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Exercise Trishul: भारतीय सेना की दक्षिणी कमान ने दिखाई ‘फ्यूचर-रेडी फोर्स’ की ताकत, एक्सरसाइज त्रिशूल में जमीन से लेकर समंदर तक में दिखा तीनों सेनाओं का जबरदस्त तालमेल

Exercise Trishul
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Exercise Trishul: भारतीय सेना की दक्षिणी कमान इन दिनों ट्राई सर्विसेज जॉइंट एक्सरसाइज त्रिशूल में हिस्सा ले रही है। दक्षिणी कमान के नेतृत्व में आयोजित 13 नवंबर तक चलने वाले इस अभ्यास का मकसद यह दिखाना है कि भारत की सेनाएं जमीन, समुद्र और आसमान तीनों जगह एक साथ काम कर सकती हैं और किसी भी स्थिति में देश की सुरक्षा के लिए तैयार हैं।

Exercise Trishul: दो बड़े रेगिस्तानी अभियान मरुज्वाला और अखंड प्रहार

थार रेगिस्तान से लेकर सौराष्ट्र तट तक चले इस मेगा मिलिट्री एक्सरसइज में भारतीय सेनाओं ने अपने सामूहिक कौशल का प्रदर्शन किया। थार के मरुस्थल में दक्षिणी कमान की थार रैप्टर ब्रिगेड, सुदर्शन चक्र कोर और कोणार्क कोर की टुकड़ियों ने मिलकर संयुक्त युद्धाभ्यास किया।

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यह अभ्यास दक्षिणी कमान के दो बड़े रेगिस्तानी अभियानों मरुज्वाला और अखंड प्रहार का हिस्सा था। इन अभियानों में जमीनी और हवाई दोनों प्रकार के अभ्यास शामिल रहे, जिनका उद्देश्य था संयुक्त रणनीतियों को परखना और वास्तविक युद्ध जैसी परिस्थितियों में तालमेल को मजबूत करना।

एक्सरसाइज त्रिशूल में आधुनिक युद्ध की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कई मिशन किए गए। इसमें इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, साइबर ऑपरेशन, ड्रोन और एंटी-ड्रोन तकनीक, इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस मिशन, और एयर डिफेंस कंट्रोल शामिल थे। इसके साथ ही जॉइंट फायर इंटीग्रेशन यानी जमीनी और हवाई ताकत की सामूहिक क्षमता को भी परखा गया।

इस अभ्यास के जरिए भारतीय सेना ने दिखाया कि वह सिर्फ भौतिक युद्ध नहीं, बल्कि वर्चुअल डोमेन में भी अपनी ताकत दिखाने की क्षमता रखती है।

त्रिशूल का मंत्र “जय”

अभ्यास त्रिशूल का मुख्य मंत्र रहा “जय” यानी जॉइंटनेस, आत्मनिर्भरता एंड इनोवेशन। इसका मतलब है कि तीनों सेनाओं के बीच आपसी तालमेल के साथ, देशी तकनीक पर भरोसा और नए विचारों का प्रयोग ही भारत की डिफेंस पॉलिसी की दिशा तय कर रहे हैं।

त्रिशूल अभ्यास ने इस बात को साबित किया कि भारत अब आत्मनिर्भर सैन्य क्षमता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

कच्छ से सौराष्ट्र तक संयुक्त अभियान

अभ्यास का अगला चरण कच्छ सेक्टर में हुआ, जिसमें भारतीय थलसेना, नौसेना, वायुसेना, कोस्ट गार्ड और सीमा सुरक्षा बल ने मिलकर ऑपरेशन चलाया। यह अभ्यास नागरिक प्रशासन के साथ मिलिट्री-सिविल फ्यूजन के दृष्टिकोण पर आधारित था। इसका उद्देश्य था आपात स्थितियों में सेना और नागरिक एजेंसियों के बीच तेजी से कॉर्डिनेशन बनाना और राष्ट्रीय सुरक्षा के इंटीग्रेटेड फ्रेमवर्क को मजबूत करना है।

सौराष्ट्र तट पर एंफीबियस एक्सरसाइज

अभ्यास का अंतिम चरण सौराष्ट्र तट के पास समुद्र में हुआ। इस दौरान भारतीय सेना और नौसेना की एंफीबियस टुकड़ियों ने समुद्र तट पर उतरने का वास्तविक अभ्यास किया, जिसे बीच लैंडिंग ऑपरेशन कहा जाता है। यह अभ्यास समुद्र से जमीन पर उतरकर हमले की तैयारी और संयुक्त योजना की सफलता को परखने के लिए किया गया।

इस मौके पर भारतीय नौसेना के जहाजों, हेलिकॉप्टरों और एंफीबियस व्हीकल्स का शानदार प्रदर्शन देखने को मिला, जो भारत की लैंड–सी–एयर इंटीग्रेशन क्षमता को साबित करता है।

भारतीय सेना की दक्षिणी कमान ने कहा कि यह अभ्यास न सिर्फ जॉइंट आपरेशंस की क्षमता का परीक्षण था, बल्कि यह सशस्त्र बलों की उस प्रतिबद्धता का भी प्रतीक है जिसमें वे खुद को लगातार बदलते युद्ध के स्वरूप के अनुरूप तैयार कर रहे हैं। अभ्यास त्रिशूल को भारतीय सेना की डिकेड ऑफ ट्रांसफॉर्मेशन पहल का हिस्सा बताया गया है।

इस पहल के पांच स्तंभ हैं, जॉइंटनेस एंड इंटीग्रेशन, फोर्स रिस्ट्रक्चरिंग, मॉडर्नाइजेशन एंड टेक इन्फ्यूजन,
प्रणालियों और प्रक्रियाओं में सुधार और मानव संसाधन कौशल में बढ़ोतरी है।

‘फ्यूचर-रेडी फोर्स’ बनने की दिशा

भारतीय सेना ने यह दोहराया कि वह एक फ्यूचर-रेडी फोर्स के तौर पर तैयार हो रही है, यानी ऐसी सेना जो भविष्य के युद्धों की चुनौतियों से निपटने में सक्षम हो। दक्षिणी कमान की यह जॉइंट एक्सरसाइज इस बात का प्रमाण है कि भारतीय सेनाएं किसी भी परिस्थिति में एकजुट होकर, उच्च तकनीकी क्षमता और रणनीतिक दक्षता के साथ कार्य कर सकते हैं।

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Pakistan Commander of Defence Forces

Pakistan Commander of Defence Forces: पाकिस्तान ने अपने सैन्य ढांचे में बड़ा सुधार करने की योजना बनाई है, जिसमें एक नया पद कमांडर ऑफ डिफेंस फोर्सेस (सीडीएफ) बनाया जाएगा। यह पद भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) की तरह होगा, जिसका मकसद तीनों सेनाओं थल सेना, नौसेना और वायुसेना के बीच बेहतर तालमेल और इंटीग्रेटेड कमान बनाना है।

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यह प्रस्ताव 27वें संविधान संशोधन के तहत संसद में पेश किया जाएगा। पाकिस्तान के रक्षा मंत्रालय का कहना है कि यह बदलाव “आधुनिक युद्ध की जरूरतों और हाल के भारत-पाक संघर्ष से मिले सबक” के आधार पर किया जा रहा है।

Pakistan Commander of Defence Forces: भारत से प्रेरित पाकिस्तान का नया सैन्य मॉडल

मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर के बाद इस्लामाबाद ने यह तय किया कि उसकी तीनों सेनाओं को इंटीग्रेटेड कमांड के तहत काम करने की जरूरत है। यह वही रणनीतिक सोच है, जिसने भारत को 2019 में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का पद बनाने के लिए प्रेरित किया था। पाकिस्तान के अखबार द न्यूज के अनुसार, नया कमांडर ऑफ डिफेंस फोर्सेस पद उसी तर्ज पर तैयार किया जा रहा है।

Pakistan Commander of Defence Forces: पाकिस्तान के संविधान में बड़ा बदलाव

यह नया पद पाकिस्तान के संविधान के आर्टिकल 243 में संशोधन करके लाया जाएगा। अभी तक यह अनुच्छेद कहता है कि सशस्त्र बलों की सर्वोच्च कमान राष्ट्रपति के पास है और नियंत्रण संघीय सरकार के हाथों में। लेकिन अब इस कमान स्ट्रक्चर को बदलने की योजना है ताकि सीडीएफ को केंद्रीय भूमिका मिल सके।

Pakistan Commander of Defence Forces: रक्षा मंत्री ने की पुष्टि

पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने मीडिया से बात करते हुए पुष्टि की कि सरकार आर्टिकल 243 में बदलाव पर विचार कर रही है। उन्होंने कहा, रक्षा जरूरतें बदल गई हैं। इसीलिए कानून में संशोधन की जरूरत महसूस की जा रही है। यह पूरा काम आपसी सलाह-मशवरे से किया जाएगा।” इस बयान के बाद यह लगभग स्पष्ट हो गया है कि पाकिस्तान अब अपनी सशस्त्र सेनाओं के ढांचे में एक नया शीर्ष पद जोड़ने जा रहा है, जो तीनों सेनाओं को एक छतरी के नीचे लाएगा।

संसद में आएगा 27वां संशोधन

पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने घोषणा की कि सरकार जल्द ही 27वें संविधान संशोधन को संसद में पेश करेगी। हालांकि अभी इस संशोधन का आधिकारिक ड्राफ्ट सार्वजनिक नहीं हुआ है, लेकिन रिपोर्ट्स के मुताबिक इसके प्रमुख बिंदुओं में आर्टिकल 243 में बदलाव का प्रस्ताव शामिल है। मौजूदा आर्टिकल 243 के अनुसार, संघीय सरकार सशस्त्र बलों की कमान और नियंत्रण रखेगी, और राष्ट्रपति देश की सर्वोच्च कमान के पद पर होंगे।”

नए संशोधन के जरिये यह तय किया जा सकता है कि कमांडर ऑफ डिफेंस फोर्सेस इस कमान स्ट्रक्चर में केंद्रीय भूमिका निभाएंगे, जिससे तीनों सेनाओं के बीच तुरंत फैसले और ऑपरेशनल कॉर्डिनेशन बनाया जा सके।

फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के हाथों में और पावर

रिपोर्टों में कहा गया है कि पाकिस्तान सरकार द्वारा लाया जा रहा यह बदलाव फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की भूमिका को और मजबूत करेगा। पाकिस्तान में पहले भी यह चर्चा रही है कि सेना प्रमुख ही देश की असली शक्ति केंद्र है, लेकिन अब संवैधानिक संशोधन के जरिये इस भूमिका को कानूनी रूप से वैध बनाने की कोशिश हो रही है।

