Home Blog Page 48

‘मेड इन इंडिया’ 120 kN सुपरक्रूज जेट इंजन का काउंटडाउन शुरू! AMCA के लिए GTRE ने जारी की RFI

Indigenous Jet Engine India

Indigenous Jet Engine India: भारत में पहली बार स्वदेशी फाइटर जेट AMCA के लिए स्वदेशी जेट इंजन बनाने की तैयारियां शुरू कर दी हैं। डीआरडीओ के तहत काम करने वाली बेंगलुरु स्थित गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट यानी जीटीआरई ने इंडिजिनस एयरो गैस टरबाइन इंजन कंपोनेंट्स के निर्माण को लेकर इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने के लिए रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन याानी आरएफआई जारी की है।

इसका मकसद भविष्य के फाइटर जेट, खासकर एएमसीए के लिए लगभग 120 किलो न्यूटन थ्रस्ट क्लास का स्वदेशी टर्बोफैन इंजन डेवलप करना है। (Indigenous Jet Engine India)

Indigenous Jet Engine India: क्यों जरूरी है यह कदम

भारत अभी तक अपने फाइटर जेट इंजन के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहा है। इंजन किसी भी लड़ाकू विमान का दिल होता है। अगर इंजन विदेश से आता है तो सप्लाई, अपग्रेड और मैंटेनेस के मामले में कई तरह की सीमाएं खड़ी हो सकती हैं। कावेरी इंजन प्रोग्राम से अनुभव मिला कि केवल रिसर्च काफी नहीं है, बल्कि मजबूत मैन्युफैक्चरिंग ढांचा भी उतना ही जरूरी है।

इसी अनुभव से सीखते हुए जीटीआरई अब इंजन के क्रिटिकल कंपोनेंट्स जैसे कंप्रेसर, टरबाइन, कंबस्टर, आफ्टरबर्नर और हाई टेम्परेचर मटेरियल्स के निर्माण के लिए देश में अत्याधुनिक उत्पादन क्षमता विकसित करना चाहता है। (Indigenous Jet Engine India)

क्या है आरएफआई का मकसद

फरवरी में जारी आरएफआई का मुख्य उद्देश्य यह जानना है कि कौन सी भारतीय या विदेशी ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर कंपनियां भारत में इंजन कंपोनेंट्स के निर्माण के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा कर सकती हैं।

यह आरएफआई कोई सीधा टेंडर नहीं है, बल्कि सूचना जुटाने की प्रक्रिया है। इसमें इच्छुक कंपनियों से उनकी तकनीकी क्षमता, अनुभव, मशीनिंग सुविधाएं, हाई प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग और क्वालिटी सिस्टम के बारे में जानकारी मांगी गई है। जो कंपनियां इसमें शामिल होना चाहती हैं, उन्हें पहले नॉन डिस्क्लोजर एग्रीमेंट पर दस्तखत करने होंगे। उसके बाद विस्तृत दस्तावेज साझा किए जाएंगे।

सबमिशन की अंतिम तारीख 23 अप्रैल तय की गई है। जीटीआरई स्पष्ट कर चुका है कि इस प्रक्रिया का मकसद लंबी अवधि के लिए डिजाइन के साथ-साथ पूरा स्वदेशी इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम तैयार करना है। (Indigenous Jet Engine India)

ईओआई के जरिए पार्टनर की तलाश

आरएफआई से पहले जीटीआरई ने इसी साल जनवरी में ईओआई जारी की थी। इसका उद्देश्य एक डेवलपमेंट-कम-प्रोडक्शन पार्टनर चुनना है। यानी ऐसी भारतीय कंपनी जो इंजन के डिजाइन को वास्तविक उत्पादन, असेंबली, टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन तक ले जा सके।

इस प्रोग्राम के तहत अगले लगभग दस सालों में 18 प्रोटोटाइप और प्री-प्रोडक्शन इंजन डेवलप किए जाने हैं। सातवें साल से इंजन की डिलीवरी शुरू होगी और दसवें साल तक यह संख्या 18 तक पहुंच जाएगी। आगे चलकर 200 से ज्यादा इंजनों के सीरियल प्रोडक्शन का रास्ता भी इसी आधार पर खुलेगा।

वहीं इस पूरे प्रोजेक्ट में डिजाइन अथॉरिटी बना रहेगा। इसका मतलब है कि तकनीकी नियंत्रण और बौद्धिक संपदा अधिकार भारत सरकार के पास रहेंगे। चुनी गई कंपनी उत्पादन और इंडस्ट्रियल एग्जिक्यूशन की जिम्मेदारी निभाएगी। (Indigenous Jet Engine India)

कैसा होगा यह इंजन

यह एक मॉडर्न टर्बोफैन जेट इंजन होगा। इसमें लो प्रेशर कंप्रेसर, हाई प्रेशर कंप्रेसर, कंबस्टर, हाई और लो प्रेशर टरबाइन, आफ्टरबर्नर और एडवांस्ड एग्जॉस्ट सिस्टम शामिल होंगे। इंजन में फुल अथॉरिटी डिजिटल इंजन कंट्रोल यानी फाडेक सिस्टम होगा, जो पूरी तरह डिजिटल कंट्रोल देगा।

इंजन का थ्रस्ट-टू-वेट रेशियो लगभग 10:1 रखने का टारगेट है। इसका मतलब है कि इंजन हल्का होते हुए भी ज्यादा ताकत देगा। इसमें सुपरक्रूज क्षमता होगी, यानी फाइटर जेट बिना आफ्टरबर्नर के भी सुपरसोनिक गति से उड़ सकेगा। इंफ्रारेड सिग्नेचर कम रखने की कोशिश की जाएगी ताकि दुश्मन के सेंसर से बचाव हो सके। (Indigenous Jet Engine India)

किन कंपनियों की हो सकती है भूमिका

हालांकि अभी आधिकारिक तौर पर यह घोषित नहीं किया गया है कि कौन सी कंपनी अंतिम रूप से चुनी जाएगी। लेकिन इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट में देश की कई बड़ी कंपनियों की संभावित भूमिका देखी जा रही है। एचएएल पहले से ही एयरोस्पेस निर्माण में अग्रणी है और असेंबली तथा इंटीग्रेशन में उसकी मजबूत पकड़ है। वहीं भारत फोर्ज लिमिटेड हाई स्ट्रेंथ फोर्जिंग और टरबाइन ब्लेड निर्माण में विशेषज्ञता रखती है। लार्सन एंड टूब्रो जटिल डिफेंस सिस्टम और सब-सिस्टम इंटीग्रेशन में अनुभवी है। (Indigenous Jet Engine India)

इसी तरह पीटीसी इंडस्ट्रीज हाई प्रिसिजन कास्टिंग में जानी जाती है और मिश्र धातु निगम लिमिटेड हाई टेम्परेचर अलॉय और विशेष धातुओं के उत्पादन में अग्रणी है। इंजन के लिए निकेल बेस्ड सुपर अलॉय, टाइटेनियम और सिंगल क्रिस्टल ब्लेड जैसे उन्नत मटेरियल्स की जरूरत होगी, जहां मिधानी की भूमिका अहम हो सकती है।

जीटीआरई ने साफ कर दिया है कि यह प्रोजेक्ट किसी आम कंपनी के बस का नहीं है। इच्छुक कंपनी के पास कम से कम 1500 करोड़ रुपये का टर्नओवर, मजबूत वित्तीय स्थिति, एयरोस्पेस क्वालिटी सिस्टम जैसे एएस9100 का अनुपालन और हाई प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग का अनुभव होना जरूरी है।

साथ ही एयरवर्थिनेस एजेंसियों के साथ समन्वय, सर्टिफिकेशन प्रक्रिया और लाइफ साइकिल सपोर्ट की क्षमता भी जरूरी होगी। (Indigenous Jet Engine India)

बदल सकती है तस्वीर

अगर यह प्रोग्राम अपने लक्ष्य तक पहुंचता है, तो भारत उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल हो जाएगा जो खुद का एडवांस्ड फाइटर जेट इंजन डिजाइन और बना सकते हैं। इससे न केवल रक्षा आत्मनिर्भरता बढ़ेगी, बल्कि देश में हाई टेक मैन्युफैक्चरिंग, मटेरियल साइंस और एयरोस्पेस इंडस्ट्री को नई दिशा मिलेगी। (Indigenous Jet Engine India)

हिंद महासागर में भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत! जर्मनी और यूरोपीय यूनियन के बाद IFC-IOR में ग्रीस की एंट्री

India-Greece Defence Deal: IFC-IOR Greece Liaison Officer

India-Greece Defence Deal: भारत और ग्रीस के बीच सोमवार को अहम द्विपक्षीय बैठक हुई। इस बैठक में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और ग्रीस के रक्षा मंत्री निकोलास-जॉर्जियोस डेंडियास ने हिस्सा लिया। इस बैठक की अहम बात यह रही कि ग्रीस ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की है कि वह गुरुग्राम स्थित इंफॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर-इंडियन ओशन रीजन (IFC-IOR) में एक ग्रीक इंटरनेशनल लायजन ऑफसर तैनात करेगा। पिछले एक महीने में ग्रीस तीसरा देश है, जिसने समुद्री सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने के लिए IFC-IOR में शामिल होने का ऐलान किया है। ग्रीस के इस कदम के बाद हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की बढ़ती समुद्री भूमिका काफी अहम हो गई है।

सोमवार को दिल्ली के मानेकशॉ सेंटर में भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और ग्रीस के राष्ट्रीय रक्षा मंत्री निकोलास-जॉर्जियोस डेंडियास के बीच नई दिल्ली में द्विपक्षीय बैठक हुई। बैठक में दोनों देशों ने रक्षा सहयोग को नई ऊंचाई देने पर सहमति जताई। इस दौरान एक जॉइंट डिक्लेरेशन ऑफ इंटेंट पर हस्ताक्षर भी हुए, जिसका मकसद रक्षा उद्योग में साझेदारी को मजबूत करना है। साथ ही वर्ष 2026 के लिए द्विपक्षीय मिलिट्री कोऑपरेशन प्लान का आदान-प्रदान भी किया गया। (India-Greece Defence Deal)

India-Greece Defence Deal: क्या है आईएफसी-आईओआर?

यह केंद्र भारतीय नौसेना ने साल 2018 में गुरुग्राम स्थापित किया था। इसका उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा को मजबूत करना, समुद्री गतिविधियों पर नजर रखना और मित्र देशों के साथ रियल-टाइम सूचना साझा करना है। समुद्री डकैती, हथियारों और नशीले पदार्थों की तस्करी, अवैध मछली पकड़ना और संदिग्ध जहाजों की गतिविधियों पर नजर रखने में यह केंद्र अहम भूमिका निभाता है।

जब कोई देश यहां अपना इंटरनेशनल लायजन ऑफिसर भेजता है, तो उसका मतलब होता है कि वह भारत के साथ सीधे तौर पर समुद्री सुरक्षा सहयोग में जुड़ रहा है। लायजन ऑफिसर अपने देश की नौसेना और आईएफसी-आईओआर के बीच सूचना का सेतु बनता है। इससे किसी भी आपात स्थिति में तेजी से कॉर्डिनेशन संभव होता है।

ग्रीस का यह फैसला इसलिए भी खास है क्योंकि ग्रीस एक प्रमुख समुद्री राष्ट्र है। भूमध्य सागर में उसकी सक्रिय भूमिका रही है। अब वह हिंद महासागर क्षेत्र में भारत के साथ मिलकर काम करेगा। यह भारत-ग्रीस रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करेगा। (India-Greece Defence Deal)

आईएफसी-आईओआर में कितने देश हैं शामिल

आईएफसी-आईओआर में पहले से कई देशों के लायजन ऑफिसर तैनात हैं। सूत्रों के मुताबिक आईएफसी-आईओआर से दुनियाभर की 50 ज्यादा संस्थाएं जुड़ी हैं। जबकि इसमें 28 पर्टनर देश हैं। वहीं इसमें तैनात इंटरनेशनल लायजन अफसरों की संख्या फिलहाल 15 है। सूत्रों ने बताया कि अगले 6 से 12 महीनों में इसमें 5 से 6 सदस्दीय देश और शामिल होने वाले हैं।

पहले से तैनात देशों में ऑस्ट्रेलिया, बांग्लादेश, फ्रांस, जापान, म्यामार, इटली, मालदीव, केन्या, मॉरीशस, सेशेल्स, सिंगापुर, श्रीलंका, थाईलैंड, यूनाइटेड किंगडम और यूनाइटेड स्टेट्स जैसे देश शामिल हैं। अब ग्रीस के जुड़ने से यह नेटवर्क और मजबूत होगा। इस साल जर्मनी और यूरोपीय यूनियन ने भी प्रस्ताव दिया है कि वह अपना प्रतिनिधि भेजेगा। वहीं पिछले साल अप्रैल 2025 में इंडोनेशिया ने भी यहां अधिकारी तैनात करने की घोषणा की थी। (India-Greece Defence Deal)

यह भारत के लिए क्यों है अहम कदम?

