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F-35 fighter: भारत क्यों खरीदे F-35? अमेरिका को फूटी आंख नहीं सुहाता S-400, नहीं लगा सकेगा ब्रह्मोस! क्या आएंगे केवल 2 स्क्वाड्रन?

F-35 Fighter: Will India Buy It? US Concerned Over S-400, No BrahMos, Only 2 Squadrons?

F-35 fighter: अमेरिकी फाइटर जेट F-35 की खरीद को लेकर तरह-तरह की कयासबाजियां शुरू हो गई हैं। हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के दौरान संकेत दिया था कि भारत को F-35 स्टील्थ फाइटर जेट्स देने की योजना बनाई जा रही है। इस खबर के बाद कयास लगाए जा रहे हैं कि भारत इस सौदे को अंजाम देने के लिए उसी रास्ते पर चल सकता है जिस तरह उसने फ्रांस से राफेल फाइटर जेट्स खरीदे थे।

F-35 Fighter: Will India Buy It? US Concerned Over S-400, No BrahMos, Only 2 Squadrons?

हालांकि, भारत सरकार ने साफ किया है कि अभी तक कोई औपचारिक प्रस्ताव नहीं मिला है, लेकिन अमेरिका के साथ बातचीत जल्द शुरू हो सकती है। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “यह कोई आधिकारिक प्रस्ताव नहीं है। ट्रंप ने सिर्फ यह संकेत दिया है कि अमेरिका इसे संभव बनाने के लिए रोडमैप तैयार कर सकता है। जब हमें औपचारिक प्रस्ताव मिलेगा, तब हम इस पर विचार करेंगे।”

F-35 fighter: क्या भारत सीमित संख्या में F-35 खरीदेगा?

सूत्रों के मुताबिक, भारत सीमित संख्या में F-35 फाइटर जेट्स खरीद सकता है। ठीक वैसे ही जैसे राफेल सौदे में केवल 36 विमान खरीदे गए थे। इसकी वजह यह है कि F-35 की कीमत बहुत ज्यादा है और इसका मेंटेनेंस भी बेहद महंगा है। इसलिए, भारत पूरे बेड़े को अपग्रेड करने के बजाय इसके दो स्क्वॉड्रन बना सकता है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह सौदा होता है, तो यह सरकार-से-सरकार (G2G) डील के तहत होगा, जिससे कीमत और डिलीवरी की गारंटी मिलेगी।

F-35 fighter: अमेरिका की बड़ी चिंता S-400 एयर डिफेंस सिस्टम

अमेरिका ने पहले भारत को F-35 बेचने में दिलचस्पी नहीं दिखाई थी, क्योंकि भारत ने रूस से S-400 एयर डिफेंस सिस्टम खरीदा था। अमेरिकी पेंटागन को चिंता है कि S-400 और F-35 को एक साथ ऑपरेट करना मुश्किल होगा, क्योंकि S-400 को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वह अमेरिकी स्टील्थ विमानों की मूवमेंट को पकड़ सके। सूत्रों के मुताबिक, यदि भारत इस डील को आगे बढ़ाता है, तो अमेरिका भारत से यह सुनिश्चित करने के लिए कड़ी शर्तें रख सकता है कि रूसी सैन्य विशेषज्ञों को F-35 तक पहुंच न मिले।

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अमेरिकी रक्षा विभाग का मानना है कि अगर कोई देश S-400 और F-35 को एक साथ ऑपरेट करता है, तो रूसी रडार सिस्टम अमेरिकी स्टील्थ टेक्नोलॉजी को ट्रैक करने के लिए अपडेट हो सकते हैं। क्योंकि दुनिया में अभी तक किसी भी देश ने S-400 और F-35 दोनों को एक साथ नहीं चलाया है। इससे पहले तुर्किए को भी अमेरिका ने F-35 फाइटर जेट देने से इनकार कर दिया था, क्योंकि उसने भी रूस से S-400 मिसाइलें खरीदीं थीं। वहीं अगर अमेरिका भारत को शर्तों में ढील देता है, तो तुर्किए के लिए F-35 की खरीद के रास्ते खुल सकते हैं। माना जा रहा है कि दोनों सिस्टम्स को अलग रखने के लिए अमेरिका कुछ कड़े मॉनिटरिंग प्रोटोकॉल्स जारी कर सकता है।

F-35 fighter: क्या टेंपरेरी सॉल्यूशन है F-35?

भारत अपनी वायुसेना के बेड़े को अपग्रेड करना चाहता है। भारत का AMCA (Advanced Multirole Combat Aircraft) प्रोग्राम 2036 से पहले तैयार नहीं होगा, और इसमें और देरी भी हो सकती है। इसलिए, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि F-35 को एक टेंपरेरी सॉल्यूशन के तौर पर देखा जा सकता है, जब तक कि भारत का AMCA पूरी तरह तैयार नहीं हो जाता। हाल ही में भारत ने फ्रांस से राफेल मरीन एयरक्राफ्ट खरीदे थे, ताकि स्वदेशी ट्विन इंजन डेक बेस्ड फाइटर्स (TEDBF) के डेवलप होने तक नौसेना की जरूरतें पूरी हो सकें। उसी तरह, F-35 को भी टेंपरेरी सॉल्यूशन माना जा रहा है।

वायुसेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “F-35 बहुत महंगे विमान हैं। न सिर्फ खरीदना, बल्कि इनका रखरखाव और ऑपरेशन भी बेहद खर्चीला है। ऐसे में भारत एक या दो स्क्वाड्रन (36 विमान) तक सीमित रह सकता है।”

क्या F-35 पर ब्रह्मोस मिसाइल लगने देगा अमेरिका?

F-35 एक हाई-टेक स्टील्थ फाइटर जेट है, और अमेरिका इसे केवल उन्हीं देशों को बेचता है जो उसके पार्टनर या नॉटो देश होते हैं। अगर भारत को यह फाइटर जेट मिलते हैं, तो अमेरिका यह सुनिश्चित करेगा कि भारत इसे किसी तीसरे देश (जैसे रूस) को नहीं दिखाएगा या इस पर कोई अतिरिक्त मॉडिफिकेशन नहीं करेगा। यहां कि भारत इसमें अपनी जरूरतों के हिसाब से मिसाइलें भी नहीं लगा सकेगा, जैसे कि सुखोई पर लगाई हैं।

सूत्रों का कहना है कि F-35 फाइटर जेट पर ब्रह्मोस मिसाइल लगाना आसान नहीं होगा। F-35 अमेरिकी तकनीक से बना है और इसमें किसी भी बाहरी हथियार को जोड़ने के लिए अमेरिकी सरकार और लॉकहीड मार्टिन की मंजूरी चाहिए। अब तक अमेरिका ने किसी भी गैर-नाटो या गैर-अमेरिकी मिसाइल को F-35 पर लगाने की अनुमति नहीं दी है।

ब्रह्मोस मिसाइल का आकार और वजन भी समस्या खड़ी कर सकता है। F-35 की स्टील्थ क्षमता बनाए रखने के लिए उसके हथियार इंटरनल बे में रखे जाते हैं, लेकिन ब्रह्मोस इसमें फिट नहीं होती। इसे बाहरी रूप से माउंट किया जा सकता है, लेकिन इससे F-35 का स्टील्थ खत्म हो जाएगा और रडार उसे ट्रेक कर लेंगे। इसके अलावा, अमेरिका के पास पहले से कई विकल्प मौजूद हैं। F-35 के लिए AGM-158 JASSM (स्टील्थ क्रूज मिसाइल), AGM-88 HARM (एंटी-रेडिएशन मिसाइल) और LRASM (एंटी-शिप मिसाइल, जो ब्रह्मोस जैसी ही भूमिका निभाती है) जैसी मिसाइलें हैं। इनका इस्तेमाल अमेरिकी सेना करती है और अगर अगर भारत F-35 लेता है, तो अमेरिका चाहेगा कि भारत इन्हीं मिसाइलों का इस्तेमाल करे। यहां तक कि अगली पीढ़ी की ब्रह्मोस-एनजी भी AMRAAM या JASSM से है।

ब्रह्मोस को पहले से ही Su-30MKI जैसे लड़ाकू विमानों पर तैनात किया जा रहा है और भविष्य में इसे राफेल और स्वदेशी AMCA जैसे विमानों के साथ भी जोड़ा जा सकता है। अगर भारत F-35 खरीदता है, तो वह कुछ हद तक हथियारों को कस्टमाइज़ करने पर बातचीत कर सकता है, लेकिन ब्रह्मोस के इंटीग्रेशन की संभावना कम है।

Minister Piyush Goel with Mr. Michael Williamson, President at Lockheed Martin International
Minister Piyush Goel with Mr. Michael Williamson, President at Lockheed Martin International

क्या ‘मेक इन इंडिया’ होगा F-35?