सेना और सरकार के बीच नई साझी कमान

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, पाकिस्तान के नए प्रस्ताव में भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जैसे मॉडल की झलक दिखती है। भारत ने इसे 2019 में अपनाया था। इस पद के जरिये पाकिस्तान की तीनों सेनाएं एकीकृत तरीके से काम करेंगी, ताकि संकट की स्थिति में तेजी से सैन्य कार्रवाई हो सके।

सूत्रों के मुताबिक, इस नई प्रणाली के तहत सीडीएफ सीधे प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति दोनों को रिपोर्ट करेगा, लेकिन व्यवहारिक रूप से उसकी शक्ति फील्ड मार्शल के हाथों में ही रहेगी।

अगर यह संशोधन पारित होता है, तो यह पाकिस्तान की सैन्य-संविधान व्यवस्था में सबसे बड़ा बदलाव माना जाएगा। इससे सेना को संविधान में एक औपचारिक स्थान मिलेगा और नागरिक सरकार की भूमिका सीमित हो सकती है।

विशेषज्ञों ने जताई चिंता

पाकिस्तान में संविधान विशेषज्ञों और विपक्षी दलों ने इस प्रस्ताव पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि यह कदम लोकतांत्रिक प्रणाली को कमजोर कर सकता है और सेना की शक्ति को संवैधानिक दर्जा देकर सिविल-मिलिट्री संतुलन को असंतुलित करेगा।

पख्तून नेता मोहन डावर ने इसे “18वें संशोधन को पलटने की कोशिश” बताया है। 18वें संशोधन ने प्रांतों को प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार दिए थे, जिससे सेना का नियंत्रण सीमित हो गया था।

रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि पंजाब, सिंध और के-पी के राजनीतिक समीकरण इस संशोधन को किस तरह देखते हैं, यह भी अहम होगा। 18वें संशोधन के बाद प्रांतों को जो आर्थिक शक्ति मिली थी, उससे मिलिट्री को राष्ट्रीय संसाधन पर सीमित पहुंच होने की शिकायत रही है। अब जो बदलाव सुझाए जा रहे हैं, उनमें एनएफसी से जुड़ी शक्तियों में फेरबदल भी शामिल बताया जा रहा है ताकि रक्षा निवेश और परियोजनाओं पर केंद्रीय नियंत्रण कायम किया जा सके।

27वें संशोधन के प्रमुख बिंदु

हालांकि आधिकारिक मसौदा अभी सामने नहीं आया, लेकिन पाकिस्तानी मीडिया में लीक हुए कुछ अंश बताते हैं कि प्रस्तावित संशोधन में ये बातें शामिल हो सकती हैं। इनमें कमांडर ऑफ डिफेंस फोर्सेस का नया पद, जो तीनों सेनाओं की एकीकृत कमान संभालेगा। सेना प्रमुख को फील्ड मार्शल के रूप में पांच साल का निश्चित कार्यकाल दिया जा सकता है। इसके अलावा सेना और खुफिया एजेंसियों की नियुक्ति का अधिकार फील्ड मार्शल को दिए जा सकते हैं। साथ ही आर्टिकल 243 में संशोधन करके सशस्त्र बलों के नियंत्रण की परिभाषा भी बदली जा सकती है।

पाकिस्तान के लिए बदलता शक्ति समीकरण

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि 27वां संशोधन पाकिस्तान की पावर स्ट्रक्चर को स्थायी रूप से बदल सकता है। अगर यह प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो पाकिस्तान का सैन्य ढांचा एक नए केंद्रीकृत मॉडल में बदल जाएगा, जहां फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को “कमांडर ऑफ डिफेंस फोर्सेस” और वास्तविक शक्ति की भूमिका मिलेगी।

इसके अलावा, चर्चा यह भी है कि प्रस्तावित बदलावों में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जैसे पदों और जॉइंट कमान स्ट्रक्चर को नया स्वरूप दिया जा सकता है। कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि ज्वाइंट चीफ्स की भूमिका बदल सकती है और नए उप-सेना प्रमुख या समांतर पद बन सकते हैं जो सीधे फील्ड मार्शल या कमांडर ऑफ डिफेंस फोर्सेस के अधीन होंगे।

भारत के सीडीएस मॉडल से समानता

विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान का नया सीडीएफ पद भारत के सीडीएस मॉडल से काफी मिलता-जुलता है। दोनों देशों में इसका मुख्य उद्देश्य तीनों सेनाओं के बीच जॉइंटनेस और इंटीग्रेटेड कमांड स्ट्रक्चर को मजबूत करना है।

भारत में सीडीएस को 2019 में कारगिल युद्ध और अन्य अनुभवों से सबक लेकर बनाया गया था। पाकिस्तान ने अब 2025 के संघर्ष के बाद यही रास्ता अपनाने का फैसला किया है। पाकिस्तान में यह पद मौजूदा चेयरमैन जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमिटी (सीजेसीएससी) की जगह ले सकता है। यह नया पद तीनों सेनाओं का टॉप कॉर्डिनेटर होगा, जैसा भारत में सीडीएस करते हैं।

लेकिन फर्क भी हैं

भारत में सीडीएस चार-सितारा जनरल होता है, जो रक्षा मंत्रालय के डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स का सचिव होता है। सीडीएस रक्षा नीति, प्रशिक्षण और संसाधन आवंटन से जुड़े मुद्दों पर प्राथमिकता तय करता है, लेकिन तीनों सेनाओं की ऑपरेशनल कमांड अभी भी उनके-अपने प्रमुखों के पास रहती है।

इसके विपरीत, पाकिस्तान में प्रस्तावित सीडीएफ को संविधान के अनुच्छेद 243 के तहत कानूनी अधिकार दिए जा सकते हैं, जिससे वह सीधे तीनों सेनाओं की कमान संभाल सकेगा। यह बदलाव सेना प्रमुख को अभूतपूर्व शक्ति देगा और नागरिक सरकार की निगरानी कम कर सकता है।

ISI Taliban Clash: अफगानिस्तान और आईएसआई में इस्तांबुल में जबरदस्त टकराव, पाकिस्तान पर ‘शरणार्थियों’ के भेष में ISKP आतंकी भेजने का आरोप

ISI Taliban Clash

ISI Taliban Clash: तुर्की की राजधानी इस्तांबुल में 6-7 नवंबर को पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच हुई उच्चस्तरीय बातचीत फिर एक बार बिना किसी नतीजे के खत्म हो गई। इस बैठक में अफगानिस्तान ने पाकिस्तान पर आरोप लगाए हैं कि पाकिस्तान शरणार्थियों के नाम पर इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत (आईएसकेपी) के आतंकियों की घुसपैठ करा रहा है। जबकि पाकिस्तान ने पूरी बातचीत को केवल तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) तक सीमित रखने की कोशिश की। इस बैठक में दोनों देशों के खुफिया एजेंसियों के प्रमुख शामिल हुए थे।

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सूत्रों के मुताबिक, यह बातचीत कतर और तुर्की के मध्यस्थता में आयोजित की गई थी। पाकिस्तान की ओर से इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) के डायरेक्टर जनरल लेफ्टिनेंट जनरल आसिम मलिक, जबकि अफगानिस्तान की तरफ से जनरल डायरेक्टरेट ऑफ इंटेलिजेंस (जीडीआई) के प्रमुख मौलवी अब्दुलहक वसीक शामिल हुए थे।

ISI Taliban Clash: तीसरे दौर की बातचीत में नहीं निकला कोई हल

यह इस्तांबुल में दोनों देशों के बीच तीसरा दौर था। इससे पहले दोनों देशों के बीच दो दौर की बातचीत 25 अक्टूबर को इस्तांबुल और 29 अक्टूबर को दोहा में हुई थी। लेकिन इस बार बातचीत का माहौल बिल्कुल अलग था। लेकिन बातचीत शुरू होते ही माहौल तनावपूर्ण हो गया। पाकिस्तान की तरफ से कहा गया कि केवल टीटीपी से संबंधित मुद्दे ही एजेंडा में शामिल होंगे।

अफगानिस्तान ने इसका कड़ा विरोध करते हुए कहा कि यह “बातचीत नहीं, थोपना” है। एक अफगान अधिकारी ने बताया, “जब एक पक्ष चाहता है कि सारा दोष दूसरे पर डाला जाए, तो कोई रचनात्मक बातचीत संभव नहीं है।”

ISI Taliban Clash: अफगानिस्तान का आरोप- पाकिस्तान ‘शरणार्थियों को बना रहा है हथियार’

अफगान प्रतिनिधियों ने बैठक के दौरान पाकिस्तान पर गंभीर आरोप लगाए कि वह अफगान शरणार्थियों की वापसी के नाम पर इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत के आतंकियों को अफगान सीमा में भेज रहा है। अफगान खुफिया अधिकारियों ने दावा किया कि उन्होंने ऐसे कई रास्तों का पता लगाया है जहां से आईएसकेपी के आतंकी पाकिस्तान की ओर से घुसपैठ कर रहे हैं।

अफगानिस्तान के एक वार्ताकार ने कहा, “पाकिस्तान केवल हमारे लोगों को वापस नहीं भेज रहा, बल्कि शरणार्थियों की आड़ में आतंकियों को भेज रहा है। यह एक मानवीय संकट को सुरक्षा खतरे में बदलने की कोशिश है।”

अफगान खुफिया अधिकारियों ने इस बात के पुख्ता सबूत भी दिखाए कि कैसे पाकिस्तान की सीमा पार से कुछ आतंकवादी “ड्यूरंड लाइन” पार कर अफगानिस्तान में घुस रहे हैं। यह वही लाइन है जिसे अफगानिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा नहीं मानता।

काबुल ने यह भी कहा कि पाकिस्तान की यह कार्रवाई राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा है। अफगान पक्ष ने पाक प्रधानमंत्री अनवार-उल-हक काकर के 2024 के उस बयान का हवाला दिया जिसमें उन्होंने स्वीकार किया था कि शरणार्थियों की वापसी का इस्तेमाल काबुल पर दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है ताकि वह टीटीपी पर कार्रवाई करे।

व्यापारिक मार्गों पर भी विवाद

अफगान वार्ताकारों के अनुसार, पाकिस्तान की यह रणनीति अफगानिस्तान की कमजोर अर्थव्यवस्था को तोड़ने और उसकी सुरक्षा को खतरे में डालने की कोशिश है। उन्होंने इस कदम को “आर्थिक युद्ध” कहा और कहा कि पाकिस्तान जानबूझकर व्यापारिक रास्तों को बंद कर अफगान व्यापार को कमजोर कर रहा है।

