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Tejas Mk1A की डिलीवरी शुरू करने को लेकर HAL को मिली बड़ी राहत, वायुसेना ने दी शर्तों में दी ‘विशेष’ छूट

Tejas Mk1A Delivery
File Photo

Tejas Mk1A Delivery: भारत के स्वदेशी लड़ाकू विमान तेजस एमके1ए की डिलीवरी को लेकर एक बड़ा फैसला सरकार ने किया है। रक्षा मंत्रालय और भारतीय वायुसेना ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को कुछ शर्तों में छूट देने का फैसला किया है, ताकि इस अहम फाइटर जेट की डिलीवरी जल्द शुरू हो सके।

हालांकि इस पूरे फैसले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विमान की मुख्य यानी “मस्ट-हैव” क्षमताओं पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा। यानी तेजस एमके1ए की ताकत और लड़ाकू क्षमता पूरी तरह बरकरार रहेगी। (Tejas Mk1A Delivery)

Tejas Mk1A Delivery: देरी के बाद लिया गया बड़ा फैसला

तेजस एमके1ए प्रोग्राम भारत के सबसे महत्वपूर्ण डिफेंस प्रोजेक्ट्स में से एक है। लेकिन पिछले कुछ सालों से इसकी डिलीवरी लगातार टलती रही। पहले उम्मीद थी कि 2024-25 में यह विमान वायुसेना को मिलने लगेगा, लेकिन अब यह समयसीमा बढ़कर मार्च 2026 से भी आगे खिसक गई है।

इस देरी के पीछे कई वजहें रहीं। सबसे बड़ी समस्या अमेरिका से आने वाले जीई एफ404 इंजन की सप्लाई में देरी रही। इसके अलावा एडवांस्ड सिस्टम्स जैसे एईएसए रडार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट और हथियारों के इंटीग्रेशन में भी समय लगा।

इन्हीं कारणों को देखते हुए अब सरकार और वायुसेना ने यह फैसला लिया है कि कुछ गैर-जरूरी या कम अहम काम बाद में भी पूरे किए जा सकते हैं, लेकिन जरूरी क्षमताओं के साथ ही विमान को शामिल किया जाएगा। (Tejas Mk1A Delivery)

क्या मिली है एचएएल को छूट

नई व्यवस्था के तहत एचएएल को कुछ कॉन्ट्रैक्ट से जुड़ी शर्तों में राहत दी गई है। इसका मतलब यह है कि अगर कुछ ऐसे काम बाकी हैं, जिनका सीधा असर विमान की लड़ाकू क्षमता पर नहीं पड़ता, तो उनके बिना भी विमान की डिलीवरी शुरू की जा सकती है।

बताया जा रहा है कि पेंडिंग काम को तीन हिस्सों में बांटा गया है, माइनर, मेजर और नॉट एक्सेप्टेबल। इनमें से माइनर और कुछ मेजर कामों पर छूट दी जा सकती है।

वायुसेना इस बात के लिए तैयार है कि ऐसे विमान को स्वीकार किया जाए जिसमें कुछ काम बाद में पूरे किए जाएं, लेकिन यह छूट सिर्फ उन हिस्सों तक सीमित है जो ऑपरेशनल जरूरतों के लिए जरूरी नहीं हैं। (Tejas Mk1A Delivery)

किन चीजों पर कोई समझौता नहीं

इस पूरे फैसले का सबसे अहम हिस्सा यह है कि कुछ क्षमताओं को पूरी तरह जरूरी माना गया है। इनके बिना कोई भी विमान स्वीकार नहीं किया जाएगा।

इनमें सबसे पहले आता है मिसाइल फायरिंग ट्रायल्स। यानी विमान को अपने हथियारों का सही तरीके से इस्तेमाल करना आना चाहिए। (Tejas Mk1A Delivery)

दूसरा, रडार और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम का सही इंटीग्रेशन। यह आधुनिक युद्ध में बेहद जरूरी है, क्योंकि इससे विमान दुश्मन के रडार और मिसाइल से बच सकता है।

तीसरा, पूरा वेपन पैकेज। यानी विमान पर लगाए जाने वाले सभी हथियार सिस्टम पूरी तरह काम करने चाहिए।

इन तीनों को “नॉन-कॉम्प्रोमाइज” कैटेगरी में रखा गया है। यानी इन पर किसी भी तरह की छूट नहीं दी जाएगी। (Tejas Mk1A Delivery)

एचएएल की क्या है डिलीवरी की तैयारी

एचएएल का कहना है कि वह डिलीवरी शुरू करने के लिए तैयार है। कंपनी के अनुसार पांच तेजस एमके1ए विमान पूरी तरह तैयार हैं और इनमें सभी जरूरी क्षमताएं शामिल हैं।

इसके अलावा नौ और विमान बनाए जा चुके हैं, लेकिन वे इंजन मिलने का इंतजार कर रहे हैं।

एचएएल का यह भी कहना है कि जो देरी हुई है, वह सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग की वजह से नहीं है, बल्कि डिजाइन और डेवलपमेंट से जुड़े कुछ काम अभी पूरे होने बाकी हैं, जिनमें एरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी की भूमिका भी है। (Tejas Mk1A Delivery)

इससे पहले दिसंबर 2025 में इस पूरे प्रोजेक्ट की समीक्षा के लिए एक अहम बैठक हुई थी, जिसमें एचएएल ने अलग-अलग सिस्टम्स को पूरा करने के लिए टाइमलाइन दी थी।

अब अप्रैल 2026 में एक और बड़ी रिव्यू मीटिंग होने की संभावना है, जिसमें यह देखा जाएगा कि कितनी प्रगति हुई है।

इसके बाद मई 2026 में वायुसेना इस प्रोजेक्ट का व्यापक मूल्यांकन करेगी। अगर सब कुछ तय योजना के अनुसार रहा, तो 2026-27 के मध्य तक तेजस एमके1ए की डिलीवरी शुरू हो सकती है। (Tejas Mk1A Delivery)

वायुसेना के लिए क्यों जरूरी है तेजस

भारतीय वायुसेना इस समय स्क्वाड्रन की कमी से जूझ रही है। पुराने मिग-21 जैसे विमान तेजी से रिटायर हो रहे हैं, जिससे फाइटर स्क्वाड्रन की संख्या घट रही है।

ऐसे में तेजस एमके1ए एक अहम भूमिका निभाने वाला है। यह 4.5 जनरेशन का आधुनिक फाइटर जेट है, जिसमें एडवांस्ड रडार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग जैसी क्षमताएं हैं।

यह न सिर्फ वायुसेना की ताकत बढ़ाएगा, बल्कि भारत की आत्मनिर्भरता को भी मजबूत करेगा। (Tejas Mk1A Delivery)

180 विमानों का बड़ा ऑर्डर

भारत ने तेजस एमके1ए के लिए कुल 180 विमानों का ऑर्डर दिया है। इसमें पहला कॉन्ट्रैक्ट 83 विमानों का 2021 में हुआ था, जिसकी कीमत करीब 48,000 करोड़ रुपये थी।

इसके बाद 2025 में 97 और विमानों का ऑर्डर दिया गया, जिसकी कीमत लगभग 62,000 करोड़ रुपये से ज्यादा है। यह भारत के डिफेंस सेक्टर में सबसे बड़े स्वदेशी ऑर्डर्स में से एक है। (Tejas Mk1A Delivery)

बंधक सैनिकों पर सस्पेंस बरकरार, क्या कारगिल की तरह फिर जवानों को नकार रही पाक आर्मी? गुस्से में बंधकों के गांव वाले

Pakistani soldiers hostage BLA

Pakistani soldiers hostage BLA: हाल ही में बलूच लिबरेशन आर्मी ने पाकिस्तानी सैनिकों की कुछ तस्वीरें और वीडियो जारी किए और दावा किया कि उसने पाकिस्तान के सात सैनिकों को अपने कब्जे में ले लिया है। इसके साथ ही संगठन ने सात दिन की समय-सीमा दी और कहा कि अगर उसके पकड़े गए लड़ाकों को छोड़ा नहीं गया, तो इन सैनिकों के बदले कोई समझौता नहीं होगा। वहीं पकिस्तान ने इन सैनिकों को अपना मानने से इनकार किया है। ठीक वैसे ही जैसे तकरीबन 26 साल पहले कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तानी सेना के मारे गए जवानों के शवों को पाकिस्तान ने अपनाने से इनकार कर दिया था।

21 फरवरी को एक हफ्ते की मोहलत भी खत्म हो गई, लेकिन तब तक बंधक बनाए गए पाकिस्तानी सैनिकों को लेकर स्थिति पूरी तरह अनिश्चितता बनी हुई है। दिनभर कोई बड़ा घटनाक्रम सामने नहीं आया, न ही किसी तरह की रिहाई हुई और न ही किसी एक्जीक्यूशन की पुष्टि हुई। लेकिन इस बीच एक कई वीडियोज वायरल हो रहे हैं, जिनमें बंधक सैनिकों के गांवों से आवाज उठने लगी है, जहां लोग खुलकर कह रहे हैं कि “ये हमारे ही बच्चे हैं, इन्हें कैसे नकारा जा रहा है?”

बंधक बनाए गए पाकिस्तानी जवानों को लेकर न तो कोई रिहाई की खबर आई है और न ही किसी तरह की कार्रवाई की पुष्टि हुई है। इस बीच जिन जवानों के वीडियो सामने आए हैं, उनके गांवों से लगातार आवाज उठ रही है। गांव वालों का कहना है कि ये जवान उनके ही इलाके के हैं, वे उन्हें पहचानते हैं और यह सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर सेना इन्हें अपना मानने से क्यों इनकार कर रही है। परिवारों और स्थानीय लोगों में बेचैनी और गुस्सा दोनों साफ दिखाई दे रहे हैं।

इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत 14 फरवरी से हुई, जब बलोच लिबरेशन आर्मी यानी बीएलए ने दावा किया कि उसने पाकिस्तान सेना के 7 जवानों को पकड़ लिया है। इसके साथ ही उसने एक 7 दिन का अल्टीमेटम दिया था। बीएलए ने कहा था कि अगर पाकिस्तान सरकार उसके कैद लड़ाकों को रिहा नहीं करती, तो इन जवानों को मार दिया जाएगा।

20 फरवरी को इस मामले ने नया मोड़ लिया, जब बीएलए ने एक और वीडियो जारी किया। इस वीडियो में 7 की जगह 8 जवान दिखाई दिए। ये सभी जवान घुटनों के बल बैठे हुए थे और उनके पीछे हथियारबंद लोग खड़े थे। वीडियो में जवान अपनी पहचान साबित करने की कोशिश करते दिखे। उन्होंने अपने आर्मी सर्विस कार्ड और नाडरा आईडी कार्ड कैमरे के सामने दिखाए।

सबसे ज्यादा चर्चा सेपॉय मोहम्मद शहराम के बयान की हो रही है। वह वीडियो में रोते हुए कहते हैं कि अगर ये कार्ड नकली हैं, तो फिर इन्हें जारी किसने किया। वह बताते हैं कि वह अपने परिवार के इकलौते कमाने वाले हैं और उनके पिता दिव्यांग हैं। उनका सवाल सीधा था कि अगर वे सेना का हिस्सा नहीं हैं, तो उन्हें भर्ती क्यों किया गया था। इसी तरह दीदार उल्लाह और उस्मान नाम के जवान भी वीडियो में अपनी पहचान बताते नजर आते हैं।

दूसरी तरफ पाकिस्तान की सेना और आईएसपीआर लगातार इन दावों को खारिज कर रहे हैं। उनका कहना है कि ये वीडियो फर्जी हैं और एआई से बनाए गए हैं। 15 फरवरी से लेकर अब तक सेना का रुख नहीं बदला है। न तो इन जवानों को आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया गया है और न ही किसी तरह की बातचीत की पुष्टि हुई है। यही वजह है कि यह मामला और ज्यादा गंभीर होता जा रहा है।

