भारतीय नौसेना ने मंगलवार को अपने पहले स्वदेशी डाइविंग सपोर्ट क्राफ्ट DSC A20 को औपचारिक रूप से कमीशन कर लिया। यह समारोह केरल के नेवल बेस कोच्चि में आयोजित किया गया। DSC A20 उन पांच डाइविंग सपोर्ट क्राफ्ट में पहला है, जिन्हें देश में ही बनाया जा रहा है।
कमीशनिंग समारोह की अध्यक्षता वाइस एडमिरल समीर सक्सेना, फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ, साउथर्न नेवल कमांड ने की। कार्यक्रम की मेजबानी वाइस एडमिरल संजय साधु, कंट्रोलर ऑफ वॉरशिप प्रोडक्शन एंड एक्विजिशन ने की। समारोह के दौरान नौसेना परंपराओं के अनुसार जहाज को सेवा में शामिल किया गया।
DSC A20 को कोलकाता स्थित टिटागढ़ रेल सिस्टम्स लिमिटेड ने स्वदेशी रूप से डिजाइन और निर्मित किया है। इन पांच डाइविंग सपोर्ट क्राफ्ट के निर्माण का कॉन्ट्रैक्ट रक्षा मंत्रालय और कंपनी के बीच 12 फरवरी 2021 को हुआ था। जहाज के डिजाइन फेज में इसका हाइड्रोडायनामिक एनालिसिस और मॉडल टेस्टिंग विशाखापट्टनम स्थित नेवल साइंस एंड टेक्नोलॉजिकल लेबोरेटरी में की गई थी।
Diving Support Craft DSC A20
यह जहाज इंडियन रजिस्टर ऑफ शिपिंग के नियमों के अनुसार बनाया गया है। DSC A20 एक कैटामरन-हल डिजाइन वाला जहाज है, जिसका वजन लगभग 390 टन है। इसमें आधुनिक डाइविंग इक्विपमेंट लगाए गए हैं, जो अंडरवाटर ऑपरेशंस के लिए जरूरी होते हैं।
Diving Support Craft DSC A20
भारतीय नौसेना के मुताबिक DSC A20 का इस्तेमाल अंडरवाटर रिपेयर, इंस्पेक्शन, हार्बर क्लियरेंस और कोस्टल एरिया में अहम डाइविंग मिशनों के लिए किया जाएगा। यह जहाज तटीय जलक्षेत्र में नौसेना की तकनीकी और ऑपरेशनल क्षमता को मजबूत करेगा।
Rehabilitation Of Disabled Officer Cadets: सुप्रीम कोर्ट ने मिलिट्री ट्रेनिंग के दौरान दिव्यांग हुए ऑफिसर कैडेट्स के पुनर्वास (रिहैबिलिटेशन) से जुड़ी योजना को अंतिम रूप देने के लिए केंद्र सरकार को छह हफ्ते का समय दिया है। मामले की अगली सुनवाई 28 जनवरी को होगी।
यह मामला उन ऑफिसर कैडेट्स से जुड़ा है, जिन्हें सेना, नौसेना या वायुसेना की ट्रेनिंग के दौरान गंभीर चोट लगने या दिव्यांगता होने के चलते नौकरी से बाहर कर दिया जाता है। कोर्ट ने माना कि ऐसे कैडेट्स को बिना किसी पहचान, दर्जा या पुनर्वास सुविधा के बाहर किया जाना एक गंभीर समस्या है।
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने जस्टिस बीवी नागरथना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच को बताया कि तीनों सेनाओं भारतीय सेना, भारतीय नौसेना और भारतीय वायुसेना ने इस विषय पर सकारात्मक सिफारिशें दी हैं। इन सिफारिशों के आधार पर अब रक्षा मंत्रालय और वित्त मंत्रालय को मिलकर एक योजना तैयार करनी है। सरकार ने कोर्ट से इस पूरी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए छह हफ्ते का समय मांगा था, जिसे स्वीकार कर लिया गया।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी कहा कि अब फैसला लेने में और देरी नहीं होनी चाहिए। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि उम्मीद है कि अगली तारीख तक सिफारिशों पर विचार और मंजूरी की प्रक्रिया में तेजी आएगी।
इस मामले में एमिकस क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता रेखा पल्ली ने देरी पर चिंता जताई। उन्होंने अदालत को बताया कि बीते दस सालों में कई समितियां इस तरह की सिफारिशें कर चुकी हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस नीति लागू नहीं हो सकी है। उन्होंने सुझाव दिया कि कोर्ट सरकार से अपने फैसले को सील कवर में पेश करने को भी कह सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले यह भी नोट किया था कि सैनिक भर्ती के दौरान घायल हुए जवानों को आर्थिक और चिकित्सा सुविधाएं मिलती हैं, लेकिन ऑफिसर कैडेट्स को वही सुविधाएं नहीं दी जातीं। कोर्ट ने इसे असमानता करार दिया था।
अदालत के अनुसार, हर साल करीब 40 ऑफिसर कैडेट्स ट्रेनिंग के दौरान चोट या दिव्यांगता के चलते बाहर हो जाते हैं। कोर्ट ने माना कि इस संख्या को देखते हुए सरकार पर पड़ने वाला वित्तीय बोझ बहुत अधिक नहीं होगा।
अदालत ने पहले की सुनवाई में सुझाव दिया गया था कि ऐसे कैडेट्स को चिकित्सा सुविधा, आर्थिक सहायता, शिक्षा, पुनर्वास और बीमा जैसी सुविधाएं दी जानी चाहिए। इसके अलावा उन्हें पूर्व सैनिक का दर्जा देने या उनके लिए अलग पुनर्वास कार्यक्रम बनाने पर भी विचार किया गया था।
बता दें कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान (सुओ मोटो) लिया था, जिसका उद्देश्य उन कैडेट्स को सम्मान और सुरक्षा देना है, जिन्होंने देश की सेवा की तैयारी के दौरान अपना भविष्य दांव पर लगा दिया।
Ladakh fourth Axis Road: लद्दाख की कनेक्टिविटी को लेकर एक बड़ी और अहम खबर सामने आई है। सीमा सड़क संगठन यानी बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन (बीआरओ) लद्दाख को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने के लिए चौथे रणनीतिक रोड एक्सिस की तैयारी कर रहा है। यह नया रास्ता तकलिंग ला पास से होकर हिमाचल प्रदेश की ओर जाएगा, जिसके लिए डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट यानी डीपीआर तैयार की जा रही है। इसके पूरा होने के बाद लद्दाख और खासकर लेह तक साल के बारहों महीने पहुंचना संभव हो सकेगा।
Ladakh fourth Axis Road: अभी तक लद्दाख पहुंचने के लिए तीन रास्ते
बीआरओ के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल रघु श्रीनिवासन ने रक्षा समाचार को बताया, लद्दाख भारत के लिए सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र है। उन्होंने कहा कि पहले लद्दाख तक पहुंचने के लिए केवल एक ही मुख्य रास्ता था, जो श्रीनगर से जोजिला पास के जरिए लेह को जोड़ता था। सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण यह मार्ग लंबे समय तक बंद रहता था, जिससे लद्दाख का संपर्क देश से कट जाता था। (Ladakh fourth Axis Road)
इसके बाद दूसरा मार्ग मनाली से लेह तक तैयार किया गया, जो उपशी के रास्ते लद्दाख पहुंचता है। इस रास्ते में तंगला ला, बारालाचा ला, नाकी ला और लाचुंग ला जैसे ऊंचे पहाड़ी दर्रे आते हैं। हालांकि यह मार्ग भी सर्दियों में बर्फ से ढक जाता है और आवाजाही बंद हो जाती है। अटल टनल बनने के बाद मनाली की तरफ समस्या कुछ हद तक कम हुई, लेकिन ऊंचे पास अब भी चुनौती बने हुए हैं। (Ladakh fourth Axis Road)
Ladakh fourth Axis Road: नीमू-पदम-दारचा रोड पर काम जारी
तीसरे विकल्प के तौर पर नीमू-पदम-दारचा रोड पर काम किया जा रहा है। यह सड़क करीब 298 किलोमीटर लंबी है और लद्दाख के लिए सबसे छोटा मार्ग माना जा रहा है। इस रोड पर शिंकु ला टनल का निर्माण चल रहा है, जिसका पहला ब्लास्ट पिछले साल कारगिल विजय दिवस के मौके पर खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था। बीआरओ के मुताबिक, शिंकु ला टनल बन जाने के बाद यह मार्ग ऑल-वेदर हो जाएगा और साल भर लेह तक पहुंचा जा सकेगा। (Ladakh fourth Axis Road)
तकलिंग ला पास से दक्षिण हिमाचल तक
बीआरओ डीजी लेफ्टिनेंट जनरल रघु श्रीनिवासन के मुताबिक, अब लद्दाख को चौथे सड़क मार्ग से जोड़ने की तैयारी है। उन्होंने बताया कि यह नया मार्ग तकलिंग ला पास से होकर लद्दाख को हिमाचल प्रदेश के दक्षिणी हिस्सों से जोड़ेगा। बीआरओ के मुताबिक इस रूट के लिए डीपीआर तैयार की जा रही है। इसका उद्देश्य यह है कि यदि किसी वजह से एक या दो मार्ग बंद हो जाएं, तब भी लद्दाख की सप्लाई लाइन और आवाजाही प्रभावित न हो। (Ladakh fourth Axis Road)
