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Pakistan Fake Propaganda: ऑपरेशन सिंदूर के महीनों बाद पाकिस्तान का प्रोपेगैंडा, सोशल मीडिया पर शेयर कर रहा फर्जी सैटेलाइट इमेज, बेनकाब हुआ झूठ

Pakistan Fake Propaganda
Photo Credit: Damien Symon/X

Pakistan Fake Propaganda: ऑपरेशन सिंदूर के महीनों बाद पाकिस्तान एक बार फिर सोशल मीडिया पर नया प्रोपेगेंडा फैलाने में जुट गया है। पाकिस्तान आधारित कुछ सोशल मीडिया अकाउंट और उनसे जुड़े हैंडल फेक सैटेलाइट तस्वीरें शेयर कर यह दावा कर रहे हैं कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत के पंजाब में, खासतौर पर अमृतसर के आसपास, भारतीय सैन्य ठिकानों पर हमले किए गए थे। लेकिन पाकिस्तान के ये दावे बिना किसी ठोस सबूत के हैं।

डिफेंस सूत्रों और ओपन सोर्स एनालिस्ट्स की जांच में यह साफ हो चुका है कि इन तस्वीरों में दिखाए जा रहे इलाकों में किसी भी तरह की तबाही या नुकसान के संकेत नहीं दिखे हैं। जिन सैन्य ठिकानों का नाम लेकर दावे किए जा रहे हैं, वे पूरी तरह सुरक्षित हैं और वहां पर किसी भी हमले के निशान भी नहीं हैं। (Pakistan Fake Propaganda)

Pakistan Fake Propaganda: बिना सबूत के दावे, सैटेलाइट तस्वीरों का खेल

पाकिस्तान से जुड़े सोशल मीडिया अकाउंट्स जिन सैटेलाइट इमेजेस को शेयर कर रहे हैं, उनमें न तो तस्वीर खींचे जाने की तारीख दी गई है और न ही यह बताया गया है कि वे किस सैटेलाइट से ली गई हैं। किसी भी सैटेलाइट इमेज की विश्वसनीयता के लिए टाइमस्टैम्प, सैटेलाइट सोर्स और रेजोल्यूशन जैसी जानकारियां बेहद जरूरी होती हैं, लेकिन यहां यह सब गायब हैं।

फैक्ट चेक में यह भी सामने आया है कि जिन जगहों को “टारगेट” बताया जा रहा है, वहां न तो विस्फोट के गड्ढे हैं, न मलबा, न जले हुए निशान और न ही किसी तरह का स्ट्रक्चरल डैमेज दिखाई दिया। अगर वाकई किसी सैन्य ठिकाने पर ऐसे हमले होते हैं, तो ऐसे संकेत साफ तौर पर दिखाई देते हैं। (Pakistan Fake Propaganda)

Pakistan Fake Propaganda: गलत जानकारी फैलाने की कोशिश

सैटेलाइट इमेजरी एक्सपर्ट डेमियन सिमोन कहते हैं, “सोशल मीडिया पर जानबूझकर भ्रामक तस्वीरें फैलाकर यह दावा किया जा रहा है कि पाकिस्तान ने भारत के पंजाब के अमृतसर में सैन्य ठिकानों पर हमले किए हैं। लेकिन इन तस्वीरों की स्वतंत्र जांच में साफ हो गया है कि जिन जगहों को निशाना बताए जा रहे हैं, वहां किसी भी तरह की तबाही या नुकसान के कोई निशान नहीं हैं। न तो विस्फोट के संकेत दिखते हैं और न ही किसी ढांचे को नुकसान पहुंचा है। यह पूरी कोशिश गलत जानकारी फैलाने की है। ऐसे और भी कमजोर दावों वाली तस्वीरें लगातार सामने आ रही हैं, जिनकी पड़ताल कर उन्हें एक-एक करके बेनकाब किया जा रहा है। छुट्टियों के बावजूद यह प्रक्रिया जारी रहेगी।” (Pakistan Fake Propaganda)

सात महीने बाद अचानक क्यों सामने आईं तस्वीरें

सबसे बड़ा सवाल इन दावों के समय को लेकर उठ रहा है। मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी पाकिस्तान अपने दावों के समर्थन में एक भी भरोसेमंद सैटेलाइट इमेज नहीं दिखा सका था। अब करीब सात महीने बाद अचानक ऐसी तस्वीरों का सामने आना इशारा करता है कि यह सब बाद में गढ़ी गई कहानी है।

डिफेंस एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह “पोस्ट-फैक्टो प्रोपेगैंडा” की एक क्लासिक मिसाल है, जहां पहले बुरी तरह मार खाने के बाद डिजिटल कंटेंट के जरिए जीत की कहानी गढ़ने की कोशिश की जाती है। (Pakistan Fake Propaganda)

Pakistan Fake Propaganda: पहले भी फैल चुकी हैं ऐसी झूठी कहानियां

यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान से जुड़े सोशल मीडिया नेटवर्क ने इस तरह के बढ़ा-चढ़ाकर दावे किए हों। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान और उसके तुरंत बाद भी तथाकथित “विक्ट्री रेशियो”, भारत के “स्ट्रैटेजिक सेंटर ऑफ ग्रैविटी” पर हमले और बड़े नुकसान के दावे किए गए थे। लेकिन इन सभी बातों को न तो किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था ने स्वीकार किया और न ही कोई स्वतंत्र जांच उन्हें सही साबित कर पाई। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन दावों को गंभीरता से नहीं लिया गया, क्योंकि उनके साथ कोई भरोसेमंद डेटा या सबूत मौजूद नहीं थे। (Pakistan Fake Propaganda)

Pakistan Fake Propaganda: ओपन सोर्स एनालिस्ट्स ने बताया झूठा

ओपन सोर्स इंटेलिजेंस यानी ओएसआईएनटी पर काम करने वाले कई एक्सपर्ट्स ने इन नई सैटेलाइट तस्वीरों का बारीकी से अध्ययन किया। उनके मुताबिक, तस्वीरों में जानबूझकर बहुत सीमित एंगल दिखाए गए हैं। इनमें हमले के बाद दिखने वाले आम संकेत पूरी तरह गायब हैं।

आमतौर पर किसी एयर स्ट्राइक या मिसाइल हमले के बाद गड्ढे, आसपास का मलबा, जलने के निशान, टूटी हुई इमारतें या सेकेंडरी एक्सप्लोजन के संकेत दिखते हैं। लेकिन यहां ऐसी कोई बात नजर नहीं आती। उन्हीं लोकेशंस की पुरानी और नई तस्वीरों की तुलना करने पर भी कोई फर्क नहीं दिखाई दिया। (Pakistan Fake Propaganda)

Pakistan Fake Propaganda: फिर भी क्यों जारी है प्रचार

पाकिस्तान की तरफ से ऐसी झूठी तस्वीरों का लगातार प्रचार किया जाना इस ओर इशारा करता है कि यह कोई सामान्य गलती या गलतफहमी नहीं, बल्कि एक सोची-समझी डिसइन्फॉर्मेशन मुहिम है। डिफेंस एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस तरह की कोशिशें अक्सर घरेलू ऑडियंस को यह दिखाने के लिए किए जाते हैं कि “कुछ हासिल हुआ”, भले ही हकीकत कुछ और हो।

इसके साथ ही, अंतररष्ट्रीय स्तर पर भी भ्रम पैदा करने की कोशिश की जाती है, ताकि असल हालात पर सवाल खड़े किए जा सकें। (Pakistan Fake Propaganda)

Pakistan Fake Propaganda: राफेल से लेकर नौसेना तक, एक जैसा पैटर्न

सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तान का यह रवैया कोई नया नहीं है। जब भारत ने राफेल फाइटर जेट्स को वायुसेना में शामिल किया था, तब भी सोशल मीडिया पर राफेल के क्रैश, टेक्निकल फेल्योर और कमजोर होने के झूठे वीडियो फैलाए गए थे। बाद में जांच में पता चला कि वे वीडियो या तो पुराने थे, किसी और देश के थे या वीडियो गेम फुटेज थे।

अब वही तरीका नौसेना और जमीनी अभियानों को लेकर अपनाया जा रहा है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जब पाकिस्तान को कुछ हासिल नहीं हुआ था, तो डिजिटल दुनिया में एक “विक्ट्री नैरेटिव” गढ़ने की कोशिश शुरू कर दी गई थी। (Pakistan Fake Propaganda)

Pakistan Fake Propaganda: AI डीपफेक्स का बढ़ता इस्तेमाल

हाल के सालों में इस तरह की टैक्टिक्स में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई का इस्तेमाल भी बढ़ा है। डिफेंस सूत्र बताते हैं कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद कुछ वीडियो ऐसे भी सामने आए, जिनमें भारतीय सैन्य अधिकारियों को कथित तौर पर नुकसान स्वीकार करते या ऑपरेशन की आलोचना करते दिखाया गया। बाद में ये वीडियो डीपफेक साबित हुए।

पीआईबी फैक्ट चेक और अन्य फैक्ट चेकिंग एजेंसियों ने ऐसे कई वीडियो को झूठा करार दिया है। शुरुआती जांच में इनमें से कई अकाउंट्स का लिंक पाकिस्तान से जुड़े डिजिटल नेटवर्क से मिला। (Pakistan Fake Propaganda)

Pakistan Fake Propaganda: इनफॉरमेशन वॉरफेयर की स्ट्रैटेजी

डिफेंस एनालिस्ट्स मानते हैं कि यह सब किसी एक घटना से जुड़ा नहीं है, बल्कि एक लंबी रणनीति का हिस्सा है। जब कुछ हासिल नहीं होता तो झूठी इनफॉरमेशन फैला कर जीत जैसा माहौल बनाया जाता है। इसका मकसद जमीनी सच्चाई को बदलना नहीं, बल्कि लोगों की सोच को प्रभावित करना होता है।

ऑपरेशन सिंदूर से जुड़ी मौजूदा सोशल मीडिया मुहिम भी इसी रणनीति की अगली कड़ी मानी जा रही है।

डिफेंस सूत्रों का कहना है कि आने वाले समय में इस तरह की डिजिटल फेख खबरें और बढ़ सकती हैं। ऐसे में सही जानकारी, फैक्ट चेक और जिम्मेदार रिपोर्टिंग की भूमिका और भी अहम हो जाती है।

कुल मिलाकर, ऑपरेशन सिंदूर को लेकर पाकिस्तान की यह नई सोशल मीडिया मुहिम एक बार फिर यह दिखाती है कि जब जमीन पर कुछ दिखाने को नहीं होता, तो कहानियां इंटरनेट पर गढ़ी जाती है। लेकिन सच्चाई यही है कि बिना सबूतों के ऐसे दावे सिर्फ प्रोपेगेंडा बनकर रह जाते हैं, जिनकी उम्र बहुत लंबी नहीं होती। (Pakistan Fake Propaganda)

Indian Army Universal Rocket Launcher Deal: भारतीय सेना को मिलेगा यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम, नाइब लिमिटेड को 292.69 करोड़ का इमरजेंसी ऑर्डर

Indian Army Universal Rocket Launcher Deal

Indian Army Universal Rocket Launcher Deal: भारतीय सेना ने अपनी आर्टिलरी क्षमता को और बढ़ाने के लिए पुणे की नाइब कंपनी को करीब 292.69 करोड़ रुपये का बड़ा ऑर्डर दिया है। यह ऑर्डर सेना ने इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट प्रावधान के तहत दिया है। इस समझौते के तहत कंपनी भारतीय सेना को लंबी दूरी तक अचूक मार करने वाले यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम उपलब्ध कराएगी। जिससे आने वाले समय में सेना की फायर पावर को नई मजबूती मिलेगी।

कंपनी ने इस सौदे की जानकारी बीएसई और एनएसई को भी दी है। कंपनी का कहना कि यह कॉन्ट्रैक्ट भारतीय सेना की इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट प्रोविजन के तहत किया गया है, जिसका मतलब है कि सिस्टम को कम समय में सेना तक पहुंचाया जाएगा, ताकि मौजूदा सुरक्षा जरूरतों को तुरंत पूरा किया जा सके।