अमेरिका के साथ इस डील में एक और दिलचस्प पहलू यह है कि क्या इसे ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत भारत में ही बनाया जा सकता है। हालांकि अभी तक का इतिहास रहा है कि अमेरिका इसे खुद बना कर ही एक्सपोर्ट कर रहा है। लेकिन जॉइंट प्रोडक्शन की चर्चाओं को बल तब मिला जब हाल ही में केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने लॉकहीड मार्टिन इंटरनेशनल के अध्यक्ष माइकल विलियमसन के साथ बैठक की और भारत में रक्षा और एयरोस्पेस सेक्टर में निवेश और एयरक्राफ्ट मैन्युफैक्चरिंग के अवसरों पर चर्चा की। हालांकि लॉकहीड मार्टिन ने टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (TASL) के साथ मिलकर भारतीय वायुसेना के C-130J ‘सुपर हरक्यूलिस’ विमानों के लिए देश में पहली मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल (MRO) सुविधा स्थापित करने का एलान किया है। इसके अतिरिक्त, लॉकहीड मार्टिन और टाटा ने भारतीय वायुसेना के मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट (MTA) जरूरतों के लिए C-130J विमानों की लोकल मैन्युफैक्चरिंग और असेंबली की भी पेशकश की है। बता दें कि गुजरात में, टाटा और एयरबस ने वडोदरा में C-295 विमानों के जॉइंट प्रोडक्शन के लिए एक संयंत्र स्थापित किया है, जो भारतीय वायुसेना की ट्रांसपोर्ट जरूरतों को पूरा करेगा। इसलिए ऐसी संभावना बेहद कम है कि F-35 को लॉकहीड मार्टिन भारत में बनाएगी।

Explainer Russia-Ukraine Peace Talks: सऊदी अरब में ही क्यों मिलेंगे जेलेंस्की, पुतिन और ट्रंप? क्या प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के हाथों लिखा जाएगा इतिहास?

Explainer: Russia-Ukraine Peace Talks in Saudi Arabia – Why It Matters?

Russia-Ukraine Peace Talks: अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में एलान किया है कि वह रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ यूक्रेन युद्ध समाप्त करने के लिए बातचीत करेंगे। हालांकि, इस घोषणा के साथ ही कई सवाल खड़े हो गए हैं, खासकर यह कि ट्रंप ने इस वार्ता के लिए सऊदी अरब को ही क्यों चुना है?

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ट्रंप ने इस संभावित वार्ता की कोई निश्चित तारीख नहीं बताई, लेकिन उन्होंने कहा कि यह बैठक निकट भविष्य में हो सकती है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की और सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान भी इसमें शामिल हो सकते हैं। सऊदी अरब ने इस पहल का स्वागत किया है और कहा है कि वह रूस-यूक्रेन के बीच शांति वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभाने के लिए तैयार है।

ट्रंप ने इस वार्ता के लिए पुतिन और जेलेंस्की से फोन पर बातचीत की थी। इसके बाद उन्होंने रूस और अमेरिका के प्रतिनिधियों को बातचीत शुरू करने के लिए कहा। उनकी इस पहल को लेकर सऊदी अरब ने भी बयान जारी कर कहा कि वे इस वार्ता को सफल बनाने में सहयोग करेंगे।

Russia-Ukraine Peace Talks: सऊदी अरब को क्यों चुना गया?

सऊदी अरब को इस वार्ता का स्थल चुनने के पीछे कई कारण हैं। पहला कारण यह है कि यह एक तटस्थ देश है। यूरोप के कई देश यूक्रेन युद्ध में सीधे शामिल हैं, इसलिए वहां वार्ता कराना मुश्किल था। इसी वजह से सऊदी अरब को एक तटस्थ और सुरक्षित स्थान माना गया, जहां रूस और यूक्रेन दोनों पक्ष बिना किसी पूर्वाग्रह के बातचीत कर सकते हैं।

दूसरा बड़ा कारण यह है कि सऊदी अरब और रूस के बीच मजबूत कूटनीतिक और आर्थिक संबंध हैं। 2023 में जब पुतिन ने रियाद का दौरा किया था, तब मोहम्मद बिन सलमान ने उन्हें विशेष मेहमान के रूप में आमंत्रित किया था। इसके अलावा, रूस के खिलाफ इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (ICC) ने अरेस्ट वारंट जारी किया है, लेकिन सऊदी अरब इस कोर्ट का सदस्य नहीं है, जिसका मतलब है कि पुतिन वहां बिना किसी कानूनी डर के आ सकते हैं।

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Russia-Ukraine Peace Talks: मध्यस्थ की भूमिका में सऊदी अरब

सऊदी अरब ने अतीत में भी कई अंतरराष्ट्रीय मामलों में मध्यस्थ की भूमिका निभाई है। उदाहरण के तौर पर, रूस में कैद अमेरिकी नागरिकों की रिहाई में सऊदी अरब की बड़ी भूमिका रही है। हाल ही में रूस ने अमेरिकी टीचर मार्क फोगल को रिहा किया, जिसमें सऊदी अरब का बड़ा योगदान था।

सऊदी अरब ने कई बार पुतिन और जेलेंस्की को शांति समझौते की संभावना तलाशने के लिए न्योता दिया है। उन्होंने 2023 में जेद्दा में एक अंतरराष्ट्रीय सभा आयोजित की थी, जिसमें कई देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए थे।

इस पूरे घटनाक्रम में सऊदी अरब अपनी छवि को और मजबूत कर सकता है। गल्फ मामलों के विशेषज्ञ अब्दुल्ला बाबुद मानते हैं कि सऊदी अरब मध्यस्थ की भूमिका निभाने के साथ-साथ अपने कूटनीतिक संबंधों को भी और गहरा करना चाहता है।

Russia-Ukraine Peace Talks: तेल भी एक महत्वपूर्ण फैक्टर

सऊदी अरब को इस वार्ता के लिए चुनने के पीछे तेल भी एक बड़ा कारक है। अमेरिका, रूस और सऊदी अरब दुनिया के तीन सबसे बड़े तेल उत्पादक देश हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार प्रभावित हुआ है और तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव आया है।

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विशेषज्ञों का मानना है कि इस वार्ता के दौरान तेल की कीमतों को स्थिर रखने पर भी चर्चा हो सकती है। 2024 के अंत में, रूस और सऊदी अरब ने ओपेक प्लस के तहत तेल उत्पादन को सीमित करने का फैसला किया था, ताकि वैश्विक बाजार को स्थिर किया जा सके।

अमेरिका को भी अपने ऊर्जा सेक्टर के लिए सऊदी अरब के साथ मजबूत रिश्ते बनाने की जरूरत है। ट्रंप की प्राथमिकता क्लीन एनर्जी से ज्यादा जीवाश्म ईंधन पर केंद्रित रही है, इसलिए सऊदी अरब उनके लिए एक महत्वपूर्ण साझेदार हो सकता है।

ट्रंप का सऊदी अरब से रणनीतिक जुड़ाव

डोनाल्ड ट्रंप जब 2017 में अमेरिकी राष्ट्रपति बने, तब उनकी पहली विदेश यात्रा सऊदी अरब की थी। इस यात्रा से सऊदी अरब को अंतरराष्ट्रीय मंच पर नई पहचान मिली थी।

ट्रंप ने संकेत दिया है कि अगर वह फिर से राष्ट्रपति बनते हैं, तो उनकी पहली विदेश यात्रा एक बार फिर सऊदी अरब हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर सऊदी अरब 500 अरब डॉलर के अमेरिकी उत्पाद खरीदता है, तो वे वहां जाने को तैयार हैं।

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने भी संकेत दिया है कि वह अगले चार वर्षों में अमेरिका में करीब 500 अरब डॉलर का निवेश करने की योजना बना रहे हैं। ट्रंप ने इसे एक कदम आगे बढ़ाते हुए कहा कि वे चाहते हैं कि यह निवेश 1,000 अरब डॉलर तक पहुंचे।

अमेरिका-सऊदी संबंध और अन्य कूटनीतिक एजेंडे

सऊदी अरब और अमेरिका के बीच संबंध हमेशा आर्थिक और सैन्य रणनीति पर आधारित रहे हैं। बाइडन प्रशासन ने जहां सऊदी अरब के साथ संबंधों को संतुलित किया, वहीं ट्रंप इसे और मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप, सऊदी अरब, अमेरिका और इज़राइल के बीच एक मजबूत गठबंधन बनाना चाहते हैं। इससे मध्य पूर्व में अमेरिका का प्रभाव बढ़ेगा और चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित किया जा सकेगा।

हालांकि, सऊदी अरब को लेकर अमेरिका की नीति हमेशा विवादित रही है। सऊदी अरब का मानवाधिकार रिकॉर्ड खराब रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में इसने धार्मिक पुलिस को हटाने, महिलाओं को गाड़ी चलाने की अनुमति देने जैसे सुधार किए हैं, जिससे उसकी छवि में सुधार आया है।

क्या यह वार्ता सफल होगी?