शिमला की तरफ से नया एक्सिस
लद्दाख को मिलने वाला चौथा रणनीतिक सड़क मार्ग शिमला की तरफ से तैयार किया जा रहा है, जिसके जरिए दक्षिणी हिमाचर प्रदेश की तरफ से लद्दाख को जोड़ने की तैयारी की जा रही है। यह नया रास्ता शिमला डिवीजन के मौजूदा सड़क नेटवर्क से निकलकर आगे बढ़ेगा। शिमला से ठियोग और रामपुर बुशहर होते हुए सड़क पहले ही किन्नौर जिले के रिकांग पिओ तक पहुंचती है। यह हिस्सा ऑल-वेदर रोड है और साल भर खुला रहता है। इसी मौजूदा नेटवर्क को आगे बढ़ाकर लद्दाख की ओर नया एक्सिस तैयार किया जा रहा है। (Ladakh fourth Axis Road)
रिकांग पिओ के बाद यह रास्ता अपर किन्नौर की तरफ बढ़ेगा और फिर स्पीति घाटी में प्रवेश करेगा। यहां से सड़क कियाटो क्षेत्र तक पहुंचेगी, जिसे स्पीति और लद्दाख के बीच का अहम जंक्शन माना जाता है। इसके बाद यह रास्ता तकलिंग ला पास की ओर जाएगा।
17,700 फीट पर है तकलिंग ला पास
तकलिंग ला पास लगभग 17,700 फीट की ऊंचाई पर स्थित है और यह इलाका पहले पुराने ट्रेड रूट के तौर पर इस्तेमाल होता रहा है। अब इसे आधुनिक सड़क नेटवर्क से जोड़ने की योजना है। इस रूट के जरिए लद्दाख को हिमाचल प्रदेश के अंदरूनी इलाकों से सीधी और वैकल्पिक कनेक्टिविटी मिलेगी। यह मार्ग मिलिट्री मूवमेंट के साथ-साथ आम नागरिकों के लिए भी फायदेमंद होगा। (Ladakh fourth Axis Road)
तकलिंग ला पास पर बनेगी टनल
बीआरओ ने बताया कि इस प्रोजेक्ट के तहत जो मुख्य सड़क बनाई जा रही है, उसका नाम कियाटो-करजोक रोड है। यह सड़क स्पीति घाटी के कियाटो (साउथ लाहौल) इलाके से शुरू होकर तकलिंग ला पास क्रास करेगी और लद्दाख के करजोक क्षेत्र तक पहुंचेगी। तकलिंग ला पार करने के बाद यह सड़क लद्दाख के करजोक (नॉर्थ लद्दाख) इलाके में प्रवेश करेगी, जो त्सो मोरीरी झील के पास स्थित है। इसके लिए तकलिंग ला पास पर एक टनल बनाने की भी योजना है। इस सड़क की कुल लंबाई करीब 125 किलोमीटर होगी। यही सड़क आगे चलकर सादन और मोरे प्लेंस इलाके से जुड़ जाएगी। (Ladakh fourth Axis Road)
तकलिंग ला से सादन तक का हिस्सा इस पूरे प्रोजेक्ट का अहम भाग है। तकलिंग ला पास पार करने के बाद सड़क मोरे प्लेन्स के रास्ते सादन तक पहुंचेगी। यह दूरी करीब 50 से 60 किलोमीटर की होगी। यह मार्ग भविष्य में मनाली–लेह हाईवे का एक वैकल्पिक रास्ता बनेगा। अभी इस हिस्से का सर्वे पूरा हो चुका है और डीपीआर अंतिम चरण में है। निर्माण शुरू होने के बाद यह सड़क लद्दाख को हिमाचल प्रदेश से और तेजी से जोड़ सकेगी। (Ladakh fourth Axis Road)
वहीं, तकलिंग ला से सादन पहुंचने के बाद, हिमाचल प्रदेश की ओर एक और सड़क की योजना पर काम चल रहा है। यह रास्ता दारचा से शुरू होकर शिंकु ला पास होते हुए पदम और फिर निमू तक जाएगा। इस पूरे मार्ग को दारचा–शिंकु ला–पदम–निमू रोड कहा जाता है। इसकी कुल लंबाई करीब 220 किलोमीटर से ज्यादा होगी। इस परियोजना के तहत शिंकु ला पर करीब 4.1 किलोमीटर लंबी टनल बनाई जाएगी, जिससे यह रास्ता पूरे साल खुला रह सकेगा। (Ladakh fourth Axis Road)
इस सड़क और टनल की डीपीआर नेशनल हाइवेज एंड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन तैयार कर रहा है। सर्वे का काम पूरा हो चुका है और डीपीआर को अंतिम रूप दिया जा रहा है। योजना के मुताबिक, टेंडर प्रक्रिया 2026 में और निर्माण कार्य 2027 में शुरू होने की संभावना है। इसके पूरा होने पर यह लद्दाख के लिए एक और वैकल्पिक रास्ता बन जाएगा।
टनल पूरा होने में करीब चार साल
इस पूरे प्रोजेक्ट को लेकर सीमा सड़क संगठन के महानिदेशक रघु श्रीनिवासन ने बताया कि तकलिंग ला पास पर बनने वाली टनल को पूरा होने में करीब चार साल लगेंगे, जबकि सड़क का निर्माण लगभग दो-तीन साल में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। बीआरओ डीजी के अनुसार, सड़क पहले तैयार कर ली जाएगी ताकि सीमित समय में भी लद्दाख तक वैकल्पिक आवाजाही शुरू की जा सके, जबकि टनल बनने के बाद यह मार्ग पूरी तरह ऑल-वेदर बन जाएगा। (Ladakh fourth Axis Road)
इन सभी प्रोजेक्ट्स का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि लद्दाख तक पहुंच अब केवल एक-दो रास्तों पर निर्भर नहीं रहेगी। सेना को सीमाई इलाकों तक तेजी से पहुंचने में मदद मिलेगी और जरूरी सामान की सप्लाई भी आसान होगी। इसके अलावा, पर्यटन और स्थानीय व्यापार को भी बढ़ावा मिलेगा।
हालांकि, इन सड़कों को बनाना आसान नहीं है। ऊंचाई, भारी बर्फबारी और कठिन मौसम बड़ी चुनौती हैं। इसके बावजूद बीआरओ इन परियोजनाओं को आगे बढ़ा रहा है और टिकाऊ निर्माण पर जोर दिया जा रहा है।
बीआरओ अधिकारियों के मुताबिक, पहले जहां लद्दाख तक पहुंचने के लिए सिर्फ एक मुख्य रास्ता था, अब चार प्रमुख एक्सिस पर काम किया जा रहा है। ये सभी रास्ते मिलकर लद्दाख की ऑल-वेदर कनेक्टिविटी को मजबूत करेंगे। इससे न सिर्फ सेना को फायदा होगा, बल्कि स्थानीय लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी भी आसान होगी।
बीआरओ का कहना है कि इन सभी प्रोजेक्ट्स में कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, अत्यधिक ठंड और पर्यावरणीय संतुलन को ध्यान में रखते हुए काम किया जा रहा है। आधुनिक तकनीक और अनुभव के आधार पर इन सड़कों को तैयार किया जा रहा है ताकि वे लंबे समय तक टिकाऊ रहें। (Ladakh fourth Axis Road)
Varuna HA: भारतीय सेना के लिए ऊंचाई वाले और दुर्गम इलाकों में आवाजाही हमेशा एक बड़ी चुनौती रही है। इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए भारतीय सेना स्वदेशी रूप से विकसित वरुणा एचवीटीओएल (हाइब्रिड वर्टिकल टेक-ऑफ एंड लैंडिंग) प्लेटफॉर्म पर फोकस कर रही है। यह प्लेटफॉर्म बेहद कम जगह से उड़ान भरने और उतरने की क्षमता रखता है, जिससे वह उन इलाकों तक पहुंच सकता है जहां सामान्य हेलिकॉप्टर नहीं उड़ सकते।
54वें विजय दिवस के मौके पर भारतीय सेना ने नई दिल्ली स्थित आर्मी हाउस में विजय दिवस ‘एट होम’ कार्यक्रम का आयोजन किया था। यह आयोजन 1971 के युद्ध में भारत की ऐतिहासिक जीत की स्मृति में किया जाता है। इस मौके पर भारतीय सेना ने स्वदेशी तकनीकों, इनोवेशन को शोकेस किया। इनमें वरुणा एचवीटीओएल को प्रमुख तौर पर शोकेस किया गया था।
वरुणा एचवीटीओएल को पुणे स्थित सागर डिफेंस इंजीनियरिंग ने डेवलप किया है। यह प्लेटफॉर्म iDEX और ADITI जैसी सरकारी इनोवेशन पहलों के तहत तैयार किया गया है। पहले इसका नेवी वर्जन भारतीय नौसेना में जहाज से जहाज तक सामान ले जाने के लिए शामिल किया गया था। अब इसका हाई-एल्टीट्यूड यानी ऊंचाई के लिए अनुकूलित संस्करण भारतीय सेना की जरूरतों के मुताबिक डेवलप किया जा रहा है। यह देश का पहला दो लोगों को ले जाने वाला हाई-एल्टीट्यूड टैक्टिकल एरियल व्हीकल है।
यह प्लेटफॉर्म वीटीओएल (वर्टिकल टेक-ऑफ और लैंडिंग) क्षमता के साथ आता है और इसमें कंपनी की खास सेल्फ-लर्निंग कमांड एंड कंट्रोल नेविगेशन सिस्टम तकनीक लगी है। इसकी मदद से वरुणा एचए अपने आप यहां तक कि चलती हुई जगहों से भी उड़ान भर सकता है और लैंडिंग कर सकता है।
SDE Varuna HA is India’s indigenous high-altitude VTOL aerial vehicle designed to carry two persons in extreme and inaccessible terrain. Built for military and civilian missions, it enhances mobility, logistics and emergency response in high-altitude regions.#VarunaHA… pic.twitter.com/E695eDaECd
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) December 16, 2025