यह समझौता ऐसे समय हुआ है, जब सेना सीमाओं पर अपनी ऑपरेशनल तैयारियों को और मजबूत करने पर फोकस कर रही है। हाल के सालों में बदलते सुरक्षा हालात और लंबी दूरी तक मार करने वाले हथियारों की जरूरत को देखते हुए सेना आधुनिक रॉकेट लॉन्चर सिस्टम को तेजी से शामिल कर रही है।

नाइब लिमिटेड को मिला यह ऑर्डर यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर प्लेटफॉर्म के लिए है। इस प्लेटफॉर्म की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह अलग-अलग रेंज और कैलिबर के रॉकेट्स को एक ही लॉन्चर से दागा जा सकता है। रक्षा समाचार डॉट कॉम को मिली जानकारी के अनुसार, यह सिस्टम दो अलग-अलग दूरी वाले रॉकेट्स को सपोर्ट कर सकता है। (Indian Army Universal Rocket Launcher Deal)

Indian Army Universal Rocket Launcher Deal: 12 महीनों में सप्लाई

नाइब लिमिटेड को इस कॉन्ट्रैक्ट के तहत यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम से जुड़े लॉन्चर, ग्राउंड इक्विपमेंट, एक्सेसरीज, एन्हांस्ड सिस्टम प्रोजेक्टाइल्स और एम्युनिशन की सप्लाई करनी है। कंपनी को यह पूरी डिलीवरी 12 महीनों के भीतर चरणबद्ध तरीके से पूरी करनी होगी। यानी तय समय के अंदर अलग-अलग किस्तों में सेना को यह सारा सिस्टम सौंपा जाएगा।

कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों के मुताबिक, नाइब लिमिटेड को कॉन्ट्रैक्ट साइन होने के 30 दिनों के भीतर कुल कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू का 10 फीसदी हिस्सा परफॉर्मेंस-कम-वारंटी बैंक गारंटी के तौर पर जमा करना होगा। ताकि सप्लाई समय पर और तय क्वॉलिटी स्टैंडर्ड्स के अनुसार हो सके। (Indian Army Universal Rocket Launcher Deal)

क्या है यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम

यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम दरअसल इजरायल की डिफेंस कंपनी एल्बिट सिस्टम्स के बनाए पीयूएलएस (प्रिसाइज एंड यूनिवर्सल लॉन्चिंग सिस्टम) पर आधारित है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह एक मल्टी-कैलिबर और मल्टी-रेंज प्लेटफॉर्म है।

सूत्रों का कहना है कि पीयूएलएस को भारत में “सूर्या” नाम दिया जा सकता है। पीयूएलएस यह एक मॉड्यूलर मल्टीपल रॉकेट लॉन्चर (एमआरएल) है। इस सिस्टम से अलग-अलग रेंज के रॉकेट दागे जा सकते हैं। इसमें 150 किलोमीटर और 300 किलोमीटर तक मार करने वाले रॉकेट्स को इंटीग्रेट करने की क्षमता है। सेना के लिए यह इसलिए अहम है, क्योंकि अब अलग-अलग रेंज के लिए अलग-अलग लॉन्चर रखने की जरूरत नहीं पड़ेगी। (Indian Army Universal Rocket Launcher Deal)

Indian Army Universal Rocket Launcher Deal:  एक प्लेटफॉर्म, कई रॉकेट

डिफेंस सूत्रों के मुताबिक, इस सिस्टम को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह 122 एमएम, 160 एमएम और 306 एमएम जैसे अलग-अलग कैलिबर के रॉकेट्स के साथ काम कर सकता है। रॉकेट पॉड्स की संख्या और कॉन्फिगरेशन इस्तेमाल होने वाले रॉकेट पर निर्भर करती है।

यह लॉन्चर 6×6 या 8×8 व्हीकल चैसिस पर लगाया जा सकता है, जिससे इसे अलग-अलग इलाकों में तेजी से तैनात किया जा सके। पहाड़ी क्षेत्र हों, रेगिस्तानी इलाका हो या मैदानी क्षेत्र, यह सिस्टम हर मौसम और हर भूभाग में ऑपरेशन के लिए तैयार किया गया है। (Indian Army Universal Rocket Launcher Deal)

Indian Army Universal Rocket Launcher Deal: शूट एंड स्कूट क्षमता

यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम की एक बड़ी खूबी इसकी “शूट एंड स्कूट” क्षमता है। यानी रॉकेट फायर करने के तुरंत बाद लॉन्चर अपनी जगह बदल सकता है। आधुनिक युद्ध में यह क्षमता बहुत जरूरी मानी जाती है, क्योंकि इससे दुश्मन की काउंटर फायर से बचा जा सकता है।

लॉन्चर के पीछे की तरफ एक रिमोटली कंट्रोल्ड और पावर्ड यूनिट लगी होती है। फायरिंग के समय वाहन के दोनों तरफ और पीछे हाइड्रॉलिक स्टेबलाइजर्स लगाए जाते हैं, जिससे लॉन्चर पूरी तरह स्थिर रहता है, इससे फायरिंग के दौरान सटीकता बनी रहती है और सिस्टम सुरक्षित रहता है। (Indian Army Universal Rocket Launcher Deal)

मेक इन इंडिया को बढ़ावा

यह सौदा ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के लिहाज से भी काफी अहम माना जा रहा है। जुलाई 2025 में नाइब लिमिटेड ने एल्बिट सिस्टम्स के साथ समझौता किया था, जिसके तहत पीयूएलएस सिस्टम का निर्माण भारत में किया जाना है। अब भारतीय सेना के लिए इस सिस्टम का ऑर्डर मिलना उसी साझेदारी का बड़ा नतीजा माना जा रहा है।

इससे देश के भीतर रक्षा उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय सप्लाई चेन मजबूत होगी। इसके साथ ही छोटे और मझोले उद्योगों को भी इससे फायदा मिलने की उम्मीद है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में ऐसे सिस्टम्स के निर्यात की संभावनाएं भी खुल सकती हैं।

इस सिस्टम के भारतीय सेना में शामिल होने के बाद यह पहला यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम होगा, जिसे सेना ऑपरेशनल तौर पर इस्तेमाल करेगी। इससे पहले मई 2025 में भी नाइब लिमिटेड को एक इजरायली टेक्नोलॉजी कंपनी से 150.62 करोड़ रुपये का एक और ऑर्डर मिला था। (Indian Army Universal Rocket Launcher Deal)

सेना की मारक क्षमता में इजाफा

भारतीय सेना पिछले कुछ वर्षों से लंबी दूरी के रॉकेट और मिसाइल सिस्टम्स पर खास ध्यान दे रही है। पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम के एडवांस वर्जन, गाइडेड रॉकेट्स और अब यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर जैसे प्लेटफॉर्म इसी रणनीति का हिस्सा हैं।

150 से 300 किलोमीटर तक मार करने वाले रॉकेट्स से लैस यह सिस्टम सेना को दुश्मन के इलाकों में गहराई तक मौजूद लक्ष्यों पर सटीक हमला करने की क्षमता देगा। इससे सीमावर्ती इलाकों में तैनात यूनिट्स को तेज प्रतिक्रिया और ज्यादा ऑपरेशनल विकल्प मिलेंगे। (Indian Army Universal Rocket Launcher Deal)

रणनीतिक तौर पर अहम कदम

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम जैसे प्लेटफॉर्म भारतीय सेना को भविष्य की चुनौतियों के लिए बेहतर तैयार करते हैं। एक ही सिस्टम से अलग-अलग रेंज के रॉकेट दागने की क्षमता आधुनिक युद्ध के लिहाज से बेहद अहम है। यह कॉन्ट्रैक्ट देश की रॉकेट आर्टिलरी क्षमता को नई दिशा देने वाला कदम माना जा रहा है। आने वाले एक साल में जब यह सिस्टम सेना के पास पूरी तरह पहुंच जाएगा, तो भारतीय सेना की फायर पावर और ऑपरेशनल तैयारी में इसका असर साफ दिखाई दे सकता है। (Indian Army Universal Rocket Launcher Deal)

Your Navy at Work: How the Indian Navy’s Quiet Missions in 2025 Shaped Maritime Power for 2026

Indian Navy 2025 missions

Indian Navy 2025 missions: If images of aircraft carriers dominating the Indian Ocean or headlines around Operation Sindoor lingered this year, that is understandable. But beyond those dramatic moments, the Indian Navy spent 2025 doing what it does best, working relentlessly, often quietly, across thousands of nautical miles.

From chasing smugglers and rescuing stranded sailors to delivering disaster relief and inducting new warships almost every other month, the Navy’s year was defined less by spectacle and more by substance.

Together, these efforts reveal not just what the Navy did in 2025, but how it is shaping the maritime balance heading into 2026.

One Boarding at a Time: Safeguarding the Sea Lanes

On March 31, 2025, INS Tarkash, operating deep in the Western Indian Ocean, intercepted a suspicious dhow after inputs from a P-8I maritime patrol aircraft. Naval boarding teams moved in swiftly. By dawn, nearly 2,500 kg of narcotics had been seized. It was a telling snapshot of a year-long effort.

Counter-narcotics operations, anti-piracy patrols, and merchant-vessel escorts under Operation Sankalp continued at a steady pace. These missions rarely generate dramatic visuals, but they form the backbone of maritime security. With nearly 90% of India’s trade by volume moving by sea, uninterrupted shipping is an economic necessity.

From Detection to Deterrence: MH-60R Seahawks Redefines Indian Navy’s ASW Doctrine

Every escorted tanker and every interdicted smuggler quietly raises the cost of maritime crime and reassures global shipping that India’s surrounding waters are not ungoverned spaces.

When Sailors Become Lifelines

The Navy’s role in 2025 was not limited to enforcing order. Often, it was about saving lives.

That reality was most visible after the 7.7-magnitude earthquake in Myanmar in March. Within days, Operation Brahma was launched. Ships including INS Satpura, Gharial, Karmuk, Savitri, and LCU-52 sailed with hundreds of tonnes of relief material—food, medicines, tents, and emergency supplies.

For survivors along Myanmar’s battered coast, the arrival of Indian naval ships meant immediate help, not distant promises. Coordinated with Indian Air Force airlifts and Army medical teams, the operation reinforced India’s image as a first responder in the region.

Similar moments unfolded through the year. Naval helicopters winched injured sailors from distressed vessels. Firefighting teams battled blazes aboard ships in the Gulf of Aden and off the Kerala coast. In each case, sailors trained for combat switched seamlessly into rescue mode calm, precise and human.

The message was unmistakable, the Indian Navy is both a fighting force and a force for relief.

Training for War, Building Trust

Preparedness remains the Navy’s insurance policy. Early in the year, TROPEX-25, its most complex warfighting exercise, tested ships, submarines, aircraft and cyber capabilities in a simulated high-intensity conflict. In retrospect, many within the service see it as timely preparation for real-world contingencies later in the year.

But 2025 was also about partnerships.

Exercises—Consolidation to Collaboration

INS Vikrant operated alongside the UK Carrier Strike Group during Exercise KONKAN-25, showcasing carrier interoperability with the UK, Norway and Japan. Malabar, held off Guam, brought together the Quad navies for advanced combat drills. The French-led La Pérouse exercise assembled nine navies to practise securing strategic sea lanes.

Bilateral exercises — Varuna (France), JIMEX (Japan), Bongo Sagar (Bangladesh) — and multilateral engagements such as SIMBEX, Sea Dragon and Pacific Reach deepened operational familiarity.

A quieter but symbolic milestone came through Mission IOS SAGAR, where 44 naval personnel from nine friendly countries embarked an Indian naval ship. The initiative culminated in AIKEYME, the first India–Africa multilateral maritime exercise — a statement of intent about shared security in the Indian Ocean.

Exercises, naval planners note, are not just about tactics. They are about building trust before a crisis demands it.

Building Ships, Building the Future

2025 also marked a decisive shift in how India builds maritime power.

With INS Tamal commissioned in Russia, becoming the last foreign-built warship, the Navy doubled down on indigenous construction.

