Home Blog Page 124

LCA Tejas Mk1A Engine: ऑनलाइन मिल रहा तेजस का GE-F404 इंजन! यूजर बोले- “HAL को कैश ऑन डिलीवरी ऑप्शन दे दो, अब शायद समय पर इंजन मिल जाए”

LCA Tejas Mk1A Engine: GE-F404 Engine Available on Indian Mart

LCA Tejas Mk1A Engine: भारत के स्वदेशी फाइटर जेट LCA तेजस Mk1A को अमेरिकी एरोस्पेस कंपनी GE की तरफ से समय पर इंजन सप्लाई न किए जाने से भारतीय वायु सेना को यह फाइटर जेट मिलने में डिलीवरी का सामना करना पड़ रहा है। यह डिलीवरी इस साल मार्च-अप्रैल से शुरू होनी थी, लेकिन इसकी डेडलाइन लगातार आगे बढती जा रही है। वहीं, इसमें लगने वाले GE F-404 इंजन को लेकर एक मजेदार वाकया सामने आया है। तेजस को बनाने वाली देश की सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) को भले ही जीई कंपनी की तरफ से इसकी सप्लाई में देरी की जा रही है, लेकिन यह इंजन ऑनलाइन उपलब्ध है। इस इंजन को इंडिया मार्ट (India Mart) वेबसाइट पर लिस्ट किया गया है। यह प्लेटफॉर्म आमतौर पर व्यावसायिक सामानों के लिए जाना जाता है, न कि एडवांस मिलिट्री हाईवेयर के लिए।

LCA Tejas Mk1A Engine: GE-F404 Engine Available on Indian Mart

GE F-404 इंजन दुनिया भर में अपनी विश्वसनीयता और प्रदर्शन के लिए जाना जाता है और इसे मुख्य रूप से हल्के लड़ाकू विमानों के लिए डिजाइन किया गया है।

LCA Tejas Mk1A Engine: सोशल मीडिया की पर लोग ले रहे चुटकियां

जैसे ही यह खबर फैली, सोशल मीडिया पर यूजर्स ने कंपनी को ट्रोल करना शुरू कर किया। इस पर अपनी मजेदार प्रतिक्रियाएं देते हुए किसी यूजर ने लिखा, “अगर HAL को GE से इंजन नहीं मिल रहा है, तो शायद अब उन्हें इंडिया मार्ट से ऑर्डर करना चाहिए।” वहीं, एक अन्य यूजर ने मजाकिया अंदाज में कहा, “इंडिया मार्ट के कस्टमर सर्विस वाले जल्द ही HAL को कॉल करके पूछेंगे, ‘कितने पीस चाहिए?'” एक यूजर ने लिखा, “अगर HAL को डिलीवरी में इतनी दिक्कत हो रही है, तो इंडिया मार्ट पर उपलब्धता का क्या मतलब?” दूसरे ने टिप्पणी की, “यह GE का एक विज्ञापन हो सकता है, ताकि कीमत को लेकर सौदेबाजी की जा सके।”

LCA Tejas: भारत के स्वदेशी फाइटर जेट तेजस के प्रोडक्शन में तेजी लाने पर जोर, संसदीय समिति ने रक्षा मंत्रालय को दिए निर्देश

इस पर कई मीम्स भी वायरल हो रहे हैं, जैसे:

  • “अगर GE F-404 मिल सकता है, तो F-35 का भी एक कोटेशन मांग लेते हैं, मज़े के लिए।”
  • “HAL को कैश ऑन डिलीवरी ऑप्शन दे दो, अब शायद समय पर इंजन मिल जाए।”
  • “यह इंजन कितना माइलेज देता होगा?”
  • एक यूजर ने कहा, “HAL को यह जानने में देर हो गई कि सही प्रोडक्ट कहां से खरीदना है।”

कुछ यूजर्स ने चुटकी लेते हुए लिखा:

  • “HAL को यह बात पता होती कि सही इंजन कहां मिलेगा, तो शायद वे इंडिया मार्ट से ही खरीद लेते।”
  • “सर, हम सिर्फ बल्क डिलीवरी करते हैं। एक या दो पीस के लिए आप अमेज़न या नजदीकी स्टोर देख लें।”
  • “ड्राइविंग लाइसेंस के साथ आर्डर करें, वरना डिलीवरी नहीं होगी।”

HAL और GE की चुनौतीपूर्ण साझेदारी

तेजस Mk1A प्रोजेक्ट के लिए यह इंजन बेहद अहम है, क्योंकि यह भारतीय वायुसेना के स्वदेशी लड़ाकू विमान कार्यक्रम की रीढ़ है। 2021 में HAL ने GE के साथ 99 F-404 इंजनों की डील साइन की थी, जिसकी डिलीवरी 2029 तक पूरी होनी थी। लेकिन ग्लोबल सप्लाई चेन में आई रुकावटों के कारण इसकी डिलीवरी में देरी हो रही है। हालांकि GE का कहना है कि वह इंजन की सप्लाई को लेकर प्रतिबद्ध है।

HAL को LCA Tejas की उत्पादन क्षमता बढ़ाने के निर्देश

हाल ही में, भारतीय वायुसेना (IAF) की ताकत बढ़ाने और स्क्वाड्रन की कमी को पूरा करने के लिए, संसद की रक्षा पर स्थायी समिति ने रक्षा मंत्रालय (MoD) को निर्देश दिया है कि वह हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) को तेजस लड़ाकू विमानों के उत्पादन में तेजी लाने के लिए कहे। यह बात समिति के अध्यक्ष और बीजेपी सांसद राधा मोहन सिंह की अध्यक्षता में संसद में पेश की गई रिपोर्ट में कही गई।

रिपोर्ट में कहा गया कि भारतीय वायुसेना को पाकिस्तान और चीन के साथ संभावित दो-फ्रंट युद्ध की तैयारी के लिए 42 फाइटर स्क्वाड्रन की जरूरत है। हालांकि, वर्तमान में वायुसेना के पास केवल 31 सक्रिय स्क्वाड्रन हैं, जिनमें प्रत्येक में 16-18 लड़ाकू विमान होते हैं।

समिति ने तेजस विमानों की देरी से डिलीवरी को लेकर भी चिंता जताई। HAL को 83 तेजस मार्क-1ए विमानों का ऑर्डर दिया गया था, जिसकी कुल लागत 48,000 करोड़ रुपये है। मार्च 2024 से इनकी डिलीवरी शुरू होनी थी, लेकिन अभी तक एक भी विमान वायुसेना को नहीं सौंपा गया है।

 

Pegasus spyware controversy: WhatsApp की बड़ी कानूनी जीत, अमेरिकी कोर्ट ने जासूसी के लिए NSO ग्रुप को ठहराया जिम्मेदार

Pegasus Spyware Controversy: WhatsApp Wins Legal Battle, US Court Holds NSO Group Accountable

Pegasus spyware controversy: दुनिया की सबसे लोकप्रिय मैसेजिंग सेवा WhatsApp ने शुक्रवार को पेगासस स्पाइवेयर बनाने वाली इजराइली कंपनी NSO ग्रुप के खिलाफ एक बड़ी कानूनी जीत हासिल की। एक ऐतिहासिक फैसले में, अमेरिकी अदालत ने इजरायली कंपनी एनएसओ ग्रुप को पेगासस सॉफ्टवेयर के जरिए व्हाट्सएप हैकिंग के लिए जिम्मेदार ठहराया। कंपनी ने पेगासस सॉफ़्टवेयर के जरिए 1,400 से अधिक लोगों के फोन को निशाना बनाया था। बता दें कि इस सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल का आरोप भारत की सरकार पर लगा है, जिसकी सुनवाई अभी होनी बाकी है।

Pegasus Spyware Controversy: WhatsApp Wins Legal Battle, US Court Holds NSO Group Accountable

Pegasus spyware controversy: जज ने दिया कठोर फैसला

केस की सुनवाई कर रहीं जज फिलिस हैमिल्टन ने NSO ग्रुप को अमेरिकी कंप्यूटर फ्रॉड एंड एब्यूज एक्ट (CFAA) और कैलिफोर्निया राज्य के एंटी-फ्रॉड कानूनों के उल्लंघन का दोषी पाया। इसके साथ ही कंपनी ने WhatsApp की सेवा शर्तों का भी उल्लंघन किया। उन्होंने यह भी कहा कि एनएसओ ने अदालत के आदेशों का पालन नहीं किया, जिसमें व्हाट्सएप को उनके स्पाईवेयर का सोर्स कोड सौंपने को कहा गया था।

अब मार्च 2025 में एक अलग जूरी ट्रायल में तय किया जाएगा कि NSO ग्रुप को WhatsApp को कितने नुकसान की भरपाई करनी होगी।

NSO ग्रुप ने इस मुकदमे के दौरान अमेरिकी कोर्ट में मुकदमे को टालने और देरी करने की रणनीति अपनाई। जज हैमिल्टन ने बताया कि कंपनी ने व्हाट्सएप को अपने स्पाइवेयर का सोर्स कोड उपलब्ध कराने के आदेश का पालन नहीं किया। NSO ने यह कोड केवल इजराइल में और इजरायली नागरिकों के लिए उपलब्ध कराया, जिसे जज ने “अव्यवहारिक” करार दिया। एनएसओ ग्रुप का दावा था कि उनके सरकारी ग्राहक पेगासस का उपयोग करते हैं और उन्हीं की जिम्मेदारी होती है। लेकिन अदालत ने इसे खारिज कर दिया और पाया कि एनएसओ खुद जानकारी एकत्रित करने और उसे इंस्टॉल करने में शामिल था। इसके अलावा, अदालत ने कंपनी द्वारा मुकदमे की प्रक्रिया में बाधा डालने और देरी करने की कोशिशों की आलोचना की।

