पनडुब्बी है। इस पर 2026 में उसके निर्धारित रिफिट के दौरान लगाया जाएगा। इसके बाद सिस्टम का परीक्षण होगा और सफल रहने पर इसे बाकी स्कॉर्पीन पनडुब्बियों में लगाया जाएगा।

हालांकि, यह परियोजना 2014 में स्वीकृत हुई थी और इसे 2017 तक पूरा किया जाना था। अब यह लगभग आठ साल पीछे चल रही है, जिससे भारतीय नौसेना के आधुनिकीकरण की गति पर असर पड़ा है।

भारतीय नौसेना है तैयार

भारतीय नौसेना के पास अमेरिकी मूल के पी-8ऐ पोसीडन लॉन्ग रेंज एंटी-सबमरीन विमान और एम-60आर सीहॉक हेलीकॉप्टर हैं, जो समुद्र में पनडुब्बियों की खोज और नष्ट करने में सक्षम हैं। इसके अलावा नौसेना के पास एडवांस एंटी-सबमरीन वारशिप, राडार, सोनार, टॉरपीडो और मिसाइल सिस्टम भी हैं।

हालांकि, नौसेना के अधिकारियों का मानना है कि भारत की अंडरवाटर फ्लीट में कमी एक गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है। चीन के पास फिलहाल 50 से अधिक डीजल-इलेक्ट्रिक और 10 परमाणु पनडुब्बियां हैं, जबकि पाकिस्तान की संख्या भी अब तेजी से बढ़ रही है।

रक्षा सूत्रों का कहना है, “भारत को अब अरब सागर में एक और विजिलेंट मॉनिटरिंग नेटवर्क तैयार करना होगा, क्योंकि चीन और पाकिस्तान का यह नौसैनिक गठजोड़ भविष्य में समुद्री क्षेत्र की स्थिरता पर असर डाल सकता है।”

Exercise Maru Jwala: थार की तपती रेत में भारतीय सेना कर रही हाई-टेक वॉर एक्सरसाइज, अभ्यास त्रिशूल का है हिस्सा

Exercise Maru Jwala
Exercise Maru Jwala: Indian Army conducts high-tech desert warfare drill in Rajasthan’s Thar Desert

Exercise Maru Jwala: राजस्थान के थार मरुस्थल में भारतीय सेना ने अपनी हाई-टेक वॉर एक्सरसाइज मरु ज्वाला शुरू की है। यह अभ्यास सेना की सुदर्शन चक्र कोर के तहत आने वाली शहबाज डिवीजन द्वारा किया जा रहा है। यह पहले से ही पश्चिमी मोर्चे पर चल रही ट्राई सर्विसेज एक्सरसाइज त्रिशूल का एक अहम हिस्सा है।

Exercise Trishul: 12 दिन तक चैन की नींद नहीं सो पाएगा पाकिस्तान, भारत ने सर क्रीक के पास शुरू की ट्राई सर्विसेज एक्सरसाइज

इस अभ्यास का उद्देश्य जमीन, हवा, समुद्र और डिजिटल क्षेत्र में संयुक्त सैन्य कार्रवाई की क्षमता को परखना है। सेना इस दौरान अपनी आधुनिक युद्ध प्रणाली, नई तकनीक और नेटवर्क आधारित हथियारों की क्षमता को परख रही है।

Exercise Maru Jwala: तकनीक और आत्मनिर्भरता पर जोर

इस अभ्यास की थीम “Empowered by Technology, Driven by Reform” यानी “तकनीक से सशक्त, सुधारों से प्रेरित” रखी गई है। इस अभ्यास को इस साल के “सुधार और तकनीकी आत्मनिर्भरता के वर्ष” से जोड़ा गया है। यह दिखाता है कि भारतीय सेना अब सिर्फ परंपरागत युद्ध के लिए नहीं, बल्कि भविष्य के मल्टी-डोमेन बैटल फील्ड के लिए भी पूरी तरह तैयार है।

Exercise Poorvi Prachand Prahar: अरुणाचल प्रदेश में चीन से सटी सीमा पर तीनों सेनाएं करेंगी एक्सरसाइज, मेचुका की पहाड़ियों में ‘पूर्वी प्रचंड प्रहार’ शुरू

