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Defence Budget 2026: डिफेंस सेक्टर को मिल सकती है बड़ी राहत, 2.16 लाख करोड़ के पार हो सकता है कैपिटल एक्सपेंडिचर

Defence Budget Capital Expenditure 2026
Union Budget 2026: Defence Ministry Seeks 20% Hike in Capital Expenditure for Modernisation

Defence Budget Capital Expenditure 2026: देश का यूनियन बजट पेश होने में अब 18 घंटे से भी कम समय बचा है। आम तौर पर बजट को टैक्स, महंगाई और वेलफेयर स्कीम्स के नजरिये से देखा जाता है, लेकिन इस बार डिफेंस सेक्टर की निगाहें खास तौर पर बजट पर टिकी हुई हैं। वजह साफ है, सरकार के रिफॉर्म एजेंडा के अगले चरण में डिफेंस सेक्टर को एक बड़ी छलांग मिल सकती है।

सूत्रों के मुताबिक, रक्षा मंत्रालय वित्त वर्ष 2026-27 के लिए कैपिटल एक्सपेंडिचर यानी नए हथियारों, प्लेटफॉर्म्स और सिस्टम्स की खरीद के बजट में करीब 20 फीसदी बढ़ोतरी की मांग करने जा रहा है। अगर यह मांग मंजूर होती है, तो यह भारत के रक्षा आधुनिकीकरण के लिहाज से एक बड़ा कदम माना जाएगा। (Defence Budget Capital Expenditure 2026)

Defence Budget Capital Expenditure 2026: कैपिटल बजट क्यों है इतना अहम

रक्षा बजट को आमतौर पर दो हिस्सों में बांटा जाता है, रेवेन्यू एक्सपेंडिचर और कैपिटल एक्सपेंडिचर। रेवेन्यू एक्सपेंडिचर में सैलरी, पेंशन, मौजूदा हथियारों की मेंटेनेंस और ऑपरेशनल खर्च शामिल होते हैं। यह हिस्सा हमेशा बड़ा रहता है और इससे बचना मुश्किल भी है।

वहीं कैपिटल एक्सपेंडिचर वह पैसा होता है, जिससे नए फाइटर एयरक्राफ्ट, टैंक, सबमरीन, मिसाइल सिस्टम और हाई-टेक इक्विपमेंट खरीदे जाते हैं। यही वह हिस्सा है, जो सेनाओं की भविष्य की ताकत तय करता है।

पिछले कुछ सालों में कुल रक्षा बजट में औसतन 8.5 से 11 फीसदी की बढ़ोतरी होती रही है, लेकिन इस बार खास जोर कैपिटल बजट पर है। रक्षा सचिव खुद सार्वजनिक तौर पर कह चुके हैं कि रक्षा मंत्रालय कैपिटल बजट में 20 फीसदी बढ़ोतरी की मांग करेगा। (Defence Budget Capital Expenditure 2026)

एयर फोर्स की जरूरतों से बढ़ा दबाव

इस बढ़ोतरी के पीछे सबसे बड़ी वजह इंडियन एयर फोर्स की जरूरतें हैं। एयर फोर्स को अगले कुछ सालों में नए फाइटर एयरक्राफ्ट खरीदने हैं, ताकि स्क्वाड्रन स्ट्रेंथ को मजबूत किया जा सके। इसके अलावा, एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एएमसीए) प्रोजेक्ट और स्वदेशी जेट इंजन डेवलपमेंट के लिए शुरुआती भुगतान भी इसी बजट से होना है।

जेट इंजन को लेकर भारत दशकों से विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहा है। अब सरकार का फोकस सिर्फ बाहर से टेक्नोलॉजी लाकर जोड़ने पर नहीं, बल्कि इंडियन ओन्ड इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी बनाने पर है। इसे अब “स्क्रूड्राइवर टेक्नोलॉजी” से आगे निकलकर टेक्नोलॉजिकल सॉवरेनटी की दिशा में कदम माना जा रहा है। (Defence Budget Capital Expenditure 2026)

1.8 लाख करोड़ से 2.16 लाख करोड़ तक

पिछले वित्त वर्ष में कैपिटल बजट करीब 1.8 लाख करोड़ रुपये का था। अगर 20 फीसदी बढ़ोतरी होती है, तो यह आंकड़ा 2.16 लाख करोड़ रुपये से भी ऊपर पहुंच सकता है। खास बात यह है कि पिछले दो सालों की तरह इस बार भी लगभग 75 फीसदी कैपिटल बजट घरेलू उद्योग के लिए आरक्षित रहने की उम्मीद है।

इसका मतलब साफ है कि देश में बने हथियारों, सिस्टम्स और प्लेटफॉर्म्स को प्राथमिकता मिलेगी। इससे न सिर्फ सरकारी डिफेंस कंपनियों को फायदा होगा, बल्कि प्राइवेट सेक्टर और स्टार्ट-अप्स को भी बड़े ऑर्डर्स मिलने की संभावना बढ़ेगी। (Defence Budget Capital Expenditure 2026)

डिफेंस प्रोक्योरमेंट मैनुअल में बड़ा बदलाव

एक और अहम बदलाव पिछले साल देखने को मिला, जब डिफेंस प्रोक्योरमेंट मैनुअल को 16 साल बाद अपडेट किया गया। इससे पहले यह मैनुअल 2009 में जारी हुआ था। नए मैनुअल के तहत अब रेवेन्यू प्रोक्योरमेंट का करीब 80 फीसदी हिस्सा इंडियन इंडस्ट्री, खासकर एमएसएमई सेक्टर, से लेने का टारगेट तय किया गया है।

इससे छोटे और मझोले डिफेंस मैन्युफैक्चरर्स के लिए बाजार खुलने की उम्मीद है। ज्यादा ऑर्डर मिलने से न सिर्फ उनकी आमदनी बढ़ेगी, बल्कि वे नई टेक्नोलॉजी और रिसर्च में भी निवेश कर पाएंगे। (Defence Budget Capital Expenditure 2026)

डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर 2026 से उम्मीदें

हालांकि डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर (डीएपी) का नया वर्जन 2025 में आना था, लेकिन अब इसके 2026 में आने की संभावना है। डीएपी 2026 से कई अहम बदलावों की उम्मीद की जा रही है।

बताया जा रहा है कि नए डीएपी में एक्विजिशन टाइमलाइन को छोटा किया जाएगा, ताकि हथियारों की खरीद में सालों की देरी न हो। इसके अलावा, इंडियन एमएसएमई कंपनियों के लिए बैंक गारंटी की शर्तें भी कुछ हद तक आसान की जा सकती हैं।

एक और बड़ा बदलाव स्पाइरल डेवलपमेंट मॉडल हो सकता है। इसके तहत सेनाएं पहले किसी सिस्टम की सीमित संख्या खरीदेंगी, फील्ड में उसका टेस्ट करेंगी और फिर चरणबद्ध तरीके से अपग्रेड के साथ बड़े ऑर्डर देंगी। इससे इंडस्ट्री और यूजर के बीच भरोसा बढ़ेगा। (Defence Budget Capital Expenditure 2026)

इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट को स्थायी रूप

पिछले पांच सालों में सेनाओं ने कई बार इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट पावर्स का इस्तेमाल किया है, खासकर सीमाओं पर तनाव के दौरान। अब योजना है कि 300 करोड़ रुपये तक की इमरजेंसी खरीद की व्यवस्था को डीएपी में स्थायी रूप से शामिल किया जाए।

इससे जरूरत पड़ने पर सेनाएं बिना लंबी प्रक्रिया के तेजी से जरूरी उपकरण खरीद सकेंगी। (Defence Budget Capital Expenditure 2026)

लीजिंग मॉडल को बढ़ावा

बजट और डीएपी में लीजिंग मॉडल को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। पिछले कुछ सालों से ड्रोन और हेलिकॉप्टर जैसे प्लेटफॉर्म्स को लीज पर लेने की व्यवस्था चल रही है। आने वाले समय में इसे और विस्तार दिया जा सकता है।

इसका फायदा यह है कि सेनाओं को तुरंत क्षमता मिल जाती है, जबकि सरकार पर एक साथ भारी खर्च का दबाव नहीं पड़ता। (Defence Budget Capital Expenditure 2026)

एक्सपोर्ट और फॉरेन पॉलिसी का कनेक्शन

डिफेंस एक्सपोर्ट भी बजट का एक अहम पहलू है। सरकार का लक्ष्य है कि 2028-29 तक 50,000 करोड़ रुपये का डिफेंस एक्सपोर्ट किया जाए। ब्रह्मोस, आकाश और पिनाका जैसे सिस्टम्स पहले ही विदेशी बाजार में अपनी जगह बना रहे हैं।

डिफेंस एक्सपोर्ट न सिर्फ अर्थव्यवस्था को फायदा पहुंचाता है, बल्कि भारत की फॉरेन पॉलिसी और स्ट्रैटेजिक लीवरेज को भी मजबूती देता है। (Defence Budget Capital Expenditure 2026)

बजट से क्या है उम्मीद

हालांकि बजट भाषण में इन सभी बातों का विस्तार से जिक्र होना जरूरी नहीं है, लेकिन माना जा रहा है कि बजट इन कदमों को फैसिलिटेट जरूर करेगा। रक्षा क्षेत्र में इंडस्ट्री, यूजर और अकादमिक संस्थानों के बीच बेहतर संवाद की जरूरत लगातार महसूस की जा रही है।

अगर बजट में कैपिटल एक्सपेंडिचर को वह बढ़ावा मिलता है, जिसकी उम्मीद की जा रही है, तो आने वाले सालों में भारत का रक्षा इकोसिस्टम और ज्यादा मजबूत हो सकता है। यह संतुलन बनाना जरूरी है कि सेनाओं की आज की जरूरतें भी पूरी हों और भविष्य की तैयारी भी साथ-साथ चलती रहे। (Defence Budget Capital Expenditure 2026)

पाकिस्तान में आएगी ‘प्रलय’, 500 किमी रेंज और मैक-5 से ज्यादा स्पीड वाली अपग्रेडेड प्रलय मिसाइल 2026 में होगी सेना में शामिल

Pralay Missile Upgrade
India’s Pralay Missile Gets Advanced Upgrade, DRDO Prepares for Induction in 2026

Pralay Missile Upgrade: डीआरडीओ अब अपनी स्वदेशी प्रलय मिसाइल को और ज्यादा एडवांस करने की तैयारी में है। सूत्रों के मुताबिक प्रलय मिसाइल के यूजर ट्रायल्स आखिरी चरण में पहुंच चुके हैं और इसी साल इसे भारतीय सेनाओं में शामिल किया जा सकता है। प्रलय एक कन्वेंशनल यानी नॉन-न्यूक्लियर मिसाइल है, लेकिन इसकी मारक क्षमता आज के मॉडर्न वॉरफेयर में भी जबरदस्त है। (Pralay Missile Upgrade)