रूस-यूक्रेन युद्ध अब तक के सबसे लंबे और जटिल युद्धों में से एक बन चुका है। ट्रंप की यह पहल युद्ध को समाप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकती है, लेकिन यह देखना बाकी है कि क्या पुतिन और जेलेंस्की इस वार्ता को गंभीरता से लेते हैं।

सऊदी अरब की इस वार्ता में भूमिका को लेकर भी अलग-अलग विचार हैं। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि यह एक मजबूत शांति वार्ता हो सकती है, जबकि कुछ का कहना है कि सऊदी अरब इस वार्ता से अपने राजनीतिक और आर्थिक हितों को साधने की कोशिश कर रहा है।

फिलहाल, सारी निगाहें इस संभावित वार्ता पर टिकी हैं और आने वाले दिनों में इसका क्या नतीजा निकलता है, यह देखने वाली बात होगी।

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Stryker vs WhAP: Is India's Indigenous Armored Vehicle Superior to the US Infantry Combat Vehicle?

Stryker vs WhAP: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच भारतीय सेना के लिए Stryker Infantry Combat Vehicle (ICV) को खरीदने और भारत में इसके निर्माण को लेकर सहमति बनी है। इस समझौते के तहत 530 Stryker ICV खरीदे जाएंगे, जिनमें से कुछ को सीधे खरीदा जाएगा, जबकि बाकी व्हीकल्स को भारत में साथ मिल कर बनाया जाएगा। इसके अलावा, Javelin एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल और छह P-8I मेरीटाइम सर्विलांस एयरक्राफ्ट भी भारतीय सैन्य ताकत को मजबूत करने के लिए सौदे में शामिल हैं।

Stryker vs WhAP: Is India's Indigenous Armored Vehicle Superior to the US Infantry Combat Vehicle?

अमेरिका ने पहली बार 2000 के दशक में Stryker को भारतीय सेना को बेचने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन तब यह डील अंजाम तक नहीं पहुंच पाई थी। इस दौरान, Stryker केवल भारत-अमेरिका मिलिट्री एक्सरसाइज में ही देखा गया।

पिछले साल, Stryker का लद्दाख में 13,000 से 17,000 फीट की ऊंचाई पर ट्रायल भी किा गया था,  लेकिन भारतीय सेना ने इसमें कुछ कमियां पाईं और इसमें बदलाव की सिफारिश की।

वहीं, 2024 में, Stryker की खरीद को कनाडा में मैन्युफैक्चरिंग होने के चलते रोक दिया गया, क्योंकि भारत और कनाडा के बीच कूटनीतिक तनाव चरम पर था। लेकिन 2025 में, बाइडेन प्रशासन ने भारत में Stryker की मैन्युफैक्चरिंग की अनुमति दे दी। इस योजना के तहत, BEML के साथ साझेदारी में भारत में इसका निर्माण किया जाएगा, जिससे भारतीय सेना की 10 मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री यूनिट्स को इस वाहन से लैस किया जाएगा।

Stryker vs WhAP: भारत के पास है WhAP 

जहां एक ओर भारतीय सेना Stryker को अपनाने की योजना बना रही है, वहीं दूसरी ओर DRDO ने Tata Advanced Systems, महिंद्रा और कल्याणी ग्रुप के सहयोग से Wheeled Armoured Platform (WhAP) डेवलप किया है। यह भारत का पहला स्वदेशी इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल है, जिसे विभिन्न इलाकों में तैनात किया जा सकता है। अब सवाल यह उठता है कि Stryker और WhAP में क्या अंतर है और भारतीय सेना के लिए कौन बेहतर साबित होगा?

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दोनों वाहन आर्मर्ड कैटेगरी में आते हैं, लेकिन इनकी क्षमताएं अलग-अलग हैं। WhAP को सभी प्रकार के इलाकों में चलाने के लिए डिज़ाइन किया गया है, जबकि Stryker को मुख्य तौर पर अर्बन कॉम्बैट के लिए तैयार किया गया है।

WhAP में 600 हॉर्सपावर का इंजन है, जिससे यह पानी और दलदली इलाकों में आसानी से चल सकता है। दूसरी ओर, Stryker 350 हॉर्सपावर इंजन के साथ आता है और इसकी अधिकतम स्पीड 100 किमी/घंटा है, लेकिन यह पानी में चलने में सक्षम नहीं है।

WhAP का वजन 24.5 टन है और इसमें 2+10 लोगों को बैठने की जगह मिलती है, जबकि Stryker का वजन 20.3 टन है और इसमें 3+8 लोगों के बैठने की क्षमता है।

WhAP में न्यूक्लियर सेंसर भी लगा है, जिससे यह रासायनिक, जैविक और परमाणु खतरों का पता लगा सकता है। यह Stryker से हल्का और अधिक फुर्तीला (agile) है, जिससे यह किसी भी प्रकार की सतह पर आसानी से चल सकता है।

WhAP की माइन ब्लास्ट को सहन करने की क्षमता इसे और अधिक सुरक्षित बनाती है। यह कीचड़ और दलदली इलाकों में बेहतर प्रदर्शन करता है। इसकी पावर-टू-वेट रेश्यो 25 है, जो Stryker के 17.24 से कहीं ज्यादा बेहतर है।

Stryker vs WhAP: क्या भारत को जरूरत है Stryker की?

WhAP पहले से ही भारतीय सेना की जरूरतों के हिसाब से डिज़ाइन किया गया है। WhAP को लद्दाख, राजस्थान और पूर्वोत्तर इलाकों में तैनात किया जा सकता है, जबकि Stryker मुख्य रूप से अर्बन वारफेयर के लिए बेहतर माना जाता है। इसके बावजूद, भारत ने Stryker की खरीद और जॉइंट प्रोडक्शन को प्राथमिकता दी है।

इसका कारण यह हो सकता है कि अमेरिका से Stryker खरीदने से भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी और मजबूत होगी। भारत अब अमेरिका के साथ मिलकर आधुनिक रक्षा तकनीक साझा करने की रणनीति अपना रहा है, और Stryker इसी दिशा में एक कदम है।

क्या भारत दोनों वाहनों को तैनात करेगा?

चूंकि Stryker और WhAP दोनों अलग-अलग प्रकार के इलाकों और युद्धों के लिए डिज़ाइन किए गए हैं, इसलिए संभावना है कि भारतीय सेना दोनों को अपने बेड़े में शामिल करे।

WhAP मल्टीपर्पज है औऱ एंफीबियस है, जबकि Stryker के साथ ऐसा नहीं है। स्ट्राइकर को अमेरिकी सेना में पहले से एक भरोसेमंद व्हीकल के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।

लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि भारतीय सेना WhAP को और अधिक प्राथमिकता देती है या Stryker को। फिलहाल, भारत अपनी रक्षा क्षमता को बढ़ाने के लिए इन दोनों विकल्पों को परख रहा है।

Qatar Amir’s India Visit: भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारियों की अपील; कतर में फंसे साथी को भारत वापस लाने की गुहार

Qatar Amir's India Visit: Ex-Naval Officers Urge PM Modi to Help Bring Back Retired Commander Purnendu Tiwari

Qatar Amir’s India Visit: भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमद अल-थानी से अपील की है कि उनके एक साथी रिटायर्ड कमांडर पूर्णेंदू तिवारी, जो अब भी कतर में हैं, को भारत वापस लाने में मदद करें। यह अपील उस समय आई है जब कतर के अमीर भारत के दो दिवसीय आधिकारिक दौरे पर आ रहे हैं।

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पिथछे साल फरवरी में, सात पूर्व नौसेना अधिकारियों की रिहाई के बाद भारत सरकार ने कूटनीतिक स्तर पर एक बड़ी सफलता हासिल की थी। ये अधिकारी अगस्त 2022 से कतर में अज्ञात आरोपों में हिरासत में थे और उन्हें पहले मौत की सजा सुनाई गई थी। हालांकि, दिसंबर 2023 में कतर की कोर्ट ऑफ अपील ने उनकी सजा को बदलकर तीन से 25 साल के कारावास में तब्दील कर दिया। 11 फरवरी 2024 को उन्हें 17 महीने की कैद के बाद भारत वापस लाया गया था।

भारत लौटने वालों में कैप्टन नवतेज गिल, कैप्टन सौरभ वशिष्ठ, कमांडर संजीव गुप्ता, कमांडर अमित नागपाल, कमांडर बीके वर्मा, कमांडर सुगुणाकर पकाला और नाविक रागेश शामिल थे। लेकिन कमांडर पूर्णेंदू तिवारी (रिटायर्ड) अभी भी कतर में हैं।

कमांडर तिवारी को 2019 में प्रवासी भारतीय सम्मान से भी नवाजा गया था। लेकिन उन्हें अभी तक भारत लौटने की अनुमति नहीं मिली है। उनकी वापसी पर ट्रैवल बैन (यात्रा प्रतिबंध) लगा हुआ है। उनके साथी, कमांडर संजीव गुप्ता और कमांडर सुगुणाकर पकाला ने एक साझा बयान में कहा, “एक साल हो गया है जब कतर ने भारतीय नौसेना के आठ पूर्व अधिकारियों को रिहा किया, लेकिन उनमें से एक साथी अभी भी वहीं फंसा हुआ है।”

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उन्होंने आगे कहा, “हम कतर के अमीर और भारत के प्रधानमंत्री से अनुरोध करते हैं कि वे इस मामले का शीघ्र समाधान निकालें। यात्रा प्रतिबंध हटाकर तिवारी को भारत लौटने दिया जाए ताकि वे अपनी वृद्ध मां और परिवार के साथ फिर से मिल सकें।”

Qatar Amir’s India Visit: क्यों हुई थी इनकी गिरफ्तारी?

