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पवन हंस को 10 स्वदेशी ध्रुव नेक्स्ट जेनरेशन हेलीकॉप्टर देगा HAL, डील से बदलेगा सिविल एविएशन का खेल

HAL Pawan Hans Dhruv NG Helicopter Deal
File Photo

HAL Pawan Hans Dhruv NG Helicopter Deal: हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने सरकारी हेलीकॉप्टर सेवा कंपनी पवन हंस लिमिटेड के साथ 10 ध्रुव नेक्स्ट जेनरेशन हेलीकॉप्टरों की सप्लाई के लिए डील साइन की है। इस डील की अनुमानित कीमत 1800 करोड़ रुपये से अधिक है। यह समझौता ऐसे समय हुआ है, जब भारत सिविल एविएशन सेक्टर में विदेशी प्लेटफॉर्म्स पर निर्भरता कम करने और स्वदेशी तकनीक को आगे बढ़ाने की दिशा में तेजी से कदम उठा रहा है।

एचएएल ने इस डील की जानकारी 29 जनवरी को बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज को दी है। कंपनी ने बताया कि पवन हंस के साथ यह कॉन्ट्रैक्ट हैदराबाद में साइन किया गया है और यह पूरी तरह डोमेस्टिक ऑर्डर है।

फाइलिंग के अनुसार, यह ऑर्डर साल 2027 तक पूरा किया जाएगा और इसमें हेलीकॉप्टरों के साथ जरूरी स्पेयर पार्ट्स, एक्सेसरीज और सपोर्ट इक्विपमेंट भी शामिल हैं।

HAL Pawan Hans Dhruv NG Helicopter Deal: कॉन्ट्रैक्ट में क्या-क्या शामिल है

इस समझौते के तहत एचएएल पवन हंस को 10 ध्रुव एनजी हेलीकॉप्टरों की सप्लाई करेगा। इसके साथ ही इन हेलीकॉप्टरों के ऑपरेशन और मेंटेनेंस के लिए जरूरी स्पेयर और अन्य तकनीकी सपोर्ट भी दिया जाएगा। कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह ऑर्डर पूरी तरह भारतीय संस्थाओं के बीच हुआ है और इसमें किसी अंतरराष्ट्रीय यूनिट की भागीदारी नहीं है।

यह बात खास इसलिए भी मानी जा रही है क्योंकि सिविल हेलीकॉप्टर सेगमेंट में अब तक विदेशी कंपनियों का दबदबा रहा है।

पवन हंस लिमिटेड भारत की प्रमुख सरकारी हेलीकॉप्टर सेवा कंपनी है, जिसका मुख्यालय नोएडा में है। यह कंपनी ऑफशोर ऑपरेशंस, वीआईपी ट्रांसपोर्ट, मेडिकल इमरजेंसी और खासतौर पर ओएनजीसी के लिए समुद्र में हेलीकॉप्टर सेवाएं उपलब्ध कराती है।

अब तक पवन हंस का बेड़ा ज्यादातर विदेशी हेलीकॉप्टरों पर आधारित रहा है। ऐसे में पहली बार इतने बड़े स्तर पर स्वदेशी हेलीकॉप्टर को चुनना, भारत की सिविल एविएशन नीति में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है।

ध्रुव एनजी हेलीकॉप्टर क्या है

ध्रुव एनजी, एचएएल के एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर ध्रुव का नेक्स्ट जेनरेशन वर्जन है, जिसे खास तौर पर सिविल एविएशन के लिए तैयार किया गया है। ध्रुव प्लेटफॉर्म पहले ही भारतीय सेना, वायु सेना, नौसेना और कोस्ट गार्ड में अपनी क्षमताएं साबित कर चुका है।

नेक्स्ट जेनरेशन वर्जन में बेहतर एवियोनिक्स, आधुनिक ग्लास कॉकपिट, एडवांस सेफ्टी फीचर्स और सिविल सर्टिफिकेशन के अनुरूप कई बदलाव किए गए हैं। यह हेलीकॉप्टर ऊंचाई वाले इलाकों और समुद्री क्षेत्रों में भी बेहतर प्रदर्शन के लिए डिजाइन किया गया है, जो पवन हंस जैसे ऑपरेटर के लिए बेहद जरूरी है।

एचएएल के लिए क्यों है यह डील खास

यह समझौता एचएएल के लिए रणनीतिक तौर पर भी बहुत महत्वपूर्ण है। अब तक एचएएल की पहचान मुख्य रूप से एक डिफेंस एयरोस्पेस कंपनी के रूप में रही है। लेकिन कंपनी अब सिविल एविएशन मार्केट में भी अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराना चाहती है।

ध्रुव एनजी जैसे प्लेटफॉर्म के जरिए एचएएल यह दिखाना चाहता है कि वह सिर्फ सैन्य जरूरतों तक सीमित नहीं है, बल्कि सिविल सेक्टर के लिए भी विश्व स्तर का आधुनिक हेलीकॉप्टर तैयार कर सकता है।

मेडिकल डिलीवरी से बॉर्डर सर्विलांस तक; विंग्स इंडिया में AKSI Aerospace ने लॉन्च किए दो नए Skyshipper और Skywing 90 यूएवी

AKSI Aerospace drones
AKSI Aerospace Launches New Indigenous Cargo and Surveillance Drones at Wings India 2026

AKSI Aerospace drones: विंग्स इंडिया 2026 ने भारत की स्वदेशी ड्रोन इंडस्ट्री को नए पंख दिए हैं। हैदराबाद में चल रहे इस इवेंट में हैदराबाद की होमग्रोन कंपनी एकेएसआई एयरोस्पेस ने दो नए अनमैन्ड एरियल व्हीकल यानी यूएवी प्लेटफॉर्म लॉन्च किए। इनमें पहला है स्काईशिपर कार्गो ड्रोन और दूसरा स्काईविंग 90। इसके साथ ही कंपनी ने अपने पहले से चर्चित खेतपायलट एग्री एआई ड्रोन प्लेटफॉर्म को भी शोकेस किया।

विंग्स इंडिया एशिया का सबसे बड़ा सिविल एविएशन इवेंट माना जाता है, जो 28 से 31 जनवरी तक हैदराबाद में आयोजित हो रहा है। (AKSI Aerospace drones)

AKSI Aerospace drones: कौन है AKSI Aerospace

एकेएसआई एयरोस्पेस, AKSI Group का हिस्सा है और भारत की तेजी से उभरती यूएवी मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों में गिनी जाती है। यह कंपनी पूरी तरह इंडिजिनस डेवलपमेंट पर फोकस करती है। यानी डिजाइन से लेकर डेवलपमेंट और मैन्युफैक्चरिंग तक का काम भारत में ही किया जाता है।

कंपनी एग्रीकल्चर, इंडस्ट्रियल इंस्पेक्शन, कार्गो लॉजिस्टिक्स और जरूरत पड़ने पर मिलिट्री एप्लीकेशंस के लिए ड्रोन बनाती है। एकेएसआई एयरोस्पेस का अपना इन-हाउस प्रोडक्ट डेवलपमेंट सेंटर है और यह अपने ही विकसित किए गए केकेए ऑटोपायलट सिस्टम का इस्तेमाल करती है। इस सिस्टम में जियो-फेंसिंग, सेफ्टी लिमिट्स और कई तरह के बैक-अप फीचर्स दिए गए हैं, ताकि ड्रोन सुरक्षित और सटीक उड़ान भर सके। (AKSI Aerospace drones)

Skyshipper: कार्गो डिलीवरी ड्रोन

एकेएसआई एयरोस्पेस का पहला बड़ा लॉन्च है स्काईशिपर कार्गो ड्रोन। यह एक मल्टी-रोटर इलेक्ट्रिक यूएवी है, जिसे खास तौर पर कार्गो और लॉजिस्टिक्स के लिए डिजाइन किया गया है।

स्काईशिपर उन जगहों के लिए बेहद उपयोगी है, जहां जल्दी और सुरक्षित तरीके से सामान पहुंचाना जरूरी होता है। जैसे दूरदराज के इलाके, मेडिकल इमरजेंसी, दवाइयों की सप्लाई, इंडस्ट्रियल साइट्स और लास्ट-माइल डिलीवरी।

यह ड्रोन अधिकतम 52 किलो के वजन के साथ उड़ान भर सकता है और इसमें 30 किलो तक का पेलोड ले जाने की क्षमता है। एक बार चार्ज होने पर यह करीब 45 मिनट तक उड़ान भर सकता है। इसकी खासियत यह है कि यह हवा में टिककर (होवरिंग) भी काम कर सकता है, जो मेडिकल या सटीक डिलीवरी के लिए जरूरी होता है।

स्काईशिपर जैसे ड्रोन भारत में मेडिकल लॉजिस्टिक्स और ई-कॉमर्स डिलीवरी का तरीका बदल सकते हैं, खासकर पहाड़ी और ग्रामीण इलाकों में। (AKSI Aerospace drones)

AKSI Aerospace drones
AKSI Aerospace Launches New Indigenous Cargo and Surveillance Drones at Wings India 2026

Skywing 90: सर्विलांस ड्रोन

एकेएसआई एयरोस्पेस का दूसरा लॉन्च है Skywing 90। यह एक हाई-एंड्योरेंस क्वाडकॉप्टर है, यानी चार रोटर वाला ड्रोन, जिसे खास तौर पर रिकॉन्सेंस और सर्विलांस के लिए बनाया गया है।