पहला, इससे भारत की समुद्री सुरक्षा में नेतृत्व की भूमिका मजबूत होती है। हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री डकैती, अवैध मछली पकड़ना, तस्करी और आतंकवाद जैसी चुनौतियों से निपटने में यह केंद्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

दूसरा, यह भारत की इंडो-पैसिफिक रणनीति और “सागर” यानी क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास की नीति को मजबूत करता है। क्वाड देशों के अलावा यूरोपीय देशों की भागीदारी से भारत का सहयोग दायरा और व्यापक हुआ है।

तीसरा, समुद्री मार्गों की बेहतर निगरानी से व्यापारिक सुरक्षा बढ़ती है। हिंद महासागर से होकर दुनिया का बड़ा हिस्सा व्यापार गुजरता है, इसलिए सूचना साझाकरण बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है।

कुल मिलाकर, IFC-IOR में लगातार बढ़ती आईएलओ की तैनाती भारत की समुद्री कूटनीति के लिए एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। यह भारत को हिंद महासागर क्षेत्र में एक भरोसेमंद और सक्रिय साझेदार के रूप में स्थापित करती है।

यह सब दर्शाता है कि भारत हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा का केंद्र बनता जा रहा है। दुनिया के कई देश यह मानने लगे हैं कि अगर इस क्षेत्र में स्थिरता और सुरक्षित समुद्री व्यापार सुनिश्चित करना है, तो भारत के साथ सहयोग जरूरी है। वैश्विक व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री क्षेत्र से गुजरता है। ऐसे में सूचना साझा करने का यह सिस्टम बेहद अहम हो जाता है। (India-Greece Defence Deal)

भारत-ग्रीस के बीच स्वदेशी रक्षा उद्योग पर जोर

बैठक के दौरान दोनों देशों ने इस बात पर भी जोर दिया कि वे अपने स्वदेशी रक्षा उद्योग को आगे बढ़ाएंगे। भारत की आत्मनिर्भर भारत पहल और ग्रीस के एजेंडा 2030 रक्षा सुधार कार्यक्रम को जोड़कर सहयोग बढ़ाने की बात कही गई। इसका मतलब है कि भविष्य में दोनों देश रक्षा उत्पादन, टेक्नोलॉजी और संयुक्त परियोजनाओं में साथ काम कर सकते हैं।

इस यात्रा के दौरान ग्रीक रक्षा मंत्री ने राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर श्रद्धांजलि भी दी और मानेकशॉ सेंटर में ट्राई-सर्विस गार्ड ऑफ ऑनर का निरीक्षण किया। ग्रीक प्रतिनिधिमंडल ने बेंगलुरु में रक्षा और औद्योगिक प्रतिष्ठानों का दौरा भी किया, जहां उन्होंने डीपीएसयू, निजी रक्षा कंपनियों और स्टार्ट-अप से बातचीत की। (India-Greece Defence Deal)

भारतीय नेवल डिप्लोमेसी का कमाल, जब विशाखापत्तनम में एक साथ दिखेंगे 75 देश और उनके 90 से ज्यादा जंगी जहाज

IFR Milan 2026 Indian Naval Diplomacy

IFR Milan 2026: एक तरफ जहां पश्चिमी एशिया में ईरान और अमेरिका तनावपूर्ण संबंध बने हुए हैं, तो वहीं रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते पूरी दुनिया दो धड़ों में बंटी हुई है। लेकिन इसी दुनिया में, पश्चिमी एशिया से तकरीबन तीन हजार किलोमीटर दूर, हिंद महासागर के किनारे बसे भारत के विशाखापत्तनम में एक बिल्कुल अलग तस्वीर देखने को मिलने वाली है। यहां दुनिया के 75 देश एक साथ एक ही मंच पर दिखने वाले हैं। जहां दुनिया के कई धुरविरोधी देश कुछ दिन ही सही, लेकिन एक-दूसरे के ‘दोस्त’ बन कर रहेंगे। यह सब संभव हुआ है भारतीय नौसेना की डिप्लोमेसी के चलते।

फरवरी 2026 में आयोजित IFR और मिलन अभ्यास में इस साल में ऐसा पहली बार होगा, जब कई देश अपनी युद्धपोतों के साथ भारतीय नौसेना के बुलावे पर एक ही समुद्र में एक साथ अभ्यास करेंगे, एक-दूसरे को सलामी देंगे और साझा सुरक्षा पर बातचीत करेंगे। भारत ने इन इवेंट्स में उन देशों को आमंत्रित किया है, जो मुख्य रूप से इंडियन ओशन और इंडो-पैसिफिक में भारत के सहयोगी हैं। देखा जाए तो यह केवल एक मिलिट्री प्रोग्राम नहीं है, बल्कि भारत की मजबूत और संतुलित नेवल डिप्लोमेसी की सबसे बड़ी मिसाल है। (IFR Milan 2026)

हिंद महासागर से सटे विशाखापत्तनम में 15 फरवरी से 25 फरवरी तक तीन बड़े मेगा इवेंट इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू (आईएफआर) 2026, मल्टीलेटरल नेवल एक्सरसाइज मिलन 2026, और इंडियन ओशन नेवल सिंपोजियम (आईओएनएस) कॉन्क्लेव ऑफ चीफ्स का आयोजन हो रहा है। ये तीनों कार्यक्रम एक ही शहर, एक ही समय और एक ही उद्देश्य के साथ आयोजित हो रहे हैं। (IFR Milan 2026)

IFR Milan 2026: विशाखापत्तनम से पूरी दुनिया के लिए संदेश

फरवरी 2026 में विशाखापत्तनम सिर्फ एक बंदरगाह शहर नहीं रहेगा। यह भारत की समुद्री कूटनीति की राजधानी बन जाएगा। यही वह शहर है, जहां भारतीय नौसेना का ईस्टर्न नेवल कमांड स्थित है और जहां से बंगाल की खाड़ी से लेकर पूरे हिंद महासागर पर नजर रखी जाती है।

15 फरवरी से 25 फरवरी तक चलने वाले इन कार्यक्रमों में दुनिया के दर्जनों देशों के युद्धपोत, हजारों नौसैनिक अधिकारी और सैकड़ों डिफेंस एक्सपर्ट्स एक साथ जुटेंगे। समुद्र में युद्धपोतों की कतारें होंगी, तो जमीन पर कूटनीतिक बैठकों और सेमिनारों का दौर चलेगा। (IFR Milan 2026)

इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू 2026: महासागरों के माध्यम से एकजुटता

इस बार इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू की थीम है यूनाइटेड थ्रो ओशन्स यानी महासागरों के माध्यम से एकजुटता। यह किसी भी देश की नौसेना के लिए सबसे प्रतिष्ठित कार्यक्रमों में से एक माना जाता है। इसमें राष्ट्रपति या राष्ट्राध्यक्ष नौसेना के जहाजों का निरीक्षण करते हैं। लेकिन भारत के लिए यह सिर्फ ताकत दिखाने का मंच नहीं है, बल्कि भरोसा और पारदर्शिता दिखाने का जरिया भी है।

18 फरवरी को भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू बंगाल की खाड़ी में भारतीय और विदेशी युद्धपोतों का निरीक्षण करेंगी। इस दौरान उन्हें गन सैल्यूट दिया जाएगा। भारत का स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत इस इवेंट का मुख्य आकर्षण होगा। यह भारत की “बिल्डर्स नेवी” यानी खुद बनाने वाली नौसेना की पहचान है।

खास बात यह है कि इस मेगा इवेंट में हिस्सा लेने वाला कोई भी देश दुश्मन या दोस्त के तौर पर नहीं, बल्कि एक समुद्री साझेदार के तौर पर मौजूद रहेगा।

बता दें कि भारत अब तक दो बार इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू की मेजबानी कर चुका है। पहला आयोजन साल 2001 में मुंबई में हुआ था। यह भारत के गणतंत्र की स्वर्ण जयंती के अवसर पर आयोजित किया गया था और देश का पहला आईएफआर था। इसमें 29 देशों की नौसेनाओं ने हिस्सा लिया था और कुल 97 जहाज इस आयोजन में शामिल हुए, जिनमें 20 देशों के जहाज थे और 24 विदेशी युद्धपोत भी शामिल थे। इसके अलावा 54 सैन्य विमान फ्लाईपास्ट में शामिल हुए थे। उस समय यह आयोजन भारत की बढ़ती समुद्री क्षमता और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी का बड़ा प्रदर्शन माना गया था।

इसके बाद दूसरा और अब तक का सबसे बड़ा आयोजन साल 2016 में विशाखापत्तनम में हुआ। इसमें लगभग 52 देशों की नौसेनाओं ने हिस्सा लिया था। इस आयोजन में करीब 95 से 100 जहाज शामिल हुए, जिनमें 24 विदेशी युद्धपोत और बाकी भारतीय नौसेना के जहाज थे। 50 से अधिक विदेशी नौसेनाओं के प्रतिनिधिमंडल भी इसमें पहुंचे थे। इसमें अमेरिका, रूस, चीन, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे कई बड़े देशों की नौसेनाएं शामिल हुई थीं। 2016 का आईएफआर अब तक का सबसे बड़ा आयोजन माना जाता है, जहां दुनिया भर से नौसेनाएं भारत के साथ समुद्री सहयोग के लिए एक मंच पर आई थीं। (IFR Milan 2026)

मिलन 2026 में दिखेगा भाईचारा, सहयोग और तालमेल 

अगर आईएफआर को नौसेना की परेड कहा जाए, तो मिलन अभ्यास उसकी असली परीक्षा है। इस बार मिलन एक्सरसाइज की थीम है भाईचारा, सहयोग, तालमेल। इस अभ्यास की शुरुआत 1995 में पोर्ट ब्लेयर से हुई थी, जब इसमें सिर्फ चार-पांच देश शामिल थे। आज यह दुनिया के सबसे बड़े मल्टीलेटरल नेवल एक्सरसाइज में से एक बन चुकी है। मिलन 2026 के लिए 135 से अधिक देशों को निमंत्रण भेजा गया है।

मिलन 2026 में 40 से ज्यादा देशों की नौसेनाएं हिस्सा ले रही हैं। इस अभ्यास का मकसद सिर्फ वॉर एक्सरसाइज करना नहीं है, बल्कि यह देखना है कि अलग-अलग देशों की नौसेनाएं आपदा, समुद्री खतरे और मानवीय संकट के समय एक साथ कैसे काम कर सकती हैं। यह अभ्यास दो चरणों सी फेज और हार्बर फेज में होगा। हार्बर फेज में सेमिनार, प्रोफेशनल बातचीत, सांस्कृतिक कार्यक्रम और खेल होते हैं। जबकि सी फेज में संयुक्त नौसैनिक अभ्यास जैसे- एंटी-सबमरीन वॉरफेयर, एयर डिफेंस, सर्च एंड रेस्क्यू, और ह्यूमैनिटेरियन असिस्टेंस एंड डिजास्टर रिलीफ जैसे अभ्यास किए जाएंगे।

मिलन 2024 भी विशाखापत्तनम में आयोजित हुआ था। इसमें लगभग 40 से ज्यादा ने हिस्सा लिया था। करीब 15 से 20 देशों ने अपने युद्धपोत या विमान भेजे, जबकि बाकी देशों ने अपने प्रतिनिधि या नौसेना प्रमुख भेजे। इस एडिशन में 35 से ज्यादा युद्धपोत और पनडुब्बियां तथा 50 से अधिक विमान शामिल हुए थे।

वहीं मिलन 2022 में करीब 39 से 42 देशों ने भाग लिया था। 13 देशों ने अपने युद्धपोत भेजे थे और कुल 39 विदेशी डेलीगेशन शामिल हुए थे। यह कोविड महामारी के बाद पहला बड़ा आयोजन था।