Pralay Missile Upgrade: क्या है प्रलय मिसाइल

प्रलय एक स्वदेशी क्वासी-बैलिस्टिक सरफेस-टू-सरफेस मिसाइल है। इसे खास तौर पर टैक्टिकल यानी सीमित लेकिन बेहद सटीक हमलों के लिए तैयार किया गया है। इस मिसाइल को हैदराबाद स्थित रिसर्च सेंटर इमारत के नेतृत्व में डीआरडीओ की कई प्रयोगशालाओं ने मिलकर डेवलप किया है। इसमें पृथ्वी और अग्नि मिसाइल सीरीज से मिली सीखों को भी इस्तेमाल किया गया है, लेकिन इसका इस्तेमाल पूरी तरह पारंपरिक युद्ध के लिए किया जाता है।

प्रलय मिसाइल को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह दुश्मन के एयरबेस, कमांड सेंटर, रडार स्टेशन, बंकर और लॉजिस्टिक हब जैसे अहम ठिकानों को बेहद कम समय में निशाना बना सके। (Pralay Missile Upgrade)

चौंका देगी रेंज और स्पीड

प्रलय मिसाइल की रेंज करीब 150 किलोमीटर से लेकर 500 किलोमीटर तक मानी जाती है। वहीं, भविष्य में इसके एक्सटेंडेड रेंज वर्जन पर भी काम हो सकता है। स्पीड की बात करें तो यह मिसाइल मिड-कोर्स में मैक-5 से ज्यादा की रफ्तार पकड़ सकती है और टर्मिनल फेज में तेज और सीधी डाइव करती है, जिससे इसे इंटरसेप्ट करना दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम के लिए बेहद मुश्किल हो जाता है।

इसकी सबसे बड़ी ताकत इसका मैन्यूवरेबल ट्रैजेक्टरी है। यानी यह उड़ान के दौरान रास्ता बदल सकती है। यही वजह है कि दुश्मन के आधुनिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम भी इसे आसानी से रोक नहीं पाते। (Pralay Missile Upgrade)

ले जा सकती है इतना वॉरहेड

प्रलय मिसाइल में 350 से 1000 किलोग्राम तक का मॉड्यूलर वारहेड लगाया जा सकता है। इसमें कई तरह के वारहेड ऑप्शन मौजूद हैं। कुछ वारहेड्स खास तौर पर बंकर और मजबूत स्ट्रक्चर को भेदने के लिए बनाए गए हैं, जबकि कुछ रनवे डिनायल यानी एयरफील्ड को लंबे समय तक बेकार करने के लिए डिजाइन किए गए हैं।

गाइडेंस सिस्टम की बात करें तो प्रलय में एडवांस्ड इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम के साथ रेडियो फ्रीक्वेंसी सीकर लगाया गया है। इससे इसकी सटीकता बेहद ज्यादा बढ़ जाती है। इसका सीईपी यानी सर्कुलर एरर प्रोबेबिलिटी टारगेट से चूक की संभावना 10 मीटर से भी कम है, जो किसी भी टैक्टिकल मिसाइल के लिए ये बहुत बड़ी बात है। (Pralay Missile Upgrade)

हालिया ट्रायल्स से बढ़ा भरोसा

दिसंबर 2025 के आखिर में ओडिशा के चांदीपुर स्थित इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज से प्रलय मिसाइल का एक अहम यूजर इवैल्यूएशन ट्रायल किया गया। इस दौरान एक ही मोबाइल लॉन्चर से बेहद कम समय के अंतर पर दो मिसाइलें दागी गईं। दोनों मिसाइलों ने अपने तय किए गए टारगेट्स को सटीकता से हिट किया।

इस ट्रायल ने साबित किया कि प्रलय मिसाइल न सिर्फ सटीक है, बल्कि सैल्वो लॉन्च, यानी एक के बाद एक कई मिसाइलें दागने की क्षमता भी रखती है। युद्ध के हालात में यह क्षमता बेहद अहम मानी जाती है। (Pralay Missile Upgrade)

2026 में इंडक्शन की तैयारी

डीआरडीओ चीफ डॉक्टर समीर वी कामत के मुताबिक, प्रलय मिसाइल के यूजर ट्रायल्स 2026 में पूरे हो जाएंगे। इसके बाद इसे भारतीय सेना में शामिल किया जाएगा। शुरुआती चरण में इसे ब्रिगेड-लेवल फॉर्मेशन में तैनात किया जा सकता है, ताकि सीमित समय में दुश्मन पर तेज और सटीक हमला किया जा सके।

सेना में शामिल होने के बाद प्रलय, ब्रह्मोस जैसी सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल और पिनाका मल्टी-बैरेल रॉकेट सिस्टम के साथ मिलकर भारत की टैक्टिकल स्ट्राइक क्षमता को बड़ी मजबूती मिलेगी। (Pralay Missile Upgrade)

30 मिनट से भी कम समय में लॉन्च

प्रलय मिसाइल को मोबाइल, कैनिस्टराइज्ड लॉन्चर से दागा जाता है। इसका मतलब यह है कि लॉन्च की तैयारी में 30 मिनट से भी कम समय लगता है। यह मिसाइल “शूट-एंड-स्कूट” रणनीति के तहत काम करती है, यानी हमला करने के तुरंत बाद लॉन्चर अपनी जगह बदल सकता है। इससे दुश्मन के काउंटर अटैक की संभावना काफी कम हो जाती है।

प्रलय मिसाइल के प्रोडक्शन में भारत डायनेमिक्स लिमिटेड, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड के साथ-साथ निजी क्षेत्र की कंपनियों जैसे टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स और एलएंडटी को भी शामिल किया गया है। इससे देश में एक मजबूत डिफेंस इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम तैयार हो रहा है। (Pralay Missile Upgrade)

क्यों खास है प्रलय मिसाइल

आज के दौर में युद्ध सिर्फ न्यूक्लियर हथियारों तक सीमित नहीं रह गया है। सीमित लेकिन सटीक पारंपरिक हमले रणनीतिक रूप से ज्यादा अहम हो गए हैं। प्रलय मिसाइल इसी जरूरत को पूरा करती है। यह भारत को यह क्षमता देती है कि वह बिना न्यूक्लियर हथियारों का इस्तेमाल किए, दुश्मन के अहम सैन्य ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचा सके।

रूस के मिलिटरी एक्सपर्ट ने भी पढ़े प्रलय के कसीदे

रूस के जाने-माने मिलिटरी एक्सपर्ट एवगेनी दामांत्सेव ने भी प्रलय मिसाइल की तारीफ की है। उन्होंने प्रलय के हाइपरसोनिक मैन्युवर, एडवांस्ड गाइडेंस सिस्टम और टर्मिनल फेज डाइव को मॉडर्न एयर डिफेंस सिस्टम्स के लिए गंभीर खतरा बताया है।

अपने विश्लेषण में दामांत्सेव ने कहा है कि प्रलय मिसाइल पारंपरिक क्वासी-बैलिस्टिक मिसाइल और पूरी तरह मैन्युवरिंग हाइपरसोनिक हथियारों के बीच की एक खास श्रेणी में आती है। उन्होंने तकनीकी रूप से प्रलय मिसाइल को एक टू-स्टेज हथियार बताया, जिसमें सॉलिड प्रोपेलेंट रॉकेट मोटर्स का इस्तेमाल किया गया है। इसमें एक डिटैचेबल वारहेड होता है, जिसे स्वतंत्र रूप से टारगेट किया जा सकता है। इसका नेविगेशन सिस्टम इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम पर बेस्ड है, जिसे जीपीएस अपडेट्स से सपोर्ट मिलता है।

रूसी एक्सपर्ट के मुताबिक, इस गाइडेंस सिस्टम को भविष्य में और भी एडवांस किया जा सकता है। इसमें एक्टिव-पैसिव होमिंग हेड जोड़ने की संभावना है, जिससे यह मिसाइल रेडियो-कॉन्ट्रास्ट और रडार से उत्सर्जन करने वाले टारगेट्स को खुद पहचान कर ट्रैक कर सकेगी। इसका मतलब यह है कि प्रलय सिर्फ स्टैटिक टारगेट्स के अलावा मोबाइल एयर डिफेंस सिस्टम और हाई-वैल्यू टारगेट्स को भी निशाना बना सकेगी।

वहीं, इसका टर्मिनल कंट्रोल मैकेनिज्म भी काफी घातक है। दामांत्सेव ने बताया कि मिसाइल में फोल्डिंग लैटिस एयरोडायनामिक फिन्स लगाए गए हैं। ये फिन्स टर्मिनल फेज में एक्टिव मैन्युवरिंग की क्षमता देते हैं, जिससे मिसाइल अपनी दिशा अचानक बदल सकती है। (Pralay Missile Upgrade)

रफ्तार पहुंत जाती है 6,480 किलोमीटर प्रति घंटा

दामांत्सेव के मुताबिक बूस्ट फेज के दौरान प्रलय की रफ्तार लगभग 6,480 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुंच जाती है। इसके बाद जब वारहेड अलग होता है, तब भी यह 1,300 से 850 मीटर प्रति सेकंड की स्पीड बनाए रखता है और इसी दौरान कॉम्प्लैक्स मैन्युवर करता है। यही मैन्युवर लेटेस्ट इंटरसेप्टर मिसाइलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाते हैं।

रूसी विश्लेषक का कहना है कि प्रलय मिसाइल एक खास तरह की हाइपरसोनिक ट्रैजेक्टरी पर उड़ान भरती है, जहां इसकी स्पीड मैक-5 से ज्यादा हो जाती है। यह मिसाइल किसी पारंपरिक बैलिस्टिक आर्क पर नहीं चलती, बल्कि वायुमंडल के भीतर मिड-कोर्स मैन्युवर करती है। इस तरह की एटमॉस्फेरिक हाइपरसोनिक फ्लाइट में मिसाइल का पूरा रास्ता कई हिस्सों में बंट जाता है। हर हिस्से में मिसाइल नियंत्रित ढंग से दिशा बदलती है, जिससे दुश्मन के रडार सिस्टम भ्रमित हो जाते हैं और एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल इंटरसेप्टर्स के लिए सटीक गणना करना बेहद मुश्किल हो जाता है। (Pralay Missile Upgrade)

टर्मिनल फेज में प्रलय का फ्लाइट प्रोफाइल और भी आक्रामक हो जाता है। रिपोर्ट के मुताबिक, मिसाइल पहले अपेक्षाकृत कम ऊंचाई तक उतरती है और फिर अचानक एक तेज “पुल-अप” मैन्युवर करती है। इसके बाद यह लगभग 90 डिग्री के कोण पर सीधी और खड़ी डाइव करते हुए टारगेट पर गिरती है। (Pralay Missile Upgrade)

 

पाकिस्तान की ‘कश्मीर सॉलिडैरिटी’ का सच, आतंक के खिलाफ बोलने वाले कश्मीरी बुद्धिजीवियों को डराने में जुटी ISI