वरुणा एचए को इस तरह डिजाइन किया गया है कि समय, खर्च और इंसानी जान का जोखिम कम हो। यह ऊंचाई वाले दुर्गम इलाकों में भारी सामान उठाने में सक्षम है और जरूरत पड़ने पर हेलिकॉप्टर जैसे पारंपरिक प्लेटफॉर्म का विकल्प बन सकता है।
यह प्लेटफॉर्म कम ऊंचाई पर छोटी और मध्यम दूरी की तेज ट्रांसपोर्ट जरूरतों के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है। ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी इलाकों में रसद, मेडिकल सप्लाई या जरूरी सामान पहुंचाने में यह बेहद कारगर साबित हो सकता है।
SDE Varuna HA- India’s High-Altitude Two-Man VTOL
सेना के उत्तरी और पूर्वी कमानों ने इस प्लेटफॉर्म में गहरी रुचि दिखाई है। इसका मुख्य कारण यह है कि लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम जैसे क्षेत्रों में कई फॉरवर्ड पोस्ट ऐसे हैं जहां मौसम, टर्बुलेंस और पतली हवा के चलते हेलिकॉप्टरों से सप्लाई पहुंचाना मुश्किल होता है। ऐसे में वरुणा एचवीटीओएल जैसे प्लेटफॉर्म सैनिकों के लिए सुरक्षित और भरोसेमंद विकल्प बन सकते हैं।
यह टैक्टिकल एरियल व्हीकल दो सैनिकों को एक साथ ले जाने या लगभग 150 से 200 किलोग्राम तक का सामान ढोने में सक्षम है। इसमें गोला-बारूद, राशन, मेडिकल सप्लाई और यहां तक कि घायल सैनिक को निकालकर सुरक्षित स्थान तक लाने की क्षमता भी शामिल है। इसकी उड़ान सीमा 25 किलोमीटर से अधिक और उड़ान समय एक घंटे से ज्यादा बताया गया है, जो ऊंचाई वाले इलाकों के लिए महत्वपूर्ण है।
वरुणा एचवीटीओएल को खास तौर पर ऊंचाई और ठंडे मौसम के लिए तैयार किया जा रहा है। इसमें बड़े रोटर, डी-आइसिंग सिस्टम, मजबूत लैंडिंग गियर और ठंड में काम करने वाला इंजन शामिल किए जाने की योजना है। कंपनी के अनुसार, यह प्लेटफॉर्म माइनस 20 से 30 डिग्री तापमान में भी काम करने में सक्षम होगा।
इस प्लेटफॉर्म की एक बड़ी खासियत इसका सेफ्टी सिस्टम है। इसमें बैलिस्टिक पैराशूट, क्वाड-रिडंडेंट कंट्रोल सिस्टम और एयरबैग जैसी सुविधाएं दी गई हैं, जिससे आपात स्थिति में जोखिम कम हो जाता है। यह विशेष रूप से ऊंचाई वाले इलाकों में ऑपरेशन के दौरान अहम साबित हो सकता है।
सेना के अधिकारियों का मानना है कि वरुणा एचवीटीओएल जैसे प्लेटफॉर्म से खतरनाक “फ्री-ड्रॉप” सप्लाई मिशनों की जरूरत कम हो सकती है। अभी कई जगहों पर हेलिकॉप्टरों को ऊंचाई पर उड़ते हुए सामान गिराना पड़ता है, जो पायलटों के लिए जोखिम भरा होता है। एक वरुणा डिटैचमेंट एक दिन में कई फॉरवर्ड पोस्ट तक सप्लाई पहुंचा सकता है।
सैन्य उपयोग के अलावा यह प्लेटफॉर्म डिजास्टर रिस्पॉन्स, ह्यूमैनिटेरियन असिस्टेंस, इमरजेंसी मेडिकल सर्विस, लॉ-एन्फोर्समेंट और दूरदराज़ इलाकों में कनेक्टिविटी जैसे नागरिक कार्यों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इस तरह वरुणा एचवीटीओएल का इस्तेमाल ड्यूल-यूज प्लेटफॉर्म के तौर पर भी किया जा सकता है।
Vijay Diwas 2025: 54वें विजय दिवस के मौके पर भारतीय सेना ने नई दिल्ली स्थित आर्मी हाउस में विजय दिवस ‘एट होम’ कार्यक्रम का आयोजन किया। यह आयोजन 1971 के युद्ध में भारत की ऐतिहासिक जीत की स्मृति में किया गया। इस कार्यक्रम में भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू मुख्य अतिथि के तौर पर उपस्थित रहीं। इस मौके पर भारतीय सेना ने स्वदेशी तकनीकों, इनोवेशन और आत्मनिर्भर रक्षा क्षमताओं का व्यापक प्रदर्शन किया।
इस आयोजन में 73 देशों के राजदूत और उच्चायुक्त, वीरता पुरस्कार विजेता, खिलाड़ी, विभिन्न क्षेत्रों के विशिष्ट अतिथि और वरिष्ठ सैन्य अधिकारी शामिल हुए।
विजय दिवस ‘एट होम’ में प्रदर्शित प्रमुख तकनीकों में भारतीय सेना ने एआई बेस्ड सैटेलाइट इमेजरी एनालिसिस सिस्टम को पेश किया। यह सिस्टम सैटेलाइट से प्राप्त तस्वीरों का तेज और सटीक विश्लेषण करता है। यह प्लेटफॉर्म इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल, सिंथेटिक एपर्चर रडार, हाइपरस्पेक्ट्रल और इंफ्रारेड इमेजरी को एक साथ प्रोसेस करता है। पहले इन तस्वीरों को मैन्युअली देखने और समझने में काफी समय लगता था, लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से अब बदलावों की पहचान, गतिविधियों की निगरानी और अहम संकेतों को तुरंत मार्क किया जा सकता है।
AI-Based Satellite Imagery Analysis system
यह सिस्टम iDEX के तहत विकसित किया गया है और इसे आईआईटी दिल्ली से जुड़े स्टार्टअप साइरन एआई ने तैयार किया है।
यह सिस्टम 40 से अधिक श्रेणियों में ऑब्जेक्ट पहचान सकता है, बदलावों को ट्रैक कर सकता है और ड्रोन से मिलने वाली इमेजरी का विश्लेषण कर रियल-टाइम अलर्ट जारी करता है। यह तकनीक भारतीय स्टार्टअप्स और शैक्षणिक संस्थानों के सहयोग से तैयार की गई है। इसका उपयोग आपदा प्रबंधन, भूमि उपयोग, कृषि आकलन और इंफ्रास्ट्रक्चर योजना जैसे नागरिक क्षेत्रों में भी किया जा सकता है।
नेटवर्क के बिना काम करने वाला AI-इन-ए-बॉक्स
भारतीय सेना ने एक पोर्टेबल AI सिस्टम को भी शोकेस किया। इसे “AI-इन-ए-बॉक्स” कहा जाता है। यह सिस्टम उन इलाकों के लिए डिजाइन किया गया है जहां इंटरनेट या मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं होता। कठिन और दुर्गम क्षेत्रों में यह सिस्टम डेटा का विश्लेषण कर निर्णय लेने में मदद करता है।
यह सिस्टम भारतीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गयाा है और यह लॉजिस्टिक्स प्लानिंग, रियल-टाइम सिचुएशनल अवेयरनेस और ट्रेनिंग में मददगार है। यह पूरी तरह सुरक्षित है और बाहर के किसी सर्वर से जुड़ा नहीं होता। आपदा के समय, दूरदराज इलाकों में राहत टीमों के लिए भी यह सिस्टम काफी उपयोगी साबित हो सकता है।
वज्रका ऑल-टेरेन वाहन: पहाड़ों का भरोसेमंद साथी
भारतीय सेना ने वज्रका ऑल-टेरेन वाहन तैयार किया है, जो बेहद संकरे और खड़े पहाड़ी रास्तों पर भी चल सकता है। यह वाहन खास तौर पर लद्दाख और ऊंचाई वाले इलाकों के लिए बनाया गया है।
976 सीसी इंजन से लैस यह वाहन एक मीटर चौड़े रास्तों पर भी चल सकता है, 30 डिग्री तक की चढ़ाई चढ़ सकता है और 14,000 फीट की ऊंचाई पर –20 डिग्री तापमान में भी काम कर सकता है। इसका उपयोग लॉजिस्टिक्स सपोर्ट, सर्च एंड रेस्क्यू, कैजुअल्टी इवैक्यूएशन और ड्रोन ऑपरेशंस में किया जा सकता
एडवांस ट्रस ब्रिज: फटाफट बनेगा पुल
भारतीय सेना ने एडवांस ट्रस ब्रिज नाम का एक नया स्वदेशी पुल तैयार किया है। यह पुल खास तौर पर सेना की तेज आवाजाही और आपदा के समय आम लोगों तक मदद पहुंचाने के लिए बनाया गया है। इस पुल को iDEX प्राइम कार्यक्रम के तहत विकसित किया गया है।
इस पुल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह बहुत भारी सैन्य वाहनों का भार सह सकता है। इसे 60 मीटर तक की दूरी में लगाया जा सकता है। केवल 30 सैनिकों की टीम इस पुल को 15 से 18 घंटे में खड़ा कर सकती है। पुल की चौड़ाई 4.2 मीटर है, जिससे टैंक और बड़े वाहन आसानी से निकल सकते हैं। फिसलन रोकने के लिए इसमें खास सरफेस दिया गया है।
सेना का मानना है कि यह पुल पुराने बेली ब्रिज की जगह ले सकता है। इसकी उम्र लगभग 30 साल है। युद्ध के समय ही नहीं, बल्कि बाढ़, भूकंप और भूस्खलन के बाद टूटी सड़कों को जोड़ने में भी यह पुल बहुत काम आएगा।
रीसाइकल्ड असॉल्ट ट्रैक वे: प्लास्टिक कचरे से समाधान