काबुल ने कहा कि पाकिस्तान बार-बार तोर्खम और स्पिन बोल्डक जैसे व्यापारिक मार्गों को बंद कर देता है, जिससे अफगान अर्थव्यवस्था को बड़ा नुकसान होता है। अफगान प्रतिनिधियों ने कहा कि ये बार-बार बंद होने वाले मार्ग न सिर्फ व्यापार को नुकसान पहुंचाते हैं, बल्कि उन मरीजों को भी प्रभावित करते हैं जिन्हें इलाज के लिए पाकिस्तान जाना होता है।

अफगानिस्तान ने ड्रोन गतिविधियों पर भी आपत्ति जताई

इस्तांबुल वार्ता के दौरान अफगान पक्ष ने एक और गंभीर मुद्दा उठाया। अफगानिस्तान ने यह भी आरोप लगाया कि पाकिस्तान अमेरिका को अपने हवाई क्षेत्र से अफगानिस्तान के ऊपर ड्रोन उड़ाने की अनुमति दे रहा है, जिससे अफगान संप्रभुता का उल्लंघन हो रहा है।

अफगानिस्तान ने पाकिस्तान पर यह भी आरोप लगाया कि वह आईएसकेपी के नेटवर्क को खत्म करने के प्रति गंभीर नहीं है। अफगान प्रतिनिधियों ने कहा कि बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में आईएसकेपी की गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं, और पाकिस्तान की चुप्पी पूरे क्षेत्र की सुरक्षा के लिए खतरा बन रही है।

अफगानिस्तान ने लगाया ‘राजनीतिक साजिश’ का आरोप

अफगान अधिकारियों ने यह भी कहा कि पाकिस्तान अब भी उन राजनीतिक समूहों को संरक्षण दे रहा है जो काबुल सरकार के विरोधी हैं, इनमें मसूद परिवार और अन्य निर्वासित नेता शामिल हैं। अफगानिस्तान ने इसे “अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप” बताया और कहा कि इस तरह की गतिविधियां

अफगानिस्तान ने कहा कि पाकिस्तान इन समूहों को सम्मेलन आयोजित करने और मीडिया में बयान देने के लिए मंच उपलब्ध करा रहा है, जिससे देश में जातीय विभाजन और अस्थिरता बढ़ रही है। काबुल ने चेतावनी दी कि इस तरह की गतिविधियां अफगानिस्तान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप हैं और यह उन सिद्धांतों के खिलाफ हैं जिनकी रक्षा दोनों देश करने का दावा करते हैं।

पाकिस्तान ने सभी आरोपों से किया इनकार

आईएसआई प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल आसिम मलिक ने अफगानिस्तान के सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि बातचीत का विषय केवल टीटीपी है। इस्लामाबाद ने कहा कि अफगानिस्तान को अपनी जमीन पर मौजूद टीटीपी आतंकियों की जिम्मेदारी लेनी होगी और उन्हें “नष्ट” करना होगा।

पाकिस्तानी प्रतिनिधियों ने कहा कि “शरणार्थी, व्यापार और ड्रोन” जैसे मुद्दे इस दौर की बातचीत का हिस्सा नहीं हैं। अफगान पक्ष ने इसे “तानाशाही रवैया” बताया और कहा कि पाकिस्तान “बातचीत नहीं, आदेश दे रहा है।”

कतर पर पक्षपात का आरोप, तुर्की ने साधी चुप्पी

इस बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे कतर पर पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के पक्ष में झुकाव का आरोप लगाया। पाक मीडिया में आई लीक रिपोर्ट्स में कहा गया कि कतर अफगानिस्तान का समर्थन कर रहा है। हालांकि, कतर ने इस आरोप पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी। तुर्की ने भी इस पर टिप्पणी करने से इंकार कर दिया।

एक पश्चिमी राजनयिक ने कहा कि पाकिस्तान यह आरोप इसलिए लगा रहा है ताकि बातचीत के असफल होने की जिम्मेदारी पहले से कतर पर डाली जा सके।

ISI Taliban Clash एक अफगान अधिकारी ने इस्तांबुल बैठक के बाद कहा, “अगर पाकिस्तान इसी तरह दोष मढ़ता रहा, तो अब बात करने के लिए कुछ नहीं बचेगा।”

Defence Projects in Ladakh: लद्दाख के चुशुल में बनेगा ब्रिगेड मुख्यालय और काउंटर इंसरजेंसी फोर्स के लिए ट्रेनिंग नोड, 12 डिफेंस प्रोजेक्ट्स को मंजूरी

Defence Projects in Ladakh

Defence Projects in Ladakh: भारत सरकार ने लद्दाख में 12 अहम डिफेंस प्रोजेक्टस को मंजूरी दी है। नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ की स्टैंडिंग कमेटी ने इन परियोजनाओं को स्वीकृति दी है। रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि ये परियोजनाओं को मंजूरी मिलने से भारत की ऑपरेशनल तैयारियों को मजबूती मिलेगी। खासकर ऐसे समय में जब चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी लगातार इस इलाके अपना इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ा रहा है।

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यह फैसला हाल ही में हुई बैठक में लिया गया, जिसकी अध्यक्षता केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने की थी। इन परियोजनाओं में चुशुल में ब्रिगेड मुख्यालय, लेह में आर्मी कैंप, गोला-बारूद भंडारण केंद्र, आर्टिलरी बेस और एक ट्रेनिंग नोड शामिल है। साथ ही अरुणाचल प्रदेश के ईगलनेस्ट वाइल्डलाइफ सेंचुरी में एक स्थायी पुल बनाने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दी गई है।

Defence Projects in Ladakh: पैंगोंग झील से चुशुल तक कई प्रोजेक्ट्स

रक्षा मंत्रालय ने कहा कि इन परियोजनाओं का मुख्य उद्देश्य सीमावर्ती क्षेत्रों में सैनिकों की तैनाती और लॉजिस्टिक सपोर्ट को बेहतर बनाना है। खासकर पैंगोंग त्सो झील से लेकर माउंट ग्या तक फैले क्षेत्र में तैनात काउंटर इंसरजेंसी फोर्स के लिए एक ट्रेनिंग नोड स्थापित किया जाएगा।

Eastern Ladakh: हानले से फोटी ला तक सेना की तैयारियां होंगी और मजबूत, गोला-बारूद भंडारण के लिए सरकार से मिली बड़ी मंजूरी

सूत्रों ने कहा, “क्षेत्र में पीएलए की बढ़ती सक्रियता को देखते हुए, हाई लेवल ऑपरेशनल तैयारियां बेहद जरूरी हैं। इसके लिए 15,000 फीट की ऊंचाई पर सुपर हाई एल्टीट्यूड ट्रेनिंग सुविधाएं जरूरी हैं ताकि सैनिकों को वास्तविक परिस्थितियों में प्रशिक्षण मिल सके।” यह ट्रेनिंग नोड तारा बटालियन के पास बनाया जाएगा, जो चुशुल सब-सेक्टर का हिस्सा है।

पर्यावरण और सुरक्षा के बीच संतुलन

इन परियोजनाओं में से कई चांगथांग कोल्ड डेजर्ट सेंचुरी और काराकोरम वाइल्डलाइफ सेंचुरी के भीतर हैं। इस वजह से पर्यावरण मंत्रालय ने रक्षा मंत्रालय को यह सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं कि इकोसिस्टम पर कम से कम असर पड़े।

प्रशिक्षण नोड और गोला-बारूद भंडारण सुविधाओं के लिए उपयोग की जाने वाली भूमि का चयन बेहद सावधानी से किया गया है। मंत्रालय के अनुसार, यह परियोजनाएं पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता देंगी।

दो बड़े गोला-बारूद भंडारण केंद्र

लद्दाख में दो फॉर्मेशन अम्युनिशन स्टोरेज फैसिलिटी स्थापित की जा रही हैं, एक चांगथांग सेंचुरी में त्सोग्त्सालू क्षेत्र में और दूसरी काराकोरम सेंचुरी में। ये क्रमशः 24.2 हेक्टेयर और 47.1 हेक्टेयर क्षेत्र में बनाई जाएंगी।

इन इलाकों में दुर्लभ वन्यजीव जैसे तिब्बती भेड़िया, स्नो लेपर्ड, वाइल्ड याक और भड़ल (ब्लू शिप) पाए जाते हैं। पर्यावरण मंत्रालय ने कहा है कि निर्माण कार्य के दौरान इन संवेदनशील प्रजातियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए।

चुशुल में ब्रिगेड मुख्यालय

एक और अहम परियोजना में चुशुल में 40 हेक्टेयर भूमि पर 142 इंफैंट्री ब्रिगेड हेडक्वार्टर बनाने की मंजूरी दी गई है। मंत्रालय के अनुसार, यह मुख्यालय एलएस के पास जरूरी कमांड और कंट्रोल बनाए रखने में मदद करेगा। 142 इंफैंट्री ब्रिगेड की यूनिट्स पहले से ही एलएसी के साथ तैनात हैं। वहीं, बेहतर कॉर्डिनेशन के लिए हेडक्वार्टर का चुशुल में होना बेहद जरूरी है।

2020 के गलवान संघर्ष के बाद तेज हुईं गतिविधियां

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब भारत ने गलवान संघर्ष के बाद से पूर्वी लद्दाख में स्ट्रेटेजिक इंफ्रास्ट्रक्चर कंस्ट्रक्शन को तेज कर दिया है। पहले भी राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड ने कई अहम परियोजनाओं को मंजूरी दी थी, जिनमें फॉरवर्ड एविएशन बेस, मिसाइल लॉन्चिंग सुविधा और दौलत बेग ओल्डी तक वैकल्पिक सड़कें शामिल हैं। इन परियोजनाओं से सीमावर्ती इलाकों में सैनिकों की मोबिलाइजेशन, रसद आपूर्ति और तुरंत कार्रवाई करने में मदद मिलेगी।

Indians in Russian Army: सरकार ने माना रूस की सेना में फंसे 44 भारतीय, पुतिन के भारत दौरे में उठाया जा सकता है मुद्दा

Indians in Russian Army
Relatives of Indians who joined the Russian army in India took to the streets to demand the return of their loved ones.