Among the notable inductions were,

  • INS Surat, a Visakhapatnam-class destroyer
  • INS Nilgiri, Himgiri and Udaygiri, the first Nilgiri-class stealth frigates
  • INS Vagsheer, the final Kalvari-class submarine
  • INS Arnala, Androth and Mahe, shallow-water anti-submarine craft
  • INS Nistar, the first indigenously designed diving support vessel
  • INS Nirdeshak and Ikshak, large survey ships

Each ship represents more than naval firepower. Indigenous construction drives advanced manufacturing, electronics and propulsion technologies, generating skilled employment and long-term strategic autonomy.

Simply put, India is no longer just buying naval power, it is building it.

Why 2025 Matters

Taken together, the Navy’s actions in 2025 tell a coherent story. Constabulary missions protect commerce. Exercises translate diplomacy into operational reality.

Disaster-relief missions build credibility. Indigenous shipbuilding strengthens both security and the economy.

For the Indo-Pacific, this contributes to stability. For India, it means resilience—economic, diplomatic, and strategic.

Modern maritime power is not forged overnight. It is accumulated patrol by patrol, exercise by exercise, ship by ship.

Eyes on 2026

The coming year will bring visible milestones. February 2026’s International Fleet Review and MILAN-26 will place the Indian Navy’s growing capabilities on global display, aligned with the MAHASAGAR vision of India as a collaborative maritime hub.

Behind the scenes, the pace will only quicken. The Navy expects one new warship induction roughly every six weeks, steadily expanding both its fleet and its industrial base.

Away from headlines, sailors will continue boarding suspect vessels, flying long patrols and responding to distress calls. The work rarely pauses because the sea never does.

And that, perhaps, is the clearest lesson of the year gone by: while moments like carrier deployments grab attention, it is the Navy’s constant, unseen presence that truly keeps India’s maritime world turning.

DGBR Takes Charge: लेफ्टिनेंट जनरल हरपाल सिंह बने BRO के 29वें महानिदेशक, बॉर्डर इलाकों में चल रहे रणनीतिक प्रोजेक्टस को मिलेगी रफ्तार

DGBR Takes Charge
Lt Gen Harpal Singh (VSM)

DGBR Takes Charge: भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल हरपाल सिंह ने सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) के 29वें डायरेक्टर जनरल के रूप में पदभार संभाल लिया। उन्होंने लेफ्टिनेंट जनरल रघु श्रीनिवासन की जगह ली है, जो बीआरओ के 28वें डीजी थे और वे 31 दिसंबर 2025 को रिटायर हो गए। लेफ्टिनेंट जनरल हरपाल सिंह को यह जिम्मेदारी ऐसे समय में मिली है, जब बॉर्डर इलाकों में सड़क, पुल और अन्य रणनीतिक इंफ्रास्ट्रक्चर का महत्व लगातार बढ़ता जा रहा है।

लेफ्टिनेंट जनरल हरपाल सिंह को कोर ऑफ इंजीनियर्स का अनुभवी अधिकारी माना जाता है। उन्हें तीन दशक से अधिक का सैन्य अनुभव है। अपने करियर के दौरान उन्होंने देश के अलग-अलग इलाकों में कमांड, स्टाफ और नेतृत्व से जुड़ी जिम्मेदारियां निभाई हैं।

बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन देश के सीमावर्ती और दुर्गम इलाकों में सेनाओं के आवागमन के लिए रणनीतिक इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने का अहम काम करता है। संगठन की स्थापना 7 मई 1960 को हुई थी। अब तक बीआरओ देशभर में 63,700 किलोमीटर से ज्यादा सड़कों का निर्माण कर चुका है। इसके अलावा 1,179 पुल, 7 सुरंगें और 22 एयरफील्ड्स भी बनाए गए हैं।

बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन के ये प्रोजेक्ट्स न सिर्फ सेना की आवाजाही को आसान बनाते हैं, बल्कि सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों के जीवन को भी बेहतर बनाते हैं। सड़कों और पुलों से इन क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य और व्यापार जैसी सुविधाओं तक पहुंच आसान होती है।

लेफ्टिनेंट जनरल हरपाल सिंह को जून 1991 में भारतीय सेना की कॉर्प्स ऑफ इंजीनियर में कमीशन मिला था। अपने तीन दशक से अधिक लंबे सैन्य करियर में उन्होंने कई महत्वपूर्ण नियुक्तियां संभाली हैं। इनमें कमांड और स्टाफ की जिम्मेदारियां शामिल रही हैं, जहां उन्होंने इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट, इंजीनियरिंग क्षमताओं को मजबूत करने और मानव संसाधन प्रबंधन पर काम किया। बीआरओ के डीजी का पद संभालने से पहले वे एक सीनियर लीडरशिप पोजिशन पर थे. जहां उन्होंने इंफ्रास्ट्रक्चर विकास को मजबूत करने में योगदान दिया।

बीआरओ के अधिकारी और कर्मी देश के सबसे मुश्किल इलाकों में काम करते हैं। ऊंचे पहाड़, अत्यधिक ठंड, बर्फबारी, भूस्खलन और सीमित संसाधनों के बावजूद संगठन लगातार अपने काम को अंजाम देता है। इन परिस्थितियों में बीआरओ के सभी रैंक्स और कैजुअल पेड लेबरर्स का मनोबल और समर्पण को संगठन की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है।

DGBR Takes Charge
Lt Gen (Retd) Raghu Srinivasan

इससे पहले लेफ्टिनेंट जनरल रघु श्रीनिवासन बीआरओ के 28वें डीजीबीआर रहे और उन्होंने 30 सितंबर 2023 से 31 दिसंबर 2025 तक यह जिम्मेदारी संभाली। कोर ऑफ इंजीनियर्स के अनुभवी अधिकारी के तौर पर उनका पूरा फोकस सीमावर्ती इलाकों में इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत करने, आपदा प्रबंधन और संगठन को आधुनिक बनाने पर रहा।

लेफ्टिनेंट जनरल रघु श्रीनिवासन के नेतृत्व में बीआरओ ने कई ऐसे प्रोजेक्ट पूरे किए, जिनका सीधा असर देश की सुरक्षा और सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास पर पड़ा। उनके कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि बीआरओ ने 110 से अधिक बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को तय समय में पूरा किया। इनमें रणनीतिक सड़कें, अहम पुल और सुरंगें शामिल थीं, जिससे लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल और लाइन ऑफ कंट्रोल पर सेना की आवाजाही आसान हुई।

उनके नेतृत्व में लेह-लद्दाख और अन्य ऊंचाई वाले इलाकों में कनेक्टिविटी को खास मजबूती मिली। बीआरओ ने इस दौरान एक हजार किलोमीटर से ज्यादा नई सड़कों का निर्माण किया और कई अहम पुल तैयार किए, जिससे दुर्गम इलाकों में पहुंच पहले से कहीं ज्यादा आसान हो गई। उनके कार्यकाल के दौरान आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में भी बीआरओ की भूमिका बेहद अहम रही। वर्ष 2023 में सिक्किम में आई भीषण बाढ़ के दौरान बीआरओ ने बेहद कम समय में सड़कों को बहाल किया। इससे राहत और बचाव कार्यों को गति मिली। इसी तरह उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में भूस्खलन की घटनाओं के बाद बीआरओ की टीमों ने तेजी से मलबा हटाकर रास्ते खोले।

रणनीतिक कनेक्टिविटी को बढ़ावा देना भी उनके कार्यकाल की एक बड़ी प्राथमिकता रही। पूर्वोत्तर भारत में, खासकर अरुणाचल प्रदेश और मिजोरम जैसे राज्यों में, नए सड़क प्रोजेक्ट्स को आगे बढ़ाया गया। इसके अलावा लेफ्टिनेंट जनरल रघु श्रीनिवासन ने बीआरओ को तकनीकी रूप से मजबूत बनाने पर भी खास ध्यान दिया। उनके कार्यकाल में सर्वे और प्लानिंग के लिए ड्रोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल पर जोर दिया गया।

उनके योगदान को देखते हुए उन्हें कई बड़े सम्मान मिले। वर्ष 2025 में उन्हें परम विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित किया गया, जो देश की सेवा में उनके उत्कृष्ट योगदान का प्रतीक है। इससे पहले उन्हें विशिष्ट सेवा मेडल से भी सम्मानित किया जा चुका है।

Lt Gen Harpal Singh (VSM) assumed charge as the 29th Director General Border Roads (DGBR) of the Border Roads Organisation (BRO) on January 1, 2026, at a time when strategic infrastructure along India’s borders is gaining increasing importance. A highly experienced officer of the Corps of Engineers, he brings over three decades of command, staff and leadership experience in diverse and challenging terrains.

Air Marshal Nagesh Kapoor बने भारतीय वायु सेना वाइस चीफ ऑफ एयर स्टाफ, एयर मार्शल नर्मदेश्वर तिवारी हुए रिटायर

Air Marshal Nagesh Kapoor
Air Marshal Nagesh Kapoor

Air Marshal Nagesh Kapoor: 2026 की शुरुआत के साथ ही एयर मार्शल नागेश कपूर ने 1 जनवरी को औपचारिक तौर पर भारतीय वायु सेना के वाइस चीफ ऑफ एयर स्टाफ का कार्यभार संभाल लिया। उन्होंने यह जिम्मेदारी एयर मार्शल नर्मदेश्वर तिवारी से ली, जो करीब 40 वर्षों की सेवा के बाद रिटायर हुए। यह नियुक्ति ऐसे समय में हुई है, जब वायुसेना मॉडर्नाइजेशन और ऑपरेशनल तैयारियों के एक अहम दौर से गुजर रही है।

एयर मार्शल नागेश कपूर का नाम वायु सेना में एक ऐसे अधिकारी के तौर पर लिया जाता है, जिन्होंने हर स्तर पर काम किया है। वह सिर्फ एक फाइटर पायलट ही नहीं, बल्कि एक क्वालिफाइड फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर और फाइटर कॉम्बैट लीडर भी रहे हैं। (Air Marshal Nagesh Kapoor)

Air Marshal Nagesh Kapoor: एनडीए से वायु सेना तक का सफर

एयर मार्शल नागेश कपूर ने दिसंबर 1985 में नेशनल डिफेंस अकादमी से स्नातक किया था। इसके बाद 6 दिसंबर 1986 को उन्हें भारतीय वायुसेना की फ्लाइंग ब्रांच के फाइटर स्ट्रीम में कमीशन मिला। अपने फ्लाइंग करियर के दौरान उन्होंने मिग-21 और मिग-29 के सभी वेरिएंट्स पर उड़ान भरी है। विभिन्न कॉम्बैट और ट्रेनर विमानों पर उनके पास 3,400 घंटे से अधिक का उड़ान अनुभव है। (Air Marshal Nagesh Kapoor)

Air Marshal Nagesh Kapoor: ऑपरेशनल और कमांड जिम्मेदारियां

अपने करियर में एयर मार्शल कपूर ने कई महत्वपूर्ण ऑपरेशनल और कमांड जिम्मेदारियां निभाई हैं। वे सेंट्रल सेक्टर में एक फाइटर स्क्वाड्रन के कमांडिंग ऑफिसर रहे। इसके बाद उन्होंने वेस्टर्न सेक्टर में एक फ्लाइंग बेस के स्टेशन कमांडर के रूप में भी सेवा दी। इसके साथ ही वे एक प्रमुख एयर बेस के एयर ऑफिसर कमांडिंग भी रहे, जहां उन्होंने बेस की ऑपरेशनल और प्रशासनिक जिम्मेदारियों को संभाला। (Air Marshal Nagesh Kapoor)

Air Marshal Nagesh Kapoor: ट्रेनिंग और इंस्ट्रक्शन में अहम भूमिका

एयर फोर्स अकादमी में चीफ इंस्ट्रक्टर (फ्लाइंग) के रूप में रहते हुए उन्होंने पायलट ट्रेनिंग को मजबूत करने में भूमिका निभाई। इसी दौरान भारतीय वायुसेना में पीसी-7 मार्क-II विमान को शामिल करने और उसे पूरी तरह ऑपरेशनल बनाने में उनकी अहम भूमिका रही। इसके अलावा वे डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज, वेलिंगटन में डायरेक्टिंग स्टाफ के रूप में भी कार्य कर चुके हैं। (Air Marshal Nagesh Kapoor)