Pakistan terror proxies Kashmiri intellectuals
Junaid Qureshi

Pakistan terror proxies Kashmiri intellectuals: पाकिस्तान की कश्मीर नीति की असलियत एक बार फिर सामने आ गई है। एक तरफ इस्लामाबाद हर साल 5 फरवरी को तथाकथित “कश्मीर सॉलिडैरिटी डे” मनाकर कश्मीरियों के साथ खड़े होने का दावा करता है, तो दूसरी तरफ उसकी खुफिया एजेंसी और आतंकवादी प्रॉक्सी उन्हीं कश्मीरियों को निशाना बना रही हैं, जो हिंसा और आतंकवाद के खिलाफ खुलकर बोल रहे हैं। हाल ही में पाकिस्तान समर्थित आतंकी नेटवर्क ने प्रो-इंडिया और आतंक-विरोधी कश्मीरी बुद्धिजीवियों को सीधे मौत की धमकी दी है।

सुरक्षा एजेंसियों और अंतरराष्ट्रीय थिंक-टैंकों से जुड़े सूत्रों का कहना है कि यह एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है, जिसके जरिए पाकिस्तान उन आवाजों को खामोश करना चाहता है, जो उसकी “कश्मीर नैरेटिव” को दुनिया के सामने बेनकाब कर रही हैं। उनका कहना है कि यह मामला केवल किसी एक व्यक्ति की सुरक्षा का नहीं है, बल्कि उस पूरी सोच पर हमला है, जो कश्मीर में शांति, संवाद और लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करती है। (Pakistan terror proxies Kashmiri intellectuals)

Pakistan terror proxies Kashmiri intellectuals: धमकी का मकसद डर फैलाना और चुप कराना

जनवरी 2026 में सामने आए इस मामले में एक प्रमुख कश्मीरी मूल के काउंटर-टेररिज्म एक्सपर्ट को सीधे जान से मारने की धमकी दी गई। यह धमकी एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के जरिए भेजी गई, जिसमें आतंकवादी संगठन की ब्रांडिंग साफ दिखाई दे रही थी। मैसेज में न सिर्फ उन्हें “गद्दार” कहा गया, बल्कि यह भी लिखा गया कि उन्हें मारने में किसी तरह की हिचक नहीं होगी।

सूत्रों ने बताया कि यह धमकी लश्कर ए तैयबा के प्रॉक्सी संगठन द रजिस्टेंट फ्रंट यानी टीआरएफ ने जुनैद कुरैशी को एंड-टू-एंड एनक्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म (जैसे टेलीग्राम या सिग्नल) के जरिए दी थी। बता दें कि जुनैद कुरैशी यूरोपियन फाउंडेशन फॉर साउथ एशियन स्टडीज (EFSAS) के डायरेक्टर हैं।

सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, यह पिछले कुछ महीनों में दूसरी ऐसी घटना है, जब पाकिस्तान समर्थित आतंकी नेटवर्क ने उन कश्मीरी बुद्धिजीवियों को निशाना बनाया है, जो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के खिलाफ बोल रहे हैं। धमकी की भाषा और उसमें इस्तेमाल किए गए शब्द इस बात का संकेत देते हैं कि इसका मकसद डर फैलाना और चुप कराना है। (Pakistan terror proxies Kashmiri intellectuals)

रावलपिंडी से ऑपरेट हो रहा अकाउंट

धमकी पाने वाले विशेषज्ञ जुनैद कुरैशी ने मीडिया से बातचीत में सीधे तौर पर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई पर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि यह धमकी लश्कर ए तैयबा के कमांडर शेख सज्जाद गुल के जरिए आई। खास बात यह ही धमकी में जिन जानकारियों का जिक्र किया गया, वे सार्वजनिक नहीं थीं और सिर्फ सीमित लोगों तक ही पहुंच रखती थीं। क्योंकि मैसेज में एक प्रस्तावित कश्मीरी इंटेलेक्चुअल थिंक टैंक की संवेदनशील जानकारी थी, जो पब्लिक डोमेन में नहीं है। इससे यह आशंका और मजबूत हो जाती है कि इस पूरे मामले के पीछे संगठित खुफिया नेटवर्क काम कर रहा है।

जांच से जुड़े सूत्र बताते हैं कि धमकी भेजने वाला अकाउंट पाकिस्तान के रावलपिंडी क्षेत्र से ऑपरेट हो रहा था और इसका इस्तेमाल पहले भी आतंकवादी प्रचार सामग्री फैलाने के लिए किया जा चुका है। यह अकाउंट 24 अगस्त 2025 को बनाया गया और टीआरएफ के प्रोपेगैंडा फोटोज, अपडेट्स फैलाने के लिए इस्तेमाल होता है। यह वही तरीका है, जिसे पाकिस्तान लंबे समय से अपनाता रहा है, वह आतंकवादी संगठनों को आगे रखकर खुद पर्दे के पीछे रहता है। (Pakistan terror proxies Kashmiri intellectuals)

जुनैद ने पिता की आतंकी विचारधारा को किया रिजेक्ट

जुनैद कुरैशी ने अपने एक्स अकाउंट @JQ_plaintalk पर पर पोस्ट किया कि धमकियां उन्हें शांति और टेररिज्म के खिलाफ काम करने से नहीं रोकेंगी। उन्होंने अपने काम को जारी रखने का ऐलान किया है। जुनैद कुरैशी कश्मीरी मूल के हैं और EFSAS के डायरेक्टर हैं। उनके पिता हाशिम कुरैशी 1971 में एयर इंडिया फ्लाइट IC-405 के हाईजैकर्स में से एक थे, लेकिन जुनैद ने सार्वजनिक रूप से अपने पिता की विचारधारा को रिजेक्ट करते हुए अपने जन्म से पहले हुए हाईजैकिंग कांड को टेररिज्म का ऐक्ट बताया थाा।

अपनी संस्था के जरिए, जुनैद अंतरराष्ट्रीय प्लेटफॉर्म्स (जैसे यूएन, यूरोपीय पार्लियामेंट) पर पाकिस्तान की स्टेट-स्पॉन्सर्ड टेररिज्म को एक्सपोज करते हैं। वे दिखाते हैं कि कश्मीर में “आजादी की लड़ाई” वास्तव में आईएसआई का चलाया हुआ कैंपेन है, जिसमें लश्कर ए तैयबा, हिजबुल मुजाहिदीन और जैश-ए-मोहम्मद शामिल हैं।

2019 में पुलवामा अटैक की निंदा करने के लिए जुनैद को एक ब्लॉग पर हिट-लिस्ट में शामिल किया गया था। उन्होंने एक्स पर कहा कि लश्कर ए तैयबा, हिजबुल मुजाहिदीन और जैश-ए-मोहम्मद आतंकी संगठन हैं जो कश्मीर को बांटते हैं, और धमकियां उन्हें चुप नहीं कराएंगी। (Pakistan terror proxies Kashmiri intellectuals)

आतंकवाद के खिलाफ बोलने की चुकानी पड़ी कीमत

पाकिस्तान-समर्थित आतंकी संगठनों द्वारा कश्मीरी बुद्धिजीवियों और समाज के जागरूक वर्ग को निशाना बनाने का लंबा और खूनी इतिहास रहा है। दशकों से ऐसे कश्मीरी, जो आतंकवाद का विरोध करते हैं, लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करते हैं या भारत के साथ शांति और सह-अस्तित्व का समर्थन करते हैं, लगातार इन टेरर प्रॉक्सीज के टारगेट पर रहे हैं।

आकंड़ों के मुताबिक 1989 से 2020 के बीच पाकिस्तान-समर्थित आतंकी संगठनों ने 5000 से ज्यादा कश्मीरी नागरिकों, पत्रकारों, नेताओं और बुद्धिजीवियों की हत्या की थी। इनमें वे लोग शामिल थे, जिन्होंने खुले तौर पर आतंकवाद का विरोध किया या कश्मीर में पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल उठाए। लश्कर-ए-तैयबा, हिजबुल मुजाहिदीन और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठन इस पूरे दौर में इस खूनखराबे के प्रमुख जिम्मेदार रहे।

साल 2018 में इस पैटर्न का एक बेहद चौंकाने वाला उदाहरण तब सामने आया, जब ‘राइजिंग कश्मीर’ के संपादक शुजात बुखारी की श्रीनगर में गोली मारकर हत्या कर दी गई। उन्हें महीनों से धमकियां मिल रही थीं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें सरेआम मार दिया गया। इस हत्या ने साफ कर दिया कि जो भी कश्मीर में हिंसा और आतंक के खिलाफ बोलता है, वह सीधे आतंकी संगठनों के निशाने पर आ जाता है।

साल 2018 में इस पैटर्न का एक बेहद चौंकाने वाला उदाहरण तब सामने आया, जब ‘राइजिंग कश्मीर’ के संपादक शुजात बुखारी की श्रीनगर में गोली मारकर हत्या कर दी गई। उन्हें महीनों से धमकियां मिल रही थीं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें सरेआम मार दिया गया। इस हत्या ने साफ कर दिया कि जो भी कश्मीर में हिंसा और आतंक के खिलाफ बोलता है, वह सीधे आतंकी संगठनों के निशाने पर आ जाता है। (Pakistan terror proxies Kashmiri intellectuals)

इसके बाद 2019 में पुलवामा आतंकी हमले की निंदा करने पर जुनैद कुरैशी को आतंकियों की हिट-लिस्ट में डाल दिया गया। सिर्फ इसलिए कि उन्होंने खुले तौर पर आतंकवाद को गलत बताया और उसकी आलोचना की, उन्हें लश्कर-ए-तैयबा, हिजबुल मुजाहिदीन और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों से धमकियों का सामना करना पड़ा।

हिंसा का यह सिलसिला हाल के सालों में भी जारी रहा। साल 2025 में कुपवाड़ा में सामाजिक कार्यकर्ता गुलाम रसूल मैगरे की हत्या कर दी गई। शुरुआती जांच में इस हत्या के पीछे भी पाकिस्तान-समर्थित आतंकियों पर शक जताया गया। यह घटना इस बात का संकेत थी कि भले ही हालात बदले हों, लेकिन आतंक के जरिए डर फैलाने की नीति नहीं बदली है।

इन घटनाओं के बीच कुछ और खौफनाक मिसालें भी सामने आई हैं। 2019 में लश्कर-ए-तैयबा ने एक कश्मीरी लड़की को जबरन शादी के लिए बंधक बना लिया था और एक 12 साल के बच्चे की बेरहमी से हत्या कर दी थी। ऐसे मामलों ने यह साफ कर दिया कि आतंकी संगठनों के लिए न उम्र मायने रखती है, न इंसानियत। (Pakistan terror proxies Kashmiri intellectuals)

“सॉलिडैरिटी” की यह है सच्चाई

पाकिस्तान हर साल “कश्मीर सॉलिडैरिटी डे” के नाम पर रैलियां करता है, भाषण देता है और खुद को कश्मीरियों का हितैषी बताता है। लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। जिन कश्मीरियों की सोच पाकिस्तान की लाइन से मेल नहीं खाती, उन्हें या तो धमकाया जाता है या फिर हिंसा का शिकार बनाया जाता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह रणनीति केवल डर पैदा करने के लिए नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की आलोचना को कमजोर करना भी है। जब कश्मीरी मूल के लोग ही आतंकवाद को बेनकाब करते हैं, तो पाकिस्तान की पूरी कहानी ढहने लगती है। (Pakistan terror proxies Kashmiri intellectuals)