Indians in Russian Army: रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध के बीच भारत सरकार ने ऐसे 44 भारतीय नागरिकों की पहचान की है जो अभी भी रूस की सेना में शामिल हैं। यह जानकारी तब सामने आई जब इन युवाओं के परिजनों ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया और उनकी वापसी की मांग की।

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सरकारी सूत्रों ने पुष्टि की है कि इन 44 भारतीयों की मौजूदगी रूस की सेनाओं में हो चुकी है। यह खुलासा ऐसे समय में हुआ है जब रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन अगले महीने भारत दौरे पर आने वाले हैं। भारत सरकार ने पहले भी इस मुद्दे को रूस के सामने उठाया था, और रूस ने वादा किया था कि वह अब भारतीयों की भर्ती नहीं करेगा और पहले से भर्ती लोगों को वापस भेज देगा।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि 44 भारतीयों की रूसी सेना में शामिल होने की पुष्टि हुई है। उन्होंने बताया कि इस मामले को रूसी अधिकारियों के सामने उठाया गया है और उन्होंने भारतीय से अपील की है कि वे ऐसे ऑफर्स के झांसे में न आएं, जिसमें बहुत ज्यादा जोखिम हैं।

Indians in Russian Army: जंतर-मंतर पर परिवारों का प्रदर्शन

सोमवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर 27 परिवार एकत्रित हुए और विदेश मंत्रालय से अपने परिजनों को सुरक्षित वापस लाने की मांग की। परिवारों का कहना है कि उनके बेटे और भाई को एजेंट धोखे से रूस ले गए, जहां उन्हें अच्छे नौकरी के झांसे में युद्ध में झोंक दिया गया।

हरियाणा के हिसार जिले के रहने वाले अमन का परिवार विशेष रूप से व्यथित है, क्योंकि उसी गांव के सोनू की युद्ध में मौत हो चुकी है। सोनू को इस साल अगस्त में रूस भेजा गया था, जबकि रूस का कहना है कि उसने मार्च 2025 के बाद कोई भर्ती नहीं की। सोनू भाषा कोर्स करने रूस गया था, लेकिन बाद में उसे सेना में शामिल कर लिया गया और 6 सितंबर को यूक्रेनी ड्रोन हमले में उसकी मौत हो गई।

अमन के भाई आशीष ने कहा, “मेरे भाई को जिंदा वापस लाओ, हमें बॉडी बैग नहीं चाहिए।”

Indians in Russian Army: भारत सरकार को लिखी चिट्ठी

इन परिवारों ने 23 अक्टूबर को विदेश मंत्री एस. जयशंकर को पत्र लिखकर मदद मांगी। चिट्ठी में हरियाणा, राजस्थान, पंजाब और जम्मू-कश्मीर के 16 युवाओं की जानकारी दी गई है, जो स्टूडेंट वीजा पर रूस गए थे और फिर उन्हें जबरन सेना में शामिल कर लिया गया।

पत्र में कहा गया, “रूस पहुंचने के बाद इन युवाओं को कुछ एजेंटों ने धोखे से सेना की ट्रेनिंग के लिए भेज दिया। परिवारों का उनसे संपर्क टूट गया है और उनकी सुरक्षा को लेकर डर बढ़ता जा रहा है।”

परिवारों ने भारत सरकार से राजनयिक स्तर पर दखल देने की अपील की ताकि सभी भारतीयों को तुरंत भारत वापस लाया जा सके।

कानूनी रूप से विदेशी भर्ती की अनुमति

रूस में विदेशी नागरिकों का सेना में शामिल होना कानूनी है। वहां के कानून के अनुसार विदेशी नागरिक स्वेच्छा से कॉन्ट्रैक्ट साइन कर सकते हैं। रूस में 2023 के अंत से अब तक 100 से अधिक भारतीय इस तरह से सेना में भर्ती हो चुके हैं।

रूस में भारत के राजदूत डेनिस अलीपोव ने कहा था कि मार्च 2025 के बाद से किसी भी भारतीय की भर्ती नहीं हुई है। उन्होंने कहा, “अगर कोई विदेशी व्यक्ति स्वयं भर्ती केंद्र में जाकर कॉन्ट्रैक्ट साइन करता है, तो उसे जबरन नहीं रोका जा सकता।”

हालांकि, भारत सरकार का कहना है कि ज्यादातर भारतीयों को एजेंटों ने गुमराह किया और उनसे रूसी भाषा के कोर्स या नौकरी का वादा किया गया था। बाद में उन्हें सेना में शामिल कर लिया गया।

घायल भारतीयों की दयनीय स्थिति

प्रदर्शन में मौजूद परिवारों ने बताया कि कई भारतीय सैनिक घायल होने के बाद भी युद्ध के मोर्चे पर भेजे जा रहे हैं। हरियाणा के अनूप कुमार के चचेरे भाई संदीप ने बताया, “मेरे भाई को गोली लगी है, उसे केवल प्राथमिक उपचार दिया गया और फिर वापस भेज दिया गया।”

एक अन्य भारतीय सैनिक माजोती साहिल मोहम्मद हुसैन ने पिछले महीने यूक्रेनी सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था। उन्होंने खुद को भारतीय नागरिक बताया था और कहा कि वह रूस की जेल में सजा कम करने के लिए सेना में भर्ती हुआ था। अब उसे प्रिजनर ऑफ वॉर माना जा रहा है।

भारत सरकार ने मॉस्को स्थित भारतीय दूतावास के माध्यम से उसकी राष्ट्रीयता की पुष्टि की है और कीव में भारतीय मिशन ने उसके लिए कांसुलर एक्सेस की मांग की है। उसकी वापसी अब रूस और यूक्रेन के बीच कैदियों की अदला-बदली पर निर्भर करेगी।

भारत और रूस के बीच बातचीत जारी

भारत सरकार ने इस मुद्दे को रूस के साथ कई स्तरों पर उठाया है। जुलाई 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मॉस्को में राष्ट्रपति पुतिन के साथ हुई शिखर बैठक में इस विषय पर चर्चा की थी। अब जब पुतिन दिसंबर 2025 में फिर भारत यात्रा पर आने वाले हैं, तो यह मुद्दा एक बार फिर एजेंडे में शामिल किया जा सकता है।

विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने बताया कि सरकार इन मामलों पर संवेदनशीलता के साथ काम कर रही है। भारतीय दूतावास रूस में इन सैनिकों की पहचान, उनके ठिकाने और संपर्क स्थापित करने में जुटा है ताकि उन्हें जल्द से जल्द स्वदेश लाया जा सके।

Indians in Russian Army रूस में फंसे भारतीयों के परिवार अब अपने प्रियजनों की खबर के लिए दिन-रात इंतजार कर रहे हैं। कई परिवारों को महीनों से उनसे कोई संपर्क नहीं मिला है। प्रदर्शन में शामिल एक मां ने कहा, “सरकार से बस यही गुहार है कि हमारे बच्चों को जिंदा वापस लाया जाए।”

दिल्ली में हुए प्रदर्शन के बाद सरकार इस मामले पर गंभीरता से विचार कर रही है। उम्मीद है कि आगामी भारत-रूस शिखर सम्मेलन में यह मुद्दा प्रमुखता से उठाया जाएगा।

HAL GE F404 Engine Deal: एचएएल ने अमेरिकी कंपनी जीई के साथ किया बड़ा करार, 97 तेजस लड़ाकू विमानों के लिए मिलेंगे 113 इंजन

HAL GE F404 Engine Deal

HAL GE F404 Engine Deal: हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड ने शुक्रवार को 97 तेजस एमके1ए के लिए अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक के साथ एक समझौते पर दस्तखत किए हैं। इस समझौते के तहत 113 इंजन एफ404-जीई-आईएन20 खरीदे जाएंगे। साथ ही संबंधित सपोर्ट पैकेज भी भारत को उपलब्ध कराए जाएंगे। ये इंजन भारत के 97 एलसीए एमके-1ए फाइटर जेट्स में लगााए जाएंगे।

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तेजस एमके-1ए कार्यक्रम को मिलेगी रफ्तार

एचएएल ने अपनी सोशल मीडिया हेंडल एक्स पर बताया है कि यह कॉन्ट्रैक्ट 97 तेजस एमके-1ए के इंजन के लिए किया गया है। वहीं इंजन डिलीवरी 2027 से 2032 तक की जाएगी। तेजस एमके-1ए भारत में तैयार किया जाने वाला चौथी पीढ़ी का मल्टी-रोल लड़ाकू विमान है, जिसे भारतीय वायुसेना की जरूरतों के मुताबिक डिजाइन और डेवलप किया गया है। जून 2025 में कैबिनेट ने 97 अतिरिक्त तेजस को मंजूरी दी थी, जिसके तहत इस साल सितंबर में एचएएल के साथ 65,000 करोड़ का कॉन्ट्रैक्ट साइन किया गया था। अभी तक वायुसेना 180 तेजस एमके 1ए के ऑर्डर दे चुकी है। वायुसेना ने स्पष्ट किया है कि अब वह तेजस एमके 1ए के और ऑर्डर नहीं देगी और तेजस एमके 2 पर फोकस करेगी।

इस समझौते में भारत को न केवल इंजन मिलेंगे बल्कि इनके साथ मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल सेवाओं के लिए सपोर्ट पैकेज भी शामिल है। इसका मतलब यह है कि इन इंजनों की सर्विसिंग और तकनीकी रखरखाव अब भारत में ही किया जाएगा।

इन विमानों में इस्तेमाल होने वाला एफ404 इंजन 84 किलो न्यूटन का थ्रस्ट पैदा करता है। तेजस एमके-1ए का निर्माण एचएएल की नासिक और बेंगलुरु यूनिट में हो रहा है। इससे पहले 2021 में एचएएल ने जीई के साथ 99 एफ404 इंजन खरीदे थे। जिसकी कुल लागत 716 मिलियन डॉलर थी। इसके तहत 83 एलसीए तेजस एमके 1ए बनाए जाने थे और जहाजों की डिलीवरी पिछले साल मार्च में शुरू की जानी थी। लेकिन जीई की तरफ इस साल अप्रैल में इंजन आने शुरू हुए। अभी तक चार इंजन भारत आ चुके हैं। पहला इंजन अप्रैल में, दूसरा इंजन जुलाई में, तीसरा इंजन सितंबर में और चौथा इंजन पहली अक्टूबर को भारत पहुंच चुका है।

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वहीं अभी तक एक भी तेजस एमके 1ए फाइटर जेट की डिलीवरी भारतीय वायुसेना को नहीं की है। इससे पहले सितंबर में एचएएल ने दावा किया था कि इस साल अक्टूबर में पहले तेजस की डिलीवरी कर दी जाएगी। 17 अक्टूबर को एचएएल ने अपने नासिक प्लांट से तेजस एमके 1ए के पहले प्रोटोटाइप ने उड़ान भी भरी थी। एचएएल ने कहा था कि तेजस के फायरिंग टेस्ट के बाद वायुसेना को डिलीवरी कर दी जाएगी। इन फायरिंग टेस्ट में देश में बने बियोन्ड विजुअल रेंज मिसाइल अस्त्र, शॉर्ट रेंज एयर टू एयर मिसाइल, ब्रह्मोस एनजी और लेजर-गाइडेड बम का टेस्ट किया जाना था। लेकिन इंटीग्रेशन संबंधित दिक्कतों के चलते अब यह डिलीवरी अगले साल मार्च 2026 तक के लिए टल गई है। सूत्रों का कहना है कि सर्टिफिकेशन में देरी हो रही है, जिसकी वजह से डिलीवरी अगले साल तक के लिए टल गई है।