जबकि मिलन 2018 में 17 देश शामिल हुए थे। मिलन 2014 में भी 17 देशों ने भाग लिया था और उस समय तक वह सबसे बड़ा एडिशन माना गया था। 2010 और 2012 के संस्करणों में भी करीब 16 विदेशी देश शामिल हुए थे। (IFR Milan 2026)

IFR Milan 2026 Indian Naval Diplomacy
IONS Conclave (File Photo)

आईओएनएस कॉनक्लेव में कई देशों के नेवी चीफ शामिल

विशाखापत्तनम में 20 फरवरी को 9वें इंडियन ओशन नेवल सिंपोजियम कॉनक्लेव ऑफ चीफ्स का आयोजन होगा। इसमें 42 देशों के नौसेना प्रमुख शामिल होने की उम्मीद है। सूत्रों के मुताबिक इस आयोजन में ईरानी नौसेना के कमांडर रियर एडमिरल शाहराम ईरानी भी शामिल हो सकते हैं। हालांकि ईरान पिछले आईओएनएस इवेंट्स में नियमित रूप से भाग लेता रहा है।

आईओएनएस के 25 मुख्य सदस्य देश हिंद महासागर क्षेत्र के तटीय देश हैं। इन्हें चार हिस्सों में बांटा गया है-दक्षिण एशिया, पश्चिम एशिया, पूर्वी अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया व ऑस्ट्रेलिया क्षेत्र। इन सदस्य देशों में भारत, बांग्लादेश, मालदीव, श्रीलंका, सेशेल्स, ईरान, ओमान, सऊदी अरब, यूएई, केन्या, मॉरीशस, दक्षिण अफ्रीका, फ़्रांस (रीयूनियन), मोजाम्बिक, तंजानिया, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, सिंगापुर, थाईलैंड, तिमोर, कोमोरोस, जिबूती, मेडागास्कर और अन्य देश शामिल हैं। (IFR Milan 2026)

इसके अलावा कुछ देश ऑब्जर्वर के रूप में जुड़े हैं, इनमें जर्मनी, इटली, यूके, जापान, रूस, स्पेन, नीदरलैंड और दक्षिण कोरिया शामिल हैं। कुछ अन्य देशों को विशेष निमंत्रण दिया गया है। इनमें सदस्य और ऑब्जर्वर देशों में पाकिस्तान, चीन और तुर्किए भी शामिल हैं, लेकिन उन्हें इस मेगा इवेंट से बाहर रखा गया है।

इस बैठक में समुद्री सुरक्षा, मानवीय सहायता और आपदा राहत, समुद्री डकैती और साइबर हमलों जैसी चुनौतियों, सूचना साझा करने की व्यवस्था, ड्रोन और मानव रहित प्रणालियों के उपयोग और क्षेत्रीय सहयोग जैसे विषयों पर चर्चा होगी। आईओएनएस का मुख्य उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में साझा चुनौतियों से मिलकर निपटना है। वहीं इस दौरान भारत 2026 से 2028 तक के लिए आईओएनएस की चेयरमैनशिप भी संभालेगा। हालांकि इससे पहले भारत 2008 से 2010 तक चेयरमैन रह चुका है। (IFR Milan 2026)

भारत की नेवल डिप्लोमेसी की बड़ी जीत

इस पूरे आयोजन की सबसे दिलचस्प तस्वीर तब बनेगी, जब कई धुर विरोधी देश रूस, ईरान और अमेरिका के युद्धपोत एक साथ एक ही जगह पर दिखाई देंगे। पश्चिमी एशिया में जहां ईरान और अमेरिका एक-दूसरे के धुरविरोधी हैं, तो यूक्रेन युद्ध के बाद रूस और अमेरिका दोनों देशों के रिश्ते बेहद खराब हैं। लेकिन विशाखापत्तनम में ये सभी देश भारत के मंच पर साथ होंगे।

वहीं भारत के लिए सिर्फ बड़े देश ही अहम नहीं हैं। बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों की मौजूदगी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। बांग्लादेश नौसेना भी अपने फ्रिगेट के साथ इस आयोजन का हिस्सा बन रही है। भले ही भारत बांग्लादेश के बीच राजनीतिक और राजनयिक संबंध कितने खराब हों, लेकिन नेवल डिप्लोमेसी आज भी उतनी ही मजबूत है, जितनी पहले हुआ करती थी। बंगाल की खाड़ी में भारत और बांग्लादेश की साझा जिम्मेदारियां हैं, जिनमें चक्रवात, समुद्री डकैती, अवैध मछली पकड़ना और आपदा राहत शामिल हैं। ऐसे में मिलन और आईएफआर जैसे मंच दोनों देशों के रिश्तों को और मजबूत करते हैं। (IFR Milan 2026)

इन तीनों कार्यक्रमों में ईरान और अमेरिका, रूस और अमेरिका, छोटे और बड़े देशों को लेकर एक साथ बुला कर भारत ने साफ कर दिया है कि वह किसी एक गुट का हिस्सा नहीं, बल्कि सभी के साथ मिलकर चलने वाला देश है। जहां दुनिया टकराव और ध्रुवीकरण की ओर बढ़ रही है, वहीं भारत समुद्र के रास्ते संवाद और सहयोग की राह दिखा रहा है। भारत ने यह दिखा दिया है कि उसकी नौसेना राजनीति से ऊपर उठकर साझा समुद्री सुरक्षा की बात करती है। यही भारत की सबसे बड़ी ताकत है। (IFR Milan 2026)

विशाखापत्तनम में होगा नेवी का एयर शो

इस मेगा इवेंट के दौरान 19 फरवरी को विशाखापत्तनम में ही आयोजित आरके बीच पर इंटरनेशल सिटी परेड में भारतीय नौसेना अपनी एयर पावर का डेमोन्स्ट्रेशन भी करेगी। जो मुख्य रूप से ऑपरेशनल डेमोन्स्ट्रेशन का हिस्सा है। भारतीय नौसेना के लगभग 45 एयरक्राफ्ट इस पूरे आयोजन में भाग ले रहे हैं, जो समुद्र और आसमान दोनों में उसकी तैयारियों और क्षमताओं को दिखाएंगे।

एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत से मिग-29के फाइटर जेट्स उड़ान भरेंगे। ये जेट फॉर्मेशन फ्लाइट्स और एयर डिफेंस डेमो में हिस्सा लेंगे, जिससे समुद्र के ऊपर नौसेना की मारक क्षमता का प्रदर्शन होगा।इसमें भारतीय नौसेना के एयरक्राफ्ट और हेलीकॉप्टर्स लाइव डिस्प्ले करेंगे। इस दौरान कुछ फॉर्मेशंस भी दिखाई जाएंगी। जिनमें एयरक्राफ्ट फॉर्मेशन जैसे एरोहेड और डायमंड, हेलीकॉप्टर मैन्यूवर्स, और सिमुलेटेड ऑपरेशन्स (जैसे एंटी-सबमरीन वारफेयर या सर्च एंड रेस्क्यू) शामिल हैं।

वहीं, हेलीकॉप्टर श्रेणी में स्वदेशी एएलएच ध्रुव, एमएच-60आर सीहॉक भी भाग लेगा, जो एंटी-सबमरीन ऑपरेशन्स और मल्टी-रोल मिशनों के लिए इस्तेमाल होता है। वहीं कामोव केए-31 एयरबोर्न अर्ली वार्निंग की भूमिका निभाएगा और दूर से आने वाले खतरों की जानकारी देगा। इसके अलावा विमानों में लंबी दूरी की समुद्री गश्त के लिए बोइंद पी8आई पोसीडॉन, डोर्नियर 228, आईएआई सर्चर या आईएआई हेरॉन जैसे यूएवी भी शामिल हो सकते हैं। (IFR Milan 2026)

75 से ज्यादा देश ले रहे हैं हिस्सा

इन तीनों आयोजनों में 75 से ज्यादा देश और 4000 से ज्यादा डेलीगेट्स हिस्सा ले रहे हैं। जिनमें ईरान, अमेरिका, रूस और बांग्लादेश जैसे देश भी शामिल हैं। इस आयोजन में अभी तक भारत के अलावा 67 जहाजों के अलावा विदेशी देशों के 22 युद्धपोत और प्रतिनिधि भी हिस्सा ले रहे हैं। भारतीय नौसेना की ओर से एयरक्राफ्ट कैरियर, डिस्ट्रॉयर, फ्रिगेट, सबमरीन और अन्य युद्धपोत शामिल किए गए हैं। साथ ही कई मिलिट्री एयरक्राफ्ट भी इस कार्यक्रम का हिस्सा हैं।

भारत की तरफ से प्रमुख एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत (R11), डिस्ट्रॉयर आईएनएस चेन्नई (D65), आईएनएस विशाखापत्तनम (D66), आईएनएस मैसूर (D60), आईएनएस मुंबई (D62), आईएनएस राणा (D52) और आईएनएस रणविजय (D55) शामिल हैं। फ्रिगेट कैटेगरी में आईएनएस तरकश (F50), आईएनएस तमाल (F71) और आईएनएस नीलगिरि (F33) भी भाग ले रहे हैं। इनके अलावा कई अन्य युद्धपोत और पनडुब्बियां भी हैं। (IFR Milan 2026)

सबमरींस की बात करें, तो इन आयोजनों में भारत की तरफ से सिंधुघोष क्लास (प्रोजेक्ट 877EKM) यानी किलो क्लास की तीन पनडुब्बियां हिस्सा ले रही हैं। इनमें आईएनएस सिंधुकेसरी (S60), आईएनएस शंकुल (S47), आईएनएस सिंधुकीर्ति (S61) शामिल हैं।

इनमें आईएनएस सिंधुकेसरी 1989 में कमीशन हुई थी, जो हाल ही में रिफिट से गुजरी है। जिसमें नए सोनार और वेपन सिस्टम्स लगाए गए हैं। आईएफआर में फ्लीट रिव्यू के दौरान यह सबमर्ज्ड या सरफेस पोजीशन में हिस्सा लेगी, जो भारतीय नौसेना की अंडरवॉटर कैपेबिलिटी दिखाएगी। वहीं, मिलन के सी फेज में एंटी-सबमरीन एक्सरसाइज में यह शामिल होगी।

वहीं, 1992 में कमीशन हुई आईएनएस शंकुल सबमरीन स्टेल्थ फीचर्स के लिए जानी जाती है और यह मिसाइल कैपेबल है। आईएफआर में 18 फरवरी को प्रेसिडेंशियल रिव्यू के दौरान यह फॉर्मेशन में रहेगी। जबकि मिलन में इंटरऑपरेबिलिटी ड्रिल्स (जैसे सर्च एंड रेस्क्यू या एंटी सबमरीन वॉरफेयर) में अपना जलवा बिखेरेगी।

आईएनएस सिंधुकीर्ति की बात करें, तो यह 1990 में कमीशन हुई थी। यह भारत की पहली सबमरीन है जो पूरी तरह से भारत में विशाखापत्तनम स्थित हिंदुस्तान शिपयार्ड में रिफिट हुई है। यह आईएफआर में डिस्प्ले का हिस्सा बनेगी, और मिलन अभ्यास के दौरान विदेशी नौसेनाओं के साथ कोऑर्डिनेटेड ऑपरेशंस में शामिल होगी। (IFR Milan 2026)

ये विदेशी जहाज बन रहे हैं हिस्सा

आईएफआर और मिलन एक्सरसाइज में ईरान के तीन शिप IRINS देना, बुशहर और लवन हिस्सा ले रहे हैं। इनमें देना माउज-क्लास की स्वदेशी फ्रिगेट है, जिसे ईरान ने अपने देश में डेवलप किया है, जो एंटी-शिप और एयर डिफेंस क्षमताओं से लैस है। यह फ्रिगेट आमतौर पर पर्शियन गल्फ और हिंद महासागर क्षेत्र में ऑपरेट करती है। वहीं, बुशहर कामन-क्लास की फास्ट अटैक क्राफ्ट या कोरवेट श्रेणी की मिसाइल बोट है। इसकी खासियत इसकी तेज रफ्तार है। यह छोटे आकार की होने के बावजूद एंटी-शिप मिसाइलों से लैस है। जबकि लवन एक ऑक्जिलियरी या सपोर्ट वेसल है। इसका मुख्य काम लॉजिस्टिक सपोर्ट देना होता है, जैसे समुद्र में ईंधन, रसद और अन्य जरूरी सामग्री की सप्लाई करना है। (IFR Milan 2026)

