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Republic Day 2025: 15 राज्यों और 11 मंत्रालयों की झांकियां होंगी आकर्षण का केंद्र, इस बार ये होगी थीम

Republic Day 2025: 15 States, 11 Ministries to Showcase 'Swarnim Bharat' Theme

Republic Day 2025: गणतंत्र दिवस 2025 के अवसर पर ‘कर्तव्य पथ’ पर भारत की सांस्कृतिक धरोहर और विकास को प्रदर्शित करने के लिए 15 राज्यों और 11 केंद्रीय मंत्रालयों की झांकियां शामिल होंगी। रक्षा मंत्रालय ने इस बार झांकियों की थीम ‘स्वर्णिम भारत: विरासत और विकास’ (Golden India: Heritage and Development) रखी है।

Republic Day 2025: 15 States, 11 Ministries to Showcase 'Swarnim Bharat' Theme

Republic Day 2025: भारत पर्व 26 जनवरी से 31 जनवरी तक 

रक्षा मंत्रालय ने सोमवार को घोषणा की कि 15 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की झांकियां इस साल कर्तव्य पथ पर प्रदर्शित की जाएंगी। इनमें आंध्र प्रदेश, बिहार, चंडीगढ़, दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव, गोवा, गुजरात, हरियाणा, झारखंड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, पंजाब, त्रिपुरा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल शामिल हैं। इसके अलावा, 11 केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों की झांकियां भी परेड का हिस्सा होंगी।

गणतंत्र दिवस परेड में शामिल न हो पाने वाले राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को ‘भारत पर्व’ में अपनी झांकियां प्रदर्शित करने का अवसर मिलेगा। यह आयोजन 26 जनवरी से 31 जनवरी 2025 तक लाल किले में आयोजित किया जाएगा।

Republic Day 2025: ‘स्वर्णिम भारत’ थीम पर झांकियां

इस वर्ष की थीम का उद्देश्य भारत की सांस्कृतिक विविधता और विकास यात्रा को प्रदर्शित करना है। इस थीम के तहत झांकियां न केवल भारत की सांस्कृतिक धरोहर को उजागर करेंगी, बल्कि आधुनिक भारत की विकास यात्रा को भी दर्शाएंगी।

रक्षा मंत्रालय ने कहा कि झांकियों के चयन की प्रक्रिया पारदर्शी, निष्पक्ष और योग्यता आधारित रही। चयन समिति में कला, संस्कृति, संगीत, वास्तुकला और कोरियोग्राफी के विशेषज्ञ शामिल थे। झांकियों के चयन में मौलिकता, रचनात्मकता, सौंदर्य और ‘विरासत और विकास’ के बीच संतुलन पर जोर दिया गया।

चयन प्रक्रिया और नई पहल

इस वर्ष झांकियों की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए रक्षा मंत्रालय ने पहले से ही एक सुसंगठित प्रक्रिया अपनाई। अप्रैल 2024 में आयोजित एक वरिष्ठ स्तर की बैठक में झांकियों को और बेहतर बनाने के सुझाव दिए गए थे, जिन्हें इस प्रक्रिया में शामिल किया गया।

सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और केंद्रीय मंत्रालयों से झांकियों के प्रस्ताव मांगे गए थे। चयन प्रक्रिया के दौरान विशेषज्ञों की समिति ने झांकियों को उनकी मूल संरचना, संदेश की स्पष्टता और कलात्मक प्रस्तुति के आधार पर चुना।

Delhi Republic Day Tableau: गणतंत्र दिवस परेड में दिल्ली के झांकी विवाद पर रक्षा मंत्रालय ने दिया जवाब, बताया- ये है सच्चाई

इस बार की झांकियों में आधुनिक तकनीक और पारंपरिक कलाओं का मिश्रण होगा। हर झांकी को इस प्रकार डिजाइन किया गया है कि वह न केवल देखने में सुंदर हो, बल्कि संदेशप्रद भी हो।

झांकियां: भारत की विविधता और विकास का प्रतीक

कर्तव्य पथ पर प्रदर्शित होने वाली झांकियां भारत की सांस्कृतिक विविधता और समृद्ध इतिहास को दर्शाएंगी। उदाहरण के तौर पर:

  • गुजरात की झांकी में भारत की प्राचीन वास्तुकला और पर्यावरण संरक्षण को प्रदर्शित किया जा सकता है।
  • कर्नाटक की झांकी में ‘होयसला मंदिर समूह’, जो हाल ही में यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल हुआ है, को दर्शाया जा सकता है।
  • उत्तर प्रदेश अपनी झांकी में काशी विश्वनाथ धाम और राम मंदिर अयोध्या जैसे आधुनिक विकास परियोजनाओं को शामिल कर सकता है।

केंद्रीय मंत्रालयों की झांकियां विभिन्न राष्ट्रीय योजनाओं और परियोजनाओं को दर्शाएंगी। उदाहरण के लिए, ‘स्वच्छ भारत मिशन’, ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे अभियानों को रचनात्मक ढंग से प्रस्तुत किया जाएगा।

‘भारत पर्व’ का आयोजन

गणतंत्र दिवस परेड में शामिल न होने वाले राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए ‘भारत पर्व’ एक विशेष अवसर है। यह आयोजन लाल किले पर 26 जनवरी से 31 जनवरी तक होगा। इसमें राज्यों की झांकियां, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां, हस्तशिल्प, और पारंपरिक व्यंजन शामिल होंगे।

‘भारत पर्व’ का उद्देश्य भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विविधता को देशभर के नागरिकों और विदेशी पर्यटकों के सामने प्रस्तुत करना है। यह आयोजन न केवल एक उत्सव है, बल्कि भारत के विकास और प्रगति का भी प्रतीक है।

15 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का चयन

कर्तव्य पथ पर झांकियों की संख्या सीमित होने के कारण केवल 15 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को प्रदर्शनी के लिए चुना गया है। ये राज्य और यूटी हैं:

  1. आंध्र प्रदेश
  2. बिहार
  3. चंडीगढ़
  4. दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
  5. गोवा
  6. गुजरात
  7. हरियाणा
  8. झारखंड
  9. कर्नाटक
  10. मध्य प्रदेश
  11. पंजाब
  12. त्रिपुरा
  13. उत्तराखंड
  14. उत्तर प्रदेश
  15. पश्चिम बंगाल

11 केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों की भागीदारी

इन राज्यों के अलावा, 11 केंद्रीय मंत्रालय और विभाग भी झांकियों के माध्यम से अपनी उपलब्धियों और योजनाओं को प्रस्तुत करेंगे।

Sheikh Hasina Extradition: क्या भारत शेख हसीना को बांग्लादेश वापस भेजेगा? दोस्ती और कानून के बीच फंसा मामला

Sheikh Hasina Extradition: Will India Send Her Back to Bangladesh?

Sheikh Hasina Extradition: बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने भारत को एक डिप्लोमैटिक नोट भेजकर पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को वापस भेजने का अनुरोध किया है। 77 वर्षीय अवामी लीग की नेता शेख हसीना, जो अपने 16 साल लंबे शासन के बाद बड़े विरोध प्रदर्शनों के चलते 5 अगस्त को भारत आई थीं, लेकिन अब प्रत्यर्पण की मांग ने भारत और बांग्लादेश के बीच एक नया कूटनीतिक और कानूनी मोर्चा खोल दिया है। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत शेख हसीना को बांग्लादेश वापस भेजने के लिए प्रत्यार्पण प्रक्रिया शुरू करेगा या पुरानी दोस्त के लिए बांग्लादेश की मांग को नजरअंदाज करेगा?

Sheikh Hasina Extradition: Will India Send Her Back to Bangladesh?

Sheikh Hasina Extradition:  शेख हसीना के खिलाफ आरोप और अंतर्राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल

ढाका स्थित अंतरराष्ट्रीय अपराध ट्रिब्यूनल (ICT) ने शेख हसीना और उनके मंत्रियों, सलाहकारों, पूर्व सैन्य और सिविल अधिकारियों के खिलाफ “मानवता के खिलाफ अपराध” और “नरसंहार” के आरोपों में गिरफ्तारी वारंट जारी किया है।

विदेश मामलों के सलाहकार तौहीद हुसैन ने कहा, “हमने भारत को नोट वर्बेल (राजनयिक संदेश) भेजकर अनुरोध किया है कि शेख हसीना को वापस भेजा जाए ताकि उनके खिलाफ न्यायिक प्रक्रिया शुरू हो सके।”

Sheikh Hasina: शेख हसीना को वापस भेजें ढाका, बांग्लादेश ने की भारत से मांग

इस बीच, बांग्लादेश के गृह सलाहकार जहांगिर आलम ने बताया कि उनके कार्यालय ने भारतीय विदेश मंत्रालय को एक पत्र भेजा है, जिसमें शेख हसीना की प्रत्यर्पण प्रक्रिया को तेज करने की मांग की गई है।

भारत-बांग्लादेश प्रत्यर्पण संधि, 2013 और भारत का प्रत्यर्पण अधिनियम, 1962

शेख हसीना के प्रत्यर्पण का मामला दो प्रमुख कानूनों पर आधारित है:

  1. भारत-बांग्लादेश प्रत्यर्पण संधि, 2013: इस संधि के अनुच्छेद 1 और 2 के अनुसार, प्रत्यर्पण का अनुरोध तभी किया जा सकता है जब संबंधित व्यक्ति के खिलाफ औपचारिक आरोप लगाए गए हों। शेख हसीना के मामले में, अंतरराष्ट्रीय अपराध ट्रिब्यूनल ने उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया है।
  2. भारत का प्रत्यर्पण अधिनियम, 1962: इस अधिनियम के सेक्शन 31 में स्पष्ट किया गया है कि “किसी भी राजनीतिक कारण से अपराध के आरोपी व्यक्ति को प्रत्यर्पित नहीं किया जा सकता।” इसी के तहत, भारत यह तर्क दे सकता है कि शेख हसीना पर लगाए गए आरोप राजनीतिक प्रकृति के हैं।

Sheikh Hasina Extradition: क्या हैं भारत के पास विकल्प

भारत-बांग्लादेश संधि और भारत के प्रत्यर्पण अधिनियम के तहत, भारत को शेख हसीना को प्रत्यर्पित करने का कोई कानूनी दायित्व नहीं है, खासकर जब आरोप राजनीतिक प्रकृति के माने जा सकते हैं।

संधि के अनुच्छेद 6 (1) के तहत, यदि अपराध राजनीतिक चरित्र का हो, तो भारत प्रत्यर्पण से इनकार कर सकता है। इसके अतिरिक्त, अनुच्छेद 8 (3) के तहत यह साबित करना आवश्यक है कि आरोप “न्याय के हित में” और “सद्भावना” के तहत लगाए गए हैं।

शेख हसीना ने युनुस को बताया तानाशाह

शेख हसीना ने अंतरिम सरकार और उनके प्रमुख, नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद युनुस पर गंभीर आरोप लगाए हैं। शेख हसीना ने बांग्लादेश की अंतरिम सरकार पर “तानाशाही” का आरोप लगाया है। उन्होंने एक वर्चुअल संबोधन में कहा कि युनुस उनके शासन को गिराने के पीछे “मुख्य साजिशकर्ता” हैं और “बांग्लादेश अब एक तानाशाही शासन के कब्जे में है, जहाँ लोगों के लोकतांत्रिक अधिकार समाप्त कर दिए गए हैं।”

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अल्पसंख्यकों और धार्मिक स्थलों पर हमले बढ़ गए हैं, जिससे बांग्लादेश का लोकतांत्रिक ढांचा खतरे में है। इन परिस्थितियों में, भारत के लिए यह तय करना कठिन हो जाता है कि वह शेख हसीना को प्रत्यर्पित करे या नहीं।

हसीना ने आरोप लगाया कि उनके शासन के दौरान गरीबी उन्मूलन और आधारभूत ढांचे के विकास के क्षेत्र में हुई प्रगति को मुहम्मद यूनुस की अगुवाई वाली सरकार ने नुकसान पहुँचाया है।

भारत के लिए कूटनीतिक चुनौती

भारत और बांग्लादेश के संबंध ऐतिहासिक हैं। भारत और बांग्लादेश के बीच लंबे समय से घनिष्ठ संबंध रहे हैं। बांग्लादेश के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भारत ने अहम भूमिका निभाई थी। लेकिन मौजूदा हालात से दोनों देशों के संबंधों में तनाव बढ़ सकता है। हाल ही में, भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने ढाका का दौरा किया और अंतरिम सरकार के साथ इस मुद्दे पर चर्चा की। रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों पर अपनी चिंता व्यक्त की।

मिसरी ने कहा, “हमने इस संबंध में ईमानदारी और रचनात्मकता के साथ चर्चा की।” हालांकि, इस बैठक में शेख हसीना के भारत में ठहरने का मुद्दा भी उठा, जिससे मामला और जटिल हो गया।

प्रत्यर्पण का संभावित परिणाम

विशेषज्ञों का मानना है कि कानूनी दृष्टिकोण से देखा दजाए तो भारत के पास शेख हसीना को प्रत्यर्पित करने के लिए कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। लेकिन राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा जााए तो यह मामला भारत और बांग्लादेश के संबंधों पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकता है। वहीं, अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य से देखा जाए तो, भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसके फैसले से उसकी निष्पक्षता और पड़ोसी देशों के साथ उसके संबंध प्रभावित न हों।

पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने कहा,

“बांग्लादेश जानता है कि भारत ऐसा नहीं करेगा। यह एक राजनीतिक चाल है। राजनीतिक प्रत्यर्पण भारत-बांग्लादेश प्रत्यर्पण संधि के दायरे में नहीं आता। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार इस अव्यवस्थित कदम से भारत को राजनीतिक रूप से चुनौती देने पर तुली हुई लगती है। इससे दोनों देशों के संबंधों में लगातार समस्याएं पैदा होंगी। यूनुस सरकार को उन ताकतों से समर्थन मिल रहा है जिन्होंने बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन का समर्थन किया था, और अब वह भारत का सामना करने के लिए प्रोत्साहित महसूस कर रही है। यह घटना विदेश सचिव मिसरी की सौहार्दपूर्ण बांग्लादेश यात्रा के बाद हुई है, जो दिखाती है कि वहां के इस्लामवादी भारत के साथ संबंधों को सुधारने के लिए तैयार नहीं हैं और संबंधों को पीछे ले जाने पर आमादा हैं।”

विदेश मामलों के जानकार ब्रह्मा चेलानी ने बांग्लादेश का तमाशा करार दिया है। उन्होंने मौजूदा युनुस सरकार के लिए कहा,

“एक ऐसा शासन, जिसे न तो संवैधानिक वैधता प्राप्त है और न ही जनादेश, जो भीड़ हिंसा के बल पर सत्ता में आई है, ने भारत को एक नोट वर्बेल भेजकर निष्कासित प्रधानमंत्री की वापसी का अनुरोध किया है, जिन्हें सेना ने उनके इस्तीफा देने से पहले ही भारत भेज दिया।”

क्या कहता है भारत का प्रत्यर्पण अधिनियम 1962?

भारत का प्रत्यर्पण अधिनियम, 1962, प्रत्यर्पण के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश प्रदान करता है। इसमें कहा गया है कि किसी भी व्यक्ति को प्रत्यर्पित नहीं किया जा सकता यदि:

  • अपराध राजनीतिक प्रकृति का हो।
  • आरोप न्याय और सद्भावना के हित में न लगाए गए हों।

क्या होगा भारत का फैसला?

शेख हसीना का प्रत्यर्पण न केवल एक कानूनी मामला है, बल्कि यह भारत के लिए कूटनीतिक संतुलन की परीक्षा भी है।कानूनी दृष्टिकोण से भारत इस मामले में प्रत्यर्पण से इनकार कर सकता है। वहीं, राजनीतिक दृष्टिकोण से भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसके फैसले से उसके पड़ोसी देशों के साथ उसके संबंध प्रभावित न हों। अब देखने वाली बात होगी कि क्या भारत अपनी पुरानी दोस्त शेख हसीना को वापस भेजेगा या उनके लिए कूटनीतिक समर्थन जारी रखेगा? यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत इस संवेदनशील मुद्दे को कैसे हल करता है।

Sheikh Hasina: शेख हसीना को वापस भेजें ढाका, बांग्लादेश ने की भारत से मांग

Sheikh Hasina slams ICT verdict

Sheikh Hasina: बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने भारत को एक कूटनीतिक नोट भेजकर निवर्तमान प्रधानमंत्री शेख हसीना को ढाका वापस भेजने का अनुरोध किया है। 77 वर्षीय अवामी लीग नेता शेख हसीना 5 अगस्त से भारत में रह रही हैं, जब उन्हें अपने 16 साल लंबे शासन के दौरान बड़े विरोध प्रदर्शनों के बीच देश छोड़ना पड़ा था।

Sheikh Hasina: Bangladesh Requests India to Send Her Back to Dhaka

Sheikh Hasina: अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण का वारंट

ढाका स्थित इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (ICT) ने शेख हसीना, उनके मंत्रियों, सलाहकारों और पूर्व सैन्य व सिविल अधिकारियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया है। इन सभी पर “मानवता के खिलाफ अपराध और नरसंहार” के आरोप लगाए गए हैं।

बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के विदेश मामलों के सलाहकार तौहीद हुसैन ने बताया, “हमने भारत सरकार को एक कूटनीतिक संदेश भेजा है, जिसमें कहा गया है कि बांग्लादेश उन्हें न्यायिक प्रक्रिया के लिए वापस लाना चाहता है।”

Sheikh Hasina: भारत से प्रत्यर्पण का अनुरोध

बांग्लादेश के गृह सलाहकार जहांगिर आलम ने कहा कि उनके कार्यालय ने भारतीय विदेश मंत्रालय को शेख हसीना के प्रत्यर्पण को लेकर पत्र भेजा है। उन्होंने मीडिया को बताया, “हमने विदेश मंत्रालय को उनके प्रत्यर्पण के लिए पत्र भेजा है। यह प्रक्रिया अभी चल रही है।”