Skywing 90 में एडवांस्ड स्टेबलाइजेशन सिस्टम दिया गया है, जिससे यह तेज हवा और मुश्किल मौसम में भी स्थिर उड़ान भर सकता है। इसमें हाई-परफॉर्मेंस इमेजिंग पेलोड लगाए जा सकते हैं, जैसे ईओ/आईआर कैमरा और हाई-रिजॉल्यूशन सेंसर।

इस तरह का ड्रोन सीमा पर निगरानी, संवेदनशील इलाकों की सुरक्षा, भीड़ पर नजर रखने और आपदा के समय स्थिति का आकलन करने में उपयोगी हो सकता है। रक्षा और सुरक्षा से जुड़े जानकारों का कहना है कि ऐसे ड्रोन ISR यानी इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉन्सेंस के लिए बेहद अहम होते जा रहे हैं। (AKSI Aerospace drones)

KhetPilot: खेती को टेक्नोलॉजी से जोड़ने की कोशिश

एकेएसआई एयरोस्पेस का KhetPilot Agri AI प्लेटफॉर्म पहले से ही कंपनी की पहचान बन चुका है। विंग्स इंडिया में इसे एक बार फिर प्रमुखता से दिखाया गया। खेतपायलट का मकसद खेती को ज्यादा स्मार्ट, सटीक और टिकाऊ बनाना है। यह प्लेटफॉर्म AI और ड्रोन टेक्नोलॉजी की मदद से फसलों की सेहत की निगरानी करता है। इससे किसान यह जान पाते हैं कि किस हिस्से में खाद या कीटनाशक की जरूरत है और कहां नहीं।

इससे न सिर्फ लागत कम होती है, बल्कि केमिकल का बेवजह इस्तेमाल भी घटता है। खेतपायलट का इस्तेमाल सीडिंग, प्रिसिजन स्प्रेइंग, अफॉरेस्टेशन और पर्यावरण से जुड़े कामों में भी किया जा रहा है। (AKSI Aerospace drones)

Explained: क्या है V-BAT Drone, जिसे भारतीय सेना ने Shield AI से खरीदा? क्यों कहा जा रहा है इसे गेम-चेंजर

V-BAT drone Indian Army
Explained: Why Indian Army’s V-BAT Drone Deal With Shield AI Is a Game-Changer

V-BAT drone Indian Army: भारतीय सेना ने ड्रोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते इस्तेमाल को देखते हुए अमेरिका की कैलिफोर्निया स्थित डिफेंस टेक्नोलॉजी कंपनी शील्ड एआई (Shield AI) के साथ एक समझौता किया है। इसके तहत भारतीय सेना को वी-बैट नाम के आधुनिक ड्रोन मिलेंगे। यह डील मेक इन इंडिया पहल के तहत की गई है और इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि ये ड्रोन आगे चलकर भारत में ही बनाए जाएंगे।

खास बात यह है कि इस समझौते में केवल ड्रोन खरीद ही शामिल नहीं है, बल्कि इसमें अत्याधुनिक ऑटोनॉमी सॉफ्टवेयर ‘हाइवमाइंड’ (Hivemind) का लाइसेंस भी शामिल है। यह सॉफ्टवेयर वी-बैट ड्रोन में इस्तेमाल होता है, क्योंकि यह ड्रोन दुश्मन के जैमिंग, जीपीएस फेल होने या कम्युनिकेशन टूटने जैसी परिस्थितियों में भी खुद से फैसले लेकर मिशन पूरा कर सकता है। (V-BAT drone Indian Army)

V-BAT drone Indian Army: क्या है V-BAT ड्रोन और क्यों है खास

वी-बैट एक ग्रुप-3 क्लास का वर्टिकल टेक-ऑफ एंड लैंडिंग (VTOL) अनमैन्ड एरियल सिस्टम है। आसान भाषा में कहें तो यह ड्रोन बिना रनवे के, बिल्कुल हेलीकॉप्टर की तरह ऊपर उठ सकता है और नीचे उतर सकता है। लेकिन उड़ान के दौरान यह फिक्स्ड-विंग विमान की तरह तेज और लंबे समय तक उड़ान भर सकता है।

भारत जैसे देश के लिए यह खास तौर पर अहम है, क्योंकि यहां हर जगह लंबे रनवे उपलब्ध नहीं हैं। पहाड़ी इलाके, जंगल, रेगिस्तान, समुद्री तट और यहां तक कि जहाजों के डेक से भी इस ड्रोन को उड़ाया जा सकता है।

V-BAT ड्रोन की सबसे बड़ी ताकत इसकी लंबी उड़ान क्षमता है। यह एक बार उड़ान भरने के बाद 12 घंटे से ज्यादा समय तक हवा में रह सकता है। इतने लंबे समय तक उड़ान का मतलब है कि यह दुश्मन की गतिविधियों पर लगातार नजर रख सकता है। (V-BAT drone Indian Army)

V-BAT drone Indian Army

किन कामों में होगा V-BAT ड्रोन का इस्तेमाल

भारतीय सेना V-BAT ड्रोन का इस्तेमाल मुख्य रूप से इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस (आईएसआर) मिशन के लिए करेगी। इन ड्रोन की मदद से सीमा पार होने वाली गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा सकेगी और दुश्मन की मूवमेंट को समय रहते पहचाना जा सकेगा। आतंकवाद विरोधी ऑपरेशंस में भी ये ड्रोन अहम भूमिका निभाएंगे, जहां दूर-दराज और संवेदनशील इलाकों में बिना सैनिक भेजे निगरानी संभव होगी। पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्रों में, जहां पहुंचना मुश्किल होता है, वहां V-BAT ड्रोन लगातार निगरानी रख सकेंगे। इसके अलावा समुद्री सीमाओं और तटीय इलाकों पर नजर रखने में भी इनका उपयोग होगा। सेना के सूत्रों के मुताबिक, हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक, भारत की हर भौगोलिक परिस्थिति में ये ड्रोन प्रभावी साबित हो सकते हैं। (V-BAT drone Indian Army)

हाइवमाइंड सॉफ्टवेयर क्यों है गेम-चेंजर

इस पूरी डील का सबसे अहम हिस्सा हाइवमाइंड ऑटोनॉमी सॉफ्टवेयर है। यह शील्ड एआई का बनाया एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सिस्टम है, जो ड्रोन को काफी हद तक इंसानी दखल के बिना काम करने की ताकत देता है।

आसान भाषा में समझें तो हाइवमाइंड ड्रोन को “सोचने और समझने” की ताकत देता है। अगर युद्ध के दौरान दुश्मन जीपीएस सिग्नल जाम कर दे या ड्रोन का कंट्रोल स्टेशन से संपर्क टूट जाए, तब भी यह ड्रोन अपने आसपास के माहौल को समझ कर खुद से रास्ता चुन सकता है, मिशन को पूरा कर सकता है और सुरक्षित तरीके से वापस लौट सकता है।

आज के आधुनिक युद्ध में, जहां इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर तेजी से बढ़ रहा है, ऐसे ऑटोनॉमस सिस्टम को बेहद अहम माना जा रहा है। (V-BAT drone Indian Army)

यूक्रेन युद्ध से मिली पहचान

V-BAT ड्रोन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान यूक्रेन युद्ध के दौरान मिली। शुरुआत में जब रूस ने भारी इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग की, तो कई ड्रोन सिस्टम प्रभावित हुए। इसके बाद शील्ड एआई ने V-BAT में हाइवमाइंड सॉफ्टवेयर को पूरी तरह इंटीग्रेट किया।

कंपनी के मुताबिक, इसके बाद यूक्रेन में इन ड्रोन ने दर्जनों मिशन सफलतापूर्वक पूरे किए। साल 2025 में ही इन ड्रोन ने 200 से ज्यादा रूसी टारगेट्स की पहचान की। इनमें एयर डिफेंस सिस्टम, मिलिट्री हेडक्वार्टर और ड्रोन कंट्रोल सेंटर्स शामिल थे। इसलिए इसे भारतीय सेना के लिए भी बेहद उपयोगी माना जा रहा है। (V-BAT drone Indian Army)

V-BAT drone Indian Army

हैदराबाद में लगेगा प्लांट

इस डील का एक और बड़ा पहलू भारत में मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ा है। दिसंबर 2025 में शील्ड एआई ने भारत की जेएसडब्ल्यू डिफेंस के साथ मिलकर हैदराबाद के ईएमसी महेश्वरम में एक अत्याधुनिक फैक्ट्री का निर्माण शुरू किया है।

इस प्रोजेक्ट में करीब 90 मिलियन डॉलर, यानी लगभग 750 करोड़ रुपये, का निवेश किया जा रहा है। यह फैक्ट्री सिर्फ भारतीय सेना की जरूरतें पूरी करने के लिए नहीं होगी, बल्कि शील्ड एआई की ग्लोबल प्रोडक्शन हब के रूप में भी काम करेगी। इससे भारत में तकनीकी विशेषज्ञता बढ़ेगी, स्थानीय सप्लाई चेन मजबूत होगी और भविष्य में भारत से दूसरे देशों को ड्रोन निर्यात करने की संभावना भी बनेगी।