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बढ़ता असर

हाल के वर्षों में कई कश्मीरी बुद्धिजीवियों और शोधकर्ताओं ने यूरोप और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की भूमिका को दुनिया के सामने रखा है। उन्होंने दस्तावेजों और आंकड़ों के साथ यह दिखाया है कि कश्मीर में हिंसा किसी “जन आंदोलन” का नतीजा नहीं, बल्कि एक संगठित और प्रायोजित आतंकवादी अभियान है।

यही वजह है कि ऐसे लोगों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। जानकार मानते हैं कि यह पाकिस्तान की हताशा को दर्शाता है, क्योंकि उसकी कूटनीतिक रणनीति अब पहले जैसी असरदार नहीं रह गई है। (Pakistan terror proxies Kashmiri intellectuals)

भारत की सुरक्षा एजेंसियों की है नजर

सूत्रों के मुताबिक, भारतीय सुरक्षा एजेंसियां इस पूरे घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इन धमकियों को गंभीरता से लिया जा रहा है। यह सिर्फ भारत-पाकिस्तान का मामला नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई से जुड़ा मुद्दा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में अंतरराष्ट्रीय दबाव ही सबसे प्रभावी हथियार हो सकता है। जब तक आतंकवाद को प्रायोजित करने वाले ढांचे पर सीधा सवाल नहीं उठेगा, तब तक ऐसी धमकियां जारी रहेंगी। (Pakistan terror proxies Kashmiri intellectuals)

GPS जाम होने पर भी दुश्मन पर वार, भारतीय नौसेना के बेड़े में शामिल हुए ‘मेड इन इंडिया’ एडवांस्ड अनमैन्ड इंटरसेप्टर क्राफ्ट

Indian Navy Unmanned Interceptor Craft
Indian Navy Inducts Indigenous Armed Unmanned Interceptor Craft, Boosts Maritime Security

Indian Navy Unmanned Interceptor Craft: भारतीय नौसेना को देश में बने पहले ऑटोनॉमस हथियारबंद अनमैन्ड फास्ट इंटरसेप्टर क्राफ्ट (FIC) मिलने शुरू हो गए हैं। इन क्राफ्ट्स का पहला बैच पुणे स्थित भारतीय कंपनी सागर डिफेंस इंजीनियरिंग ने नौसेना को सौंप दिया है। पहले चरण में दो क्राफ्ट्स पश्चिमी तट पर तैनाती के लिए रवाना किए गए हैं।

अनमैन्ड फास्ट इंटरसेप्टर क्राफ्ट की डिलीवरी को भारतीय नौसेना के ऑपरेशन करने के तरीके में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है। इन अनमैन्ड और हथियारबंद क्राफ्ट्स के शामिल होने के बाद भारत उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल हो जाएगा, जिनके पास बोट स्वार्म तकनीक मौजूद है। (Indian Navy Unmanned Interceptor Craft)

Indian Navy Unmanned Interceptor Craft: क्या हैं अनमैन्ड फास्ट इंटरसेप्टर क्राफ्ट

अनमैन्ड फास्ट इंटरसेप्टर क्राफ्ट ऐसे हाई-स्पीड बोट्स होते हैं, जिन्हें बिना किसी चालक के समुद्र में ऑपरेट किया जा सकता है। ये क्राफ्ट ऑटोनॉमस सिस्टम पर काम करते हैं और जरूरत पड़ने पर इन्हें रिमोट कंट्रोल के जरिए भी चलाया जा सकता है। इनका मुख्य उद्देश्य समुद्र में तेजी से संदिग्ध नौकाओं को रोकना, तटीय इलाकों की निगरानी करना और विशेष अभियानों में मदद देना है।

भारतीय नौसेना को मिलने वाले ये क्राफ्ट पूरी तरह हथियारबंद हैं और आधुनिक समुद्री खतरों को ध्यान में रखकर डिजाइन किए गए हैं। (Indian Navy Unmanned Interceptor Craft)

पूरी तरह स्वदेशी डिजाइन और निर्माण

इन इंटरसेप्टर क्राफ्ट्स की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन्हें पूरी तरह भारत में डिजाइन, डेवलप और मैन्युफैक्चर किया गया है। यह प्रोजेक्ट सरकार के इनोवेशन्स फॉर डिफेंस एक्सीलेंस यानी आईडेक्स (iDEX) और डिफेंस इनोवेशन ऑर्गेनाइजेशन फ्रेमवर्क के तहत तैयार किया गया है।

अब तक भारतीय नौसेना कुछ हद तक विदेश में बने अनमैन्ड सरफेस वेसल्स पर निर्भर थी, लेकिन उनका इस्तेमाल मुख्य रूप से माइन काउंटर मेजर्स तक सीमित था। पहली बार नौसेना को ऐसे स्वदेशी अनमैन्ड क्राफ्ट मिल रहे हैं, जो सीधे कॉम्बैट और इंटरसेप्शन रोल निभा सकते हैं। (Indian Navy Unmanned Interceptor Craft)

12 क्राफ्ट का ऑर्डर, पहला बैच हुआ रवाना

भारतीय नौसेना ने जनवरी 2022 में कुल 12 ऐसे हथियारबंद अनमैन्ड इंटरसेप्टर क्राफ्ट्स का ऑर्डर दिया था। अब उसी डील के तहत पहला बैच तैयार होकर नौसेना को सौंपा गया है। आने वाले समय में बाकी क्राफ्ट्स भी चरणबद्ध तरीके से नौसेना के बेड़े में शामिल किए जाएंगे।

पहले बैच की दो यूनिट्स को पश्चिमी तट पर किसी संवेदनशील और रणनीतिक क्षेत्र में तैनात किया जाएगा, जहां तटीय सुरक्षा और निगरानी की सबसे ज्यादा जरूरत रहती है। (Indian Navy Unmanned Interceptor Craft)

रेंज और क्षमता में बेहद मजबूत

इन अनमैन्ड इंटरसेप्टर क्राफ्ट्स की ऑपरेशनल रेंज 400 नॉटिकल माइल्स से ज्यादा है, यानी ये करीब 800 किलोमीटर तक समुद्र में ऑपरेशन कर सकती हैं। इसका मतलब यह है कि ये क्राफ्ट लंबी दूरी तक पेट्रोलिंग कर सकती हैं और किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर तुरंत प्रतिक्रिया दे सकते हैं। वहीं इनकी रफ्तार भी लगभग 90 किमी/घंटा से ज्यादा है और इनकी एंड्यूरेंस कैपेसिटी 2 से ज्यादा दिन की है, जिससे ये समुद्र में लगातार ऑपरेशन कर सकते हैं।

जरूरत पड़ने पर ये क्राफ्ट विशेष मिशनों के लिए 14 से ज्यादा जवानों को भी ले जाने में सक्षम हैं। इससे इनका इस्तेमाल रैपिड इंसर्शन और इवैक्यूएशन जैसे मिशनों में भी किया जा सकता है।

ऑपरेशनल रोल्स के लिहाज से यह सिस्टम बेहद मल्टी-रोल है। इसे हाई-स्पीड इंटरडिक्शन के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, यानी संदिग्ध या दुश्मन बोट्स का पीछा कर उन्हें रोकने में। यह सर्विलांस और आईएसआर (इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रेकॉनिसेंस) मिशनों में भी अहम भूमिका निभा सकता है, जहां समुद्री इलाकों की लगातार निगरानी जरूरी होती है। इसके साथ ही यह सी4आईएसआर फ्रेमवर्क का हिस्सा बनकर कमांड, कंट्रोल, कम्युनिकेशन और इंटेलिजेंस नेटवर्क को मजबूत करता है। (Indian Navy Unmanned Interceptor Craft)

जीपीएस सिग्नल जाम होने पर भी करेगा काम

इस सिस्टम की सबसे बड़ी खासियत इसका एडवांस्ड ऑटोनॉमस आर्किटेक्चर है। इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह जीपीएस-डिनाइड एनवायरनमेंट में भी प्रभावी तरीके से काम कर सके। यानी अगर दुश्मन इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर के जरिए जीपीएस सिग्नल जाम करने की कोशिश करे, तब भी यह प्लेटफॉर्म अपना रास्ता नहीं भटकेगा। इसमें पूरी तरह स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम और कोलिजन अवॉइडेंस सॉफ्टवेयर लगाया गया है, जो आसपास मौजूद अन्य जहाजों, बाधाओं और समुद्री हालात को पहचानकर अपने आप सुरक्षित मूवमेंट सुनिश्चित करता है। (Indian Navy Unmanned Interceptor Craft)

सेल्फ-राइटिंग कैपेबिलिटी

इसके अलावा इस प्लेटफॉर्म में कई ऐसे फीचर्स जोड़े गए हैं, जो इसे मुश्किल समुद्री हालात में भी भरोसेमंद बनाते हैं। अगर ऊंची लहरों या खराब मौसम के कारण यह क्राफ्ट पलट भी जाए, तो इसमें सेल्फ-राइटिंग कैपेबिलिटी है, यानी यह अपने आप फिर से सीधा हो सकता है। यह दिन और रात, दोनों समय ऑपरेशन करने में सक्षम है और तेज लहरों तथा रफ सी-कंडीशंस को झेलने की क्षमता रखता है। यही वजह है कि इसे लंबी अवधि के समुद्री मिशनों के लिए उपयुक्त माना जा रहा है। (Indian Navy Unmanned Interceptor Craft)

क्राफ्ट्स में लेयर्ड वेपन आर्किटेक्चर

इन क्राफ्ट्स में लेयर्ड वेपन आर्किटेक्चर दिया गया है। यानी ये अलग-अलग तरह के समुद्री खतरों से निपटने में सक्षम हैं। छोटे और तेज रफ्तार बोट्स, असिमेट्रिक हमले, या अचानक सामने आने वाले खतरे इन सबके लिए ये क्राफ्ट तैयार किए गए हैं। इसके फ्रंट में 12.7 मिलीमीटर एसआरसीजी (स्टेबलाइज्ड रिमोट कंट्रोल गन) लगाई गई है, जो क्लोज-रेंज फायरपावर देती है। इसके जरिए तेज रफ्तार से आने वाली छोटी बोट्स या संदिग्ध टारगेट्स पर सटीक फायर किया जा सकता है। इसके अलावा यह प्लेटफॉर्म शॉर्ट-रेंज मिसाइल्स और लॉइटरिंग अम्युनिशन भी डिप्लॉय कर सकता है, जिन्हें ड्रोन जैसे स्मार्ट हथियारों की श्रेणी में रखा जाता है। इससे यह न सिर्फ असिमेट्रिक थ्रेट्स, बल्कि हाई-इंटेंसिटी कॉम्बैट सिचुएशंस में भी असरदार है।