उन्होंने यह भी बताया कि ढाका और नई दिल्ली के बीच एक प्रत्यर्पण संधि है, जिसके तहत शेख हसीना को वापस लाया जा सकता है।

भारत और बांग्लादेश के कूटनीतिक संबंधों पर असर

शेख हसीना की वापसी का अनुरोध ऐसे समय में आया है जब भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने हाल ही में बांग्लादेश का दौरा किया है। उन्होंने अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार और नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद युनुस से मुलाकात की। ढाका में संवाददाताओं से बात करते हुए, मिसरी ने कहा कि उन्होंने अपने समकक्षों के साथ ईमानदारी और रचनात्मकता से चर्चा की और “अत्यंत महत्वपूर्ण द्विपक्षीय संबंधों” पर विचारों का आदान-प्रदान किया।

मोहम्मद युनुस के कार्यालय ने कहा कि इस मुलाकात के दौरान शेख हसीना के भारत में ठहराव पर भी चर्चा हुई। मुख्य सलाहकार ने कहा था, “हमारे लोग चिंतित हैं क्योंकि वह वहां से कई बयान दे रही हैं। इससे तनाव पैदा होता है।”

शेख हसीना का आरोप

विदेश सचिव की यात्रा से पहले, शेख हसीना ने अंतरिम सरकार पर हमला बोला और मोहम्मद युनुस पर “तानाशाही शासन” चलाने का आरोप लगाया। लंदन में अवामी लीग समर्थकों को दिए वर्चुअल संबोधन में, उन्होंने कहा कि राजनीतिक उथल-पुथल के पीछे युनुस का हाथ है, जिसने उनके शासन को समाप्त कर दिया।

शेख हसीना ने कहा, “5 अगस्त से अल्पसंख्यकों, हिंदुओं, ईसाइयों और बौद्धों के पूजा स्थलों पर हमले बढ़ गए हैं। हम इसकी निंदा करते हैं। जमात और आतंकवादी नई सरकार के तहत स्वतंत्र रूप से काम कर रहे हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “बांग्लादेश अब एक फासीवादी शासन के चंगुल में है, जहां लोगों के लोकतांत्रिक अधिकार खत्म कर दिए गए हैं। हमारे शासन के दौरान गरीबी उन्मूलन, बुनियादी ढांचे के विकास और लोकतंत्र को मजबूत करने की जो उपलब्धियां थीं, उन्हें युनुस के नेतृत्व में खत्म किया जा रहा है।”

बांग्लादेश की अंतरिम सरकार द्वारा भारत को भेजे गए इस डिप्लोमैटिक संदेश ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस मुद्दे का समाधान भारत और बांग्लादेश के कूटनीतिक संबंधों की परीक्षा करेगा।

कई अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हो रहे कथित अत्याचार और मानवाधिकार हनन को लेकर चिंता जता चुके हैं। शेख हसीना ने अल्पसंख्यकों पर हो रहे इन हमलों के लिए अंतरिम सरकार को जिम्मेदार ठहराया है और इसे “लोकतंत्र के लिए खतरा” करार दिया है।

ECHS: आयुष्मान कार्ड को लेकर ईसीएचएस ने पूर्व-सैनिकों को किया सावधान! अगर की ये गलती तो जिंदगी भर पड़ेगा पछताना

ECHS Cautions Veterans: Think Twice Before Opting for Ayushman Card!

ECHS: पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करने के लिए सेंट्रल ऑर्गनाइजेशन ईसीएचएस (Ex-Servicemen Contributory Health Scheme) ने 16 दिसंबर 2024 को एक महत्वपूर्ण फैसला किया है। ईसीएचएस (ECHS) की तरफ से जारी एक आधिकारिक पत्र में यह स्पष्ट किया गया है कि पूर्व सैनिक अब प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (आयुष्मान भारत) का लाभ उठा सकते हैं। हालांकि, इसके साथ कुछ शर्तें और चेतावनियां भी जारी की गई हैं, जो सभी पूर्व सैनिकों को ध्यान में रखनी होंगी।

ECHS Cautions Veterans: Think Twice Before Opting for Ayushman Card!

ECHS: क्या है नया आदेश?

ईसीएचएस की ओर से जारी लेटर में कहा गया है कि प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के तहत आयुष्मान कार्ड का विकल्प पूर्व सैनिकों के लिए खुला है। इसका मतलब यह है कि जो पूर्व सैनिक ईसीएचएस या सीजीएचएस (Central Government Health Scheme) की सुविधाओं का लाभ नहीं ले पा रहे हैं, वे आयुष्मान भारत योजना के तहत इलाज करा सकते हैं।

लेकिन इसके साथ ही यह भी साफ किया गया है कि यदि कोई पूर्व सैनिक ईसीएचएस छोड़कर आयुष्मान भारत के तहत इलाज का विकल्प चुनता है, तो यह प्रक्रिया अपरिवर्तनीय होगी। इसका अर्थ है कि एक बार ईसीएचएस छोड़ने के बाद, वह इसे दोबारा नहीं अपना सकता।

ECHS: और आयुष्मान भारत: क्या है अंतर?

ईसीएचएस (Ex-Servicemen Contributory Health Scheme):
ईसीएचएस पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों को विशेष स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह योजना उन पूर्व सैनिकों की जरूरतों को ध्यान में रखती है, जो कठिन परिस्थितियों में सेना में सेवाएं दे चुके हैं। इसमें सैन्य अस्पतालों के साथ-साथ पैनल में शामिल निजी अस्पतालों में इलाज की सुविधा भी शामिल है।

ECHS Scam: ईसीएचएस योजना में घोटालों से परेशान सेना! रोक लगाने के लिए जारी की ये नई गाइडलाइंस

आयुष्मान भारत (प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना):
आयुष्मान भारत योजना का उद्देश्य गरीब और जरूरतमंद परिवारों को मुफ्त इलाज प्रदान करना है। इसके तहत लाभार्थियों को 5 लाख रुपये तक का कैशलेस और पेपरलेस इलाज की सुविधा मिलती है। इस योजना में सरकारी और निजी दोनों प्रकार के अस्पताल शामिल हैं।

ECHS की अहम शर्त: ‘नो रिटर्न’ का नियम

नए आदेश में यह स्पष्ट किया गया है कि यदि कोई पूर्व सैनिक ईसीएचएस छोड़कर आयुष्मान भारत योजना के तहत इलाज कराने का विकल्प चुनता है, तो वह भविष्य में ईसीएचएस में वापस नहीं आ सकता।

New ECHS Advisory: अगर डिस्पेंसरी में नहीं है दवा तो क्या करें? रक्षा मंत्रालय की तरफ से जारी हुए नए दिशा-निर्देश

इस नियम से उन पूर्व सैनिकों को दिक्कत हो सकती है, जो वर्तमान में ईसीएचएस की सुविधाओं से नाखुश हैं। इसमें कहा गया है कि ईसीएचएस की किसी भी समस्या के बावजूद, इसे छोड़कर आयुष्मान कार्ड का उपयोग करने से पहले पूरी जानकारी और सावधानी बरतनी चाहिए।

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क्या हो सकते हैं फायदे और नुकसान?

फायदे:

  1. आयुष्मान योजना की व्यापकता: आयुष्मान भारत योजना के तहत देशभर में कई अस्पतालों में इलाज की सुविधा मिलती है। इसमें निजी अस्पताल भी शामिल हैं, जो बेहतर सेवाएं प्रदान कर सकते हैं।
  2. कैशलेस इलाज: इस योजना के तहत मरीज को कैशलेस सुविधा मिलती है, जिससे तत्काल इलाज में आसानी होती है।
  3. गरीब परिवारों के लिए मददगार: यह योजना उन पूर्व सैनिकों के लिए लाभकारी हो सकती है, जिनके पास सीमित वित्तीय संसाधन हैं।

नुकसान:

  1. ईसीएचएस सुविधाओं का नुकसान: यदि आप ईसीएचएस छोड़ते हैं, तो आप सैन्य अस्पतालों और ईसीएचएस पैनल के अन्य लाभों से वंचित हो जाएंगे।
  2. अपरिवर्तनीय प्रक्रिया: एक बार ईसीएचएस छोड़ने के बाद, इसे दोबारा अपनाना संभव नहीं होगा।
  3. सीमित विकल्प: आयुष्मान भारत योजना के तहत केवल सूचीबद्ध अस्पतालों में ही इलाज संभव है।

आयुष्मान योजना के तहत क्या मिलेगा?