रणनीतिक और स्टाफ नियुक्तियां

एयर मार्शल नागेश कपूर ने कई अहम स्टाफ पदों पर भी काम किया। एयर मार्शल नागेश कपूर ने एयर हेडक्वार्टर्स में असिस्टेंट चीफ ऑफ एयर स्टाफ ऑपरेशंस (स्ट्रैटेजी) के पद पर काम किया। इस भूमिका में उन्होंने वायुसेना की ऑपरेशनल योजना और रणनीतिक तैयारियों से जुड़े काम संभाले। इसके अलावा वे साउथ वेस्टर्न एयर कमांड में एयर डिफेंस कमांडर भी रहे, जहां एयर डिफेंस नेटवर्क की जिम्मेदारी उनके पास थी।

उन्होंने सेंट्रल एयर कमांड में सीनियर एयर स्टाफ ऑफिसर के रूप में भी सेवाएं दीं। इसके बाद एयर हेडक्वार्टर्स में एयर ऑफिसर-इन-चार्ज पर्सनल के पद पर रहते हुए उन्होंने ह्यूमन रिसोर्सेज, पोस्टिंग्स और पर्सनल पॉलिसियों से जुड़े महत्वपूर्ण काम देखे। (Air Marshal Nagesh Kapoor)

रहे पाकिस्तान में डिफेंस अताशे

एयर मार्शल कपूर ने पाकिस्तान में डिफेंस अताशे के तौर पर भी काम किया। यह जिम्मेदारी बेहद संवेदनशील मानी जाती है। इस भूमिका में उन्होंने सैन्य कूटनीति और द्विपक्षीय रक्षा संवाद से जुड़े दायित्व निभाए।

ट्रेनिंग कमांड के एयर ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ रहे

वाइस चीफ ऑफ द एयर स्टाफ का पद संभालने से पहले एयर मार्शल कपूर ट्रेनिंग कमांड के एयर ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ रहे। इस दौरान वायुसेना के ट्रेनिंग सिस्टम, फ्लाइंग ट्रेनिंग और ग्राउंड ट्रेनिंग को मजबूत करने की जिम्मेदारी उनके पास थी। इसके बाद उन्होंने साउथ वेस्टर्न एयर कमांड के एयर ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ के रूप में भी सेवा दी। यह कमांड पश्चिमी सीमाओं की सुरक्षा और ऑपरेशनल तैयारियों के लिहाज से बेहद अहम मानी जाती है। (Air Marshal Nagesh Kapoor)

एयर मार्शल नागेश कपूर को उनकी उत्कृष्ट सेवा के लिए कई बड़े सम्मान मिले हैं। वर्ष 2008 में उन्हें वायु सेना मेडल (वीएम) मिला। 2022 में अति विशिष्ट सेवा मेडल (एवीएसएम) से सम्मानित किया गया। वर्ष 2025 में उन्हें परम विशिष्ट सेवा मेडल (पीवीएसएम) और सर्वोत्तम युद्ध सेवा मेडल (एसवाईएसएम) जैसे प्रतिष्ठित सम्मान मिले।

बता दें कि ऑपरेशन सिंदूर में उनके योगदान के लिए उन्हें 15 अगस्त 2025 को राष्ट्रपति ने द्वारा सर्वोत्तम युद्ध सेवा मेडल से सम्मानित किया थ। यह पहली बार था जब वायुसेना के सात अधिकारियों को एक साथ सर्वोत्तम युद्ध सेवा मेडल दिया गया, उनमें एयर मार्शल नागेश कपूर भी शामिल थे। एयर मार्शल कपूर उस समय साउथ वेस्टर्न एयर कमांड के एयर ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ थे, जो ऑपरेशन सिंदूर के दौरान मुख्य कमांडर थे। उन्होंने एयर ऑपरेशंस को लीड किया, जिसमें एयर डिफेंस, स्ट्राइक्स और सिविलियन कोऑर्डिनेशन शामिल था। (Air Marshal Nagesh Kapoor)

Indian Army Artillery: ‘गॉड ऑफ वॉर’ को और घातक बनाने की तैयारी! दुनिया में पहली बार 155 एमएम आर्टिलरी शेल को मिलेगी रैमजेट की पावर

Indian Army Artillery

Indian Army Artillery: भारतीय सेना दुनिया की पहली ऐसी सेना बनने की तरफ बढ़ रही है, जो रैमजेट तकनीक से लैस 155 एमएम आर्टिलरी शेल का इस्तेमाल करेगी। इस टेक्नोलॉजी के सफल होने पर सेना की तोपों की मारक दूरी में करीब 30 से 50 प्रतिशत तक का इजाफा होगा, जबकि गोले की घातक क्षमता भी पूरी तरह बनी रहेगी।

डिफेंस सूत्रों के मुताबिक, यह प्रोजेक्ट पूरी तरह आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत डेवलप किया जा रहा है और इसमें भारतीय सेना, आईआईटी मद्रास और रक्षा अनुसंधान से जुड़े संस्थान मिलकर काम कर रहे हैं। यह तकनीक भविष्य में भारतीय आर्टिलरी की तस्वीर ही बदल सकती है।

Indian Army Artillery: आर्टिलरी को और ताकतवर बनाने पर फोकस

भारतीय सेना पिछले कुछ सालों से अपनी आर्टिलरी क्षमता को मजबूत करने पर खास फोकस कर रही है। सेना का मकसद सिर्फ ज्यादा दूरी तक मार करना नहीं है, बल्कि ज्यादा सटीकता, तेज प्रतिक्रिया और दुश्मन की काउंटर फायर से सुरक्षित रहना भी है। इसी वजह से सेना ने लंबी दूरी के रॉकेट, प्रिसिजन एम्यूनिशन और अब रैमजेट पावर्ड आर्टिलरी शेल जैसी एडवांस टेक्नोलॉजी पर काम शुरू कर दिया है।

डिफेंस सूत्रों का कहना है कि मॉडर्न वॉरफेयर में आर्टिलरी की भूमिका फिर से बेहद अहम हो गई है। रूस-यूक्रेन युद्ध ने यह साफ कर दिया है कि लंबी दूरी से सटीक और लगातार फायर करने वाली आर्टिलरी किसी भी युद्ध का रुख बदल सकती है। भारतीय सेना भी इन्हीं अनुभवों से सीख लेकर अपनी तैयारी कर रही है। (Indian Army Artillery)

Indian Army Artillery: क्या है रैमजेट तकनीक और कैसे काम करती है

रैमजेट तकनीक आम तौर पर मिसाइलों में इस्तेमाल की जाती रही है। ब्रह्मोस जैसी सुपरसोनिक मिसाइल भी इसी तकनीक पर काम करती है। अब इसी तकनीक को पहली बार आर्टिलरी शेल में इस्तेमाल करने की तैयारी हो रही है।

सूत्रों ने बताया कि इस प्रोजेक्ट पर काम साल 2020 से चल रहा है। इसमें डीआरडीओ, आईआईटी मद्रास और आर्मी टेक्नोलॉजी बोर्ड मिलकर काम कर रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में इस तकनीक के कई प्रोटोटाइप तैयार किए गए और अलग-अलग फायरिंग रेंज में उनके ट्रायल किए गए। एयरो इंडिया 2025 में इसका प्रोटोटाइप सार्वजनिक रूप से दिखाया गया था, जहां बताया गया कि रामजेट तकनीक से 155 एमएम गोले की रेंज को 60 से 80 किलोमीटर तक बढ़ाया जा सकता है। यह मौजूदा 30 से 45 किलोमीटर की रेंज के मुकाबले काफी बड़ी छलांग मानी जा रही है।

आईआईटी मद्रास के एयरोस्पेस इंजीनियरिंग विभाग से जुड़े वैज्ञानिकों के अनुसार, रैमजेट एक एयर-ब्रीदिंग इंजन होता है। इसमें न तो कोई कंप्रेसर होता है और न ही टरबाइन। यह इंजन तभी काम करता है, जब शेल पहले से तेज स्पीड में हो। जैसे ही 155 एमएम शेल को तोप से फायर किया जाता है, वह लगभग मैक-2 की रफ्तार पकड़ लेता है। इसी स्पीड पर पहुंचते ही रैमजेट इंजन एक्टिव हो जाता है। (Indian Army Artillery)

रैमजेट में आगे से आने वाली हवा खुद ही कंप्रेस हो जाती है। फिर उसमें फ्यूल जलाया जाता है, जिससे गैस फैलती है और शेल को लगातार आगे की ओर धक्का मिलता रहता है। इसका फायदा यह होता है कि शेल सिर्फ शुरुआती फायरिंग पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि उड़ान के दौरान भी उसे अतिरिक्त ताकत मिलती रहती है। (Indian Army Artillery)

Indian Army Artillery: मौजूदा गोले में ही लग सकेगी नई तकनीक

डिफेंस सूत्रों के मुताबिक, रामजेट तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे मौजूदा 155 एमएम आर्टिलरी शेल पर ही रेट्रोफिट किया जा सकता है। यानी सेना को हर तोप के लिए अलग नया गोला विकसित करने की जरूरत नहीं होगी।

एक बार यह तकनीक पूरी तरह विकसित हो जाने के बाद इसे बोफोर्स, धनुष, के-9 वज्र, एटीएजीएस और एम-777 अल्ट्रा लाइट होवित्जर जैसी सभी 155 एमएम तोपों में इस्तेमाल किया जा सकेगा। इससे सेना को बहुत कम लागत में अपनी आर्टिलरी की क्षमता बढ़ाने का मौका मिलेगा। (Indian Army Artillery)

Indian Army Artillery: रेंज में जबरदस्त बढ़ोतरी की उम्मीद

डिफेंस सूत्र बताते हैं कि अभी भारतीय सेना की ज्यादातर 155 एमएम तोपों की प्रभावी रेंज करीब 30 से 40 किलोमीटर है। कुछ आधुनिक तोपें इससे थोड़ा ज्यादा भी मार कर सकती हैं। लेकिन रैमजेट पावर्ड शेल के आने से यही रेंज 50 से 80 किलोमीटर तक पहुंच सकती है।

कुछ अनुमानों में यह भी कहा जा रहा है कि भविष्य में इस तकनीक को और बेहतर बनाकर रेंज को 100 किलोमीटर से ज्यादा तक भी बढ़ाया जा सकता है। अगर ऐसा होता है, तो यह आर्टिलरी के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी बदलाव होगा। (Indian Army Artillery)

Indian Army Artillery: बेस-ब्लीड तकनीक से आगे  

अब तक आर्टिलरी की रेंज बढ़ाने के लिए बेस-ब्लीड तकनीक का इस्तेमाल किया जाता रहा है। इसमें शेल के पीछे से गर्म गैस छोड़ी जाती है, जिससे हवा का खिंचाव कम होता है और रेंज करीब 10 से 20 फीसदी तक बढ़ जाती है। लेकिन बेस-ब्लीड से रेंज डबल करना संभव नहीं होता।

रैमजेट तकनीक इस मामले में कहीं ज्यादा प्रभावी है। इसमें शेल खुद इंजन की तरह काम करता है और लगातार थ्रस्ट देता है। यही वजह है कि इससे रेंज में 50 फीसदी या उससे ज्यादा की बढ़ोतरी संभव हो पाती है। (Indian Army Artillery)

Indian Army Artillery: सटीकता बढ़ाने पर भी फोकस

डिफेंस सूत्रों का कहना है कि जैसे-जैसे रेंज बढ़ती है, वैसे-वैसे गोले के बिखराव यानी डिस्पर्शन की समस्या भी बढ़ती है। इसी को ध्यान में रखते हुए आईआईटी मद्रास और अन्य संस्थान प्रिसिजन गाइडेंस किट पर भी काम कर रहे हैं।

भविष्य में रैमजेट पावर्ड 155 एमएम शेल में सैटेलाइट नेविगेशन आधारित गाइडेंस सिस्टम लगाया जा सकता है। इससे गोला बेहद सटीक तरीके से अपने टारगेट को निशाना बना सकेगा और सर्कुलर एरर बहुत कम हो जाएगा। (Indian Army Artillery)