Pegasus spyware controversy: 2019 में WhatsApp ने किया था केस

WhatsApp ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा, “पांच साल की कानूनी लड़ाई के बाद, आज का फैसला हमारे लिए महत्वपूर्ण है। NSO अब अपने अवैध हमलों के लिए जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। यह फैसला स्पाइवेयर कंपनियों को स्पष्ट संदेश देता है कि उनके गैरकानूनी काम बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे।”

व्हाट्सएप ने 2019 में एनएसओ ग्रुप के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया था। आरोप था कि इस कंपनी ने अपने जासूसी पेगासस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करते हुए 1,400 लोगों के फोन को हैक किया और उनकी जासूसी की।
इस हैकिंग का दायरा पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, राजनीतिक असंतुष्टों और राजनयिकों तक फैला था। व्हाट्सएप ने इसे अमेरिकी कानूनों और अपने सेवा शर्तों का उल्लंघन करार दिया।

NSO ग्रुप के पेगासस सॉफ़्टवेयर का उपयोग कई पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, राजनयिकों और वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों के फोन हैक करने के लिए किया गया था। पेगासस का उपयोग iPhones और WhatsApp को हैक करने के लिए भी किया गया, जिससे यूजर्स के ईमेल, फोटो और संदेशों को एक्सेस किया गया।

अमेरिकी सरकार की सख्ती

पेगासस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल व्हाट्सएप और आईफोन जैसे उपकरणों को हैक करने के लिए किया गया था। इसके जरिए तस्वीरें, ईमेल और टेक्स्ट मेसेज चोरी किए गए। जो बाइडन प्रशासन ने 2021 में NSO ग्रुप को एक ब्लैकलिस्ट पर डाल दिया और अमेरिकी सरकारी एजेंसियों को इसके प्रोडक्ट खरीदने से मना कर दिया। NSO को तानाशाही सरकारों द्वारा हैकिंग गतिविधियों में शामिल होने के आरोपों का सामना करना पड़ा है।

पेगासस स्पाइवेयर का उपयोग लंबे समय से विभिन्न देशों में विरोधियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ किया जाता रहा है। NSO ने हमेशा यह दावा किया है कि उसके ग्राहक, यानी सरकारें, इस सॉफ़्टवेयर के उपयोग के लिए जिम्मेदार हैं। हालांकि, कोर्ट में पेश दस्तावेज़ों से यह साबित हुआ कि NSO खुद इस सॉफ़्टवेयर का उपयोग डेटा निकालने के लिए करता था।

मार्च 2025 में होने वाले जूरी ट्रायल में तय किया जाएगा कि NSO ग्रुप को WhatsApp को कितना हर्जाना देना होगा। यह मुकदमा स्पाइवेयर उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा और डिजिटल निजता की सुरक्षा के लिए एक बड़ा कदम होगा।

भारत में भी किया गया था इस्तेमाल

इजरायली कंपनी एनएसओ के पेगासस सॉफ्टवेयर से भारत में कथित तौर पर 300 से ज्यादा प्रमुख हस्तियों के फोन हैक किए गए थे। इनमें कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी, केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव, प्रह्लाद सिंह पटेल, पूर्व निर्वाचन आयुक्त अशोक लवासा और चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर जैसे दिग्गज शामिल थे। इसके अलावा, कई पत्रकारों के फोन भी हैक किए गए, जिनमें ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’, ‘मिंट’, ‘इंडिया टुडे’, ‘द हिंदू’, ‘द इंडियन एक्सप्रेस’, और ‘फाइनैंशियल टाइम्स’ जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के संवाददाता शामिल थे।

अक्टूबर 2021- सुप्रीम कोर्ट ने पेगासस के ज़रिए अनधिकृत निगरानी के आरोपों की जांच के आदेश दिए। इस उद्देश्य के लिए सुप्रीम कोर्ट ने तीन सदस्यों और एक पर्यवेक्षक वाली एक विशेष समिति बनाई। जिस पर सुनवाई होनी अभी बाकी है।

पेगासस क्यों खतरनाक है?

पेगासस सॉफ्टवेयर को केवल एक मिस कॉल के जरिए किसी फोन में इंस्टॉल किया जा सकता था, बिना यूजर की जानकारी या अनुमति के। एक बार इंस्टॉल होने के बाद, इसे हटाना लगभग असंभव है। यह सॉफ्टवेयर हैकर को स्मार्टफोन के माइक्रोफोन, कैमरा, ऑडियो, टेक्स्ट मैसेज, ईमेल और लोकेशन तक पहुंचने की अनुमति देता है। यह इसे बेहद खतरनाक और उपयोगकर्ता की गोपनीयता के लिए गंभीर खतरा बनाता है।

K9 Vajra Artillery Guns: भारतीय सेना को मिलेंगी 100 नई K9 वज्र तोपें, लार्सन एंड टुब्रो के साथ 7,629 करोड़ रुपये कॉन्ट्रैक्ट पर हुए दस्तखत

K9 Vajra Artillery Guns: MoD signs Rs 7,629 crore contract with Larsen Toubro for Indian Army

K9 Vajra Artillery Guns: भारत सरकार ने देश की रक्षा क्षमता को मजबूत करने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। रक्षा मंत्रालय ने लार्सन एंड टुब्रो (L&T) के साथ 155 मिमी/52 कैलिबर K9 वज्र K9 (VAJRA-T) स्व-चालित ट्रैक्ड तोपों की खरीद के लिए 7,628.70 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट किया है। यह कॉन्ट्रैक्ट 20 दिसंबर, 2024 को रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की मौजूदगी में साइन किया गया। इससे पहले 14 दिसंबर को ही केंद्रीय कैबिनेट कमेटी ने 100 अतिरिक्त K9 वज्र तोपों और 12 नए Su-30MKI लड़ाकू विमानों के अधिग्रहण को मंजूरी दी थी।

K9 Vajra Artillery Guns: MoD signs Rs 7,629 crore contract with Larsen Toubro for Indian Army

K9 वज्र: भारतीय सेना के लिए गेम-चेंजर

K9 वज्र तोप भारतीय सेना की तोपखाने (आर्टिलरी) शक्ति को आधुनिक बनाने और संचालन क्षमता को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। यह तोप अपनी तेज रफ्तार और सटीकता के लिए जानी जाती है। इसे विशेष रूप से ऊंचाई वाले क्षेत्रों और माइनस तापमान वाले इलाकों में ऑपरेशन करने के लिए डिजाइन किया गया है।

यह तोप लंबी दूरी तक सटीक और घातक फायरपावर देने में सक्षम है। इसके मॉडर्न फीचर्स भारतीय सेना को हर तरह के इलाके में बेहतर प्रदर्शन करने में मदद करेंगे। इसकी जबरदस्त क्षमताएं सेना को न केवल लद्दाख जैसे ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बल्कि अन्य कठिन इलाकों में भी चीन जैसी चुनौतियों का सामना करने में सक्षम बनाएंगी।

K9 Vajra Artillery Guns: MoD signs Rs 7,629 crore contract with Larsen Toubro for Indian Army

चीन के साथ बढ़ती चुनौतियों का जवाब

सैन्य सूत्रों ने बताया कि यह खरीद “बाय इंडियन” श्रेणी के तहत की गई है, जिसमें न्यूनतम 60 फीसदी इंडीजीनियस  (स्वदेशीकरण) इक्विपमेंट्स का होना जरूरी है। लद्दाख और अन्य ऊंचाई वाले क्षेत्रों में चीन के साथ बढ़ती सैन्य चुनौतियों को देखते हुए यह फैसला लिया गया है। इन तोपों की तैनाती से भारतीय सेना की रणनीतिक ताकत में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। हाल ही में केंद्रीय कैबिनेट ने 100 अतिरिक्त K9 वज्र तोपों को मंजूरी दी थी, जो भारत की उत्तरी सीमाओं की रक्षा में अहम भूमिका निभाएंगी।

स्वदेश में ही बनेंगी

K9 वज्र तोपों का निर्माण पूरी तरह से भारत में किया जाएगा। लार्सन एंड टुब्रो की गुजरात के हजीरा में स्थित मैन्युफैक्चरिंग यूनिट में इन तोपों का निर्माण किया जाएगा। यह 155 मिमी, 52-कैलिबर सेल्फ-प्रोपेल्ड होवित्जर तोपें हैं, जिन्हें दक्षिण कोरिया की कंपनी हनव्हा टेकविन की तकनीकी मदद से विकसित किया गया है। इस प्रोजेक्ट को दक्षिण कोरिया की डिफेंस एजेंसी की मंजूरी है। एलएंडटी ने पहले भी सेना को 100 K-9 वज्र तोपें सप्लाई की थीं। 2017 में, रक्षा मंत्रालय ने 4,366 करोड़ रुपये की लागत से इन तोपों को खरीदने का फैसला किया था। ये तोपें भारतीय सेना की ताकत बढ़ाने में मदद करेंगी।

K9 Vajra Artillery Guns: भारतीय सेना को मिलेंगी 100 अतिरिक्त K9 वज्र तोपें; लद्दाख में चीन की चुनौती से निपटने की तैयारी