इस बीच पाकिस्तान के कुछ इलाकों से जो जानकारी सामने आई है, उसमें यह दिख रहा है कि जिन जवानों के वीडियो आए हैं, उनके परिवार और गांव वाले सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। खासकर खैबर पख्तूनख्वा के बुनर गांव से जुड़े लोगों ने कहा है कि वीडियो में दिख रहा जवान उनके गांव का ही है। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर वह सेना में नहीं है, तो फिर उसकी पहचान के इतने सबूत कैसे हैं।

हालांकि 21 फरवरी की शाम तक सबसे बड़ी बात यह रही कि बीएलए की तरफ से कोई नई वीडियो या बयान सामने नहीं आया है। साथ ही पाकिस्तान सरकार या सेना की ओर से भी कोई नई घोषणा नहीं की गई है। यानी स्थिति पूरी तरह अनिश्चित बनी हुई है। अगर 22 फरवरी तक भी कोई हल नहीं निकलता, तो खतरा और बढ़ सकता है।

इस पूरे मामले को कई लोग 1999 के कारगिल युद्ध से भी जोड़कर देख रहे हैं। उस समय भी पाकिस्तान ने अपने सैनिकों की मौजूदगी से इनकार किया था, लेकिन बाद में सबूत सामने आए थे। अब एक बार फिर वैसी ही स्थिति बनती दिखाई दे रही है, जहां जमीनी हकीकत और आधिकारिक बयान में अंतर नजर आ रहा है।

बीएलए का दावा है कि उसने कुल 17 जवानों को पकड़ा था, जिनमें से 10 को छोड़ दिया गया है और बाकी अभी भी उसके कब्जे में हैं। हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। लेकिन वीडियो में दिख रहे जवानों की हालत और उनके बयान इस मामले को और संवेदनशील बना रहे हैं।

इस पूरे घटनाक्रम का एक बड़ा असर पाकिस्तान सेना की छवि पर भी पड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी इस पर चर्चा हो रही है कि क्या सेना अपने ही जवानों को पहचानने से इनकार कर रही है। इससे सेना की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ एक बंधक संकट नहीं है, बल्कि यह एक बड़ी रणनीतिक और मनोवैज्ञानिक लड़ाई भी है। बीएलए इस मामले को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाकर दबाव बनाना चाहता है, जबकि पाकिस्तान सेना इसे सूचना युद्ध यानी इंफॉर्मेशन वॉर बताकर खारिज कर रही है।

फिलहाल सबसे अहम सवाल यही है कि आगे क्या होगा। क्या पाकिस्तान बातचीत करेगा या फिर स्थिति और बिगड़ेगी। क्या बीएलए अपने अल्टीमेटम पर अमल करेगा या फिर कोई नया रास्ता निकलेगा। इन सभी सवालों के जवाब अगले 24 घंटे में सामने आ सकते हैं।

हिंद महासागर की सुरक्षा पर बड़ा फैसला, 15 देशों ने मिलकर तैयार किया नया सिक्योरिटी प्लान!

Goa Maritime Conclave 2026

Goa Maritime Conclave 2026: गोवा में आयोजित गोवा मैरिटाइम कॉन्क्लेव 2026 (जीएमसी-26) में कई देशों में सहमति जताई है कि हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षा अब किसी एक देश की जिम्मेदारी नहीं रही, बल्कि यह सभी देशों की साझा चुनौती बन चुकी है। भारतीय नौसेना द्वारा आयोजित इस बड़े अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम में 15 देशों के नौसेना प्रमुख और वरिष्ठ समुद्री विशेषज्ञ शामिल हुए।

यह कॉन्क्लेव गोवा के नेवल वॉर कॉलेज में आयोजित किया गया, जहां समुद्री सुरक्षा से जुड़े कई अहम मुद्दों पर खुलकर चर्चा हुई। इस बार की थीम थी- “कॉमन मैरिटाइम सिक्योरिटी चैलेंजेज इन आईओआर – डायनामिक थ्रेट्स से निपटने के लिए लाइन्स ऑफ एफर्ट को आगे बढ़ाना।” आसान शब्दों में समझें तो यह बैठक इस बात पर केंद्रित थी कि बदलते समुद्री खतरों से मिलकर कैसे निपटा जाए।

इस कॉन्क्लेव का सबसे अहम संदेश यही रहा कि हिंद महासागर में बढ़ते खतरों का सामना करने के लिए देशों के बीच बेहतर तालमेल, तेजी से जानकारी साझा करना और संयुक्त कार्रवाई बेहद जरूरी है। (Goa Maritime Conclave 2026)

Goa Maritime Conclave 2026: भारत बना “कन्वीनर”

इस पूरे आयोजन में भारत की भूमिका एक “कन्वीनर” यानी सबको साथ लाने वाले देश के रूप में सामने आई। भारत ने न सिर्फ इस बैठक की मेजबानी की, बल्कि एक ऐसा मंच भी दिया जहां सभी देश खुलकर अपनी बात रख सकें और मिलकर समाधान निकाल सकें।

यह कॉन्क्लेव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “महासागर विजन” (म्यूचुअल एंड होलिस्टिक एडवांसमेंट फॉर सिक्योरिटी एंड ग्रोथ एक्रॉस रीजेंस) के तहत आयोजित किया गया। इसका मतलब है कि सुरक्षा और विकास दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ना। (Goa Maritime Conclave 2026)

भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी ने अपने संबोधन में कहा कि आज समुद्री खतरे तेजी से बदल रहे हैं। ऐसे में सिर्फ जानकारी साझा करना काफी नहीं है, बल्कि अब मिलकर कार्रवाई करने की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि टेक्नोलॉजी, बेहतर जानकारी साझा करने की व्यवस्था और संयुक्त ऑपरेशन के जरिए समुद्री सुरक्षा को मजबूत किया जा सकता है।

इस कॉन्क्लेव में बांग्लादेश, कोमोरोस, इंडोनेशिया, केन्या, मेडागास्कर, मलेशिया, मालदीव, मॉरीशस, म्यांमार, सेशेल्स, सिंगापुर, श्रीलंका, तंजानिया, थाईलैंड जैसे देशों के प्रमुख और प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं। (Goa Maritime Conclave 2026)

किन मुद्दों पर हुई सबसे ज्यादा चर्चा

कॉन्क्लेव में जिन मुद्दों पर सबसे ज्यादा फोकस रहा, उनमें अवैध मछली पकड़ना, ड्रग तस्करी, समुद्री अपराध और अन्य ट्रांसनेशनल क्राइम शामिल थे।

विशेष रूप से “आईयूयू फिशिंग” यानी अवैध, अप्रतिबंधित और अनियमित फिशिंग को बड़ा खतरा माना गया। यह सिर्फ आर्थिक नुकसान ही नहीं करता, बल्कि कई बार सुरक्षा के लिए भी खतरा बन जाता है।

इसके अलावा ड्रग तस्करी और समुद्री रास्तों के जरिए होने वाले अपराधों पर भी गंभीर चिंता जताई गई। विशेषज्ञों ने कहा कि ये नेटवर्क अब ज्यादा संगठित और तकनीक का इस्तेमाल करने वाले हो गए हैं। (Goa Maritime Conclave 2026)

Goa Maritime Conclave 2026

रियल टाइम जानकारी साझा करने पर जोर

कॉन्क्लेव में यह बात बार-बार सामने आई कि अगर समुद्र में होने वाली गतिविधियों की जानकारी समय पर साझा की जाए, तो कई खतरों को पहले ही रोका जा सकता है।

इसके लिए मैरिटाइम डोमेन अवेयरनेस यानी समुद्री क्षेत्र की निगरानी को मजबूत करने पर जोर दिया गया।

पहले सत्र में चर्चा हुई कि अलग-अलग देशों के बीच रियल टाइम इंफॉर्मेशन शेयरिंग सिस्टम को कैसे बेहतर बनाया जाए। इसमें यह भी कहा गया कि सभी देशों के सिस्टम आपस में जुड़ें, ताकि किसी भी घटना पर तुरंत प्रतिक्रिया दी जा सके। (Goa Maritime Conclave 2026)

क्षमता निर्माण और ट्रेनिंग पर फोकस

दूसरे सत्र में देशों के बीच सहयोग बढ़ाने और क्षमता निर्माण पर चर्चा हुई। इसमें यह सुझाव दिया गया कि सभी देश अपने ट्रेनिंग संसाधनों को साझा करें और ज्यादा से ज्यादा संयुक्त अभ्यास करें। इससे न सिर्फ तकनीकी क्षमता बढ़ेगी, बल्कि एक-दूसरे के साथ काम करने की समझ भी बेहतर होगी।

विशेषज्ञों ने कहा कि लंबे समय तक समुद्री सुरक्षा बनाए रखने के लिए मजबूत संस्थागत ढांचा जरूरी है। यानी सिर्फ बैठकें करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि स्थायी सिस्टम बनाना होगा। (Goa Maritime Conclave 2026)

Goa Maritime Conclave 2026
Former CNS Admiral Arun Prakash

पूर्व नौसेना प्रमुख का अहम सुझाव

कॉन्क्लेव में पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल अरुण प्रकाश ने कहा कि आज के समय में समुद्री सुरक्षा के लिए तीन चीजें सबसे जरूरी हैं- इनमें रियल टाइम जानकारी, मजबूत समन्वय और लगातार क्षमता विकास है।

उन्होंने यह भी कहा कि आईयूयू फिशिंग और ड्रग तस्करी जैसी समस्याओं से निपटने के लिए सभी देशों को मिलकर जिम्मेदारी लेनी होगी। (Goa Maritime Conclave 2026)

सभी देशों ने जताई साझा प्रतिबद्धता

कॉन्क्लेव के अंत में सभी देशों के प्रतिनिधियों ने अपनी-अपनी बात रखी और इस बात पर सहमति जताई कि समुद्री सुरक्षा के लिए मिलकर काम करना ही एकमात्र रास्ता है।

सभी देशों ने यह माना कि हिंद महासागर क्षेत्र की स्थिरता तभी संभव है जब सहयोग, भरोसा और साझा जिम्मेदारी हो। (Goa Maritime Conclave 2026)

इस कॉन्क्लेव ने एक बार फिर यह दिखाया कि भारत हिंद महासागर क्षेत्र में एक भरोसेमंद साझेदार के रूप में उभर रहा है।

भारत लगातार ऐसे मंच तैयार कर रहा है जहां अलग-अलग देश मिलकर काम कर सकें। हाल ही में आयोजित मिलन एक्सरसाइज और इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू के बाद यह कॉन्क्लेव भी उसी दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। (Goa Maritime Conclave 2026)

क्यों अहम है यह कॉन्क्लेव

आज दुनिया में समुद्र का महत्व तेजी से बढ़ रहा है। व्यापार, ऊर्जा और सुरक्षा- तीनों के लिए समुद्र बेहद जरूरी है। ऐसे में अगर समुद्र सुरक्षित नहीं रहेगा, तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा। इसी वजह से गोवा मैरिटाइम कॉन्क्लेव 2026 जैसे मंच बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं, जहां देश मिलकर समाधान तलाशते हैं। (Goa Maritime Conclave 2026)

जानें क्या है भारतीय नौसेना की कंटीन्यूटी ड्रिल? MILAN 2026 में जीता विदेशी मेहमानों का दिल

Indian Navy Continuity Drill MILAN 2026
Indian Navy Continuity Drill MILAN 2026

Indian Navy Continuity Drill: विशाखापत्तनम के आरके बीच पर गुरुवार की शाम एक अलग ही नजारा देखने को मिला। मिलन एक्सरसाइज 2026 के उद्घाटन के मौके पर आयोजित इंटरनेशनल सिटी परेड में हजारों लोग जुटे। समुद्र के किनारे जब भारतीय नौसेना की कंटीन्यूटी ड्रिल शुरू हुई, तो कुछ ही पलों में वहां खड़े दर्शक तालियों और उत्साह से पूरा माहौल गूंज उठा।

Indian Navy Continuity Drill: क्या होती है कंटीन्यूटी ड्रिल?