भारतीय सेना और आईआईटी रुड़की ने मिलकर रीसाइकल्ड प्लास्टिक से बनी असॉल्ट ट्रैक वे विकसित की है। यह पारंपरिक एल्यूमिनियम ट्रैक वे की तुलना में हल्की है और ज्यादा भार सहन कर सकती है। यह अस्थायी रास्ता होता है, जिसे मिट्टी वाली जमीन, कीचड़ या टूटी सड़क पर बिछाया जाता है। जहां पुराने एल्यूमिनियम ट्रैक बहुत भारी होते थे, लेकिन यह नया ट्रैक हल्का है और ज्यादा भार सह सकता है।
इस ट्रैक वे का निर्माण कैंटोनमेंट्स से जुटाए गए प्लास्टिक कचरे, जैसे दूध के पैकेट्स, से किया गया है। 5,000 से अधिक वाहनों के ट्रायल में इसने स्थिरता और मजबूती साबित की है। इससे सैन्य और नागरिक दोनों क्षेत्रों में तेजी से अस्थायी रास्ते तैयार किए जा सकते हैं।
क्रायोकूलर: अब नाइट विजन पूरी तरह स्वदेशी
भारतीय सेना ने नाइट विजन उपकरणों में इस्तेमाल होने वाला क्रायोकूलर अब देश में ही बनाना शुरू कर दिया है। पहले इसे विदेश से मंगाया जाता था और इसकी कीमत बहुत ज्यादा थी। 500 mW क्रायोकूलर को स्वदेशी रूप से विकसित कर आत्मनिर्भरता की बड़ी उपलब्धि हासिल की है। पहले यह उपकरण 25 से 50 लाख रुपये की लागत से आयात किया जाता था, लेकिन अब इसे लगभग 4 लाख रुपये में देश में बनाया जा रहा है।
Big boost to self-reliance in defence tech 🇮🇳🔬
The Indian Army has successfully indigenised the 500mW Cryocooler, a mission-critical component for night-vision and thermal imaging systems. Developed by DRDO–SSPL and now being manufactured by 509 Army Base Workshop, this… pic.twitter.com/uIzuqnbVMi
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) December 15, 2025
इससे सेना को नाइट विजन उपकरण जल्दी मिलेंगे और मरम्मत में भी कम समय लगेगा। इससे हर साल करोड़ों रुपये की बचत होगी। डीआरडीओ की एसएसपीएल लैब द्वारा विकसित यह तकनीक अब 509 आर्मी बेस वर्कशॉप में बनाई जा रही है। इससे हर साल करीब 50 करोड़ रुपये की बचत होगी और उपकरणों की मरम्मत भी जल्दी होगी।
Ekam AI: सेना का अपना AI प्लेटफॉर्म
Ekam AI भारतीय सेना का खुद का सुरक्षित आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म है। यह पूरी तरह भारत में बना है और बाहर के किसी सिस्टम पर निर्भर नहीं है। इससे रिपोर्ट पढ़ना, जानकारी समझना और फैसले लेना आसान होता है। इसे बिना तकनीकी ज्ञान के भी इस्तेमाल किया जा सकता है। यह किसी विदेशी क्लाउड या सॉफ्टवेयर पर निर्भर नहीं रहता।
यह स्वदेशी लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स पर आधारित है। यह प्लेटफॉर्म सुरक्षित, एयर-गैप्ड वातावरण में काम करता है और डेटा संप्रभुता सुनिश्चित करता है। यह रियल-टाइम इंटेलिजेंस, डॉक्यूमेंट एनालिसिस और निर्णय सहायता प्रदान करता है, जिससे फील्ड से लेकर मुख्यालय तक काम आसान होता है।
इलेक्ट्रिक टैक्टिकल ऑल-टेरेन व्हीकल ‘वीर’
ई-टीएटीवी ‘वीर’ एक स्वदेशी इलेक्ट्रिक टैक्टिकल वाहन है। ‘वीर’ की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह बहुत कम आवाज़ करता है। इसमें 400 हॉर्स पावर की इलेक्ट्रिक मोटर लगी है, जिसके साथ पेट्रोल इंजन भी है, ताकि जरूरत पड़ने पर ज्यादा दूरी तय की जा सके। यह वाहन एक बार चार्ज होने पर लगभग 520 किलोमीटर तक चल सकता है। यह वाहन कम शोर और कम थर्मल सिग्नेचर के कारण गश्त और इंटेलिजेंस, सर्वेलांस एंड रिकॉनिसेंस (आईएसआर) मिशनों के लिए उपयोगी है। यह व्हीकल गश्त, निगरानी, रसद और घायल सैनिकों को निकालने जैसे कामों में इस्तेमाल किया जा सकता है। कम आवाज और कम गर्मी पैदा करने की वजह से दुश्मन के लिए इस वाहन को पहचानना बहुत मुश्किल होता है।
फायर फाइटिंग रोबोट: जान जोखिम में डाले बिना बुझाएगा आग
भारतीय सेना ने आग बुझाने के लिए एक स्वदेशी फायर फाइटिंग रोबोट तैयार किया है। इस रोबोट को स्वदेशी एम्प्रेसा प्राइवेट लिमिटेड ने भारतीय सेना के साथ मिलकर iDEX कार्यक्रम के तहत बनाया है। यह रोबोट उन जगहों पर काम करता है, जहां आग बहुत तेज होती है और इंसानों का जाना खतरनाक होता है। इसे दूर से कंट्रोल किया जा सकता है, जिससे फायर फाइटर्स को आग के पास जाने की जरूरत नहीं पड़ती।
Saving lives with indigenous robotics 🤖🔥
The Fire Fighting Robot (FF BOT), developed in India under the iDEX initiative, is transforming firefighting by operating in high-risk, inaccessible fire zones where human entry is unsafe. Equipped with thermal & optical imaging and… pic.twitter.com/xyYAdlsCmf
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) December 15, 2025
इस रोबोट में कैमरा और थर्मल सेंसर लगे हैं, जो आग और गर्मी की सही जानकारी देते हैं। इससे यह पता चलता है कि आग कहां है और कितनी फैल चुकी है। इसी जानकारी के आधार पर आग बुझाने की कार्रवाई की जाती है।
फायर फाइटिंग रोबोट बहुत मजबूत है और ज्यादा तापमान में भी काम कर सकता है। यह सेना के ठिकानों के साथ-साथ फैक्ट्रियों, रिहायशी इलाकों और आपदा वाले क्षेत्रों में भी उपयोगी है, जहां इंसानों की जान को खतरा होता है।
टेदर्ड हाइब्रिड एयरोस्टैटिक ड्रोन
भारत ने निगरानी के लिए एक नया स्वदेशी ड्रोन तैयार किया है, जिसे टेदर्ड हाइब्रिड एयरोस्टैटिक ड्रोन कहा जाता है। यह ड्रोन हीलियम गैस और इलेक्ट्रिक मोटर दोनों की मदद से उड़ता है, जिससे यह कम बिजली में लंबे समय तक हवा में बना रह सकता है।
यह ड्रोन एक ही जगह पर 24 घंटे तक लगातार निगरानी कर सकता है और करीब 10 किलोमीटर तक के इलाके पर नजर रख सकता है। इसे जमीन से एक तार (केबल) के जरिए जोड़ा जाता है, जिससे इसका कंट्रोल और डेटा लिंक सुरक्षित रहता है।
यह ड्रोन सेना के लिए निगरानी में मददगार है। इसके अलावा इसका इस्तेमाल सर्वे, मैपिंग, मौसम की जानकारी, बाढ़ की निगरानी और जंगल में आग का पता लगाने जैसे कामों में भी किया जा सकता है। पुलिस और प्रशासन भी बड़े कार्यक्रमों या संवेदनशील इलाकों में इससे निगरानी कर सकते हैं। यह पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से बना है।
SKYNET-INTEL
ड्रोन फॉरेंसिक टूल – SKYNET-INTEL
भारतीय सेना ने ड्रोन से जुड़ी जानकारी निकालने के लिए एक खास स्वदेशी सिस्टम बनाया है, जिसका नाम स्काइनेट-इंटेल है। यह सिस्टम iDEX कार्यक्रम के तहत सेना और भारतीय कंपनियों ने मिलकर डेवलप किया है।
जब कोई दुश्मन ड्रोन पकड़ा जाता है या गिराया जाता है, तो स्काइनेट-इंटेल उसकी उड़ान की जानकारी, जीपीएस रास्ता, मिशन डाटा, रेडियो सिग्नल और सेंसर डाटा निकाल सकता है। इससे पता चलता है कि ड्रोन कहां से आया, कहां जाना था और उसका मकसद क्या था। पाकिस्तान इसे आए तुर्की के ड्रोन की फॉरेंसिक जांच इसी के जरिए की गई थी।
SKYNET-INTEL
यह सिस्टम सुरक्षित नेटवर्क पर काम करता है और सेना को दुश्मन की रणनीति समझने में मदद करता है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ड्रोन की अहम भूमिका को देखते हुए यह टूल और भी उपयोगी साबित हुआ है।
प्रोजेक्ट संभव
प्रोजेक्ट SAMBHAV के तहत भारतीय सेना और एयरटेल ने मिलकर दूर-दराज इलाकों में 4जी मोबाइल नेटवर्क पहुंचाने की व्यवस्था की है। इसके लिए एक पोर्टेबल सिस्टम बनाया गया है, जिसे आसानी से कहीं भी ले जाया जा सकता है।
यह सिस्टम वनवेब सैटेलाइट नेटवर्क से जुड़कर काम करता है, इसलिए जहां मोबाइल टावर या फाइबर नहीं है, वहां भी नेटवर्क मिल सकता है। पहाड़ों, सीमावर्ती इलाकों और आपदा प्रभावित क्षेत्रों में यह बहुत उपयोगी है।
इससे सेना के साथ-साथ आम लोगों को भी संचार सुविधा मिलती है। यह तकनीक आपदा के समय संपर्क बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभा सकती है।