आत्मनिर्भर भारत और मेक-इन-इंडिया अभियान को बल

K9 वज्र परियोजना न केवल भारतीय सेना के लिए, बल्कि भारतीय उद्योग के लिए भी एक बड़ा अवसर लेकर आई है। इस परियोजना से अगले चार वर्षों में नौ लाख मानव-दिनों का रोजगार पैदा होगा। इसके अलावा, इस परियोजना में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSMEs) सहित भारतीय उद्योगों की सक्रिय भागीदारी को बढ़ावा मिलेगा।

K9 वज्र की खासियत

K9 वज्र एक 155 मिमी की ट्रैक्ड आर्टिलरी गन है, जो टैंक जैसी मारक क्षमता, एडवांस मोबिलिटी और सटीकता के लिए मशहूर है। यह तोप पहले राजस्थान के रेगिस्तान में तैनात की गई थी, लेकिन 2020 में चीन के साथ सीमा पर तनाव के बाद इसे लद्दाख जैसे ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तैनात किया गया। बता दें कि सेना में पहले से ही के9 वज्र गनों की पांच रेजिमेंट हैं, और इस फैसले के बाद पांच रेजिमेंट और बनाईं जाएंगी। जिसके बाद इनकी संख्या कुल 10 हो जाएगी।

K-9 वज्र-टी तोपों से लैस सेल्फ-प्रोपेल्ड आर्टिलरी रेजिमेंट्स स्ट्राइक कोर के टैंक और इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल्स (ICVs) के ठीक पीछे चलती हैं। ये तोपें दुश्मन के ठिकानों पर हाई-एक्सप्लोसिव गोले बरसाती हैं। रेगिस्तानी इलाकों में K-9 वज्र जैसी ट्रैक वाली तोपें फायर सपोर्ट के लिए बेहद जरूरी होती हैं।

एलएंडटी द्वारा बनाई गई पहली 100 K-9 वज्र तोपों ने पांच रेजिमेंट्स को लैस किया है, जिनमें से प्रत्येक रेजिमेंट में 20 तोपें हैं। इनमें से एक रेजिमेंट को मई 2020 में चीन सीमा पर घुसपैठ के बाद तैनात किया गया था, जबकि बाकी चार रेजिमेंट्स को स्ट्राइक कोर की चार टैंक ब्रिगेड्स के साथ तैनात किया गया है। वहीं, अब, आज हुए नए समझौते के तहत अगली 100 तोपों से सेना की दूसरी स्ट्राइक कोर की पांच और रेजिमेंट्स को लैस किया जाएगा।

सेना की दीर्घकालिक योजना के तहत इन 200 तोपों के बाद 100 और तोपों का तीसरा ऑर्डर दिया जाएगा। इन पांच नई रेजिमेंट्स में से प्रत्येक को सेना की “इंडिपेंडेट आर्मर्ड ब्रिगेड्स” के साथ तैनात किया जाएगा।

K9 Vajra Guns: भारतीय सेना को जल्द मिल सकती हैं 100 और K-9 वज्र तोपें, कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी के सामने प्रपोजल पेश करने की तैयारी

इस तोप की सबसे बड़ी खासियत इसकी सेल्फ-प्रोपेल्ड (स्व-चालित) प्रणाली है, जो इसे अन्य तोपों से अलग बनाती है। इसे खींचने के लिए किसी बाहरी वाहन की आवश्यकता नहीं होती, और इसके एडवांस सिस्टम इसे कठिन परिस्थितियों में भी तेजी से फायरिंग और पुनः तैनाती में सक्षम बनाते हैं।

  1. लंबी दूरी की सटीक फायरिंग: K9 वज्र तोपें लंबी दूरी तक सटीक और प्रभावी फायरिंग करने में सक्षम हैं।
  2. तेज फायरिंग रेट: यह तोपें तेज गति से गोले दाग सकती हैं, जो किसी भी युद्ध क्षेत्र में निर्णायक साबित हो सकती हैं।
  3. सभी प्रकार के भूभागों में संचालन: इन तोपों की क्रॉस-कंट्री मोबिलिटी उन्हें किसी भी भूभाग में संचालन के लिए उपयुक्त बनाती है।
  4. उच्च ऊंचाई और माइनस तापमान में कार्यक्षमता: K9 वज्र तोपें उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों और कठिन मौसम स्थितियों में भी पूरी क्षमता के साथ काम कर सकती हैं।

K9 Vajra Artillery Guns में हाई एल्टीट्यूड पर तैनाती के लिए खास अपग्रेड

नई K9 वज्र तोपों को ऊंचाई वाले क्षेत्रों के लिए खास तौर पर तैयार किया जा रहा है। इन्हें -20°C तक के ठंडे मौसम में भी प्रभावी रूप से काम करने लायक बनाया गया है। इसके लिए इनमें कई खास फीचर जोड़े गए हैं, जैसे:

  • एडवांस्ड फायर-कंट्रोल सिस्टम
  • विशेष लुब्रिकेंट्स
  • ठंडे मौसम के लिए तैयार की गई बैटरियां

तोप की रेंज 40 किलोमीटर से अधिक है और यह 65 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से मूव कर सकती है। इसे पांच जवानों की टीम मैनेज करती है और यह 49 राउंड तक गोला-बारूद अपने साथ ले जाने में सक्षम है।

बता दें कि 18 दिसंब को कोरियाई दूतावास ने हनह्वा एयरोस्पेस लैंड सिस्टम्स के साथ एक बैठक की थी और के-9 होवित्जर (वज्र) परियोजना के दूसरे चरण की स्थिति सहित कोरिया-भारत रक्षा सहयोग पर विचारों का आदान-प्रदान किया। दक्षिण कोरिया की कंपनी हनवा एयरोस्पेस यूरोप में अपनी पहली उत्पादन इकाई स्थापित करने जा रही है।  रोमानिया में K-9 थंडर होवित्जर के लिए 2025 तक शुरू होने की उम्मीद है। यह अत्याधुनिक सुविधा रोमानियाई सशस्त्र बलों और रक्षा निर्यात के लिए उत्पादन, उपकरण परीक्षण, अनुसंधान, प्रशिक्षण और रखरखाव सेवाएं प्रदान करेगी। K-9 थंडर को रोमानिया सहित नौ देशों ने चुना है। यह अत्याधुनिक तोप 40 किलोमीटर से अधिक की रेंज और स्वचालित गोला-बारूद प्रणाली से लैस है। हनवा K2 ब्लैक पैंथर टैंक और AS-21 रेडबैक इन्फैंट्री वाहनों की आपूर्ति के लिए भी निविदा प्रक्रिया में भाग ले रही है।

Air Force accidents: भारतीय वायुसेना में 5 सालों में हुए 34 विमान हादसे, इनमें से 19 में मानव गलतियों की वजह से गईं जानें

Air Force accidents: Parliamentary panel report said, 34 Crashes in 5 Years, 19 Due to Human Error

Air Force accidents: भारतीय वायुसेना (IAF) में 2017 से 2022 के बीच 34 विमान हादसे हुए हैं, जिनमें से 19 का कारण मानव त्रुटि (एयरक्रू) रहा है। संसदीय रक्षा समिति ने अपनी हाल ही में जारी रिपोर्ट में यह खुलासा किया है। रिपोर्ट में वायुसेना के पुराने विमानों और तकनीकी खामियों को भी प्रमुख चिंताओं के रूप में बताया गया है। हालांकि, पिछले वर्षों में दुर्घटनाओं की संख्या में गिरावट दर्ज की गई है। इससे पहले संसद में पेश की गई रक्षा पर स्थायी समिति की रिपोर्ट ने बताया था कि 8 दिसंबर 2021 को तमिलनाडु के कुन्नूर में एक भीषण हेलिकॉप्टर दुर्घटना में भारत के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल बिपिन रावत की मौत भी “मानवीय त्रुटि (एयरक्रू)” की वजह से हुई थी। इस हादसे में उनकी पत्नी मधुलिका रावत और 12 अन्य सैन्य अधिकारियों की दुखद मृत्यु हो गई।

Air Force accidents: Parliamentary panel report said, 34 Crashes in 5 Years, 19 Due to Human Error

Air Force accidents: दुर्घटनाओं का सालाना ब्योरा

रिपोर्ट में हादसों का सालवार विवरण दिया गया है, जो इस प्रकार है:

  • 2017–18: 8 हादसे
  • 2018–19: 11 हादसे
  • 2019–20: 3 हादसे
  • 2020–21: 3 हादसे
  • 2021–22: 9 हादसे

2018–19 और 2021–22 के दौरान दुर्घटनाओं में तेज वृद्धि ने सुरक्षा उपायों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इन वर्षों में हुई प्रमुख घटनाओं में दिसंबर 2021 में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल बिपिन रावत की मौत भी शामिल है। यह हादसा Mi-17V5 हेलीकॉप्टर के क्रैश के कारण हुआ था।

Air Force accidents: Parliamentary panel report said, 34 Crashes in 5 Years, 19 Due to Human Error

Air Force accidents: दुर्घटनाओं की वजह

रिपोर्ट के अनुसार, हादसों के पीछे मुख्य रूप से तीन कारण रहे:

  • मानव त्रुटि (एयरक्रू): 19 घटनाएं
  • तकनीकी खामियां: 9 घटनाएं
  • अन्य कारण: पक्षियों से टकराव और बाहरी वस्तुओं से क्षति

विशेषज्ञों ने मानव त्रुटियों के कारण होने वाले हादसों को प्रशिक्षण और उपकरणों की बेहतर निगरानी से रोकने की आवश्यकता पर जोर दिया है।

General Bipin Rawat Death: कैसे हुई थी सीडीएस रावत की हेलिकॉप्टर दुर्घटना में मौत? संसदीय समिति की रिपोर्ट में हुआ खुलासा