शील्ड एआई की स्थापना साल 2015 में हुई थी। इसे अमेरिकी नेवी सील रह चुके ब्रैंडन सैंग ने अपने भाई और एक अन्य सहयोगी के साथ शुरू किया था। शुरुआत में कंपनी ने छोटे ड्रोन बनाए, जिन्हें सैनिकों से पहले सुरंगों और इमारतों में भेजा जाता था ताकि अंदर की स्थिति की जानकारी मिल सके।

बाद में कंपनी ने बड़े और लंबी उड़ान क्षमता वाले ड्रोन प्लेटफॉर्म पर फोकस किया और 2021 में V-BAT ड्रोन को अपने पोर्टफोलियो में शामिल किया। आज शील्ड एआई को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती डिफेंस स्टार्ट-अप कंपनियों में गिना जाता है और इसकी वैल्यूएशन करीब 5.6 बिलियन डॉलर बताई जाती है। (V-BAT drone Indian Army)

भारत के लिए क्या हैं रणनीतिक मायने

भारतीय सेना के लिए यह डील कई मायनों में बेहद अहम मानी जा रही है। इससे सेना की ड्रोन क्षमता में बड़ा इजाफा होगा और एआई आधारित सैन्य सिस्टम के क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनने में मदद मिलेगी। सीमा पर चीन और पाकिस्तान जैसे देशों की बढ़ती ड्रोन गतिविधियों के बीच यह समझौता भारत के लिए एक मजबूत रणनीतिक जवाब माना जा रहा है।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य की लड़ाइयां केवल टैंक और सैनिकों से नहीं, बल्कि ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा के दम पर लड़ी जाएंगी। ऐसे में V-BAT जैसे सिस्टम भारतीय सेना को तकनीकी रूप से आगे रखते हैं।

सूत्रों के मुताबिक, आने वाले समय में भारतीय सेना ऐसे और एडवांस ड्रोन सिस्टम को अपने बेड़े में शामिल कर सकती है। V-BAT के साथ हाइवमाइंड सॉफ्टवेयर का भारतीय पार्टनर्स के साथ साझा किया जाना देश में अपने खुद के ऑटोनॉमस मिलिटरी सिस्टम डेवलप करने का रास्ता खोल सकता है। (V-BAT drone Indian Army)

ऑपरेशन सिंदूर का असर; Budget 2026 में सेनाओं को मिल सकता है अब तक का सबसे बड़ा कैपिटल पुश

Defence stocks Budget 2026
Budget 2026 Boost: Defence Stocks Like BEL, HAL, BDL, Mazagon Dock in Focus Ahead of Higher Capital Outlay

Defence Budget 2026: बजट 2026 का काउंटडाउन शुरू हो चुका है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद यह पहला डिफेंस बजट होगा और माना जा रहा है कि सरकार इसमें भारतीय सेनाओं के लिए अब तक का सबसे बड़ा कैपिटल पुश दे सकती है। सूत्रों की मानें तो इस बार रक्षा मंत्रालय का कुल बजट 7 लाख करोड़ रुपये से ऊपर जा सकता है। केवल हथियारों और मिलिटरी इक्विपमेंट्स की खरीद के लिए रखा जाने वाला कैपिटल बजट 2 लाख करोड़ रुपये से ऊपर हो सकता है। अगर ऐसा होता है, तो यह भारत के इतिहास का सबसे बड़ा रक्षा बजट होगा।

Defence Budget 2026: ऑपरेशन सिंदूर के बाद बदली रणनीतिक सोच

ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान और पीओके में आतंकी ठिकानों पर की गई कार्रवाई के बाद सरकार यह मानकर चल रही है कि आने वाले वर्षों में सुरक्षा चुनौतियां और बढ़ेंगी। वहीं, यह चुनौतियां सिर्फ सीमाओं पर ही नहीं, बल्कि हवा, समुद्र, साइबर और अंतरिक्ष जैसे नए डोमेन में भी होंगी।

इसी बदली हुई सोच का असर बजट 2026 में दिखने की उम्मीद है। सूत्रों के मुताबिक, रक्षा मंत्रालय के लिए डबल डिजिट बढ़ोतरी, यानी कम से कम 10 फीसदी या उससे ज्यादा का इजाफा तय माना जा रहा है। (Defence Budget 2026)

क्या 7 लाख करोड़ के पार जाएगा रक्षा बजट

पिछले बजट में रक्षा मंत्रालय को करीब 6.81 लाख करोड़ रुपये मिले थे। यह रकम अपने आप में बड़ी थी, लेकिन इस बार सरकार इससे काफी आगे जाने की तैयारी में है। अगर रक्षा बजट 7 लाख करोड़ रुपये से ऊपर जाता है, तो यह न सिर्फ एक आर्थिक फैसला होगा, बल्कि एक स्ट्रैटेजिक स्टेटमेंट भी माना जाएगा कि भारत अपनी सुरक्षा को लेकर कोई समझौता नहीं करना चाहता।

इस कुल बजट में सबसे अहम हिस्सा कैपिटल एक्सपेंडिचर, यानी हथियार, फाइटर जेट, हेलीकॉप्टर, मिसाइल सिस्टम, रडार और दूसरे आधुनिक सैन्य प्लेटफॉर्म की खरीद का होगा। (Defence Budget 2026)

कैपिटल बजट में ऐतिहासिक उछाल

बजट 2025-26 में कैपिटल एक्सपेंडिचर करीब 1.80 लाख करोड़ रुपये था, जो कुल रक्षा बजट का लगभग 26 फीसदी था। बजट 2026 में यह आंकड़ा 2 लाख करोड़ रुपये से ऊपर जाने की संभावना है।

रक्षा जानकारों का मानना है कि यह बढ़ोतरी सिर्फ रकम तक सीमित नहीं होगी, बल्कि प्राथमिकताओं में भी बदलाव दिखेगा। सरकार अब ज्यादा जोर उन सिस्टम्स पर दे रही है, जो फोर्स मल्टीप्लायर की तरह काम करते हैं।

वायुसेना को मिलेगा बड़ा हिस्सा

इस बार भारतीय वायुसेना के लिए बजट खास तौर पर अहम माना जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, एयर-टू-एयर रिफ्यूलर और एयरबोर्न वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम (अवाक्स) की खरीद को लेकर तैयारी लगभग पूरी हो चुकी है।

अवाक्स ऐसे सिस्टम होते हैं, जो हवा में उड़ते हुए दुश्मन की हर गतिविधि पर नजर रखते हैं और जमीन व आसमान में मौजूद लड़ाकू विमानों को रियल टाइम जानकारी देते हैं। यही वजह है कि इन्हें फोर्स मल्टीप्लायर कहा जाता है।

बताया जा रहा है कि अवाक्स की कॉस्टिंग पहले ही हो चुकी है। इस प्रोजेक्ट में ब्राजील की भूमिका होगी, जबकि एयर-टू-एयर रिफ्यूलर के लिए अमेरिका और इजरायल से बातचीत चल रही है। (Defence Budget 2026)

राफेल डील पर भी नजर

बजट 2026 के आसपास 114 राफेल फाइटर जेट्स की खरीद पर भी बातचीत जारी है यह डील करीब 30 बिलियन यूरो की बताई जा रही है। हालांकि इसके मार्च 2027 तक फाइनल होने की सिर्फ हल्की संभावना जताई जा रही है।

अभी इस डील को डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) से मंजूरी मिलनी बाकी है, जिसकी अध्यक्षता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह करते हैं। उसके बाद कीमत पर बातचीत और स्वदेशी कंटेंट को लेकर लंबी प्रक्रिया होगी।

फिर भी, बजट 2026 में इस डील के लिए कुछ प्रोविजन या संकेत देखने को मिल सकते हैं।

स्वदेशी इंजन प्रोजेक्ट को मिलेगा फंड

रक्षा बजट 2026 में एक और अहम एलिमेंट एयरक्राफ्ट इंजन डेवलपमेंट होगा। इसे सफरान और डीआरडीओ के सहयोग से तैयार किया जाएगा। यह प्रोजेक्ट करीब 3 बिलियन यूरो का हो सकता है।

इसका मकसद भारत में आधुनिक फाइटर जेट इंजन डेवलप करना है, ताकि देश को भविष्य में विदेशी इंजनों पर निर्भर न रहना पड़े। सूत्रों के मुताबिक, इस प्रोजेक्ट से जुड़ा नोट कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी के लिए तैयार किया जा रहा है।

अगर बजट में इसके लिए फंडिंग का साफ संकेत मिलता है, तो इसे आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ा कदम माना जाएगा। (Defence Budget 2026)

पिछले पांच सालों का रहा है ट्रेंड

पिछले पांच सालों में भारत के रक्षा बजट में लगातार बढ़ोतरी देखने को मिली है। वित्त वर्ष 2021 में भारत का रक्षा खर्च करीब 4.85 लाख करोड़ रुपये था। इसके बाद हर साल इसमें इजाफा होता गया और वित्त वर्ष 2025 (संशोधित अनुमान) में यह बढ़कर लगभग 6.41 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया। वहीं, वित्त वर्ष 2026 के बजट अनुमान में रक्षा खर्च को 6.81 लाख करोड़ रुपये रखा गया है। (Defence Budget 2026)