रूबिक परमानेंट डिफेंस
रूबिक परमानेंट डिफेंस एक खास तरह का तैयार किया गया सुरक्षा ढांचा है, जिसे सेना के जवान बहुत कम समय में बना सकते हैं। यह खास तौर पर पहाड़ी और ऊंचाई वाले इलाकों के लिए बनाया गया है।
Rubik Permanent Defence (PD): Rapid, Rugged & Ready 🇮🇳🛡️
An innovative prefabricated defensive structure, Rubik PD is designed for harsh high-altitude and mountainous terrain. Using lightweight, interlocking fibrous concrete blocks, soldiers can build a bullet- and… pic.twitter.com/c147l5PnYM
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) December 15, 2025
इसके छोटे-छोटे कंक्रीट ब्लॉक बहुत हल्के होते हैं, जिन्हें दूर-दराज पोस्ट तक आसानी से ले जाया जा सकता है। जवान सिर्फ 2–3 दिन में एक मजबूत, गोली और धमाके से बचाने वाला बंकर तैयार कर सकते हैं।
इस सिस्टम से सामान ढोने और मजदूरों की जरूरत बहुत कम हो जाती है। यह आगे की चौकियों को मजबूत बनाने में बहुत कारगर साबित हो रहा है।
टैक्टिकल LAN रेडियो
भारतीय सेना ने टैक्टिकल लैन रेडियो नाम का एक तेज और सुरक्षित कम्युनिकेशन सिस्टम तैयार किया है। यह सिस्टम पूरी तरह भारत में बना है और iDEX पहल के तहत विकसित किया गया है।
यह रेडियो लंबी दूरी तक तेज और सुरक्षित डेटा भेज सकता है। इसका इस्तेमाल युद्ध क्षेत्र में, ड्रोन नेटवर्क, सेंसर सिस्टम और आपदा के समय संचार के लिए किया जा सकता है।
सेना के साथ-साथ यह तकनीक सिविल एविएशन, स्मार्ट सिटी और दूर-दराज़ इलाकों में इंटरनेट कनेक्टिविटी के लिए भी उपयोगी है। यह भारत को संचार तकनीक में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक अहम कदम है।
Operation Sindoor Turkish Drone: ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने भारत पर कई ड्रोन हमले किए थे। जिन्हें भारतीय सेना के एयर डिफेंस सिस्टम ने बडी सटीकता के साथ नाकाम कर दिया था। इनमें से पाकिस्तान को कई ड्रोन तुर्किए से मिले थे। इन्हें भी भारतीय सेना ने मार गिराया था। उन गिराए गए ड्रोनों में से एक ड्रोन का देखने का मौका रक्षा समाचार को भी मिला। तुर्की में बने इस आर्मेड ड्रोन को पाकिस्तान ने लाहौर से लॉन्च किया था। यह ड्रोन भारतीय वायुसेना के एक अहम सैन्य ठिकाने को निशाना बनाने के लिए भेजा गया था, लेकिन भारतीय एयर डिफेंस सिस्टम एल-70 गनों ने इसे भारत की सीमा के भीतर घुसने से पहले ही गिरा दिया था।
हालांकि उस दौरान सेना के सूत्रों ने इस ड्रोन की पुष्टि थी, लेकिन ज्यादा जानकारी देने से परहेज बरता था। उसके बाद इस ड्रोन को फॉरेंसिक के लिए भेजा गया था। यह ड्रोन हाल ही में विजय दिवस के अवसर पर थल सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी के दिल्ली स्थित आवास पर प्रदर्शित किया गया। प्रदर्शनी में यह ड्रोन अन्य सैन्य स्मृतिचिह्नों के साथ रखा गया था।
पाकिस्तान ने यह ड्रोन हमला 8 मई को किया था, यानी उस दिन के करीब 24 घंटे बाद जब भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में स्थित आतंकी ठिकानों को तबाह किया था। इसके जवाब में पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर, राजस्थान और पंजाब के 36 शहरों और कस्बों को निशाना बनाते हुए 500 से ज्यादा हथियारबंद ड्रोन भारतीय सीमा में भेजे थे।
A Pakistani-origin Turkish drone was shot down by the Indian Army Air Defence during #OperationSindoor, as confirmed by @adgpi.
The drone, identified as a YIHA UAV, reportedly procured from Turkey, was launched from Lahore International Airport on 10 May with an intended target… pic.twitter.com/GloLrwguP0
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भारतीय सेना और वायुसेना की मल्टी-लेयर्ड एयर डिफेंस सिस्टम ने इन हमलों का जवाब दिया और लगभग सभी ड्रोन हवा में ही मार गिराए गए। इन्हीं में से एक ड्रोन था यीहा-III (YIHA-III), जिसे तुर्की और पाकिस्तान ने मिलकर डेवलप किया है। यह एक कामिकेज या सुसाइड ड्रोन है, जिसे लोइटरिंग म्यूनिशन भी कहा जाता है।
यीहा-III ड्रोन को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह किसी इलाके के ऊपर काफी समय तक मंडरा सकता है और सही टारगेट मिलने पर विस्फोट के साथ उस पर हमला कर देता है। अधिकारियों के मुताबिक, यह ड्रोन 10 मई को लाहौर इंटरनेशनल एयरपोर्ट के आसपास से लॉन्च किया गया था और उस समय लगभग 2,000 मीटर की ऊंचाई पर उड़ रहा था।
ड्रोन में करीब 10 किलोग्राम विस्फोटक लोड किया गया था। इसका टारगेट पंजाब में जलंधर के पास आदमपुर में तैनात भारतीय वायुसेना का एस-400 एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम था। कुछ अधिकारियों ने बताया कि निशाना होशियारपुर या जालंधर सेक्टर में स्थित सैन्य प्रतिष्ठान हो सकता था। हालांकि, यह ड्रोन अपने टारगेट तक पहुंचने में सफल नहीं हो सका और अमृतसर के पास भारतीय सेना की एयर डिफेंस यूनिट्स ने इसे इंटरसेप्ट कर गिरा दिया।
ड्रोन को गिराने के बाद भारतीय सेना के साइबर और तकनीकी विशेषज्ञों ने इसे पूरी तरह खोलकर जांच की। इस दौरान इसके फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम, प्री-फीडेड फ्लाइट पाथ, लॉन्च पॉइंट और टारगेट डेटा का विश्लेषण किया गया। सेना के अनुसार, जांच में यह स्पष्ट हो गया कि ड्रोन में फ्लाइट प्लान पहले से फीड किया गया था और इसे सीधे भारतीय सैन्य ठिकाने की ओर भेजा गया था।
A Pakistani-origin Turkish drone was successfully shot down by Indian Army Air Defence during #OperationSindoor.
The YIHA UAV, reportedly procured from Turkey, was launched from Lahore International Airport on 10 May with an intended target near Jalandhar, and was neutralised… pic.twitter.com/6FShn1jjXr
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) December 15, 2025
सेना के अधिकारियों ने बताया कि इस तरह की जांच से दुश्मन की रणनीतिक और सामरिक मंशा को समझने में मदद मिलती है। ड्रोन में लगे कैमरे, इंफ्रारेड सेंसर और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का डेटा भी सुरक्षित किया गया है।
इस दौरान यह भी सामने आया कि पाकिस्तान ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तुर्की में बने अन्य हथियारबंद ड्रोन भी इस्तेमाल किए थे। इनमें ‘सोंगार’ नाम का ड्रोन शामिल है, जिसे तुर्की की डिफेंस कंपनी एशिसगार्ड बनाती है। सोंगार ड्रोन के अलग-अलग वेरिएंट्स में असॉल्ट राइफल, ग्रेनेड लॉन्चर और मोर्टार जैसे हथियार लगाए जा सकते हैं।
भारतीय सेना के अनुसार, पाकिस्तान द्वारा इस्तेमाल किए गए ये ड्रोन भारतीय सुरक्षा बलों की सतर्कता और मजबूत एयर डिफेंस सिस्टम के सामने टिक नहीं पाए। सेना की तेज कार्रवाई से न केवल सैन्य ठिकानों को सुरक्षित रखा, बल्कि नागरिक इलाकों को भी बड़े नुकसान से बचाया।
MH-60R Seahawks: The commissioning of the second MH-60R squadron and integration of the helicopter into fleet operation marks a decisive leap in the Indian Navy’s ability to control the underwater battlespace and safeguard India’s vital maritime interests within the Indian Ocean Region. More than a mere platform upgrade, it represents a coherent enhancement of technology, strategy and human skill that will shape undersea vigilance and deterrence on the high seas for years to come.