गिरफ्तार किए गए ये आठ अधिकारी कतर की एक निजी कंपनी अल दहरा ग्लोबल टेक्नोलॉजीज में काम करते थे। यह कंपनी कतर की सेना और सुरक्षा एजेंसियों के लिए ट्रेनिंग और अन्य सर्विसेज प्रदान करती थी। इन सभी पर अज्ञात आरोपों के तहत अगस्त 2022 में गिरफ्तारी हुई थी।

इस मामले में कतर की कोर्ट ऑफ फर्स्ट इंस्टेंस ने पहले सभी आठ भारतीय अधिकारियों को मौत की सजा सुनाई थी। हालांकि, भारत सरकार के उच्च-स्तरीय कूटनीतिक प्रयासों और राजनयिक हस्तक्षेप के बाद दिसंबर 2023 में कोर्ट ऑफ अपील ने उनकी सजा को बदलकर तीन से 25 साल के कारावास में बदल दिया। इसके बाद, भारत सरकार की लगातार बातचीत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यक्तिगत प्रयासों के चलते फरवरी 2024 में सात अधिकारियों को रिहा किया गया और वे सुरक्षित भारत लौट आए।

कमांडर पूर्णेंदू तिवारी भारतीय सशस्त्र बलों के पहले ऐसे व्यक्ति थे, जिन्हें प्रवासी भारतीय सम्मान से नवाजा गया था। यह पुरस्कार उन्हें भारतीय समुदाय और डिफेंस सेक्टर में उनके योगदान के लिए दिया गया था। उनके साथियों की मानें तो तिवारी की गिरफ्तारी और उन पर लगाए गए प्रतिबंधों को जल्द से जल्द हटाया जाना चाहिए।

पूर्व नौसेना अधिकारियों ने बताया कि कतर में बिताए गए 17 महीनों का समय बेहद कठिन था। एक पूर्व अधिकारी, संजीव गुप्ता ने कहा, “वह 17 महीने बेहद भयावह थे। पहले छह महीने तो और भी ज्यादा मुश्किल थे। कई बार ऐसा महसूस हुआ कि शायद मैं कभी भारत लौट भी नहीं पाऊंगा।”

गुप्ता ने बताया कि उन 531 दिनों में उन्होंने 42 किताबें पढ़ीं और प्रतिदिन चार घंटे योग और ध्यान किया, जिससे वे मानसिक रूप से खुद को मजबूत रख पाए।

कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमद अल-थानी के भारत दौरे के दौरान यह मामला फिर से उठ सकता है। भारत और कतर के बीच ऐतिहासिक रूप से मजबूत व्यापारिक और कूटनीतिक संबंध रहे हैं। दोनों देशों के बीच तेल, गैस, व्यापार और निवेश के क्षेत्रों में घनिष्ठ सहयोग है।

इस दौरे के दौरान भारत सरकार द्वारा कतर के समक्ष कमांडर तिवारी की वापसी का मुद्दा उठाए जाने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला न केवल मानवीय आधार पर बल्कि कूटनीतिक रिश्तों को और मजबूत करने के दृष्टिकोण से भी अहम हो सकता है।

बता दें कि विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने 30 दिसंबर 2024 से 1 जनवरी 2025 तक कतर की आधिकारिक यात्रा की थी। इस दौरान, उन्होंने कतर के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री, महामहिम शेख मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान बिन जसीम अल थानी से मुलाकात की थी। इस यात्रा का उद्देश्य भारत और कतर के बीच राजनीतिक, व्यापार, निवेश, ऊर्जा, सुरक्षा, सांस्कृतिक और जनसंपर्क सहित द्विपक्षीय संबंधों के विभिन्न पहलुओं की समीक्षा करना था।

इससे पहले, डॉ. जयशंकर ने 6 से 7 दिसंबर 2024 को दोहा फोरम के 22वें एडिशन में हिस्सा लेने के लिए कतर की यात्रा की थी। इसके बाद, उन्होंने 8 से 9 दिसंबर 2024 को बहरीन की यात्रा की, जहां उन्होंने चौथी भारत-बहरीन संयुक्त उच्चायोग की सह-अध्यक्षता की।

F-35 Stealth Fighter Jets: आसान नहीं है भारतीय वायुसेना में अमेरिकी फाइटर जेट्स शामिल करने की डगर! पहले इन चुनौतियों से पाना होगा पार?

F-35 Stealth Fighter Jets: Challenges Ahead for Indian Air Force Before Induction!

F-35 Stealth Fighter Jets: पिछले हफ्ते बेंगलुरु काफी चर्चा में रहा। यहां के येलाहंका एयर फोर्स स्टेशन में एयरो इंडिया शो का आयोजन हुआ। खास इस मायने में रहा कि पहली बार दुनिया के दो धुरविरोधी शक्तिशाली देशों अमेरिका और रूस के पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट F-35 और SU-57 एक ही एयर स्ट्रिप पर थे। दोनों के बीच 10 मीटर का भी अंतर नहीं था। इन दोनों का एक ही प्लेटफॉर्म पर मौजूदा होना ही पूरी दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींचने के लिए काफी था। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई। उस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वाशिंगटन डीसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ खड़े होकर एलान किया कि अमेरिका भारत को “कई अरब डॉलर” की सैन्य बिक्री बढ़ाएगा और “अंततः” भारत को F-35 स्टेल्थ फाइटर जेट देने का रास्ता तैयार कर रहा है।

F-35 Stealth Fighter Jets: Challenges Ahead for Indian Air Force Before Induction!

F-35 Stealth Fighter Jets: लॉकहीड मार्टिन ने जारी किया ये बयान

इस घोषणा के बाद भारत में इस बात पर चर्चा शुरू हो गई कि क्या भारतीय वायुसेना (IAF) को इस एडवांस फाइटर जेट की जरूरत है। भारत पहले से ही अपने पुराने लड़ाकू विमानों को बदलने और नए विमान बनाने की कोशिशों में जुटा है। हालांकि, इस एलान के बाद विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने कहा कि सैन्य खरीद की एक प्रक्रिया होती है और अभी तक इसे लेकर कोई औपचारिक कदम नहीं उठाया गया है। हालाकि अमेरिकी राष्ट्रपति के एलान के कुछ देर बाद ही F-35 फाइटर जेट बनाने वाली एयरोस्पेस कंपनी लॉकहीड मार्टिन (Lockheed Martin) ने एक महत्वपूर्ण बयान जारी किया, जिसमें कंपनी ने कहा कि वह पिछले तीन दशकों से भारत की रक्षा और एयरोस्पेस प्रणाली को मजबूत करने में एक विश्वसनीय और रणनीतिक भागीदार रही है।

F-35 GAO Report: इस रिपोर्ट के खुलासे के बाद क्या भारत को खरीदना चाहिए F-35 फाइटर जेट? अमेरिका के सरकारी विभाग ने ही खोले सारे राज!

लॉकहीड मार्टिन ने अपने बयान में कहा, “हमने C-130J ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट, S-92 हेलीकॉप्टर कैबिन और फाइटर विंग्स जैसे उत्पादन कार्यक्रमों के माध्यम से अपनी प्रतिबद्धता को साबित किया है। ये सभी कार्यक्रम वैश्विक सप्लाई चेन का हिस्सा हैं और भारतीय रक्षा क्षेत्र को मजबूती प्रदान कर रहे हैं।” कंपनी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयान पर भी प्रतिक्रिया दी, जिसमें उन्होंने भारत को F-35 स्टील्थ फाइटर जेट्स देने की मंशा जाहिर की थी। लॉकहीड मार्टिन ने कहा कि “हम इस घोषणा से उत्साहित हैं और दोनों देशों की सरकारों के साथ मिलकर रणनीतिक खरीद प्रक्रियाओं पर काम करने के लिए तैयार हैं।”

कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया कि वह भारत के साथ न केवल फाइटर जेट्स, बल्कि जेवलिन मिसाइल सिस्टम और हेलीकॉप्टर्स जैसे अन्य डिफेंस प्रोडक्ट्स पर भी सहयोग बढ़ाने की इच्छुक है। उन्होंने कहा, “हम भारतीय सशस्त्र बलों को 21वीं सदी की सुरक्षा तकनीकों और आधुनिक क्षमताओं से लैस करने के लिए प्रतिबद्ध हैं, ताकि वे अपनी वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपट सकें।”

F-35 क्यों है खास?