‘मरु ज्वाला’ में सेना ने अनमैन्ड प्लेटफॉर्म्स, डिजिटल सेंसर नेटवर्क और नेटवर्क-बेस्ड फायरिंग सिस्टम्स का इस्तेमाल किया है। इन सिस्टम से रियल-टाइम निगरानी और सिचुएशनल अवेयरनेस बढ़ाई जा रही है, ताकि किसी भी स्थिति में तुरंत और सटीक कार्रवाई की जा सके।

थार की तपती रेत में तालमेल की परीक्षा

थार के कठिन और गर्म वातावरण में यह युद्धाभ्यास भारतीय सेना की असली ताकत की परीक्षा है। रेगिस्तानी इलाके में सेना के जवान दिन-रात युद्धाभ्यास कर रहे हैं, ताकि हर परिस्थिति में मुकाबले के लिए तैयार रहें। यह अभ्यास ऑपरेशनल सिनर्जी यानी तीनों सेनाओं के बीच तालमेल की जांच के लिए भी जरूरी है।

‘मरु ज्वाला’ में सेना के साथ भारतीय वायुसेना और भारतीय नौसेना का भी सहयोग शामिल है। इस दौरान ड्रोन और हेलीकॉप्टरों के जरिए टारगेट की पहचान और सटीक प्रहार की तकनीक का अभ्यास किया जा रहा है।

‘एक्सरसाइज मरु ज्वाला’ भारतीय सेना के उस प्रयास का हिस्सा है, जिसमें सेना को आत्मनिर्भर और भविष्य के युद्धों के लिए सक्षम बनाया जा रहा है। इस अभ्यास में इस्तेमाल की जा रही तकनीकें न केवल युद्ध की दक्षता बढ़ाती हैं, बल्कि भारतीय रक्षा उद्योग की क्षमता को भी प्रदर्शित करती हैं।

MISW 2025: IFC-IOR वर्कशॉप में बोले वाइस एडमिरल तरुण सोबती- हिंद महासागर को सुरक्षित रखना हम सभी की साझा जिम्मेदारी

MISW 2025: Vice Admiral Tarun Sobti, the Deputy Chief of Naval Staff (DCNS)
Vice Admiral Tarun Sobti, the Deputy Chief of Naval Staff (DCNS)

MISW 2025: गुरुग्राम में भारतीय नौसेना के इन्फॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर– इंडियन ओशन रीजन (IFC-IOR) द्वारा आयोजित तीसरे मैरीटाइम इन्फॉर्मेशन शेयरिंग वर्कशॉप 2025 में बोलते हुए डिप्टी चीफ ऑफ नेवल स्टाफ ने कहा कि “हिंद महासागर क्षेत्र दुनिया की व्यापारिक जीवनरेखा है और इसे सुरक्षित रखना हम सभी की साझा जिम्मेदारी है।”

MISW 2025: ‘महासागर’ विजन के तहत गुरुग्राम के INS अरावली में जुटेंगे 30 देश, हिंद महासागर में समुद्री सहयोग पर होगी चर्चा

उन्होंने कहा कि यह महासागर न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया के लिए रणनीतिक और आर्थिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा, “यह हमारे लिए सिर्फ एक इलाका नहीं, बल्कि एक साझा परिवार की तरह है। एडमिरल सोबती ने भारतीय दर्शन ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का उल्लेख करते हुए कहा कि यह सम्मेलन उसी भावना को दर्शाता है कि पूरा विश्व एक परिवार है और समुद्री सहयोग इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है।

 MISW 2025
Indian Navy’s IFC-IOR hosts Maritime Information Sharing Workshop

एडमिरल सोबती ने कहा कि यह भारत के लिए गर्व की बात है कि इतने सारे देश एक साथ मिलकर समुद्री सुरक्षा और सहयोग के मुद्दों पर काम कर रहे हैं। उन्होंने सभी देशों के प्रतिनिधियों का स्वागत करते हुए कहा कि यह सम्मेलन वैश्विक समुद्री समुदाय के बीच आपसी समझ और विश्वास को मजबूत करेगा।

MISW 2025: 29 देशों की भागीदारी

इस तीन दिवसीय सम्मेलन में 29 देशों के प्रतिनिधि और महासागर रिम एसोसिएशन (आईओआरए), जिबूती कोड ऑफ कंडक्ट/जेद्दा अमेंडमेंट और बिम्सटेक देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए। वाइस एडमिरल सोबती ने कहा कि इन संगठनों ने समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने और सदस्य देशों के बीच भरोसेमंद संबंध स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई है।