Indian Army Artillery: फायरिंग रेंज में शुरुआती ट्रायल

डिफेंस सूत्रों के मुताबिक, इस प्रोजेक्ट पर काम पिछले कुछ वर्षों से चल रहा है। राजस्थान के पोखरण और ओडिशा के बालासोर जैसे फायरिंग रेंज में इसके शुरुआती ट्रायल किए गए हैं। कुछ परीक्षण पूरी तरह सफल रहे, जबकि कुछ में आंशिक दिक्कतें भी सामने आईं। लेकिन हर टेस्ट से मिले डेटा ने डिजाइन को और बेहतर बनाने में मदद की है।

करीब छह महीने पहले 76 एमएम के हाफ-स्केल मॉडल का सफल ट्रायल किया गया था। इससे यह साबित हुआ कि रैमजेट तकनीक आर्टिलरी शेल में काम कर सकती है। अब पूरा फोकस 155 एमएम शेल को पूरी तरह मैच्योर बनाने पर है।

राजस्थान के पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज में किए गए हालिया ट्रायल्स को काफी अहम माना जा रहा है। इन परीक्षणों के बाद डिफेंस से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि तकनीक अब लगभग स्थापित हो चुकी है और इसे ऑपरेशनल इस्तेमाल के लिए तैयार किया जा रहा है। अच्छी बात यह भी है कि यह रैमजेट पावर्ड शेल मौजूदा 155 एमएम तोपों जैसे एटीएजीएस और धनुष के साथ बिना किसी बड़े बदलाव के इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे सेना को नई तोपें खरीदे बिना ही अपनी मारक क्षमता बढ़ाने का मौका मिलेगा।

सूत्रों के मुताबिक, यह प्रोजेक्ट अब अपने आखिरी चरण में पहुंच चुका है और इसे “ऑपरेशनल होने के बेहद करीब” माना जा रहा है। हालांकि अभी कोई तय तारीख घोषित नहीं की गई है, लेकिन मौजूदा प्रगति को देखते हुए माना जा रहा है कि इन शेल्स की इंडक्शन अगले कुछ सालों में हो सकता है। हालांकि अभी तक डीआरडीओ या भारतीय सेना की ओर से कोई आधिकारिक इंडक्शन डेट का एलान नहीं किया गया है। (Indian Army Artillery)

Indian Army Artillery: चैलेंज भी हैं बहुत

हालांकि इस पूरे प्रोजेक्ट में कुछ तकनीकी चुनौतियां भी रही हैं। 155 एमएम जैसे छोटे साइज के शेल में रैमजेट इंजन को फिट करना, अत्यधिक हीट को संभालना और लंबी दूरी पर स्टेबिलिटी बनाए रखना आसान काम नहीं है। सूत्रों के मुताबिक, इन्हीं पहलुओं पर अभी आखिरी स्तर की फाइन-ट्यूनिंग चल रही है। लागत को लेकर भी आकलन किया गया है और अनुमान है कि एक रैमजेट पावर्ड शेल की कीमत करीब 20 से 25 लाख रुपये हो सकती है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विकसित इसी तरह की तकनीक से काफी सस्ती मानी जा रही है। (Indian Army Artillery)

दुनिया में पहली बार इस्तेमाल की तैयारी

सूत्रों के अनुसार, आर्टिलरी से जुड़े बड़े प्रोजेक्ट्स में समय लगना आम बात है, लेकिन रैमजेट पावर्ड शेल के मामले में प्रगति अपेक्षा से तेज मानी जा रही है। डिफेंस एक्सपर्ट्स का कहना है कि अमेरिका, नॉर्वे और कुछ अन्य देश भी रैमजेट पावर्ड आर्टिलरी पर काम कर रहे हैं, लेकिन अब तक किसी भी देश ने इसे ऑपरेशनल स्तर पर नहीं अपनाया है। ऐसे में अगर भारतीय सेना इसे पहले अपनाती है, तो यह भारत को इस क्षेत्र में वैश्विक बढ़त दिला सकता है।

सूत्रों के अनुसार, भारतीय सेना इस तकनीक को सफल बनाने के बाद भविष्य में इसे मित्र देशों को निर्यात करने की संभावना भी देख रही है। कम लागत और ज्यादा क्षमता के कारण यह भारतीय डिफेंस इंडस्ट्री के लिए भी बड़ा अवसर बन सकता है।

रैमजेट पावर्ड शेल के आने से भारतीय सेना दुश्मन की सीमा के अंदर तक टारगेट पर हमला कर सकेगी, वह भी अपनी तोपों को आगे बढ़ाए बिना। इससे सेना दुश्मन की काउंटर-बैटरी फायर से ज्यादा सुरक्षित रहेगी।

डिफेंस सूत्र बताते हैं कि चीन और पाकिस्तान दोनों ही लंबी दूरी की आर्टिलरी पर तेजी से काम कर रहे हैं। ऐसे में यह तकनीक पहाड़ी और सीमावर्ती इलाकों में भारतीय सेना को रणनीतिक बढ़त दे सकती है। (Indian Army Artillery)

आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ा कदम

इस पूरे प्रोजेक्ट की सबसे अहम बात यह है कि इसे पूरी तरह स्वदेशी तकनीक के रूप में विकसित किया जा रहा है। इसमें विदेशी निर्भरता बहुत कम है। इससे न सिर्फ सेना की जरूरतें पूरी होंगी, बल्कि देश की तकनीकी क्षमता और डिफेंस इंडस्ट्री को भी मजबूती मिलेगी।

डिफेंस सूत्रों का कहना है कि आने वाले वर्षों में यह तकनीक भारतीय आर्टिलरी की पहचान बन सकती है। अगर सब कुछ योजना के मुताबिक चलता है, तो भारत दुनिया की पहली ऐसी सेना बन जाएगी, जो रैमजेट पावर्ड 155 एमएम आर्टिलरी शेल को ऑपरेशनल रूप से इस्तेमाल करेगी। (Indian Army Artillery)

IAF Modernisation 2026: इस साल ‘हेवीवेट फोर्स’ बनेगी भारतीय वायुसेना, 2026 में मिड-एयर रिफ्यूलर, अवाक्स और 114 फाइटर जेट को मंजूरी की तैयारी

IAF Modernisation 2026

IAF Modernisation 2026: 2026 में भारतीय वायुसेना को एक “हेवीवेट फोर्स” बनाने की तैयारियां शुरू हो गई हैं। भारतीय वायुसेना आने वाले दो साल में अपनी क्षमता में ऐसा इजाफा करने जा रही है, जिससे वह सिर्फ क्षेत्रीय ही नहीं, बल्कि रणनीतिक स्तर पर भी एक मजबूत “हेवीवेट एयर फोर्स” के रूप में उभरेगी। दिसंबर 2025 के आखिरी में हुई रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) में ऐसे कई प्रस्तावों को मंजूरियां दी गईं, जिनका मकसद एयर ऑपरेशन को कई गुना ज्यादा प्रभावी बनाना हैं।

डिफेंस सूत्रों के मुताबिक मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान वायुसेना ने कई अहम सबक सीखे। उस ऑपरेशन में पाकिस्तान के पास एयरबोर्न अर्ली वॉर्निंग सिस्टम यानी अवाक्स की संख्या भारत से ज्यादा थी। हालांकि भारतीय वायुसेना ने हालात को संभाला, लेकिन यह साफ हो गया कि भविष्य में सिर्फ फाइटर जेट्स की संख्या बढ़ाना काफी नहीं होगा। हवा में ईंधन भरने की क्षमता, लंबी दूरी की निगरानी और मजबूत एयर डिफेंस नेटवर्क उतने ही जरूरी हैं। इन्हीं जरूरतों को ध्यान में रखते हुए अब बड़े फैसले लिए गए हैं। (IAF Modernisation 2026)

IAF Modernisation 2026: मिड-एयर रिफ्यूलर्स लेने की तैयारी

डिफेंस सूत्रों के अनुसार, रक्षा मंत्रालय ने भारतीय वायुसेना के लिए छह नए मिड-एयर रिफ्यूलर विमान लेने की प्रक्रिया तेज कर दी है। ये विमान बोइंग 767 प्लेटफॉर्म पर आधारित होंगे और इन्हें इजरायल की कंपनी इजरायल एरोस्पेस इंडस्ट्रीज कन्वर्ट करेगी। अनुमान है कि इस पूरे प्रोजेक्ट की लागत करीब 8 से 10 हजार करोड़ रुपये तक हो सकती है। इसके लिए डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल ने जरूरत की मंजूरी यानी एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी दे दी है और अब कीमत तय करने के लिए कॉस्ट नेगोशिएशन कमिटी बनाई जा रही है। इसके बाद मामला कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी के पास जाएगा, जहां से अंतिम हरी झंडी मिलने पर कॉन्ट्रैक्ट साइन होगा।

फिलहाल वायुसेना के पास रूस से खरीदे गए छह आईएल-78 रिफ्यूलर विमान हैं, जो साल 2003 से सर्विस में हैं। डिफेंस सूत्रों का कहना है कि ये विमान अब अपनी उम्र पूरी कर रहे हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते स्पेयर पार्ट्स और मेंटेनेंस में भी दिक्कतें आ रही हैं, जिससे इनकी उपलब्धता कई बार कम हो जाती है।

नए बोइंग 767 आधारित टैंकर की सबसे बड़ी खासियत यह होगी कि ये बूम और होज-एंड-ड्रोग, दोनों तरह के रिफ्यूलिंग सिस्टम सपोर्ट करेंगे। इससे सुखोई-30 और राफेल जैसे विमानों को एक ही प्लेटफॉर्म से हवा में ईंधन दिया जा सकेगा। डिफेंस सूत्रों के मुताबिक, इससे फाइटर जेट्स की ऑपरेशनल रेंज लगभग दोगुनी हो सकती है और इंडियन ओशन रीजन जैसे इलाकों में लंबे समय तक ऑपरेशन करना आसान होगा। (IAF Modernisation 2026)

IAF Modernisation 2026: एयरबोर्न अर्ली वॉर्निंग सिस्टम पर बड़ा फोकस

सूत्रों के मुताबिक वायुसेना के लिए 12 नए एयरबोर्न अर्ली वॉर्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम यानी एईडब्ल्यूएंडसी और एडवांस्ड अवाक्स प्लेटफॉर्म भी तैयार किए जा रहे हैं। इसमें दो अलग-अलग तरह के सिस्टम शामिल होंगे। पहला, ब्राजील के एम्ब्रायर जेट्स पर डीआरडीओ द्वारा विकसित नेत्रा मार्क-2 रडार लगाए जाएंगे। यह रडार करीब 270 डिग्री तक निगरानी कर सकता है और इसमें मॉडर्न इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और नेटवर्क सेंट्रिक वॉरफेयर की क्षमता होगी। इसके लिए जल्द ही रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल जारी किया जाएगा। (IAF Modernisation 2026)

दूसरे चरण में एयर इंडिया से लिए गए एयरबस ए319 और ए321 विमानों को फ्रांस में अपग्रेड किया जाएगा। इन विमानों पर 360 डिग्री कवरेज वाला रोटोडोम रडार लगाया जाएगा, जिससे ये पूरी तरह अवाक्स प्लेटफॉर्म बन जाएंगे। डिफेंस सूत्रों का कहना है कि इस कॉन्ट्रैक्ट पर पहले ही दस्तखत हो चुके हैं और अपग्रेड का काम जल्द शुरू होगा।

फिलहाल भारतीय वायुसेना के पास सीमित संख्या में ही अवाक्स और एईडब्ल्यूएंडसी सिस्टम हैं। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान यह कमी साफ तौर पर सामने आई थी, जब पाकिस्तान के पास तुलनात्मक रूप से ज्यादा अवाक्स प्लेटफॉर्म मौजूद थे। पाकिस्तान के पास 9 से 13 अवाक्स सिस्टम बताए जाते हैं। नए 12 सिस्टम शामिल होने के बाद 2030 तक भारतीय वायुसेना के पास 18 से ज्यादा अवाक्स और एईडब्ल्यूएंडसी प्लेटफॉर्म होंगे। इससे न सिर्फ पाकिस्तान, बल्कि चीन के मुकाबले भी संतुलन बेहतर होगा, जिसके पास 30 से ज्यादा ऐसे सिस्टम माने जाते हैं।