इनमें रिमोट कंट्रोल गन, शॉर्ट-रेंज हथियार और आधुनिक सेंसर सिस्टम लगे हैं, जिससे ये दिन और रात दोनों समय ऑपरेशन कर सकते हैं। ऑटोनॉमस नेविगेशन सिस्टम की मदद से ये इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर में भी बखूबी काम कर सकते हैं। (Indian Navy Unmanned Interceptor Craft)

बोट स्वार्म तकनीक क्यों है खास

इन अनमैन्ड इंटरसेप्टर क्राफ्ट्स की एक बड़ी ताकत बोट स्वार्म कैपेबिलिटी है। इसका मतलब यह है कि एक साथ कई क्राफ्ट्स को नेटवर्क के जरिए कंट्रोल किया जा सकता है। इससे यह एक तरह का फोर्स मल्टीप्लायर बन जाता है और ह्यूमन ऑपरेटर्स का जोखिम काफी हद तक कम हो जाता है। ये सभी क्राफ्ट्स मिलकर किसी बड़े इलाके की निगरानी कर सकते हैं या किसी लक्ष्य को चारों तरफ से घेर सकते हैं।

इसके अलावा लो-इंटेंसिटी मेरिटाइम ऑपरेशन्स, जैसे कोस्टल पैट्रोलिंग, समुद्री सीमाओं की निगरानी और चोक पॉइंट्स जैसे स्ट्रेट्स या संकरे समुद्री रास्तों पर हॉट पर्स्यूट ऑपरेशन्स में भी यह प्लेटफॉर्म काफी उपयोगी है।

सबसे अहम बात यह है कि यह प्लेटफॉर्म रिकॉन्फिगरेबल है। यानी जरूरत के मुताबिक इसे सिर्फ आईएसआर मिशन के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है या फिर इसे पूरी तरह कॉम्बैट रोल में ढाला जा सकता है।

इस तकनीक से समुद्र में नौसैनिक उतारने की जरूरत नहीं पड़ती, और कम समय में ज्यादा क्षेत्र को सुरक्षित किया जा सकता है। भविष्य की नेवल बैटल्स में स्वार्म टेक्नोलॉजी को बेहद अहम माना जा रहा है। (Indian Navy Unmanned Interceptor Craft)

भारतीय नौसेना को क्या मिलेगा फायदा

अब तक भारतीय नौसेना कुछ हद तक इजरायल में बने अनमैन्ड सरफेस वेसल्स पर निर्भर रही है, लेकिन वे मुख्य रूप से माइन काउंटर मेजर्स के लिए इस्तेमाल होते थे। पहली बार नौसेना को पूरी तरह हथियारबंद और स्वदेशी अनमैन्ड इंटरसेप्टर क्राफ्ट मिल रहे हैं।

इन अनमैन्ड इंटरसेप्टर क्राफ्ट्स के शामिल होने से भारतीय नौसेना की तटीय सुरक्षा और रैपिड रिस्पॉन्स क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी। ये क्राफ्ट बंदरगाहों, समुद्री चोक पॉइंट्स और संवेदनशील इलाकों में चौबीसों घंटे निगरानी रख सकते हैं।

इसके अलावा, इंडियन ओशन रीजन में बढ़ती विदेशी नौसैनिक गतिविधियों के बीच ये प्लेटफॉर्म नौसेना के लिए एक मजबूत फोर्स मल्टीप्लायर साबित हो सकते हैं।

इस प्रोजेक्ट से आत्मनिर्भर भारत को मजबूती मिली है। इसकी वजह है कि इस टेक्नोलॉजी को देश में ही डेवलप किया गया है, साथ ही स्टार्ट-अप्स को भी बढ़ावा मिला है और विदेशी निर्भरता भी कम हुई है। (Indian Navy Unmanned Interceptor Craft)

 

50 साल पुराने रूसी पेचोरा मिसाइल सिस्टम को मिली नई जान, अब बनेगा सुदर्शन चक्र का हिस्सा

Upgraded Pechora Missile System
Upgraded Pechora Missile System: How India Gave New Life to a Legacy Air Defence Weapon

Upgraded Pechora Missile System: भारतीय वायुसेना के पेचोरा सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम को भारतीय कंपनी अल्फा डिजाइन टेक्नोलॉजीज ने पूरी तरह अपग्रेड कर दिया है। हाल ही में इस अपग्रेडेड सिस्टम ने अपने अहम लाइव-फायर टेस्ट सफलतापूर्वक पूरे कर लिए हैं। यह अपग्रेड ऐसे समय पर हुआ है, जब हवाई खतरे तेजी से बदल रहे हैं। ड्रोन, क्रूज मिसाइल, लो-फ्लाइंग टारगेट और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर जैसे नए खतरे सामने हैं। ऐसे माहौल में पेचोरा जैसे पुराने सिस्टम को हटाने के बजाय उसे अपग्रेड करना भारतीय वायुसेना की एक सोची-समझी रणनीति है।

Upgraded Pechora Missile System: क्या है पेचोरा सिस्टम

पेचोरा मिसाइल सिस्टम, जिसे दुनिया एस-125 नेवा या पेचोरा के नाम से जानती है। इसे सोवियत दौर में विकसित किया गया था। भारत ने इसे 1970 के दशक में अपनी वायु रक्षा में शामिल किया था। उस समय यह सिस्टम दुश्मन के लड़ाकू विमानों और कम ऊंचाई पर उड़ने वाले टारगेट्स के खिलाफ बेहद प्रभावी माना जाता था। इसकी रेंज 25-35 किमी थी, जो अपग्रेडेड वर्जन में 35 से ज्यादा हो गई है।

पिछले करीब 50 सालों में पेचोरा ने भारतीय वायुसेना की एयर डिफेंस में अहम भूमिका निभाई है। कई युद्ध अभ्यासों और वास्तविक हालात में इस सिस्टम ने अपनी विश्वसनीयता साबित की। लेकिन समय के साथ तकनीक बदलती गई और यही पेचोरा की सबसे बड़ी चुनौती बन गई।

6-7 मई को हुए ऑपरेशन सिंदूर में भी पेचोरा ने अहम भूमिका निभाई थी। यह पाकिस्तान की तरफ से आए स्वार्म ड्रोन्स, लोइटरिंग म्यूनिशंस, और लो-फ्लाइंग एरियल थ्रेट्स को इंटरसेप्ट करने में इस्तेमाल हुआ था। यह लेयर्ड एयर डिफेंस का हिस्सा था, जिसमें आकाश, ओसाका, एस-400 और स्पाइडर शामिल थे। वहीं कैनिबलाइजेशन तकनीक से पुराने यूनिट्स से पार्ट्स लेकर एक्टिव बैटरियों को ऑपरेशनल रखा गया। इस ऑपरेशन में अपग्रेडेड पेचोरा ने अपनी रिलायबिलिटी साबित की, और यह सुदर्शन चक्र (लेयर्ड एयर डिफेंस शील्ड) का हिस्सा बन रहा है। (Upgraded Pechora Missile System)

क्यों जरूरी हो गया था अपग्रेड

आज की लड़ाई 1970 या 1980 के दशक जैसी नहीं रही। अब खतरा सिर्फ फाइटर जेट्स से नहीं है, बल्कि ड्रोन, क्रूज मिसाइल, लो-रडार सिग्नेचर टारगेट्स और स्वार्म अटैक्स से भी है। पुराने पेचोरा सिस्टम में एनालॉग टेक्नोलॉजी इस्तेमाल होती थी। इसमें वैल्व और ट्रांजिस्टर बेस्ड हार्डवेयर होता था, जिसे मेंटेन करना मुश्किल और महंगा होता जा रहा था।

इसके अलावा, रूस से स्पेयर पार्ट्स पर निर्भरता भी एक बड़ी समस्या बन चुकी थी। जियो-पॉलिटिकल हालात और सप्लाई चेन की दिक्कतों ने यह साफ कर दिया कि अगर पुराने सिस्टम्स को जिंदा रखना है, तो देश के भीतर ही उनका समाधान निकालना होगा।

यही वजह है कि भारतीय वायुसेना ने फैसला किया कि पेचोरा जैसे भरोसेमंद लेकिन पुराने सिस्टम को हटाने के बजाय उसे पूरी तरह अपग्रेड किया जाए। (Upgraded Pechora Missile System)

अल्फा डिजाइन को क्यों मिली जिम्मेदारी

बेंगलुरु की अल्फा डिजाइन टेक्नोलॉजीज लिमिटेड पहले से ही भारतीय सेना और वायुसेना के लिए कई स्वदेशी सिस्टम डेवलप कर चुकी है। थर्मल इमेजिंग फायर कंट्रोल यूनिट, सॉफ्टवेयर-डिफाइंड रेडियो, लेजर टारगेट डिजाइनटर और मिसाइल लॉन्च डिटेक्शन सिस्टम जैसे प्रोजेक्ट्स में कंपनी का अनुभव रहा है।

साल 2020 में रक्षा मंत्रालय ने करीब 591 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट अल्फा डिजाइन को दिया। इसका मकसद था वायुसेना के 16 पेचोरा सिस्टम्स को पूरी तरह आधुनिक बनाना। यह एक बड़ा भरोसा था, क्योंकि पहली बार किसी निजी भारतीय कंपनी को इतने पुराने और संवेदनशील मिसाइल सिस्टम के अपग्रेड की जिम्मेदारी दी गई थी। (Upgraded Pechora Missile System)

अपग्रेड में क्या-क्या बदला गया

इस अपग्रेड को सिर्फ “मरम्मत” कहना सही नहीं होगा। दरअसल पेचोरा को अंदर से पूरी तरह नया बना दिया गया है। सबसे पहले इसके ट्रैकिंग रडार सिस्टम को पूरी तरह डिजिटल किया गया। पुराने एनालॉग सिग्नल प्रोसेसिंग की जगह अब आधुनिक डिजिटल प्रोसेसिंग सिस्टम लगाए गए हैं। इससे टारगेट को पकड़ने, ट्रैक करने और मिसाइल को गाइड करने की क्षमता कई गुना बेहतर हो गई है।

रडार का नया ट्रांसमीटर और रिसीवर चेन लगाया गया है। पुराने वैल्व और ट्रांजिस्टर आधारित हिस्सों की जगह अब आधुनिक सेमीकंडक्टर चिप्स इस्तेमाल हो रहे हैं, जो ज्यादा भरोसेमंद और कम मेंटेनेंस वाले हैं। (Upgraded Pechora Missile System)

ऑपरेटर्स के लिए केबिन को भी पूरी तरह मॉडर्न बनाया गया है। अब वहां डिजिटल डिस्प्ले, डेटा कलेक्शन सिस्टम और हेल्थ मॉनिटरिंग यूनिट्स लगी हैं। इससे सिस्टम की हालत को रियल-टाइम में देखा जा सकता है।

ऑटोमेशन बढ़ने से केबिन में काम करने वाले क्रू की संख्या भी कम हो गई है। यानी अब कम लोग ज्यादा सटीक और तेजी से फैसले ले सकते हैं।