F-35 जॉइंट स्ट्राइक फाइटर जेट है औऱ दुनिया के सबसे एडवांस लड़ाकू विमानों में से एक है। इसे स्टील्थ टेक्नोलॉजी से बनाया गया है, जिससे यह दुश्मन के रडार में पकड़ में नहीं आता। यह तीन अलग-अलग वेरिएंट में आता है, F-35A, जो सामान्य टेकऑफ और लैंडिंग के लिए बनाया गया है; F-35B, जिसे कम जगह में उड़ान भरने और वर्टिकल लैंडिंग करने के लिए डिजाइन किया गया है; और F-35C, जो एयरक्राफ्ट कैरियर से ऑपरेट करने के लिए तैयार किया गया है।

अमेरिका इस विमान को कई देशों को निर्यात भी कर रहा है। अब तक 10 देशों ने इसे अपनी वायुसेना में शामिल कर लिया है और अमेरिका खुद 2,470 से ज्यादा F-35 खरीदने की योजना बना रहा है।

F-35 Stealth Fighter Jets: क्या भारत को F-35 की जरूरत है?

भारतीय वायुसेना फिलहाल अपने लड़ाकू बेड़े को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। कई पुराने विमान रिटायर होने वाले हैं, और ऐसे में नए फाइटर जेट्स की जरूरत महसूस की जा रही है। भारतीय वायुसेना की स्क्वाड्रन क्षमता भी लगातार घट रही है। मौजूदा समय में वायुसेना के पास बचे हैं कुल 32 स्क्वाड्रन, जबकि जरूरत है 42 की। यह आंकड़े भी लगभग आठ साल पुराने हैं। हालांकि 36 राफेल आने बाद दो स्क्वाड्रनों की संख्यया तो बढ़ी, लेकिन जैसे-जैसे पुराने विमान रिटायर होते जाएंगे, इनमें लगातार कमी आती रहेगी, क्योंकि अगले कुछ सालों में मिग-21, मिग-27, जगुआर औऱ मिराज को भी चरणबद्ध तरीके से रिटायर किया जाना है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या F-35 इस काम के लिए सबसे सही विकल्प होगा? भारत पहले से ही रूस, फ्रांस और इजरायल की तकनीकों का इस्तेमाल कर रहा है। ऐसे में, अमेरिकी F-35 को भारत के मौजूदा सिस्टम से जोड़ना आसान नहीं होगा। इंडियन डिफेन्स स्ट्रक्चर में यह एक बड़ी चुनौती हो सकती है।

F-35 Stealth Fighter Jets: चुनौतियां क्या हैं?

अगर अमेरिका भारत को F-35 ऑफर कर रहा है, तो इसका मतलब यह है कि अमेरिका को अब भारत के रूसी S-400 मिसाइल सिस्टम से ज्यादा परेशानी नहीं है।  पहले यह माना जा रहा था कि S-400 की खरीद के कारण अमेरिका भारत को F-35 नहीं देगा, लेकिन ट्रंप के बयान के बाद यह साफ हो गया कि अब अमेरिका इस शर्त को दरकिनार कर सकता है।

कीमत और मेंटेनेंस भी बड़ा सवाल 

F-35 दुनिया के सबसे महंगे फाइटर जेट्स में से एक है। अमेरिकी सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, यह प्रोजेक्ट एक दशक की देरी से चल रहा है और इसकी लागत 209 बिलियन डॉलर (17 लाख करोड़ रुपये) ज्यादा हो चुकी है। भारत को यह देखना होगा कि क्या यह सौदा उसके बजट के अनुकूल रहेगा?

भारतीया वायुसेना की पसंद ट्विन-सीटर फाइटर जेट्स 

एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि F-35 सिंगल-सीटर जेट है, जबकि भारतीय वायुसेना ज्यादातर ट्विन-सीटर फाइटर जेट्स को प्राथमिकता देती आई है। पहले, भारत ने रूस के साथ मिलकर पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान (FGFA) बनाने की योजना बनाई थी, लेकिन जब यह सामने आया कि यह विमान सिंगल-सीट कॉन्फ़िगरेशन में है, तो भारत ने यह प्रोजेक्ट छोड़ दिया। ऐसे में अगर भारत F-35 खरीदता है, तो यह देखना होगा कि यह हमारे पायलट्स के लिए कितना उपयुक्त रहेगा और इसकी लागत कितनी होगी।

भारत के स्वदेशी प्रोजेक्ट्स का क्या होगा?

हालांकि अभी तक भारत ने इस सौदे को लेकर कोई आधिकारिक बातचीत शुरू नहीं की है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भारत F-35 को अपने बेड़े में शामिल करने का विचार करेगा या अपने स्वदेशी प्रोजेक्ट्स AMCA को ही प्राथमिकता देगा। वहीं, अगर भारत F-35 खरीदता है, तो इससे हमारे अपने फाइटर जेट प्रोजेक्ट्स पर क्या असर पड़ेगा? क्योंकि अगर भारत F-35 खरीदता है, तो इससे देश के स्वदेशी फाइटर जेट बनाने के प्रोजेक्ट्स प्रभावित हो सकते हैं। भारत डिफेंस सेक्टर में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है और ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत ज्यादा से ज्यादा सैन्य उपकरणों का निर्माण देश में करने पर जोर दे रहा है। ऐसे में, अगर भारत F-35 खरीदता है, तो इससे डोमेस्टिक डिफेंस इंडस्ट्री को नुकसान हो सकता है और भारत को लंबे समय तक अमेरिकी डिफेंस सिस्टम पर निर्भर रहना पड़ सकता है।

भारत के अपने फाइटर जेट प्रोजेक्ट्स

भारत का हल्का लड़ाकू विमान (LCA)-Mk1A प्रोजेक्ट अभी भी पूरा नहीं हुआ है। इस विमान में अमेरिकी General Electric (GE) का F404 इंजन लगाया गया है, लेकिन इंजन की डिलीवरी में दो साल की देरी हो चुकी है। हालांकि, एयरो इंडिया शो में अधिकारियों ने कहा कि GE ने अब अपनी सप्लाई चेन की समस्या सुलझा ली है और मार्च से डिलीवरी शुरू हो जाएगी।

इसके अलावा, LCA-Mk2 का पहला प्रोटोटाइप इस साल के अंत तक तैयार होने की उम्मीद है और इसका पहली उड़ान परीक्षण 2026 में किया जाएगा। इसके बाद भारत का अपना फाइटर जेट प्रोजेक्ट, एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA), 2034-35 तक भारतीय वायुसेना में शामिल करने की योजना है।

इसके अलावा, भारत 114 मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA) खरीदने की योजना बना रहा है, जिसमें एक विदेशी लड़ाकू विमान को लाइसेंस के तहत भारत में बनाया जाएगा।

एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “अभी इस पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन जो भी फैसला लिया जाए, भारत को अपने स्वदेशी प्रोजेक्ट्स को प्राथमिकता देनी चाहिए।”

F-35 GAO Report: इस रिपोर्ट के खुलासे के बाद क्या भारत को खरीदना चाहिए F-35 फाइटर जेट? अमेरिका के सरकारी विभाग ने ही खोले सारे राज!

F-35 GAO Report: Should India Still Consider Buying the Fighter Jet?

F-35 GAO Report: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को अपने एडवाांस F-35 फाइटर जेट को देने की पेशकश की है। यह वही विमान है जिसे अमेरिका अपने सबसे आधुनिक और घातक फाइटर जेट के तौर पर प्रचारित करता है। लेकिन इसी बीच अमेरिकी सरकार की निगरानी एजेंसी – गवर्नमेंट अकाउंटेबिलिटी ऑफिस (GAO) की एक रिपोर्ट सामने आई है। इस रिपोर्ट में हुए खुलासों से विमान को लेकर कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

F-35 GAO Report: Should India Still Consider Buying the Fighter Jet?

GAO की रिपोर्ट के मुताबिक F-35 की ऑपरेशनल एफिशिएंसी पिछले पांच सालों में लगातार गिर रही है, और इसके सभी वेरिएंट (F-35A, F-35B और F-35C) परफॉरमेंस के तय मानकों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं। यानी कि यह विमान जितना एडवांस बताया जाता है, उतना भरोसेमंद साबित नहीं हो रहा है। बता दें कि यह विमान अमेरिकी वायुसेना, नौसेना और मरीन कॉर्प्स में भी शामिल है।

F-35 GAO Report: : सबसे महंगा मिलिट्री प्रोजेक्ट, लेकिन प्रदर्शन उम्मीद से कम

F-35 लड़ाकू विमान को अमेरिकी रक्षा विभाग (DOD) ने अपने सबसे महत्वपूर्ण वेपन सिस्टम्स के तौर पर डेवलप किया था। वर्तमान में अमेरिका के पास 630 से अधिक F-35 फाइटर जेट हैं, और वह 1,800 और खरीदने की योजना बना रहा है, जिन्हें 2088 तक इस्तेमाल किया जाएगा।

लेकिन समस्या यह है कि F-35 की लागत तेजी से बढ़ रही है। 2018 में इस विमान की अनुमानित ऑपरेटिंग कॉस्ट्स 1.1 ट्रिलियन डॉलर (91.3 लाख करोड़ रुपये) थी, जो 2023 में बढ़कर 1.58 ट्रिलियन डॉलर (131.14 लाख करोड़ रुपये) हो गई। और यह तब है जब अमेरिकी वायुसेना, नौसेना और मरीन कॉर्प्स ने इसके उड़ान घंटों को कम करने का फैसला लिया है, क्योंकि इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं।

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रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी वायुसेना के लिए एक F-35 को उड़ाने की वार्षिक लागत 4.1 मिलियन डॉलर (34.03 करोड़ रुपये) आंकी गई थी, लेकिन अब यह बढ़कर 6.8 मिलियन डॉलर (56.44 करोड़ रुपये) प्रति वर्ष हो गई है।

F-35 GAO Report: ये हैं दिक्कतें; क्यों उठ रहे हैं सवाल?