कंटीन्यूटी ड्रिल भारतीय नौसेना की एक विशेष वेपन ड्रिल है। इसे साधारण मार्च या सामान्य परेड से अलग माना जाता है। इसमें सेलर्स राइफल के साथ बेहद सटीक और एकसमान मूवमेंट करते हैं। खास बात यह है कि ड्रिल शुरू होने के बाद बीच में कोई मौखिक कमांड नहीं दी जाती। पूरी ड्रिल बिना रुके और लगातार चलती रहती है। इसी वजह से इसे “कंटीन्यूटी” यानी निरंतरता की ड्रिल कहा जाता है।

इस ड्रिल में आम तौर पर 24 या उससे अधिक नाविक एक साथ शामिल होते हैं। वे .22 राइफल राइफल के साथ बेयोनेट लगाकर अभ्यास करते हैं। सभी सेलर्स इतने करीब खड़े होते हैं कि एक छोटी सी गलती भी पूरी ड्रिल को बिगाड़ सकती है। लेकिन जब यह टीम ड्रिल करती है, तो हर मूवमेंट ऐसा लगता है जैसे एक ही शरीर काम कर रहा हो। (Indian Navy Continuity Drill)

राइफल के जमीन पर पड़ने की आवाज, जूतों की एकसमान थाप और हथियारों की क्लिक की ध्वनि एक अलग ही ताल बनाती है। इसीलिए कई बार इसे “ड्रिल विद थ्रिल” भी कहा जाता है। इसमें रोमांच और अनुशासन दोनों साथ दिखाई देते हैं। (Indian Navy Continuity Drill)

आरके बीच पर क्यों बना आकर्षण का केंद्र?

विशाखापत्तनम पूर्वी नौसैनिक कमान का मुख्यालय है। यहां नौसेना की कई महत्वपूर्ण यूनिट्स तैनात हैं। ऐसे में जब इंटरनेशनल सिटी परेड आयोजित हुई, तो नौसेना की कंटीन्यूटी ड्रिल स्वाभाविक रूप से सबसे बड़ा आकर्षण बन गई।

मिलन 2026 में 74 देशों के प्रतिनिधिमंडल और नौसेनाएं हिस्सा ले रही हैं। ऐसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीय नौसेना की यह प्रस्तुति देश की प्रोफेशनल क्षमता और ट्रेनिंग का प्रदर्शन थी। विदेशी प्रतिनिधि भी इस ड्रिल को बड़े ध्यान से देखते नजर आए। (Indian Navy Continuity Drill)

मैन्यूवर ने दर्शकों को कर दिया रोमांचित

कार्यक्रम की शुरुआत मुख्य अतिथि के आगमन से हुई। वंदे मातरम और राष्ट्रीय गान के साथ वातावरण देशभक्ति से भर गया। इसके बाद बैनर फ्लाईपास्ट और एरियल डेमो ने आसमान में रोमांच पैदा कर दिया। फाइटर जेट्स और हेलीकॉप्टरों ने बे ऑफ बंगाल के ऊपर सिंक्रोनाइज्ड मैन्यूवर किए। एमएच-60आर हेलीकॉप्टर का ब्रेकआउट मैन्यूवर और बम बर्स्ट डेमो ने दर्शकों को रोमांचित कर दिया।

डोर्नियर, कोस्ट गार्ड एयरक्राफ्ट और पी-8आई मैरीटाइम पेट्रोल एयरक्राफ्ट के फ्लाईपास्ट ने नौसेना की हवाई ताकत दिखाई। सर्च एंड रेस्क्यू डेमो, स्लिथरिंग ऑपरेशन और मरीन कमांडोज के कॉम्बैट मैन्यूवर ने ऑपरेशनल तैयारियों की झलक दी। (Indian Navy Continuity Drill)

अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है दुनिया

परेड के दौरान नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी ने कहा कि मिलन 2026 एक ऐतिहासिक आयोजन है। उन्होंने 74 देशों से आए प्रतिनिधियों का स्वागत किया और आंध्र प्रदेश सरकार तथा विशाखापत्तनम के लोगों का धन्यवाद किया।

उन्होंने कहा कि यह आयोजन सिर्फ सैन्य प्रदर्शन नहीं, बल्कि दोस्ती और सहयोग का प्रतीक है। जब अलग-अलग देशों की नौसेनाएं एक मंच पर आती हैं, तो आपसी भरोसा बढ़ता है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत और भारतीय नौसेना समुद्रों को सुरक्षित, मुक्त और खुला रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं। (Indian Navy Continuity Drill)

एडमिरल त्रिपाठी ने कहा कि आज दुनिया अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है। कई तरह की चुनौतियां सामने हैं। ऐसे समय में भारत और भारतीय नौसेना अपने साझेदार देशों के साथ मिलकर समुद्रों को सुरक्षित, मुक्त और सबके लिए खुला रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री के उस विचार का उल्लेख किया कि जब वैश्विक समुद्रों में हलचल होती है, तो दुनिया एक स्थिर और भरोसेमंद प्रकाशस्तंभ की ओर देखती है। भारत उस भूमिका को निभाने के लिए तैयार है। (Indian Navy Continuity Drill)

एडमिरल त्रिपाठी ने कहा कि मिलन जैसे आयोजन इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये अलग-अलग देशों की नौसेनाओं को एक साथ लाते हैं। चाहे समुद्र में संयुक्त अभ्यास हो या आज की तरह सिटी परेड में साथ कदम मिलाना, ऐसे कार्यक्रम आपसी विश्वास और तालमेल को मजबूत करते हैं। (Indian Navy Continuity Drill)

रोशनी से जगमगा उठे युद्धपोत

जैसे ही सूरज ढलने लगा, समुद्र में लंगर डाले युद्धपोत रोशनी से जगमगा उठे। एंकरज पर खड़े जहाजों की इल्यूमिनेशन ने समुद्र को चमकते शहर में बदल दिया। इसके बाद फायरवर्क्स, लेजर शो और ड्रोन शो ने आसमान को रंगों से भर दिया। (Indian Navy Continuity Drill)

MILAN 2026: 74 देशों के बीच रक्षा मंत्री का बड़ा संदेश, समुद्री चुनौतियों से अकेला नहीं निपट सकता कोई देश

MILAN 2026 Maritime Security

MILAN 2026 Maritime Security: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने गुरुवार को साफ शब्दों में कहा कि आज समुद्र से जुड़ी चुनौतियां पहले से कहीं ज्यादा जटिल और आपस में जुड़ी हुई हैं। ऐसे समय में दुनिया के देशों को मिलकर काम करना होगा। उन्होंने 74 देशों से आए नौसेना प्रमुखों और प्रतिनिधिमंडलों को संबोधित करते हुए कहा कि समुद्री सुरक्षा अब किसी एक देश का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह पूरी दुनिया की साझा जिम्मेदारी है।

MILAN 2026 Maritime Security: समुद्री रास्तों पर नियंत्रण को लेकर बढ़ी होड़

विशाखापत्तनम में आयोजित मल्टीलेटरल नेवल एक्सरसाइज मिलन 2026 के उद्घाटन समारोह में बोलते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि पिछले कुछ दशकों में दुनिया की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ी है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार और समुद्री परिवहन में भारी इजाफा हुआ है। इसके साथ ही समुद्री रास्तों, जलडमरूमध्यों और समुद्री चैनलों पर नियंत्रण को लेकर होड़ भी बढ़ी है। कई बार यह तनाव की स्थिति तक पहुंच जाती है। समुद्र के नीचे मौजूद खनिज संपदा, खासकर दुर्लभ खनिजों को लेकर भी दुनिया का ध्यान बढ़ा है, जिससे नई तरह की प्रतिस्पर्धा पैदा हो रही है। (MILAN 2026 Maritime Security)

नौसेनाओं के लिए लगातार बढ़ रही हैं चुनौतियां

उन्होंने चेतावनी दी कि पारंपरिक खतरों के साथ-साथ नए खतरे भी सामने आ रहे हैं। समुद्री डकैती, मैरीटाइम टेररिज्म, अवैध मछली पकड़ना, तस्करी, साइबर हमले और सप्लाई चेन में रुकावट जैसी चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण प्राकृतिक आपदाएं भी ज्यादा बार और ज्यादा तीव्र रूप में आ रही हैं। ऐसे में मानवीय सहायता और आपदा राहत ऑपरेशन भी अधिक जरूरी हो गए हैं।

राजनाथ सिंह ने स्पष्ट किया कि कोई भी एक नौसेना, चाहे वह कितनी भी मजबूत क्यों न हो, इन सभी चुनौतियों का अकेले सामना नहीं कर सकती। उन्होंने नौसेनाओं के बीच सहयोग बढ़ाने, सूचना साझा करने और संयुक्त अभ्यास करने की जरूरत पर जोर दिया। (MILAN 2026 Maritime Security)

ग्लोबल नेवल फ्रेमवर्क पर दिया जोर

रक्षा मंत्री ने संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि यानी यूएन कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ सीज (यूएनसीएलओएस) का जिक्र करते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र से जुड़े मामलों के समाधान के लिए यह एक मजबूत लीगल फ्रेमवर्क देता है। लेकिन इसे और प्रभावी बनाने के लिए एक व्यापक ग्लोबल नेवल फ्रेमवर्क की जरूरत है। ऐसा फ्रेमवर्क देशों के बीच भरोसा बढ़ाएगा, संचार मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा और खुले समुद्र में आतंकवाद व अपराध जैसी गतिविधियों को रोकने में मदद करेगा। (MILAN 2026 Maritime Security)

मिलन जैसे प्लेटफॉर्म्स की है जरूरत

रक्षा मंत्री ने कहा कि आज वैश्विक व्यवस्था में बदलाव दिखाई दे रहा है। ऐसे समय में मिलन जैसे प्लेटफॉर्म प्रोफेशनल अनुभव साझा करने, आपसी भरोसा मजबूत करने और मिलकर काम करने की क्षमता बढ़ाने का अवसर देते हैं। जब अलग-अलग देशों के जहाज साथ चलते हैं, नाविक साथ में ट्रेनिंग लेते हैं और कमांडर साथ बैठकर चर्चा करते हैं, तो भौगोलिक और राजनीतिक दूरियां कम हो जाती हैं। (MILAN 2026 Maritime Security)

सागर से महासागर से समुद्री साझेदारी होगी मजबूत

उन्होंने कहा कि भारत लंबे समय से समुद्री सहयोग की जरूरत को समझता रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन ‘सागर’ यानी सिक्योरिटी एंड ग्रोथ फॉर ऑल इन द रीजन से आगे बढ़कर अब ‘महासागर’ यानी म्यूचुअल एंड होलिस्टिक एडवांसमेंट फॉर सिक्योरिटी एंड ग्रोथ अक्रॉस रीजन का विचार सामने आया है। यह दिखाता है कि भारत सिर्फ अपने क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापक समुद्री साझेदारी को मजबूत करना चाहता है।

राजनाथ सिंह ने कहाा कि भारत नियमित रूप से मल्टीलेटरल नेवल एक्सरसाइजेज में हिस्सा लेता है। कॉर्डिनेटेड पेट्रोलिंग, एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन की निगरानी, हाइड्रोग्राफिक सहायता और चक्रवात जैसी आपदाओं के दौरान राहत कार्यों में भी भारत सक्रिय भूमिका निभाता रहा है। उन्होंने कहा कि भारत एक विश्व-मित्र के रूप में क्षेत्र में रचनात्मक और भरोसेमंद भूमिका निभाता रहेगा। (MILAN 2026 Maritime Security)