प्रमुख विमान और हादसे

रिपोर्ट में मिग-21 को सबसे अधिक दुर्घटनाग्रस्त विमान बताया गया है। इसे अक्सर “उड़ता ताबूत” कहा जाता है। मिग-21 के अलावा, जिन विमानों में हादसे हुए, वे हैं:

  • Mi-17 हेलीकॉप्टर
  • जगुआर लड़ाकू विमान
  • सुखोई-30 एमकेआई
  • सूर्य किरण ट्रेनर जेट

रिपोर्ट में संसदीय समिति ने मिग-21 की उम्र और डिजाइन के कारण इसे चरणबद्ध तरीके से हटाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।

सुरक्षा उपायों में सुधार

रक्षा मंत्रालय ने वायुसेना में दुर्घटनाओं को कम करने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी दी। इनमें शामिल हैं:

  1. ऑपरेशनल प्रोटोकॉल्स की व्यापक समीक्षा।
  2. पायलट प्रशिक्षण में सुधार।
  3. रखरखाव प्रक्रियाओं को बेहतर बनाना।
  4. जांच रिपोर्ट की सिफारिशों को लागू करना।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि पिछले वर्षों में 10,000 उड़ान घंटों पर दुर्घटनाओं की दर में लगातार गिरावट आई है:

  • 2000–2005: 0.93
  • 2017–2022: 0.27
  • 2020–2024: 0.20

Air Force accidents: पुराने विमान बने चुनौती

वायुसेना के पुराने विमानों, विशेषकर मिग-21, को सेवा से हटाना प्राथमिकता में है। इनके स्थान पर आधुनिक और सुरक्षित विमानों को शामिल करने की आवश्यकता है। मिग-21 की जगह लेने के लिए तेजस जैसे स्वदेशी लड़ाकू विमान को प्राथमिकता दी जा रही है।

2021 का Mi-17 हादसा

दिसंबर 2021 में हुए Mi-17 हेलीकॉप्टर हादसे का प्रमुख कारण “मौसम में अचानक बदलाव” और पायलट की दिशाभ्रम (स्पैशियल डिसओरिएंटेशन) बताया गया। प्रारंभिक जांच में यह बात सामने आई कि मौसम में अचानक आए बदलाव के कारण हेलिकॉप्टर बादलों में प्रवेश कर गया। इससे पायलट दिशाभ्रम का शिकार हो गए और हेलिकॉप्टर “Controlled Flight Into Terrain” (CFIT) का शिकार हो गया।

जांच टीम ने फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर और कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर का विश्लेषण करने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंची। इसके साथ ही टीम ने सभी गवाहों से पूछताछ भी की।

रिपोर्ट में हेलिकॉप्टर के संचालन और रखरखाव पर भी सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि क्या पायलट को ऐसे हालातों से निपटने का समुचित प्रशिक्षण दिया गया था? क्या हेलिकॉप्टर में लगे उपकरण खराब थे, जो मौसम के बदलाव को पायलट को सही समय पर चेतावनी नहीं दे सके? क्या वायुसेना के सुरक्षा प्रोटोकॉल इस हद तक प्रभावी हैं कि इस तरह की त्रासदी को रोका जा सके?

क्या कहा था CAG ने अपनी रिपोर्ट में?

इससे एक दिन पहले ही भारतीय नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) ने संसद के सामने रखी गई अपनी लेटेस्ट रिपोर्ट में भारतीय वायुसेना (IAF) के पायलट प्रशिक्षण में गंभीर खामियों को उजागर किया था। रिपोर्ट में कहा गया था कि हेलिकॉप्टर पायलटों को Mi-17 V5 जैसे पुराने हेलिकॉप्टरों पर प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इनमें लेटेस्ट एवियोनिक्स की कमी है।

भारतीय नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) ने संसद के सामने रखी गई अपनी लेटेस्ट रिपोर्ट में भारतीय वायुसेना (IAF) के पायलट प्रशिक्षण में गंभीर खामियों को उजागर किया था। रिपोर्ट में वायुसेना के ‘स्टेज-1’ प्रशिक्षण में इस्तेमाल हो रहे Pilatus PC-7 Mk-II विमान की खामियों को भी बताया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक 64 विमानों में से 16 (25%) में 2013 से 2021 के बीच 38 बार इंजन ऑयल लीक की घटनाएं दर्ज की गईं।

सथ ही, CAG की रिपोर्ट में ‘स्टेज-2’ और ‘स्टेज-3’ पायलट ट्रेनिंग में पुरानी तकनीक और उपकरणों के इस्तेमाल पर भी सवाल उठाए गए। रिपोर्ट में कहा गया कि हेलिकॉप्टर पायलटों को Mi-17 V5 जैसे पुराने हेलिकॉप्टरों पर प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इनमें लेटेस्ट एवियोनिक्स की कमी है, जिसके कारण ऑपरेशनल यूनिट्स को अतिरिक्त प्रशिक्षण की जरूरत पड़ती है। वहीं, ट्रांसपोर्ट पायलटों को डॉर्नियर-228 जैसे पुराने विमानों पर प्रशिक्षित किया जा रहा है। इन विमानों में आधुनिक कॉकपिट की सुविधाएं नहीं हैं।

CAG ने वर्चुअल रियलिटी (VR) सिमुलेटर और फ्लाइंग ट्रेनिंग डिवाइस (FTD) की उपयोगिता पर भी सवाल उठाए। कहा, ये सिमुलेटर केवल प्रोसिजरल ट्रेनिंग देते हैं और रियल टाइम फ्लाइट एक्सपीरियंस का अहसास नहीं कराते।

Army Personnel Salary Attachment: सैन्य कर्मियों की सैलरी को लेकर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, केंद्र सरकार की अनुमति है जरूरी

Liberalised Family Pension
File Photo

Army Personnel Salary Attachment: पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा है कि सेना कर्मियों की सैलरी को धारा 125 सीआरपीसी (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 144) के तहत भरण-पोषण के बकाए को वसूलने के लिए अटैच नहीं किया जा सकता, क्योंकि केवल केंद्र सरकार को ही इस प्रकार की कटौती करने का अधिकार है।

Army Personnel Salary Attachment: High Court Rules Only Central Government Authorized for Deductions

न्यायमूर्ति हरप्रीत सिंह बरार ने अपने आदेश में कहा कि सेना अधिनियम के तहत सेना कर्मियों को व्यापक अधिकार और सुरक्षा प्रदान की गई है, ताकि वे राष्ट्रीय सुरक्षा के अपने कर्तव्यों को बिना किसी बाहरी वित्तीय बाधा के प्रभावी ढंग से निभा सकें।

Army Personnel Salary Attachment: क्या है मामला?

यह फैसला एक याचिका की सुनवाई के दौरान आया, जिसमें फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी। फैमिली कोर्ट ने सेना कर्मी की सैलरी से 4,10,000 रुपये की कटौती का आदेश दिया था, ताकि भरण-पोषण का बकाया वसूल किया जा सके।

OROP Supreme Court: सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया- इन रिटायर्ड कर्मियों को OROP के तहत नहीं मिलेगी बढ़ी हुई पेंशन!

याचिकाकर्ता के वकील मदन लाल सैनी ने तर्क दिया कि सेना अधिनियम (आर्मी एक्ट 1950) के तहत बिना केंद्र सरकार की स्वीकृति के इस प्रकार की कटौती नहीं की जा सकती।

सेना अधिनियम के तहत अधिकार और सुरक्षा

न्यायालय ने कहा कि सेना अधिनियम (आर्मी एक्ट 1950) की धारा 25 और 91 के तहत सेना कर्मियों की सैलरी और भत्तों से कटौती केवल केंद्र सरकार की अनुमति से ही संभव है। इसके अलावा, धारा 28 यह सुनिश्चित करती है कि सेना कर्मियों की सैलरी अटैच नहीं की जा सकती।

One Rank One Pension: OROP-3 में पेंशन विसंगतियों से नाराज हैं सेवानिवृत्त सैन्य कर्मी, 401 JCOs ने रक्षा मंत्रालय और नेवी चीफ को भेजा कानूनी नोटिस

न्यायालय ने यह भी कहा कि सेना कर्मियों को दिए गए अधिकार और विशेषाधिकार अन्य कानूनों के तहत उनके पास मौजूद किसी भी अधिकार या विशेषाधिकार को कम नहीं करते, बल्कि यह उनके लिए अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करते हैं।

न्यायालय ने सेना अधिनियम की निम्नलिखित धाराओं का हवाला दिया:

  • धारा 25 और 91: ये धाराएं जवानों के वेतन और भत्तों से कटौती के नियम तय करती हैं।
  • धारा 28: इस धारा के तहत जवानों के वेतन और भत्तों को जब्ती से सुरक्षा प्रदान की गई है।
  • धारा 33: यह धारा स्पष्ट करती है कि जवानों को दिए गए अधिकार अन्य कानूनों के तहत दिए गए अधिकारों के पूरक हैं।

Army Personnel Salary Attachment: न्यायालय का निर्णय

न्यायमूर्ति हरप्रीत सिंह बरार ने कहा, “निचली अदालत द्वारा दिए गए आदेश के अनुसार सेना कर्मी की सैलरी को अटैच नहीं किया जा सकता। भरण-पोषण के लिए तय 10,000 रुपये की कटौती के लिए केंद्र सरकार से अनुमति लेना अनिवार्य है।”

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई सिविल कोर्ट भरण-पोषण का आदेश देती है, तो लाभार्थी केंद्र सरकार से अनुरोध कर सकता है कि सेना अधिनियम की धारा 91(i) के तहत आवश्यक कटौती की जाए।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि सेना कर्मियों को उनके कार्यों में बाधा पहुंचाने से बचाने के लिए यह विशेष संरक्षण दिया गया है। सेना कर्मियों को अपनी सैलरी और भत्तों पर निर्भर रहना पड़ता है, और इस प्रकार की कटौती उनके कर्तव्यों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।

वहीं, उच्च न्यायालय ने फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और याचिकाकर्ता की अपील स्वीकार कर ली। साथ ही, जवाबदेही तय करते हुए यह निर्देश दिया कि भरण-पोषण के आदेश को लागू करने के लिए उत्तरदाता केंद्र सरकार से संपर्क कर सकता है।

क्या है धारा 125 सीआरपीसी?

भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 144) के तहत पत्नी, बच्चे और माता-पिता को भरण-पोषण का अधिकार दिया गया है। इसमें विशेष रूप से यह प्रावधान है कि यदि परिवार के लिए आवश्यक धनराशि का भुगतान नहीं किया जाता, तो इसे अदालत द्वारा लागू कराया जा सकता है।

सेना कर्मियों के लिए क्या है खास?

सेना कर्मियों को उनके संवैधानिक अधिकारों और विशेषाधिकारों के तहत यह सुनिश्चित किया गया है कि उनके वेतन और भत्तों की कटौती केवल केंद्र सरकार की स्वीकृति से ही हो सकती है। यह कदम यह सुनिश्चित करता है कि सेना कर्मी अपनी सेवा और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति पूरी तरह से समर्पित रह सकें।

न्यायालय के फैसले का महत्व

इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि सेना कर्मियों के वेतन और भत्तों को लेकर केंद्र सरकार का विशेष अधिकार है। यह फैसला न केवल सेना कर्मियों के अधिकारों को सुरक्षित रखता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि सिविल अदालतें इस संवेदनशील मुद्दे पर सीधे हस्तक्षेप न करें।

Tashi Namgyal: नहीं रहे करगिल जंग के गुमनाम हीरो ताशी नामग्याल, जिन्होंने सबसे पहले दी थी पाकिस्तानी सेना की घुसपैठ की खबर

Tashi Namgyal: Unsung Hero of Kargil War Who First Alerted India About Pakistani Intrusion Passes Away

Tashi Namgyal: करगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तान की घुसपैठ का सबसे पहले पता लगाने वाले बटालिक सेक्टर के गारकन गांव के बहादुर चरवाहे ताशी नामग्याल का निधन गुरुवार को हो गया। लद्दाख की आर्यन घाटी के नाम से मशहूर इस अनजान नायक ने भारतीय सेना को समय रहते चेतावनी दी, जिससे 1999 के करगिल युद्ध में भारत की जीत सुनिश्चित हुई और अनगिनत सैनिकों की जान बच सकी। इसी साल उनसे मेरी (हरेंद्र चौधरी) करगिल के 25 साल समारोह में मुलाकात हुई थी। जिसमें वे सरकार से काफी खिन्न भी नजर आ रहे थे। उनका कहना था कि सरकार से उन्हें कोई पहचान या सम्मान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे। यहां तक कि सरकार ने उनकी गरीबी को देखते हुए उन्हें कोई सम्मान राशि भी नहीं दी।

Tashi Namgyal: Unsung Hero of Kargil War Who First Alerted India About Pakistani Intrusion Passes Away

1999 में दिया था सबसे बड़ा अलर्ट

लेखक से बातचीत करते हुए उन्होंने बताया था कि उस समय उनकी उम्र 35 साल थी। भारतीय सेना को घुसपैठ के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, तो 2 मई को वे जानवरों (याक) की देखभाल और उन्हें चराने के लिए गरखुन नाला (धारा) पर गए थे। वे दौड़ते हुए वापस आए और उन्होंने वहां बर्फ में कुछ निशान देखे। यह बहुत असामान्य था क्योंकि कोई भी वहां नहीं जाता था।

Tashi Namgyal: Unsung Hero of Kargil War Who First Alerted India About Pakistani Intrusion Passes Away
लेखक के साथ ताशी नामग्याल

उनके भाई मोरुप त्सेरिंग ने दूरबीन उठाई और वे जुबार हिल पर एक नाले के पास पहुंचे। वे कहते हैं, “हम सलवार-कमीज़ पहने छह से सात लोगों को साफ़-साफ़ पहचान सकते थे। हमें यकीन नहीं था कि वे भारतीय सेना से नहीं थे।”

उन्होंने तुरंत निकटतम सेना पोस्ट जाकर इसकी सूचना दी। इससे पहले भी 1997 में उन्होंने याल्डोर क्षेत्र में पाकिस्तान सेनी के गश्ती दल की गतिविधियों की जानकारी दी थी, लेकिन तब किसी ने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया। इस बार भी, उनकी बात को पहले नकारा गया, लेकिन उनका साहस और धैर्य अंततः रंग लाया और आखिरकार सरकार को उनका बात माननी पड़ी।

सेना को कैसे मिला सबूत

उन्होंने बताया था कि गरखुन गांव के पास एक चौकी पर मौजूद बारा साहब को इस बारे में जानकारी दी। एक दिन बाद, एक लेफ्टिनेंट और कुछ सैनिक त्सेरिंग और ताशी के साथ गए ताकि वे खुद देख सकें कि दोनों किस बारे में बात कर रहे थे।

वे कहते हैं, “जब हम करीब पांच किलोमीटर ऊपर गरखुन नाला पहुंचे, तो हमें घुसपैठिए दिखाई दिए। हम वापस आए और मुझसे पूछा गया कि क्या नाले तक पहुंचने का कोई और रास्ता है। मैं उन्हें दाह नाला ले गया।” वहां भी घुसपैठियों की भरमार थी और वहां अच्छी तरह से बनाए गए बंकर और बहुत सारा गोला-बारूद था।

जब सेना के अधिकारियों ने उनके दावों की जांच की, तो उन्हें पता चला कि पाकिस्तानी सेना वास्तव में इलाके में सक्रिय थे। गरखुन नाले और दाह नाले में घुसपैठियों ने बंकर और गोला-बारूद का बड़ा जखीरा जमा कर रखा था। ताशी ने सेना को दुर्गम रास्तों की जानकारी दी और घुसपैठियों की स्थिति का सटीक विवरण दिया।

मेरा पुराना इंटरव्यू

गुमनाम नायक का योगदान

करगिल युद्ध के दौरान, ताशी ने सेना के लिए कुली के रूप में काम किया और रसद और हथियार पहुंचाने में मदद की। उनकी बहादुरी और योगदान ने न केवल भारतीय सेना को समय पर तैयारी का मौका दिया, बल्कि दुश्मन की साजिशों को भी विफल किया।

सम्मान के बदले उपेक्षा

ताशी नामग्याल जैसे नायकों को वह पहचान और सम्मान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे। ताशी ने मुलाकात के दौरान बताया था, “हमने सेना के लिए बहुत कुछ किया, लेकिन आज भी हम गुमनाम हैं। हमें आज भी पूछताछ का सामना करना पड़ता है। मेरा भाई आज भी मजदूरी करता है। क्या आपको लगता है कि हमें कभी हमारे काम का इनाम मिलेगा?”

सभी सच्चे नायकों की तरह, वे भी गुमनाम ही ररहे। उनकी गरीबी भरी जिंदगी में कोई बदलाव नहीं आया। उनके हाथ और कपड़े अभी भी धूल से सने थे, क्योंकि जब वह भेड़ और याक चराने के अलावा किसी और की जमीन पर काम करते हैं तो अपनी आजीविका चलाते हैं। उन्होंने बताया था कि वे और उनके भाई ताशी नामग्याल कारगिल के बटालिक क्षेत्र के गरखुन गांव में हीरो हैं, लेकिन इसके अलावा उनकी जिंदगी में कुछ भी नहीं बदला है।

सादगी में बीता जीवन

ताशी नामग्याल ने अपना जीवन बेहद सादगी से बिताया। उनके अद्वितीय योगदान के बावजूद, उन्होंने कभी कोई बड़ा दावा नहीं किया और देशभक्ति को अपने जीवन का आधार बनाया।

करगिल के गुमनाम नायकों को कब मिलेगा हक?

ताशी और मोरुप जैसे नायकों की कहानियां यह सवाल उठाती हैं कि क्या हमारे देश में गुमनाम नायकों को उनका हक मिल पाता है? जब हम करगिल की विजय का जश्न मनाते हैं, तो हमें उन अनजान और निस्वार्थ नायकों को भी याद करना चाहिए, जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना देश की रक्षा की।

ताशी नामग्याल का निधन देश के लिए एक बड़ी क्षति है। उनका योगदान हर भारतीय के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनके जीवन ने यह सिखाया कि असली नायक वह होता है, जो बिना किसी प्रशंसा की अपेक्षा के अपना कर्तव्य निभाता है।

General Bipin Rawat Death: कैसे हुई थी सीडीएस रावत की हेलिकॉप्टर दुर्घटना में मौत? संसदीय समिति की रिपोर्ट में हुआ खुलासा

CDS General Bipin Rawat Death: Parliamentary report reveals key findings on helicopter crash!