वहीं, रूस की नौसेना भी इस बार मिलन 2026 में सक्रिय भागीदारी कर रही है। रूसी पैसिफिक फ्लीट से आने वाला आरएफएस मार्शल शापोशनिकोव (543) एक उडालॉय-क्लास डेस्ट्रॉयर/फ्रिगेट है, जिसे पनडुब्बी रोधी युद्ध क्षमता और लंबी दूरी के ऑपरेशन्स के लिए जाना जाता है। इसके साथ आरएफएस बोरिस बुटोमा (P234) भी शामिल है, जो एक ऑक्जिलियरी या रिप्लेनिशमेंट शिप है और समुद्र में तैनात युद्धपोतों को ईंधन, रसद और अन्य जरूरी सपोर्ट उपलब्ध कराने का काम करता है।

जबकि अमेरिकी नौसेना की तरफ से इस बार मिलन और इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू में यूएसएस पिंकनी (DDG 91) हिस्सा ले रहा है। यह आर्ले बर्क-क्लास गाइडेड-मिसाइल डेस्ट्रॉयर है, जिसे आधुनिक हथियार प्रणालियों और मजबूत एयर डिफेंस क्षमता के लिए जाना जाता है। इसकी मौजूदगी इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिका की सक्रिय भूमिका को दर्शाती है। जो भारत और अमेरिका के बीच बढ़ती नौसैनिक साझेदारी और रणनीतिक सहयोग का मजबूत संदेश है। (IFR Milan 2026)

इसके अलावा बांग्लादेश नौसेना का प्रमुख युद्धपोत बीएनएस सोमुद्र अविजान (F29) इस बार विशाखापत्तनम में आयोजित आईएफआर और मिलन 2026 में हिस्सा ले रहा है। यह बांग्लादेश नेवी का एक अहम पेट्रोल फ्रिगेट है, जो लंबे समुद्री गश्त और सुरक्षा अभियानों के लिए तैनात किया जाता है। यह जहाज मूल रूप से अमेरिका के कोस्ट गार्ड का हाई एंड्यूरेंस कटर रूश था। इसे हैमिल्टन-क्लास कटर के रूप में बनाया गया था, जिसे बाद में बांग्लादेश नौसेना ने 2016 में पेट्रोल फ्रिगेट के तौर पर अपने बेड़े में शामिल किया था।

इन जहाजों के अलावा तो ऑस्ट्रेलिया से HMAS वाररामुंगा, इंडोनेशिया से केआरआई बंग तोमो, जापान की ओर से जेएस युदाची और मलेशिया की ओर से केडी श्री इंद्र शक्ति, मालदीव से सीजीएस हुरावी, म्यांमार से यूएमएस किंग आंग जेया, ओमान से आरएनओवी साध और फिलिपींस से बीआरपी मिगुएल मालवर, दक्षिण कोरिया की नौसेना ROKS गैंग गाम चान शिप के साथ पहुंच रही है। इसके अलावा सेशेल्स से एससीजीएस जोरोस्टर, दक्षिण अफ्रीका से एसएएस अमाटोला और श्रीलंका से एसएलएनएस सागर और एसएलएनएस नंदीमित्रा हिस्सा ले रहे हैं। इस कार्यक्रम में भाग ले रहे हैं। (IFR Milan 2026)

ऑपरेशन सिंदूर के बाद SCALP मिसाइल फिर चर्चा में? पाकिस्तान में तबाही के बाद भारत क्यों बढ़ा रहा है स्टॉक?

SCALP Cruise Missile Deal India France

SCALP Cruise Missile Deal: भारत और फ्रांस के बीच राफेल फाइटर जेट के अलावा स्कैल्प (SCALP) क्रूज मिसाइलों के लेकर भी बात हो सकती है। स्कैल्प मिसाइल पिछले साल हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान बेहद चर्चा में रही थीं। सूत्रों के मुताबिक, भारत और फ्रांस लगभग 300 मिलियन यूरो (करीब 2,700 करोड़ रुपये) की डील पर चर्चा हो रही है, जिसके तहत भारतीय वायु सेना के लिए बड़ी संख्या में स्कैल्प मिसाइलें खरीदी जा सकती हैं।

यह वही मिसाइल है, जिसका इस्तेमाल भारतीय वायु सेना ने पाकिस्तान के अंदर मौजूद आतंकवादी ठिकानों को पूरी तरह तबाह करने के लिए किया था। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान राफेल लड़ाकू विमानों से दागी गई इन मिसाइलों ने यह साबित कर दिया कि भारत अब दुश्मन की सीमा के भीतर गहराई तक जाकर सटीक हमला करने की पूरी क्षमता रखता है। (SCALP Cruise Missile Deal)

SCALP Cruise Missile Deal: जैश-लश्कर के मुख्यालयों को निशाना बनाया

मई 2025 की रात, जब भारतीय वायु सेना ने पाकिस्तान के अंदर आतंकी ठिकानों पर हमला किया, तब पूरी दुनिया की नजरें इस ऑपरेशन पर थीं। इस कार्रवाई में जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के मुख्यालयों को निशाना बनाया गया। बहावलपुर और मुरिदके जैसे इलाकों में मौजूद आतंकी ढांचे को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया।

इस ऑपरेशन में भारतीय वायु सेना ने राफेल फाइटर जेट्स से स्कैल्प क्रूज मिसाइल और ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल दोनों का इस्तेमाल किया। जहां ब्रह्मोस ने तेजी से बड़े हमले किए, तो वहीं स्कैल्प मिसाइलों ने बेहद सटीक तरीके से बंकरों और मजबूत इमारतों को निशाना बनाया।

सूत्रों के मुताबिक, जिन टारगेट्स पर स्कैल्प मिसाइलें गिरीं, वहां पूरी तरह तबाही हुई और आतंकवादी संगठनों का इंफ्रास्ट्रक्चर जड़ से खत्म हो गया। (SCALP Cruise Missile Deal)

स्कैल्प मिसाइल आखिर है क्या?

स्कैल्प एक एयर-लॉन्च्ड स्टैंडऑफ क्रूज मिसाइल है। इसे फ्रांस और यूरोप की जानी-मानी रक्षा कंपनी एमबीडीए बनाती है। ब्रिटेन में इसी मिसाइल को स्टॉर्म शैडो के नाम से जाना जाता है।

इस मिसाइल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे दुश्मन की एयर डिफेंस रेंज से बाहर रहकर लॉन्च किया जा सकता है। यानी पायलट को खतरे वाले इलाके में घुसने की जरूरत नहीं पड़ती।

स्कैल्प मिसाइल की मारक क्षमता करीब 250 से 500 किलोमीटर तक मानी जाती है। यह मिसाइल बेहद कम ऊंचाई पर उड़ती है, पेड़ों की ऊंचाई के आसपास, ताकि दुश्मन के रडार इसे पकड़ न सकें। इसके अंदर एडवांस गाइडेंस सिस्टम होता है, जिसमें जीपीएस, टेर्रेन रेफरेंस नेविगेशन और इंफ्रारेड सीकर शामिल हैं। इसी वजह से यह मिसाइल “पिनपॉइंट एक्युरेसी” के लिए जानी जाती है। (SCALP Cruise Missile Deal)

पाकिस्तान के एयरबेस पर भी हुआ इस्तेमाल

ऑपरेशन सिंदूर के बाद जब हालात और तनावपूर्ण हुए, तब भारतीय वायु सेना ने स्कैल्प मिसाइलों का दोबारा बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया। यहां तक कि पाकिस्तान एयर फोर्स के कई एयरबेस को भी निशाना बनाया था।

सूत्रों के मुताबिक, भारतीय वायु सेना ने पाकिस्तान के 12 प्रमुख एयरबेस पर हमले किए। इन हमलों में रनवे, हैंगर, फाइटर जेट्स और जासूसी विमानों को जमीन पर ही तबाह कर दिया गया। स्कैल्प मिसाइलों ने यहां भी अपनी सटीकता और भरोसेमंद क्षमता साबित की। (SCALP Cruise Missile Deal)

अब क्यों जरूरी हो गई नई डील?

ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत की सुरक्षा सोच में बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। अब सिर्फ जवाबी कार्रवाई नहीं, बल्कि डीप स्ट्राइक कैपेबिलिटी को मजबूत करने पर जोर है। इसी कड़ी में भारतीय वायु सेना अपने हथियार भंडार को और मजबूत करना चाहती है।

सूत्रों के अनुसार, वायु सेना अब स्कैल्प मिसाइलों का स्टॉक बढ़ाना चाहती है, ताकि भविष्य में किसी भी आपात स्थिति में पर्याप्त संख्या में ये मिसाइलें उपलब्ध रहें। इसी वजह से फ्रांस के साथ नई डील पर बातचीत चल रही है। (SCALP Cruise Missile Deal)

राफेल के साथ स्कैल्प का मजबूत कॉम्बिनेशन

स्कैल्प मिसाइल को खास तौर पर राफेल फाइटर जेट के साथ इस्तेमाल के लिए डिजाइन किया गया है। भारतीय वायु सेना के पास फिलहाल 36 राफेल विमान हैं, और ये सभी स्कैल्प से लैस हैं।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि राफेल और स्कैल्प की जोड़ी भारत को ऐसी ताकत देती है, जिससे दुश्मन के सबसे सुरक्षित ठिकानों को भी बिना सीमा पार किए खत्म किया जा सकता है। (SCALP Cruise Missile Deal)

नौसेना के राफेल मरीन में भी होगा इस्तेमाल

भारत ने हाल ही में नौसेना के लिए 26 राफेल मरीन लड़ाकू विमानों का ऑर्डर दिया है। ये विमान अगले तीन से चार साल में भारत पहुंचेंगे और विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत से ऑपरेट करेंगे।

जानकारी के मुताबिक, स्कैल्प मिसाइल को इन राफेल मरीन विमानों में भी इंटीग्रेट किया जाएगा। इससे भारतीय नौसेना को समुद्र से जमीन पर गहरे हमले की क्षमता मिलेगी, जो हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की ताकत को और बढ़ाएगी। (SCALP Cruise Missile Deal)

मीटियोर मिसाइलों की भी तैयारी

स्कैल्प के साथ-साथ भारतीय वायु सेना मीटियोर एयर-टू-एयर मिसाइल की भी बड़ी खरीद की प्रक्रिया में है। मीटियर मिसाइल हवा में दुश्मन के लड़ाकू विमानों को लंबी दूरी से मार गिराने में सक्षम मानी जाती है। यानी राफेल फ्लीट को हवा और जमीन दोनों मोर्चों पर और ज्यादा घातक बनाया जा रहा है। (SCALP Cruise Missile Deal)

114 और राफेल की तैयारी

ऑपरेशन सिंदूर में राफेल के प्रदर्शन के बाद भारतीय वायु सेना का भरोसा इस विमान पर और मजबूत हुआ है। यही वजह है कि अब 114 अतिरिक्त राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद की योजना पर काम चल रहा है।

सूत्रों के मुताबिक, यह प्रस्ताव जल्द ही डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (DAC) के सामने रखा जा सकता है। अगर यह डील मंजूर हो जाती है, तो आने वाले 10 से 15 साल में भारतीय वायु सेना के पास करीब 200 राफेल विमान हो सकते हैं।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि स्कैल्प मिसाइल की यह संभावित डील सिर्फ एक हथियार खरीद नहीं है। यह भारत और फ्रांस के बीच गहरे होते रणनीतिक रिश्तों का संकेत भी है। पिछले कुछ सालों में दोनों देशों के बीच सबमरीन, फाइटर जेट, इंजन और मिसाइल जैसे कई बड़े रक्षा सौदे हो चुके हैं। यह डील भारत की सैन्य तैयारी को नई धार देगी और यह साफ संदेश भी देगी कि भारत अब आतंकवाद और किसी भी सुरक्षा चुनौती से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है। (SCALP Cruise Missile Deal)

भारतीय नौसेना को मिल सकते हैं स्वदेशी मरीन इंजन, DAC की बैठक में 114 राफेल और P-8i को मिल सकती है हरी झंडी

Indigenous Marine Gas Turbine Engine for Indian Navy in DAC Meeting

DAC Meeting: अगले हफ्ते होने वाली डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल यानी डीएसी की बैठक में एक बड़ा और अहम फैसला लिया जा सकता है। माना जा रहा है कि डीएसी की बैठक 12 फरवरी को हो सकती है। बैठक में नौसेना के लिए स्वदेशी मरीन गैस टर्बाइन इंजन के डेवलपमेंट से जुड़े एक बड़े प्रोग्राम को मंजूरी मिलने की पूरी संभावना है। अगर ऐसा होता है, तो यह फैसला सिर्फ नौसेना के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश की रक्षा तैयारियों के लिहाज से एक ऐतिहासिक कदम माना जाएगा। (DAC Meeting)

यह प्रोग्राम खास तौर पर 24 से 28 मेगावॉट क्षमता वाले मरीन गैस टर्बाइन इंजन के स्वदेशी विकास से जुड़ा है। ऐसे इंजन नौसेना के बड़े युद्धपोतों, जैसे डिस्ट्रॉयर और फ्रिगेट में इस्तेमाल होते हैं। अभी तक भारत इन इंजनों के लिए विदेशों पर निर्भर रहा है, लेकिन अब तस्वीर बदलने की तैयारी है। (DAC Meeting)

DAC Meeting: क्या है यह मरीन गैस टर्बाइन प्रोग्राम?