अमेरिकी सरकार की निगरानी एजेंसी गवर्नमेंट अकाउंटेबिलिटी ऑफिस (GAO) की रिपोर्ट में F-35 लड़ाकू विमान को लेकर कई तकनीकी खामियों और लॉजिस्टिक्स चुनौतियों की बात भी की गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सबसे बड़ी समस्या मेंटेनेंस में लगने वाला लंबा वक्त है। F-35 के कई कंपोनेंट्स इतने मुश्किल हैं कि छोटे-छोटे रिपेयर्स में भी महीनों लग जाते हैं। इसका मतलब है कि अगर कोई विमान तकनीकी खराबी की वजह से ग्राउंडेड हो जाता है, तो उसे फिर से उड़ान के लिए तैयार करने में बेहद लंबा वक्त लग सकता है।

इसके अलावा, कंपोनेंट्स की भारी कमी भी एक बड़ी चुनौती बन गई है। GAO की रिपोर्ट बताती है कि स्पेयर पार्ट्स की न मिलने से कई विमान ज़मीन पर खड़े रहते हैं और उन्हें मिशन के लिए तैयार नहीं किया जा सकता। अमेरिकी वायुसेना और नौसेना के लिए यह एक गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि इससे उनकी तैयारियों पर असर पड़ता है।

तकनीकी दिक्कतों में सॉफ्टवेयर अपडेट में देरी भी एक बड़ी समस्या है। F-35 को एक “फ्लाइंग कंप्यूटर” कहा जाता है, क्योंकि इसमें एडवांस डिजिटल सिस्टम और सॉफ्टवेयर-बेस्ड टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया है। लेकिन यह सॉफ़्टवेयर लगातार अपग्रेड होते रहना चाहिए। कई बार जरूरी अपग्रेड समय पर न होने की वजह से F-35 को मिशन से हटाना पड़ता है।

अमेरिकी सप्लाई चेन और मेंटेनेंस सिस्टम पर रहना होगा निर्भर

ट्रंप के प्रस्ताव के बाद भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या F-35 वाकई में एक अच्छा ऑप्शन है? यह विमान अपनी स्टील्थ टेक्नोलॉजी और एडवांस फीचर्स के लिए मशहूर है, लेकिन इसकी कमियों को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। भारत इस समय अपने वायुसेना बेड़े को मजबूत और मॉर्डन बनाने पर फोकस कर रहा है। भारत के पास पहले से ही राफेल, तेजस और सुखोई-30MKI जैसे बेहतरीन विकल्प हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत को एक ऐसा विमान खरीदना चाहिए, जिसकी खुद अमेरिका में आलोचना हो रही है?

अगर भारत F-35 को अपनाता है, तो इस पर न केवल भारी भरकम खर्च करना पड़ेगाा, बल्कि इसके मेंटेनेंस और टेक्नोलॉजी अपग्रेड पर भी निर्भर रहना होगा। क्योंकि यह विमान पूरी तरह से अमेरिकी सप्लाई चेन और मेंटेनेंस सिस्टम पर निर्भर है।

हालांकि अभी तक भारत सरकार की तरफ से इस प्रस्ताव पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भारत अमेरिका से F-35 खरीदने की दिशा में कदम बढ़ाएगा, या फिर अपने स्वदेशी AMCA और मौजूदा बेड़े को ही मजबूत करेगा।

Pinaka MBRL: फ्रांस को चाहिए ‘शिवजी का धनुष’! मैक्रों हुए राजी तो डिफेंस एक्सपोर्ट में भारत का बढ़ जाएगा दबदबा

Pinaka MBRL: France Eyes India’s Pinaka Rocket Launcher System, Boosting India's Defense Exports

Pinaka MBRL: भारत और फ्रांस के बीच रक्षा सहयोग को और मजबूत करने के लिए भारत ने फ्रांस को स्वदेशी पिनाका मल्टी-लॉन्च आर्टिलरी रॉकेट सिस्टम ऑफर किया है। अगर यह सौदा फाइनल हो जाता है, तो यह पहली बार होगा जब फ्रांस भारत से हथियार खरीदेगा। अभी तक भारत ही फ्रांस से हथियार खरीदता रहा है, लेकिन यह डील अपने अंतिम अंजाम तक पहुंचती है, तो एक निर्यातक के तौर पर भारत का बड़ी पहचान मिलेगी।

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Pinaka MBRL: फ्रांसीसी सेना को दिया न्योता

प्रदानमंत्री नरेंद्र मोदी इन दिनों फ्रांस में हैं, जहां वे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस समिट में हिस्सा लेने पहुंचे हुए हैं। इसी दौरान पीएम मोदी ने फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को पिनाका सिस्टम का ऑफर दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने फ्रांसीसी सेना को पिनाका मल्टी-बैरेल रॉकेट लॉन्चर (MBRL) सिस्टम देखने के लिए भी आमंत्रित किया है। हाालंकि तीन महीने पहले फ्रांस का एक प्रतिनिधिमंडल भारत आया था और पिनाका सिस्टम का डेमो देखा था। इस डेमो के नतीजों के बाद फ्रांसीसी अधिकारियों ने इस सौदे में रूचि दिखाई है। सूत्रों के अनुसार, फ्रांस पिनाका का गाइडेड वर्जन खरीदना चाहता है।

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इसके साथ ही भारत 26 राफेल मरीन फाइटर्स और 3 अतिरिक्त स्कॉर्पीन सबमरीन्स डील को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में है। राफेल मरीन फाइटर्स का सौदा करीब 63,000 करोड़ रुपये का है, जबकि स्कॉर्पीन सबमरीन्स की डील 33,500 करोड़ रुपये में होगी।

Pinaka MBRL: कारगिल युद्ध में पिनाका ने दिखाया था कमाल

बता दें कि पिनाका का नाम शिवजी के धनुष पर रखा गया है। इस धनुष से भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का वध किया था। पिनाका रॉकेट सिस्टम को DRDO ने बनाया है। इसकी मारक क्षमता 90 किलोमीटर तक है और इसे भारतीय सेना ने 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तान के खिलाफ इस्तेमाल किया था। इस युद्ध में पिनाका ने अपने घातक हमलों से पाकिस्तानी सेना को धूल चटा दी थी।

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DRDO के मिसाइल्स एंड स्ट्रेटेजिक सिस्टम्स के डायरेक्टर जनरल उम्मलनेनी राजा बाबू ने बताया, फ्रांस पिनाका को लेकर इच्छुक है। हालांकि, अभी तक इस सौदे को लेकर कोई औपचारिक समझौता नहीं हुआ है, लेकिन बातचीत लगातार जारी है।

फ्रांस रूस के बाद दूसरा ऐसा देश है, जो भारत को हथियारों की सप्लाई करता है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) के आंकड़ों के अनुसार, 2019 से 2023 के बीच भारत और फ्रांस के बीच डिफेंस एक्सपोर्ट में जबरदस्त इजाफा हुआ है।

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बता दें कि इससे पहले आर्मेनिया भी पिनाका को खरीद चुका है। पिछले साल नवंबर में आर्मेनिया को पिनाका का पहला रेजिमेंट भी भेजा गया था।

दोनों देश डिफेंस कोऑपरेशन में भी काफी आगे बढ़ रहे हैं। जनवरी 2025 में फ्रांसीसी कैरियर स्ट्राइक ग्रुप चार्ल्स डी गॉल भारत आया था। वहीं, भारतीय नौसेना ने फ्रेंच मल्टीनेशनल एक्सरसााइज ला पेरूज में भी हिस्सा लिया था। वहीं, अब अगला वरुणा अभ्यास मार्च 2025 में आयोजित होगा। इसके अलावा, फ्रांस-इंडिया डिफेंस स्टार्टअप एक्सीलेंस (FRIND-X) को दिसंबर 2024 में पेरिस में लॉन्च किया गया, जिसमें दोनों देशों के रक्षा स्टार्टअप्स, निवेशकों और रिसर्च ऑर्गनाइजेशंस ने हिस्सा लिया था।

Pinaka MBRL: भारतीय सेना में चार पिनाका रेजीमेंट्स

बता दें कि भारतीय सेना पहले ही चार पिनाका रेजीमेंट्स को शामिल कर चुकी है, जिनमें से कुछ लांचर उत्तरी सीमाओं पर ऊंचाई वाले इलाकों में भी तैनात किए गए हैं। बाकी छह रेजीमेंट्स को जल्द ही शामिल किया जाएगा। डीआरडीओ ने पिनाका के लिए 45 किमी तक की मारक क्षमता वाले एक्सटेंडेड रेंज रॉकेट और 75 किमी तक की गाइडेड रेंज रॉकेट भी डेवलप किए हैं। इसके अलावा, पिनाका की रेंज को 120 किमी और फिर 300 किमी तक बढ़ाने की योजना है।

GE Aerospace की टीम फरवरी में भारत दौरे पर, LCA Mk2 और AMCA के लिए इंजन टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर बातचीत

LCA Mk-1A: HAL Confirms Tejas Mk1A's First Engine Ready for April Delivery!