वहीं इंजन को लेकर एचएएल का कहना है कि चालू वित्त वर्ष के आखिर तक उसे 12 इंजन मिल जाएंगे। इसके बाद अगले वित्त वर्ष में सप्लाई सुचारू हो जाएगी। 2026–27 तक एचएएल का लक्ष्य हर साल 30 तेजस एमके1ए विमान तैयार करना है। इसमें निजी और सरकारी साझेदार कंपनियों को भी शामिल किया जाएगा।

वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह कई बार सार्वजनिक तौर पर तेजस की डिलीवरी को लेकर चिंता जाहिर कर चुके हैं। उन्होंने कहा था, “भूखे मुंह तैयार हैं, हम सिर्फ भोजन का इंतजार कर रहे हैं।” उनका इशारा तेजस विमानों के जल्दी प्रोडक्शन और डिलीवरी की तरफ था। उन्होंने कहा था कि वायुसेना की क्षमता बनाए रखने के लिए हर साल 30 से 40 विमान तैयार होने चाहिए, यानी दो स्क्वाड्रन हर साल तैयार होनी चाहिए।

Sir Creek Indian Army: सर क्रीक में अपनी मौजूदगी मजबूत कर रहा भारत, सेना को चाहिए लैंडिंग क्राफ्ट असॉल्ट और फास्ट पेट्रोल बोट्स, जारी की RFP

Sir Creek Indian Army

Sir Creek Indian Army: भारत ने अपनी पश्चिमी सीमा, खास तौर पर सर क्रीक इलाके की सुरक्षा को लेकर जरूरी कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। एक तरफ जहां सर क्रीक इलाके पास तीनों भारतीय सेनाएं 13 नवंर तक ट्राई सर्विसेज एक्सरसाइज त्रिशूल कर रही हैं, तो वहीं रक्षा मंत्रालय ने इस इलाके की संवेदनशीलता को देखते हुए दो अहम रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) भी जारी किए हैं। इनमें से एक आरएफपी भारतीय सेना के लिए लैंडिंग क्राफ्ट असॉल्ट (एलसीए) के लिए तो दूसरी फास्ट पेट्रोल बोट के लिए जारी की गई हैं। इनका उद्देश्य सीमा की निगरानी, सैनिकों की आवाजाही और समुद्री गश्त की क्षमता को मजबूत करना है।

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हाल ही में 6 नवंबर को जारी की गई आरएफपी में सेना आठ लैंडिंग क्राफ्ट असॉल्ट बोट्स खरीदेगी। इन नौकाओं को इस तरह डिजाइन किया जाएगा कि वे दलदली, उथले और संकरे जलमार्गों में भी ऑपरेशन कर सकें। वहीं, 21 अक्टूबर को जारी की गई आरएफपी के तहत छह फास्ट पेट्रोल बोट खरीदी जाएंगी। ये नौकाएं तेज गश्त, निगरानी और तस्करी या घुसपैठ के मामलों में तुरंत जवाबी कार्रवाई करने में मदद करेंगी।

रक्षा मंत्रालय के मुताबिक ये दोनों प्रोजेक्ट्स ‘बॉय (इंडियन-आईडीडीएम)’ कैटेगरी में रखे गए हैं, यानी दोनों का निर्माण पूरी तरह भारत में होगा। इसमें कम से कम 60 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल जरूरी होगा। मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि इन परियोजनाओं को एमएसएमई उद्योगों के लिए भी खोला गया है, ताकि छोटे और मझोले उद्योग भी रक्षा उत्पादन में सक्रिय भागीदारी कर सकें।

Sir Creek Indian Army: सर क्रीक इलाका है बेहद संवेदनशील

सर क्रीक को अक्सर भारत की “वेस्टर्न नेवल बॉटलनेक” कहा जाता है। यह वही इलाका है जहां से अरब सागर तक पहुंचने वाला रास्ता गुजरता है। इसलिए यह नौसैनिक रणनीति और कोस्टल डिफेंस दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। सर क्रीक इलाका भारत और पाकिस्तान के बीच फैला लगभग 96 किलोमीटर लंबा दलदली इलाका है, जो गुजरात के कच्छ जिले से अरब सागर तक फैला हुआ है। यह क्षेत्र दशकों से सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता रहा है, क्योंकि यहां की मुश्किल भौगोलिक परिस्थितियों के चलते पारंपरिक गश्त और निगरानी बेहद कठिन होती है। इस इलाके में पाकिस्तान की ओर से घुसपैठ, तस्करी और जासूसी जैसी गतिविधियों की कई बार कोशिश की जा चुकी है। इसलिए, भारतीय सेना ने अब एडवांस तकनीक वाली बोट्स की तैनाती के जरिए इस क्षेत्र को और सुरक्षित करने का फैसला किया है।

लैंडिंग क्राफ्ट असॉल्ट बोट्स की सर क्रीक में तैनाती

सेना के अनुसार, लैंडिंग क्राफ्ट असॉल्ट बोट्स की तैनाती सर क्रीक में लखपत–लक्की नाला (गुजरात) क्षेत्र और असम के गुवाहाटी में की जाएगी। इनमें से चार नौकाएं गुजरात में और चार असम में तैनात होंगी। इनका मुख्य उद्देश्य सीमाई और जलीय इलाकों में सैनिकों, वाहनों और सामग्री की आवाजाही को तेज बनाना है। ये नौकाएं लगभग 25 नॉट्स (46 किमी प्रति घंटे) की गति से चल सकती हैं और लगभग 10 टन तक का भार उठा सकती हैं। इन्हें इस तरह डिजाइन किया जाएगा कि ये –15°C से +50°C तक तापमान में आसानी से काम कर सकें। आरएफपी के मुताबिक इसे समुंदर के साथ-साथ उथले क्रिक इलाकों, सर क्रीक, ब्रह्मपुत्र नदी, सुंदरबन डेल्टा और पूर्वी लद्दाख जैसे कठिन इलाकों में काम करने के लिये तैनात किया जाएगा।

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आरएफपी में कहा गया है कि ये लैंडिंग क्राफ्ट असॉल्ट बोट्स कई आधुनिक सिस्टम, जैसे जीपीएस-ग्लोनास आधारित नेविगेशन सिस्टम, ऑटोमेटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम, लो-पावर रडार, इको साउंडर, वीएचएफ रेडियो कम्युनिकेशन सिस्टम, और एआईजे लेवल-III बुलेट रेसिस्टेंट प्रोटेक्शन से लैस होनी चाहिए। इनका कंट्रोल एक मल्टी-फंक्शन कंसोल से होगा, जो रडार, जीपीएस और एआईएस डेटा को एक साथ शो करेगा। इन नौकाओं को आईपी66/आईपी67 वाटरप्रूफिंग मानकों का भी पालन करना होगा, ताकि ये हर मौसम में काम कर सकें।

रक्षा मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि कॉन्ट्रैक्ट साइन होने के बाद पहले 9 महीने में पहली प्रोटोटाइप बोट तैयार की जाएगी, जबकि बाकी बोट्स 24 महीने के भीतर सेना को सौंप दी जाएंगी। इन नौकाओं के साथ कंप्यूटर-बेस्ड ट्रेनिंग मॉड्यूल और मेंटेनेंस सिमुलेटर भी दिया जाएगा, ताकि सैनिकों को ऑपरेशन और मेंटेनेंस की भी ट्रेनिंग मिल सके।

क्या हैं लैंडिंग क्राफ्ट असॉल्ट?

‘लैंडिंग क्राफ्ट असॉल्ट एक ऐसी तेज रफ्तार और मल्टीपर्पज बोट होती है, जिसका इस्तेमाल सैनिकों, हथियारों और हल्के वाहनों को पानी के रास्ते तेजी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने के लिए किया जाता है। इसका इस्तेमाल दलदली तटीय क्षेत्र, नदी मार्ग या उथले समुद्री इलकों में किया जाता है, जहां सड़क या पुल से पहुंचना मुश्किल होता है।

इस नाव की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह कम गहराई वाले पानी (शैलो वाटर) में भी आसानी से चल सकती है। इसलिए इसे सर क्रीक (गुजरात), ब्रह्मपुत्र नदी (असम) या सुंदरबन डेल्टा (पश्चिम बंगाल) जैसे इलाकों के लिए बेहद उपयुक्त माना जाता है।

इनकी लंबाई लगभग 13–14 मीटर के आसपास होती है। इनकी पेलोड क्षमता 10 टन तक, यानी यह एक प्लाटून को पूरे कॉम्बैट लोड के साथ या हल्के सैन्य वाहनों को ले जा सकती है। ये कंपोजिट फाइबर रिइनफोर्स्ड स्ट्रक्चर की बनी होती हैं, जिससे हल्की और मजबूत बनी रहती हैं। इस नाव में बुलेट-रेसिस्टेंट केबिन भी होता है, जिससे यह दुश्मन की गोलीबारी के बीच भी सुरक्षित रह सकती है।

सेना को चाहिए 6 फास्ट पेट्रोल बोट्स

वहीं, फास्ट पेट्रोल बोट्स को भी सर क्रीक के अलावा कच्छ और लखपत के तटीय इलाकों में तैनात किया जाएगा। ये बोट्स तेज रफ्तार वाली और हल्के वजन वाली होंगी। इनका डिजाइन इस तरह तैयार किया गया है कि वे 35 नॉट्स तक की स्पीड से चल सकें और सीमाई इलाकों में तुरंत प्रतिक्रिया दे सकें। ये नौकाएं मुख्य रूप से निगरानी, घुसपैठ-रोधी मिशन, सर्च एंड रेस्क्यू और लॉजिस्टिक सपोर्ट के लिए इस्तेमाल की जाएंगी।

आरएफपी के मुताबिक इन नौकाओं में इस्तेमाल की जाने वाली तकनीक पूरी तरह से स्वदेशी होगी। डिजाइन का स्वामित्व भारतीय कंपनियों के पास होगा और उत्पादन भारतीय शिपयार्ड्स में किया जाएगा। इस प्रोजेक्ट के तहत आने वाली कंपनियों को यह प्रमाणित करना होगा कि उनकी तकनीक और निर्माण पूरी तरह देश के अंदर किया गया है। रक्षा मंत्रालय ने इन नौकाओं के रखरखाव के लिए लाइफ-साइकिल सपोर्ट सिस्टम भी अनिवार्य किया है, ताकि आने वाले वर्षों में मरम्मत और अपग्रेडेशन के लिए विदेशी निर्भरता न रहे।

सर क्रीक में लगातार अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है पाकिस्तान