मरीन गैस टर्बाइन इंजन किसी भी बड़े युद्धपोत का दिल माने जाते हैं। इन्हीं इंजनों की वजह से जहाज तेज रफ्तार से चल पाते हैं, लंबी दूरी तय कर सकते हैं और युद्ध जैसी स्थिति में तेजी से मूवमेंट कर सकते हैं।

भारतीय नौसेना अब चाहती है कि ऐसे अहम इंजन भारत में ही डिजाइन हों, भारत में ही बनें और भारत की जरूरतों के हिसाब से तैयार किए जाएं। इसी उद्देश्य से यह नया प्रोग्राम तैयार किया गया है, जिसे डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर 2020 की मेक-1 कैटेगरी में लाया गया है।

मेक-1 कैटेगरी का मतलब होता है कि सरकार खुद इस प्रोजेक्ट में बड़ा निवेश करती है, ताकि देश के भीतर इन्हें तैयार किया जा सके। (DAC Meeting)

कितनी होगी लागत और सरकार कितना पैसा देगी?

सूत्रों के मुताबिक, इस पूरे मरीन इंजन प्रोग्राम की लागत करीब 4,000 से 5,000 करोड़ रुपये हो सकती है। मेक-1 नियमों के तहत सरकार प्रोटोटाइप यानी शुरुआती नमूने बनाने की लागत का 70 फीसदी तक खर्च उठाएगी। बाकी 30 फीसदी लागत उस इंडस्ट्री पार्टनर को वहन करनी होगी, जो इस प्रोजेक्ट में शामिल होगा।

नियमों के मुताबिक, एक डेवलपमेंट एजेंसी को प्रोटोटाइप बनाने के लिए सरकार की ओर से अधिकतम 250 करोड़ रुपये तक की फंडिंग दी जा सकती है। लेकिन चूंकि यह एक बड़ा और अहम प्रोजेक्ट है, इसलिए इसमें कई चरणों में निवेश किया जाएगा। (DAC Meeting)

कितने इंजन बनेंगे और कहां होंगे इस्तेमाल?

इस प्रोग्राम के तहत सबसे पहले 4 प्रोटोटाइप इंजन बनाए जाएंगे। इन इंजनों को जमीन पर और बाद में जहाज पर टेस्ट किया जाएगा, ताकि यह देखा जा सके कि वे नौसेना की सभी जरूरतों पर खरे उतरते हैं या नहीं।

अगर ये प्रोटोटाइप सफल रहते हैं, तो इसके बाद शुरुआती तौर पर कम से कम 40 मरीन गैस टर्बाइन इंजन बनाने की योजना है। आगे चलकर यह संख्या और बढ़ सकती है, क्योंकि भारतीय नौसेना आने वाले वर्षों में कई नए युद्धपोत शामिल करने वाली है।

ये इंजन खास तौर पर डिस्ट्रॉयर और फ्रिगेट जैसे बड़े सरफेस कॉम्बैटेंट्स के लिए बनाए जाएंगे, जो नौसेना की ताकत की रीढ़ माने जाते हैं। (DAC Meeting)

अभी किन विदेशी इंजनों पर निर्भर है भारत?

फिलहाल भारतीय नौसेना के ज्यादातर बड़े युद्धपोत विदेशी गैस टर्बाइन इंजनों पर चलते हैं। इनमें मुख्य रूप से दो नाम आते हैं। उनमें एक यूक्रेन की कंपनी जोर्या-माशप्रोएक्ट और दूसरी अमेरिका की कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक (जीई)है।

इन कंपनियों के इंजन वर्षों से भारतीय नौसेना के जहाजों में लगे हुए हैं। लेकिन बीते कुछ सालों में वैश्विक हालात ने यह साफ कर दिया है कि विदेशी सप्लाई पर निर्भरता जोखिम भरी हो सकती है। युद्ध, प्रतिबंध या राजनीतिक तनाव की स्थिति में स्पेयर पार्ट्स और मेंटेनेंस पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा, इस प्रोग्राम से भारत में हाई-टेम्परेचर मेटलर्जी, एडवांस्ड मटीरियल्स और प्रिसीजन इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में बड़ी तकनीकी तरक्की होगी।

इसी वजह से नौसेना अब चाहती है कि भविष्य में ऐसे अहम सिस्टम्स पूरी तरह से स्वदेशी हों। (DAC Meeting)

पहले भी हुए हैं स्वदेशी प्रयास, लेकिन यह प्रोग्राम क्यों है अलग?

भारतीय नौसेना और डीआरडीओ पहले भी मरीन इंजन के क्षेत्र में स्वदेशी प्रयास कर चुके हैं। गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट यानी जीटीआरई ने कावेरी इंजन का एक मरीन वर्जन डेवलप करने की कोशिश की थी।

इसके अलावा हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) और भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (बीएचईएल) जैसी सार्वजनिक कंपनियों ने भी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के जरिए लोकलाइजेशन पर काम किया है। हालांकि, सूत्रों के अनुसार मौजूदा मरीन इंजन प्रोग्राम का दायरा पहले से कहीं अधिक व्यापक रखा गया है। इस बार विकास की जिम्मेदारी सिर्फ सरकारी संस्थानों तक सीमित नहीं होगी, बल्कि प्राइवेट इंडस्ट्री की अगुवाई में, नौसेना की सक्रिय भागीदारी के साथ इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने की योजना है। इससे स्वदेशी तकनीक के विकास को नई गति मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। (DAC Meeting)

प्राइवेट इंडस्ट्री से क्या है उम्मीद?

पिछले साल के आखिर में नौसेना ने भारतीय प्राइवेट कंपनियों से संपर्क किया था और उनसे जानकारी मांगी थी कि क्या वे ऐसे हाई-पावर मरीन गैस टर्बाइन इंजन बना सकती हैं। कंपनियों से यह पूछा गया कि क्या उनके पास गैस टर्बाइन डिजाइन करने का अनुभव है। क्या वे फोर्जिंग, कास्टिंग और प्रिसीजन मशीनिंग जैसे अहम काम कर सकती हैं। साथ ही, क्या उनके पास टेस्टिंग फैसिलिटी और क्वालिटी कंट्रोल सिस्टम है और वे इंजन का मेंटेनेंस और लाइफ-साइकिल सपोर्ट कैसे देंगे। इस कवायद का मकसद यह समझना था कि भारतीय इंडस्ट्री इस चुनौती के लिए कितनी तैयार है। (DAC Meeting)

खुल सकती है निर्यात की संभावना भी

अगर भारत इस 24-28 मेगावॉट मरीन गैस टर्बाइन को सफलतापूर्वक विकसित कर लेता है, तो भविष्य में इसे इंडियन ओशन रीजन की मित्र नौसेनाओं को निर्यात भी किया जा सकता है। आज कई छोटे और मध्यम देश अपने युद्धपोतों के लिए भरोसेमंद और किफायती इंजन की तलाश में रहते हैं। ऐसे में भारत उनके लिए एक नया विकल्प बन सकता है। (DAC Meeting)

डीएसी बैठक में और किस पर हो सकती है चर्चा

डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) की होने वाली बैठक में वायुसेना के लिए 114 अतिरिक्त राफेल लड़ाकू विमानों की प्रस्तावित खरीद पर भी चर्चा होने की संभावना है। इस डील की अनुमानित लागत करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये बताई जा रही है, जिससे यह हाल के वर्षों की सबसे बड़ी रक्षा खरीद योजनाओं में शामिल मानी जा रही है। इसके अलावा डीएसी में भारतीय नौसेना के लिए छह अतिरिक्त पी-8आई समुद्री निगरानी और पनडुब्बी रोधी युद्धक विमान खरीदने का प्रस्ताव पर भी विचार हो सकता है।

फिलहाल भारतीय नौसेना के पास 12 पी-8आई विमान हैं, जिनका इस्तेमाल हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री निगरानी और पनडुब्बी रोधी अभियानों के लिए किया जाता है। नौसेना अपनी निगरानी क्षमता को और मजबूत करने के लिए छह और विमानों की जरूरत महसूस कर रही है। यह खरीद अमेरिका के फॉरेन मिलिट्री सेल्स (एफएमएस) रूट के जरिए की जानी है। (DAC Meeting)

अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट ने मई 2021 में इस बिक्री को मंजूरी दे दी थी और उस समय इसकी अनुमानित लागत करीब 2.42 अरब डॉलर बताई गई थी। हालांकि, लागत से जुड़े सवालों और पिछले साल डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद बने राजनीतिक माहौल के कारण यह सौदा आगे नहीं बढ़ पाया।

इसके बावजूद बातचीत बंद नहीं हुई। सितंबर में अमेरिकी रक्षा विभाग और बोइंग के वरिष्ठ अधिकारी भारत आए थे और इस सौदे को लेकर विस्तृत चर्चा की गई थी। अब सूत्रों का कहना है कि डीएसी से मंजूरी मिलने की स्थिति में यह सौदा अगले वित्त वर्ष में औपचारिक रूप से साइन किया जा सकता है। (DAC Meeting)

पूंछ दौरे में अपने पुराने साथी से गले मिले सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी, ऑपरेशन सिंदूर के वेटरन को किया सम्मानित

Army Chief Poonch Visit

Army Chief Poonch Visit: जम्मू-कश्मीर का पूंछ जिला हमेशा से भारतीय सेना के लिए रणनीतिक रूप से अहम रहा है। लाइन ऑफ कंट्रोल के पास बसे इस इलाके में सेना की तैनाती सिर्फ सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां सेना और आम लोगों के बीच एक गहरा रिश्ता भी है। जिसकी एक झलक शनिवार को देखने को मिली, जब भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी पूंछ पहुंचे।

भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी फॉरवर्ड इलाकों में तैनात जवानों की ऑपरेशनल तैयारी की समीक्षा करने पहुंचे थे, इस दौरान उन्होंने अपने पुराने साथियों से मुलाकात भी की।

Army Chief Poonch Visit: फॉरवर्ड एरिया में जवानों से मुलाकात

पूंछ पहुंचने के बाद जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने लाइन ऑफ कंट्रोल के पास तैनात जवानों से सीधे बातचीत की। उन्होंने सैनिकों की तैनाती, सतर्कता और तैयारियों का जायजा लिया। सेना प्रमुख ने जवानों के ऊंचे मनोबल, अनुशासन और प्रोफेशनल रवैये की सराहना की।

उन्होंने जवानों से कहा कि मौजूदा सुरक्षा हालात में उनकी भूमिका बेहद अहम है और देश को उन पर पूरा भरोसा है। इस तरह की मुलाकातें जवानों का हौसला बढ़ाती हैं, क्योंकि उन्हें यह एहसास होता है कि सेना का शीर्ष नेतृत्व उनकी मेहनत और चुनौतियों को समझता है। (Army Chief Poonch Visit)

कामसार गांव में की मुलाकात

इस दौरे के दौरान जनरल द्विवेदी पूंछ के कामसार गांव पहुंचे। यहां उनकी मुलाकात रिटायर्ड सुबेदार (ऑनरेरी कैप्टन) परवेज अहमद से हुई। परवेज अहमद जनरल द्विवेदी के पुराने साथी रहे हैं।

जनरल उपेंद्र द्विवेदी और परवेज अहमद ने 18 जम्मू एंड कश्मीर राइफल्स में साथ काम किया था। खासकर 2002 से 2005 के बीच, जब जनरल द्विवेदी इस बटालियन के कमांडिंग ऑफिसर थे, उस समय दोनों ने कई मुश्किल हालात में एक साथ देश की सेवा की। कश्मीर में यह दौर काफी संवेदनशील माना जाता है, जब आतंकवाद विरोधी ऑपरेशंस चरम पर थे।