उन्होंने मिलन 2026 को वैश्विक समुद्री समुदाय के भारत पर भरोसे का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि भारत एक ऐसा न्यायपूर्ण समुद्री व्यवस्था स्थापित करना चाहता है जो अंतरराष्ट्रीय कानून और नौवहन की स्वतंत्रता पर आधारित हो। (MILAN 2026 Maritime Security)

नेवी चीफ ने मिलन को बताया समुद्री महाकुंभ

मिलन 2026 उद्घाटन समारोह में नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी ने भी मिलन को एक समुद्री महाकुंभ बताया। उन्होंने कहा कि यह ऐसा मंच है जहां दुनिया भर के मैरीन प्रोफेशनल्स एक साझा उद्देश्य के साथ इकट्ठा होते हैं। उन्होंने दोहराया कि आज की समुद्री चुनौतियां जटिल और सीमाओं से परे हैं, जिनका समाधान सहयोग और साझेदारी से ही संभव है।

एडमिरल त्रिपाठी ने कहा कि भारतीय नौसेना प्रधानमंत्री के महासागर विजन से प्रेरित है, जो साझेदारी और साझा जिम्मेदारी पर आधारित है। भारतीय नौसेना अपने सभी साझेदार देशों को बराबरी का दर्जा देती है और मानती है कि हर देश अपनी अलग ताकत लेकर आता है। (MILAN 2026 Maritime Security)

बराबरी और साझेदारी की भावना

नौसेना प्रमुख ने कहा कि भारतीय नौसेना अपने सभी समुद्री साझेदारों को बराबरी का दर्जा देती है। हर देश की अपनी खास ताकत होती है – चाहे वह अनुभव हो, भौगोलिक स्थिति हो या तकनीकी क्षमता। जब ये ताकतें एक साथ जुड़ती हैं, तो सामूहिक क्षमता बढ़ती है। इससे बदलती समुद्री चुनौतियों का सामना करने की ताकत भी मजबूत होती है। (MILAN 2026 Maritime Security)

तीन स्तरों पर काम करने की रणनीति

नौसेना प्रमुख ने बताया कि भारतीय नौसेना समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने के लिए तीन स्तरों पर काम करती है।

इनमें वैश्विक स्तर पर भारत अपने साझेदार देशों के साथ मिलकर समग्र समुद्री सुरक्षा को बढ़ावा देता है। इसमें कानून व्यवस्था, मानवीय सहायता, पर्यावरण संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन शामिल है।

वहीं, क्षेत्रीय स्तर पर भारत यह समझता है कि हर इलाके की जरूरत अलग होती है। इसलिए एक ही तरीका हर जगह काम नहीं करता। सहयोग को स्थानीय जरूरतों के अनुसार ढालना जरूरी है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि पिछले साल भारतीय नौसेना ने ‘इंडियन ओशन शिप सागर’ के रूप में एक जहाज को दक्षिण-पश्चिम हिंद महासागर क्षेत्र में तैनात किया। इसमें नौ देशों के 44 कर्मियों की मिलीजुली टीम शामिल थी। इसका मकसद अनुभव और जिम्मेदारी साझा करना था। (MILAN 2026 Maritime Security)

अब इसी पहल को आगे बढ़ाते हुए ‘आईओएस सागर 2.0’ को इस साल अप्रैल में और बड़े स्तर पर तैनात किया जाएगा।

उन्होंने पिछले साल हुए ‘अफ्रीका–इंडिया की मैरीटाइम एंगेजमेंट’ अभ्यास का भी जिक्र किया। इस अभ्यास में पूर्वी अफ्रीका के देशों के साथ मिलकर व्यावहारिक सहयोग किया गया। इससे यह संदेश गया कि अगर इरादा मजबूत हो तो दूरी कोई बाधा नहीं बनती। (MILAN 2026 Maritime Security)

पड़ोसी देशों के साथ प्राथमिकता

नौसेना प्रमुख ने कहा कि भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ यानी पड़ोसी देशों को प्राथमिकता देने की नीति भी समुद्री सुरक्षा में दिखती है। चाहे समन्वित पेट्रोलिंग हो या संकट के समय मानवीय सहायता, भारत हमेशा क्षेत्र में एक भरोसेमंद ‘फर्स्ट रिस्पॉन्डर’ की भूमिका निभाता है। (MILAN 2026 Maritime Security)

दो चरणों में होगी मिलन एक्सरसाइज

मिलन 2026 को दो चरणों में आयोजित किया जा रहा है। पहले चरण यानी हार्बर फेज में प्रोफेशनल डिस्कशंस, अंतरराष्ट्रीय समुद्री सेमिनार, विशेषज्ञों के बीच विचार-विमर्श, सांस्कृतिक कार्यक्रम और शहर भ्रमण जैसी गतिविधियां शामिल हैं। इससे देशों के बीच आपसी समझ और संबंध मजबूत होते हैं।

दूसरे चरण यानी सी फेज में समुद्र में संयुक्त अभ्यास होंगे। इनमें एंटी-सबमरीन वॉरफेयर, एयर डिफेंस, सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन और सामरिक अभ्यास शामिल हैं। इन अभ्यासों का मकसद नौसेनाओं के बीच तालमेल और सामूहिक तैयारी को मजबूत करना है। (MILAN 2026 Maritime Security)

नौ एशियान देशों के नौसेना प्रमुखों से मिले रक्षा मंत्री

मिलन के उदघाटन के दौरान रक्षा मंत्री ने नौ एशियान देशों के नौसेना प्रमुखों से भी मुलाकात की। उन्होंने कहा कि एशियान भारत की इंडो-पैसिफिक रणनीति का महत्वपूर्ण स्तंभ है। साझा सुरक्षा ही क्षेत्रीय समृद्धि की नींव है। उन्होंने एशियान देशों को भारत की रक्षा तकनीक और आत्मनिर्भर भारत के तहत विकसित इकोसिस्टम का लाभ उठाने का निमंत्रण दिया।

उन्होंने आईएनएस विक्रांत और विशाखापत्तनम क्लास डिस्ट्रॉयर जैसे जहाजों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत अब “बिल्डर नेवी” बन चुका है। यानी भारत अब सिर्फ जहाज खरीदने वाला देश नहीं, बल्कि खुद डिजाइन और निर्माण करने वाला देश है। (MILAN 2026 Maritime Security)

IFR-Milan 2026: ऑपरेशन सिंदूर के बाद पहली बार साथ दिखे भारत के स्ट्रेटेजिक वॉरशिप, INS विक्रांत से अन्वेष तक दुनिया ने देखा भारत का दम

IFR-Milan 2026 Indian Navy Strategic Warships

IFR-Milan 2026: बुधवार को विशाखापत्तनम भारतीय नौसेना की ब्लू वॉटर ताकत का सबसे बड़ा गवाह बना। विशाखापत्तनम के तट पर आयोजित इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू (आईएफआर) 2026 सिर्फ एक नौसैनिक परेड नहीं थी, बल्कि यह भारत की समुद्री ताकत और रणनीतिक आत्मविश्वास का खुला प्रदर्शन था। ऑपरेशन सिंदूर के बाद यह पहला मौका था जब भारतीय नौसेना के कई अहम और स्ट्रेटेजिक वॉरशिप एक साथ कतार में दुनिया के सामने दिखाई दिए। ऐसे मौके कई सालों में कभी कभार ही देखने को मिलते हैं।

आईएफआर का निरीक्षण तीनों सेनाओं की सुप्रीम कमांडर और देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने किया। वह स्वदेशी ऑफशोर पेट्रोल वेसल आईएनएस सुमेधा पर सवार होकर फ्लीट का रिव्यू करती नजर आईं। समुद्र में कतारबद्ध खड़े भारतीय और विदेशी जहाजों ने यह साफ संदेश दिया कि हिंद महासागर क्षेत्र में भारत अब सिर्फ एक तटीय ताकत नहीं, बल्कि एक सशक्त ब्लू वॉटर नेवी बन चुका है। (IFR-Milan 2026)

IFR-Milan 2026 Indian Navy Strategic Warships

IFR-Milan 2026: क्या होता है फ्लीट रिव्यू?

फ्लीट रिव्यू एक ऐसा कार्यक्रम होता है, जिसमें देश का सर्वोच्च कमांडर समुद्र में तैनात नौसेना के जहाजों का निरीक्षण करता है। इसमें दोस्त देशों की नौसेनाएं भी हिस्सा लेती हैं। भारत में इससे पहले 2001 में मुंबई और 2016 में विशाखापत्तनम में आईएफआर आयोजित हो चुका है। 2026 का आयोजन सबसे बड़ा माना जा रहा है, क्योंकि इसमें मिलन एक्सरसाइज और आईओएनएस कॉन्क्लेव भी शामिल हैं।

इस बार आईएफआर में करीब 70 से ज्यादा देशों की नौसेनाएं शामिल हुईं। भारतीय नौसेना के 50 से अधिक युद्धपोत, पनडुब्बियां और सपोर्ट शिप इसमें दिखाई दिए। साथ ही विदेशी नौसेनाओं के भी कई जहाज समुद्र में मौजूद रहे। (IFR-Milan 2026)

ऑपरेशन सिंदूर की यादें हुईं ताजा

पिछले साल हुए ऑपरेशन सिंदूर के बाद यह पहला बड़ा अंतरराष्ट्रीय मंच था, जहां भारतीय नौसेना की स्ट्रेटेजिक ताकत खुले तौर पर सामने आई। उस ऑपरेशन के दौरान भारत के स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत ने अपने कैरियर बैटल ग्रुप के साथ अरब सागर में अहम भूमिका निभाई थी।

आईएफआर 2026 में आईएनएस विक्रांत मुख्य आकर्षण रहा। यह भारत का पहला पूरी तरह स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर है, जिसे कोचीन शिपयार्ड में बनाया गया है। लगभग 40 हजार टन से ज्यादा वजन वाला यह विशाल जहाज भारत की समुद्री शक्ति का प्रतीक बन चुका है।

इस पर मिग-29के फाइटर जेट, कामोव हेलीकॉप्टर और एडवांस लाइट हेलीकॉप्टर ध्रुव जैसे एयरक्राफ्ट तैनात किए जा सकते हैं। आईएफआर के दौरान समुद्र में एंकर डाले खड़े विक्रांत को देखकर साफ लगा कि भारत अब दूर समुद्रों में भी अपनी एयर पॉवर को प्रोजेक्ट करने की क्षमता रखता है। (IFR-Milan 2026)

स्वदेशी डिस्ट्रॉयर और फ्रिगेट ने भी दिखाया दम

आईएफआर में प्रोजेक्ट 15बी के तहत बने विशाखापत्तनम क्लास गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर भी शामिल थे। आईएनएस विशाखापत्तनम, आईएनएस मोरमुगाओ और अन्य जहाज आधुनिक रडार, ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल और लंबी दूरी के एयर डिफेंस सिस्टम से लैस हैं।

ये जहाज एंटी-एयर, एंटी-सर्फेस और एंटी-सबमरीन वारफेयर में सक्षम हैं। इनकी स्टेल्थ डिजाइन से इन्हें दुश्मन के रडार से बचने में मदद करती है।

इसी तरह प्रोजेक्ट 17ए के तहत बने नीलगिरी क्लास स्टेल्थ फ्रिगेट भी आकर्षण का केंद्र रहे। ये जहाज अधिक ऑटोमेशन, कम क्रू और आधुनिक सेंसर से लैस हैं। इनका डिजाइन पूरी तरह भारतीय नौसेना के डायरेक्टोरेट ऑफ नेवल डिजाइन द्वारा तैयार किया गया है। (IFR-Milan 2026)

पनडुब्बियों और एंटी सबमरीन वॉरशिप भी दिखे कतार में

आईएफआर में तीन भारतीय पनडुब्बियां भी दिखाई गईं। इनमें शिशु क्लास की शंकुल, सिंधु क्लास की आईएनएस सिंधुकेसरी और आईएनएस सिंधुकीर्ति शामिल थीं। ये पनडुब्बियां साइलेंट वॉरियर, लंबी दूरी की क्षमता और डीप स्ट्राइक के लिए जानी जाती हैं।