इसके अलावा, मिसाइल कॉम्प्लेक्स के मैकेनिकल हिस्सों को भी या तो रिफर्बिश किया गया है या पूरी तरह बदला गया है, ताकि सिस्टम अगले कई वर्षों तक बिना बड़ी दिक्कत के काम करता रहे। (Upgraded Pechora Missile System)

पोखरण में हुआ असली इम्तिहान

किसी भी हथियार प्रणाली के लिए सबसे बड़ा टेस्ट मैदान में होता है। अपग्रेडेड पेचोरा सिस्टम का यूजर फायरिंग ट्रायल राजस्थान के पोखरण रेंज में हुआ। यह ट्रायल नवंबर 2025 से दिसंबर 2025 के बीच चले।

इन ट्रायल्स में यह देखा गया कि नया डिजिटल सिस्टम असली हालात में कितना भरोसेमंद है। टारगेट डिटेक्शन, ट्रैकिंग, मिसाइल लॉन्च और इंटरसेप्शन- हर स्टेज पर सिस्टम ने उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन किया। यही वजह है कि इसे एक बड़ी सफलता माना जा रहा है। (Upgraded Pechora Missile System)

वायुसेना को क्या मिलेगा फायदा

अपग्रेडेड पेचोरा सिस्टम भारतीय वायुसेना की लेयर्ड एयर डिफेंस स्ट्रैटेजी का अहम हिस्सा बनेगा। इसे मिशन सुदर्शन चक्र के तहत शामिल किया जा रहा है, जिसका मकसद ड्रोन से लेकर हाई-स्पीड फाइटर जेट तक हर खतरे से देश को सुरक्षित रखना है।

जब तक आकाश-एनजी, क्यूआरएसएएम और दूसरे नए सिस्टम पूरी संख्या में तैनात नहीं हो जाते, तब तक अपग्रेडेड पेचोरा एक मजबूत ब्रिज का काम करेगा। (Upgraded Pechora Missile System)

Vayushakti-2026: पाकिस्तान सीमा से सटे वेस्टर्न फ्रंट पर भारतीय वायुसेना की सबसे बड़ी फायर पावर एक्सरसाइज, जानें इस बार क्यों है खास?

Vayushakti 2026 Indian Air Force
Vayushakti-2026: Indian Air Force to Showcase Massive Firepower on Western Front in Pokhran

Vayushakti 2026 Indian Air Force: भारतीय वायुसेना फरवरी 2026 में एक बार फिर अपनी जबरदस्त फायर पावर और ऑपरेशनल तैयारी का प्रदर्शन करने जा रही है। इसके लिए वायुसेना ने अपने सबसे बड़े एयर पावर एक्सरसाइज ‘वायुशक्ति-2026’ की तैयारी शुरू कर दी है। इस एक्सरसाइज को लेकर नोटम भी जारी किया जा चुका है। जिसके मुताबिक वेस्टर्न फ्रंट, यानी पाकिस्तान सीमा से सटे राजस्थान के पोखरण में बड़े स्तर पर हवाई गतिविधियां होने वाली हैं।

एक्सरसाइज ‘वायुशक्ति-2026’ में दिन और रात, दोनों समय लाइव फायरिंग, एयर-टू-ग्राउंड स्ट्राइक, एयर-टू-एयर मिशन, एयर डिफेंस और जॉइंट ऑपरेशन्स का अभ्यास किया जाएगा।

Vayushakti 2026 Indian Air Force: पोखरण फिर बनेगा वायुसेना की ताकत का गवाह

राजस्थान का पोखरण इलाका पहले भी भारत की सैन्य ताकत का गवाह रहा है। अब एक बार फिर रेगिस्तान का यह इलाका भारतीय वायुसेना की ताकत और तैयारी का केंद्र बनने जा रहा है। पाकिस्तान सीमा से सटे इलाकों के खुले आसमान में जब दर्जनों फाइटर जेट एक साथ उड़ान भरेंगे और अपने हथियारों का प्रदर्शन करेंगे, तो यह नजारा सिर्फ सैन्य अभ्यास नहीं, बल्कि भारत की हवाई शक्ति का प्रतीक होगा। (Vayushakti 2026 Indian Air Force)

तीन चरणों में एक्सरसाइज

नोटम-इन के मुताबिक, भारतीय वायुसेना की यह एक्सरसाइज तीन चरणों में आयोजित की जाएगी। पहला चरण 9 फरवरी से 14 फरवरी 2026 तक चलेगा, दूसरा चरण 16 फरवरी से 19 फरवरी तक और तीसरा व अंतिम चरण 20 फरवरी से 28 फरवरी 2026 तक निर्धारित किया गया है।

शुरुआती दो चरणों में ग्राउंड से 30,000 फीट तक हवाई गतिविधियां आयोजित की जाएंगी। इसके बाद तीसरे चरण में यह सीमा हटा दी गई है। यानी आखिरी चरण में वायुसेना पूरी ऊंचाई और पूरी क्षमता के साथ अपने हथियारों और प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल कर सकती है। आमतौर पर ऐसा तभी किया जाता है, जब बड़े पैमाने पर कॉम्बैट सिमुलेशन और लॉन्ग-रेंज स्ट्राइक का अभ्यास होता हो। (Vayushakti 2026 Indian Air Force)

क्यों खास है वायुशक्ति एक्सरसाइज

वायुशक्ति भारतीय वायुसेना की सबसे प्रतिष्ठित फायर पावर एक्सरसाइज मानी जाती है। इसे हर कुछ वर्षों में आयोजित किया जाता है, ताकि वायुसेना अपनी युद्धक तैयारियों को न सिर्फ परखे, बल्कि देश और दुनिया को भी दिखा सके।

पिछली वायुशक्ति एक्सरसाइज में राफेल, सुखोई-30 एमकेआई, तेजस, मिराज-2000 और मिग-29 जैसे फाइटर जेट्स ने लाइव हथियारों के साथ अपने टारगेट्स को निशाना बनाया था। ऑपरेशन सिंदूर के बाद आयोजित वायुशक्ति 2026 का संस्करण इससे भी बड़ा और ज्यादा व्यापक माना जा रहा है। (Vayushakti 2026 Indian Air Force)

Vayushakti 2026 Indian Air Force

वेस्टर्न फ्रंट पर फोकस क्यों

हाल के वर्षों में भारत के सामने दो-फ्रंट चैलेंज लगातार चर्चा में रहा है। एक तरफ पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान, तो दूसरी तरफ उत्तरी सीमा पर चीन। ऐसे में वायुसेना की रणनीति यह है कि वह दोनों मोर्चों पर एक साथ जवाब देने में सक्षम रहे।

वायुशक्ति-2026 के जरिए वायुसेना वेस्टर्न फ्रंट पर अपनी रैपिड रिस्पॉन्स, डीप-स्ट्राइक और प्रिसिजन अटैक क्षमताओं को परखेगी। इस अभ्यास के जरिए पाकिस्तान को यह संदेश दिया जाएगा कि किसी भी हालात में भारतीय वायुसेना तुरंत और प्रभावी कार्रवाई करने में सक्षम है। (Vayushakti 2026 Indian Air Force)

कौन-कौन से एयरक्राफ्ट होंगे शामिल

हालांकि आधिकारिक तौर पर सभी प्लेटफॉर्म्स की सूची जारी नहीं की गई है, लेकिन पिछले ट्रेंड और तैयारियों को देखते हुए माना जा रहा है कि इस एक्सरसाइज में वायुसेना के लगभग सभी फ्रंटलाइन एयरक्राफ्ट शामिल होंगे।

इसमें राफेल फाइटर जेट्स की अहम भूमिका रहने की उम्मीद है। राफेल अपनी लॉन्ग-रेंज प्रिसिजन स्ट्राइक क्षमता और एडवांस्ड मिसाइल सिस्टम के लिए जाना जाता है। सुखोई-30 एमकेआई एयर सुपीरियॉरिटी और हेवी स्ट्राइक का जिम्मा संभालेगा, जबकि स्वदेशी तेजस फाइटर जेट आत्मनिर्भर भारत की ताकत को दिखाएगा।

इसके अलावा मिराज-2000, मिग-29, जैगुआर, अपाचे अटैक हेलिकॉप्टर, चिनूक हेवी-लिफ्ट हेलिकॉप्टर और सी-130जे जैसे सपोर्ट एयरक्राफ्ट भी मिशन का हिस्सा बन सकते हैं। (Vayushakti 2026 Indian Air Force)

दिन और रात दोनों में ऑपरेशन

वायुशक्ति-2026 की एक बड़ी खासियत यह होगी कि इसमें दिन और रात, दोनों समय मिशन को अंजाम दिया जाएगा। रात के ऑपरेशन असली युद्ध की दृष्टि से बेहद अहम माने जाते हैं, क्योंकि मॉडर्न वॉरफेयर में अंधेरे में सटीक हमला करने की क्षमता निर्णायक होती है।

रात के समय टारगेट पर सटीक बमबारी, मिसाइल लॉन्च और एयर डिफेंस इंटरसेप्शन यह दिखाएंगे कि भारतीय वायुसेना हर हालात में ऑपरेशनल रेडी है। (Vayushakti 2026 Indian Air Force)

एयर डिफेंस और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर का अभ्यास

इस एक्सरसाइज में सिर्फ हमला ही नहीं, बल्कि दुश्मन के हमलों से बचाव का अभ्यास भी किया जाएगा। एयर डिफेंस सिस्टम, रडार नेटवर्क और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर क्षमताओं को भी परखा जाएगा।

इससे यह देखा जाएगा कि अगर दुश्मन हवाई हमला करता है, तो भारतीय एयर डिफेंस सिस्टम उसे कितनी तेजी और प्रभावी तरीके से रोक पाते हैं। (Vayushakti 2026 Indian Air Force)

10–15 साल और बढ़ेगी T-72 टैंकों की उम्र, लंबे समय तक ऑपरेशनल बनाए रखने के लिए शुरू की ओवरहालिंग

T-72 Tank Overhaul Jabalpur
T-72 Tank Overhaul Begins in Jabalpur, Boosting Indian Army’s Armoured Capability

T-72 Tank Overhaul Jabalpur: मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर में स्थित आर्मर्ड वीहिकल्स निगम लिमिटेड यानी एवीएनएल के तहत आने वाली व्हीकल फैक्ट्री जबलपुर (वीएफजे) में टी-72 मेन बैटल टैंकों के ओवरहॉल का काम औपचारिक रूप से शुरू हो गया है।

यह पूरा प्रोजेक्ट एक पायलट पहल के तौर पर शुरू किया गया है, जिसका फोकस भारतीय सेना के टी-72 मेन बैटल टैंकों के ओवरहॉल पर है। टी-72 सोवियत मूल का टैंक है, जो दशकों से भारतीय सेना की बख्तरबंद ताकत की रीढ़ बना हुआ है। भारत के पास करीब 2,400 से ज्यादा टी-72 टैंक हैं, जिनमें अजेय जैसे भारतीय अपग्रेडेड वेरिएंट भी शामिल हैं। इतने बड़े बेड़े को लंबे समय तक ऑपरेशनल बनाए रखने के लिए ओवरहॉल बेहद जरूरी हो जाता है। (T-72 Tank Overhaul Jabalpur)