आयुष्मान भारत योजना में लाभार्थियों को 5 लाख रुपये तक का मुफ्त इलाज मिलता है। इसमें सभी प्रकार की गंभीर बीमारियों का इलाज शामिल है, जैसे कि कैंसर, हृदय रोग, डायबिटीज, आदि। योजना के तहत देशभर के निजी और सरकारी अस्पतालों में इलाज संभव है।

पूर्व सैनिकों के लिए सलाह

1. जल्दबाजी में न लें फैसला:

यदि आप ईसीएचएस सुविधाओं से असंतुष्ट हैं, तो भी इसे छोड़ने से पहले सभी विकल्पों पर गंभीरता से विचार करें।

2. आयुष्मान योजना की जांच करें:

यह सुनिश्चित करें कि आयुष्मान भारत योजना के तहत आपके क्षेत्र में अच्छे अस्पताल उपलब्ध हैं या नहीं।

3. दूसरों से सलाह लें:

अपने साथी पूर्व सैनिकों से बात करें, जिन्होंने आयुष्मान कार्ड का उपयोग किया है, और उनकी राय जानें।

4. शिकायतें दर्ज करें: यदि ईसीएचएस से संबंधित कोई समस्या है, तो उसे संबंधित अधिकारियों के पास दर्ज कराएं।

ECHS: से जुड़े लाभार्थियों के लिए खास जानकारी

  1. मेडिसिन की उपलब्धता: ईसीएचएस में दवाओं की उपलब्धता को लेकर अक्सर शिकायतें मिलती हैं। लेकिन ध्यान रखें कि यह एक आम समस्या है, जिसे समय के साथ हल किया जा सकता है।
  2. रीइंबर्समेंट प्रक्रिया: कई लाभार्थियों ने शिकायत की है कि उन्हें दवाओं और इलाज के लिए रीइंबर्समेंट में देरी का सामना करना पड़ता है।
  3. समस्याओं का समाधान: यदि आप ईसीएचएस की सुविधाओं से असंतुष्ट हैं, तो इसके लिए संबंधित अधिकारियों से संपर्क करें और अपनी समस्या दर्ज करें।

BrahMos Missile Deal: गुड न्यूज! ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल को मिलने वाला है नया खरीदार, भारत-वियतनाम के बीच जल्द हो सकती है डील

BrahMos Missile Deal: India-Vietnam Set to Finalize Agreement Soon!

BrahMos Missile Deal: भारत और वियतनाम के बीच $700 मिलियन की ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल डील पर बातचीत अपने अंतिम चरण में है। इस डील के तहत भारत, वियतनाम की सेना और नौसेना को ब्रह्मोस मिसाइल की आपूर्ति करेगा। समझौते पर हस्ताक्षर अगले कुछ महीनों में होने की उम्मीद है। इस डील के बाद भारत और वियतनाम के बीच रक्षा सहयोग को नई ऊंचाइयां मिलेंगी। अगर यह सौदा होता है, तो वियतनाम भारत से ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने वाला दूसरा देश बन जाएगा। इससे पहले फिलीपींस ने भारत से यह मिसाइल खरीदी थी।

दोनों देशों के बीच इस डील को लेकर कई महीनों से चर्चा हो रही है। यह समझौता अब अपने अंतिम चरण में है और आने वाले कुछ महीनों में इस पर दस्तखत हो सकते हैं।

BrahMos Missile Deal: India-Vietnam Set to Finalize Agreement Soon!

BrahMos Missile Deal: भारत और रूस की तकनीकी साझेदारी

ब्रह्मोस मिसाइल ब्रह्मोस एयरोस्पेस द्वारा विकसित की गई है, जो भारत के रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) और रूस के एनपीओ मशिनोस्ट्रोयेनीया का जॉइंट वेंचर है। ब्रह्मोस मिसाइल की रेंज 290 किलोमीटर से अधिक है और यह 2.8 मैक की गति से अपने लक्ष्य को भेद सकती है। इसे जल, थल और वायु – तीनों माध्यमों से लॉन्च किया जा सकता है, जो इसे एक बहुमुखी मिसाइल प्रणाली बनाता है। वियतनाम की भौगोलिक स्थिति और सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए ब्रह्मोस मिसाइल उनके लिए एक गेम-चेंजर साबित हो सकती है।

BrahMos Aerospace: क्यों विवादों में घिरा देश के लिए अचूक मिसाइल बनाने वाला संस्थान? जानें क्या है पूरा मामला

यदि यह डील पूरी होती है, तो वियतनाम फिलीपींस के बाद ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने वाला दूसरा देश होगा। वियतनाम ने पहले रूस से बास्टियन-पी (K-300P) तटीय रक्षा मिसाइल प्रणाली भी खरीदी है।

BrahMos Missile Deal: डील की प्रक्रिया और शर्तें

वियतनाम ने इस डील के लिए लंबे समय से इंतजार किया है। यह डील ब्रह्मोस एयरोस्पेस से प्रस्तावित मसौदे, फाइनल डील राशि, डिलीवरी शेड्यूल और भुगतान शर्तों के आधार पर की जा रही है। हाल ही में वियतनाम के रक्षा मंत्रालय के साथ तकनीकी और कॉमर्शियल्स डिटेल्स  साझा की गई हैं।

हालांकि, ब्रह्मोस एयरोस्पेस की लीडरशिप में कुछ बदलाव होने के कारण डील में कुछ देरी हुई है। नए सीईओ और एमडी डॉ. जयतीर्थ राघवेंद्र जोशी की नियुक्ति को लेकर कानूनी विवाद चल रहा है। यह मामला सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल, हैदराबाद में विचाराधीन है।

रक्षा सहयोग में नई ऊंचाई

भारत और वियतनाम के बीच रक्षा सहयोग में लगातार वृद्धि हो रही है। हाल ही में हनोई में आयोजित वियतनाम अंतरराष्ट्रीय रक्षा प्रदर्शनी (VIDE24) में भारत ने अपने रक्षा उपकरणों का प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शनी का उद्घाटन वियतनाम के सार्वजनिक सुरक्षा मंत्री जनरल लुओंग टैम क्वांग, भारतीय रक्षा उत्पादन सचिव संजीव कुमार, और भारत के वियतनाम राजदूत संदीप आर्य ने किया। इसके अलावा दोनों देशों ने संयुक्त सैन्य अभ्यास, जैसे VINBAX-2023 और MILAN-2024 में भी भाग लिया है।

ब्रह्मोस एयरोस्पेस, DRDO, HAL और मजगांव डॉक शिपबिल्डर्स ने VIDE24 में हिस्सा लिया। यह प्रदर्शनी भारत और वियतनाम के बीच रक्षा साझेदारी को और मजबूत करने का माध्यम बनी।

सेना के उच्च अधिकारियों का दौरा

भारतीय सेना के उप प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल एन. एस. राजा सुब्रमणि ने वियतनाम का दौरा किया और VIDE24 में भाग लिया। उन्होंने हनोई में वियतनाम पीपल्स आर्मी (VPA) की 80वीं वर्षगांठ समारोह में भी हिस्सा लिया था। इस अवसर पर सेना ने कहा, “यह दौरा दोनों देशों की सेनाओं के बीच सहयोग को मजबूत करता है, जो सामरिक साझेदारी और विश्वास पर आधारित है।”

भारत ने वियतनाम को दीं 12 हाई-स्पीड गार्ड बोट्स

भारत ने 2022 में वियतनाम को $100 मिलियन की रक्षा क्रेडिट लाइन के तहत 12 हाई-स्पीड गार्ड बोट्स सौंपी थीं। 2023 में भारत ने वियतनाम को स्वदेश निर्मित मिसाइल कार्वेट INS किरपान उपहार स्वरूप दिय था। दोनों देशों के बीच एक लॉजिस्टिक सपोर्ट समझौता भी है, जिससे सैन्य ठिकानों का उपयोग मरम्मत के लिए किया जा सकता है।

इसके अलावा, भारत ने वियतनामी सैन्य कर्मियों को प्रशिक्षण दिया है। दिसंबर 2023 में वियतनाम में आयोजित संयुक्त सैन्य अभ्यास VINBAX-2023 में भारतीय सेना की 50 सदस्यीय टुकड़ी ने भाग लिया। वहीं, फरवरी 2024 में वियतनाम की नौसेना ने भारत में अंतरराष्ट्रीय समुद्री अभ्यास MILAN में हिस्सा लिया।

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता का उद्देश्य

भारत और वियतनाम का यह सहयोग हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है। वियतनाम के साथ इस तरह की डील न केवल भारत की सामरिक स्थिति को मजबूत करती है, बल्कि इसे आत्मनिर्भर भारत (Aatmanirbhar Bharat) पहल का एक अहम हिस्सा भी बनाती है।

यह डील दोनों देशों के बीच विश्वास और रणनीतिक साझेदारी का प्रतीक है और इस क्षेत्र में सुरक्षा और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए एक ठोस कदम है।

Delhi Republic Day Tableau: गणतंत्र दिवस परेड में दिल्ली के झांकी विवाद पर रक्षा मंत्रालय ने दिया जवाब, बताया- ये है सच्चाई

Delhi Republic Day Tableau: Defence Ministry Clarifies Controversy

Delhi Republic Day Tableau: गणतंत्र दिवस परेड में दिल्ली की झांकी शामिल न होने के आरोपों पर रक्षा मंत्रालय ने अपनी सफाई दी है। आम आदमी पार्टी (AAP) के मुखिया अरविंद केजरीवाल द्वारा केंद्र सरकार पर लगाए गए पक्षपात के आरोपों को खारिज करते हुए मंत्रालय ने झांकी चयन प्रक्रिया को “पारदर्शी और निष्पक्ष” बताया। इससे पहले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर आरोप लगाया है कि उसने 2025 गणतंत्र दिवस पर दिल्ली की झांकी को जानबूझकर बाहर रखा है। केजरीवाल ने इसे दिल्लीवासियों के खिलाफ “भाजपा की नाराजगी” करार दिया। उन्होंने कहा, “दिल्ली देश की राजधानी है, उसकी झांकी हर साल शामिल होनी चाहिए। ये कैसी राजनीति है? वे दिल्ली और उसके लोगों से इतनी नफरत क्यों करते हैं?”