MH-60R Seahawks: A New Era in ASW
The MH-60R has been designed from the outset as a dedicated maritime combat helicopter, integrating advanced sensors, weapons, networks, anti-ship capabilities and mission systems into a single, highly capable ASW platform. In an era when submarines are quieter, more networked and able to remain at sea for extended periods, this capability restores balance in the underwater domain by enabling quiet, persistent and confident operations far from the coastline.
At the heart of this transformation is the helicopter’s ability to search sub-surface contacts with precision and speed. It’s state-of-the-art dipping sonar allows aircrew to probe the depths for subtle acoustic signatures that may be missed by surface ships, while patterns of deployed sonobuoys can create a temporary underwater listening grid across wide swathes of ocean. Supported by maritime surveillance radar, anti-shipping capabilities and electronic support measures, the MH-60R gives commanders at sea a unified picture of surface and subsurface activity enhancing the MDA.
MH-60R Seahawks: Sensor Fusion and Rapid Decisions
What truly differentiates the MH-60R is not just the sophistication of individual sensors, but the way these inputs are fused onboard to generate a coherent, real-time tactical picture. This integrated processing drastically reduces uncertainty, shrinks the time between detection, classification and engagement decisions, and helps ensure that fleeting contacts do not slip back into the obscurity of the deep.
The Indian Navy is set to commission INAS 335 (Ospreys), its second MH-60R helicopter squadron, on 17 Dec 2025 at INS Hansa, Goa, in the presence of CNS Adm Dinesh K Tripathi.
Packed with advanced sensors, avionics and weapons, the MH-60R brings a major boost to the Navy’s… pic.twitter.com/IFiqGLMOF7
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) December 14, 2025
Such rapid decision cycles are crucial in anti-submarine warfare, where the advantage often lies with the platform that can act fastest on incomplete information. By providing the ship and force commander with timely, high-quality data, the MH-60R becomes a central node in the fleet’s wider combat system, rather than a standalone sensor operating in isolation.
MH-60R Seahawks: From detection to decisive response
The MH-60R’s value is further amplified by its ability not only to locate contacts but to engage them with precision weapons. Armed with lightweight torpedoes, the helicopter can prosecute contacts swiftly once they are positively classified, translating underwater/ surface awareness into credible and immediate combat power.
Operating from frontline units, the helicopter pushes the ASW battlespace outward, away from high-value ships, thereby increasing the protective cordon around task groups. This keeps hostile submarines on the defensive, complicates their approach to critical units and imposes continuous psychological and operational pressure on any adversary attempting to operate in contested waters.
MH-60R Seahawks: Strengthening the Western Fleet
The deployment of MH-60R helicopters on the western seaboard particularly enables the Western Fleet, which must safeguard some of the busiest and most strategically important waters for the nation. The Arabian Sea hosts dense commercial shipping, vital energy lifelines and growing naval presence, all within an acoustically complex environment that makes persistent, high-quality undersea surveillance indispensable.
From their host ships, MH-60Rs extend the Western Fleet’s reach well beyond the radar horizon, enabling rapid investigation of contacts and the maintenance of a broad protective envelope to the desired area of interest. The helicopter’s real-time data links feed directly into combat systems, sharpening maritime domain awareness not only during crises, but also through routine patrols that gradually build a detailed picture of regional surface/ sub-surface activity.
MH-60R Seahawks: Geopolitical impact in the Indian Ocean Region
The western Indian Ocean has seen a steady rise in submarine deployments, including those by extra-regional navies whose presence adds complexity and uncertainty to maritime planning. Submarines, by their very nature, thrive on ambiguity and the ability to remain undetected; the MH-60R counters this by raising the probability of detection, tracking and, if required, engagement.
This persistent surveillance and credible deterrence have a stabilising effect on the broader security environment. By signalling the Western Naval Command’s readiness to detect and respond to variety of threats, the MH-60R underpins India’s commitment to keeping sea lanes of communication safe and maintaining predictability in a theatre that is central to national and regional prosperity.
MH-60R Seahawks: Human skill behind advanced technology
Behind the MH-60R’s advanced systems stand highly trained aircrew, technicians and support personnel whose professionalism translates technology into operational effect. Operating often in demanding conditions, far from shore support, they undergo rigorous training to master complex avionics, weapons and maintenance routines, ensuring that the platform remains mission-ready at short notice to deliver decisive punch when called upon for action.
The training imparted has ensured building up on experience level of personnel in interpreting sensor data, executing precise tactics and sustaining high sortie rates during extended deployments. The MH-60R thus becomes a force multiplier not only because of its design, but because of the human expertise that exploits its full potential when deployed on the high seas.
Enduring vigilance beneath the waves
The commissioning of the second MH-60R squadron is therefore far more than the arrival of a new aircraft type; it is a quiet but consequential reinforcement of India’s vigilance on the Western seaboard. By combining cutting-edge sensors, integrated weapons, networked operations and skilled personnel, the platform ensures that India’s maritime approaches remain secure, monitored and well defended against evolving threats in the Indian Ocean Region.
In a domain where most activity remains hidden from view, the MH-60R brings clarity, reach and reassurance, enabling the Indian Navy to operate with confidence in an increasingly contested maritime environment. Commissioning the MH squadron underscores an enduring responsibility to remain watchful beneath the waves, protect national interests and uphold stability across the wider Indian Ocean Region.