GE Aerospace: भारतीय वायुसेना प्रमुख एपी सिंह की हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के एमडी को खरी-खरी सुनाने के एक दिन बाद ही एचएएल की तरफ से राहत भरी खबर आई है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने बताया कि अमेरिकी एयरोस्पेस कंपनी GE की एक टीम इस महीने के अंत में भारत का दौरा करेगी। यह टीम GE 414 इंजन की 80 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर (ToT) पर बातचीत करेगी। एक बार इस टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर क्लैरिटी आने के बाद दोनों पक्ष कीमतों को लेकर बातचीत शुरू करेंगे।

GE Aerospace Team to Visit India in February for LCA Mk2 and AMCA Engine Tech Transfer Talks

GE Aerospace: इस महीने के अंत तक भारत आएगी टीम

HAL के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर डीके सुनील ने बताया, इससे पहले अमेरिका ने केवल 58 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की पेशकश की थी, लेकिन अब बातचीत के जरिए इसे 80 फीसदी तक बढ़ाने की योजना है। उनकी टीम पिछले हफ्ते बोस्टन गई थी और अब GE टीम इस महीने के अंत तक भारत आएगी। उन्होंने कहा, “हम दो फेज में काम कर रहे हैं। पहला फेज 80 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर बातचीत का है और उसके बाद कीमतों पर चर्चा की जाएगी।”

LCA Tejas Mk1A को लेकर IAF प्रमुख ने सुनाई फिर खरी-खरी, HAL से क्यों नाखुश है वायुसेना? आप भी सुनें

GE 414 इंजन को भारत के स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमान (LCA) Mk2 और एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) में फिट किया जाएगा। AMCA प्रोजेक्ट के बारे में डीके सुनील ने कहा कि यह पांचवीं पीढ़ी का फाइटर जेट है और अगले तीन सालों में इसकी पहली उड़ान होने की संभावना है। वहीं, AMCA प्रोजेक्ट डायरेक्टर कृष्णा राजेंद्र नीली का कहना है कि AMCA का इंडक्शन 2036 से शुरू होने की संभावना है।

GE Aerospace: LCA Mk1 और LCA Mk1A की डिलीवरी योजना

HAL के प्रमुख डीके सुनील ने बताया कि 83 LCA Mk1 और 97 LCA Mk1A विमान 2031 तक भारतीय वायुसेना को सौंप दिए जाएंगे। अगले 3 से 3.5 वर्षों में सभी 83 LCA Mk1 विमानों की डिलीवरी पूरी कर ली जाएगी। GE कंपनी ने इस कैलेंडर वर्ष में 12 GE 404 इंजन की सप्लाई का भी वादा किया है।

HAL की ऑर्डर बुक 1.33 लाख करोड़ रुपये!

HAL चीफ डीके सुनील ने बताया कि HAL की ऑर्डर बुक 2026-27 तक 2.50 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की उम्मीद है। कई बड़े कॉन्ट्रैक्ट पाइपलाइन में हैं, जिनमें 97 LCA Mk1A फाइटर जेट्स, 156 लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर्स (LCH), और SU-30 MKI जेट्स का एक्वीजीशन और अपग्रेड भी शामिल है।

उन्होंने बताया कि पिछले नौ महीनों में HAL को 55,800 करोड़ रुपये के कॉन्ट्रैक्ट मिले हैं। इसमें 39,000 करोड़ रुपये के मैन्युफैक्चरिंग ऑर्डर शामिल हैं, जिनमें 240 AL-31 FP इंजनों के लिए 25,350 करोड़ रुपये और 12 SU-30 MKI विमानों के एक्वीजीशन के लिए 12,573 करोड़ रुपये के ऑर्डर भी शामिल हैं। इसके अलावा HAL को 16,500 करोड़ रुपये के मरम्मत, ओवरहॉल, स्पेयर्स और डिज़ाइन एवं डेवलपमेंट के ऑर्डर भी मिले हैं।

इसके अलावा पिछले एक साल में HAL ने भारतीय सेना को 25 एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर (ALH), भारतीय तटरक्षक बल को 9 ALH, भारतीय वायुसेना को 80 RD-33 इंजन, और भारतीय नौसेना एवं वायुसेना को 65 डॉर्नियर मिड-लाइफ अपग्रेड की सप्लाई की है।

डीके सुनील ने बताया कि नई डील्स के साथ, HAL की ऑर्डर बुक दिसंबर 2024 तक 1.33 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। उन्होंने कहा, “हम दो बड़े कॉन्ट्रैक्ट्स पर सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं, जिनमें 97 LCA Mk-1A और 156 LCH के ऑर्डर शामिल हैं। ये दोनों ऑर्डर मंजूरी के अंतिम चरण में हैं और अगले 3 से 6 महीनों में इन सौदों के पूरा होने की उम्मीद है।”

P-8I Aircraft Deal: पीएम मोदी की अमेरिका दौरे में इस डिफेंस डील पर हो सकती है बातचीत, तीन साल पहले डाल दी थी ठंडे बस्ते में

P-8I Aircraft Deal: PM Modi's US Visit May Revive Stalled Defense Talks

P-8I Aircraft Deal: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा से पहले भारत और अमेरिका के बीच एक बड़ी डिफेंस डील पर बातचीत हो सकती है। यह डील अमेरिका से छह और एडवांस्ड P-8I लॉन्ग-रेंज मेरीटाइम पेट्रोल और सबमरीन-हंटिंग एयरक्राफ्ट खरीदने को लेकर है। यह सौदा लगभग तीन साल पहले ठंडे बस्ते में चला गया था, लेकिन अब इसे फिर से इस पर काम करने की कोशिश की जा रही है।

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P-8I Aircraft Deal: चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियां

सरकारी सूत्रों के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की वॉशिंगटन में होने वाली समिट मीटिंग से पहले इस प्रस्ताव को फिर से “पुनर्विचार” के लिए उठाया गया है। इसके पीछे जो वजह बताई जा रही है, उसके मुताबिक हिंद महासागर और आसपास के क्षेत्रों में चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों के चलते भारत की निगरानी क्षमताओं को मजबूत करने की जरूरत है।

अमेरिका से इन छह P-8I विमानों के लिए एक वाजिब दामों का प्रस्ताव देने के लिए कहा गया है। यह सौदा अमेरिका के फॉरेन मिलिट्री सेल्स (FMS) कार्यक्रम के तहत गर्वनमेंट-टू-गर्वनमेंट के स्तर पर किया जाएगा। सही कीमतें मिलने बाद के बाद ही यह तय किया जाएगा कि इस सौदे को अमली जामा पहनाया जा सकता है या नहीं।

P-8I Aircraft Deal: भारतीय नौसेना के पास पहले से ही 12 P-8I विमान

बता दें कि भारतीय नौसेना के पास पहले से ही 12 P-8I विमान हैं, जिन्हें मल्टी-मोड रडार, एडवांस इलेक्ट्रो-ऑप्टिक सेंसर, हार्पून ब्लॉक-II मिसाइलें, MK-54 हल्के टॉरपीडो, रॉकेट और डेप्थ चार्ज से लैस किया गया है। इन विमानों को बोइंग ने बनाया है और 2009 और 2016 में कुल 3.2 बिलियन डॉलर से अधिक के दो अलग-अलग सौदों के तहत इन्हे भारतीय नौसेना में शामिल किया गया था।

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P-8I विमान का इस्तेमाल मुख्य रूप से दुश्मन की पनडुब्बियों और वॉरशिपों को टारगेट कर उन्हें नष्ट करने के लिए किया जाता है। लेकिन भारत ने इन विमानों का इस्तेमाल पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ अप्रैल 2020 में शुरू हुए हिंसक संघर्ष के बाद से 3,488 किमी लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के साथ चीनी सैनिकों और उनकी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए भी बड़े पैमाने पर किया है।

मई 2021 में अमेरिका ने दिया था ऑफर

मई 2021 में, अमेरिकी विदेश विभाग ने कांग्रेस को भारत को छह P-8I विमानों और उससे जुड़े इक्विपमेंट्स की 2.4 बिलियन डॉलर की संभावित बिक्री के बारे में बताया था।। हालांकि, भारत ने इस सौदे पर कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, जिसके बाद इस सौदे को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था। अब, यदि भारत इस सौदे को आगे बढ़ाता है, तो कीमत पहले के मुकाबले ज्यादा होने की संभावना है।

इसके अलावा, भारतीय नौसेना को अमेरिका से 31 MQ-9B प्रीडेटर ड्रोन में से 15 ड्रोन मिलने वाले हैं। ये ड्रोन लंबी दूरी के “हंट एंड किल” मिशनों के लिए बनाए गए हैं। यह सौदा पिछले साल अक्टूबर में 3.4 अरब डॉलर में तय हुआ था। भारतीय सेना और वायुसेना को इन ड्रोनों में से आठ-आठ ड्रोन मिलेंगे।