General Bipin Rawat Death: 8 दिसंबर 2021 को तमिलनाडु के कुन्नूर में एक भीषण हेलिकॉप्टर दुर्घटना में भारत के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल बिपिन रावत, उनकी पत्नी मधुलिका रावत और 12 अन्य सैन्य अधिकारियों की दुखद मृत्यु हो गई। तीन साल बाद, संसद में पेश की गई रक्षा पर स्थायी समिति की रिपोर्ट ने इस दुर्घटना का कारण “मानवीय त्रुटि (एयरक्रू)” को बताया है। बता दें कि इससे एक दिन पहले ही भारतीय नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) ने संसद के सामने रखी गई अपनी लेटेस्ट रिपोर्ट में भारतीय वायुसेना (IAF) के पायलट प्रशिक्षण में गंभीर खामियों को उजागर किया था। रिपोर्ट में कहा गया था कि हेलिकॉप्टर पायलटों को Mi-17 V5 जैसे पुराने हेलिकॉप्टरों पर प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इनमें लेटेस्ट एवियोनिक्स की कमी है।

CDS General Bipin Rawat Death: Parliamentary report reveals key findings on helicopter crash!

General Bipin Rawat Death: क्या कहा संसद में पेश रिपोर्ट ने?

हाल ही में संसद में रक्षा मामलों की स्थायी समिति ने इस हादसे पर अपनी रिपोर्ट पेश की। इस रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यह हादसा “मानवीय भूल” (Human Error – Aircrew) की वजह से हुआ। रिपोर्ट में बताया गया कि 2017 से 2022 तक के ‘तेरहवें रक्षा योजना काल’ के दौरान भारतीय वायुसेना में कुल 34 हादसे हुए। इनमें से नौ हादसे केवल 2021-22 के वित्तीय वर्ष में हुए, और जनरल रावत का हेलिकॉप्टर क्रैश इन्हीं में से एक था।

India-China: पैंगोंग झील में चीन की बड़ी कारस्तानी! डिसइंगेजमेंट और वार्ता के बावजूद फिंगर-4 के आगे जारी है निर्माण कार्य

यह पहली बार नहीं है जब “मानवीय भूल” को हादसे का कारण बताया गया हो। 2022 में भी जांच टीम ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट में इसी निष्कर्ष की ओर इशारा किया था।

General Bipin Rawat Death: क्या हुआ था उस दिन?

8 दिसंबर 2021 की सुबह, जनरल बिपिन रावत, उनकी पत्नी और 12 अन्य अधिकारी Mi-17 V5 हेलिकॉप्टर में सवार होकर सुलूर एयरबेस से वेलिंगटन स्थित डिफेंस स्टाफ सर्विस कॉलेज के लिए निकले थे। वेलिंगटन पहुंचने से कुछ ही मिनट पहले हेलिकॉप्टर पहाड़ियों में दुर्घटनाग्रस्त हो गया।

IAF Pilots Training: भारतीय वायुसेना के पायलट ट्रेनिंग प्रोग्राम में खामियां; सीएजी की रिपोर्ट में खुलासा

इस हादसे में जनरल रावत, उनकी पत्नी और 11 अन्य अधिकारियों की तुरंत मौत हो गई। ग्रुप कैप्टन वरुण सिंह, जो कि शौर्य चक्र विजेता थे, इस हादसे में जीवित बचे लेकिन गंभीर रूप से झुलसने के कारण कुछ दिनों बाद उनका भी निधन हो गया।

जांच टीम की रिपोर्ट में क्या आया सामने?

प्रारंभिक जांच में यह बात सामने आई कि मौसम में अचानक आए बदलाव के कारण हेलिकॉप्टर बादलों में प्रवेश कर गया। इससे पायलट दिशाभ्रम का शिकार हो गए और हेलिकॉप्टर “Controlled Flight Into Terrain” (CFIT) का शिकार हो गया।

हालांकि, “मानवीय त्रुटि” का ठीकरा फोड़ने से यह सवाल उठता है कि क्या पायलट को पर्याप्त जानकारी और सहायता दी गई थी? क्या विमानन प्रणाली इतनी मजबूत थी कि ऐसे हालातों से निपट सके?

जांच टीम ने फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर और कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर का विश्लेषण करने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंची। इसके साथ ही टीम ने सभी गवाहों से पूछताछ भी की।

रिपोर्ट में हेलिकॉप्टर के संचालन और रखरखाव पर भी सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि क्या पायलट को ऐसे हालातों से निपटने का समुचित प्रशिक्षण दिया गया था? क्या हेलिकॉप्टर में लगे उपकरण खराब थे, जो मौसम के बदलाव को पायलट को सही समय पर चेतावनी नहीं दे सके? क्या वायुसेना के सुरक्षा प्रोटोकॉल इस हद तक प्रभावी हैं कि इस तरह की त्रासदी को रोका जा सके?

बता दें कि 2022 में सूत्रों ने बताया था कि पायलट की गलती हेलिकॉप्टर दुर्घटना की मुख्य वजह हो सकती है, जिसमें CDS जनरल बिपिन रावत की मृत्यु हुई। अब, संसदीय समिति की रिपोर्ट इस बात की पुष्टि करती है कि दुर्घटना का कारण “मानवीय त्रुटि” थी।

हादसे के बाद ग्रुप कैप्टन वरुण सिंह को गंभीर रूप से जलने की स्थिति में वेलिंगटन से बेंगलुरु के एक सैन्य अस्पताल में ले जाया गया, जहां उन्हें लाइफ सपोर्ट पर रखा गया। दुर्भाग्यवश, उनकी हालत में सुधार नहीं हो सका और वह एक सप्ताह बाद शहीद हो गए।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को इस रिपोर्ट को हल्के में नहीं लेना चाहिए। हादसे के पीछे की खामियों को दूर करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भविष्य में इस तरह की घटनाएं न हों।

क्या कहा था CAG ने अपनी रिपोर्ट में?

भारतीय नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) ने संसद के सामने रखी गई अपनी लेटेस्ट रिपोर्ट में भारतीय वायुसेना (IAF) के पायलट प्रशिक्षण में गंभीर खामियों को उजागर किया था। रिपोर्ट में वायुसेना के ‘स्टेज-1’ प्रशिक्षण में इस्तेमाल हो रहे Pilatus PC-7 Mk-II विमान की खामियों को भी बताया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक 64 विमानों में से 16 (25%) में 2013 से 2021 के बीच 38 बार इंजन ऑयल लीक की घटनाएं दर्ज की गईं।

सथ ही, CAG की रिपोर्ट में ‘स्टेज-2’ और ‘स्टेज-3’ पायलट ट्रेनिंग में पुरानी तकनीक और उपकरणों के इस्तेमाल पर भी सवाल उठाए गए। रिपोर्ट में कहा गया कि हेलिकॉप्टर पायलटों को Mi-17 V5 जैसे पुराने हेलिकॉप्टरों पर प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इनमें लेटेस्ट एवियोनिक्स की कमी है, जिसके कारण ऑपरेशनल यूनिट्स को अतिरिक्त प्रशिक्षण की जरूरत पड़ती है। वहीं, ट्रांसपोर्ट पायलटों को डॉर्नियर-228 जैसे पुराने विमानों पर प्रशिक्षित किया जा रहा है। इन विमानों में आधुनिक कॉकपिट की सुविधाएं नहीं हैं।

CAG ने वर्चुअल रियलिटी (VR) सिमुलेटर और फ्लाइंग ट्रेनिंग डिवाइस (FTD) की उपयोगिता पर भी सवाल उठाए। कहा, ये सिमुलेटर केवल प्रोसिजरल ट्रेनिंग देते हैं और रियल टाइम फ्लाइट एक्सपीरियंस का अहसास नहीं कराते।

India-China: पैंगोंग झील में चीन की बड़ी कारस्तानी! डिसइंगेजमेंट और वार्ता के बावजूद फिंगर-4 के आगे जारी है निर्माण कार्य

India-China: Despite Disengagement, China Continues Construction Beyond Finger-4 at Pangong Lake
Source: Damien Symon

India-China: पूर्वी लद्दाख के पैंगोंग झील के इलाके में चीन की तरफ निर्माण गतिविधियों के जारी रहने की नई सैटेलाइट तस्वीरें सामने आई हैं। चीन ने 21 अक्तूबर को हुए डिसइंगेजमेंट और कई दौर की वार्ताओं के बावजूद बफर ज़ोन से आगे के इलाकों में बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य शुरू कर दिया है। इन तस्वीरों से पता चलता है कि फिंगर-4 (फॉक्सहोल पॉइंट) से आगे के क्षेत्रों में, जो अब एक बफर ज़ोन के अंतर्गत आते हैं, चीन ने बड़ी निर्माण गतिविधियां शुरू कर दी हैं। इसमें सिरिजाप और रिमुचांग जैसे क्षेत्रों में पेट्रोल बोट बेस का विस्तार करते हुए देखा गया है।

India-China: Despite Disengagement, China Continues Construction Beyond Finger-4 at Pangong Lake
Source: Damien Symon

India-China: क्या कहती हैं सैटेलाइट तस्वीरें?