उन्होंने बताया कि भारत बिम्सटेक और DCOC-JA यानी जिबूती कोड ऑफ कंडक्ट/जेद्दा अमेंडमेंट दोनों का संस्थापक सदस्य है और हिंद महासागर क्षेत्र में ब्लू इकोनॉमी, सहयोग और शांति बनाए रखने के लिए लगातार सक्रिय भूमिका निभा रहा है।

MISW 2025: Indian Navy's IFC-IOR hosts Maritime Information Sharing Workshop
Indian Navy’s IFC-IOR hosts Maritime Information Sharing Workshop

समुद्री सुरक्षा पर बढ़ता खतरा

वाइस एडमिरल सोबती ने अपने संबोधन में हाल के सालों में बढ़ीं समुद्री चुनौतियों पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि समुद्री डकैती, हथियारों और नशीले पदार्थों की तस्करी, अवैध फिशिंग और पर्यावरणीय खतरे लगातार बढ़ रहे हैं।

उन्होंने कहा कि हाल ही में मध्य पूर्व में हुई घटनाओं ने यह दिखा दिया है कि समुद्री व्यापार मार्ग कितने संवेदनशील हैं। गैर-राज्य तत्वों द्वारा किए गए हमलों ने यह दिखा दिया है कि वैश्विक शिपिंग लेन कितनी असुरक्षित हैं। उन्होंने बताया कि गल्फ ऑफ एडन में दोबारा बढ़ती समुद्री डकैती की घटनाओं ने इस खतरे को और गंभीर बना दिया है।

उन्होंने कहा कि इन घटनाओं की वजह से जहाजों को अपने मार्ग बदलने पड़े, जिससे मौसम संबंधित हादसे बढ़े और माल की डिलीवरी में देरी हुई। उन्होंने कहा कि यह हालात दिखाते हैं कि दुनिया भर के मैरीटाइम सिक्योरिटी सिस्टम एक-दूसरे से कितने जुड़े हुए हैं।

IFC-IOR बना सहयोग का मजबूत केंद्र

वाइस एडमिरल सोबती ने कहा कि भारतीय नौसेना का इन्फॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर– इंडियन ओशन रीजन इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने बताया कि 2018 में शुरू हुआ यह केंद्र अब पूरे हिंद महासागर क्षेत्र में जानकारी साझा करने और तुरंत प्रतिक्रिया देने का मुख्य केंद्र बन गया है।

उन्होंने बताया कि आज इस केंद्र से 15 साझेदार देशों के लायजन ऑफिसर्स जुड़े हैं, और यह केंद्र 75 से अधिक अंतरराष्ट्रीय समुद्री एजेंसियों के साथ काम कर रहा है। यह नेटवर्क अब रीयल टाइम में सूचनाएं साझा करने और घटनाओं पर समन्वित कार्रवाई में सक्षम है। इस नेटवर्क के जरिए समुद्री सुरक्षा घटनाओं, डकैती और आपातकालीन अभियानों में रीयल टाइम प्रतिक्रिया संभव हो पाती है।

भारत का विजन- महासागर

वाइस एडमिरल तरुण सोबती ने कहा कि भारत का समुद्री नीति “महासागर” जिसका पूरा नाम है “म्यूचुअल एंड होलिस्टिक एडवांसमेंट फॉर सिक्युरिटी एंड ग्रोथ अक्रोस रीजंस” यानी साझा सुरक्षा और विकास के लिए सामूहिक प्रगति, यह सभी देशों की साझा सुरक्षा और विकास की भावना को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक समृद्धि समुद्री स्थिरता से जुड़ी हुई हैं। यह सिर्फ भारत नहीं, बल्कि इस क्षेत्र के हर देश के लिए सच है।

मंत्रा सॉफ्टवेयर पर टेबल-टॉप एक्सरसाइज

सम्मेलन के दौरान एक टेबल-टॉप एक्सरसाइज भी आयोजित की जा रही है, जिसमें भारतीय नौसेना के बनाए मंत्रा सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया जाएगा। इसके जरिए वास्तविक समुद्री परिदृश्यों का अभ्यास करके यह देखा जाएगा कि विभिन्न देशों के सुरक्षा बल किस तरह से प्रतिक्रिया दे सकते हैं।