5 साल में 2 लाख करोड़ रुपये बढ़ा बजट

इन आंकड़ों से यह साफ है कि बीते पांच वर्षों में रक्षा बजट करीब 2 लाख करोड़ रुपये तक बढ़ चुका है। खासतौर पर हाल के सालों में इसमें तेजी आई है, जिसकी वजह सीमाओं पर तनाव, बदलते वैश्विक हालात और युद्ध के नए स्वरूप हैं। सरकार अब यह मानकर चल रही है कि भविष्य की चुनौतियों के लिए पहले से मजबूत तैयारी जरूरी है।

इस बढ़ते बजट के साथ सरकार का जोर सिर्फ खर्च बढ़ाने पर नहीं, बल्कि सेना के मॉर्डनाइजेशन पर भी है। बजट 2025-26 को लेकर पीआईबी की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक, कुल रक्षा बजट का करीब 26 फीसदी यानी लगभग 1.80 लाख करोड़ रुपये कैपिटल खर्च के लिए रखा गया था। इस राशि का इस्तेमाल हथियारों, सैन्य उपकरणों और नई तकनीक की खरीद पर किया जाना है।

इस कैपिटल बजट में खास बात यह रही कि आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत घरेलू खरीद को प्राथमिकता दी गई। इसका मतलब यह है कि सेना की जरूरतों को पूरा करने के लिए भारतीय कंपनियों से ज्यादा से ज्यादा खरीद की जा रही है। इसमें सरकारी रक्षा कंपनियों के साथ-साथ निजी क्षेत्र की भागीदारी भी लगातार बढ़ रही है। (Defence Budget 2026)

मॉडर्नाइजेशन पर बढ़ता फोकस

इन बढ़ते आंकड़ों के पीछे सिर्फ खर्च बढ़ाने की सोच नहीं है। सरकार का साफ फोकस मॉडर्नाइजेशन पर है। पिछले बजट में कैपिटल बजट का बड़ा हिस्सा घरेलू इंडस्ट्री से खरीद के लिए रिजर्व रखा गया था। इसमें सरकारी कंपनियों के साथ-साथ प्राइवेट सेक्टर को भी मौका दिया गया।

आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत अब कोशिश है कि ज्यादा से ज्यादा हथियार और सिस्टम देश में ही बनें। (Defence Budget 2026)

इंडस्ट्री की मांग: 30 फीसदी कैपिटल बजट

उद्योग संगठन फिक्की ने बजट 2026 से पहले सरकार को सुझाव दिया है कि रक्षा बजट में कैपिटल एक्सपेंडिचर का हिस्सा 30 फीसदी तक बढ़ाया जाए। फिक्की का कहना है कि भविष्य की लड़ाइयां टेक्नोलॉजी आधारित होंगी, जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन, साइबर और स्पेस कैपेबिलिटी अहम भूमिका निभाएंगी। इसके लिए पारंपरिक हथियारों से आगे सोचने की जरूरत है। (Defence Budget 2026)

रिसर्च, टेक्नोलॉजी और एक्सपोर्ट पर नजर

बजट 2026 से उम्मीद की जा रही है कि इसमें डीआरडीओ के लिए ज्यादा फंड दिया जाएगा। कुछ सुझावों में डीआरडीओ के बजट में 10 हजार करोड़ रुपये की बढ़ोतरी की बात कही गई है। इसके अलावा ड्रोन, यूएवी, साइबर डिफेंस और स्पेस सिस्टम्स के लिए भी अलग से प्रावधान हो सकते हैं।

रक्षा निर्यात भी सरकार की प्राथमिकता में है। आंकड़ों के मुताबिक, 2016-17 से 2023-24 के बीच भारत के रक्षा निर्यात में 46 फीसदी की सालाना बढ़ोतरी दर्ज की गई है। सरकार का लक्ष्य 2028-29 तक इसे 50 हजार करोड़ रुपये तक ले जाने का है। (Defence Budget 2026)

भारत में बनेंगे कमर्शियल पैसेंजर जेट, सुपरजेट-100 को लेकर HAL और रूस की UAC ने साइन की डील

HAL UAC Superjet 100 India
HAL, Russia’s UAC Sign Historic Deal to Produce Superjet-100 Commercial Aircraft in India

HAL UAC Superjet 100 India: भारत के सिविल एविएशन सेक्टर के लिए अच्छी खबर है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड और रूस की सरकारी एयरोस्पेस कंपनी यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन (UAC) के बीच एक अहम समझौता हुआ है। इस समझौते के तहत भारत में सुपरजेट-100 पैसेंजर एयरक्राफ्ट के लाइसेंस्ड प्रोडक्शन पर मिलकर काम किया जाएगा। इससे एक दिन पहले ही ब्राजील की जानी-मानी ग्लोबल एयरोस्पेस कंपनी एम्ब्रेयर और अदाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस के बीच एक अहम एमओयू पर दस्तखत किए गए। इस समझौते का मकसद भारत में इंटीग्रेटेड रीजनल ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट इकोसिस्टम तैयार करना है।

यह डील विंग्स इंडिया 2026 इवेंट के दौरान साइन हुई और इसे भारत में कमर्शियल पैसेंजर विमान निर्माण की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। (HAL UAC Superjet 100 India)

HAL UAC Superjet 100 India: क्या है सुपरजेट-100

सुपरजेट-100 एक रीजनल पैसेंजर जेट है, जिसे खास तौर पर छोटे और मध्यम दूरी के रूट्स के लिए डिजाइन किया गया है। इस विमान में करीब 87 से 108 यात्री सफर कर सकते हैं और इसकी रेंज लगभग 3,500 से 4,000 किलोमीटर तक है।

भारत जैसे देश में, जहां टियर-2 और टियर-3 शहरों के बीच हवाई कनेक्टिविटी तेजी से बढ़ रही है, ऐसे रीजनल जेट की मांग आने वाले समय में और बढ़ सकती है। (HAL UAC Superjet 100 India)

सर्टिफिकेशन और वैलिडेशन में मदद करेगा एचएएल

इस समझौते के मुताबिक, एचएएल भारत में सुपरजेट-100 के प्रोडक्शन, सेल्स और मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल यानी एमआरओ से जुड़ी जिम्मेदारी संभालेगा। साथ ही, एचएएल भारत में इस विमान के लिए डीजीसीए सर्टिफिकेशन और वैलिडेशन की प्रक्रिया में भी अहम भूमिका निभाएगा।

शुरुआत में भारत में असेंबली से काम शुरू किया जा सकता है, जिसे आगे चलकर फुल प्रोडक्शन तक ले जाने की संभावना है। (HAL UAC Superjet 100 India)

UAC देगी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर

रूस की यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन इस प्रोजेक्ट में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, डिजाइन सपोर्ट, प्रोडक्शन फैसिलिटी अपग्रेड और तकनीकी विशेषज्ञों की मदद उपलब्ध कराएगी। भारत में बनने वाला सुपरजेट-100 वर्जन पूरी तरह रूसी कंपोनेंट्स पर आधारित होगा, जिससे यह पश्चिमी प्रतिबंधों से प्रभावित नहीं होगा। इस विमान में पीडी-8 इंजन और रूसी एवियोनिक्स का इस्तेमाल किया जाएगा। (HAL UAC Superjet 100 India)

HAL UAC Superjet 100 India
HAL, Russia’s UAC Sign Historic Deal to Produce Superjet-100 Commercial Aircraft in India

भारत के लिए क्यों है यह डील अहम

भारत में पिछले कई दशकों से कोई भी कमर्शियल पैसेंजर जेट नहीं बना है। 1980 के दशक में एवरो एयरक्राफ्ट के बाद यह पहला मौका होगा जब भारत दोबारा पैसेंजर जेट निर्माण की दिशा में आगे बढ़ेगा।

यह प्रोजेक्ट आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया जैसे अभियानों को मजबूती देगा। इसके साथ ही एयरोस्पेस सेक्टर में स्किल्ड नौकरियों के नए अवसर पैदा होंगे और भारत को ग्लोबल एविएशन सप्लाई चेन में जगह मिल सकती है। (HAL UAC Superjet 100 India)

सिविल एविएशन पर एचएएल कर रहा फोकस

एचएएल के सीएमडी डॉ. डी.के. सुनील पहले ही कह चुके हैं कि आने वाले 10 सालों में कंपनी अपने कुल टर्नओवर का करीब एक-चौथाई हिस्सा सिविल एविएशन से हासिल करना चाहती है। इसी दिशा में नासिक या कानपुर यूनिट में सिविल एयरक्राफ्ट मैन्युफैक्चरिंग की संभावनाओं पर भी विचार किया जा रहा है। (HAL UAC Superjet 100 India)

तेजस एमके-1ए पर HAL का बड़ा अपडेट, पांच फाइटर जेट तैयार, मार्च 2026 तक IAF को डिलीवरी

Tejas Mk-1A delivery
HAL Confirms 5 Tejas Mk-1A Fighters Ready, Missile Trials Completed; IAF Induction Awaited