इसके अलावा अर्नाला क्लास एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट भी मौजूद रहे। इनका मकसद तटीय इलाकों में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाना और उन्हें निष्क्रिय करना है। हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती पनडुब्बी गतिविधियों को देखते हुए यह क्षमता बेहद अहम मानी जा रही है। ये जहाज सोनार, टॉरपीडो और एएसडब्ल्यू हेलीकॉप्टर से लैस हैं। हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती पनडुब्बी गतिविधियों को देखते हुए इनकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। (IFR-Milan 2026)

आईएनएस निस्तार की दिखी झलक

आईएफआर में डीप सबमर्जेंस रेस्क्यू व्हीकल यानी डीएसआरवी और डाइविंग सपोर्ट वेसल आईएनएस निस्तार भी देखने को मिला। इनका काम समुद्र में फंसी पनडुब्बियों के नाविकों को बचाना है। यह भारत की मानवीय और तकनीकी क्षमता दोनों को दिखाता है। नया स्वदेशी निस्तार भारतीय शिपयार्ड में बना है और यह भारत की बढ़ती तकनीकी क्षमता को दिखाता है। (IFR-Milan 2026)

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पहली बार दिखा आईएनएस अन्वेष

आईएफआर में भारतीय नौसना ने पहली बार अपने स्ट्रेटेजिक शिप आईएनएस अन्वेष (A41) को भी शोकेस किया। यह भारतीय नौसेना का एक बेहद खास और रणनीतिक जहाज है। इसे बैलास्टिक मिसाइल रेंज इंस्ट्रूमेंटेशन शिप कहा जाता है। आसान शब्दों में समझें तो यह समुद्र में तैरती हुई टेस्टिंग लैब है, जहां से लंबी दूरी की मिसाइलों का परीक्षण और ट्रैकिंग की जाती है। इसी वजह से इसे फ्लोटिंग टेस्ट रेंज भी कहा जाता है।

“अन्वेष” का मतलब होता है खोज। यह नाम इसके काम को सही तरीके से दर्शाता है, क्योंकि यह जहाज मिसाइलों को ट्रैक करता है, उनका डेटा इकट्ठा करता है और परीक्षण की पूरी प्रक्रिया को मॉनिटर करता है। (IFR-Milan 2026)

इस जहाज को रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी डीआरडीओ ने डिजाइन किया है और कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड में बनाया गया है। यह पूरी तरह स्वदेशी तकनीक पर आधारित है और ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ की बड़ी मिसाल माना जाता है।

आईएनएस अन्वेष को 11 मार्च 2022 को गुप्त समारोह में कमीशन किया गया था। यह जहाज डीआरडीओ के स्वामित्व में है, लेकिन इसे भारतीय नौसेना संचालित करती है। यानी इस पर नौसेना के अधिकारी और जवान तैनात रहते हैं, जबकि इसके मिशन डीआरडीओ के कार्यक्रमों से जुड़े होते हैं। (IFR-Milan 2026)

यह जहाज करीब 118 मीटर लंबा और 20 मीटर चौड़ा है। इसका कुल वजन लगभग 11,300 टन है। यह 18 नॉट्स से ज्यादा की रफ्तार से चल सकता है और बिना दोबारा सप्लाई लिए करीब 45 दिन तक समुद्र में रह सकता है। इस पर लगभग 165 लोग तैनात रहते हैं। इनमें नौसेना के अधिकारी, तकनीकी स्टाफ और वैज्ञानिक शामिल होते हैं।

आईएनएस अन्वेष की सबसे बड़ी तकनीकी खासियत इसका इंटीग्रेटेड फुल इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन सिस्टम है। यह भारतीय नौसेना का पहला जहाज है जिसमें इस तरह की तकनीक लगी है। (IFR-Milan 2026)

इस सिस्टम से जहाज कम शोर करता है, ज्यादा स्थिर रहता है और लंबे समय तक लगातार काम कर सकता है। मिसाइल टेस्टिंग के दौरान स्थिरता बहुत जरूरी होती है, क्योंकि हल्की सी कंपन भी डेटा को प्रभावित कर सकती है।

आईएनएस अन्वेष पर लंबी दूरी का मल्टी-फंक्शन रडार लगाया गया है। यह रडार बैलिस्टिक मिसाइल को ट्रैक करने में सक्षम है। इसके अलावा इसमें इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल ट्रैकिंग सिस्टम, टेलीमेट्री उपकरण और डेटा प्रोसेसिंग सेंटर भी हैं। जब कोई मिसाइल छोड़ी जाती है, तो यह जहाज उसकी उड़ान का पूरा डेटा रिकॉर्ड करता है।

इस पर मिसाइल लॉन्च सिस्टम भी मौजूद हैं। यानी जरूरत पड़ने पर यह जहाज खुद भी इंटरसेप्टर मिसाइल टेस्टिंग में हिस्सा ले सकता है। आईएनएस अन्वेष भारत के बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस कार्यक्रम के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। भारत दो चरणों में अपनी मिसाइल डिफेंस सिस्टम डेवलप कर रहा है। इस जहाज की मदद से समुद्र में गहराई तक जाकर मिसाइल इंटरसेप्टर का परीक्षण किया जा सकता है। (IFR-Milan 2026)

21 अप्रैल 2023 को इस जहाज से एक महत्वपूर्ण इंटरसेप्टर मिसाइल टेस्ट किया गया था। यह भारत के लिए बड़ी उपलब्धि थी, क्योंकि इससे साबित हुआ कि देश समुद्र आधारित मिसाइल रक्षा क्षमता विकसित कर रहा है। आईएनएस अन्वेष हिंद महासागर में काफी दूर तक जाकर परीक्षण कर सकता है। इससे 1500 किलोमीटर तक की रेंज वाली मिसाइलों की टेस्टिंग संभव हो जाती है। (IFR-Milan 2026)

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आसमान में भी दिखा शक्ति प्रदर्शन

समुद्र के साथ-साथ आसमान में भी शक्ति प्रदर्शन हुआ। मिग-29के फाइटर जेट, पी-8आई मैरीटाइम पेट्रोल एयरक्राफ्ट, डोर्नियर और भारतीय नौसेना की रीढ़ कहे जाने वाले चीता, एएलएच, सी किंग, कोमोव और एमएच 60 आर रोमियो हेलीकॉप्टरों ने फ्लाईपास्ट किया। हॉक जेट्स ने एरियल मैन्यूवर दिखाए। (IFR-Milan 2026)

“बिल्डर नेवी” की पहचान

आईएफआर 2026 ने एक और महत्वपूर्ण संदेश दिया कि भारत अब “बायर नेवी” नहीं, बल्कि “बिल्डर नेवी” बन चुका है। पहले भारत बड़े युद्धपोत विदेशों से खरीदता था। आज एयरक्राफ्ट कैरियर से लेकर डिस्ट्रॉयर, फ्रिगेट और सबमरीन तक देश में डिजाइन और निर्माण हो रहे हैं। मझगांव डॉक, गार्डन रीच शिपबिल्डर्स, कोचीन शिपयार्ड और हिंदुस्तान शिपयार्ड जैसे संस्थान अब विश्वस्तरीय युद्धपोत बना रहे हैं। (IFR-Milan 2026)

IFR-Milan 2026 Indian Navy Strategic Warships

मैरीटाइम डिप्लोमेसी की दिखी पावर

आईएफआर-मिलन एक्सरसाइज में ईरान, अमेरिका, रूस, बांग्लादेश जापान, ऑस्ट्रेलिया और अन्य देशों की भागीदारी ने यह भी दिखाया कि भारत रणनीतिक संतुलन बनाए रखते हुए सबके साथ संबंध मजबूत कर रहा है। यह कार्यक्रम ऐसे समय में हुआ जब दुनिया कई खेमों में बंटी हुई है। इसके बावजूद विभिन्न देशों की नौसेनाएं एक ही मंच पर दिखीं।

नौसेना के प्रवक्ता कैप्टन विवेक मधवाल ने बताया कि इन आयोजनों में लगभग 72 देशों के प्रतिनिधिमंडल हिस्सा ले रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह भागीदारी दिखाती है कि अलग-अलग देशों के बीच सहयोग कितना मजबूत हो रहा है। समुद्री सुरक्षा अब सिर्फ एक देश का मुद्दा नहीं है, बल्कि सबकी साझा जिम्मेदारी है, क्योंकि समुद्र पूरी दुनिया की साझा संपत्ति हैं। (IFR-Milan 2026)

उन्होंने यह भी कहा कि विदेशी युद्धपोतों की मौजूदगी भारत की समुद्री पहुंच और सहयोग की नीति को दर्शाती है। वहीं भारतीय नौसेना के जहाजों की संख्या और संरचना इस बात का संकेत है कि अब बेड़े में स्वदेशी जहाजों की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है।

कैप्टन मधवाल के अनुसार, पहली बार स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत की भागीदारी, भारत में बनी कलवरी श्रेणी की पनडुब्बी की मौजूदगी और बड़ी संख्या में देश में डिजाइन और निर्मित प्लेटफॉर्म्स यह साबित करते हैं कि भारतीय नौसेना अब स्वदेशी क्षमता के मामले में काफी मजबूत हो चुकी है। (IFR-Milan 2026)

वहीं इन तीनों बड़े आयोजनों में क्वाड समूह के चारों देश भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया विशाखापत्तनम में मौजूद थे। हालांकि अमेरिका इस कार्यक्रम के लिए अपना एक डेस्ट्रॉयर वॉरशिप भेजने वाला था, लेकिन ऑपरेशनल जरूरतों के कारण वह जहाज शामिल नहीं हो सका। हालांकि, अमेरिका की बाकी भागीदारी में कोई बदलाव नहीं हुआ। अमेरिकी पी-8 मैरीटाइम पेट्रोलिंग एय़रक्राफ्ट ने आईएफआर के फ्लाईपास्ट में हिस्सा लिया और वह एक्सरसाइज मिलन में भी शामिल होने वाला है। वहीं, भारत में अमेरिकी दूतावास के प्रवक्ता ने कहा कि आपात जरूरतों के कारण यूएसएस पिनकनी इस साल इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू में शामिल नहीं हो पाया। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका भारत के साथ अपनी मजबूत साझेदारी को महत्व देता है और इस आयोजन की सफलता की कामना करता है। (IFR-Milan 2026)

ब्लू वॉटर में भारत का आत्मविश्वास

ब्लू वॉटर नेवी का मतलब है ऐसी नौसेना जो अपने तट से दूर, खुले महासागरों में भी लंबे समय तक अभियान चला सके। आईएफआर 2026 में दिखी जहाजों की विविधता और ताकत ने साफ किया कि भारत अब इस श्रेणी में मजबूती से खड़ा है। (IFR-Milan 2026)

एवरेस्ट तक उड़ने वाला H-125 अब बनेगा भारत में, मोदी-मैक्रों ने किया पहली प्राइवेट हेलीकॉप्टर असेंबली लाइन का उद्घाटन

Tata-Airbus H-125 Helicopter
Tata-Airbus H-125 Helicopter

Tata-Airbus H-125 Helicopter: कर्नाटक के वेमगल में मंगलवार को एयरबस एच-125 हेलीकॉप्टर की फाइनल असेंबली लाइन का उद्घाटन किया गया। यह भारत के निजी क्षेत्र में स्थापित होने वाली पहली हेलीकॉप्टर फाइनल असेंबली लाइन है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने मुंबई से वर्चुअली इसका उद्घाटन किया।