60 साल पहले पाकिस्तान के पहले तानाशाह अयूब खान ने कच्छ में फौजी हमला किया था। 1965 में पाकिस्तान ने ऑपरेशन डेजर्ट हॉक के तहत इसी इलाके में हमला किया था। लेकिन भारतीय सेना ने जवाबी कार्रवाई करते हुए उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था। हाल ही में सर क्रीक इलाके में पाकिस्तान ने तेजी से गतिविधियां बढ़ाई हैं। पाकिस्तान वहां मिनी-कैंटोनमेंट, एयरस्ट्रिप बनाए हैं। सैटेलाइट इमेजरी के मुताबिक पाकिस्तान ने वहां कई छोटे मिनी-कैंटोनमेंट और मिलिट्री कॉम्प्लेक्स बनाए हैं। ये 150 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा इलाके में फैले हैं, जहां सिविलियंस का प्रवेश बैन है। पाकिस्तान की मरीन फोर्स ने सर क्रीक के रह-दा-पिर इलाके में एक नई मिलिट्री बैरक भी बनाई है।

इसके अलावा आपातकालीन हवाई पट्टियां बनाईं हैं, जो फाइटर जेट्स या ड्रोन्स के लिए इस्तेमाल हो सकती हैं। साथ ही दर्जनों कोस्टल डिफेंस बोट्स, मरीन असॉल्ट क्राफ्ट्स, नेवल शिप्स और पैट्रोलिंग स्पीडबोट्स की भी तैनाती की है। इसके अलावा 31वीं और 32वीं क्रीक बटालियन्स के हेडक्वार्टर भी सुझावल और घारो में बनाए हैं। यही नहीं, पाकिस्तान ने वहां तीन ग्रिफॉन 2400टीडी हॉवरक्राफ्ट इंडक्ट किए हैं, जो दलदली इलाके में तेज रफ्तार से चल सकते हैं।

क्या सर क्रीक से मुंबई हमलों जैसी साजिश रच रहा पाकिस्तान

सर क्रीक में पाकिस्तान की गतिविधियां इस कदर बढ़ चुकी हैं कि दशहरा के मौके पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भुज का दौरा किया था। जहां से उन्होंने पाकिस्तान को चेतावनी दी थी कि अगर पाकिस्तान सर क्रीक में कोई हिमाकत करेगा तो हम इतना जोरदार जवाब देंगे कि इतिहास और भूगोल दोनों बदल जाएंगे। उन्होंने यह बयान उस समय दिया जब भारत की खुफिया रिपोर्टों ने पाकिस्तान की नई सैन्य तैयारियों की पुष्टि की थी। भारतीय खुफिया एजेंसियों का कहना है कि यह पाकिस्तान का “जमीनी हकीकत बदलने का प्रयास” है ताकि विवादित इलाकों पर नियंत्रण स्थापित किया जा सके।

वहीं, 25 अक्टूबर को पाकिस्तान के नौसेना प्रमुख एडमिरल नवेद अशरफ ने सर क्रीक के आगे के ठिकानों का दौरा किया था और कहा था, “सर क्रीक से जिवानी तक, पाकिस्तान अपने हर इंच समुद्री मोर्चे की रक्षा करेगा।” पाकिस्तान ने अपनी नौसेना को “हाई रेडीनेस मोड” में डाल दिया है और समुद्री सीमाओं पर निगरानी बढ़ा दी है।

सरकार के वरिष्ठ सूत्रों का कहना है कि पाकिस्तान यहां से 26-11 जैसे मुंबई हमले जैसे साजिश को अंजाम देने की साजिश रच रहा है और यहां से आतंकियों को भारत में भेजने में की रणनीति बना रहा है, ताकि बड़ा आतंकी वारदातों को अंजाम दिया जा सके।

बता दें कि मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने कच्छ में सरदार पोस्ट और विगोकोट पर गोले बरसाए थे। 10 मई को एक पाकिस्तानी ड्रोन को गांव के पास मार गिराया था।

डायनामिक मैरीटाइम रेडीनेस की नीति

रक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि यह परियोजना केवल सुरक्षा बढ़ाने के लिए नहीं है, बल्कि यह भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता का भी प्रतीक है। उन्होंने कहा, “हमारा लक्ष्य है कि भारतीय सीमाएं न केवल सुरक्षित रहें बल्कि हर प्रकार के ऑपरेशन के लिए तैयार भी रहें। यह परियोजना उस दिशा में एक ठोस कदम है।”

सर क्रीक क्षेत्र में इन नौकाओं की तैनाती पाकिस्तान के लिए भी एक स्पष्ट संदेश मानी जा रही है। भारत ने अब इस क्षेत्र में डायनामिक मैरीटाइम रेडीनेस की नीति अपनाई है, जिसमें केवल रक्षा नहीं बल्कि तुरंत जवाबी कार्रवाई और आक्रामक निगरानी को प्राथमिकता दी गई है।

सर क्रीक की मौजूदा स्थिति को देखते हुए यह कदम बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह इलाका न केवल पाकिस्तान से सटा हुआ है, बल्कि यहां से अरब सागर तक सीधी पहुंच होने के कारण यह एक महत्वपूर्ण सामरिक गलियारा भी है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इन नई नौकाओं की तैनाती से भारत की सीमा पर निगरानी, खुफिया गतिविधियों और रैपिड रेस्पॉन्स क्षमता में बड़ा सुधार आएगा।

Chicken Neck Corridor: मोहम्मद यूनुस को पाकिस्तानी जनरल शमशाद मिर्जा को किताब गिफ्ट करना पड़ा भारी! भारत ने चिकन नेक पर कसी ‘नकेल’

Chicken Neck Corridor
1. General Sahir Shamshad Mirza, paid a courtesy call on Chief Adviser Professor Muhammad Yunus at the State Guest House Jamuna late Saturday. 2. Mehmet Akif Yılmaz, Member of the Turkish Parliament and Chairperson of the Türkiye-Bangladesh Parliamentary Friendship Group, called on Chief Adviser Professor Muhammad Yunus at the State Guest House Jamuna on Monday

Chicken Neck Corridor: हाल ही में भारत ने बांग्लादेश सीमा से सटे कुछ संवेदनशील भारतीय इलाकों में तीन नए सैन्य ठिकाने बनाए हैं। ये नए सैन्य ठिकाने बांद्रा-धुबरी के पास बामुनी, बिहार के किशनगंज और पश्चिम बंगाल के चोप्रा जिले के पास बनाए गए हैं। इन स्थानों को चुना गया है क्योंकि इन्हें सुरक्षा के लिहाज से संवेदनशील माना गया है और ये सिलिगुड़ी कॉरिडोर, जिसे आम बोलचाल में “चिकन-नेक” (Chicken Neck Corridor) कहा जाता है, उसके नजदीक स्थित हैं। यह कॉरिडोर ही वह रास्ता है जिसके जरिए भारत अपने पूर्वोत्तर राज्यों असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और सिक्किम से जुड़ा हुआ है।

Chicken Neck Corridor: चिकन नेक के आसपास बढ़ाया ऑपरेशनल कंट्रोल

सरकारी और खुफिया सूत्रों के मुताबिक, इन तीनों इलाकों को भारत की सीमा सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना जाता था। अब इन इलाकों में सेना की मौजूदगी बढ़ने से भारत की सीमा सुरक्षा व्यवस्था और मजबूत होगी। इस कदम को केवल सामरिक नहीं, बल्कि रणनीतिक स्तर पर भी एक बड़ा संकेत माना जा रहा है। इस कदम के तहत भारतीय सेनाओं ने सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास लगभग 60 किलोमीटर तक अपना ऑपरेशनल कंट्रोल बढ़ा दिया है।

ISI in Bangladesh: आसिम मुनीर की अगुवाई में भारत के दो मोर्चों पर हाइब्रिड वॉरफेयर की तैयारी कर रहा पाकिस्तान! अलर्ट पर एजेंसियां

सरकारी सूत्रों ने कहा कि इन नए सैन्य ठिकाने का मुख्य मकसद सीमावर्ती इलाकों में निगरानी बढ़ाना और जरूरी होने पर तुरंत जवाबी कार्रवाई करना है। सिलिगुड़ी कॉरिडोर (Chicken Neck Corridor) बेहद ही संकरा कॉरिडोर है, जो भारत को नौ उत्तर-पूर्वी राज्यों से जोड़ता है। इस कॉरिडोर की चौड़ाई कुछ स्थानों पर मात्र 22 किलोमीटर है और इसलिए इसे रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील माना जाता है। उसी को ध्यान में रख कर सुरक्षा व्यवस्थाओं को और मजबूत किया जा रहा है।

अगर इस क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ती है तो भारत का पूर्वोत्तर देश के बाकी हिस्से से कट सकता है। इसलिए, भारत ने इस क्षेत्र में सैन्य ढांचे को मजबूत करने और लगातार निगरानी बढ़ाने का फैसला लिया है।

Chicken Neck Corridor: ढाका में विवादास्पद घटना के बाद भारत का कदम

भारत का यह फैसला उस घटना के बाद आया है, जब 25 अक्टूबर को ढाका में एक बैठक के दौरान बांग्लादेश के मुख्य सलाहकार प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस पाकिस्तान के जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमिटी के चेयरमैन जनरल साहिर शमशाद मिर्जा को एक किताब भेंट की थी। जिसमें भारत के पूर्वोत्तर हिस्से को “ग्रेटर बांग्लादेश” का हिस्सा दिखाया गया था। यह घटना भारत के लिए एक साफ राजनीतिक संदेश मानी गई और नई दिल्ली ने इसे उकसावे की कार्रवाई बताया।

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सरकारी सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तान के सैन्य प्रतिष्ठान द्वारा “ग्रेटर बांग्लादेश” जैसे विचारों को बढ़ावा देना दक्षिण एशिया में अस्थिरता पैदा करने की कोशिश है। भारत ने इस पर संयम बरतते हुए भी अपने इस नए इंफ्रास्ट्रक्चर (Chicken Neck Corridor) को एक्टिव कर दिया है।

हालांकि केंद्र सरकार का रुख अभी भी संवाद और क्षेत्रीय सहयोग की ओर है, लेकिन उसे यह साफ भी बताया गया है कि देश की संप्रभुता पर हमला बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

बांग्लादेश में हुई इस घटना के बाद से भारत में कई वर्गों में निराशा और चिंता है। भारत ने 1971 में बांग्लादेश की आजादी में अहम भूमिका निभाई थी और तब से दोनों देशों के बीच एतिहासिक मित्रता रही है। लेकिन हालिया घटनाओं को इस रिश्ते में दरार डालने वाला माना जा रहा है। भारत में इस बात पर भी नाराजगी है कि पाकिस्तान की भूमिका इस पूरे विवाद में फिर से उभरकर सामने आई है।