Tejas Mk-1A delivery: स्वदेशी फाइटर जेट तेजस एमके-1ए को लेकर हो रही देरी के बीच हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड की ओर से एक अहम बयान सामने आया है। एचएएल के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. डी.के. सुनील ने कहा है कि तेजस एमके-1ए के पांच विमान पूरी तरह तैयार हैं और इन पर जरूरी फायरिंग और मिसाइल ट्रायल पूरे किए जा चुके हैं। हालांकि उन्हें डिलीवरी की कोई तय तारीख नहीं बताई है।

एचएएल अब भारतीय वायुसेना से संपर्क करेगा ताकि इन पांच विमानों को मौजूदा वित्त वर्ष के दौरान ही वायुसेना में शामिल किया जा सके। अगर यह होता है, तो यह तेजस एमके-1ए प्रोग्राम के लिए एक बड़ा मोड़ माना जाएगा।

Tejas Mk-1A delivery: ट्रायल पूरे, इंडक्शन की प्रक्रिया शुरू

एचएएल चीफ के मुताबिक, जिन पांच तेजस एमके-1ए विमानों की बात हो रही है, उन पर एयर-टू-एयर हथियारों के ट्रायल, मिसाइल फायरिंग और जरूरी फ्लाइट टेस्ट सफलतापूर्वक पूरे किए जा चुके हैं। इन विमानों को ऑपरेशनल जरूरतों के हिसाब से तैयार किया गया है और अब वे वायुसेना में शामिल किए जाने के लिए तैयार हैं।

तेजस एमके-1ए, तेजस के पुराने वर्जन की तुलना में कहीं ज्यादा एडवांस है। इसमें एईएसए रडार, बेहतर इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम, आधुनिक एवियोनिक्स और ज्यादा हथियार ले जाने की क्षमता जैसे कई अहम अपग्रेड शामिल हैं।

वायुसेना के लिए क्यों अहम है तेजस एमके-1ए

भारतीय वायुसेना इस समय फाइटर स्क्वाड्रन की कमी से जूझ रही है। कई पुराने विमान रिटायर हो चुके हैं और कुछ को चरणबद्ध तरीके से हटाया जा रहा है। तेजस एमके-1ए को खास तौर पर पुराने मिग-21 विमानों की जगह लेने के लिए तैयार किया गया है।

ऐसे में तेजस एमके-1ए की हर डिलीवरी वायुसेना के लिए ऑपरेशनल तौर पर बेहद अहम है। लेकिन पिछले कुछ सालों में इस प्रोग्राम की समयसीमा बार-बार आगे खिसकती रही है। पहले अक्टूबर में डिलीवरी की बात कही गई, फिर 2025 के अंत तक का भरोसा दिया गया और बाद में मार्च 2026 तक डिलीवरी करने की बात कही गई है।

देरी की यह है वजह

डिफेंस सूत्रों के मुताबिक, तेजस एमके-1ए की डिलीवरी में देरी की सबसे बड़ी वजह हथियारों का इंटीग्रेशन, सर्टिफिकेशन और फ्लाइट ट्रायल रहे हैं। एचएएल का कहना है कि किसी भी लड़ाकू विमान को बिना पूरी जांच और ट्रायल के सौंपना सुरक्षित नहीं होता, इसलिए हर चरण में सावधानी बरतना जरूरी है।

एचएएल यह भी दोहराता रहा है कि शुरुआती डिलीवरी में देरी के बावजूद तेजस एमके-1ए लंबी अवधि में भारतीय वायुसेना के लिए एक मजबूत और भरोसेमंद प्लेटफॉर्म साबित होगा।

बीटिंग रिट्रीट 2026 में वाद्य यंत्रों के नाम पर होंगे सीटिंग एनक्लोजर, विजय चौक पर गूंजेंगी ‘विजयी भारत’ की धुनें

Beating Retreat Ceremony 2026

Beating Retreat Ceremony 2026: गणतंत्र दिवस की परेड के बाद हर साल जिस कार्यक्रम का देश को बेसब्री से इंतजार रहता है, वह है बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी है। यह कार्यक्रम गणतंत्र दिवस समारोह का औपचारिक समापन माना जाता है। 29 जनवरी को होने वाली बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी इस बार भी खास होने जा रही है।

77वें गणतंत्र दिवस समारोह के समापन अवसर पर होने वाली इस सेरेमनी में भारतीय सेना, भारतीय नौसेना, भारतीय वायु सेना और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) के बैंड एक साथ प्रस्तुति देंगे। (Beating Retreat Ceremony 2026)

Beating Retreat Ceremony 2026: क्या होती है बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी

बीटिंग रिट्रीट एक पुरानी सैन्य परंपरा है। इसका इतिहास सदियों पुराना है। पहले के समय में जब युद्ध के बाद शाम ढलने लगती थी, तब सैनिकों को संकेत दिया जाता था कि अब लड़ाई रोक दी जाए और सभी सैनिक अपने-अपने शिविरों में लौट आएं। इसी परंपरा को बीटिंग रिट्रीट कहा गया।

भारत में यह परंपरा आज भी सम्मान के साथ निभाई जाती है। गणतंत्र दिवस के तीन दिन बाद, यानी 29 जनवरी को राष्ट्रपति की मौजूदगी में यह सेरेमनी होती है। इसे भारतीय सेनाओं की एकता, अनुशासन और गौरव का प्रतीक माना जाता है। (Beating Retreat Ceremony 2026)

विजय चौक पर होगा भव्य आयोजन

29 जनवरी की शाम को विजय चौक पूरी तरह रोशनी और संगीत से जगमगा उठेगा। कार्यक्रम में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, केंद्रीय मंत्री, वरिष्ठ अधिकारी और बड़ी संख्या में आम नागरिक मौजूद रहेंगे।

सेरेमनी की शुरुआत होते ही विजय चौक और रायसीना हिल्स का इलाका देशभक्ति के रंग में रंग जाएगा। जैसे-जैसे सूर्य अस्त होगा, संगीत की धुनें माहौल को और भावुक बना देंगी। (Beating Retreat Ceremony 2026)

भारतीय वाद्य यंत्रों के नाम पर सीटिंग एनक्लोजर

बीटिंग रिट्रीट 2026 की एक खास बात यह भी है कि इस बार विजय चौक के सीटिंग एनक्लोजर को भारतीय वाद्य यंत्रों के नाम दिए गए हैं। इनमें बांसुरी, डमरू, एकतारा, एसराज, मृदंगम, नगाड़ा, पखावज, संतूर, सारंगी, सरिंदा, सरोद, शहनाई, सितार, सुरबहार, तबला और वीणा शामिल हैं।

‘कदम कदम बढ़ाए जा’ से होगी शुरुआत

बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी की शुरुआत मास्ड बैंड द्वारा बजाई जाने वाली मशहूर धुन ‘कदम कदम बढ़ाए जा’ से होगी। यह धुन आजाद हिंद फौज से जुड़ी रही है। इसके बाद अलग-अलग बैंड अपनी प्रस्तुतियां देंगे। पाइप्स एंड ड्रम्स बैंड ‘अतुल्य भारत’, ‘वीर सैनिक’, ‘मिली झुली’, ‘नृत्य सरिता’, ‘मारूनी’ और ‘झेलम’ जैसी धुनें बजाएगा। इन धुनों में भारतीय संस्कृति और सैन्य गौरव की झलक साफ दिखाई देगी।

वहीं पिछले साल 2025 में पाइप्स एंड ड्रम्स सेक्शन में ‘अमर भारती’, ‘इंद्रधनुष’, ‘जय जनम भूमि’, ‘नाती इन हिमालयन वैली’, ‘गंगा जमुना’ और ‘वीर सियाचिन’ जैसी धुनें बजाई गई थीं। (Beating Retreat Ceremony 2026)

तीनों सेनाओं की ये होंगी धुनें

भारतीय वायु सेना का बैंड ‘ब्रेव वॉरियर’, ‘ट्वाइलाइट’, ‘अलर्ट’ और ‘फ्लाइंग स्टार’ जैसी धुनें बजाएगा। इन संगीत रचनाओं में वायु सेना की ताकत, सतर्कता और आकाश में भारत की सुरक्षा का संदेश छिपा होगा।

वहीं, भारतीय नौसेना का बैंड ‘नमस्ते’, ‘सागर पवन’, ‘मातृभूमि’, ‘तेजस्वी’ और ‘जय भारती’ जैसी धुनों से समंदर में भारत की ताकत और शांति का संदेश देगा।

इसके बाद भारतीय सेना का बैंड ‘विजयी भारत’, ‘आरंभ है प्रचंड है’, ‘ऐ वतन ऐ वतन’, ‘आनंद मठ’, ‘सुगम्य भारत’ और ‘सितारे हिंद’ जैसी भावुक और जोशीली धुनें बजाएगा। यह हिस्सा अक्सर दर्शकों को भावुक कर देता है।

केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के बैंड ‘विजय भारत’, ‘हथरोही’, ‘जय हो’ और ‘वीर सिपाही’ जैसी धुनें पेश करेंगे। ये धुनें देश की आंतरिक सुरक्षा में लगे जवानों के साहस और समर्पण को दर्शाती हैं। (Beating Retreat Ceremony 2026)

‘सारे जहां से अच्छा’ के साथ होगा समापन

कार्यक्रम के आखिरी हिस्से में मास्ड बैंड एक साथ ‘भारत के शान’, ‘वंदे मातरम’ और ‘ड्रमर्स कॉल’ बजाएंगे। इसके बाद बग्लर्स द्वारा बजाई जाने वाली धुन ‘सारे जहां से अच्छा’ के साथ सेरेमनी का समापन होगा।