Chinese HQ-9B: ऑपरेशन सिंदूर में चीन ने पर्दे के पीछे रह कर पाकिस्तान का साथ दिया था। चीन ने न केवल सैटेलाइट इंटेल दिया बल्कि वेपंस भी मुहैया कराए। हालांकि ऑपरेशन सिंदूर में चीन की एयर डिफेंस तकनीक को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए। अमेरिका के प्रतिष्ठित डिफेंस एक्सपर्ट और द नेशनल इंटरेस्ट के सीनियर नेशनल सिक्योरिटी एडिटर ब्रैंडन जे. वाइशर्ट ने दावा किया है कि पाकिस्तान में तैनात चीन का एचक्यू-9बी लॉन्ग रेंज एयर डिफेंस सिस्टम पूरी तरह विफल रहा। उनके मुताबिक, रूस से खरीदे एस-400 ट्रायम्फ सिस्टम और ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइलों के सामने एचक्यू-9बी टिक नहीं पाया।
वाइशर्ट के मुताबिक, जंग से पहले चीन ने पाकिस्तान को कई एचक्यू-9बी एयर डिफेंस सिस्टम सप्लाई किए थे। चीन ने इस सिस्टम को अपेक्षाकृत सस्ते लेकिन प्रभावी विकल्प के तौर पर पेश किया था, और रूस के एस-400 जैसा बताया था। हालांकि, लेकिन जब असली युद्ध का मौका आया तो इसकी क्षमताएं कागजों तक ही सीमित रह गईं। (Chinese HQ-9B)
अमेरिकी विश्लेषक के मुताबिक, एचक्यू-9बी को रूस के एस-300 सिस्टम से प्रेरित माना जाता है, जिसे चीन ने रिवर्स इंजीनियरिंग के जरिए डेवलप किया। बाद में इसमें एस-400 जैसे कुछ फीचर्स और अमेरिकी व इजराइली तकनीक से जुड़े एलिमेंट्स भी शामिल किए गए। इसके बावजूद, वाइशर्ट ने एचक्यू-9बी को “फ्रेंकस्टीन मॉन्स्टर” जैसा सिस्टम बताया, जिसमें अलग-अलग तकनीकों का मिश्रण तो है, लेकिन युद्ध में भरोसेमंद प्रदर्शन नहीं रहा। (Chinese HQ-9B)
उनका कहना है कि एचक्यू-9बी न तो एस-300 के स्तर का है और न ही एस-400 की बराबरी कर सकता है। यह फर्क उस समय साफ दिखा, जब भारतीय एयर डिफेंस नेटवर्क ने पाकिस्तान के अहम इलाकों में तैनात एचक्यू-9बी को आसानी से डिएक्टिवेट कर दिया।
भारत के एस-400 ट्रायम्फ सिस्टम को वाइशर्ट ने निर्णायक हथियार बताया। उनके अनुसार, यह सिस्टम पहले से कॉम्बैट-प्रूवन है और इसी वजह से युद्ध में बेहतर साबित हुआ। रूसी सैन्य विशेषज्ञ आंद्रेई मार्त्यानोव ने भी इस आकलन का समर्थन करते हुए कहा कि एचक्यू-9बी सुपरसोनिक खतरों को रोकने में पूरी तरह नाकाम रहा। (Chinese HQ-9B)
मार्त्यानोव ने दावा किया कि भारतीय ब्रह्मोस मिसाइलों ने पाकिस्तान के एचक्यू-9बी एयर डिफेंस सिस्टम को “उड़ा दिया।” ब्रह्मोस की तेज रफ्तार और सटीकता के आगे एचक्यू-9बी की इंटरसेप्शन क्षमता कमजोर साबित हुई। यहां तक कि यह सिस्टम सबसोनिक टारगेट्स और ड्रोन के खिलाफ भी प्रभावी नहीं रहा।
रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान ने 2021 में एचक्यू-9बी सिस्टम खरीदे थे और 2024 तक इनमें अपग्रेड भी किए गए। इन्हें लाहौर और सियालकोट जैसे हाई-वैल्यू इलाकों की सुरक्षा के लिए तैनात किया गया था। इसके बावजूद, एचक्यू-9बी कथित तौर पर एक भी भारतीय मिसाइल, ड्रोन या लोइटरिंग म्यूनिशन को इंटरसेप्ट नहीं कर सका। (Chinese HQ-9B)
वाइशर्ट के मुताबिक, एचक्यू-9बी के एचटी-233 रडार को भारतीय इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और जैमिंग तकनीकों ने निष्क्रिय कर दिया। रडार के ब्लाइंड होते ही लॉन्चर और कमांड यूनिट्स भी भारतीय हमलों की चपेट में आ गईं। इससे सिस्टम की सर्वाइवेबिलिटी और नेटवर्क इंटीग्रेशन की कमजोरियां दुनिया के सामने उजागर हो गईं।
एक और बड़ी कमी एचक्यू-9बी की सीमित संख्या रही। अनुमान के मुताबिक, पाकिस्तान के पास सिर्फ 12 से 18 एचक्यू-9बी लॉन्चर थे। इसके मुकाबले भारत के पास 40 से ज्यादा एस-400 ट्रायम्फ लॉन्चर हैं, जो लेयर्ड और डेंस एयर डिफेंस नेटवर्क का हिस्सा हैं। इसी अंतर ने युद्ध के दौरान भारत को रणनीतिक बढ़त दिलाई। (Chinese HQ-9B)
पाकिस्तानी आकलन में यह भी सामने आया कि एचक्यू-9बी का सेमी-एक्टिव रडार होमिंग सिस्टम उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गया। इससे बैटरियों की लोकेशन आसानी से ट्रैक हो गई और भारतीय वायुसेना को स्पष्ट टारगेट मिलते चले गए।
संघर्ष के बाद पाकिस्तान में एचक्यू-9बी को लेकर अंदरूनी समीक्षा की बात सामने आई है। जहां चीन ने खराब ट्रेनिंग को असफलता की वजह बताया, वहीं पाकिस्तानी और दूसरे विश्लेषकों का मानना है कि सिस्टम खुद तकनीकी रूप से कमजोर साबित हुआ। (Chinese HQ-9B)
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान अब तुर्किये के सिपर एयर डिफेंस सिस्टम ब्लॉक-1 और ब्लॉक-2 जैसे विकल्पों पर विचार कर रहा है। साथ ही, चीन के एचक्यू-19 सिस्टम पर भी नजर है, हालांकि इसे बीजिंग को संतुष्ट रखने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
तुर्की का सिपर एयर डिफेंस सिस्टम एक स्वदेशी लंबी दूरी का एयर और मिसाइल डिफेंस सिस्टम है, जो स्टील डोम मल्टी-लेयर्ड डिफेंस स्ट्रक्चर का हिस्सा है। यह लड़ाकू विमान, क्रूज मिसाइल, एयर-टू-ग्राउंड म्यूनिशन और यूएवी जैसे खतरों के खिलाफ कारगर है। सिपर ब्लॉक-1 की रेंज 100+ किमी है और यह 2024 से तुर्की सेना में शामिल है, जबकि ब्लॉक-2 की रेंज 150+ किमी है और इसका परीक्षण जारी है। यह सिस्टम 360 डिग्री कवरेज, हाई मोबिलिटी और ऑल-वेदर क्षमता देता है। (Chinese HQ-9B)
वाइशर्ट के अनुसार, एचक्यू-9बी की नाकामी ने न सिर्फ पाकिस्तान के एयर डिफेंस को कमजोर किया, बल्कि चीन के एयर डिफेंस एक्सपोर्ट्स की साख को भी झटका दिया है। इसके उलट, यह भारत ने जिस तरह से एस-400 और ब्रह्मोस जैसे सिस्टम्स में निवेश किया, इसका फायदा ऑपरेशन सिंदूर में स्पष्ट तौर पर देखने को मिला। (Chinese HQ-9B)
Indian Army RVC Corps Day: भारतीय सेना की सबसे पुरानी इंडियन आर्मी रिमाउंट एंड वेटरनरी कॉर्प्स को आज 247 साल पूरे हो गए। आरवीसी ने रविवार को अपना 247वां कॉर्प्स डे मनाया। लगभग 250 साल पहले आरवीसी की शुरुआत वर्ष 1779 में बंगाल में स्थापित स्टड डिपार्टमेंट के रूप में हुई थी। जिसके बाद 14 दिसंबर 1920 को आधिकारिक रूप से आर्मी वेटरीनरी कॉर्प्स बना। कई पुनर्गठन के बाद वर्ष 1960 में औपचारिक रूप से रिमाउंट एंड वेटरनरी कॉर्प्स (आरवीसी) का स्वरूप मिला। वर्ष 1989 में इस कॉर्प्स को प्रेसिडेंट्स कलर्स से सम्मानित किया गया था।
आरवीसी का आदर्श वाक्य “पशु सेवा अस्माकम धर्मः” है, जिसका अर्थ है पशुओं की सेवा ही हमारा कर्तव्य है। यह कॉर्प्स सेना के लिए घोड़े, खच्चर और आर्मी डॉग्सके प्रजनन, पालन, प्रशिक्षण और सप्लाई का काम करता है। इन पशुओं को देशभर की एनिमल होल्डिंग यूनिट्स में तैनात किया जाता है, जहां वे सेना के अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
भारतीय सेना की रिमाउंट एंड वेटरनरी कॉर्प्स को अक्सर “साइलेंट वारियर्स” की रीढ़ कहा जाता है। पहले और दूसरे विश्व युद्ध सहित स्वतंत्रता के बाद हुए सभी प्रमुख सैन्य अभियानों में आरवीसी ने उल्लेखनीय योगदान दिया है। दुर्गम और उच्च हिमालयी क्षेत्रों में, जहां वाहन या हेलीकॉप्टर नहीं पहुंच पाते, वहां खच्चर आज भी रसद आपूर्ति का सबसे भरोसेमंद साधन बने हुए हैं।
वहीं, कारगिल युद्ध के दौरान आरवीसी की भूमिका सबसे ज्यादा चर्चा में रही। कारगिल की बर्फीली और ऊंची चोटियों पर, जहां वाहन या हेलीकॉप्टर पहुंचना संभव नहीं था, वहीं आरवीसी के खच्चरों ने मोर्चा संभाला। ये खच्चर 18 से 19 हजार फीट की ऊंचाई तक गोला-बारूद, राशन और हथियार ढोते रहे। ऑक्सीजन की कमी, जमा देने वाली ठंड और दुश्मन की गोलीबारी के बीच इन पैक एनिमल्स ने भारतीय सैनिकों के लिए सप्लाई लाइन को जिंदा रखा। आज भी सियाचिन और लद्दाख जैसे इलाकों में खच्चर सेना की लॉजिस्टिक्स का भरोसेमंद साधन बने हुए हैं।
आतंकवाद विरोधी अभियानों में आर्मी डॉग्स की बहादुरी भी किसी सैनिक से कम नहीं रही है। 2022 में बारामूला ऑपरेशन के दौरान दो साल का बेल्जियन मालिनॉइस डॉग एक्सेल आगे भेजा गया। उसके शरीर पर कैमरा लगाया गया था, ताकि आतंकियों की सटीक लोकेशन मिल सके। एक्सेल ने छिपे आतंकियों का पता लगा लिया, जिससे जवान सुरक्षित आगे बढ़ सके, लेकिन इसी दौरान वह शहीद हो गया।