सालों बाद जब दोनों मिले तो काफी भावुक हो गए। भारतीय सेना की यह खूबी है यहां रिश्ता सिर्फ ड्यूटी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह जिंदगी भर का साथ भी बन जाता है। (Army Chief Poonch Visit)

मार्च 1991 में भारतीय सेना की थी जॉइन

सुबेदार परवेज अहमद ने मार्च 1991 में भारतीय सेना जॉइन की थी। करीब 28 साल की सेवा के बाद वे मार्च 2019 में रिटायर हुए। अपने करियर के दौरान उन्होंने कई ऑपरेशनल जिम्मेदारियां निभाईं और ट्रेनिंग संस्थानों में इंस्ट्रक्टर के तौर पर भी काम किया।

सेना में रहते हुए उन्होंने कई स्पेशलाइज्ड कोर्स पूरे किए और अपनी मेहनत और अनुशासन के लिए सराहना भी पाई। रिटायरमेंट के बाद भी उनका रिश्ता सेना से खत्म नहीं हुआ। (Army Chief Poonch Visit)

ऑपरेशन सिंदूर में अहम भूमिका

रिटायर होने के बाद भी परवेज अहमद स्थानीय इलाके में सक्रिय रहे। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान, जब सुरक्षा हालात काफी संवेदनशील थे, उन्होंने तैनात जवानों की हर संभव मदद की।

उन्होंने लॉजिस्टिक्स सपोर्ट, स्थानीय समन्वय और इलाके की जानकारी के जरिए सेना को सहयोग दिया। यह सब उन्होंने अपनी जान को जोखिम में डालकर किया। उनकी स्थानीय पहचान और यूनिट के साथ पुराने संबंधों की वजह से सेना को काफी मदद मिली। (Army Chief Poonch Visit)

वेटरन अचीवर अवार्ड से सम्मानित

इन्हीं योगदानों को देखते हुए जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने परवेज अहमद को वेटरन अचीवर अवार्ड से सम्मानित किया। इस मौके पर उनके परिवार के सदस्य, पूर्व सैनिक और स्थानीय लोग भी मौजूद थे। यह सम्मान सिर्फ एक व्यक्ति के लिए नहीं था, बल्कि उन सभी वेटरन्स के लिए था, जो रिटायरमेंट के बाद भी देश और समाज के लिए योगदान देते रहते हैं।

स्थानीय लोगों से किया संवाद

इस यात्रा के दौरान सेना प्रमुख ने अन्य वेटरन्स, महिलाओं और बच्चों से भी मुलाकात की। बातचीत पूरी तरह अनौपचारिक रही। लोगों ने अपने अनुभव साझा किए और सेना के प्रति अपना भरोसा जताया।

पूंछ जैसे सीमावर्ती इलाकों में सेना सिर्फ एक सुरक्षा बल नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा होती है। यहां लगभग हर परिवार का कोई न कोई सदस्य सेना से जुड़ा रहा है। (Army Chief Poonch Visit)

Opinion: इंडो-पैसिफिक में दिखेगी भारत की समुद्री ताकत, विशाखापत्तनम में IFR और ‘मिलन’ कैसे बनेंगे गेम-चेंजर

IFR MILAN 2026 Indo-Pacific

IFR MILAN 2026 Indo-Pacific: हिंद महासागर में सजे सैकड़ों युद्धपोत, आसमान में लहराते दर्जनों देशों के झंडे और तट पर उमड़ती भीड़, यह दृश्य केवल सैन्य ताकत का प्रदर्शन नहीं होगा, बल्कि यह भारत की बढ़ती समुद्री कूटनीति का साफ संकेत देगा। एक ही शहर में इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू (IFR) और बहुपक्षीय नौसैनिक अभ्यास ‘मिलन’ का आयोजन, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत की भूमिका को नए नजरिये से स्थापित करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

IFR MILAN 2026 Indo-Pacific: विशाखापत्तनम में सबसे बड़ा नौसैनिक जमावड़ा

साल 2016 में विशाखापत्तनम के तट पर 70 से ज्यादा भारतीय और विदेशी युद्धपोत एक साथ नजर आए थे। अब, दस साल बाद 2026 में, यह आयोजन पहले से कहीं ज्यादा बड़ा और राजनीतिक रूप से ज्यादा अहम होने जा रहा है। इस बार इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू के साथ-साथ नौसैनिक अभ्यास ‘मिलन’ भी विशाखापत्तनम में ही आयोजित होगा। इसे भारतीय महासागर क्षेत्र के सबसे बड़े नेवल डिप्लॉयमेंट्स में से एक माना जा रहा है। कार्यक्रम के दौरान समुद्र में युद्धपोतों की सलामी के साथ-साथ शहर की सड़कों पर अंतरराष्ट्रीय सिटी परेड और हाई-लेवल मैरीटाइम सेमिनार्स भी होंगी।

बेड़े के निरीक्षण यानी फ्लीट इंस्पेक्शन की परंपरा कोई नई नहीं है। ब्रिटेन के स्पिटहेड रिव्यू से लेकर अमेरिका के ‘ग्रेट व्हाइट फ्लीट’ तक, नौसेनाएं हमेशा अपने जहाजों की कतारों के जरिए दुनिया को राजनीतिक और रणनीतिक संदेश देती रही हैं। भारत ने भी 1953 में पहला प्रेसिडेंट फ्लीट इंस्पेक्शन आयोजित कर यह दिखाया था कि अब देश की नौसेना किसी वायसराय को नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रपति को सलामी देती है। (IFR MILAN 2026 Indo-Pacific)

समय के साथ-साथ भारत की समुद्री ताकत लगातार बढ़ती गई। स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत से लेकर नीलगिरी और कोलकाता श्रेणी के युद्धपोतों तक, हर फ्लीट रिव्यू ने यह साबित किया कि भारत समुद्री शक्ति की सीढ़ियां लगातार चढ़ रहा है। 2001 में मुंबई के तट पर हुआ पहला इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू और 2016 का विशाखापत्तनम आयोजन इसी लंबी यात्रा के अहम पड़ाव रहे हैं। (IFR MILAN 2026 Indo-Pacific)

1995 में पोर्ट ब्लेयर से शुरू हुआ यह मिलन

अगर इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू को नौसैनिक कूटनीति का “शोकेस विंडो” कहा जाए, तो अभ्यास ‘मिलन’ को उसका “वर्कशॉप” कहना गलत नहीं होगा। साल 1995 में पोर्ट ब्लेयर से शुरू हुआ यह अभ्यास शुरुआत में सिर्फ पांच देशों तक सीमित था, लेकिन आज यह 40 से ज्यादा देशों की नौसेनाओं के लिए साझा मंच बन चुका है।

पिछले कुछ वर्षों में ‘मिलन’ ने कॉम्प्लेक्स नेवल एक्सरसाइज, कोआर्डिनेटेड पैट्रोलिंग और मानवीय सहायता व आपदा राहत (HADR) जैसे क्षेत्रों में वास्तविक सहयोग को मजबूत किया है। 2024 में 47 नौसेनाओं की भागीदारी और आईएनएस विक्रांत की मौजूदगी ने यह साफ संकेत दिया कि भारत क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे में एक भरोसेमंद और पसंदीदा साझेदार बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। (IFR MILAN 2026 Indo-Pacific)

आज इंडो-पैसिफिक क्षेत्र तेज सामरिक प्रतिस्पर्धा और जटिल सहयोग का केंद्र बन चुका है। चीन की तेजी से बढ़ती नौसैनिक मौजूदगी, पाकिस्तान की लगातार समुद्री गतिविधियां और अमेरिकी नौसेना की बदलती प्राथमिकताएं, क्षेत्र के कई देशों को असमंजस में डालती हैं। इसी बीच मालदीव से मॉरीशस और वियतनाम से इंडोनेशिया तक के तटीय देश समुद्री डकैती, अवैध मछली पकड़ने और जलवायु से जुड़ी आपदाओं जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। (IFR MILAN 2026 Indo-Pacific)

“कन्वीनिंग पावर” बनकर उभरा है भारत

ऐसे माहौल में भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी “कन्वीनिंग पावर” बनकर उभरती है, यानी अलग-अलग देशों की नौसेनाओं को एक मंच पर लाने की क्षमता। इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू पारदर्शिता और भरोसे का संदेश देता है, जबकि ‘मिलन’ अभ्यास उस भरोसे को जमीन पर उतारने का काम करता है। किसी भी उभरती शक्ति के लिए यह बेहद अहम होता है कि कितने देश उसके बुलावे पर एक साथ आने को तैयार हैं।

अक्सर यह सवाल भी उठता है कि इतने बड़े आयोजनों पर खर्च करना कितना सही है। आलोचक इन्हें “महंगा तमाशा” कहकर खारिज करते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि समुद्री शक्ति केवल जहाजों और पनडुब्बियों से नहीं बनती, बल्कि साझेदारी, भरोसे और अंतरराष्ट्रीय मौजूदगी से भी बनती है। अगर भारत इन आयोजनों के साथ-साथ अपनी वास्तविक समुद्री क्षमता, दूरदराज समुद्री इलाकों में सतत मौजूदगी और घरेलू शिपबिल्डिंग को मजबूत करता रहा, तो इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू और ‘मिलन’ जैसे कार्यक्रम लंबे समय के लिए निवेश साबित होंगे। (IFR MILAN 2026 Indo-Pacific)

छोटी और मध्यम नौसेनाओं के लिए यह मंच सिर्फ ट्रेनिंग का जरिया नहीं, बल्कि भारत के साथ स्थायी रिश्ते बनाने का अवसर भी बन सकता है।

फरवरी 2026 में विशाखापत्तनम इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू, अभ्यास ‘मिलन’ और इंडियन ओशन नेवल सिंपोजियम (आईओएनएस) के चीफ्स कॉन्क्लेव की मेजबानी करेगा। समुद्र में कतारबद्ध युद्धपोतों से लेकर शहर की सड़कों पर निकलने वाली अंतरराष्ट्रीय परेड और कूटनीतिक बैठकों तक, हर स्तर पर दुनिया यह परखने की कोशिश करेगी कि भारत सिर्फ शान-ओ-शौकत दिखा रहा है या सचमुच क्षेत्रीय नेतृत्व की ओर बढ़ रहा है।

इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू और ‘मिलन’ जैसे आयोजन आने वाले सालों में इंडो-पैसिफिक की शक्ति-संतुलन की कहानी के अहम अध्याय बन सकते हैं। (IFR MILAN 2026 Indo-Pacific)

मलक्का स्ट्रेट के पास भारत-थाईलैंड की एयर एक्सरसाइज, अभ्यास में शामिल होंगे सुखोई-30 और ग्रिपेन

India Thailand Air Exercise Near Malacca Strait
India Thailand Air Exercise Near Malacca Strait

India Thailand Air Exercise: भारतीय वायु सेना और रॉयल थाई एयर फोर्स के बीच फरवरी में एक महत्वपूर्ण जॉइंट एयर एक्सरसाइज हो जा रही है, जो उत्तर मलक्का स्ट्रेट के पास, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के नजदीक की जाएगी।

यह अभ्यास 9 फरवरी को होना तय है और इसे भारत-थाईलैंड रक्षा संबंधों में एक नया और अहम कदम माना जा रहा है। अब तक दोनों देशों के बीच नौसेना स्तर पर सहयोग ज्यादा रहा है, लेकिन यह पहली बार है जब दोनों वायु सेनाएं इतने रणनीतिक इलाके में एक साथ अभ्यास करने जा रही हैं। (India Thailand Air Exercise)

India Thailand Air Exercise: कहां और कैसे होगा यह अभ्यास?