यह फैसिलिटी यूरोपीय एयरोस्पेस की दिग्गज एयरबस हेलीकॉप्टर्स और भारत की टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड के जॉइंट वेंचर के तहत बनाई गई है। वहीं इस फैसिलिटी के उद्घाटन के बाद वेमगल अब भारत के उभरते एयरोस्पेस सेंटर में शामिल हो गया है। (Tata-Airbus H-125 Helicopter)

Tata-Airbus H-125 Helicopter: क्यों खास है यह फाइनल असेंबली लाइन

अब तक भारत में हेलीकॉप्टरों का निर्माण मुख्य रूप से सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों तक ही सीमित था। यह पहली बार है जब निजी क्षेत्र में किसी हेलीकॉप्टर की पूरी फाइनल असेंबली, सिस्टम इंटीग्रेशन और फ्लाइट टेस्टिंग की व्यवस्था की गई है। इसका मतलब है कि यहां हेलीकॉप्टर के स्ट्रक्चर को जोड़ने से लेकर उसके इंजन, इलेक्ट्रिकल सिस्टम, एवियोनिक्स और अन्य उपकरणों को फिट करने और अंतिम परीक्षण तक का काम भारत में ही होगा। (Tata-Airbus H-125 Helicopter)

पीएम मोदी ने कहा- मजबूत हो रही साझेदारी

उद्घाटन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत में हेलीकॉप्टर असेंबली लाइन की शुरुआत दोनों देशों के बीच गहरे भरोसे का प्रतीक है। उनका कहना था कि भारत और फ्रांस के रिश्ते सिर्फ औपचारिक नहीं हैं, बल्कि आपसी भरोसे पर टिके हुए हैं। राफेल विमान से लेकर पनडुब्बियों और अब हेलीकॉप्टर निर्माण तक, यह साझेदारी लगातार मजबूत होती जा रही है।

उन्होंने यह भी कहा कि भारत और फ्रांस मिलकर ऐसा हेलीकॉप्टर बनाएंगे जो दुनिया में अपनी तरह का खास है। यह वही हेलीकॉप्टर है जो माउंट एवरेस्ट जैसी ऊंचाई तक उड़ान भर सकता है। प्रधानमंत्री ने गर्व के साथ कहा कि अब यह हेलीकॉप्टर भारत में बनेगा और दुनिया के दूसरे देशों को भी निर्यात किया जाएगा। इसका मतलब है कि भारत अब सिर्फ खरीदने वाला देश नहीं, बल्कि बनाने और बेचने वाला देश बन रहा है। (Tata-Airbus H-125 Helicopter)

प्रधानमंत्री ने भारत-फ्रांस साझेदारी को गहराई और ऊंचाई दोनों से जोड़ा। उन्होंने कहा कि यह रिश्ता समुद्र की गहराइयों से लेकर पहाड़ों की ऊंचाइयों तक फैला है। उनका इशारा रक्षा, तकनीक, इनोवेशन और रणनीतिक सहयोग की ओर था। उन्होंने इस परियोजना को आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक मजबूत कदम बताया। (Tata-Airbus H-125 Helicopter)

मैक्रों बोले- रक्षा क्षेत्र में फ्रांस, “मेक इन इंडिया” का एक भरोसेमंद साझेदार

वहीं, इंडिया-फ्रांस इनोवेशन फोरम में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि रक्षा क्षेत्र में फ्रांस, “मेक इन इंडिया” का एक मजबूत और भरोसेमंद साझेदार है। उन्होंने बताया कि भारत और फ्रांस के बीच उच्च स्तर का सहयोग है, जिसकी वजह से दोनों देश मिलकर अगली पीढ़ी के इंजन, मल्टी-रोल हेलीकॉप्टर, एडवांस कॉम्बैट एयरक्राफ्ट और सबमरीन जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम कर पा रहे हैं।

मैक्रों ने कहा कि वह भारत की ओर से इस साझेदारी पर जताए गए भरोसे के लिए दिल से आभार व्यक्त करते हैं। उनके मुताबिक यह सिर्फ रक्षा सौदों की एक श्रृंखला नहीं है, बल्कि दो संप्रभु देशों के बीच एक मजबूत गठबंधन है। उन्होंने कहा कि भारत और फ्रांस जमीन, समुद्र और आसमान तीनों क्षेत्रों में एक-दूसरे को मजबूती से चुन रहे हैं, और यह चुनाव मजबूरी में नहीं, बल्कि भरोसे के साथ किया गया है। (Tata-Airbus H-125 Helicopter)

उन्होंने यह भी कहा कि दोनों देशों का सहयोग सिर्फ रक्षा तक सीमित नहीं है। अंतरिक्ष क्षेत्र में भी यह साझेदारी बेहद अहम है। उन्होंने ‘त्रिश्ना’ सैटेलाइट के विकास का उदाहरण देते हुए कहा कि जब वैज्ञानिक उत्कृष्टता और औद्योगिक विशेषज्ञता साथ आती हैं, तो बड़े परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।

मैक्रों ने आगे कहा कि भारत में कई सिविल और न्यूक्लियर पहलें भी चल रही हैं, जिनमें दोनों देश साथ काम कर रहे हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि इनोवेशन का मतलब सिर्फ बड़ी तकनीकी उपलब्धियां हासिल करना नहीं होता, बल्कि इसका मकसद आम लोगों की जिंदगी बेहतर बनाना भी है। उनके अनुसार, तकनीक ऐसी होनी चाहिए जो लोगों के रोजमर्रा के जीवन को ज्यादा सुरक्षित, स्वस्थ और आसान बनाए।

उन्होंने इस परियोजना को दोनों देशों के बीच इनोवेशन और तकनीकी सहयोग का उदाहरण बताया। मैक्रों ने यह भी कहा कि आने वाले समय में भारत और फ्रांस रक्षा, तकनीक और इनोवेशन के क्षेत्र में मिलकर और आगे बढ़ेंगे। (Tata-Airbus H-125 Helicopter)

रक्षा मंत्री ने रक्षा निर्यात में हुई बढ़ोतरी पर दिया जोर

वेमगल में आयोजित कार्यक्रम में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत और फ्रांस के बीच सहयोग की कोई सीमा नहीं है। उन्होंने बताया कि दोनों देश रक्षा क्षेत्र में लंबे समय से साथ काम कर रहे हैं और अब हेलीकॉप्टर निर्माण के जरिए यह संबंध और मजबूत होगा।

रक्षा मंत्री ने भारत के रक्षा निर्यात में हुई बढ़ोतरी पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में रक्षा निर्यात कई गुना बढ़ा है और भारत अब दुनिया के प्रमुख रक्षा निर्यातकों में शामिल हो रहा है। पहले रक्षा उत्पादन में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की ज्यादा भूमिका थी, लेकिन अब निजी क्षेत्र भी तेजी से आगे आ रहा है। टाटा जैसी कंपनियां अब बड़े रक्षा प्रोजेक्ट्स में अहम भूमिका निभा रही हैं।

उन्होंने यह भी बताया कि एच-125 कार्यक्रम में एक हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश होने की उम्मीद है। इससे देश के युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। सीधे तौर पर फैक्ट्री में काम मिलेगा और अप्रत्यक्ष रूप से सप्लाई चेन, छोटे उद्योग और सेवा क्षेत्र को भी फायदा होगा। रक्षा मंत्री ने कहा कि यह परियोजना सिर्फ एक फैक्ट्री नहीं है, बल्कि भारत के औद्योगिक आत्मविश्वास का प्रतीक है। (Tata-Airbus H-125 Helicopter)

क्या है एयरबस एच-125?

एच-125 दुनिया का सबसे ज्यादा बिकने वाला सिंगल इंजन लाइट हेलीकॉप्टर माना जाता है। यह एक हल्का लेकिन बेहद ताकतवर हेलीकॉप्टर है। सिविल क्षेत्र में इसका इस्तेमाल पर्यटन, वीआईपी यात्रा, आपातकालीन चिकित्सा सेवा, पुलिस ऑपरेशन, जंगल में आग बुझाने और आपदा राहत जैसे कामों में किया जाता है।

इस हेलीकॉप्टर की सबसे बड़ी खासियत इसकी हाई-एल्टीट्यूड क्षमता है। यह दुनिया का एकमात्र ऐसा हेलीकॉप्टर है जिसने माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई तक उड़ान भरी है। इसलिए बर्फीले और ऊंचे इलाकों में यह बेहद उपयोगी साबित होता है। भारत के हिमालयी सीमावर्ती क्षेत्रों में, जहां मौसम कठिन और ऊंचाई अधिक होती है, ऐसे हेलीकॉप्टर की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी। (Tata-Airbus H-125 Helicopter)

मिलिटरी वर्जन भी होगा तैयार

इस प्लांट में भविष्य में एच-125 का मिलिटरी वर्जन, जिसे एच-125एम कहा जाता है, बनाने की भी योजना है। यह लाइट मल्टी-रोल हेलीकॉप्टर के रूप में भारतीय सेनाओं बलों की जरूरतों को पूरा कर सकता है।

मिलिटरी वर्जन में निगरानी, टोही, हल्के हथियारों के साथ सीमित हमला क्षमता और ट्रेनिंग जैसी सुविधाएं हो सकती हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें अधिक से अधिक स्वदेशी कंपोनेंट्स और तकनीक शामिल करने की योजना है। इससे भारत में रक्षा हेलीकॉप्टर निर्माण का मजबूत इकोसिस्टम तैयार होगा। (Tata-Airbus H-125 Helicopter)

2027 की शुरुआत में डिलीवरी

पहला ‘मेड इन इंडिया’ सिविल एच-125 हेलीकॉप्टर वर्ष 2027 की शुरुआत में डिलीवर किए जाने की उम्मीद है। यह हेलीकॉप्टर सिर्फ घरेलू बाजार के लिए ही नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया के अन्य देशों को भी निर्यात किया जाएगा।

इससे भारत एक एयरोस्पेस मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में उभरेगा। हेलीकॉप्टर के निर्यात से विदेशी कमाई भी बढ़ेगी और भारत की छवि एक भरोसेमंद रक्षा उत्पादन केंद्र के रूप में मजबूत होगी। (Tata-Airbus H-125 Helicopter)

मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत को बढ़ावा

यह परियोजना ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सरकार का लक्ष्य है कि भारत रक्षा उपकरणों का आयातक देश बने रहने के बजाय निर्माता और निर्यातक देश बने।

टाटा और एयरबस की यह साझेदारी दो साल पहले शुरू हुए सी-295 सैन्य ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट प्रोजेक्ट के बाद दूसरा बड़ा कदम है। गुजरात के वडोदरा में सी-295 विमान की असेंबली लाइन स्थापित की गई थी। अब हेलीकॉप्टर निर्माण के साथ यह सहयोग और मजबूत हो गया है। (Tata-Airbus H-125 Helicopter)

रोजगार और उद्योग को फायदा

इस संयंत्र के जरिए बड़ी संख्या में सीधे और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होंगे। हेलीकॉप्टर निर्माण में सैकड़ों छोटे और मध्यम उद्योगों की भागीदारी होती है, जो पार्ट्स, वायरिंग, कंपोनेंट्स और अन्य उपकरण बनाते हैं।

इससे स्थानीय सप्लाई चेन मजबूत होगी और भारत का एयरोस्पेस इकोसिस्टम बढ़ेगा। डिजाइन, इंजीनियरिंग, मेंटेनेंस और रिपेयर जैसी सेवाओं में भी नई संभावनाएं खुलेंगी।

वहीं, भारत और फ्रांस के बीच रक्षा सहयोग पहले से ही मजबूत रहा है। राफेल लड़ाकू विमान, स्कॉर्पीन पनडुब्बियां और अब हेलीकॉप्टर निर्माण, ये सभी इस भरोसे को दर्शाते हैं। (Tata-Airbus H-125 Helicopter)

क्यों कहा जाता है विशाखापत्तनम को ‘सबमरींस की कब्रगाह’? IFR-Milan 2026 के बीच गूंजेगी 1971 की जंग की कहानी