T-72 Tank Overhaul Jabalpur: क्यों जरूरी है टी-72 टैंकों का ओवरहॉल

टी-72 टैंक भारतीय सेना की बख्तरबंद ताकत की रीढ़ माने जाते हैं। भले ही ये टैंक पुराने डिजाइन के हों, लेकिन आज भी सेना के पास इनकी संख्या काफी ज्यादा है। भारत ने टी-72 टैंकों को दशकों से इस्तेमाल किया है और समय-समय पर इनमें कई अपग्रेड भी किए गए हैं।

लेकिन हर टैंक की एक सीमित ऑपरेशनल लाइफ होती है। लगातार तैनाती, फायरिंग, रेगिस्तानी और पहाड़ी इलाकों में ऑपरेशन के कारण टैंकों के इंजन, ट्रांसमिशन, गन सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक हिस्सों पर असर पड़ता है। ऐसे में ओवरहॉल जरूरी हो जाता है।

ओवरहॉल का मतलब सिर्फ मामूली मरम्मत नहीं होता, बल्कि टैंक को लगभग पूरी तरह खोलकर उसके हर अहम हिस्से की गहराई से जांच की जाती है। इस प्रक्रिया में इंजन, ट्रांसमिशन, गन सिस्टम, आर्मर और इलेक्ट्रॉनिक्स को चेक किया जाता है। जो पार्ट खराब या कमजोर हो जाते हैं, उन्हें रिपेयर या रिप्लेस किया जाता है। इसके बाद टैंक को दोबारा असेंबल कर टेस्ट किया जाता है, ताकि वह फिर से नई जैसी हालत में मैदान में उतर सके। इस तरह के ओवरहॉल से टैंक की ऑपरेशनल लाइफ करीब 10 से 15 साल तक बढ़ जाती है। (T-72 Tank Overhaul Jabalpur)

T-72 Tank Overhaul Jabalpur

टी-72 टैंक की खूबियां

टी-72 टैंक अपनी ताकत और भरोसेमंद डिजाइन के लिए जाना जाता है। इसमें 125 मिलीमीटर की मेन गन, करीब 1000 हॉर्सपावर का इंजन, और सड़क पर लगभग 60 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार की क्षमता होती है। इसका वजन करीब 41 टन होता है। भारत ने इन टैंकों को 1970 के दशक से इस्तेमाल करना शुरू किया था और समय के साथ इनमें कई अहम अपग्रेड भी किए गए, जिनमें ईआरए यानी एक्सप्लोसिव रिएक्टिव आर्मर जैसे सुरक्षा सिस्टम शामिल हैं।

क्यों चुना गया एवीएनएल और वीएफजे को

अब तक T-72 टैंकों का बड़ा ओवरहॉल काम मुख्य रूप से तमिलनाडु के अवाड़ी स्थित हेवी व्हीकल्स फैक्ट्री में होता रहा है। लेकिन सेना की जरूरतें बढ़ने के साथ वहां की क्षमता सीमित पड़ने लगी।

इसी को देखते हुए एवीएनएल ने फैसला लिया कि ओवरहॉल की क्षमता को बढ़ाया जाए। इसके लिए व्हीकल फैक्ट्री जबलपुर को चुना गया। वीएफजे पहले से ही सेना के लिए कई तरह के वाहन और उपकरण बनाती रही है, इसलिए यहां जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर और कुशल मानव संसाधन मौजूद था। (T-72 Tank Overhaul Jabalpur)

साल 2025 में वीएफजे को पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर टी-72 टैंकों का ओवरहॉल करने की अनुमति दी गई। इसके बाद फैक्ट्री ने अपने स्ट्रक्चर को अपग्रेड किया, कर्मचारियों को ट्रेनिंग दी और तय समय में पहला लक्ष्य पूरा किया।

एवीएनएल के सीएमडी संजय द्विवेदी ने कहा कि यह एक बेहद चुनौतीपूर्ण प्रोजेक्ट था। पहली बार जबलपुर में इस स्तर पर टैंकों का ओवरहॉल किया गया, लेकिन टीम ने समयसीमा के भीतर काम पूरा कर दिखाया।

उन्होंने भरोसा दिलाया कि अब वीएफजे पूरी क्षमता के साथ टैंकों का ओवरहॉल करेगी और भारतीय सेना की जरूरतों को समय पर पूरा किया जाएगा।

मास्टर जनरल ऑफ सस्टेन्मेंट, एमजीएस के डीजी लेफ्टिनेंट जनरल अमरदीप सिंह औजला ने भी वीएफजे और एवीएनएल की टीम की तारीफ की। उन्होंने कहा कि यह आसान काम नहीं था, लेकिन इसे सफलतापूर्वक पूरा कर यह साबित कर दिया गया है कि भविष्य में और भी बड़ा काम यहां से कराया जा सकता है। (T-72 Tank Overhaul Jabalpur)

सेना को क्या मिलेगा इसका फायदा

भारतीय सेना की ओवरऑल रणनीति के तहत वर्ष 2027 तक मौजूदा टी-72 टैंक फ्लीट को अपग्रेड करने पर खास जोर दिया गया है। इसका मकसद यह है कि जब तक नई पीढ़ी के प्लेटफॉर्म पूरी तरह सेवा में नहीं आ जाते, तब तक टी-72 टैंक आधुनिक युद्ध की जरूरतों के मुताबिक सक्षम बने रहें। इसी रणनीति के साथ आगे चलकर FRCV यानी फ्यूचर रेडी कॉम्बैट व्हीकल प्रोजेक्ट को लागू करने की योजना है, जिसके जरिए भारतीय सेना को पूरी तरह नए और अत्याधुनिक टैंक मिलेंगे। (T-72 Tank Overhaul Jabalpur)

इस प्रोजेक्ट से भारतीय सेना को कई स्तर पर फायदा होगा। सबसे बड़ा फायदा यह है कि टैंकों की उपलब्धता बढ़ेगी। जब टैंक लंबे समय तक ओवरहॉल के लिए फैक्ट्री में फंसे रहते हैं, तो यूनिट्स की ऑपरेशनल क्षमता प्रभावित होती है। अब जब एक और फैक्ट्री यह काम करेगी, तो टैंक जल्दी वापस सेना को मिलेंगे।

दूसरा फायदा यह है कि सेना को अपने पुराने लेकिन भरोसेमंद T-72 टैंकों को पूरी तरह हटाने की जल्दी नहीं पड़ेगी। जब तक नए प्लेटफॉर्म पूरी संख्या में नहीं आ जाते, तब तक ये ओवरहॉल किए गए टैंक सीमाओं पर मजबूती से तैनात रह सकेंगे।

तीसरा फायदा रणनीतिक है। भारत के सामने पश्चिमी और उत्तरी दोनों मोर्चों पर चुनौतियां हैं। ऐसे में बख्तरबंद ताकत का मजबूत रहना बेहद जरूरी है। ओवरहॉल किए गए टी-72 टैंक इसी जरूरत को पूरा करेंगे। (T-72 Tank Overhaul Jabalpur)

भारत-जर्मनी सबमरीन डील फाइनल! प्रोजेक्ट 75I से भारतीय नौसेना को मिलेगी नई अंडरवॉटर ताकत

India Germany Submarine Deal Project 75I
Indian Navy’s Kalvari Class Submarine - INS Vela

India Germany Submarine Deal Project 75I: भारत सरकार और जर्मनी सरकार के बीच एक इंटर-गवर्नमेंटल एग्रीमेंट यानी आईजीए को अंतिम रूप दे दिया गया है, जिससे भारतीय नौसेना के लिए करीब 8 से 10 बिलियन डॉलर की सबमरीन डील का रास्ता साफ हो गया है। यह डील भारतीय नौसेना के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट 75I के तहत की जाएगी, जिसमें देश में ही छह नई पीढ़ी की डीजल-इलेक्ट्रिक अटैक सबमरींस बनाई जाएंगी।

India Germany Submarine Deal Project 75I: क्या है प्रोजेक्ट 75I

प्रोजेक्ट 75I भारतीय नौसेना का सबसे अहम सबमरीन प्रोग्राम माना जाता है। इसका मकसद ऐसी छह अत्याधुनिक पारंपरिक यानी नॉन-न्यूक्लियर सबमरीन्स को शामिल करना है, जो लंबे समय तक पानी के नीचे रह सकें, बेहद कम आवाज करें और दुश्मन की पकड़ में आए बिना हमला करने में सक्षम हों।

इस प्रोजेक्ट की योजना 2000 के दशक में ही बन गई थी, लेकिन तकनीकी शर्तों, नीतिगत बदलावों और इंटरनेशनल साझेदारों के चयन में देरी के कारण यह सालों तक अटका रहा। अब जाकर यह प्रोजेक्ट निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। (India Germany Submarine Deal Project 75I)

भारत और जर्मनी की साझेदारी

इस डील में भारतीय पक्ष की ओर से मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (एमडीएल) को चुना गया है। एमडीएल वही शिपयार्ड है, जिसने पहले कलवरी क्लास (स्कॉर्पीन) सबमरीन्स को भारत में बनाया था। जर्मनी की ओर से इस प्रोजेक्ट में थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (टीकेएमएस) भागीदार है।

टीकेएमएस दुनिया की सबसे अनुभवी सबमरीन डिजाइन कंपनियों में से एक मानी जाती है। भारत के लिए वह अपनी टाइप-214 एनजी सबमरीन का एडवांस्ड और बड़ा वर्जन ऑफर कर रही है, जो करीब 3000 टन क्लास की होगी। (India Germany Submarine Deal Project 75I)

कितनी बड़ी है यह डील

इस डील की अनुमानित कीमत 70 हजार से 72 हजार करोड़ रुपये बताई जा रही है, जबकि कुछ शुरुआती रिपोर्ट्स में इसका आंकड़ा 10 बिलियन डॉलर तक गया था। लागत बढ़ने की वजह इसमें शामिल हाई-एंड टेक्नोलॉजी, लंबी अवधि का सपोर्ट, ट्रेनिंग, लाइफ-साइकल मेंटेनेंस और भारत में पूरा इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम खड़ा करना है।

शुरुआती आरएफपी के समय इस प्रोजेक्ट की लागत करीब 40 हजार करोड़ रुपये मानी जा रही थी, लेकिन समय के साथ इसमें एडवांस्ड फीचर्स जुड़ते गए। (India Germany Submarine Deal Project 75I)

इंटर-गवर्नमेंटल एग्रीमेंट क्यों जरूरी था

यह डील सिर्फ एमडीएल और रक्षा मंत्रालय के बीच नहीं है। इसके पीछे भारत और जर्मनी सरकारों के बीच एक बड़ा आईजीए है। इस एग्रीमेंट के तहत टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, एक्सपोर्ट क्लीयरेंस, लॉन्ग-टर्म सपोर्ट और प्रशासनिक गारंटी दी जाएगी।