Delhi Republic Day Tableau: Defence Ministry Clarifies Controversy

झांकी चयन प्रक्रिया: क्या है सच?

रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, गणतंत्र दिवस परेड के लिए झांकी चयन का फैसला रोटेशन सिस्टम के तहत किया जाता है। यह सुनिश्चित करता है कि हर तीन वर्षों में 15 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (UTs) को परेड में शामिल होने का मौका मिले।

सूत्रों ने बताया, “2025 के चक्र के लिए दिल्ली को प्रारंभिक सूची में रखा गया था। दिल्ली की झांकी पिछले दो दशकों में सात बार परेड का हिस्सा रही है। लेकिन  इस बार, दिल्ली की प्रस्तावित झांकी चयन समिति के मानकों पर खरा नहीं उतर सकी।” यह भी ध्यान देने योग्य है कि कुछ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने इस साल झांकी प्रस्ताव ही पेश नहीं किए।

इस प्रक्रिया को पारदर्शिता का प्रमाण देते हुए मंत्रालय ने खुलासा किया कि मिजोरम और सिक्किम ने इस वर्ष कोई प्रस्ताव प्रस्तुत नहीं किया, जबकि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह और लक्षद्वीप चयन बैठक में शामिल नहीं हुए। इसके चलते पांच अतिरिक्त राज्यों — पंजाब, आंध्र प्रदेश, गुजरात, हरियाणा, और उत्तर प्रदेश को मौका दिया गया।

AAP के आरोप बेबुनियाद: मंत्रालय

रक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “चयन प्रक्रिया में पक्षपात के आरोप निराधार हैं। पंजाब, जहां आम आदमी पार्टी सत्ता में है, इस साल हिस्सा ले रहा है। इससे यह स्पष्ट है कि चयन प्रक्रिया निष्पक्ष है।”

अधिकारी ने यह भी बताया कि दिल्ली की झांकी पिछले दो दशकों में सात बार परेड में शामिल हो चुकी है। यह औसत अन्य राज्यों की भागीदारी के समान है। इसके अलावा, गुजरात और उत्तर प्रदेश के अलावा अन्य पांच राज्यों ने हाल के वर्षों में दिल्ली से अधिक बार परेड में भाग लिया है।

राजनीतिक विवाद पर मंत्रालय का रुख

मंत्रालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से अनुरोध किया है कि वे चयन प्रक्रिया को राजनीति से जोड़ने के बजाय गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होने वाली प्रस्तावित झांकी की क्वॉलिटी और क्रिएटिविटी पर ध्यान दें। एक अधिकारी ने कहा, “हम सभी प्रतिभागियों को इंस्पीरेशनल झांकियां तैयार करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं जो परेड के विषयों के अनुरूप हों।”

केजरीवाल का आरोप: दिल्ली के खिलाफ पक्षपात?

पूर्व दिल्ली मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी सरकार दिल्ली और दिल्लीवासियों के प्रति अपनी “नाराजगी” निकाल रही है।

केजरीवाल ने कहा, “दिल्ली की झांकी हर साल गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होनी चाहिए, क्योंकि यह देश की राजधानी है। यह कैसी राजनीति है? केंद्र सरकार दिल्ली और इसके लोगों से इतनी नफरत क्यों करती है? यदि वे दिल्लीवासियों से इतना बैर रखते हैं, तो दिल्ली क्यों उन्हें वोट दे?”

गणतंत्र दिवस की तैयारियों पर विवाद

यह विवाद तब सामने आया है जब 26 जनवरी, 2025 को देश 76वां गणतंत्र दिवस मनाने की तैयारी कर रहा है। झांकी चयन प्रक्रिया में विवाद पहली बार नहीं है। हर साल कई राज्य और केंद्र शासित प्रदेश अपनी झांकियों के चयन न होने पर नाराजगी व्यक्त करते हैं।

झांकी चयन प्रक्रिया: कैसे होता है चुनाव?

गणतंत्र दिवस परेड के लिए झांकी चयन प्रक्रिया में रचनात्मकता, थीम, और प्रस्तुति के कई पहलुओं को ध्यान में रखा जाता है। चयन समिति में जाने-माने कलाकार, डिजाइन विशेषज्ञ, और संस्कृति एवं इतिहास के विशेषज्ञ शामिल होते हैं।

झांकियों को निम्नलिखित बिंदुओं पर आंका जाता है:

  1. थीम की प्रासंगिकता: झांकी का विषय राष्ट्रीय महत्व का होना चाहिए।
  2. क्रिएटिविटी और इनोवेशन : झांकी का डिज़ाइन अनूठा और आकर्षक होना चाहिए।
  3. तकनीकी क्षमता: झांकी का निर्माण ऐसा होना चाहिए कि वह परेड के दौरान सुचारू रूप से संचालित हो सके।

दिल्ली की झांकी: पिछले प्रदर्शन

दिल्ली की झांकी ने पिछले वर्षों में ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को प्रदर्शित किया है। इनमें स्वच्छ भारत अभियान, चांदनी चौक, और किला-ए-मुबारक जैसे विषयों को दिखाया गया। हाल के वर्षों में दिल्ली की झांकी ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसा भी हासिल की।

क्या है झांकी विवाद का भविष्य?

झांकी चयन प्रक्रिया को लेकर हर साल राजनीति और विवाद सामने आते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि झांकी चयन को और अधिक पारदर्शी और सहभागी बनाने की आवश्यकता है। इससे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह भरोसा मिलेगा कि उनकी झांकी को निष्पक्ष रूप से परखा गया है।

गणतंत्र दिवस परेड, भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर को प्रदर्शित करने का एक महत्वपूर्ण मंच है। ऐसे में यह जरूरी है कि झांकियों का चयन केवल उनकी गुणवत्ता और विषयवस्तु के आधार पर हो, न कि राजनीतिक दबाव या विवादों के आधार पर।

Defence Ministry IAF: भारतीय वायुसेना की कमियों को दूर करने के लिए रक्षा मंत्रालय ने बनाई उच्चस्तरीय समिति

India defence indigenisation: Defence Secretary Rajesh Kumar said- Atmanirbhar Bharat in defence is a necessity, not just policy
Defence Secretary Rajesh Kumar Singh

Defence Ministry IAF: भारतीय वायुसेना (IAF) की घटती क्षमता और महत्वपूर्ण संसाधनों की कमी को देखते हुए, सरकार ने एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया है। यह समिति वायुसेना की क्षमता बढ़ाने के लिए नए रोडमैप पर काम करेगी। इस समिति की अध्यक्षता रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह करेंगे। सरकारी सूत्रों के मुताबिक यह समिति तब बनाई गई है, जब पिछले महीने राष्ट्रीय राजधानी में वायुसेना कमांडरों के सम्मेलन के दौरान भारतीय वायुसेना ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को विस्तृत प्रेजेंटेशन दी गई थी।

Defence Ministry IAF: Defence Ministry Forms High-Level Panel to Address IAF Gaps
Defence Secretary Rajesh Kumar Singh

समिति का उद्देश्य वायुसेना की क्षमताओं को बढ़ाने के लिए स्वदेशी डिजाइन और विकास परियोजनाओं के साथ-साथ अधिग्रहण परियोजनाओं पर काम करना है। एक सूत्र ने बताया, “तीनों सेनाओं में, वायुसेना के पास सबसे महत्वपूर्ण क्षमता का अभाव है। समिति जनवरी के अंत तक अपनी रिपोर्ट पेश करेगी।”

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Defence Ministry IAF: समिति के प्रमुख सदस्य

समिति में रक्षा मंत्रालय के अन्य वरिष्ठ सदस्य भी शामिल हैं, जैसे कि रक्षा उत्पादन सचिव संजीव कुमार, रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) के प्रमुख डॉ. समीर वी कामत, और वायुसेना के डिप्टी चीफ एयर मार्शल टी सिंह, जो समिति के सचिव सदस्य हैं। रक्षा वित्त सचिव ने भी पिछले सप्ताह हुई समिति की पहली बैठक में भाग लिया। उम्मीद जताई जा रही है कि समिति अपनी रिपोर्ट अगले दो से तीन महीनों में रक्षा मंत्री को पेश करेगी।

भारतीय वायुसेना के पास केवल 30 फाइटर स्क्वाड्रन

भारतीय वायुसेना अब तक केवल 36 नए राफेल लड़ाकू विमान शामिल कर पाई है, जो 4.5-प्लस जेनरेशन क्षमता वाले हैं। लेकिन वायुसेना को और अधिक संख्या में ऐसे विमानों की जरूरत है ताकि चीन द्वारा पेश खतरों का सामना किया जा सके। चीन, जो पाकिस्तान वायुसेना को भी हथियार और उपकरण उपलब्ध करवा रहा है, अब बांग्लादेश वायुसेना को भी लड़ाकू विमान दे सकता है।