यही वजह है कि वायुसेना लंबे समय से इन्हें “फोर्स मल्टीप्लायर” के तौर पर देख रही है। नए सिस्टम शामिल होने से दुश्मन के विमानों, मिसाइलों और ड्रोन पर काफी पहले नजर रखी जा सकेगी। (IAF Modernisation 2026)

IAF Modernisation 2026: 114 मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट की तैयारी

डिफेंस सूत्रों के मुताबिक, भारतीय वायुसेना के लिए 114 मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट यानी एमआरएफए की खरीद को भी तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है। यह सौदा “मेक इन इंडिया” फ्रेमवर्क के तहत किया जाएगा। माना जा रहा है कि फ्रांस से राफेल जेट्स का यह अगला बड़ा ऑर्डर हो सकता है। चर्चा है कि ये विमान राफेल एफ-4 स्टैंडर्ड के हो सकते हैं और भविष्य में एफ-5 वर्जन का विकल्प भी खुला रखा जाएगा।

वायुसेना की स्क्वाड्रन संख्या लगातार घट रही है और पुराने मिग-21 जैसे विमानों के रिटायरमेंट के बाद यह कमी और बढ़ गई है। फिलहाल भारतीय वायुसेना की स्क्वाड्रन संख्या 31 के आसपास है, जबकि जरूरी संख्या 42 है। पुराने मिग-21 और मिग-27 विमानों के रिटायरमेंट के बाद यह कमी और बढ़ गई है। मौजूदा समय में वायुसेना के पास 36 राफेल विमान पहले से सेवा में हैं और भारत में पहले से राफेल के लिए मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल की सुविधा मौजूद है। ऐसे में उसी प्लेटफॉर्म पर आगे बढ़ना लॉजिस्टिक और ऑपरेशनल दोनों लिहाज से आसान होगा। इससे चीन और पाकिस्तान के जे-35 और जेएफ-17 जैसे विमानों से निपटने की क्षमता भी बढ़ेगी। ऐसे में नए 114 विमानों का इसी प्लेटफॉर्म पर आधारित होना लॉजिस्टिक और ऑपरेशनल दोनों नजरिए से आसान माना जा रहा है। (IAF Modernisation 2026)

IAF Modernisation 2026: राफेल और एयर डिफेंस के लिए नई मिसाइलें

डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल ने राफेल लड़ाकू विमानों के लिए 36 और मीटियोर एयर-टू-एयर मिसाइलों की खरीद को भी मंजूरी दे दी है। डिफेंस सूत्रों का कहना है कि कुल संख्या आगे चलकर 50 से 100 से ज्यादा हो सकती है। मीटियोर मिसाइल लंबी दूरी की हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल है और इसे दुनिया की सबसे खतरनाक मिसाइलों में गिना जाता है। मीटियोर मिसाइल की 200 किलोमीटर से ज्यादा की रेंज और रैमजेट इंजन इसे हवा में होने वाली लड़ाई में बेहद खतरनाक बनाते हैं। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इसकी उपयोगिता सामने आ चुकी है। इससे राफेल की बियॉन्ड विजुअल रेंज क्षमता और मजबूत होगी। (IAF Modernisation 2026)

इसके साथ ही रूस से खरीदे गए एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम के लिए 280 लंबी और छोटी दूरी की मिसाइलों को भी हरी झंडी मिल चुकी है। डिफेंस सूत्रों के अनुसार, भारत और रूस के बीच पांच और एस-400 सिस्टम खरीदने को लेकर भी बातचीत चल रही है। इसके अलावा, पैंटसिर जैसे मीडियम रेंज एयर डिफेंस सिस्टम पर भी विचार हो रहा है, जो ड्रोन, क्रूज मिसाइल और हेलिकॉप्टर जैसे खतरों से निपट सकता है।

IAF Modernisation 2026: ऑपरेशन सिंदूर से मिले सबक

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान वायुसेना को कई अहम सबक मिले। खास तौर पर यह समझ में आया कि सिर्फ फाइटर जेट्स की संख्या बढ़ाना ही काफी नहीं है। हवा में ईंधन भरने की क्षमता, बेहतर रडार कवरेज और मजबूत एयर डिफेंस नेटवर्क भी उतने ही जरूरी हैं। पाकिस्तान की तरफ से ज्यादा अवाक्स प्लेटफॉर्म होने के कारण शुरुआती दौर में चुनौती महसूस की गई थी। (IAF Modernisation 2026)

इसी अनुभव के आधार पर अब वायुसेना की योजना बनाई जा रही है, ताकि भविष्य में किसी भी मोर्चे पर ऐसी कमी महसूस न हो। चीन और पाकिस्तान दोनों के साथ दो मोर्चों की चुनौती को ध्यान में रखते हुए यह तैयारियां की जा रही हैं।

इसके साथ ही आत्मनिर्भरता पर भी खास जोर है। डीआरडीओ के स्वदेशी रडार, देश में एमआरओ सुविधाएं और मेक इन इंडिया के तहत उत्पादन से आयात पर निर्भरता कम होगी। डिफेंस सूत्र मानते हैं कि 2026 तक जैसे-जैसे ये सिस्टम वायुसेना में शामिल होंगे, भारतीय एयर पावर की तस्वीर पूरी तरह बदल जाएगी। (IAF Modernisation 2026)

DRDO Pralay Missile Test: एक ही लॉन्चर से दो मिसाइलों का साल्वो लॉन्च सफल, भारतीय सेना के लिए गेम-चेंजर साबित होगी प्रलय

DRDO Pralay Missile Test
DRDO Pralay Missile Test

DRDO Pralay Missile Test: 2025 के आखिरी दिन डीआरडीओ ने बड़ाा धमाका किया। डीआरडीओ ने बड़ी कामयाबी हासिल करते हुए ओडिशा के तट के पास समुद्र में स्थित चांदीपुर इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज से प्रलय मिसाइल का सफल साल्वो लॉन्च किया। इस टेस्ट की खास बात यह थी कि इसमें एक ही लॉन्चर से बेहद कम समय के अंतर में लगातार दो मिसाइलें दागी गईं और दोनों ने अपने तय टारगेट पर निशाना लगाया।

डीआरडीओ के अनुसार यह परीक्षण यूजर इवैल्यूएशन ट्रायल्स का हिस्सा था, यानी यह देखा जा रहा था कि मिसाइल एक्चुअल मिलिटरी सिचुएशन में कितनी भरोसेमंद है और सेना की जरूरतों पर कितनी खरी उतरती है। टेस्ट के दौरान दोनों मिसाइलें तय ट्रैजेक्टरी पर चलीं और सभी टेक्निकल स्टैंडर्ड्स को पूरा किया।

वहीं, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस सफल साल्वो लॉन्च पर डीआरडीओ, भारतीय सेना, भारतीय वायुसेना और देश के रक्षा उद्योग को बधाई दी है। उन्होंने कहा कि यह सफलता मिसाइल सिस्टम की भरोसेमंद क्षमता को साबित करती है। डीआरडीओ प्रमुख और रक्षा अनुसंधान विभाग के सचिव डॉक्टर समीर वी कामत ने कहा कि यह उपलब्धि इस बात का संकेत है कि प्रलय मिसाइल अब उपयोगकर्ताओं के लिए जल्द ही तैनाती के लिए तैयार है। (DRDO Pralay Missile Test)

DRDO Pralay Missile Test:  क्या होता है साल्वो लॉन्च और क्यों है यह अहम

साल्वो लॉन्च का मतलब होता है एक ही सिस्टम से बहुत कम समय में एक से ज्यादा मिसाइलें दागना। आधुनिक युद्ध में इसकी जरूरत है। अगर किसी दुश्मन के पास एयर डिफेंस सिस्टम हो, तो एक साथ कई मिसाइलें दागकर उस डिफेंस को कन्फ्यूज किया जा सकता है। प्रलय मिसाइल का यह सफल साल्वो लॉन्च इस बात का संकेत है कि भारत अब इस तरह की एडवांस युद्ध क्षमता हासिल कर चुका है। (DRDO Pralay Missile Test)

चांदीपुर से समुद्र तक, हर सिस्टम ने किया काम

डीआरडीओ की ओर से बताया गया कि इस टेस्ट के दौरान इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज, चांदीपुर में तैनात ट्रैकिंग सिस्टम्स ने दोनों मिसाइलों की उड़ान को पूरी तरह मॉनिटर किया। मिसाइल के टर्मिनल फेज यानी आखिरी चरण की पुष्टि समुद्र में तैनात जहाजों पर लगे टेलीमेट्री सिस्टम्स के जरिए की गई।

इन सिस्टम्स ने यह कन्फर्म किया कि दोनों मिसाइलें अपने तय लक्ष्य बिंदु तक बिल्कुल सही तरीके से पहुंचीं और कोई भी तकनीकी गड़बड़ी सामने नहीं आई। (DRDO Pralay Missile Test)

DRDO Pralay Missile Test: क्या है प्रलय मिसाइल

प्रलय भारत की स्वदेशी रूप से विकसित क्वासी-बैलिस्टिक सरफेस-टू-सरफेस मिसाइल है। यह मिसाइल दुश्मन के एयरबेस, रडार स्टेशन, कमांड एंड कंट्रोल सेंटर और अन्य हाई-वैल्यू टारगेट्स को बेहद सटीक तरीके से निशाना बना सकती है।

प्रलय मिसाइल को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह पारंपरिक यानी कन्वेंशनल वारहेड ले जाती है। इसका मकसद दुश्मन को भारी नुकसान पहुंचाना है। (DRDO Pralay Missile Test)

DRDO Pralay Missile Test
DRDO Pralay Missile Test

क्यों खास है प्रलय की क्वासी-बैलिस्टिक तकनीक

प्रलय मिसाइल की सबसे बड़ी खासियत इसकी क्वासी-बैलिस्टिक ट्रैजेक्टरी है। जहां आम बैलिस्टिक मिसाइलें एक तय रास्ते पर उड़ती हैं, लेकिन प्रलय हवा में मैन्यूवर कर सकती है। इसका मतलब है कि यह रास्ता बदल सकती है और दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा दे सकती है।

आधुनिक युद्ध में जब एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम तेजी से डेवलप हो रहे हैं, तब ऐसी मैन्यूवर करने वाली मिसाइलें कहीं ज्यादा असरदार साबित होती हैं। (DRDO Pralay Missile Test)

समझें प्रलय की तकनीकी ताकत के बारे में

प्रलय मिसाइल सॉलिड प्रोपेलेंट रॉकेट मोटर पर आधारित है, जिससे यह लॉन्च के लिए फटाफट तैयार हो जाती है। इसकी रेंज करीब 150 किलोमीटर से लेकर 500 किलोमीटर तक मानी जाती है। यह थिएटर लेवल ऑपरेशंस के लिए बेहद उपयोगी है।

इस मिसाइल की रफ्तार टर्मिनल फेज में हाइपरसोनिक यानी मैक-5 से ज्यादा है। इतनी तेज रफ्तार की वजह से दुश्मन के लिए इसे रोक पाना बेहद मुश्किल हो जाता है। इसका गाइडेंस सिस्टम इतना एडवांस है कि यह 10 मीटर से भी कम की सटीकता से टारगेट को निशाना बना सकती है। (DRDO Pralay Missile Test)

ले जा सकती है अलग-अलग तरह के वारहेड

प्रलय मिसाइल की एक और खास बात यह है कि यह अलग-अलग तरह के वारहेड ले जा सकती है। इसमें हाई एक्सप्लोसिव फ्रैग्मेंटेशन वारहेड, रनवे डिनायल सबम्यूनिशन और बंकर बस्टर जैसे विकल्प शामिल हैं। इससे सेना को अलग-अलग टारगेट के हिसाब से मिसाइल को कॉन्फिगर करने की सुविधा मिलती है।

यानी एयरबेस को अस्थायी रूप से बेकार करना हो, दुश्मन के कमांड सेंटर को तबाह करना हो या किसी रणनीतिक ठिकाने पर हमला करना हो, प्रलय हर स्थिति में कारगर साबित हो सकती है। (DRDO Pralay Missile Test)