Visakhapatnam Submarine Graveyard
Representative Photo

Visakhapatnam Submarine Graveyard: विशाखापत्तनम इन दिनों भारतीय नौसेना के तीन बड़े आयोजनों का गवाह बनने जा रहा है। विशाखापत्तनम में इन दिनों इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू (आईएफआर) 2026 और मिलन एक्सरसाइज जैसे बड़े कार्यक्रम हो रहे हैं। लेकिन यह शहर सिर्फ आधुनिक नौसैनिक ताकत का प्रतीक नहीं है, बल्कि इतिहास का भी गवाह है। यही वजह है कि विशाखापत्तनम को अक्सर “सबमरींस की कब्रगाह” कहा जाता है।

इस नाम के पीछे दो बड़ी घटनाएं जुड़ी हैं, द्वितीय विश्व युद्ध के समय जापानी सबमरीन आरओ-110 का डूबना और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में पाकिस्तानी पनडुब्बी पीएनएस गाजी का समंदर में समा जाना। (Visakhapatnam Submarine Graveyard)

Visakhapatnam Submarine Graveyard: 1971 की जंग में पीएनएस गाजी को डुबोया था

दिसंबर 1971 का समय था। भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध शुरू हो चुका था। पाकिस्तान की नौसेना की सबसे बड़ी ताकत मानी जाने वाली सबमरीन पीएनएस गाजी को एक खास मिशन पर भेजा गया था। उसका मकसद उस समय के भारतीय एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत को निशाना बनाना था।

उस समय आईएनएस विक्रांत पूर्वी समुद्र में सक्रिय था और पाकिस्तान के लिए बड़ा खतरा बन चुका था। गाजी को विशाखापत्तनम के आसपास माइंस (समुद्री बारूदी सुरंगें) बिछाने और विक्रांत को ढूंढकर डुबाने का काम सौंपा गया था।

लेकिन 3 और 4 दिसंबर 1971 की रात को हालात बदल गए। भारतीय नौसेना के युद्धपोत आईएनएस राजपूत ने समुद्र में संदिग्ध हलचल महसूस की और डेप्थ चार्ज गिराए। कुछ देर बाद जोरदार धमाका हुआ। अगले दिन समुद्र की सतह पर तेल के धब्बे और मलबा तैरता मिला। जांच में साफ हुआ कि पीएनएस गाजी डूब चुकी है। दरअसल भारतीय नौसेना ने आईएनएस राजपूत को आईएनएस विक्रांत का डेकोय (झांसा) बनाकर इस्तेमाल किया था, ताकि गाजी को फंसाया जा सके। जिसके बाद आईएनएस विक्रांत ने पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) पर नौसैनिक नाकाबंदी कर ली थी, जो युद्ध में निर्णायक साबित हुई थी। (Visakhapatnam Submarine Graveyard)

इस हादसे में सबमरीन पर सवार 93 पाकिस्तानी (11 अधिकारी और 82 नाविक) मारे गए। गाजी का मलबा विशाखापत्तनम तट से लगभग दो-ढाई किलोमीटर दूर फेयरवे ब्वॉय में करीब 100 मीटर गहराई में मिला। यह मलबा अब भी वहीं बरकरार है, और भारतीय नौसेना ने सम्मान के तौर पर इसे छेड़ा नहीं है।

भारतीय नौसेना के तत्कालीन डाइविंग सपोर्ट शिप आईएनएस निस्तार ने उस समय गाजी के मलबे की खोज और जांच में अहम भूमिका निभाई थी। (Visakhapatnam Submarine Graveyard)

55 साल बाद फिर उसी जगह ‘निस्तार’

इतिहास की सबसे दिलचस्प बात यह है कि 1971 में जिस आईएनएस निस्तार ने गाजी के मलबे को खोजा था, उसी नाम का नया पूरी तरह स्वदेशी डाइविंग सपोर्ट वेसल अब भारतीय नौसेना में शामिल हो चुका है।

यह नया आईएनएस निस्तार 18 जुलाई 2025 को नौसेना को सौंपा गया। यह देश का पहला स्वदेशी डाइविंग सपोर्ट वेसल है। इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू 2026 में यही निस्तार उसी समुद्र के पास मौजूद है, जहां गाजी की “कब्र” मानी जाती है।

पीएनएस गाजी पाकिस्तान की सबसे पुरानी और लंबी दूरी की सबमरीन थी। उसका डूबना पाकिस्तान के लिए बड़ा झटका था। इसलिए हर बार जब विशाखापत्तनम में बड़ा नौसैनिक आयोजन होता है, तो 1971 की यादें फिर ताजा हो जाती हैं। (Visakhapatnam Submarine Graveyard)

आईएनएस निस्तार की खासियत

आईएनएस निस्तार लगभग 120 मीटर लंबा और करीब 10,000 टन वजनी जहाज है। यह करीब 18 नॉट की रफ्तार से चल सकता है। इसमें आधुनिक डाइविंग सिस्टम लगे हैं।

सबसे अहम बात यह है कि यह डीप सबमर्जेंस रेस्क्यू व्हीकल (डीएसआरवी) को समुद्र में उतार सकता है। डीएसआरवी एक छोटा लेकिन बेहद एडवांस रेस्क्यू व्हीकल होता है, जो गहरे समुद्र में जाकर किसी फंसी हुई सबमरीन से 15-16 नाविकों को एक बार में निकाल सकता है।

अगर भविष्य में किसी भारतीय या दोस्त देश की पनडुब्बी को समुद्र में दुर्घटना हो जाए, तो निस्तार जैसे जहाज जीवनरक्षक साबित होंगे। (Visakhapatnam Submarine Graveyard)

2024 में फिर सामने आया था गाजी का मलबा

फरवरी 2024 में मिलन एक्सरसाइज के दौरान भारतीय नौसेना के डीएसआरवी ने पीएनएस गाजी के मलबे को फिर से लोकेट किया। साइड स्कैन सोनार और रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल की मदद से मलबे की तस्वीरें ली गईं। दरअसल भारतीय नौसेना ने मिलन 2024 में डीएसआरवी को डेमोंस्ट्रेट करने के लिए इस्तेमाल किया था। भारतीय नौसेना ने इसे “सबमरीन ग्रेवयार्ड” में ट्रेनिंग/टेस्टिंग के तौर पर इस्तेमाल किया था। हालांकि भारतीय नौसेना ने उसे छेड़ा नहीं। उसे युद्ध समाधि (वार ग्रेव) के रूप में सम्मान दिया गया। (Visakhapatnam Submarine Graveyard)

द्वितीय विश्व युद्ध में डूबी थी आरओ-110

विशाखापत्तनम के पास सिर्फ गाजी ही नहीं डूबी थी। 1944 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानी सबमरीन आरओ-110 भी यहीं डूबी थी। आरओ-110 द्वितीय विश्व युद्ध के समय की एक जापानी पनडुब्बी थी। यह इंपीरियल जापानी नेवी की आरओ-100 क्लास की मध्यम आकार की तटीय अटैक सबमरीन थी। आज यह बंगाल की खाड़ी में विशाखापत्तनम के पास समुद्र की गहराई में पड़ी है।

आरओ-110 को 26 जनवरी 1943 को जापान के कोबे शिपयार्ड में लॉन्च किया गया था और 6 जुलाई 1943 को इसे आधिकारिक तौर पर सेवा में शामिल किया गया। इस पनडुब्बी पर 47 अधिकारी और नाविक तैनात थे। इसका वजन पानी की सतह पर करीब 600 टन और पानी के अंदर 800 टन से ज्यादा था। इसमें चार टॉरपीडो ट्यूब लगे थे और यह आठ टॉरपीडो ले जा सकती थी। (Visakhapatnam Submarine Graveyard)

फरवरी 1944 में इसकी आखिरी समुद्री कार्रवाई हुई। 11 या 12 फरवरी 1944 को यह सबमरीन कोलंबो से कोलकाता जा रहे मित्र राष्ट्रों के जहाजों के एक काफिले पर हमला कर रही थी। इसी दौरान इसने ब्रिटिश व्यापारी जहाज एसएस एस्फालियन पर दो टॉरपीडो दागे। हमले में छह लोगों की मौत हुई और जहाज को भारी नुकसान पहुंचा।

हमले के बाद काफिले की सुरक्षा कर रहे जहाजों ने तुरंत जवाबी कार्रवाई की। रॉयल इंडियन नेवी के एचएमआईएस जमुना और रॉयल ऑस्ट्रेलियन नेवी के एचएमएएस लॉन्सेस्टन तथा एचएमएएस इप्सविच ने सोनार की मदद से पनडुब्बी का पता लगाया और उस पर डेप्थ चार्ज गिराए। कुछ देर बाद समुद्र की सतह पर तेल का बड़ा धब्बा और बुलबुले दिखाई दिए। इससे साफ हो गया कि आरओ-110 डूब चुकी है। पनडुब्बी पर सवार सभी 47 नाविक मारे गए। (Visakhapatnam Submarine Graveyard)

यह भी उल्लेखनीय है कि इससे पहले दिसंबर 1943 में आरओ-110 ने ब्रिटिश जहाज डेजी मोलर पर भी टॉरपीडो हमला किया था।

आज आरओ-110 का मलबा गाजी के आसपास ही विशाखापत्तनम तट के पास करीब 90 से 110 मीटर की गहराई में मौजूद है। 2024 में भारतीय नौसेना के डीप सबमर्जेंस रेस्क्यू व्हीकल ने इसे फिर से स्कैन किया, लेकिन सम्मान के कारण इसे वहीं छोड़ दिया गया। नौसेना इसे एक युद्ध समाधि मानती है और इसे उन सैनिकों का अंतिम विश्राम स्थल समझती है, जिन्होंने समुद्र में अपनी जान गंवाई। (Visakhapatnam Submarine Graveyard)

अरब सागर में बड़ा ड्रग्स नेटवर्क फेल! 203 किलो क्रिस्टलाइन नशा पकड़ा, कोस्ट गार्ड-ATS की संयुक्त कार्रवाई

Indian Coast Guard Drug Seizure

Indian Coast Guard Drug Seizure: अरब सागर में एक बार फिर बड़ी कार्रवाई करते हुए भारतीय कोस्ट गार्ड और गुजरात एंटी टेररिज्म स्क्वॉड (एटीएस) ने मिलकर एक स्पीड बोट से करीब 203 किलोग्राम संदिग्ध क्रिस्टलाइन नशीला पदार्थ बरामद किया है। यह कार्रवाई 16 फरवरी की रात को की गई और इसे हाल के समय की बड़ी समुद्री ड्रग्स विरोधी कार्रवाई माना जा रहा है। बरामद ड्रग की अनुमानित कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगभग 2000 करोड़ रुपये आंकी जा रही है।

भारतीय कोस्ट गार्ड से मिली जानकारी के मुताबिक, गुजरात एटीएस को पहले से इनपुट मिला था कि समुद्र के रास्ते नशीले पदार्थ की तस्करी की कोशिश हो सकती है। यह इनपुट पुख्ता होने के बाद तुरंत भारतीय कोस्ट गार्ड को साझा किया गया। इसके बाद कोस्ट गार्ड के नॉर्थ वेस्ट रीजन में तैनात एक जहाज, जो पहले से मल्टी-मिशन डिप्लॉयमेंट पर था, उसे तुरंत संदिग्ध नाव की ओर मोड़ दिया गया। (Indian Coast Guard Drug Seizure)

यह पूरी कार्रवाई अरब सागर में तथाकथित इंटरनेशनल मैरीटाइम बाउंड्री लाइन यानी आईएमबीएल के पास की गई। यह वह समुद्री इलाका है जहां भारत और पाकिस्तान की समुद्री सीमा पास-पास आती है। ऐसे संवेदनशील क्षेत्र में तस्करी की कोशिश सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती होती है।