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चीनी वायुसेना द्वारा भारत के सामने वाले सभी हवाई अड्डों, जैसे होटन, काशगर, गारगुंसा, शिगात्से, बांगडा, न्यिंगची और होपिंग में अतिरिक्त लड़ाकू विमानों, बमवर्षकों और ड्रोन की तैनाती के बाद, भारत को अपनी वायुसेना की ताकत बढ़ाने की जरूरत महसूस हो रही है। चीन ने इन हवाई अड्डों को नई रनवे, मजबूत शेल्टर, ईंधन और गोला-बारूद स्टोरेज सुविधाओं से लैस किया है।

वर्तमान में भारतीय वायुसेना केवल 30 लड़ाकू स्क्वाड्रन के साथ काम कर रही है, जबकि चीन और पाकिस्तान से संभावित खतरों से निपटने के लिए 42.5 स्क्वाड्रन की आवश्यकता है।

Defence Ministry IAF: 114 नए लड़ाकू विमानों की परियोजना पर अनिश्चितता

समिति के सामने एक बड़ा सवाल 114 नए 4.5-जनरेशन लड़ाकू विमानों की निर्माण परियोजना पर आ रही अनिश्चितता को हल करना होगा। यह परियोजना लगभग 1.25 लाख करोड़ रुपये की है, जिसमें विदेशी सहयोग के साथ भारत में उत्पादन किया जाएगा। सूत्रों के अनुसार, “कुछ विमान सीधे खरीदे जाएंगे, जबकि बाकी का उत्पादन भारत में होगा।”

हथियारों और मिसाइलों की कमी

वायुसेना के लड़ाकू विमानों में हवाई-से-हवाई और हवाई-से-भूमि मिसाइलों की कमी उत्तरी सीमा पर चीन के मुकाबले बढ़ रही है। इसके अलावा, चीनी बलों के पास लंबी दूरी के सतह-से-सतह मिसाइल सिस्टम अधिक संख्या में और लंबी रेंज के साथ उपलब्ध हैं, जबकि भारतीय बलों के पास ऐसे सिस्टम सीमित संख्या में हैं।

तेजस मार्क-1ए और मार्क-2 के निर्माण में देरी

स्वदेशी तेजस मार्क-1ए विमानों का निर्माण भी प्रमुख मुद्दा है। अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक (GE) से इंजन की आपूर्ति में देरी के कारण यह प्रोजेक्ट बाधित हो गया है।

  • हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) वित्तीय वर्ष 2024-25 में वायुसेना को केवल 2-3 तेजस मार्क-1ए विमान की ही डिलीवरी कर सकेगा, जबकि 16 विमानों की आपूर्ति का वादा किया गया था।
  • फरवरी 2021 में 46,898 करोड़ रुपये की लागत से 83 विमानों का ऑर्डर दिया गया था।
  • 97 और तेजस मार्क-1ए विमानों के लिए ₹67,000 करोड़ की नई परियोजना भी पाइपलाइन में है।

GE ने अब मार्च 2025 तक 99 GE-F404 टर्बोफैन जेट इंजन की आपूर्ति शुरू करने का वादा किया है, जो करीब दो साल की देरी से होगा।

GE-F414 इंजन का को-प्रोडक्शन

HAL और GE भारत में GE-F414 एयरो-इंजन के सह-उत्पादन के लिए अंतिम तकनीकी-व्यावसायिक बातचीत कर रहे हैं। यह इंजन कम से कम 108 तेजस मार्क-2 विमानों के लिए आवश्यक होगा। इसमें $1 बिलियन की लागत से 80% तकनीकी हस्तांतरण की योजना है।

फोर्स-मल्टीप्लायर्स की कमी

भारतीय वायुसेना को अपनी क्षमताओं को बढ़ाने के लिए फोर्स-मल्टीप्लायर्स की आवश्यकता है।

  • वायुसेना के पास केवल 6 IL-78 मिड-एयर रिफ्यूलर हैं, जो 2003-04 में शामिल किए गए थे। जबकि 18 ऐसे विमानों की जरूरत है।
  • भारत “एयर सर्विलांस” के मामले में पाकिस्तान और चीन से भी पीछे है।
  • वायुसेना के पास केवल तीन स्वदेशी ‘नेत्र’ एयरबोर्न अर्ली-वॉर्निंग एंड कंट्रोल (AEW&C) विमान और तीन इजरायली फाल्कन AWACS विमान हैं।

नेत्र विमान परियोजना

स्वदेशी नेत्र विमान परियोजना में तेजी लाने की जरूरत है। योजना के अनुसार, छह मार्क-1ए और छह मार्क-2 संस्करण विकसित किए जाने हैं। यह परियोजना वायुसेना की परिचालन क्षमताओं को बढ़ाने में महत्वपूर्ण होगी।

Army Junior Officers: सरकार ने माना, सेना में कुछ सीनियर अफसर जूनियर अफसरों के साथ कर रहे हैं दुर्व्यवहार

Army Junior Officers: Government Acknowledges Misconduct by Some Senior Officers

Army Junior Officers: लोकसभा में शीतकालीन सत्र में सरकार ने स्वीकार किया कि सेना में 2023-24 के दौरान जूनियर अधिकारियों के साथ “अपमान और शारीरिक दबाव” से जुड़े कुछ मामलों की शिकायतें प्राप्त हुई हैं। रक्षा राज्यमंत्री संजय सेठ से यह पूछे जाने पर कि क्या सरकार को सेना में वरिष्ठ अधिकारियों, विशेष रूप से कमांडिंग अधिकारियों, द्वारा जूनियर अधिकारियों के साथ इस प्रकार के व्यवहार की जानकारी है, तो उन्होंने इसका सकारात्मक जवाब दिया।

Army Junior Officers: Government Acknowledges Misconduct by Some Senior Officers

उन्होंने बताया कि इस प्रकार की “कुछ शिकायतें” सरकार को मिली हैं और सेना में अनुशासन सुनिश्चित करने के लिए एक “अच्छी तरह से स्थापित तंत्र” मौजूद है।

Army Junior Officers: लोकसभा में क्या पूछा गया?

सांसदों ने सरकार से सवाल किया था कि क्या सेना में 2023-24 के दौरान जूनियर अधिकारियों के साथ अपमान और शारीरिक दबाव के मामले सामने आए हैं? यदि हां, तो क्या यह यूनिट के माहौल को प्रभावित कर सकता है? इसके अलावा, ऐसे मामलों को रोकने और जिम्मेदार अधिकारियों को जवाबदेह बनाने के लिए सरकार क्या कदम उठा रही है?

सरकार का जवाब

रक्षा राज्यमंत्री संजय सेठ ने जवाब में कहा, “हां, महोदय। इस अवधि के दौरान कुछ शिकायतें प्राप्त हुई हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि सेना में शिकायतों का समाधान करने और आवश्यक अनुशासन सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत और स्थापित तंत्र मौजूद है।

उन्होंने स्पष्ट किया, “यह तंत्र सुनिश्चित करता है कि सैन्य कर्मियों का मनोबल और एकता प्रभावित न हो।”

सरकार द्वारा स्वीकार किए गए इन मामलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सेना में शिकायत निवारण प्रणाली और अनुशासनात्मक तंत्र के बावजूद, सुधार की गुंजाइश बनी हुई है। यह मुद्दा केवल कुछ शिकायतों तक सीमित हो सकता है, लेकिन यह सेना के संगठनात्मक ढांचे और यूनिट की एकता को प्रभावित कर सकता है।

सेना में अनुशासन और आपसी तालमेल का विशेष महत्व है, और इस प्रकार के मामलों से निपटने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी।

Army Junior Officers: सेना का दृष्टिकोण

विशेषज्ञ मानते हैं कि सेना में उच्चतम स्तर पर अनुशासन और सम्मान बनाए रखना अनिवार्य है। वरिष्ठ अधिकारियों का व्यवहार न केवल इकाई के माहौल को प्रभावित करता है, बल्कि इससे जूनियर अधिकारियों का मनोबल भी गिर सकता है।

शिकायत निवारण तंत्र

रक्षा मंत्रालय के अनुसार, सेना में शिकायत निवारण तंत्र को बेहतर बनाने के लिए समय-समय पर समीक्षा की जाती है। इसमें शिकायतों की पारदर्शी जांच और दोषी अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई शामिल है।

सेना की पारंपरिक प्रणाली और अनुशासन के साथ-साथ, ऐसी घटनाओं से बचने के लिए आधुनिक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। वरिष्ठ अधिकारियों को संवेदनशील और जिम्मेदार बनाने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इन घटनाओं से यह स्पष्ट है कि सेना को न केवल शिकायत निवारण तंत्र को और मजबूत बनाना होगा, बल्कि अंदरूनी संवाद को भी बढ़ावा देना होगा।

  1. सख्त निगरानी: सेना में वरिष्ठ अधिकारियों के व्यवहार की नियमित समीक्षा की जानी चाहिए।
  2. शिक्षा और प्रशिक्षण: वरिष्ठ अधिकारियों को अपने जूनियर सहयोगियों के साथ सहानुभूतिपूर्ण और पेशेवर व्यवहार के लिए प्रशिक्षित करना होगा।
  3. पारदर्शी कार्रवाई: शिकायतों की जांच और कार्रवाई में पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
  4. मनोवैज्ञानिक समर्थन: अधिकारियों के मानसिक स्वास्थ्य और कार्यस्थल के माहौल को बेहतर बनाने के लिए मनोवैज्ञानिक सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