सरकारी और खुफिया सूत्रों ने बताया कि इन तीन नये सैन्य ठिकानों (Chicken Neck Corridor) में रोटेशनल टुकड़ियां, इलाके की निगरानी के आधुनिक संसाधन, कॉन्वॉय मॉनिटरिंग सिस्टम और लोकल लायजन यूनिट्स शामिल होंगी। ये स्थानीय सिविल प्रशासन और सीमा बलों के साथ मिलकर काम करेंगे ताकि सीमापार गतिविधियों पर सटीक जानकारी मिले और किसी भी असामान्य गतिविधि का समय पर जवाब दिया जा सके।

तीनों नए ठिकानों से भारतीय सेना को सीमावर्ती इलाकों में रियल-टाइम निगरानी और रैपिड रिस्पॉन्स क्षमता मिलेगी। अब अगर किसी भी सीमा पार गतिविधि का संकेत मिलता है, तो भारतीय बल तुरंत कार्रवाई कर सकेंगे। इन ठिकानों से ड्रोन नेटवर्क, इंटेलिजेंस यूनिट्स और रडार सिस्टम्स को भी जोड़ा गया है।

सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यह कदम भारत की कम्प्रिहेंसिव बॉर्डर स्ट्रैटेजी (Chicken Neck Corridor) का हिस्सा है। इसके तहत सरकार डिप्लोमेसी, इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट और मिलिट्री प्रिपेयर्डनेस तीनों को एक साथ जोड़ रही है, ताकि सीमाओं पर हर प्रकार के खतरे का प्रभावी जवाब दिया जा सके।

IAF Medium Transport Aircraft: भारतीय वायुसेना खरीदेगी 80 नए ट्रांसपोर्ट विमान, अमेरिका, ब्राजील और यूरोप की कंपनियों में कांटे की टक्कर

IAF Medium Transport Aircraft

IAF Medium Transport Aircraft: रक्षा मंत्रालय जल्द ही भारतीय वायुसेना के लिए मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट (एमटीए) की खरीद प्रक्रिया शुरू करने जा रहा है। इसके तहत वायुसेना को 18 से 30 टन तक का वजन ढोने वाले 80 तक नए ट्रांसपोर्ट विमान मिल सकते हैं। इस बड़े रक्षा सौदे की दौड़ में तीन अंतरराष्ट्रीय कंपनियां शामिल हैं। जिनमें अमेरिका की लॉकहीड मार्टिन, ब्राजील की एम्ब्रेयर और यूरोप की एयरबस डिफेंस एंड स्पेस हैं।

सूत्रों के अनुसार, डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल इस प्रपोजल को दिसंबर के आखिर तक एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी (एओएन) मंजूरी दे सकती है। बता दें कि यह किसी भी डिफेंस सौदे की खरीद की पहली औपचारिक मंजूरी होती है। मंजूरी के बाद 2026 की शुरुआत में टेंडर जारी किए जाएंगे।

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रक्षा सूत्रों के मुताबिक, इन 80 विमानों (IAF Medium Transport Aircraft) की खरीद “मेक इन इंडिया” योजना के तहत की जाएगी। यानी जिस भी कंपनी के साथ यह डील साइन होगी, उसे भारत में ही इन विमानों की असेंबली और प्रोडक्शन लाइन तैयार करनी होगी। इससे देश में रक्षा उत्पादन और तकनीकी आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलेगा।

भारतीय वायुसेना के पास वर्तमान में 12 सी-130जे सुपर हरक्यूलिस एयरक्राफ्ट हैं, जिनका इस्तेमाल कार्गो, सैनिकों और राहत सामग्री के लिए किया जाता है। लॉकहीड मार्टिन कंपनी का कहना है कि भारत में पहले से ही इन विमानों के मेंटेनेंस और ट्रेनिंग के लिए पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद है, जिससे तुरंत डिलीवरी देने में मदद मिलेगी।

कंपनी का कहना है, “भारतीय वायुसेना हमारे एयरक्राफ्ट (IAF Medium Transport Aircraft) के परफॉरमेंस से संतुष्ट है। हम भारत में अपनी साझेदारी को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।” लॉकहीड मार्टिन ने इस प्रोजेक्ट के लिए टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड के साथ साझेदारी की है। वहीं, ब्राजील की एम्ब्रेयर ने हाल ही में महिंद्रा ग्रुप के साथ करार किया है। एयरबस ने अभी तक अपने भारतीय पार्टनर के नाम का एलान नहीं किया है।

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एयरबस अपना एटलस ए400एम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट (IAF Medium Transport Aircraft) ऑफर कर रही है, जिसकी पेलोड कैपेसिटी 40 टन तक है। वहीं एयरबस भारत में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, इंडिजिनाइजेशन और प्रोडक्शन लाइन सेटअप पर फोकस कर रही है। साथ ही एयरबस ने रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन का जवाब दिया है और लोकल मैन्युफैक्चरिंग की पेशकश भी की है।

वहीं, बाकी दोनों कंपनियों की तुलना में एयरबस एटलस ए400एम की पेलोड कैपेसिटी 40 टन, जबकि लॉकहीड मार्टिन के सी-130जे की कैपेसिटी 20 टन और एम्ब्रेयर केसी-390 मिलेनियम की कैपेसिटी 26 टन है। वहीं एटलस ए400एम 25 टन के जोरावर लाइट टैंक को आसानी से ढो सकता है।

रक्षा मंत्रालय ने करीब तीन साल पहले इन ट्रांसपोर्ट विमानों (IAF Medium Transport Aircraft) की जरूरत को लेकर कई विदेशी कंपनियों से आरएफआई मांगी थी। भारत ने उनसे यह भी पूछा था कि वे कितनी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर देने को तैयार हैं और देश में कितना इंडिजिनाइजेशन कर सकते हैं। इसमें यह भी शामिल था कि क्या भारत को इस क्षेत्र में रीजनल मैन्युफैक्चरिंग हब बनाया जा सकता है।

लॉकहीड मार्टिन और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स बेंगलुरु में एक एमआरओ (मेंटेनेंस, रिपेयर एंड ओवरहॉल) सेंटर तैयार कर रहे हैं, जो 2027 तक काम करना शुरू करेगा। यह सेंटर भारत के मौजूदा सी-130जे फ्लीट की देखभाल करेगा।

इसके अलावा रूस भी यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉर्पोरेशन का नया आईएल-276 (IAF Medium Transport Aircraft) भी ऑफर कर रहा है। जिसकी पेलोड कैपेसिटी करीब 20 टन है। रूस इसे एचएएल के साथ मिलकर पेश करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन मौजूदा जियोपॉलिटिकल हालात के चलते इसके साथ साझेदारी करना मुश्किल माना जा रहा है। हालांकि अभी हाल ही में यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉर्पोरेशन यानी यूएसी ने एचएएल के साथ मिल कर सिविल कम्यूटर एयरक्राफ्ट एसजे-100 के प्रोडक्शन के लिए एक एमओयू पर दस्तखत किए हैं।

वहीं, एयरबस कंपनी पहले से ही भारत में एक बड़ा डिफेंस प्रोजेक्ट चला रही है। कंपनी भारतीय वायुसेना को 56 सी-295 ट्रांसपोर्ट विमान उपलब्ध करा रही है। यह प्रोजेक्ट 21,935 करोड़ रुपये का है और इसे भी टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स के साथ मिलकर किया जा रहा है।

ब्राजील की एम्ब्रेयर (IAF Medium Transport Aircraft) भी भारत से जुड़ी हुई है। उसने पहले ही देश को आठ विमान सप्लाई किए हैं, जिनका इस्तेमाल वीवीआईपी यात्रा और एयरबोर्न अर्ली वार्निंग मिशनों के लिए किया जाता है। रक्षा सूत्रों का कहना है कि नए ट्रांसपोर्ट विमानों की खरीद से भारतीय वायुसेना की एयरलिफ्ट क्षमता में बड़ा इजाफा होगा। यह विमान सैनिकों, उपकरणों, और राहत सामग्रियों की तेजी से ले सकेंगे।

भारतीय वायुसेना लंबे समय अपने लिए मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट (IAF Medium Transport Aircraft) तलाश रही है, जिसका मकसद पुराने एंटोनोव एएन-32 और इल्यूशिन आईएल-76 जैसे सोवियत युग के ट्रांसपोर्ट विमानों को रिप्लेस करना हैं। भारत के पास लगभग 100 एन-32 एयरक्राफ्ट हैं जबकि 17 के आसपास आईएल-76 हैं। पुराने होने के चलते इनका मेंटेनेंस खर्च काफी बढ़ गया है। इसलिए वायुसेना अपनी एयरलिफ्ट कैपेसिटी को आधुनिक बनाना चाहता है।

एमटीए प्रोग्राम (IAF Medium Transport Aircraft) के तहत भारत को 18 से 30 टन पेलोड कैपेसिटी वाले विमानों की जरूरत है। जिसके तहत 40 से 80 विमान खरीदे जाने हैं। यह विमान न केवल सैनिकों और उपकरणों के ट्रांसपोर्टेशन के लिए इस्तेमाल होंगे, बल्कि इन्हें लद्दाख जैसे हाई-ऑल्टिट्यूड इलाकों और शॉर्ट रनवे से ऑपरेट करने के लिए डिजाइन किया जाएगा। इनकी क्षमता इतनी होगी कि ये 25 टन वजनी जोरावर लाइट टैंकतक को भी एयरलिफ्ट कर सकें। साथ ही, इन विमानों में एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग, रैपिड ट्रूप डिप्लॉयमेंटऔर आपातकालीन राहत कार्य की क्षमता भी होगी।

यह पूरा प्रोजेक्ट (IAF Medium Transport Aircraft) मेक इन इंडिया पहल के तहत लागू किया जाएगा। इसके तहत भारत में ही मैन्युफैक्चरिंग, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और कम से कम 50 प्रतिशत स्वदेशी कंटेंट का इस्तेमाल किया जाएगा। इसके साथ ही एक एमआरओ हब भी बनाया जाएगा, ताकि रखरखाव और मरम्मत के लिए विदेशों पर निर्भरता कम हो। रक्षा मंत्रालय ने इस प्रोग्राम के लिए दिसंबर 2022 में आरएफआई जारी किया था और अब तक सभी कंपनियों के जवाब मिल चुके हैं। अब जल्द ही इसका आरएफपी जारी किया जाएगा।

Tughril vs Nilgiri Class: पाक नेवी में चीन की ‘स्विस आर्मी नाइफ’ फ्रिगेट्स, तुघरिल के सामने भारत का नीलगिरी, कौन है ज्यादा ताकतवर?