DRDO Pralay Missile Test: रोड मोबाइल लॉन्चर से लॉन्च

प्रलय मिसाइल को रोड मोबाइल लॉन्चर से दागा जाता है। इसे हाई मोबिलिटी व्हीकल पर लगाया गया है, जिससे इसे आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है। यह मिसाइल कैनिस्टराइज्ड सिस्टम में रहती है, जिससे इसे लंबे समय तक स्टोर किया जा सकता है और जरूरत पड़ने पर तुरंत लॉन्च किया जा सकता है।

इसका मतलब यह है कि युद्ध के समय दुश्मन को यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि मिसाइल कहां से दागी जाएगी। (DRDO Pralay Missile Test)

DRDO Pralay Missile Test: सेना और वायुसेना के लिए क्यों अहम

प्रलय मिसाइल को भारतीय थल सेना और भारतीय वायुसेना दोनों के लिए डेवलप किया गया है। थल सेना के लिए यह मिसाइल सीमाओं पर तैनात दुश्मन के ठिकानों को निशाना बनाने में मदद करेगी, जबकि वायुसेना के लिए यह एक अतिरिक्त सटीक स्ट्राइक ऑप्शन होगी। रक्षा सूत्रों के अनुसार, प्रलय को भारत की कन्वेंशनल डिटरेंस नीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है। यह मिसाइल बिना परमाणु हथियारों का इस्तेमाल किए दुश्मन को कड़ा संदेश देने में सक्षम है।

डिफेंस सूत्रों के मुताबिक, साल 2023 में भारतीय सेना के लिए एक पूरी रेजिमेंट के लिए करीब 250 प्रलय मिसाइलों का ऑर्डर अप्रूव किया गया था। इन मिसाइलों को एलएसी और एलओसी जैसे संवेदनशील इलाकों में तैनात किए जाने की योजना है। (DRDO Pralay Missile Test)

वहीं, भारतीय वायु सेना ने भी प्रलय मिसाइल में रुचि दिखाई है। वर्ष 2022 में वायु सेना के लिए करीब 120 मिसाइलों का ऑर्डर दिया गया था। इस तरह थल सेना और वायु सेना दोनों के लिए कुल मिलाकर लगभग 370 मिसाइलों का ऑर्डर दिया गया है, जिसकी अनुमानित लागत करीब 7,500 करोड़ रुपये बताई जाती है।

DRDO Pralay Missile Test: इंडक्शन अब ज्यादा दूर नहीं

डिफेंस सूत्रों के अनुसार, 2025 के आखिर तक प्रलय मिसाइल के यूजर ट्रायल्स लगभग पूरे हो चुके हैं। जुलाई और दिसंबर में हुए दोनों बड़े परीक्षण पूरी तरह सफल रहे हैं। 31 दिसंबर को किया गया साल्वो लॉन्च इस बात का संकेत है कि मिसाइल सिस्टम अब ऑपरेशनल लेवल पर लगभग तैयार है। सूत्रों का कहना है कि अगर सब कुछ योजना के मुताबिक रहा, तो 2026 या 2027 में प्रलय मिसाइल की पहली रेजिमेंट पूरी तरह ऑपरेशनल हो सकती है। इसके इंडक्शन के साथ ही बिना न्यूक्लियर एस्केलेशन के जोखिम के भारत की कन्वेंशनल डिटरेंस क्षमता को बड़ा बल मिलेगा। (DRDO Pralay Missile Test)

DRDO Pralay Missile Test: डीआरडीओ की कई लैब्स जुड़ीं

इस मिसाइल के डेवलपमेंट में डीआरडीओ की कई प्रयोगशालाओं ने मिलकर काम किया है। हैदराबाद स्थित रिसर्च सेंटर इमारत के साथ-साथ डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट लैबोरेटरी, एडवांस्ड सिस्टम्स लैबोरेटरी, हाई एनर्जी मटीरियल्स रिसर्च लैबोरेटरी और अन्य संस्थानों ने इसमें योगदान दिया।

इसके अलावा भारत डायनामिक्स लिमिटेड और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों ने इसके प्रोडक्शन और इंटीग्रेशन में अहम भूमिका निभाई है। (DRDO Pralay Missile Test)

Indian Army Year Ender 2025: ऑपरेशन सिंदूर के बाद सेना का बड़ा कदम, 90 फीसदी गोला-बारूद स्वदेशी, लंबी जंग के लिए है तैयार

Indian Army Year Ender 2025
Indian Army Ammunition Indigenisation Crosses 90%, Boosts War Readiness

Indian Army Year Ender 2025: भारतीय सेना आज सिर्फ नए हथियारों पर ही ध्यान नहीं दे रही, बल्कि इस बात पर भी पूरी तरह फोकस कर रही है कि अगर कोई जंग लंबी चले तो तैयारियों में कोई दिक्कत न आए। इसी पहल पर आगे बढ़ते हुए सेना ने गोला-बारूद के क्षेत्र में बड़ी कामयाबी हासिल की है। अब भारतीय सेना के इस्तेमाल होने वाले गोला-बारूद का 90 फीसदी से ज्यादा हिस्सा देश में ही तैयार हो रहा है। यह बदलाव भारत की सैन्य तैयारी के लिए एक बड़ा और जरूरी कदम माना जा रहा है।

Indian Army Year Ender 2025: बदलते युद्ध हालात ने बढ़ाई चिंता

डिफेंस सूत्र बताते हैं कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चर्चा की जा रही थी कि अगर भारत-पाकिस्तान जंग लंबी छिड़ी तो कितने दिन का गोला-बारूद रिजर्व में है। हालांकि ये बातें बेफिजूल थीं लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध ने यह साफ कर दिया है कि मौजूदा माहौल में रहे युद्ध लंबे समय तक खिंच सकते हैं और इनमें गोला-बारूद की खपत बेहद तेजी से होती है। भारत की सीमाएं पाकिस्तान और चीन जैसे देशों से जुड़ी हैं, जहां तनाव लंबे समय से बना हुआ है। ऐसे हालात में सेना को पहले से यह सुनिश्चित करना जरूरी था कि किसी भी स्थिति में गोला-बारूद की सप्लाई बाधित न हो।

Indian Army Year Ender 2025: गोला-बारूद की सप्लाई क्यों है सबसे अहम

सूत्रों के मुताबिक, युद्ध के दौरान गोला-बारूद, स्पेयर पार्ट्स और लॉजिस्टिक्स किसी भी सेना की रीढ़ होते हैं। अगर गोला-बारूद की सप्लाई रुक जाए, तो सबसे आधुनिक हथियार भी बेकार हैं। यही वजह है कि भारतीय सेना ने इसे अपनी प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर रखा है।

Indian Army Year Ender 2025: पहले विदेशों पर थी निर्भरता

डिफेंस सूत्रों का कहना है कि कुछ साल पहले तक भारतीय सेना को गोला-बारूद के लिए काफी हद तक विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता था। कई अहम एम्यूनिशन वैरिएंट्स आयात किए जाते थे। लेकिन हाल के सालों में ग्लोबल सप्लाई चेन में आई दिक्कतों ने यह साफ कर दिया कि संकट के समय बाहरी सप्लाई पर भरोसा करना जोखिम भरा हो सकता है।

स्वदेशीकरण को किया तेज

सूत्रों के अनुसार, इसी अनुभव से सीख लेते हुए सेना ने गोला-बारूद के स्वदेशीकरण को तेज किया। भारतीय सेना अपने अलग-अलग हथियार सिस्टम्स के लिए करीब 200 तरह के गोला-बारूद इस्तेमाल करती है। अब इनमें से 90 फीसदी से ज्यादा वैरिएंट्स देश में ही बनाए जा रहे हैं। इसमें छोटे हथियारों की गोलियों से लेकर आर्टिलरी शेल, रॉकेट और अन्य जरूरी एम्यूनिशन शामिल हैं।

Indian Army Year Ender 2025: खरीद प्रक्रिया में किए गए बड़े बदलाव

डिफेंस सूत्र बताते हैं कि यह बदलाव अचानक नहीं आया। इसके लिए खरीद प्रक्रिया में कई अहम सुधार किए गए। नियमों को सरल बनाया गया और निजी कंपनियों को भी रक्षा उत्पादन में भागीदारी का मौका दिया गया। पहले जहां कुछ सरकारी कंपनियां ही गोला-बारूद बनाती थीं, अब सार्वजनिक क्षेत्र के साथ-साथ निजी कंपनियां भी बड़ी भूमिका निभा रही हैं।

Indian Army Year Ender 2025: मेक-इन-इंडिया के तहत बड़े ऑर्डर

सूत्रों के मुताबिक, पिछले चार से पांच सालों में सेना ने मेक-इन-इंडिया पहल के तहत बड़े पैमाने पर ऑर्डर दिए हैं। करीब 16,000 करोड़ रुपये का एक ऑर्डर बास्केट तैयार किया गया है, ताकि घरेलू कंपनियां लंबे समय के लिए उत्पादन की योजना बना सकें। इसके अलावा, पिछले तीन वर्षों में लगभग 26,000 करोड़ रुपये के गोला-बारूद सप्लाई ऑर्डर भारतीय निर्माताओं को दिए गए हैं।

Indian Army Year Ender 2025: सप्लाई सिस्टम हुआ ज्यादा मजबूत

डिफेंस सूत्रों का कहना है कि इन प्रयासों का एक बड़ा फायदा यह हुआ है कि अब कई तरह के गोला-बारूद के लिए एक से ज्यादा घरेलू सप्लायर मौजूद हैं। पहले किसी एक फैक्ट्री या एक देश पर निर्भरता रहती थी, लेकिन अब विकल्प बढ़ गए हैं। इससे सप्लाई में रुकावट का खतरा काफी हद तक कम हो गया है।

Indian Army Year Ender 2025: दुनिया के युद्धों से ली गई सीख

सूत्रों के अनुसार, हाल के वर्षों में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हुए युद्धों ने यह साबित कर दिया है कि लंबी जंग में गोला-बारूद की खपत अनुमान से कहीं ज्यादा होती है। जिन देशों के पास घरेलू उत्पादन की मजबूत व्यवस्था होती है, वे लंबे समय तक दबाव झेलने में सक्षम रहते हैं। भारतीय सेना ने इसी अनुभव को ध्यान में रखते हुए अपनी रणनीति बदली है।

Indian Army Year Ender 2025: अब अगला फोकस किन चीजों पर

डिफेंस सूत्र बताते हैं कि अब सेना का अगला फोकस इस सिस्टम को और मजबूत करने पर है। कच्चे माल की घरेलू सप्लाई, जैसे प्रोपेलेंट और फ्यूज, पर खास ध्यान दिया जा रहा है। इसके साथ ही फैक्ट्रियों के आधुनिकीकरण, नई मशीनों और सख्त क्वॉलिटी कंट्रोल सिस्टम पर भी काम किया जा रहा है।

Indian Army Year Ender 2025: क्वॉलिटी को लेकर भी कोई समझौता नहीं

सूत्रों के मुताबिक, सेना यह सुनिश्चित करना चाहती है कि गोला-बारूद सिर्फ देश में बने ही नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता भी वैश्विक मानकों के बराबर या उनसे बेहतर हो। इसके लिए लगातार टेस्टिंग और वैलिडेशन की प्रक्रिया अपनाई जा रही है।

Indian Army Year Ender 2025: ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ी सतर्कता

डिफेंस सूत्रों का कहना है कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद सेना की ऑपरेशनल रेडीनेस पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। सीमाओं पर सतर्कता बढ़ाई गई है और किसी भी हालात से निपटने के लिए तैयारियां तेज की गई हैं। ऐसे माहौल में गोला-बारूद की घरेलू उपलब्धता से सेना के आत्मविश्वास को बड़ा सहारा मिला है।

Indian Army Year Ender 2025: सेना के साथ-साथ देश को भी फायदा

सूत्रों के अनुसार, गोला-बारूद में आत्मनिर्भरता का यह सफर सिर्फ सेना तक सीमित नहीं है। इससे देश की अर्थव्यवस्था, रोजगार और तकनीकी क्षमता को भी फायदा हो रहा है। कई छोटे और मध्यम उद्योग अब रक्षा उत्पादन से जुड़े हैं, जिससे नए रोजगार के अवसर पैदा हो रहे हैं और भारत की पहचान एक भरोसेमंद रक्षा निर्माता के रूप में मजबूत हो रही है।