India-China Disengagement: लद्दाख और अरुणाचल के बाद क्या उत्तराखंड बनेगा भारत-चीन के बीच तनाव की बड़ी वजह? पूर्व जनरल ने क्यों जताई आशंका?

india-china disengagement: uttarakhand could be next border flashpoint former Lt general warns

India-China Disengagement: भारतीय सेना की वेस्टर्न कमांड के जीओसी रहे लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) कमलजीत सिंह ने आशंका जताई है कि लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश के बाद चीन की नजर अब उत्तराखंड पर है। उनका कहना है कि लद्दाख में मौजूदा गतिरोध और अरुणाचल प्रदेश के विवादित क्षेत्रों के बाद अब उत्तराखंड का इलाका चीन का अगला निशाना हो सकता है। जनरल सिंह ने यह बात यूट्यूब चैनल रायसीना हिल्स पर एक डिस्कशन के दौरान कही। उन्होंने हाल ही में उनकी किताब ‘जनरल्स जॉटिंग्स: नेशनल सिक्योरिटी, कॉन्फ्लिक्ट्स एंड स्ट्रेटेजीज’ इन काफी चर्चा में है। बता दें कि भारत और चीन के बीच पिछले सप्ताह ही बीजिंग में 23वें विशेष प्रतिनिधि स्तर की वार्ता हुई, जिसमें सीमा तनाव को खत्म करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

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बनाया पहला रीजनल थिंक टैंक “ज्ञान चक्र” 

पांच दशकों तक भारतीय सेना में अपनी सेवाएं दे चुके रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल कमलजीत सिंह, जिन्हें केजे सिंह के नाम से भी जाना जाता है, उन्होंने अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे में बताया कि वे राजस्थान के एक छोटे से कस्बे से आते हैं। सैनिक स्कूल में पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने सेना में जाने का निश्चय कर लिया था। सैनिक स्कूल से सेना में आए। उन्होंने कहा, “मेरे परिवार का सेना से कोई संबंध नहीं था, लेकिन सेना ने मुझे मौके दिए और मेरी काबिलियत को पहचाना।” उन्होंने 63 कैवेलरी रेजिमेंट का हिस्सा बनने और फिर पश्चिमी कमान का नेतृत्व करने को अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि बताया। वे सिक्किम में कोर कमांडर भी रहे, जहां उन्होंने चीन की रणनीतिक गतिविधियों को काउंटर करने में अहम भूमिका निभाई। सेना से रिटायर होने के बाद चंडीगढ़ में पहला रीजनल थिंक टैंक “ज्ञान चक्र” बनाने का श्रेय भी उन्हें जाता है।

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India-China Disengagement: लद्दाख में मौजूदा हालात

जनरल सिंह के अनुसार, भारत-चीन सीमा तीन हिस्सों – पूर्वी, मध्य और पश्चिमी क्षेत्रों में बंटी हुई है। पिछले तीन वर्षों में, चीन ने दो प्रमुख क्षेत्रों – डोकलाम (2017) और पूर्वी लद्दाख (2020) में तनाव पैदा किया है। पूर्वी लद्दाख में हालात अभी भी पूरी तरह से सामान्य नहीं है। उन्होंने कहा, “2020 में गलवान झड़प के बाद से चीन ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है। देपसांग और डेमचोक क्षेत्रों में हमारी पेट्रोलिंग की सीमाएं तय करना भारत के लिए चिंता का विषय है।” उन्होंने कैलाश रेंज पर कब्जे को भारतीय सेना की बड़ी सफलता बताया, लेकिन यह भी जोड़ा कि इसे रणनीतिक रूप से और मजबूत किया जा सकता था। उन्होंने कहा कि कैलाश रेंज न केवल सामरिक दृष्टि से बल्कि मनोवैज्ञानिक बढ़त के लिए भी महत्वपूर्ण है।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि चीन द्वारा बनाए गए नए पुल और बुनियादी ढांचे से उनकी आक्रामक रणनीति स्पष्ट होती है।

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India-China Disengagement: उत्तराखंड: संभावित अगला मोर्चा?

जनरल सिंह ने विशेष रूप से उत्तराखंड सेक्टर चीन की तरफ से तनाव बढ़ने की संभावना जताई। उन्होंने कहा, “चीन, भारत को अलग-अलग मोर्चों पर उलझाए रखना चाहता है। उत्तराखंड के बाराहोती इलाके पर चीन की पहले ही नजर है। सेना को इस क्षेत्र में सतर्क रहना होगा।” उन्होंने आगे कहा कि 1954 में चीन ने उत्तराखंड के बाराहोती क्षेत्र में घुसपैठ की थी। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस क्षेत्र में चीन की रुचि लंबे समय से बनी हुई है। बाराहोती क्षेत्र पर चीन अपना दावा जताता है और यह भारत के लिए एक संवेदनशील क्षेत्र है। उन्होंने चेतावनी दी कि चीन की रणनीति है कि वह छोटे और अप्रत्याशित इलाकों पर अपना दावा करता है। यह इलाका अभी तक अपेक्षाकृत शांत रहा है, लेकिन इसके महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक महत्व को देखते हुए, इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने जोर देकर कहा, “चीन पर भरोसा करना खतरनाक हो सकता है। हमारी तैयारियां सतर्क और दूरदर्शी होनी चाहिए।”

जनरल सिंह के मुताबिक, “चीनी सेना (पीएलए) नए मोर्चों को खोलने में माहिर है, और आने वाले समय में उत्तराखंड के लिपुलेख, बाराहोटी और नीलांग घाटी जैसे क्षेत्रों में तनाव बढ़ सकता है।”

India-China Disengagement: हिमाचल प्रदेश में चीनी खतरा

सिंह ने हिमाचल प्रदेश के रामपुर क्षेत्र में अपनी तैनाती के दिनों को याद करते हुए कहा, “जब मैं पश्चिमी सेना का कमांडर था, तो मुझे बताया गया कि यह एक ‘हॉलिडे सेक्टर’ है। इसे ‘शुगर सेक्टर’ कहा जाता था।” शुगर सेक्टर हिमाचल प्रदेश और लद्दाख के बीच का सीमा क्षेत्र है, जहां चीन का प्रभाव देखा जाता है। उन्होंने हिमाचल प्रदेश के रामपुर और शिपकी ला जैसे क्षेत्रों में भी तैनाती बढ़ाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत ने इस क्षेत्र में अपनी सैन्य ताकत को बढ़ाकर चीन को चुनौती देने की तैयारी की है। हमने इसे 36 ब्रिगेड से 136 स्वतंत्र इंफेंट्री ब्रिगेड बनाया। उस समय, इसमें केवल दो बटालियन थीं। आज, इसमें चार बटालियन हैं। पहले केवल एक लाइट रेजिमेंट थी, जबकि अब एक मीडियम रेजिमेंट और एक लाइट रेजिमेंट भी है।

सिक्किम में चीन की चालें

सिक्किम में कोर कमांडर पद पर रहने के दौरान के अपने अनुभवों को साझा करते हुए, सिंह ने बताया कि कैसे हिमाचल प्रदेश और सिक्किम जैसे क्षेत्रों में चीन ने अचानक गतिविधियां शुरू कर दीं। “सिक्किम में एक जगह है नाकू-ला। जब मैं कोर कमांडर था, तो मुझे बताया गया कि यहां कोई खतरा नहीं है, कुछ नहीं होता। उन्होंने बताया कि लेकिन मेरी सेवा समाप्ति के एक साल बाद, मुझे बताया गया कि चीनी वहां सक्रिय हो गए।” उन्होंने आगे बताया, “नाकू-ला में पहले आईटीबीपी तैनात थी, लेकिन मैंने वहां हमारी इंफेंट्री कंपनी तैनात करने की योजना बनाई। एक साल बाद, चीनी ने वहां सक्रियता दिखाई। इसका मतलब है कि चीनी किसी भी स्थान पर दावा जता सकता है। सिंह ने यह भी बताया कि उनके कार्यकाल के दौरान चीन ने स्मगलर्स गैप, ब्लैक रॉक और नकु पास जैसे स्थानों पर भी अपनी गतिविधियां शुरू कर दीं। बता दें कि नकु पास मुगुथांग घाटी के ग्लेशियर इलाके में स्थित है।

भूगोल और रणनीति का महत्व

जनरल सिंह ने कहा कि भूगोल किसी भी सैन्य रणनीति की रीढ़ होता है। सिक्किम के चुम्बी घाटी से लेकर पूर्वी लद्दाख के दौलत बेग ओल्डी तक, भारत के कई इलाकों में चीनी रणनीति का सामना करने के लिए भूगोल का गहन अध्ययन और औऱ उसका इस्तेमाल जरूरी है। उन्होंने कहा कि चुम्बी घाटी का क्षेत्र सामरिक रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन चीन इसे लगातार अपना विस्तार देने की कोशिश करता है। वहीं, पैंगोंग त्सो के फिंगर 4 से फिंगर 8 तक का इलाका अब बफर जोन है, लेकिन इसका सबसे ज्यादा फायदा चीन को मिलता है। दौलत बेग ओल्डी की बात करें, तो  चीन इस इलाके को अपनी रणनीति में एक कमजोर कड़ी मानता है और यहां तनाव बनाए रखना चाहता है।