यह संयुक्त एयर एक्सरसाइज अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के ऊपर और उसके आसपास के क्षेत्र में की जाएगी, जो सीधे तौर पर मलक्का जलडमरूमध्य के पास स्थित है। यह इलाका बंगाल की खाड़ी और अंडमान सागर के संगम पर पड़ता है और इसे हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सबसे संवेदनशील जगहों में से एक माना जाता है।

भारतीय वायु सेना इस अभ्यास में अपने 4 से 6 सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमानों को उतारेगी, जो अंडमान के किसी एयरबेस से उड़ान भरेंगे। वहीं थाईलैंड की वायु सेना अपने ग्रिपेन फाइटर जेट्स के साथ इस अभ्यास में हिस्सा लेगी, जो थाई एयरबेस से ऑपरेट करेंगे। (India Thailand Air Exercise)

मिड-एयर रिफ्यूलिंग टैंकर एयरक्राफ्ट भी तैनात

यह अभ्यास केवल फाइटर बनाम फाइटर ट्रेनिंग तक सीमित नहीं होगा। भारतीय वायु सेना इसमें मिड-एयर रिफ्यूलिंग टैंकर एयरक्राफ्ट भी तैनात करेगी, जिससे लंबी दूरी तक ऑपरेशन की क्षमता को परखा जा सके।

इसके अलावा एयरबोर्न वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम यानी एडब्ल्यूएसीएस भी इस अभ्यास का हिस्सा होंगे। इनका काम आसमान से निगरानी करना, एयर ट्रैफिक को कंट्रोल करना और लड़ाकू विमानों को रियल-टाइम जानकारी देना होता है।

साथ ही, भारतीय नौसेना भी आसपास के समुद्री क्षेत्र में अपने युद्धपोत तैनात करेगी, ताकि अगर किसी तरह की आपात स्थिति पैदा हो, तो सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन तुरंत किए जा सकें। (India Thailand Air Exercise)

अभ्यास का क्या है मकसद?

इस जॉइंट एयर एक्सरसाइज का सबसे बड़ा उद्देश्य दोनों वायु सेनाओं के बीच इंटरऑपरेबिलिटी यानी आपसी तालमेल को मजबूत करना है। अलग-अलग देशों के एयरक्राफ्ट, अलग सिस्टम और अलग रणनीतियों के साथ काम करते हैं। ऐसे में यह अभ्यास यह समझने का मौका देगा कि संकट की स्थिति में दोनों सेनाएं कितनी तेजी से और कितनी सटीकता से साथ काम कर सकती हैं।

इसके अलावा, इसमें बेस्ट प्रैक्टिसेज शेयर की जाएंगी, यानी दोनों देश एक-दूसरे के ऑपरेशन तरीकों, टेक्निक और अनुभवों से सीखेंगे। लंबी दूरी की उड़ान, लॉजिस्टिक्स सपोर्ट, मिड-एयर रिफ्यूलिंग और रिमोट इलाकों में ऑपरेशन जैसी क्षमताओं को भी परखा जाएगा। (India Thailand Air Exercise)

मलक्का स्ट्रेट के पास अभ्यास क्यों खास है?

मलक्का जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। एशिया, यूरोप और मिडिल ईस्ट के बीच होने वाला करीब 80 फीसदी समुद्री व्यापार और तेल सप्लाई इसी रास्ते से गुजरती है।

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की लोकेशन भारत को इस पूरे इलाके पर नजर रखने की रणनीतिक क्षमता देती है। यहां होने वाला यह एयर अभ्यास साफ संकेत देता है कि भारत और उसके साझेदार देश हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर गंभीर हैं।

यह अभ्यास यह भी दिखाता है कि भारत न सिर्फ अपने लिए, बल्कि पूरे क्षेत्र की स्थिरता और समुद्री सुरक्षा के लिए जिम्मेदारी लेने को तैयार है। (India Thailand Air Exercise)

नौसेना से आगे बढ़े डिफेंस रिलेशंस

भारत और थाईलैंड के बीच डिफेंस रिलेशंस पहले नौसेना तक सीमित माने जाते थे। दोनों देश मिलकर समुद्री गश्त, कोरपैट और अन्य नौसैनिक अभ्यास करते रहे हैं। लेकिन अब वायु सेना स्तर पर यह सीधा सहयोग इस रिश्ते को एक नई ऊंचाई पर ले जाता है।

यह अभ्यास भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी और आसियान देशों के साथ बढ़ते रक्षा संबंधों का भी हिस्सा है। थाईलैंड जैसे देश के साथ हवाई अभ्यास यह संदेश देता है कि भारत दक्षिण-पूर्व एशिया में एक भरोसेमंद सुरक्षा साझेदार बनकर उभर रहा है। (India Thailand Air Exercise)

आने वाले महीनों में और बड़े अभ्यास

सूत्रों के मुताबिक, यह अभ्यास सिर्फ शुरुआत है। फरवरी और मार्च 2026 में भारतीय वायु सेना फ्रांस, अमेरिका और ग्रीस जैसे देशों के साथ भी बड़े संयुक्त अभ्यास करने जा रही है। इससे यह साफ होता है कि भारतीय वायु सेना अपनी ग्लोबल रीच और ऑपरेशनल क्षमता को लगातार मजबूत कर रही है। (India Thailand Air Exercise)

अग्नि-3 मिसाइल टेस्ट क्यों है इतना अहम? चीन-पाकिस्तान तक मार, भारत की सेकंड स्ट्राइक ताकत कितनी मजबूत?

Agni-3 missile test Explained

Agni-3 missile test Explained: 6 फरवरी को भारत ने अग्नि-3 बैलिस्टिक मिसाइल का सफल परीक्षण किया। खास बात यह थी इस मिसाइल की रेंज में पाकिस्तान और चीन के कुछ शहर बीजिंग और शंघाई भी आ सकते हैं। यह मिसाइल भारत के न्यूक्लियर ट्रायड का हिस्सा है और भारत को सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी देती है। इस मिसाइल का टेस्ट होना भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, न्यूक्लियर डिटरेंस पॉलिसी और रणनीतिक संतुलन से सीधे जुड़ा है। खासकर ऐसे समय में, जब भारत के आसपास का सुरक्षा माहौल लगातार चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।

Agni-3 missile test Explained: अग्नि-3 टेस्ट में आखिर हुआ क्या?

6 फरवरी को ओडिशा के चांदीपुर स्थित इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज से अग्नि-3 इंटरमीडिएट रेंज बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण किया गया। यह लॉन्च स्ट्रैटेजिक फोर्सेस कमांड (SFC) की निगरानी में हुआ, जो भारत की परमाणु ताकत को ऑपरेट करने और संभालने की जिम्मेदारी निभाता है।

टेस्ट के दौरान मिसाइल ने तय की गई दूरी तक बिल्कुल सही रास्ते पर उड़ान भरी और अपने सभी तकनीकी और ऑपरेशनल पैरामीटर्स को सफलतापूर्वक साबित किया। रक्षा सूत्रों के मुताबिक, लॉन्च के दौरान मिसाइल की स्पीड, दिशा, कंट्रोल सिस्टम, गाइडेंस और री-एंट्री सभी चीजें बिल्कुल तय मानकों के मुताबिक रहीं।

यह टेस्ट इसलिए भी अहम है क्योंकि अग्नि-3 पहले से ही भारतीय सेना का हिस्सा है। यह 2011 में भारतीय सेना का हिस्सा बनी थी। ऐसे में अग्नि-3 का फिर से टेस्ट करना यह सुनिश्चित करना था कि जरूरत पड़ने पर यह मिसाइल आज भी पूरी तरह भरोसेमंद और तैनाती के लिए तैयार है। (Agni-3 missile test Explained)

अग्नि-3 आखिर है क्या और कितनी है ताकतवर?

अग्नि-3 एक दो-चरण वाली सॉलिड फ्यूल बैलिस्टिक मिसाइल है, जिसे भारत ने पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से डेवलप किया है। इसकी मारक क्षमता करीब 3,000 से 3,500 किलोमीटर तक मानी जाती है। भविष्य में इसकी रेंज को 5,000 किलोमीटर तक बढ़ाया जा सकता है। इस दूरी के साथ अग्नि-3 पूरे पाकिस्तान को, चीन के बड़े हिस्से को यहां तक कि बीजिंग जैसे अहम इलाकों तक और मध्य पूर्व के कई रणनीतिक ठिकानों को कवर करने में सक्षम है। यानी यह मिसाइल भारत को क्षेत्रीय नहीं, बल्कि रणनीतिक स्तर पर मजबूत बनाती है।

इस मिसाइल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम है। इसका पेलोड यानी वारहेड का वजन करीब 1,500 से 2,500 किलोग्राम तक हो सकता है। जरूरत पड़ने पर इसमें पारंपरिक वॉरहेड के साथ-साथ परमाणु वॉरहेड भी लगाया जा सकता है। यह एक न्यूक्लियर कैपेबल मिसाइल है, जिसमें करीब 150 से 250 किलोटन तक की न्यूक्लियर क्षमता वाला वॉरहेड फिट किया जा सकता है। इसी वजह से इसे भारत की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता की रीढ़ माना जाता है।

अग्नि-3 की गति बहुत ज्यादा होती है। टर्मिनल फेज में 5-6 मैक (हाइपरसोनिक स्पीड) पकड़ लेती है, और एंटी-मिसाइल सिस्टम्स को चकमा दे सकती है। जिससे इसे इंटरसेप्ट करना यानी बीच में रोकना दुश्मन के लिए बेहद मुश्किल हो जाता है। (Agni-3 missile test Explained)

अग्नि-3 वजन करीब 50 टन

डिजाइन और स्ट्रक्चर के लिहाज से अग्नि-3 लगभग 17 मीटर लंबी है और इसका वजन करीब 50 टन है। यह एक रोड-मोबाइल मिसाइल है, यानी इसे ट्रक या रेल प्लेटफॉर्म से कहीं भी तैनात करके लॉन्च किया जा सकता है। यह क्षमता इसे दुश्मन के पहले हमले से काफी हद तक सुरक्षित बनाती है, क्योंकि इसकी लोकेशन लगातार बदली जा सकती है और इसे पहले से ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है।

डिजाइन और स्ट्रक्चर के लिहाज से अग्नि-3 लगभग 17 मीटर लंबी है और इसका वजन करीब 50 टन है। यह एक रोड-मोबाइल मिसाइल है, यानी इसे ट्रक या रेल प्लेटफॉर्म से कहीं भी तैनात करके लॉन्च किया जा सकता है। यह क्षमता इसे दुश्मन के पहले हमले से काफी हद तक सुरक्षित बनाती है, क्योंकि इसकी लोकेशन लगातार बदली जा सकती है और इसे पहले से ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है। (Agni-3 missile test Explained)

यह टेस्ट रूटीन नहीं, बल्कि रणनीतिक संदेश क्यों है?

अक्सर लोग सवाल करते हैं कि जब अग्नि-3 पहले से सेना में शामिल है, तो फिर इसका टेस्ट क्यों जरूरी था। इसका जवाब है– ऑपरेशनल रेडीनेस। परमाणु हथियारों और बैलिस्टिक मिसाइलों में सबसे अहम बात यह होती है कि वे आखिरी वक्त तक पूरी तरह भरोसेमंद रहें। सालों तक स्टोरेज में रहने के बाद भी अगर मिसाइल बिना किसी तकनीकी दिक्कत के लॉन्च हो जाए, तो ही वह असली ताकत कहलाती है।

अग्नि-3 का यह टेस्ट यह साबित करता है कि भारत की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता सिर्फ कागजों में नहीं, बल्कि जमीन पर भी पूरी तरह तैयार है। यह दुश्मन देशों को साफ संदेश देता है कि भारत की सेकंड स्ट्राइक क्षमता मजबूत और विश्वसनीय है। (Agni-3 missile test Explained)

भारत की “नो फर्स्ट यूज” पॉलिसी

भारत की परमाणु नीति साफ है– “नो फर्स्ट यूज”। यानी भारत कभी पहले परमाणु हमला नहीं करेगा, लेकिन अगर उस पर हमला हुआ, तो जवाब इतना सख्त होगा कि दुश्मन दोबारा ऐसा सोच भी न सके।

इस नीति में अग्नि-3 जैसी मिसाइलों की भूमिका बेहद अहम हो जाती है। चूंकि यह रोड और रेल मोबाइल है, इसलिए इसे छिपाकर रखा जा सकता है। दुश्मन के पहले हमले में इसे पूरी तरह नष्ट करना आसान नहीं होता। यही वजह है कि अग्नि-3 भारत की सेकंड स्ट्राइक क्षमता को मजबूत बनाती है। (Agni-3 missile test Explained)

चीन और पाकिस्तान के संदर्भ में क्यों अहम है अग्नि-3?