रात के अंधेरे में कोस्ट गार्ड ने ह्यूमन इंटेलिजेंस और टेक्निकल सर्विलांस सिस्टम की मदद से संदिग्ध स्पीड बोट की पहचान कर ली। जैसे ही तस्करों को कोस्ट गार्ड जहाज के पास आने का अंदेशा हुआ, उन्होंने अपनी स्पीड बोट को आईएमबीएल की दिशा में तेज रफ्तार से भगाने की कोशिश की। (Indian Coast Guard Drug Seizure)

शुरुआत में दोनों जहाजों के बीच कुछ दूरी थी, लेकिन कोस्ट गार्ड ने पीछा जारी रखा। समुद्र में तेज रफ्तार पीछा करने के बाद स्पीड बोट को घेरकर रोक लिया गया। इसके बाद कोस्ट गार्ड की टीम ने बोट पर चढ़कर तलाशी ली। (Indian Coast Guard Drug Seizure)

तलाशी के दौरान पता चला कि बोट पर दो लोग सवार थे और दोनों विदेशी नागरिक थे। पूरी नाव की बारीकी से जांच की गई। जांच में नाव के भीतर छिपाकर रखे गए 203 पैकेट बरामद हुए। हर पैकेट का वजन लगभग एक किलोग्राम था। इन पैकेटों में क्रिस्टलाइन जैसा पदार्थ भरा हुआ था, जिसे प्राथमिक तौर पर नशीला पदार्थ माना जा रहा है। हालांकि अंतिम पुष्टि के लिए केमिकल एनालिसिस किया जाएगा।

कार्रवाई के बाद पकड़ी गई स्पीड बोट, बरामद नशीला पदार्थ और दोनों विदेशी क्रू मेंबर्स को कोस्ट गार्ड जहाज से पोरबंदर लाया गया। यहां आगे की जांच और कानूनी प्रक्रिया शुरू की जाएगी। जब्त किए गए पदार्थ को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा जाएगा, ताकि यह साफ हो सके कि यह किस प्रकार का नारकोटिक ड्रग है।

अधिकारियों का कहना है कि भारतीय कोस्ट गार्ड और गुजरात एटीएस के बीच समन्वय की वजह से यह कार्रवाई संभव हो पाई। पिछले कुछ वर्षों में दोनों एजेंसियों ने मिलकर कई सफल लॉ एन्फोर्समेंट ऑपरेशन किए हैं। समुद्री रास्ते से होने वाली तस्करी को रोकना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से बेहद अहम है, क्योंकि ड्रग्स तस्करी का सीधा संबंध आतंक फंडिंग और संगठित अपराध से भी हो सकता है। (Indian Coast Guard Drug Seizure)

कोचीन शिपयार्ड बनाएगा नौसेना के लिए 5 नेक्स्ट जेनरेशन सर्वे वेसल! 5,000 करोड़ रुपये का है NGSV प्रोजेक्ट

Next Generation Survey Vessels

Next Generation Survey Vessels: कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड यानी सीएसएल भारतीय नौसेना के लिए पांच नेक्स्ट जेनरेशन सर्वे वेसल्स बनाने की तैयारी कर रही है। देश की सरकारी शिपयार्ड कंपनी कोचीन शिपयार्ड को रक्षा मंत्रालय ने भारतीय नौसेना के लिए बनने वाले पांच नेक्स्ट जेनरेशन सर्वे वेसल्स (एनजीएसवी) प्रोजेक्ट में एल-वन बोलीदाता घोषित किया है। हालांकि अभी तक कंपनी को आधिकारिक तौर पर कॉन्ट्रैक्ट नहीं दिया गया है, लेकिन माना जा रहा है कि कॉन्ट्रैक्ट उसे ही मिल सकता है। इस प्रोजेक्ट की अनुमानित कुल कीमत करीब 5,000 करोड़ रुपये बताई जा रही है।

16 फरवरी रक्षा मंत्रालय में हुई बैठक में कंपनी को एल-वन बिडर घोषित किया गया। बाद में सीएसएल ने स्टॉक एक्सचेंज को इसकी आधिकारिक जानकारी दी। हालांकि अभी अंतिम अनुबंध पर दस्तखत होना बाकी है। जरूरी प्रक्रियाएं और औपचारिकताएं पूरी होने के बाद ही कॉन्ट्रैक्ट अवार्ड किया जाएगा, लेकिन आम तौर पर एल–वन घोषित कंपनी को ही काम सौंपा जाता है। बता दें कि एल–वन यानी वह कंपनी जिसने सबसे कम बोली लगाई और कॉन्ट्रैक्ट पाने की दौड़ में सबसे आगे होती है। (Next Generation Survey Vessels)

क्या हैं Next Generation Survey Vessels?

नेक्स्ट जेनरेशन सर्वे वेसल्स यानी एनजीएसवी ऐसे विशेष जहाज होंगे जिनका मुख्य काम समुद्र की गहराई, समुद्र तल की बनावट और समुद्री मार्गों का सटीक सर्वे करना होगा। इसे हाइड्रोग्राफिक सर्वे कहा जाता है। आसान शब्दों में कहें तो ये जहाज समुद्र की गहराई, तल की बनावट और वहां मौजूद चट्टानों, ढलानों या बाधाओं का नक्शा तैयार करेंगे। (Next Generation Survey Vessels)

समुद्र के नीचे क्या है, यह जानना बहुत जरूरी होता है। अगर सही जानकारी न हो तो जहाज दुर्घटनाग्रस्त हो सकते हैं या समुद्री रास्ते असुरक्षित हो सकते हैं। इसलिए एनजीएसवी सबसे पहले सुरक्षित नेविगेशन चार्ट तैयार करने में मदद करेंगे। इन चार्ट्स का इस्तेमाल सिर्फ भारतीय नौसेना ही नहीं, बल्कि व्यापारी जहाज भी करते हैं।

दूसरा बड़ा काम होगा समुद्र के नीचे बिछाई जाने वाली केबल और पाइपलाइन की योजना बनाना। आज इंटरनेट के लिए समुद्र के नीचे केबल बिछाई जाती हैं। तेल और गैस की पाइपलाइन भी समुद्र के रास्ते गुजरती हैं। इन सबके लिए समुद्र तल की सटीक जानकारी जरूरी होती है। (Next Generation Survey Vessels)

एनजीएसवी भारत की मैरिटाइम डोमेन अवेयरनेस यानी समुद्री क्षेत्र की निगरानी क्षमता भी बढ़ाएंगे। इससे नौसेना को रणनीतिक ऑपरेशन की बेहतर तैयारी करने में मदद मिलेगी। ये जहाज पुराने सर्वे जहाजों, जैसे संध्यायक क्लास की जगह लेंगे या उन्हें आधुनिक तकनीक से अपग्रेड करने का काम करेंगे। खासकर हिंद महासागर क्षेत्र में जहां गतिविधियां बढ़ रही हैं, वहां ऐसी आधुनिक सर्वे क्षमता बेहद महत्वपूर्ण है। (Next Generation Survey Vessels)

इन खूबियों से होंगे लैस

हालांकि आधिकारिक जानकारी अभी सार्वजनिक नहीं हुई है, लेकिन अनुमान के मुताबिक एनजीएसवी बड़े और आधुनिक सर्वे जहाज होंगे। भारतीय नौसेना के पास पहले से ऐसे सर्वे जहाज मौजूद हैं, लेकिन एनजीएसवी अधिक आधुनिक और तकनीकी रूप से एडवांस होंगे। माना जा रहा है कि इनमें मल्टी–बीम इको साउंडर, एडवांस सोनार सिस्टम, आधुनिक डेटा प्रोसेसिंग लैब और हेलीकॉप्टर ऑपरेशन की सुविधा जैसी क्षमताएं हो सकती हैं।

इनका वजन यानी डिस्प्लेसमेंट लगभग 2,500 से 4,000 टन के बीच हो सकता है। लंबाई करीब 90 से 110 मीटर तक हो सकती है। ये जहाज लगभग 18 से 22 नॉट्स की रफ्तार से चल सकेंगे और एक बार में 4 से 6 सप्ताह तक समुद्र में लगातार काम कर सकेंगे। (Next Generation Survey Vessels)

इनमें मल्टी-बीम इको साउंडर जैसे आधुनिक उपकरण होंगे, जो समुद्र की गहराई को बहुत सटीक तरीके से मापते हैं। साइड स्कैन सोनार और सब-बॉटम प्रोफाइलर जैसे सिस्टम समुद्र तल की बनावट और नीचे की परतों की जानकारी देंगे।

इन जहाजों से ऑटोनॉमस अंडरवाटर व्हीकल और रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल भी छोड़े जा सकेंगे, जो समुद्र के नीचे जाकर डेटा इकट्ठा करेंगे। इसमें जीपीएस, आधुनिक नेविगेशन सिस्टम और डेटा प्रोसेसिंग लैब भी होंगी, जहां सर्वे की जानकारी तुरंत प्रोसेस की जा सकेगी। (Next Generation Survey Vessels)

संभव है कि इनमें हेलीकॉप्टर ऑपरेशंस के लिए हेली डेक भी हो। जहाज पर लगभग 80 से 120 लोग तैनात रह सकते हैं, जिनमें नौसेना के अधिकारी, वैज्ञानिक और तकनीकी स्टाफ शामिल होंगे।

इन जहाजों की खास बात होगी कम शोर और कम कंपन वाली डिजाइन, ताकि सर्वे के दौरान माप सटीक मिल सके। कोशिश होगी कि इनमें अधिक से अधिक स्वदेशी सिस्टम लगाए जाएं। (Next Generation Survey Vessels)

मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत को मजबूती

कंपनी अगर भारतीय नौसेना के लिए ये जहाज बनाती है, तो इससे ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान को भी बूस्ट मिलेगा। रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी निर्माण को बढ़ावा देने की दिशा में यह एक और बड़ा कदम माना जा रहा है।

सीएसएल पहले ही भारतीय नौसेना के लिए देश का पहला स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत बना चुका है। इसके अलावा कंपनी ने नेक्स्ट जेनरेशन मिसाइल वेसल्स और अन्य डिफेंस शिप्स पर भी काम किया है। हाल ही में कंपनी ने छह नेक्स्ट जेनरेशन मिसाइल वेसल्स (एनजीएमवी) बनाने का भी बड़ा कॉन्ट्रैक्ट हासिल किया था। ऐसे में एनजीएसवी प्रोजेक्ट मिलने से सीएसएल की डिफेंस ऑर्डर बुक और मजबूत होगी। (Next Generation Survey Vessels)

इस प्रोजेक्ट से न केवल हजारों लोगों को रोजगार मिलेगा, बल्कि एमएसएमई सेक्टर और सप्लाई चेन को भी बड़ा फायदा होगा, क्योंकि जहाज निर्माण में बड़ी संख्या में छोटे और मध्यम उद्योगों की भागीदारी होती है।

शेयर बाजार में सकारात्मक असर

एल–वन घोषित होने की खबर का असर कंपनी के शेयरों पर भी दिखा। 17 फरवरी को सीएसएल के शेयरों में 4 से 7 प्रतिशत तक की तेजी देखी गई। निवेशकों ने इसे कंपनी के लिए सकारात्मक संकेत माना।

समुद्री क्षेत्र में भारत की भूमिका लगातार बढ़ रही है। हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती गतिविधियों को देखते हुए सटीक सर्वे और मैरीन मैपिंग बेहद जरूरी है। ऐसे जहाज नौसेना को बेहतर रणनीतिक तैयारी और समुद्री सुरक्षा में मदद करेंगे।

एनजीएसवी प्रोजेक्ट भारतीय नौसेना के आधुनिकीकरण कार्यक्रम का हिस्सा है। सरकार घरेलू शिपयार्ड्स को बड़े प्रोजेक्ट देकर देश में रक्षा उत्पादन क्षमता को मजबूत करना चाहती है। (Next Generation Survey Vessels)