सैन्य बलों का पुनर्गठन जरूरी

भारत-चीन सीमा पर तैनात अर्धसैनिक बलों को लेकर जनरल सिंह ने इंटीग्रेटेड कमांड का सुझाव दिया। उन्होंने कहा, “यह आवश्यक है कि सभी अर्धसैनिक बलों जैसे आईटीबीपी, बीएसएफ, और असम राइफल्स को सेना के अधीन लाया जाए। इससे न केवल समन्वय बढ़ेगा बल्कि इन बलों की दक्षता में भी सुधार होगा।” उनका मानना है कि अर्धसैनिक बलों के शीर्ष पदों पर प्रशिक्षित सैन्य अधिकारियों को नियुक्त किया जाना चाहिए और “एक सीमा-एक बल” का सिद्धांत अपनाना चाहिए।

बांग्लादेश और पूर्वोत्तर भारत पर नजर

पूर्वोत्तर भारत के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि बांग्लादेश के साथ संबंधों को मजबूत करना रणनीतिक दृष्टि से जरूरी है। शेख हसीना के कार्यकाल को भारत-बांग्लादेश संबंधों का स्वर्ण युग बताते हुए उन्होंने कहा, “हमारे कूटनीतिक प्रयासों में स्थिरता की कमी रही है, जिससे चीन को इस क्षेत्र में प्रभाव बढ़ाने का मौका मिला।” लेफ्टिनेंट जनरल सिंह वर्तमान में पूर्वोत्तर भारत को लेकर एक नई पुस्तक पर काम कर रहे हैं। उनका कहना है कि भारत की “एक्ट ईस्ट” नीति को तभी सफलता मिलेगी जब पूर्वोत्तर राज्यों के बुनियादी ढांचे और सुरक्षा को मजबूत किया जाएगा।

चीन की मंशा और रणनीति

चीन की दीर्घकालिक रणनीति के बारे में जनरल सिंह ने कहा कि वह “धीरे-धीरे और छोटे-छोटे कदमों” के जरिए अपनी स्थिति मजबूत करता है। उन्होंने बताया कि चीन ने लद्दाख में झीलों और ऊंचे इलाकों में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की है। अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम जैसे इलाकों में चीन ने अपने दावे को बार-बार दोहराया है। उत्तराखंड में चीन का बढ़ता प्रभाव भारत के लिए नई चुनौतियां प्रस्तुत कर सकता है। जनरल सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय सेना ने सीमावर्ती इलाकों में हर चुनौती का सामना किया है। उन्होंने कहा कि चीन से निपटने के लिए केवल सैन्य ताकत ही पर्याप्त नहीं है। हमें अपनी आर्थिक और कूटनीतिक शक्ति का भी उपयोग करना होगा।”

Takshashila Survey 2024: भारत-चीन संबंधों को लेकर क्या सोचती है जनता, लोग बोले- चीन में होता लोकतंत्र तो ऐसे होते हालात

Takshashila Survey 2024: Public on India-China Ties, Democracy in China a Game-Changer?

Takshashila Survey 2024: भारत और चीन के संबंधों को लेकर आम जनता की सोच क्या है? तक्षशिला इंस्टीट्यूट के हालिया सर्वे में इस सवाल का जवाब ढूंढा गया है। यह सर्वे तक्षशिला के इंडो-पैसिफिक स्टडीज प्रोग्राम में स्टाफ रिसर्च एनालिस्ट अनुष्का सक्सेना ने किया है। PULSE OF THE PEOPLE- STATE OF INDIA-CHINA RELATIONS सर्वे के नतीजे बताते हैं कि अधिकांश भारतीयों का मानना है कि सीमा विवाद (लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल – एलएसी) दोनों देशों के रिश्तों में तनाव का मुख्य कारण है। साथ ही, पड़ोसी देशों में चीन के बढ़ते प्रभाव को भी लोग एक बड़ी चुनौती मानते हैं।

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Takshashila Survey 2024: सीमा विवाद है मुख्य कारण

सर्वे में शामिल 54.4 फीसदी लोगों का मानना है कि भारत-चीन संबंधों में तनाव का सबसे बड़ा कारण एलएसी पर चल रहा सीमा विवाद है। यह मसला भारतीय विदेश मंत्रालय द्वारा भी प्रमुखता से उठाया जाता रहा है।

26.6 फीसदी लोगों ने चीन के भारत के पड़ोसी देशों में बढ़ते प्रभाव को दूसरा सबसे बड़ा कारण बताया। यह एक दिलचस्प तथ्य है क्योंकि चीन-पाकिस्तान की दोस्ती, भारत-अमेरिका साझेदारी, और चीन के पक्ष में भारी व्यापार असमानता जैसे मुद्दों को लोग कम प्राथमिकता दे रहे हैं।

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Takshashila Survey 2024: आर्थिक संबंधों पर सकारात्मक रुख

भारत-चीन के आर्थिक संबंधों को लेकर जनता की राय अपेक्षाकृत सकारात्मक रही।

  • व्यापार: 49.6 फीसदी लोगों का मानना है कि चीन के साथ व्यापार बढ़ाना भारत के विकास और सुरक्षा के लिए फायदेमंद है।
  • निवेश: 56.3 फीसदी लोगों ने कहा कि चीन से निवेश भारतीय रोजगार के नए अवसर खोल सकता है।
  • प्रतिभा: 52.4 फीसदी लोगों का मानना है कि अगर किसी विशेष उद्योग में भारतीय प्रतिभा की कमी हो तो चीनी विशेषज्ञों का स्वागत किया जाना चाहिए।

Takshashila Survey 2024: अगर चीन में होता लोकतंत्र…

सर्वे ने यह भी सवाल किया कि क्या चीन में लोकतंत्र होता तो भारत-चीन के रिश्ते बेहतर होते? इस सवाल पर 61.5 फीसदी लोगों का मानना है कि अगर चीन एक बहुदलीय लोकतंत्र होता तो दोनों देशों के रिश्ते बेहतर हो सकते थे। लेकिन 46.6 फीसदी लोगों ने इस बात पर संदेह जताया कि अगर वर्तमान राष्ट्रपति शी जिनपिंग के स्थान पर कोई और होता, तो भी हालात अलग हो सकते थे। यह संकेत देता है कि लोगों का मानना है कि भारत-चीन संबंधों की जटिलता केवल नेतृत्व तक सीमित नहीं है।

भारत का झुकाव किस तरफ: अमेरिका या चीन-रूस?

सर्वे में यह सवाल भी पूछा गया कि अगर भारत को किसी गुट का समर्थन करना पड़े तो वह किसे चुनेगा?  अमेरिकी-नेतृत्व वाले पश्चिम या चीन-रूस।

  • 69.2% लोगों ने कहा कि भारत को अमेरिका-नेतृत्व वाले पश्चिमी देशों के साथ खड़ा होना चाहिए, न कि चीन-रूस के गठजोड़ के साथ।
  • हालांकि, क्वाड (भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया का समूह) को लेकर लोगों की राय मिली-जुली रही। 50.8% लोगों ने इसे “कुछ हद तक प्रभावी” माना, जबकि 44.4% लोगों ने इसे “अप्रभावी” बताया।

तिब्बत और ताइवान पर भारत की नीति

तिब्बत और ताइवान जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भारत की नीति को लेकर लोगों की राय सामने आई। सर्वेक्षण में पूछा गया कि यदि चीन और भारत में निर्वासित तिब्बती प्रशासन अपने-अपने अगले दलाई लामा को चुनते हैं, तो भारत को क्या करना चाहिए।

  • तिब्बत: 64% लोगों ने कहा कि अगर चीन और निर्वासित तिब्बती प्रशासन अपने-अपने दलाई लामा के उत्तराधिकारी घोषित करते हैं, तो भारत को निर्वासित तिब्बती प्रशासन के उम्मीदवार का समर्थन करना चाहिए। 17.9% ने सुझाव दिया कि भारत को किसी भी नाम को मान्यता नहीं देनी चाहिए।
  • ताइवान: ताइवान संघर्ष के मामले में 54.4 फीसदी लोगों ने कहा कि भारत को शांति-दूत की भूमिका निभानी चाहिए। केवल 3.5 फीसदी लोगों ने सैन्य हस्तक्षेप की वकालत की, जबकि 28.7 फीसदी ने अमेरिका को लॉजिस्टिक समर्थन देने की बात कही।

सैन्य और राजनीतिक उपाय

भारत-चीन संबंधों में सुधार के लिए लोगों ने दो प्रमुख सुझाव दिए:

  1. सैन्य क्षमता बढ़ाना: 41.2% लोगों ने कहा कि भारत को अपनी सैन्य ताकत और रोकथाम क्षमता को मजबूत करना चाहिए।
  2. नेताओं के बीच संवाद: 31% लोगों ने उच्च-स्तरीय राजनीतिक वार्ता फिर से शुरू करने की वकालत की।