Tughril vs Nilgiri Class
Tughril vs Nilgiri Class

Tughril vs Nilgiri Class: चीन से मिली टाइप 054ए/पी क्लास की जंगी तुघरिल क्लास फ्रिगेट्स को पाकिस्तान की नौसेना ने अपने बेड़े में शामिल किया है। पाकिस्तान नौसेना के प्रमुख एडमिरल नविद अशरफ ने इसे चीन के साथ रक्षा सहयोग के इतिहास में एक “महत्वपूर्ण उपलब्धि” बताया है। उन्होंने कहा कि इन जहाजों के शामिल होने से पाकिस्तान नौसेना की मल्टी-मिशन क्षमताएं खास तौर पर एयर डिफेंस, एंटी-सबमरीन वॉरफेयर और समुद्री निगरानी—काफी मजबूत हुई हैं।

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बीजिंग स्थित सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स को दिए इंटरव्यू में एडमिरल अशरफ ने कहा कि पाकिस्तान नौसेना को 2026 तक चीन से आठ नई हैंगोर क्लास पनडुब्बियां मिलने वाली हैं। साथ ही उन्होंने यह संकेत भी दिया कि दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग सिर्फ जहाजों या पनडुब्बियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले समय में यह संबंध और गहरे होंगे।

Tughril vs Nilgiri Class: पाकिस्तान के लिए रणनीतिक बढ़त

इन फ्रिगेट्स का इस्तेमाल पाकिस्तान नौसेना उत्तर अरब सागर और हिंद महासागर क्षेत्र में गश्त और निगरानी के लिए कर रही है। पाकिस्तान ने 2017 में चीन से चार ऐसी फ्रिगेट्स का ऑर्डर दिया था। इनमें से पहली ‘तुघरिल’ फ्रिगेट नवंबर 2021 में पाकिस्तान को मिली। ये सभी जहाज चीन की चाइना स्टेट शिपबिल्डिंग कॉरपोरेशन लिमिटेड ने बनाए हैं। अब तक पाकिस्तान को चार तुघरिल क्लास फ्रिगेट्स मिल चुकी हैं जिनमें पीएनएस तुघरिल, पीएनएस तैमूर, पीएनएस टिप्पू सुल्तान और पीएनएस शाहजहां शामिल हैं।

PNS Tughril Class
PNS Tughril Class

पाकिस्तान नौसेना ने इन जहाजों को “तुघरिल क्लास” नाम दिया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, ये फ्रिगेट्स लो-रडार डिजाइन वाली हैं और विशेष रूप से एंटी-सबमरीन वॉरफेयर के लिए कस्टमाइज की गई हैं। अब तक पाकिस्तान को चार जहाज मिल चुके हैं और आने वाले सालों में चार और की डिलीवरी की योजना है।

Tughril vs Nilgiri Class: चीन का भरोसेमंद ‘मल्टी-रोल’ वॉरशिप

चीन की नौसेना ने पहली टाइप 054ए फ्रिगेट वर्ष 2008 में सेवा में शामिल की थी। कहा जाता है कि इसका डिजाइन फ्रांस की ला फयेते-क्लास फ्रिगेट से प्रेरित है। नाटो में इस जहाज को जियांगकाई-II नाम से पहचाना जाता है। 2023 तक चीन की नौसेना के पास ऐसी 30 से ज्यादा फ्रिगेट्स थीं, जिससे साफ है कि इस जहाज पर चीन को काफी भरोसा है।

विशेषज्ञ इसे “स्विस आर्मी नाइफ” जैसी मल्टीपर्पज शिप कहते हैं, क्योंकि यह एक साथ कई मिशन जैसे कि पेट्रोलिंग, एस्कॉर्ट, एंटी पायरेसी और नॉन कॉम्बैट मिशन पूरे कर सकता है। चीन ने पहली बार इसी जहाज का इस्तेमाल 2011 में लीबिया से अपने नागरिकों को निकालने के लिए किया था।

क्या फायदा होगाा पाकिस्तान की नौसेना को

इन टाइप 054ए/पी जहाजों की लंबाई 134 मीटर और चौड़ाई 16 मीटर है। ये चार शांक्सी 16पीए6 एटीसी डीजल इंजनों से चलती हैं, जो 5700 किलोवॉट की ताकत देती हैं। जहाज की अधिकतम रफ्तार 27 नॉट्स यानी करीब 50 किलोमीटर प्रति घंटा है और यह 8,000 नौटिकल मील तक सफर कर सकता है।

हथियारों की बात करें तो यह फ्रिगेट एक मल्टी-रोल प्लेटफॉर्म है। एयर डिफेंस के लिए इसमें 32-सेल वर्टिकल लॉन्च सिस्टम (वीएलएस) लगा है, जो एलवाई-80एन सरफेस-टू-एयर मिसाइलें दाग सकता है। सतह से सतह पर हमला करने के लिए इसमें सीएम-302 एंटी-शिप मिसाइलें लगी हैं। पनडुब्बियों से निपटने के लिए इसमें टाइप 87 रॉकेट लॉन्चर और यू-7 टॉरपीडो लॉन्चर मौजूद हैं।

करीबी लड़ाई के लिए इस जहाज में 76 मिमी का मरीन कैनन एच/पीजे-26 और दो टाइप 1130 क्लोज-इन वेपन सिस्टम लगे हैं, जो आने वाली किसी भी मिसाइलों को रास्ते में ही नष्ट कर सकते हैं। साथ ही इसमें दो टाइप 726-4 डिकॉय लॉन्चर भी हैं जो गाइडेड मिसाइलों को भी कन्फ्यूज कर सकते हैं।

एडमिरल नविद अशरफ ने कहा कि इन आधुनिक जहाजों के आने से पाकिस्तान नौसेना को नई तकनीकी ताकत मिली है। चीन और पाकिस्तान के बीच यह सहयोग रक्षा उत्पादन में गहराई तक पहुंच चुका है। पाकिस्तान ने हाल के वर्षों में चीन से सिर्फ युद्धपोत ही नहीं, बल्कि ड्रोन, मिसाइल और रडार सिस्टम जैसी तकनीकें भी हासिल की हैं।

रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान को एक फ्रिगेट की कीमत लगभग 348 मिलियन अमेरिकी डॉलर यानी करीब 2,900 करोड़ रुपये पड़ी है। चीन के लिए भी यह उसकी अब तक की सबसे बड़ी मरीन एक्सपोर्ट डील मानी जा रही है।

भारत का नीलगिरी क्लास स्टील्थ फ्रिगेट्स

हिंद महासागर क्षेत्र में भारत और पाकिस्तान की नौसेनाओं के बीच संतुलन बनाए रखना हमेशा रणनीतिक महत्व का विषय रहा है। पाकिस्तान को चीन से मिलने वाले ये जहाज भारतीय नौसेना के लिए नई चुनौती साबित हो सकते हैं। वहीं, भारत ने भी नौसेना के आधुनिकीकरण के तहत प्रोजेक्ट 17ए शुरू किया है, जिसके तहत नीलगिरी क्लास स्टील्थ फ्रिगेट्स तैयार की जा रही हैं।

INS Nilgiri Class
INS Nilgiri Class

इनका निर्माण मुंबई की मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड और कोलकाता की गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स कर रहे हैं। 2025 तक चार जहाज आईएनएस नीलगिरी, आईएनएस हिमगिरी, आईएनएस उदयगिरी और आईएनएस तारागिरी भारतीय नौसेना में शामिल हो चुके हैं।

इन जहाजों का वजन लगभग 6,500 टन है, यानी यह पाकिस्तान की तुघरिल क्लास से करीब 60 फीसदी भारी हैं। इनमें 75 फीसदी से अधिक स्वदेशी तकनीक का उपयोग किया गया है। निलगिरी क्लास जहाज स्टील्थ डिजाइन पर आधारित हैं, जिससे रडार पर इनका पता लगाना बेहद मुश्किल होता है।

इनमें बराक-8 मिसाइल सिस्टम, ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइलें और वरुणास्त्र टॉरपीडो जैसे आधुनिक हथियार शामिल हैं। ये जहाज एमएफ-स्टार रडार सिस्टम से लैस हैं, जो एक साथ कई लक्ष्यों को ट्रैक कर सकता है और मिसाइल गाइडेंस देता है।

भारत के पास एमएच-60आर मल्टी-रोल हेलीकॉप्टर भी हैं, जो समुद्र में पनडुब्बियों की पहचान और उन्हें नष्ट करने में सक्षम हैं। नीलगिरी क्लास की गति लगभग 30 नॉट्स (55 किमी/घंटा) और रेंज 8,000 नौटिकल माइल्स तक है।

Tughril vs Nilgiri Class: तुघरिल Vs नीलगिरी

अगर सीधी तुलना की जाए तो भारत की नीलगिरी क्लास फ्रिगेट्स तकनीक, मारक क्षमता और सेंसर सिस्टम के मामले में पाकिस्तान की तुघरिल क्लास से कहीं आगे हैं।

तुघरिल क्लास में सीएम-302 मिसाइलें हैं जिनकी रेंज लगभग 250 किलोमीटर है, जबकि नीलगिरी क्लास की ब्रह्मोस मिसाइलें 300 किलोमीटर से अधिक दूरी तक लक्ष्य भेद सकती हैं और तीन गुना तेज मैक 3 की रफ्तार से उड़ती हैं।

पाकिस्तान की फ्रिगेट्स में टाइप 382 3डी रडार है, जबकि भारत की निलगिरी क्लास में एमएफ-स्टार एईएसए रडार लगा है, जो ज्यादा सटीक और लंबी दूरी तक टारगेट को ट्रैक कर सकता है।

एंटी-सबमरीन वॉरफेयर में भी भारत को बढ़त हासिल है। निलगिरी क्लास में वरुणास्त्र टॉरपीडो, एडवांस सोनार सिस्टम और एमएच-60आर हेलीकॉप्टर शामिल हैं, जबकि पाकिस्तान की फ्रिगेट्स अभी भी चीन की पारंपरिक तकनीक पर निर्भर हैं।

2025 में भारतीय नौसेना ने 10 से अधिक जहाज कमीशन

भारत की नौसेना अब “बिल्डर नेवी” बन चुकी है। 2025 में ही भारतीय नौसेना ने 10 से अधिक जहाज कमीशन किए हैं। भारत का लक्ष्य 2030 तक 175 से अधिक जहाजों का बेड़ा तैयार करना है।

भारत की प्रोजेक्ट 17बी योजना के तहत नई पीढ़ी की स्टील्थ फ्रिगेट्स बनाई जा रही हैं, जिनमें 75 फीसदी से ज्यादा स्वदेशी तकनीक होगी। इसके अलावा, नौसेना में राफेल-एम लड़ाकू विमान, टेडबीएफ और कलवरी क्लास पनडुब्बियां शामिल हो रही हैं।