14 दिसंबर 2024 को ली गई सैटेलाइट तस्वीरों से यह पता चलता है कि चीन सिरिजाप और रिमुचांग पेट्रोल बोट बेस के पास नए निर्माण कार्य कर रहा है। सिरिजाप क्षेत्र में कई नई इमारतें निर्माणाधीन हैं और झील के किनारे पर नए निर्माण की संभावना दिखाई दे रही है। रिमुचांग बेस पर भी नए निर्माण कार्य की तस्वीर साफ तौर पर दिखाई दे रही है।

India-China Talks: क्या है 2005 का समझौता जिस पर चीन है अटका? और भारत को क्यों नहीं है स्वीकार

इसके अलावा, खुरनाक फोर्ट के पास एक पुराने निर्माण स्थल को बड़े हेलीपैड में बदलने की पुष्टि हुई है। पैंगोंग ब्रिज, जो झील के उत्तर और दक्षिण किनारों को जोड़ता है, के पास भी चीन की गतिविधियां बढ़ती हुई दिखाई दे रही हैं।

India-China: डिसइंगेजमेंट के बाद भी चीन का खेल जारी

पिछले साल भारत और चीन के बीच हुए डिसइंगेजमेंट समझौते में दोनों देशों ने फिंगर-4 और अन्य विवादित क्षेत्रों में सैन्य बलों को पीछे हटाने और बफर ज़ोन बनाने का फैसला किया था। इसका उद्देश्य था कि सीमा पर शांति और स्थिरता बनाई जा सके। लेकिन नई तस्वीरें बताती हैं कि चीन ने समझौते का सम्मान नहीं कर रहा है, बल्कि अपनी सैन्य गतिविधियों को बफर ज़ोन के आगे बढ़ा रहा है।

India-China: बसा रहा है बस्ती

इससे पहले इस साल 21 अक्तूबर को भारत-चीन डिसइंगेजमेंट समौते से पहले 14 अक्तूबर को भी सैटेलाइट तस्वीरों में खुलासा हुआ था कि चीन पैंगॉन्ग झील के उत्तरी तट पर एक बड़ी बस्ती का निर्माण कर रहा है। यह नई गतिविधि भारत और चीन के बीच 2020 के संघर्ष बिंदुओं से लगभग 38 किलोमीटर पूर्व में हो रही है। अमेरिकी कंपनी मैक्सार टेक्नोलॉजीज द्वारा अक्टूबर 2024 में कैप्चर की गई सैटेलाइट तस्वीरों से पता चल था कि झील के पास करीब 17 हेक्टेयर क्षेत्र में चीन ने तेजी से निर्माण कार्य शुरू कर दिया है। इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में निर्माण और मिट्टी हटाने वाली मशीनरी सक्रिय है।

India-China Disengagement: चीन का दोहरा रवैया, बातचीत में सहमति लेकिन LAC पर सैनिकों का जमावड़ा

चीन ने इस क्षेत्र में हेलीकॉप्टर ऑपरेशन के लिए 150 मीटर लंबी आयताकार पट्टी का निर्माण भी किया है। यह निर्माण अप्रैल 2024 में शुरू हुआ था। माना जा रहा था कि यह बस्ती चीन के लिए एक “एड-हॉक फॉरवर्ड बेस” के रूप में काम कर सकती है। इससे चीनी सेना के लिए रेस्पॉन्स टाइम में कमी आएगी।

बुधवार को हुई थी विशेष प्रतिनिधि वार्ता

इससे पहले बुधवार 18 दिसंबर को बीजिंग में हुई भारत-चीन सीमा वार्ता में दोनों पक्षों ने “छह बिंदुओं पर सहमति” बनाई है। चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने 23वें विशेष प्रतिनिधि (SR) स्तर की वार्ता में निम्नलिखित छह बिंदुओं पर सहमति व्यक्त की। यह 23वीं विशेष प्रतिनिधियों की वार्ता थी, जो पांच साल के अंतराल के बाद आयोजित की गई। पिछली बार 2019 में यह बैठक भारत में हुई थी।

पेंटागन की रिपोर्ट में खुलासा, LAC पर है चीनी सैनिकों का जमावड़ा

अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) की हाल ही में जारी वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) अब भी LAC पर अपने बड़े सैन्य जमावड़े और बुनियादी ढांचे को बनाए हुए है। रिपोर्ट में कहा गया है कि “2020 के संघर्ष के बाद से PLA ने अपनी तैनाती या सैनिकों की संख्या में कोई कमी नहीं की है और LAC के साथ कई ब्रिगेड स्तर की तैनाती के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण किया है।”

रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्वी लद्दाख के डेपसांग और डेमचोक में सैनिकों के पीछे हटने के बावजूद PLA ने लगभग 1.2 लाख सैनिक, टैंक, हॉवित्जर, सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें और अन्य भारी हथियार LAC पर तैनात किए हुए हैं।

LAC के तीन प्रमुख सेक्टरों—पश्चिमी (लद्दाख), मध्य (उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश), और पूर्वी (सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश)—में PLA के 20 से अधिक कॉम्बाइंड आर्म्स ब्रिगेड्स (CABs) मौजूद हैं। सूत्रों के अनुसार, “कुछ CABs वापस जा चुके हैं, लेकिन अधिकांश अभी भी वहीं तैनात हैं।”

Sukhoi-30: अब सुखोई-30 भी चला LCA तेजस की राह पर! सुस्त HAL ने 12 SU-30 की डिलीवरी को भी लटकाया! आत्मनिर्भरता पर उठे सवाल

sukhoi-30-hal-delays-delivery-questions-on-atmanirbhar-bharat-initiative

Sukhoi-30: भारत के स्वदेशी हल्के फाइटर जेट तेजस के इंजन की डिलीवरी में हो रही देरी से पहले ही भारतीय एयरफोर्स फाइटर स्क्वाड्रन की कमी से जूझ रही है। वहीं अब सुखोई-30 को लेकर भी भारतीय वायुसेना को बड़ा झटका लगा है। सूत्रों के मुताबिक सरकारी विमान निर्माता कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) अब भारतीय वायुसेना (IAF) के लिए नए सुखोई-30 विमानों की डिलीवरी अप्रैल 2027 में शुरू करेगी। रक्षा मंत्रालय ने हाल ही में 12 सुखोई-30 विमानों के लिए HAL के साथ 13,500 करोड़ रुपये के अनुबंध पर दस्तखत किए थे। लेकिन डिलीवरी की समयसीमा और देरी पर अब सवाल उठ रहे हैं।

sukhoi-30-hal-delays-delivery-questions-on-atmanirbhar-bharat-initiative

वहीं, इन विमानों की डिलीवरी में होने वाली देरी ने सरकार की आत्मनिर्भर भारत योजना और रक्षा उत्पादन में स्वदेशीकरण की दिशा में उसके प्रयासों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

Sukhoi-30: क्यों हो रही है देरी?

सरकार के आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत इस कॉन्ट्रैक्ट को “देश में रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने वाला” बताया गया है। लेकिन असलियत में, HAL के नासिक स्थित उत्पादन केंद्र को फिर से एक्टिव करने और उत्पादन प्रक्रिया शुरू करने में लंबा वक्त लगने वाला है। सूत्रों के अनुसार, पहला सुखोई विमान 2027 में रोल आउट होगा, जबकि आखिरी विमान 2029 तक तैयार होगा। HAL के एक अधिकारी ने बताया, “तैयारी अब शुरू हो रही है। अधिकांश स्ट्रक्चरल हिस्सा और कंपोनेंट्स स्थानीय विक्रेताओं द्वारा निर्मित और सप्लाई किए जाएंगे। जबकि कुछ सामान रूस से आयात किया जाएगा।” जबकि ओडिशा के कोरापुट में AL-31FP इंजनों का निर्माण किया जाएगा, लेकिन इसमें भी समय लगेगा। बता दें कि HAL ने नासिक स्थित अपने सुखोई उत्पादन लाइन को दोबारा शुरू करने का निर्णय लिया है। यह वही लाइन है जहां पहले भी MIG और सुखोई जैसे लड़ाकू विमान बनाए गए थे।

LCA Tejas: भारत के स्वदेशी फाइटर जेट तेजस के प्रोडक्शन में तेजी लाने पर जोर, संसदीय समिति ने रक्षा मंत्रालय को दिए निर्देश

Sukhoi-30 की देरी से होगी ऑपरेशनल क्षमता प्रभावित

IAF पहले ही 260 सुखोई-30 विमानों का बेड़ा संचालित करता है। जिनमें से 50 रूस से आए थे और बाकी HAL द्वारा भारत में बनाए गए थे। ये 12 अतिरिक्त विमान उन विमानों की भरपाई के लिए हैं, जो दुर्घटनाओं में खो गए। लेकिन देरी के कारण वायुसेना की ऑपरेशनल क्षमताओं पर असर पड़ सकता है।

IAF के लिए सुखोई-30 विमान का महत्व किसी से छिपा नहीं है। लेकिन 2027 तक पहले विमान की डिलीवरी और 2029 तक अंतिम विमान के तैयार होने का मतलब है कि वायुसेना को मौजूदा संसाधनों के साथ काम करना होगा।

स्वदेशीकरण पर बड़े दावे, लेकिन हकीकत क्या है?