अगर रणनीतिक नजरिए से देखा जाए, तो अग्नि-3 की रेंज और क्षमता सीधे तौर पर चीन और पाकिस्तान दोनों को ध्यान में रखकर बनाई गई है। पाकिस्तान के मामले में अग्नि-3 भारत को पूरी तरह निर्णायक बढ़त देता है, क्योंकि इसकी रेंज में पाकिस्तान का हर रणनीतिक ठिकाना आ जाता है।

चीन के संदर्भ में भी यह मिसाइल बेहद अहम है। इसकी मारक क्षमता चीन के कई अहम सैन्य और औद्योगिक इलाकों तक पहुंचने में सक्षम है। इससे भारत को रणनीतिक संतुलन बनाए रखने में मदद मिलती है, खासकर तब जब चीन अपनी मिसाइल और न्यूक्लियर ताकत लगातार बढ़ा रहा है। (Agni-3 missile test Explained)

अग्नि सीरीज में अग्नि-3 की जगह क्या है?

अग्नि-3, भारत की अग्नि मिसाइल सीरीज का एक अहम हिस्सा है। इस सीरीज में अलग-अलग रेंज की मिसाइलें शामिल हैं, जो मिलकर भारत को फुल स्पेक्ट्रम डिटरेंस देती हैं।

अग्नि-1 और अग्नि-2 कम दूरी के लिए हैं, जबकि अग्नि-4 और अग्नि-5 लंबी दूरी की जरूरतों को पूरा करती हैं। अग्नि-3 इन दोनों के बीच एक मजबूत कड़ी की तरह काम करती है, जो इंटरमीडिएट रेंज में भारत की जरूरतें पूरी करती है। (Agni-3 missile test Explained)

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को क्या फायदा?

अग्नि-3 जैसे सफल टेस्ट भारत को उन चुनिंदा देशों की कतार में खड़ा करते हैं, जिनके पास भरोसेमंद इंटरमीडिएट रेंज बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता है। यह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत करता है और दुनिया को दिखाता है कि भारत अपनी सुरक्षा जरूरतों के लिए किसी पर निर्भर नहीं है।

साथ ही, यह टेस्ट ऐसे समय में हुआ है जब वैश्विक राजनीति में सैन्य ताकत का महत्व फिर से बढ़ गया है। ऐसे में भारत की यह क्षमता उसे एक जिम्मेदार लेकिन मजबूत शक्ति के तौर पर स्थापित करती है। (Agni-3 missile test Explained)

अग्नि-3 का यह टेस्ट सिर्फ एक तकनीकी उपलब्धि नहीं है। यह भारत की रणनीतिक सोच, आत्मनिर्भर रक्षा नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा की रीढ़ को मजबूत करने वाला कदम है।

यह टेस्ट यह भरोसा देता है कि भारत की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता आज भी उतनी ही मजबूत और भरोसेमंद है, जितनी उसे होना चाहिए। बदलते सुरक्षा हालात में, अग्नि-3 जैसी मिसाइलें भारत को न सिर्फ सुरक्षित बनाती हैं, बल्कि दुश्मनों को साफ संदेश भी देती हैं कि भारत किसी भी चुनौती का जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार है। (Agni-3 missile test Explained)

114 राफेल जेट डील से पहले नया ट्विस्ट, अमेरिकी कानून के घेरे में आ सकता है राफेल!

Rafale ITAR impact on India

Rafale ITAR impact on India: राफेल फाइटर जेट के लिए अहम पार्ट बनाने वाली एक फ्रांसीसी कंपनी को अब एक अमेरिकी कंपनी ने खरीद लिया है। इसके बाद सवाल उठने लगे हैं कि क्या राफेल अब अमेरिका के आईटीएआर (इंटरनेशनल ट्रैफिक इन आर्म्स रेगुलेशंस) कानून के दायरे में आ सकता है। अगर ऐसा हुआ, तो इसका असर सिर्फ फ्रांस पर नहीं, बल्कि भारत जैसे उन देशों पर भी पड़ सकता है, जिन्होंने राफेल खरीदा है या खरीदने की तैयारी कर रहे हैं।

यह मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि भारत इस समय राफेल से जुड़ी दो बड़ी योजनाओं पर काम कर रहा है- एक तरफ वायुसेना के लिए 114 नए राफेल लड़ाकू विमानों का प्रस्ताव है और दूसरी तरफ नौसेना के लिए राफेल मरीन की डील पर अमल शुरू हो चुका है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि असल मामला क्या है और भारत के लिए इसमें कितना जोखिम है। (Rafale ITAR impact on India)

Rafale ITAR impact on India: आईटीएआर-फ्री रहा है राफेल

मल्टी-रोल फाइटर जेट राफेल को फ्रांस की कंपनी दसॉ एविएशन बनाती है। यह विमान हवा से हवा, हवा से जमीन, समुद्री हमलों और यहां तक कि न्यूक्लियर मिशन के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है। राफेल की सबसे बड़ी खासियत यह मानी जाती रही है कि यह “आईटीएआर-फ्री” है।

आईटीएआर-फ्री होने का मतलब यह है कि इसमें अमेरिकी तकनीक या अमेरिकी कंट्रोल वाले पार्ट्स नहीं लगे होते। इसलिए अगर कोई देश राफेल खरीदता है, तो उसे अमेरिका से अलग से मंजूरी लेने की जरूरत नहीं पड़ती। यही वजह है कि भारत, मिस्र, ग्रीस, इंडोनेशिया जैसे देशों ने राफेल को खरीदा। (Rafale ITAR impact on India)

फ्रांसीसी सप्लायर को अमेरिका ने खरीदा

दिसंबर 2025 में अमेरिका की लोअर ग्रुप नाम की कंपनी ने फ्रांस की एलएमबी एयरोस्पेस नामक कंपनी को करीब 433 मिलियन डॉलर में खरीद लिया। एलएमबी एयरोस्पेस एक छोटी लेकिन रणनीतिक कंपनी है, जो हाई-परफॉर्मेंस फैंस और ब्रशलेस मोटर्स बनाती है। ये वही पार्ट्स हैं, जो राफेल के कूलिंग सिस्टम में इस्तेमाल होते हैं। इसके अलावा ये पार्ट्स फ्रांस की न्यूक्लियर सबमरींस में भी लगते हैं।

इस साल जनवरी में फ्रांसीसी सरकार ने इस सौदे को मंजूरी दे दी, लेकिन फ्रांस की संसद में इस पर जबरदस्त विरोध हुआ। विपक्षी नेताओं ने कहा कि इससे फ्रांस की डिफेंस आटोनॉमी खतरे में पड़ सकती है। उनका तर्क था कि अगर कोई अमेरिकी कंपनी किसी अहम सप्लायर की मालिक बन जाती है, तो भविष्य में उस पर अमेरिकी कानून लागू हो सकते हैं। (Rafale ITAR impact on India)

आईटीएआर क्या है और इससे डर क्यों लगता है?

आईटीएआर यानी इंटरनेशनल ट्रैफिक इन आर्म्स रेगुलेशंस अमेरिका का एक सख्त कानून है। इसके तहत अमेरिका यह तय करता है कि उसके कंट्रोल में आने वाली रक्षा तकनीक या पार्ट्स किस देश को दिए जा सकते हैं, किस शर्त पर दिए जा सकते हैं और किन हालात में रोके जा सकते हैं।

अगर किसी वेपन सिस्टम का कोई भी अहम हिस्सा आईटीएआर के दायरे में आ जाता है, तो उसके एक्सपोर्ट, अपग्रेड या थर्ड पार्टी ट्रांसफर के लिए अमेरिकी मंजूरी जरूरी हो जाती है। कई देशों का अनुभव रहा है कि संकट या राजनीतिक मतभेद के समय अमेरिका इस कानून का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए करता है।

राफेल की बिक्री में फ्रांस अब तक यह भरोसा देता रहा है कि यह विमान पूरी तरह से अमेरिकी प्रभाव से मुक्त है। लेकिन एलएमबी एयरोस्पेस की अमेरिकी खरीद के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या भविष्य में राफेल के कुछ पार्ट्स पर आईटीएआर लागू हो सकता है। (Rafale ITAR impact on India)

क्या राफेल तुरंत आईटीएआर के तहत आ जाएगा?

डिफेंस सूत्रों और विशेषज्ञों की राय में इसका जवाब है- नहीं, कम से कम तुरंत नहीं। सिर्फ कंपनी का मालिक बदल जाने से किसी सिस्टम की कानूनी स्थिति अपने आप नहीं बदलती। मौजूदा राफेल विमानों पर इसका कोई तात्कालिक असर नहीं पड़ेगा।

लेकिन चिंता भविष्य को लेकर है। अगर आने वाले समय में एलएमबी के बनाए पार्ट्स को अमेरिकी कानूनों के तहत “डिफेंस क्रिटिकल” घोषित किया गया, या उनमें अमेरिकी तकनीक जोड़ी गई, तो आईटीएआर लागू हो सकता है। अमेरिका का पिछला रिकॉर्ड बताता है कि वह नियमों की व्याख्या अपने हित में करता है, जिससे अनिश्चितता बनी रहती है। (Rafale ITAR impact on India)

फ्रांस में क्यों मचा राजनीतिक बवाल?

फ्रांस में राफेल सिर्फ एक विमान नहीं, बल्कि राष्ट्रीय गर्व का प्रतीक है। फ्रांसीसी नेता अक्सर कहते हैं कि राफेल खरीदने का मतलब है वॉशिंगटन से आजादी। यही वजह है कि संसद में लगभग सभी दलों ने इस सौदे पर सवाल उठाए।

सरकार का कहना है कि उसने सौदे में सख्त शर्तें लगाई हैं। जैसे कि एलएमबी की मैन्युफैक्चरिंग फ्रांस में ही रहेगी, फ्रांसीसी मिलिट्री कॉन्ट्रैक्ट्स सुरक्षित रहेंगे और सरकार के पास वीटो का अधिकार होगा। लेकिन आलोचकों को डर है कि कागजों की शर्तें भविष्य की राजनीतिक हकीकत के सामने कमजोर पड़ सकती हैं। (Rafale ITAR impact on India)

भारत के लिए इसका क्या मतलब है?

भारत के पास इस समय 36 राफेल विमान हैं, जो भारतीय वायुसेना की ताकत का अहम हिस्सा हैं। इसके अलावा भारत ने 2025 में नौसेना के लिए 26 राफेल मरीन विमानों की डील साइन की है, जो स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत पर तैनात होंगे।

सबसे बड़ा मामला 114 नए राफेल विमानों का है, जिन पर करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। भारत ने राफेल को इसलिए चुना था क्योंकि यह अमेरिकी नियंत्रण से मुक्त माना जाता था। अगर भविष्य में आईटीएआर की आशंका बढ़ती है, तो भारत के लिए स्पेयर्स, अपग्रेड और लॉन्ग-टर्म सपोर्ट को लेकर सवाल खड़े हो सकते हैं।

हालांकि, जानकारों का कहना है कि भारत के साथ फ्रांस का रिश्ता रणनीतिक है और फ्रांस भारत को भरोसे में लिए बिना कोई कदम नहीं उठाएगा। फिर भी, यह एक ऐसा जोखिम है जिसे पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। (Rafale ITAR impact on India)

अन्य देशों पर क्या असर पड़ सकता है?

राफेल सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि कई देशों की वायुसेना का अहम हिस्सा है। मिस्र, ग्रीस, इंडोनेशिया जैसे देश भी इसे इसलिए चुनते हैं क्योंकि इसमें अमेरिकी दखल नहीं होता। अगर यह धारणा कमजोर पड़ती है, तो राफेल की भविष्य की एक्सपोर्ट अपील पर असर पड़ सकता है।

हालांकि फ्रांस के पास कुछ विकल्प हैं। वह या तो वैकल्पिक सप्लायर्स खोज सकता है, या एलएमबी एयरोस्पेस के मामलों में सख्त सरकारी नियंत्रण बनाए रख सकता है। भारत के लिए जरूरी है कि वह किसी भी नई डील में आईटीएआर से जुड़े क्लॉज को साफ-साफ समझे और अपने हित सुरक्षित रखे।

फिलहाल, फरवरी 2026 तक की स्थिति में कोई तात्कालिक खतरा नहीं दिखता। लेकिन आज के दौर में डिफेंस डील सिर्फ हथियार खरीदने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सप्लाई चेन और कानून भी उतने ही अहम हो गए हैं। लेकिन अमेरिकी कंपनी की खरीद ने यह दिखा दिया है कि ग्लोबल डिफेंस इंडस्ट्री में एक छोटा सा बदलाव भी बड़े रणनीतिक सवाल खड़े कर सकता है। (Rafale ITAR impact on India)