Republic Day Parade 2026: सेना के साथ पहली बार परेड में उतरेंगे ये खास लद्दाखी ऊंट, ड्रोन पकड़ने वाली चील भी होगी शामिल

Republic Day Parade 2026- Indian Army Bactrian Camel Makes Historic Debut at Kartavya Path
Republic Day Parade 2026- Indian Army Bactrian Camel Makes Historic Debut at Kartavya Path

Republic Day Parade 2026: इस साल कर्तव्य पथ पर गणतंत्र दिवस परेड में पहली बार लद्दाख के प्रसिद्ध ऊंट देखने को मिलेंगे। यह पहली बार होगा जब भारतीय सेना के रिमाउंट एंड वेटरनरी कोर के दस्ते में डबल हम्प बैक्ट्रियन ऊंट और जंस्कारी पोनी कदमताल करते नजर आएंगे। वहीं इस टुकड़ी को महिला अफसर लीड करेगी। सेना के इस कदम को परंपरा और आधुनिकता के अनोखे संगम के रूप में देखा जा रहा है।

जनरल उपेंद्र द्विवेदी के सेना प्रमुख बनने के बाद से भारतीय सेना तेजी से मॉर्डनाइजेशन की बढ़ रही है। ड्रोन, रोबोटिक म्यूल, ऑल टेरेन व्हीकल और हाई-टेक सर्विलांस सिस्टम के साथ-साथ सेना उन पारंपरिक साधनों को भी दोबारा अपना रही है, जो कठिन से कठिन हालात में भरोसेमंद साबित होते हैं। पूर्वी लद्दाख जैसे इलाकों में, जहां तापमान माइनस 20 से माइनस 40 डिग्री तक चला जाता है और ऑक्सीजन की कमी रहती है, वहां मशीनों के साथ-साथ जानवरों की भूमिका आज भी बेहद अहम है। इसी सोच के चलते पूर्वी लद्दाख के कठिन इलाकों में बैक्ट्रियन ऊंट और जंस्कारी पोनी को शामिल किया गया है।

Republic Day Parade 2026: लॉजिस्टिक और पेट्रोलिंग में कारगर हैं बैक्ट्रियन ऊंट

पूर्वी लद्दाख का इलाका बेहद ऊंचाई पर स्थित है, जहां ठंडा रेतीला मरुस्थल, कम ऑक्सीजन और बेहद कठोर मौसम सेना के सामने बड़ी चुनौती बनता है। यहां सड़कों और आधुनिक संसाधनों के बावजूद कई चौकियों तक अंतिम दूरी यानी “लास्ट माइल डिलिवरी” आज भी कठिन बनी रहती है। ऐसे में सेना ने दो कूबड़ वाले बैक्ट्रियन ऊंटों को लॉजिस्टिक और पेट्रोलिंग के काम में शामिल किया।

बैक्ट्रियन ऊंटों का वैज्ञानिक नाम कैमेलस बैक्ट्रियानस है। ये मध्य एशिया के मूल निवासी हैं और अपने दो कूबड़ों के लिए जाने जाते हैं। बैक्ट्रियन ऊंटों को भारतीय सेना ने पूर्वी लद्दाख की जरूरतों को देखते हुए शामिल किया है। ये ऊंट दो कूबड़ वाले होते हैं और दुनिया के सबसे कठिन इलाकों में काम कर सकते हैं। पिछले दो सालों से ये ऊंट पूर्वी लद्दाख के दुर्गम इलाकों में सेना की मदद कर रहे हैं। ये ऊंट 15,000 से 18,000 फीट की ऊंचाई पर 150 से 200 किलो तक वजन आसानी से ढो सकते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि ये माइनस 20 डिग्री तापमान में भी बिना किसी परेशानी के काम करते हैं।

Republic Day Parade 2026: सेना में एक दर्जन से ज्यादा ऊंट

फिलहाल सेना में बैक्ट्रियन ऊंटों का पहला बैच शामिल किया गया है, जिसमें एक दर्जन से ज्यादा ऊंट हैं। गणतंत्र दिवस परेड में इनमें से दो ऊंट कर्तव्य पथ पर कदमताल करते नजर आएंगे। यह शायद पहला मौका होगा जब बैक्ट्रियन ऊंट लद्दाख के बाहर, दिल्ली की सड़कों पर दिखाई देंगे। आमतौर पर ये ऊंट मंगोलिया और सेंट्रल एशिया में पाए जाते हैं। माना जाता है कि पुराने जमाने में सिल्क रूट से होकर व्यापार करने वाले काफिलों के साथ ये ऊंट लद्दाख आए और फिर यहीं बस गए। इसलिए इन्हें मंगोलियन ऊंट भी कहा जाता है। आज लद्दाख के नुब्रा घाटी के हुंडर गांव में ये ऊंट देखे जा सकते हैं।

Republic Day Parade 2026- Indian Army Bactrian Camel Makes Historic Debut at Kartavya Path
Republic Day Parade 2026- Indian Army Bactrian Camel Makes Historic Debut at Kartavya Path

Republic Day Parade 2026: जंस्कारी पोनी भी बन रही हैं सेना की ताकत

बैक्ट्रियन ऊंटों के साथ-साथ जंस्कारी पोनी भी पहली बार कर्तव्य पथ पर मार्च करती दिखेंगी। लद्दाख के स्थानीय लोग लंबे समय से जंस्कारी पोनी का इस्तेमाल करते आ रहे हैं। सेना ने उनकी ताकत और क्षमता को देखते हुए इन्हें धीरे-धीरे रिमाउंट एंड वेटरनरी कोर (RVC) में शामिल किया।

करीब दो साल से ये पोनी सेना का हिस्सा हैं और पूर्वी लद्दाख के दुर्गम इलाकों में काम कर रही हैं। ये पोनी माइनस 40 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी 70 किलोग्राम से ज्यादा वजन ढो सकती हैं और 18,000 फीट तक की ऊंचाई पर आसानी से काम करती हैं। गणतंत्र दिवस परेड में चार जंस्कारी पोनी दस्ते का हिस्सा होंगी।

रिसर्च के बाद सेना में शामिल हुए ऊंट और पोनी

सेना में बैक्ट्रियन ऊंट और जंस्कारी पोनी को शामिल करने का फैसला अचानक नहीं लिया गया। लेह स्थित डीआरडीओ की डिफेंस इंस्टीट्यूट ऑफ हाई एल्टीट्यूड रिसर्च लैब ने सेना के रिमाउंट एंड वेटरनरी कोर के साथ मिलकर कई सालों तक इन जानवरों पर रिसर्च की।

इस रिसर्च के दौरान ऊंटों और पोनी की शारीरिक क्षमता, कम ऑक्सीजन में अनुकूलन, वजन ढोने की सहनशक्ति और कठिन मौसम में व्यवहार का अध्ययन किया गया। इसके बाद इन्हें सेना की यूनिट्स में भेजकर वास्तविक परिस्थितियों में टेस्ट किया गया।

कुछ हफ्ते पहले डीआरडीओ ने 14 पूरी तरह प्रशिक्षित बैक्ट्रियन ऊंटों को सेना की 14 कोर, जिसे फायर एंड फ्यूरी कोर कहा जाता है, को सौंप दिया। इसके साथ ही ऊंटों की ट्रेनिंग, देखभाल और तैनाती से जुड़े स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर और हेल्थ रिकॉर्ड भी सेना को दिए गए।

Republic Day Parade 2026: ऊंटों के साथ इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग का खतरा नहीं

बैक्ट्रियन ऊंटों को गोलीबारी, धमाकों और युद्ध जैसे हालातों में भी परखा गया, ताकि यह देखा जा सके कि वे ऐसे माहौल में कैसे प्रतिक्रिया करते हैं। परीक्षणों में पाया गया कि ये ऊंट न केवल भारी वजन ढो सकते हैं, बल्कि युद्ध जैसी परिस्थितियों में भी स्थिर रहते हैं। इनके साथ इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग का कोई खतरा नहीं होता, जो ड्रोन और रोबोटिक सिस्टम के साथ एक बड़ी समस्या है। कम भोजन और कम देखभाल में काम कर पाने की क्षमता इन्हें सेना के लिए किफायती भी हैं।

Republic Day Parade 2026: ड्रोन के खिलाफ चील को किया ट्रेन

इस परेड में आधुनिक तकनीक और पारंपरिक साधनों का अनोखा मेल भी देखने को मिलेगा। दुश्मन के ड्रोन का मुकाबला करने के लिए सेना ने एंटी-ड्रोन सिस्टम के साथ-साथ चील को भी ट्रेनिंग दी है। ये चील हवा में उड़ते छोटे ड्रोन को पहचानकर उनका शिकार करने में सक्षम हैं। ऐसे चार चील भी रिमाउंट एंड वेटरनरी कोर के दस्ते का हिस्सा होंगी। पहली बार इन्हें साल 2022 में भारत-अमेरिका के संयुक्त सैन्य अभ्यास युद्धाभ्यास के दौरान देखा गया था।

Republic Day Parade 2026: डॉग स्क्वायड के दस कुत्ते भी परेड में

इसके अलावा डॉग स्क्वायड के दस कुत्ते भी कदमताल करेंगे। इनमें भारतीय नस्ल के मुधोल हाउंड, रामपुर हाउंड, चिप्पीपराई, कोम्बाई और राजा पलियम शामिल हैं, साथ ही कुछ पारंपरिक नस्लों के कुत्ते भी दस्ते का हिस्सा होंगे। ये कुत्ते सेना के लिए ट्रैकिंग, गार्ड ड्यूटी और सर्च ऑपरेशंस में अहम भूमिका निभाते हैं।

Republic Day Parade 2026: इस कदम के पीछे है ये रणनीतिक सोच

सेना से जुड़े सूत्र कहते हैं, सेना के इस कदम के पीछे की रणनीतिक सोच सीधे तौर पर भारत की सीमा सुरक्षा से जुड़ी है। पूर्वी लद्दाख के ऊंचे और बेहद ठंडे इलाकों में हालात सामान्य नहीं होते। यहां ऑक्सीजन कम होती है, तापमान माइनस में चला जाता है और कई जगहों पर सड़कें या तो हैं ही नहीं या फिर साल के बड़े हिस्से में बर्फ से ढकी रहती हैं। ऐसे माहौल में बड़े मशीनी वाहन हर समय काम नहीं कर पाते। इसी वजह से सेना के सामने सबसे बड़ी चुनौती होती है “लास्ट माइल सप्लाई”, यानी आखिरी चौकी तक रसद और जरूरी सामान पहुंचाना, और नियमित पेट्रोलिंग करना।

इन्हीं जरूरतों को देखते हुए डबल हंप बैक्ट्रियन ऊंट और जंस्कारी पोनी को सेना के सिस्टम में शामिल किया गया है। ये जानवर बेहद ठंडे मौसम, कम ऑक्सीजन और कठिन रास्तों में भी बिना ज्यादा परेशानी के काम कर सकते हैं। बैक्ट्रियन ऊंट भारी वजन उठाकर ऊंचाई वाले इलाकों में लंबे समय तक चल सकते हैं, जबकि जंस्कारी पोनी संकरे और खतरनाक पहाड़ी रास्तों पर बेहद भरोसेमंद साबित होती हैं।

राष्ट्रीय गौरव और जागरूकता है सेना का संदेश

गणतंत्र दिवस परेड में पहली बार इन जानवरों को शामिल करने के पीछे एक साफ संदेश भी है। सेना यह दिखाना चाहती है कि वह केवल आधुनिक तकनीक जैसे ड्रोन, रोबोटिक म्यूल और ऑल टेरेन व्हीकल्स पर ही निर्भर नहीं है, बल्कि जरूरत पड़ने पर पारंपरिक और आजमाए हुए तरीकों को भी उतनी ही मजबूती से अपनाती है। इसके अलावा, इस कदम का एक सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पहलू भी है। परेड के जरिए लद्दाख की इन अनोखी प्रजातियों को राष्ट्रीय स्तर पर हाइलाइट करना चाहती है, जिससे उस क्षेत्र के सामरिक और सांस्कृतिक महत्व को देश के सामने लाया जा सके। (Republic Day Parade 2026)