HAL ने दावा किया है कि सुखोई-30 विमानों में 62.6 फीसदी स्वदेशी सामग्री होगी। लेकिन महत्वपूर्ण हिस्से और सामग्री अभी भी रूस से आयात किए जाएंगे। इससे पहले सितंबर 2024 में, रक्षा मंत्रालय ने HAL के साथ 26,000 करोड़ का कॉन्ट्रैक्ट साइन किया था, जिसके तहत 240 सुखोई-30 विमानों के लिए इंजन तैयार किए जाएंगे। इन इंजनों का उत्पादन उड़ीसा के कोरापुट संयंत्र में किया जाएगा। लेकिन यहां भी, कच्चे माल का आयात रूस से होगा।

IAF Pilots Training: भारतीय वायुसेना के पायलट प्रशिक्षण में खामियां; सीएजी की रिपोर्ट में खुलासा

बता दें कि HAL भारतीय वायुसेना के सुखोई बेड़े को अपग्रेड करने की योजना बना रहा है, जिसमें स्वदेशी “उत्तम रडार” और अन्य आधुनिक उपकरण लगाए जाएंगे। इस पर लगभग 65,000 करोड़ रुपये का खर्च अनुमानित है।

सरकार की योजनाओं पर सवाल

विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार के आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत रक्षा उत्पादन के दावों और वास्तविकता में बड़ा अंतर है। HAL को सुखोई-30 विमानों का उत्पादन शुरू करने में चार साल का समय लग रहा है, जो कि सरकार की बातों के विपरीत है। विशेषज्ञ सवाल उठ रहे हैं कि जब भारत “मेक इन इंडिया” पर जोर दे रहा है, तो जरूरी कंपोनेंट्स और कच्चे माल के लिए अब भी रूस पर निर्भर क्यों है।

रिपोर्ट के अनुसार, अर्मेनिया जैसे देशों ने भारत से सुखोई-30 विमानों को अपग्रेड करने में मदद मांगी है। लेकिन अगर HAL को अपने उत्पादन में ही चार साल लग रहे हैं, तो भारत की अंतरराष्ट्रीय सहयोग क्षमताओं पर भी सवाल खड़े होते हैं।

विशेषज्ञों ने इस देरी को लेकर सरकार पर निशाना साधा है। उनका कहना है, “जब सरकार आत्मनिर्भर भारत की बात करती है, तो HAL जैसे संस्थानों को समय पर डिलीवरी और उत्पादन में सक्षम बनाना चाहिए। लेकिन वास्तविकता यह है कि हम अभी भी रूस और अन्य देशों पर निर्भर हैं। यह किस प्रकार की आत्मनिर्भरता है?”

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि IAF की जरूरतों को पूरा करने में देरी से देश की सुरक्षा पर क्या असर पड़ेगा।

क्या वायुसेना की जरूरतों को पूरा कर पाएगा HAL?

IAF के 12 नए सुखोई-30 विमानों का अनुबंध उन विमानों की भरपाई के लिए है जो हादसों का शिकार हुए हैं। लेकिन यह केवल शुरुआत है। वायुसेना को वर्तमान और भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर उत्पादन की आवश्यकता है। वहीं 2027 से डिलीवरी शुरू होने से वायुसेना की ऑपरेशनल क्षमताओं पर सीधा असर पड़ेगा।  वइसके अलावा पुराने सुखोई विमानों को अपग्रेड करने का काम भी अभी शुरुआती चरण में है, जिसमें कई साल लग सकते हैं।

क्या हैं विकल्प?

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को HAL जैसे संस्थानों को अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ काम करने की आवश्यकता है। निजी कंपनियों को बड़े पैमाने पर रक्षा उत्पादन में शामिल करना एक संभावित समाधान हो सकता है। साथ ही, तकनीकी हस्तांतरण और विदेशी सहयोग के माध्यम से उत्पादन क्षमता बढ़ाई जा सकती है।

India-China Talks: क्या है 2005 का समझौता जिस पर चीन है अटका? और भारत को क्यों नहीं है स्वीकार

India-China Talks: What is the 2005 Agreement China Sticks To, and Why India Disagrees?

India-China Talks: चीन ने हाल ही में बीजिंग में हुई 23वीं भारत-चीन विशेष प्रतिनिधि वार्ता के बाद दावा किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने सीमा विवाद को सुलझाने के लिए “छह बिंदुओं पर सहमति” बनाई है। चीन ने इस वार्ता में 2005 के समझौते का हवाला दिया, जिसमें सीमा विवाद को द्विपक्षीय संबंधों से अलग करने की बात की गई थी।

India-China Talks: What is the 2005 Agreement China Sticks To, and Why India Disagrees?

हालांकि, भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने चीन के इस दावे का कोई उल्लेख नहीं किया। भारतीय बयान में “छह बिंदुओं पर सहमति” का जिक्र नहीं किया गया।

India-China Talks: चीन का दावा और भारत की चुप्पी

चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि दोनों पक्षों ने सीमा विवाद का “उचित समाधान” खोजने के लिए 2005 के राजनीतिक मार्गदर्शक सिद्धांतों के तहत बातचीत जारी रखने की प्रतिबद्धता जताई है।

हालांकि, भारतीय सूत्रों का कहना है कि 2005 के समझौते का बार-बार उल्लेख करना चीन की रणनीति है, क्योंकि इसमें सीमा विवाद को द्विपक्षीय संबंधों से अलग करने की बात कही गई थी, जिसे भारत स्वीकार नहीं कर रहा है।

India-China talks: चीन का दावा ‘छह बिंदुओं पर बनी सहमति’, लेकिन भारत ने साधी चुप्पी!, जानें कहां फंसा है पेंच

2005 का समझौता: क्या कहता है?

2005 में दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों के बीच एक समझौता हुआ था। यह समझौता भारत और चीन के बीच दीर्घकालिक साझेदारी को बढ़ाने और सीमा विवाद को शांतिपूर्ण तरीके से हल करने के लिए किया गया था।

समझौते के मुख्य बिंदु इस प्रकार थे:

  1. सीमा विवाद को शांतिपूर्ण और मित्रतापूर्ण बातचीत के माध्यम से हल किया जाएगा।
  2. सीमा विवाद को द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित नहीं करने दिया जाएगा।
  3. दोनों पक्ष सीमा के अंतिम समाधान तक वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) का सम्मान करेंगे।
  4. सीमा का निर्धारण प्राकृतिक भौगोलिक विशेषताओं के आधार पर किया जाएगा, जो दोनों पक्षों द्वारा सहमति से तय किया जाएगा।
  5. समझौते के तहत, दोनों पक्ष सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए काम करेंगे।

चीन के 2005 समझौते की ओर लौटने की वजह

सूत्रों के अनुसार, चीन ने 2005 के समझौते का उल्लेख इसलिए किया क्योंकि यह सीमा विवाद को द्विपक्षीय संबंधों से अलग करने की बात करता है। चीन हाल के वर्षों में इस पर जोर दे रहा है, लेकिन भारत ने इसे स्वीकार नहीं किया है।

भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि 2020 के पहले की स्थिति बहाल किए बिना द्विपक्षीय संबंध सामान्य नहीं हो सकते। इसका अर्थ है कि जब तक चीन अग्रिम क्षेत्रों से अपने सैनिक वापस नहीं बुलाता, तब तक संबंधों में प्रगति संभव नहीं।

India-China Disengagement: चीन का दोहरा रवैया, बातचीत में सहमति लेकिन LAC पर सैनिकों का जमावड़ा

India-China Talks: समझौते का उल्लंघन और विवाद

2005 के बाद चीन ने कई बार इस समझौते का उल्लंघन किया। रक्षा और सुरक्षा से जुड़े भारतीय सूत्रों का कहना है कि प्रत्येक चीनी घुसपैठ, भले ही वह अस्थायी हो, इस समझौते का उल्लंघन थी।

2013 के देपसांग विवाद, 2017 के डोकलाम गतिरोध और 2020 के गलवान संघर्ष में चीनी घुसपैठ को इस समझौते के उल्लंघन के रूप में देखा गया।

सीमा पर शांति बनाए रखने की प्रतिबद्धता

समझौते में यह भी कहा गया कि अंतिम सीमा समाधान होने तक, दोनों पक्षों को वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) का सम्मान और पालन करना चाहिए।

समझौते के तहत दोनों देशों के बीच 1993 और 1996 के समझौतों के आधार पर सीमा क्षेत्रों में विश्वास निर्माण उपायों को लागू करने और LAC की स्पष्टता सुनिश्चित करने का प्रावधान था।

अक्साई चिन और अरुणाचल पर मतभेद

समझौते में कहा गया था कि दोनों पक्ष सीमा विवाद का “पैकेज समाधान” खोजने के लिए अपने-अपने रुख में बदलाव करेंगे। भारत अक्साई चिन पर दावा करता है, जबकि चीन अरुणाचल प्रदेश, विशेष रूप से तवांग क्षेत्र, पर अपना अधिकार जताता है।

भारतीय पक्ष ने हमेशा इस बात पर जोर दिया है कि चीन को 2020 से पहले की स्थिति में वापस जाना चाहिए, जबकि चीन सीमा विवाद को द्विपक्षीय संबंधों से अलग करना चाहता है।

चीन की  बुनियादी ढांचे पर आपत्ति

भारतीय रणनीति के तहत 2009 से पूर्वी लद्दाख में बुनियादी ढांचे का निर्माण तेज किया गया। यह गति मोदी सरकार के कार्यकाल में और बढ़ी। चीन इसे 2005 के समझौते का उल्लंघन मानता है।

समझौते में कहा गया कि जब तक सीमा का अंतिम समाधान नहीं हो जाता, दोनों पक्षों को LAC का सम्मान करना चाहिए और शांति बनाए रखनी चाहिए।

नए विवाद की शुरुआत?

हालिया वार्ता में चीन ने 2005 के समझौते का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों पक्षों को सीमा विवाद पर “उचित समाधान” खोजने के लिए आपसी समझ और समायोजन करना चाहिए।

हालांकि, भारतीय विदेश मंत्रालय के बयान में इन दावों का कोई जिक्र नहीं था, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या दोनों देशों के बीच सहमति वास्तव में बनी है या नहीं।

भारत और चीन के बीच सीमा विवाद लंबे समय से चल रहा है। 2005 का समझौता इस विवाद को सुलझाने का एक आधार हो सकता था, लेकिन दोनों पक्षों के अलग-अलग दृष्टिकोण और दावों ने इसे और जटिल बना दिया है।