ये होंगे बैंड कंडक्टर

इस साल बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी के प्रिंसिपल कंडक्टर स्क्वाड्रन लीडर लेइमापोकपाम रूपचंद्र सिंह होंगे। भारतीय सेना बैंड के कंडक्टर सुबेदार मेजर प्रकाश जोशी, नौसेना बैंड के कंडक्टर एम. एंटनी, वायु सेना बैंड के कंडक्टर वारंट ऑफिसर अशोक कुमार और सीएपीएफ बैंड के कंडक्टर इंस्पेक्टर चेतराम होंगे। जबकि पाइप्स एंड ड्रम्स बैंड का संचालन सुबेदार एस. पी. चौरसिया करेंगे, जबकि बग्लर्स की कमान सुबेदार मनोज कुमार के हाथों में होगी। (Beating Retreat Ceremony 2026)

क्या युद्ध में घायल सैनिकों को टोल टैक्स में नहीं है छूट? जानें क्या कहते हैं NHAI के नियम

Disabled War Veteran Toll Tax Exemption India
Toll Tax Exemption for Disabled War Veterans: What Indian Rules Say and Where the System Failed

Disabled War Veteran Toll Tax Exemption India: गणतंत्र दिवस के दौरान व्हीलचेयर पर बैठे एक पूर्व सैनिक का वीडियो आजकल खूब वायरल हो रहा है। इस वीडियो में एक व्हीलचेयर पर बैठे पूर्व पैरा कमांडो टोल बूथ पर कर्मचारियों से बहस करते दिखाई देते हैं। वे खुद को ऑपरेशन पराक्रम के दौरान घायल हुआ सैनिक बताते हैं और हाथ में एक आधिकारिक पत्र दिखाते हुए कहते हैं कि उन्हें टोल टैक्स से छूट मिली हुई है। इसके बावजूद उनसे टोल मांगा गया।

इस वीडियो के सामने आने के बाद सवाल उठ रहे हैं कि क्या डिसेबल्ड वॉर वेटरन (युद्ध में घायल पूर्व सैनिक) को टोल टैक्स की छूट मिलती है? यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि अक्सर टोल बूथ पर नियमों की अलग-अलग व्याख्या की जाती है, जिससे सैनिकों और उनके परिवारों को परेशानी झेलनी पड़ती है।

Disabled War Veteran Toll Tax Exemption India: क्या है पूरा मामला

वीडियो में दिख रहे पूर्व सैनिक अपना नाम श्यामराज बताते हैं। वे कहते हैं कि वे भारतीय सेना के पैरा कमांडो रह चुके हैं और ऑपरेशन पराक्रम के दौरान घायल हुए थे, जिसकी वजह से आज वे व्हीलचेयर पर हैं। वीडियो में वे कर्नाटक के उद्भि, शश्ताना टोल बूथ पर हैं। उनके हाथ में एक पत्र है, जिसमें उनकी पत्नी की पोस्टिंग के दौरान निजी वाहन को ले जाने की अनुमति और टैक्स से छूट की बात कही गई है।

श्यामराज का कहना है कि इस टोल बूथ तक पहुंचने से पहले वे कई अन्य टोल प्लाजा पार कर चुके थे, जहां उन्हें बिना किसी भुगतान के आगे जाने दिया गया। लेकिन शश्ताना टोल बूथ पर कर्मचारियों ने उनसे पैसे मांगे और कहा कि बिना टोल दिए वे आगे नहीं जा सकते। इसी बहस के दौरान वे भावुक होकर कहते हैं, “मैं भिखारी नहीं हूं। मैं भीख नहीं मांग रहा, मैं सिर्फ अपने अधिकार की बात कर रहा हूं।”

सोशल मीडिया पर क्यों भड़का मामला

यह वीडियो सबसे पहले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर शेयर किया गया। इसे शेयर करने वाली महिला मेघना गिरीश खुद एक शहीद की मां हैं। उन्होंने अपनी पोस्ट में लिखा कि गणतंत्र दिवस से ठीक एक दिन पहले एक डिसेबल्ड वॉर हीरो से टोल वसूला जाना बेहद शर्मनाक है। उन्होंने केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और रक्षा मंत्रालय को टैग करते हुए इस मामले में हस्तक्षेप की मांग की।

वीडियो के वायरल होते ही हजारों लोग पूर्व सैनिक के समर्थन में आ गए। सोशल मीडिया पर लोगों ने सवाल उठाया कि जब नेता, अधिकारी और वीआईपी काफिले बिना टोल दिए निकल जाते हैं, तो देश के लिए लड़कर घायल हुए सैनिक से पैसे क्यों मांगे जा रहे हैं।

क्या कहते हैं नियम: किसे मिलती है टोल टैक्स से छूट

नेशनल हाईवे पर टोल टैक्स से छूट से जुड़े नियम नेशनल हाईवे फीस रूल्स के तहत आते हैं। इन नियमों के अनुसार, सेवारत आर्मी, नेवी और एयर फोर्स के जवानों को, जब वे आधिकारिक ड्यूटी या पोस्टिंग के सिलसिले में यात्रा कर रहे हों और उनके पास निर्धारित दस्तावेज हों, तब टोल टैक्स से छूट मिलती है।

आमतौर पर यह छूट उसी स्थिति में लागू मानी जाती है, जब वाहन किसी सेवारत सैन्य अधिकारी के नाम पर हो और यात्रा सीधे तौर पर ड्यूटी या ट्रांसफर से जुड़ी हो।

पूर्व सैनिकों को लेकर क्या हैं नियम

विवाद की सबसे बड़ी वजह यही है। नियमों के तहत पूर्व सैनिकों यानी एक्स-सर्विसमैन के लिए टोल टैक्स छूट को लेकर स्पष्ट गाइडलाइंस नहीं हैं। कई टोल बूथों पर कर्मचारी यह मानते हैं कि छूट केवल नौकरी कर रहे जवानों के लिए है, न कि रिटायर्ड या पूर्व सैनिकों के लिए है।

वहीं, कई पूर्व सैनिक संगठनों और रिटायर्ड अधिकारियों का कहना है कि अगर कोई सैनिक युद्ध में घायल हुआ है और उसके पास सरकारी पत्र मौजूद है, तो उसे नियमों के साथ-साथ इंसानियत और सम्मान के आधार पर भी छूट मिलनी चाहिए।

Disabled War Veteran Toll Tax Exemption India

मिली थी छूट फिर भी मांगा टोल

रिटायर्ड मेजर डीपी सिंह केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए जारी एक पत्र का उल्लेख करते हैं। यह पत्र पूर्व सैनिक श्यामराज की अर्टिगा गाड़ी को लेकर हैं। इस पत्र में साफ तौर पर बताया गया है कि संबंधित सैन्य अधिकारी की गाड़ी को टोल टैक्स से छूट दी गई है। प्रमाण पत्र के अनुसार, लेफ्टिनेंट कर्नल शिवप्रिय एस भारतीय सेना के आधिकारिक आदेश के तहत वेलिंगटन (तमिलनाडु) से दिल्ली स्थायी पोस्टिंग के लिए जा रही हैं। यह पोस्टिंग सेना मुख्यालय, रक्षा मंत्रालय (आर्मी) के पत्र संख्या 8/70034/P/DGMS-4A दिनांक 17 नवंबर 2025 के आधार पर है।

इस यात्रा के दौरान लेफ्टिनेंट कर्नल शिवप्रिय एस की निजी कार, मारुति अर्टिगा (रजिस्ट्रेशन नंबर UP-32-JE-2372), को नेशनल हाईवे एक्ट 1956 के तहत टोल टैक्स के भुगतान से पूरी तरह छूट दी गई है।

प्रमाण पत्र में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यह वाहन एक सेवारत सैन्य अधिकारी का है और किसी भी प्रकार की बिक्री या व्यावसायिक उपयोग के लिए नहीं है। इसी कारण यह वाहन पूरे रास्ते में सभी तरह के टैक्स, सेस, लेवी, टोल, एक्साइज, पाथ-कर और ऑक्ट्रॉय से मुक्त रहेगा।

यह छूट भारतीय टोल टैक्स नियमों के तहत दी गई है, जो आर्मी और एयर फोर्स एक्ट 1902, एक्ट 1923, आर्टिकल 00 सेक्शन 1530 और रेगुलेशन 1990 (समय-समय पर संशोधित) के अंतर्गत लागू होते हैं।

एनएचएआई ने जारी किया बयान

मामला बढ़ने के बाद एनएचएआई के बेंगलुरु रीजनल ऑफिस ने इस पर आधिकारिक बयान जारी किया। एनएचएआई ने कहा कि टोल टैक्स से छूट केवल सर्विंग मिलिटरी पर्सनल को मिलती है। इस मामले में संबंधित व्यक्ति एक्स-आर्मी पर्सनल था, इसलिए वह नियमों के तहत पात्र नहीं था। साथ ही यह भी कहा गया कि प्रस्तुत किए गए दस्तावेज निर्धारित मानकों से मेल नहीं खाते थे।