अमेरिका ने भारत को बेचे 25 अरब डॉलर से अधिक के हथियार

2007 के बाद से अमेरिका ने भारत को 25 अरब डॉलर से अधिक के हथियार बेचे हैं। लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप इससे संतुष्ट नहीं हैं। उन्होंने 27 जनवरी को प्रधानमंत्री मोदी के साथ टेलीफोन पर हुई बातचीत में भारत से और अधिक अमेरिकी हथियारों की खरीद को बढ़ाने का आग्रह किया था।

P-8I विमानों के अलावा, अमेरिका भारत के साथ आठ पहियों वाले स्ट्राइकर आर्मर्ड इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल्स की जॉइंट मैन्युफैक्चरिंग की भी पेशकश कर रहा है। इसके साथ ही भारत के साथ मिल कर तेजस मार्क-II लड़ाकू विमानों के लिए जनरल इलेक्ट्रिक F414-INS6 एरो-इंजन बनाने को लेकर भी बातचीत चल रही है।

114 नए मल्टी-रोल लड़ाकू विमानों के सौदे पर नजर

इसके साथ ही, अमेरिका भारतीय वायुसेना के लिए 114 नए मल्टी-रोल लड़ाकू विमानों (MRFA) बनाने को लेकर भी रुचि दिखा रहा है। इस प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत 1.25 लाख करोड़ रुपये है। इसके अलावा, इसके अलावा, अमेरिकी विमान निर्माता कंपनी लॉकहीड मार्टिन और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड की साझेदारी में, भारतीय वायुसेना के मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट प्रोजेक्ट की भी रेस में हैं। इस प्रोजेक्ट के तहत 80 विमान खरीदे जाने हैं, जो पुराने सोवियत मूल के AN-32 बेड़े की जगह लेंगे।

Sukhoi-30MKI: जल्द ही भारत के सुखोई-30 के आगे ढेर होगा चीन का लेटेस्ट J-35 फाइटर जेट! रूस ने दिया सुखोई-57 का इंजन लगाने का ऑफर

Sukhoi-30MKI Upgrade: Russia Offers Su-57 Engine, Set to Outclass China’s J-35 Fighter Jet!

Sukhoi-30MKI: बेंगलुरु में चल रहे एरो इंडिया 2025 के बीच रूस की तरफ से भारत को तगड़ा ऑफर मिला है। रूस ने भारतीय वायुसेना के बैकबोन कहे जाने वाले लड़ाकू विमान सुखोई-30MKI के अपग्रेड को लेकर जबरदस्त ऑफर दिया है। रूस ने अपने लेटेस्ट स्टील्थ फाइटर सुखोई-57 में इस्तेमाल हो रहे एडवांस AL-41 इंजन को भारतीय सुखोई विमानों के लिए पेश किया है। ये इंजन मौजूदा AL-31 इंजन से ज्यादा ताकतवर और बेहतर है, जिसके बाद भारतीय वायुसेना की ताकत में बड़ा इजाफा होगा।

Sukhoi-30MKI Upgrade: Russia Offers Su-57 Engine, Set to Outclass China’s J-35 Fighter Jet!

भारतीय वायुसेना के पास इस वक्त 272 सुखोई-30MKI जेट्स हैं, जो किसी भी एक विमान मॉडल के मुकाबले सबसे बड़ा बेड़ा है। इन विमानों को अपग्रेड करने के लिए भारत रूस के साथ बातचीत कर रहा है। इस नए इंजन से भारत के फाइटर जेट्स की ताकत और परफॉर्मेंस में बड़ा बदलाव आ सकता है।

Sukhoi-30MKI: क्या खास है इस नए इंजन में?

अभी सुखोई-30MKI फाइटर जेट्स में AL-31 इंजन इस्तेमाल हो रहा है। लेकिन रूस का नया AL-41 इंजन ज्यादा पावरफुल है और यह सुखोई-57 जैसे एडवांस्ड स्टील्थ फाइटर में भी इस्तेमाल होता है। नए इंजन से सुखोई-30 की स्पीड, रेंज और फ्यूल एफिशिएंसी में जबरदस्त सुधार हो सकता है।

एयरो इंडिया 2025 के दौरान रूसी विमान निर्माता यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन के सीईओ वादिम बाडेखा ने इस ऑफर का एलान किया। उन्होंने कहा, “हम भारत को सुखोई-30 के अपग्रेड के हिस्से के रूप में यह नया इंजन ऑफर कर रहे हैं। AL-41 इंजन लगने के बाद सुखोई-30MKI की परफॉरमेंस बेहतर हो जाएगी, जिससे यह विमान नई पीढ़ी के लड़ाकू विमानों को भी टक्कर देगा।

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वहीं, भारत में सुखोई-30MKI को बनाने वाली कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL)का कहना है कि इस अपग्रेड के लिए डील जल्द साइन हो सकती है।

वहीं, सुखोई-30MKI का यह अपग्रेड केवल इंजन तक सीमित नहीं रहेगा। अपग्रेडेड विमानों में भारतत में बने एवियोनिक्स, रडार और मिशन कंप्यूटर लगाए जाएंगे। DRDO के बनाए उत्तम एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड अरे (AESA) रडार से विमान की पहचान और ट्रैकिंग में भी सुधार होगा।

इसके अलावा, विमान का कॉकपिट पूरी तरह डिजिटल होगा, जिसमें बड़े टचस्क्रीन डिस्प्ले पायलट को बेहतर कंट्रोल और विजिबिलिटी देंगे। नए मिशन कंप्यूटर भी जोड़े जाएंगे ताकि नई टेक्नोलॉजी को हैंडल किया जा सके।

भारत की योजना है अपग्रेडेड सुखोई-30MKI में 78 फीसदी स्वदेशी पार्ट्स इस्तेमाल किए जाएं। इससे मेक इन इंडिया को बढ़ावा मिलेगा और विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम होगी।

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रूस का दूसरा बड़ा ऑफर: भारत में सुखोई-57E का निर्माण

एयरो इंडिया 2025 के दौरान रूस ने भारत को एक और बड़ा ऑफर दिया है। रूस ने भारत को सुखोई-57E (एक्सपोर्ट वर्जन) की लोकल मैन्युफैक्चरिंग का प्रस्ताव दिया है। अगर यह डील फाइनल होती है, तो 2025 से हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) में सुखोई-57E का निर्माण शुरू हो सकता है।

रोसोबोरोनएक्सपोर्ट के एक प्रवक्ता ने बताया कि रूस भारत में पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट का उत्पादन करने के लिए पूरी तकनीकी मदद देने को तैयार है। उन्होंने कहा, “अगर सब कुछ योजना के अनुसार चलता है, तो हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) में सुखोई-57E का उत्पादन 2025 तक शुरू हो सकता है।”

साथ ही, रूस ने भारत के एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) प्रोजेक्ट में भी सहयोग की पेशकश की है। इसमें इंजन टेक्नोलॉजी, AESA रडार, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एडवांस्ड सॉफ्टवेयर शामिल हैं। यह भारत के AMCA फाइटर जेट प्रोजेक्ट को बड़ा बूस्ट मिल सकता है।

सूत्रों का कहना है कि रूस का यह ऑफर भारत के लिए बड़ा मौका है। इससे भारत को क्रिटिकल टेक्नोलॉजी में आत्मनिर्भर बनने में मदद मिलेगी। रूस के अधिकारियों ने कहा कि इस तरह के सहयोग से भारत को भविष्य में किसी भी इंटरनेशनल प्रतिबंध या सप्लाई चेन में दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ेगा।

Sukhoi-30MKI: भारत का सबसे बड़ा रक्षा सहयोगी है रूस

भारत और रूस के रिश्ते दशकों पुराने हैं। रूस लंबे समय से भारत का सबसे बड़ा रक्षा सहयोगी रहा है। 2000 से 2020 के बीच भारत के कुल हथियार आयात का 66.5 फीसदी रूस से आया है। आज भी भारतीय सेना के हथियारों में रूस का असर साफ दिखा जा सकता है।

हालांकि, अब भारत मेक इन इंडिया के तहत अपनी डिफेंस प्रोडक्शन को घरेलू स्तर पर बढ़ा रहा है। रूस के इस सहयोग से भारत को न केवल तकनीकी रूप से मजबूती मिलेगी, बल्कि घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को भी बड़ा फायदा मिलेगा।

वर्तमान में भारतीय वायुसेना को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। भारतीय वायुसेना के फाइटर स्क्वाड्रन की संख्या 42 से घटकर 31 रह गई है, जो एक गंभीर चिंता का विषय है। एयर चीफ मार्शल एपी सिंह भी कई बार LCA Mk1 फाइटर जेट्स की डिलीवरी में देरी को लेकर चिंता जता चुके हैं। वहीं, रूस के इस प्रस्ताव से भारतीय वायुसेना को अपने मौजूदा बेड़े को अपग्रेड करने का बड़ा मौका मिल सकता है।