इसी तरह 2023 में कोकेरनाग एनकाउंटर के दौरान छह साल की लैब्राडोर केंट को आगे भेजा गया। केंट ने छिपे आतंकियों पर हमला कर अपने हैंडलर और अन्य जवानों की जान बचाई। ऑपरेशन के दौरान केंट शहीद हो गई।
आरवीसी के इतिहास में ऐसी कई पुरानी लेकिन यादगार कहानियां दर्ज हैं। 1990 के दशक में कश्मीर में तैनात आर्मी डॉग रेक्स ने गोलीबारी के बीच तीन किलोमीटर तक एक घायल आतंकी को ट्रैक किया था। वहीं 1965 में भूटान में हुए एक हमले के बाद आर्मी डॉग एलेक्स ने ग्रेनेड से उठी गंध को पकड़कर जंगल में कई किलोमीटर तक दौड़ते हुए हमलावर को ढूंढ निकाला था। इस साहसिक कार्रवाई के लिए भूटान के राजा ने एलेक्स को विशेष इनाम दिया था।
वहीं, आरवीसी के खच्चरों में भी कई ऐसे नाम हैं जो सेना के इतिहास में दर्ज हैं। पेडोंगी नाम का खच्चर करीब 30 साल तक फॉरवर्ड एरिया में सेवा करता रहा। उसकी लंबी सेवा और योगदान के सम्मान में दिल्ली कैंट में एक ऑफिसर्स मेस उसके नाम पर रखा गया है।
आर्मी डॉग्स को आठ खास स्किल्स में ट्रेन किया जाता है, जिनमें काउंटर इंसर्जेंसी और काउंटर टेररिज्म ऑपरेशंस शामिल हैं। एक्सेल, जूम, मानसी, केंट और फैंटम जैसे कई डॉग्स ने अदम्य साहस दिखाते हुए अपने प्राणों की आहुति दी है।
आरवीसी आधुनिक भारत की जरूरतों के अनुरूप भी लगातार आगे बढ़ रहा है। वर्ष 2023 से इसमें महिला अधिकारियों की भर्ती शुरू की गई, और अब तक सात महिला अधिकारी कमीशन प्राप्त कर चुकी हैं। इनमें से एक अधिकारी का चयन सेना की पहली वीमेन स्काईडाइविंग टीम के लिए भी हुआ है।
कोविड-19 महामारी के दौरान आरवीसी ने आरटी-पीसीआर टेस्टिंग, मेडिकल सपोर्ट और केयर फैसिलिटी में भी अहम भूमिका निभाई। इसके अलावा यह कॉर्प्स वन हेल्थ और जूनोटिक डिजीज मैनेजमेंट के लिए राष्ट्रीय संस्थानों के साथ मिलकर कार्य करता है।
आज आरवीसी अपने रिटायर्ड सैन्य कुत्तों और जानवरों का भी पूरा सम्मान करता है। मेरठ स्थित आरवीसी सेंटर में रिटायर्ड डॉग्स के लिए विशेष देखभाल की व्यवस्था है, जहां उन्हें सम्मानजनक जीवन दिया जाता है। वहीं मेरठ में ही देश का पहला एनिमल वॉर मेमोरियल तैयार किया जा रहा है, जहां 300 से ज्यादा आर्मी डॉग्स और खच्चरों के नाम दर्ज किए जाएंगे।
MH-60R 2nd squadron: भारतीय नौसेना की समुद्री युद्ध क्षमता को जबरदस्त बूस्ट मिलने वाला है। नौसेना 17 दिसंबर को गोवा स्थित आईएनएस हंसा में अपनी दूसरी एमएच-60आर यानी रोमियो हेलिकॉप्टर स्क्वाड्रन को कमीशन करेगी। इसका पहला स्क्वाड्रन आईएनएएस 334 ‘सीहॉक्स’ पहले कोच्चि के आईएनएस गरूड़ पर मार्च 2024 में कमीशन किया गया था। यह स्क्वाड्रन उस समय बनाया गया था जब शुरु में एमएच-60आर हेलिकॉप्टर्स भारत आए थे।
एमएच-60आर हेलिकॉप्टर की नई स्क्वाड्रन का नाम आईएनएएस 335 ‘ऑस्प्रेज’ रखा गया है। इनकी कमीशनिंग के मौके पर नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी भी मौजूद रहेंगे। यह कमीशनिंग भारतीय नौसेना के आधुनिकीकरण और ऑपरेशनल क्षमता को बढ़ाने की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। (MH-60R 2nd squadron)
The Indian Navy is set to commission INAS 335 (Ospreys), its second MH-60R helicopter squadron, on 17 Dec 2025 at INS Hansa, Goa, in the presence of CNS Adm Dinesh K Tripathi.
Packed with advanced sensors, avionics and weapons, the MH-60R brings a major boost to the Navy’s… pic.twitter.com/IFiqGLMOF7
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) December 14, 2025
इससे पहले नेवी चीफ एडमिरल दिनेश के. त्रिपाठी ने 4 दिसंबर की नेवी डे प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि दिसंबर 2025 में ही आईएनएस हंसा, गोवा में फुल स्क्वाड्रन कमीशन होगा। नौसेना की योजना तीन स्क्वाड्रन बनाने की है इनमें से दो को वेस्टर्न फ्लीट के लिए, एक ईस्टर्न के लिए तैनात कियाा जाएगा।
वहीं, आईएनएएस 335 स्क्वाड्रन के कमीशन होने से नौसेना की समुद्री निगरानी, एंटी-सबमरीन वॉरफेयर और सतह पर मौजूद खतरों से निपटने की क्षमता को सीधा फायदा मिलेगा। एमएच-60आर हेलिकॉप्टरों को दुनिया के सबसे आधुनिक मैरीटाइम हेलिकॉप्टरों में गिना जाता है। (MH-60R 2nd squadron)
MH-60R 2nd squadron: एमएच-60आर हेलिकॉप्टर क्यों हैं खास
एमएच-60आर हेलिकॉप्टर को ‘रोमियो’ नाम से भी जाना जाता है। यह एक ऑल-वेदर मल्टी-रोल हेलिकॉप्टर है, जिसे खासतौर पर एंटी-सबमरीन वारफेयर यानी पनडुब्बी रोधी अभियानों के लिए डिजाइन किया गया है। इसमें आधुनिक सेंसर, एडवांस एवियोनिक्स और ताकतवर विपन सिस्टम लगा है। यही वजह है कि यह हेलिकॉप्टर ट्रेडीशनल एंड एसिमेट्रिकल दोनों तरह के खतरों से निपटने में सक्षम है। (MH-60R 2nd squadron)
ये हेलिकॉप्टर्स शिप्स (जैसे विक्रांत, विक्रमादित्य, डिस्ट्रॉयर्स) से ऑपरेट होते हैं, इसलिए एक स्क्वाड्रन के कुछ हेलिकॉप्टर्स अलग-अलग शिप्स पर एम्बार्क्ड रहते हैं।
भारतीय नौसेना ने साल 2020 में अमेरिका से 24 एमएच-60आर हेलिकॉप्टरों की खरीद का समझौता किया था, जिसकी कुल कीमत लगभग 2.4 अरब डॉलर थी। अब तक इनमें से 15 हेलिकॉप्टर भारत को मिल चुके हैं। सभी की डिलीवरी 2027 तक पूरी हो जाएगी। इनमें से कुछ हेलिकॉप्टर अभी अमेरिका में ही हैं, जहां भारतीय पायलटों और टेक्निकल स्टाफ को ट्रेनिंग दी जा रही है। (MH-60R 2nd squadron)
MH-60R 2nd squadron: पहले भी साबित कर चुके हैं क्षमता
रोमियो हेलिकॉप्टर पहले ही नौसेना के फ्लीट ऑपरेशंस में पूरी तरह इंटीग्रेट हो चुके हैं और कई मौकों पर अपनी उपयोगिता साबित कर चुके हैं। इन हेलिकॉप्टरों को वॉरशिप्स से ऑपरेट किया जा सकता है, जिससे समुद्र के बड़े इलाके में निगरानी और प्रतिक्रिया क्षमता बढ़ जाती है। (MH-60R 2nd squadron)
इन हेलिकॉप्टरों में डिपिंग सोनार, मल्टी-मोड रडार और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सिस्टम लगे हैं, जो समुद्र के भीतर मौजूद पनडुब्बियों का पता लगाने में मदद करते हैं। इसके साथ ही ये हेलिकॉप्टर मार्क-54 टॉरपीडो और हेलफायर एयर-टू-सर्फेस मिसाइलों से लैस हैं। (MH-60R 2nd squadron)
MH-60R 2nd squadron: आईएनएस हंसा से मिलेगी पश्चिमी में बढ़त
ऑस्प्रेज स्क्वाड्रन को गोवा स्थित आईएनएस हंसा में तैनात किया जाएगा, जो पश्चिमी समुद्री तट पर नौसेना का प्रमुख एयर बेस है। यहां से अरब सागर और आसपास के समुद्री क्षेत्र में निगरानी और ऑपरेशनल गतिविधियों को मजबूती मिलेगी। यह इलाका रणनीतिक रूप से काफी अहम माना जाता है। (MH-60R 2nd squadron)
भारतीय नौसेना पहले ही यह स्पष्ट कर चुकी है कि वह हिंद महासागर क्षेत्र में हो रही हर गतिविधि पर नजर रखे हुए है। हाल के वर्षों में चीनी नौसैनिक और रिसर्च जहाजों की मौजूदगी इस क्षेत्र में बढ़ी है, ऐसे में रोमियो जैसे आधुनिक हेलिकॉप्टर नौसेना के लिए बेहद उपयोगी साबित होंगे। (MH-60R 2nd squadron)
MH-60R 2nd squadron: पुराने हेलिकॉप्टरों की जगह ले रहे रोमियो
रोमियो हेलिकॉप्टर भारतीय नौसेना में लंबे समय से इस्तेमाल हो रहे पुराने सी किंग हेलिकॉप्टरों की जगह ले रहे हैं। सी किंग हेलिकॉप्टर अब अपनी मूल भूमिका की तुलना में ज्यादा ट्रांसपोर्ट कार्यों में इस्तेमाल हो रहे थे। नए हेलिकॉप्टरों के आने से एंटी-सबमरीन वॉरफेयर क्षमता फिर से मजबूत हो रही है। (MH-60R 2nd squadron)
मेंटेनेंस और सपोर्ट पर भी फोकस
हाल ही में भारत और अमेरिका के बीच रोमियो हेलिकॉप्टरों (MH-60R 2nd squadron) के लिए लगभग 7,995 करोड़ रुपये का फॉलो-ऑन सपोर्ट समझौता भी हुआ है। इसके तहत अगले पांच वर्षों तक इन हेलिकॉप्टरों के मेंटेनेस, रिपेयर और स्पेयर सपोर्ट की व्यवस्था की जाएगी। भारत में ही इंटरमीडिएट लेवल मेंटेनेंस फैसिलिटी स्थापित की जाएगी, जिससे ऑपरेशनल क्षमता और बढ़ेगी।
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