हालांकि, एनएचएआई ने यह भी स्पष्ट किया कि व्यक्ति के घायल सैनिक होने की बात सामने आने और अनावश्यक देरी से बचने के लिए उसे बिना टोल भुगतान के आगे जाने दिया गया। पूरे मामले की अलग से जांच किए जाने की बात भी कही गई।

बयान के बाद भी नहीं थमा गुस्सा

एनएचएआई के बयान के बाद भी लोगों का गुस्सा शांत नहीं हुआ। एक रिटायर्ड मेजर ने सोशल मीडिया पर लिखा कि अगर एक व्हीलचेयर पर बैठे युद्ध में घायल सैनिक के साथ भी सिर्फ “टेक्निकल नियम” देखकर व्यवहार किया जाएगा, तो यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। कई लोगों ने यह भी पूछा कि अगर नियम इतने ही कड़े हैं, तो फिर नेताओं और वीआईपी काफिलों को टोल से छूट कैसे मिल जाती है।

पूर्व सैनिकों का मानना है कि विकलांग युद्ध सैनिकों के लिए टोल टैक्स नियमों में साफ और मानवीय प्रावधान होने चाहिए। इसके साथ ही टोल कर्मचारियों को ऐसे मामलों में कॉमन सेंस और संवेदनशीलता की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए। विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि अगर किसी सैनिक को छूट का पत्र जारी किया जाता है, तो उसका सम्मान हर टोल बूथ पर एक समान रूप से होना चाहिए।

क्या है बांग्लादेश-चीन ड्रोन डील, भारत की पूर्वी सीमा और बंगाल की खाड़ी के लिए क्यों है चिंता की बात?

Bangladesh China Drone Deal
Bangladesh–China Drone Manufacturing Deal: Strategic Implications for India’s Eastern Security

Bangladesh China Drone Deal: बांग्लादेश और चीन एक दूसरे के करीब आ रहे हैं। बांग्लादेश एयर फोर्स (बीएएफ) और चीन की सरकारी कंपनी चाइना इलेक्ट्रॉनिक्स टेक्नोलॉजी ग्रुप कॉरपोरेशन इंटरनेशनल (सीईटीसी इंटरनेशनल) के बीच ड्रोन बनाने और तकनीकी सहयोग को लेकर एक अहम डील हुई है। इस समझौते के तहत बांग्लादेश में पहली बार बड़े स्तर पर अनमैन्ड एरियल व्हीकल (यूएवी) यानी ड्रोन बनाने और असेंबल करने की सुविधा बनाई जाएगी। इसके साथ ही चीन की ओर से टेक्नोलॉजी ट्रांसफर भी किया जाएगा, जिससे बांग्लादेश भविष्य में ड्रोन उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर बन सके।

यह समझौता सरकार-से-सरकार (जी-टू-जी) के तहत किया गया है। इसका मतलब यह है कि यह सिर्फ दो कंपनियों का नहीं, बल्कि सीधे तौर पर दोनों देशों की सरकारों के बीच हुआ करार है। समझौते पर हस्ताक्षर ढाका कैंटोनमेंट में स्थित एयर फोर्स हेडक्वार्टर में किए गए। इस मौके पर बांग्लादेश वायु सेना के प्रमुख एयर चीफ मार्शल हसन महमूद खान मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहे। (Bangladesh China Drone Deal)

Bangladesh China Drone Deal: बांग्लादेश में बनेगा आधुनिक ड्रोन प्लांट

इस समझौते के तहत बांग्लादेश वायु सेना और सीईटीसी इंटरनेशनल मिलकर देश में एक स्टेट-ऑफ-द-आर्ट यूएवी मैन्युफैक्चरिंग और असेंबली प्लांट बनाएंगे। यह प्लांट आधुनिक तकनीक से लैस होगा और यहां अलग-अलग तरह के ड्रोन बनाए और जोड़े जाएंगे। बांग्लादेश की सेना का कहना है कि यह सिर्फ एक फैक्ट्री नहीं होगी, बल्कि देश के लिए एक नई तकनीकी नींव तैयार करेगी।

इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य बांग्लादेश को ड्रोन तकनीक में आत्मनिर्भर बनाना है। अभी तक बांग्लादेश को ड्रोन और इससे जुड़ी तकनीक के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ता था। अब यह निर्भरता धीरे-धीरे कम की जाएगी। (Bangladesh China Drone Deal)

टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और स्किल डेवलपमेंट पर जोर

समझौते का एक अहम हिस्सा टेक्नोलॉजी ट्रांसफर है। इसके तहत सीईटीसी इंटरनेशनल बांग्लादेश को ड्रोन डिजाइन, निर्माण, असेंबली और टेस्टिंग से जुड़ी तकनीक उपलब्ध कराएगी। इसके साथ-साथ बांग्लादेशी इंजीनियरों, तकनीशियनों और सैन्य कर्मियों को विशेष ट्रेनिंग दी जाएगी।

किस तरह के ड्रोन बनाए जाएंगे

शुरुआती चरण में बांग्लादेश वायु सेना को दो तरह के ड्रोन बनाने और असेंबल करने की क्षमता मिलेगी। पहला है मीडियम एल्टीट्यूड लो एंड्योरेंस (मेल) यूएवी। ये ड्रोन मध्यम ऊंचाई पर उड़ान भरते हैं और सीमित समय तक हवा में रह सकते हैं। इन्हें निगरानी, टोही और सीमित सैन्य अभियानों के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

दूसरा प्रकार है वर्टिकल टेक-ऑफ एंड लैंडिंग (वीटॉल) ड्रोन। इन ड्रोन की खासियत यह होती है कि इन्हें उड़ान भरने और उतरने के लिए लंबे रनवे की जरूरत नहीं होती। ये सीधे ऊपर उठ सकते हैं और नीचे उतर सकते हैं। ऐसे ड्रोन घनी आबादी वाले इलाकों, पहाड़ी क्षेत्रों और आपदा प्रभावित क्षेत्रों में बेहद उपयोगी माने जाते हैं।

इसके अलावा, इस परियोजना के तहत बांग्लादेश वायु सेना भविष्य में अपने खुद के ड्रोन प्लेटफॉर्म भी विकसित करेगी। यानी सिर्फ असेंबली तक सीमित न रहकर डिजाइन और डेवलपमेंट की क्षमता भी धीरे-धीरे बढ़ाई जाएगी। (Bangladesh China Drone Deal)

सैन्य के साथ मानवीय कामों में भी इस्तेमाल

इन ड्रोन का इस्तेमाल सिर्फ सैन्य अभियानों तक सीमित नहीं रहेगा। बांग्लादेश वायु सेना ने साफ किया है कि ये यूएवी ह्यूमैनिटेरियन असिस्टेंस और डिजास्टर मैनेजमेंट में भी काम आएंगे। बांग्लादेश एक ऐसा देश है, जो अक्सर बाढ़, चक्रवात और प्राकृतिक आपदाओं का सामना करता है।

ड्रोन की मदद से आपदा प्रभावित इलाकों की निगरानी, राहत सामग्री पहुंचाने, लोगों की स्थिति का आकलन करने और सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन में तेजी लाई जा सकती है।

समझौते पर हस्ताक्षर के दौरान बांग्लादेश में चीन के राजदूत याओ वेन, आर्म्ड फोर्सेस डिवीजन के प्रिंसिपल स्टाफ ऑफिसर लेफ्टिनेंट जनरल एस.एम. कमरुल हसन, चीफ एडवाइजर ऑफिस के सेक्रेटरी एमडी सैफुल्लाह पन्ना, विधायी और संसदीय मामलों के सेक्रेटरी डॉ. हाफिज अहमद चौधरी शामिल थे। इसके अलावा बांग्लादेश वायु सेना के वरिष्ठ अधिकारी, सीईटीसी इंटरनेशनल के प्रतिनिधि और कई मंत्रालयों के अधिकारी भी इस कार्यक्रम में मौजूद थे। (Bangladesh China Drone Deal)

बांग्लादेश-चीन रक्षा सहयोग की अगली कड़ी

यह समझौता बांग्लादेश और चीन के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग की एक और कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। पिछले कुछ सालों में बांग्लादेश ने अपने रक्षा आधुनिकीकरण के लिए चीन से कई तरह के सैन्य उपकरण खरीदे हैं। अब ड्रोन निर्माण में साझेदारी से यह रिश्ता और गहरा होता दिख रहा है।

चीन की सीईटीसी इंटरनेशनल ड्रोन, रडार और डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में एक बड़ी कंपनी मानी जाती है। उसके साथ काम करने से बांग्लादेश को आधुनिक तकनीक तक सीधी पहुंच मिलेगी। (Bangladesh China Drone Deal)

बांग्लादेश–चीन ड्रोन डील के भारत के लिए क्या हैं मायने

इस समझौते का असर भारत की सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ सकता है। खासकर बंगाल की खाड़ी और पूर्वी सीमाओं के लिए यह चिंता की बात है। सबसे बड़ी चिंता चीन की उस रणनीति से जुड़ी है, जिसे अक्सर “स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स” कहा जाता है। बांग्लादेश में करीब 55 मिलियन डॉलर की लागत से ड्रोन निर्माण फैक्ट्री स्थापित होने से बंगाल की खाड़ी में चीन की मिलिटरी-इंडस्ट्रीयल मौजूदगी बढ़ेगी। इससे पहले ही पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट, श्रीलंका और म्यांमार में चीनी निवेश मौजूद हैं, ऐसे में इस डील से भारत के पूर्वी तट पर रणनीतिक दबाव बढ़ सकता है ।

सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि नई ड्रोन क्षमता से बांग्लादेश की टोही और निगरानी क्षमता बढ़ेगी। यदि भविष्य में इन ड्रोन का उपयोग हमलों के लिए किया गया, तो इससे भारत की नौसैनिक और वायु सुरक्षा पर असर पड़ सकता है। खास तौर पर सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के पास चीनी सहयोग से जुड़े एयरफील्ड या ड्रोन गतिविधियों का होना भारत के लिए बेहद संवेदनशील हैं ।

वहीं बांग्लादेश को टेक्नोलॉजी ट्रांसफर होने से बांग्लादेश को बड़े पैमाने पर ड्रोन बनाने की क्षमता मिल सकती है, जिससे उसकी चीन पर दीर्घकालिक निर्भरता बढ़ेगी। चीन पहले ही एआई-बेस्ड ड्रोन उत्पादन में तेजी से आगे बढ़ रहा है, और यदि ये सिस्टम आगे किसी तीसरे देश तक पहुंचे, तो क्षेत्रीय संतुलन प्रभावित हो सकता है। (Bangladesh China Drone Deal)

15 मिनट में 1500 किमी! सी-डिनायल ऑपरेशंस में कैसे गेमचेंजर बनेगी DRDO की LR-ASHM मिसाइल

LR-ASHM hypersonic missile
India Showcases LR-ASHM Hypersonic Missile, Boosting Sea Denial Capability in the Indian Ocean

LR-ASHM hypersonic missile: 26 जनवरी को कर्तव्य पथ पर आयोजित 77वें गणतंत्र दिवस परेड में पहली बार लॉन्ग रेंज एंटी-शिप हाइपरसोनिक मिसाइल (LR-ASHM) को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया गया। यह मिसाइल एक व्हीकल पर तैनात (व्हीकल-माउंटेड) कॉन्फिगरेशन में दिखाई गई, जिसने साफ कर दिया कि भारत अब हाइपरसोनिक हथियार बनाने के लिए तैयार है।

LR-ASHM hypersonic missile: क्या है व्हीकल-माउंटेड LR-ASHM

गणतंत्र दिवस परेड में दिखाई गई लॉन्ग रेंज एंटी-शिप हाइपरसोनिक मिसाइल जमीन से लॉन्च की जाने वाला, व्हीकल-माउंटेड सिस्टम है। इसकी मारक क्षमता लगभग 1,500 किलोमीटर तक है। इतनी लंबी रेंज के साथ यह मिसाइल समुद्र में मौजूद दुश्मन के बड़े युद्धपोतों, एयरक्राफ्ट कैरियर और अन्य रणनीतिक नौसैनिक प्लेटफॉर्म को निशाना बनाने में सक्षम है।

डीआरडीओ से जुड़े सूत्रों के अनुसार, इस मिसाइल का लिमिटेड प्रोडक्शन शुरू हो चुका है। इसका उद्देश्य भारतीय नौसेना के साथ मिलकर सिस्टम की फाइन-ट्यूनिंग करना है, ताकि इसे ऑपरेशनल जरूरतों के हिसाब से पूरी तरह तैयार किया जा सके। यह प्रोसेस आमतौर पर किसी भी नई और अत्याधुनिक हथियार प्रणाली के साथ अपनाया जाता है। (LR-ASHM hypersonic missile)

भविष्य में शिप-बेस्ड वर्जन भी होगा तैयार

फिलहाल जो लॉन्ग रेंज एंटी-शिप हाइपरसोनिक मिसाइल दिखाई गई है, वह जमीन से लॉन्च होने वाला वर्जन है। मौजूदा स्थिति में इसका साइज और वजन इतना है कि इसे सीधे किसी वॉरशिप पर फिट करना संभव नहीं है। यही वजह है कि अभी यह मिसाइल नौसेना के लिए कोस्टल बैटरी रोल में ज्यादा उपयुक्त मानी जा रही है।

हालांकि, डीआरडीओ और नौसेना के स्तर पर यह साफ कर दिया गया है कि भविष्य में एक हाइपरसोनिक नेवल वर्जन जरूर डेवलप किया जाएगा। इसका मतलब यह है कि आने वाले वर्षों में लॉन्ग रेंज एंटी-शिप हाइपरसोनिक मिसाइल का एक ऐसा वर्जन भी सामने आ सकता है, जिसे सीधे जहाज से लॉन्च किया जा सके। लेकिन इसके लिए डिजाइन, वजन, प्रोपल्शन और स्ट्रक्चर में बड़े बदलाव जरूरी होंगे। (LR-ASHM hypersonic missile)

तीनों सेनाओं के लिए अलग-अलग वर्जन क्यों जरूरी

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि लैंड, शिप और एयर वर्जन की मिसाइलें कभी एक जैसी नहीं हो सकतीं। अगर ऐसा किया गया, तो मिसाइल अपनी पूरी क्षमता के साथ काम नहीं कर पाएगी।

जमीन से लॉन्च होने वाली मिसाइलों की जरूरतें अलग होती हैं, जहाज से दागी जाने वाली मिसाइलों की सीमाएं अलग होती हैं और हवा से लॉन्च होने वाली मिसाइलों का डिजाइन बिल्कुल अलग होता है। इसी वजह से लॉन्ग रेंज एंटी-शिप हाइपरसोनिक मिसाइल का हर वर्जन अलग-अलग रोल और प्लेटफॉर्म के हिसाब से डेवलप किया जाएगा, ताकि उसकी स्पीड, रेंज और मैनूवरेबिलिटी पर कोई समझौता न करना पड़े। (LR-ASHM hypersonic missile)

सागर विजन को मजबूत करने वाला हथियार

लॉन्ग रेंज एंटी-शिप हाइपरसोनिक मिसाइल भारत के सागर विजन (सिक्युरिटी एंड ग्रोथ फोर ऑल इन द रीजन) को जमीन पर उतारने में एक अहम भूमिका निभा सकती है। सागर का मूल विचार यह है कि हिंद महासागर क्षेत्र सुरक्षित रहे, खुले समुद्री मार्ग सुरक्षित रहें और सभी देशों के लिए व्यापार और विकास के अवसर बने रहें।

इस रणनीति के तहत भारत यह स्पष्ट संदेश है कि बाहरी शक्तियों का स्वागत तभी होगा, जब वे शांतिपूर्ण व्यापार और सहयोग के उद्देश्य से आएं। अगर कोई भी देश सैन्य दबाव या आक्रामक इरादों के साथ इस क्षेत्र में आता है, तो भारत के पास उसे रोकने की पूरी क्षमता होनी चाहिए। (LR-ASHM hypersonic missile)

महासागर विजन और इंडो-पैसिफिक में साझा सुरक्षा

आने वाले समय में भारत की रणनीति सिर्फ अकेले आगे बढ़ने की नहीं है। महासागर विजन के तहत भारत, आसियान देशों, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे साझेदारों के साथ मिलकर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में समन्वित सुरक्षा व्यवस्था की ओर बढ़ सकता है।

इस सोच के पीछे विचार यह है कि अगर हिंद महासागर और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र सुरक्षित रहेंगे, तो वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री संचार भी सुरक्षित रहेगा। लॉन्ग रेंज एंटी-शिप हाइपरसोनिक मिसाइल जैसी हाइपरसोनिक मिसाइलें इस शेयर्ड सिक्युरिटी फ्रेमवर्क में भारत की भूमिका को और मजबूत बनाती हैं। (LR-ASHM hypersonic missile)

क्यों खास है LR-ASHM की हाइपरसोनिक क्षमता

लॉन्ग रेंज एंटी-शिप हाइपरसोनिक मिसाइल एक हाइपरसोनिक ग्लाइड मिसाइल है, यानी यह आवाज की गति से पांच गुना से भी ज्यादा रफ्तार से उड़ती है। इसकी उड़ान प्रोफाइल ऐसी है कि यह कम ऊंचाई पर उड़ती है, बहुत तेज रफ्तार बनाए रखती है, और उड़ते हुए दिशा बदल सकती है।

इन खूबियों की वजह से दुश्मन के रडार और एयर डिफेंस सिस्टम के लिए इसे समय पर पकड़ पाना बेहद मुश्किल हो जाता है। यही कारण है कि इसे सी-डिनायल ऑपरेशंस के लिए एक गेम-चेंजर माना जा रहा है। (LR-ASHM hypersonic missile)

हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की बढ़ती भूमिका

हिंद महासागर से होकर दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्ते गुजरते हैं। तेल, गैस और वैश्विक व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र पर निर्भर है। ऐसे में जो देश इस क्षेत्र में प्रभावी सैन्य क्षमता रखता है, उसकी रणनीतिक स्थिति भी मजबूत होती है।

लॉन्ग रेंज एंटी-शिप हाइपरसोनिक मिसाइल के साथ भारत ने यह संदेश दिया है कि वह न सिर्फ अपनी सुरक्षा को लेकर गंभीर है, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने की जिम्मेदारी भी समझता है। (LR-ASHM hypersonic missile)