यही वजह है कि जर्मनी के रक्षा मंत्री के मार्च 2026 के अंत तक भारत आने और इस डील पर अंतिम हस्ताक्षर होने की संभावना जताई जा रही है। (India Germany Submarine Deal Project 75I)

सबमरीन में खास एआईपी तकनीक

इन नई सबमरीन्स की सबसे बड़ी ताकत होगी एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (एआईपी) सिस्टम। यह सिस्टम सबमरीन को बिना सतह पर आए दो से तीन हफ्ते तक पानी के नीचे रहने की क्षमता देता है।

पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक सबमरीन्स को बार-बार ऊपर आकर बैटरी चार्ज करनी पड़ती है, जिससे उनके पकड़े जाने का खतरा बढ़ जाता है। एआईपी सिस्टम इस कमजोरी को खत्म कर देता है और सबमरीन की स्टेल्थ कई गुना बढ़ जाती है।

जर्मनी का फ्यूल-सेल बेस्ड एआईपी सिस्टम दुनिया के सबसे भरोसेमंद सिस्टम्स में गिना जाता है।

ये सबमरीन्स मल्टी-रोल होंगी। यानी इन्हें दुश्मन के जहाजों पर हमला करने, दूसरी सबमरीन्स का शिकार करने, खुफिया जानकारी जुटाने और जरूरत पड़ने पर लैंड-अटैक मिशन के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकेगा।

इनमें एडवांस्ड टॉरपीडो, एंटी-शिप मिसाइल्स और आधुनिक सेंसर्स लगाए जाएंगे। सबमरीन की आवाज बेहद कम होगी, जिससे दुश्मन के सोनार के लिए इन्हें ट्रैक करना मुश्किल होगा। (India Germany Submarine Deal Project 75I)

भारत में ही बनेगी हर सबमरीन

प्रोजेक्ट 75I की सबसे बड़ी खासियत यह है कि सभी छह सबमरीन्स भारत में ही बनाई जाएंगी। मझगांव डॉक में इनके लिए अलग से इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जाएगा।

इससे हजारों लोगों को रोजगार मिलेगा और देश में सबमरीन निर्माण से जुड़ी सप्लाई चेन मजबूत होगी। छोटे-मझोले उद्योगों को भी इसमें काम मिलेगा। (India Germany Submarine Deal Project 75I)

डिलीवरी टाइमलाइन

डील साइन होने के बाद पहली सबमरीन के नौसेना में शामिल होने में करीब सात साल लगेंगे। यानी अगर मार्च 2026 में समझौता हो जाता है, तो पहली सबमरीन 2032-33 के आसपास सेवा में आएगी।

स्टील कटिंग का काम 2026 के अंत तक शुरू हो सकता है और 2031 तक ट्रायल्स पूरे किए जाएंगे। (India Germany Submarine Deal Project 75I)

भारतीय नौसेना को क्यों है इसकी सख्त जरूरत

भारतीय नौसेना इस समय अंडरवॉटर प्लेटफॉर्म्स की भारी कमी से जूझ रही है। किलो क्लास यानी सिंधु सीरीज की सबमरीन्स अपनी सर्विस साइकिल के अंतिम चरण में हैं और एक-एक कर रिटायर हो रही हैं।

पिछले 20 वर्षों में नौसेना को सिर्फ छह नई सबमरीन्स मिली हैं, जो कलवरी क्लास की हैं। वहीं चीन लगातार बड़ी संख्या में नई सबमरीन्स शामिल कर रहा है और पाकिस्तान भी अपनी अंडरवॉटर क्षमता बढ़ा रहा है। ऐसे में प्रोजेक्ट 75I भारतीय नौसेना के लिए लाइफलाइन साबित हो सकता है।

साथ ही, यह डील भारत और जर्मनी के रिश्तों को नई ऊंचाई देगी। यह दोनों देशों के बीच अब तक का सबसे बड़ा रक्षा सहयोग प्रोजेक्ट होगा। साथ ही, यह इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की बढ़ती नौसैनिक गतिविधियों को संतुलित करने में भारत की मदद करेगा। (India Germany Submarine Deal Project 75I)

स्वदेशी AMCA के लिए हाई थ्रस्ट सुपरक्रूज जेट इंजन बनाने की तैयारियां शुरू, भारतीय पार्टनर संग GTRE बनाएगा 200 इंजन

Indigenous Jet Engine India
India Moves Towards Indigenous High-Thrust Jet Engine, DRDO’s GTRE Seeks Indian Industry Partner

Indigenous Jet Engine India: भारत ने स्वदेशी जेट इंजन बनाने को लेकर तैयारियां शुरू कर दी हैं। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) के तहत काम करने वाली गैस टरबाइन रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट (जीटीआरई), बेंगलुरु ने देश की कंपनियों से एक खास पार्टनर चुनने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। जिसके तहत देश की किसी कंपनी को एडवांस्ड हाई थ्रस्ट क्लास जेट इंजन प्रोग्राम में डेवलपमेंट-कम-प्रोडक्शन पार्टनर बनाया जाएगा। चुनी गई कंपनी इस टर्बोफैन इंजन के निर्माण, टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन की जिम्मेदारी संभालेगी। यह पार्टनर भारत का अपना एडवांस्ड हाई थ्रस्ट क्लास जेट इंजन डेवलप करने और बनाने में अहम भूमिका निभाएगा।

भारत के पास अभी तक अपना स्वदेशी जेट इंजन नहीं है और इसके लिए वह दूसरे देशों पर निर्भर है। पिछले साल 15 अगस्त को लाल किला से 79वें स्वतंत्रता दिवस के भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जेट इंजन को लेकर मेड इन इंडिया पर जोर दिया था। उन्होंने युवा वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, टैलेंटेड यूथ और सरकार के सभी विभागों को सीधा आह्वान किया था कि भारत को अपने स्वदेशी फाइटर जेट्स के लिए अपना खुद का जेट इंजन बनाना चाहिए। उन्होंने इसे एक राष्ट्रीय चुनौती के रूप में पेश करते हुए कहा कि कोविड में वैक्सीन बनाई, यूपीआई बनाया, वैसे ही जेट इंजन भी भारत में बनना चाहिए। वहीं अब जीटीआरई ने इस पहल की शुरुआत कर दी है। (Indigenous Jet Engine India)

Indigenous Jet Engine India: क्यों अहम है यह कदम

जेट इंजन किसी भी फाइटर एयरक्राफ्ट का दिल होता है। अगर इंजन विदेशी हो, तो संकट के समय सप्लाई रुक सकती है, अपग्रेड में दिक्कत आ सकती है और ऑपरेशनल आजादी सीमित हो जाती है। भारत ने यह सब पहले भी देखा है।

कावेरी इंजन प्रोग्राम इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहा है। इस प्रोग्राम से बहुत कुछ सीखा गया, लेकिन वह इंजन पूरी तरह लड़ाकू विमान के लिए तैयार नहीं हो पाया। इसके बाद भारत ने तय किया कि इंजन टेक्नोलॉजी में आधे-अधूरे कदम नहीं, बल्कि पूरी ताकत झोंकनी होगी।

इसी सोच के साथ अब एडवांस्ड हाई थ्रस्ट क्लास इंजन प्रोग्राम शुरू किया गया है, जो भविष्य के पांचवी पीढ़ी के फाइटर जेट्स जैसे एएमसीए (एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) को ताकत देगा। (Indigenous Jet Engine India)

क्या किया है जीटीआरई ने

जीटीआरई ने भारतीय कंपनियों के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी किया है। इसका मतलब है कि सरकार अब निजी और सार्वजनिक भारतीय कंपनियों को इस प्रोजेक्ट में सीधे शामिल करना चाहती है। चुनी जाने वाली कंपनी सिर्फ पार्ट्स बनाने वाली नहीं होगी, बल्कि इंजन के निर्माण, असेंबली, टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन तक की जिम्मेदारी संभालेगी।

सरल शब्दों में कहें, तो लैब में बने डिजाइन को उड़ने लायक इंजन में बदलने की पूरी जिम्मेदारी इसी भारतीय कंपनी के कंधों पर होगी। (Indigenous Jet Engine India)

कैसा होगा यह नया जेट इंजन

जिस इंजन को बनाने की योजना है, वह आज की दुनिया के सबसे एडवांस्ड मिलिटरी इंजनों की कैटेगरी में आएगा। इसमें 10:1 का थ्रस्ट-टू-वेट रेशियो होगा, यानी इंजन हल्का होने के बावजूद बेहद ताकतवर होगा।

इस इंजन की एक खास क्षमता सुपरक्रूज होगी। इसका मतलब है कि फाइटर जेट बिना आफ्टरबर्नर जलाए भी सुपरसोनिक रफ्तार से उड़ सकेगा। इससे ईंधन की बचत होगी और विमान की रेंज और स्टेल्थ दोनों बढ़ेंगी।

इसके अलावा इंजन का इंफ्रारेड सिग्नेचर कम रखा जाएगा, ताकि दुश्मन के सेंसर और मिसाइल इसे आसानी से ट्रैक न कर सकें। इंजन में सिंगल क्रिस्टल ब्लेड्स का इस्तेमाल होगा, जो बहुत ज्यादा तापमान सह सकती हैं और इंजन की उम्र बढ़ाती हैं। (Indigenous Jet Engine India)

क्या है एडवांस्ड हाई थ्रस्ट क्लास इंजन

एएमसीए यानी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट एक ट्विन-इंजन फाइटर जेट है, इसलिए इसकी ताकत को आमतौर पर प्रति इंजन थ्रस्ट के आधार पर समझा जाता है। एएमसीए को दो अलग-अलग चरणों में डेवलप किया जा रहा है और दोनों में इंजन को लेकर रणनीति भी अलग है।

एएमसीए के एमके-1 वर्जन में शुरुआती तौर पर अमेरिकी जीई एफ414 इंजन लगाने की योजना है। यह इंजन आफ्टरबर्नर के साथ लगभग 98 किलो-न्यूटन (kN) तक का अधिकतम थ्रस्ट देता है। चूंकि विमान में दो इंजन होंगे, इसलिए कुल थ्रस्ट करीब 196 kN के आसपास रहेगा। यह कॉन्फिगरेशन शुरुआती ऑपरेशनल जरूरतों को पूरा करने के लिए चुना गया है, ताकि एयरक्राफ्ट की डेवलपमेंट टाइमलाइन प्रभावित न हो।

वहीं एएमसीए एमके-2 के लिए पूरी तरह अलग और ज्यादा महत्वाकांक्षी योजना है। इस वर्जन में स्वदेशी हाई-थ्रस्ट इंजन लगाने का लक्ष्य रखा गया है, जिसे जीटीआरई और साफरान के सहयोग से को-डेवलप किया जाएगा। इस इंजन की प्लान्ड आफ्टरबर्नर थ्रस्ट क्षमता लगभग 120 kN प्रति इंजन होगी, जिसे भविष्य में 140 kN तक स्केल किया जा सकेगा। इस तरह दो इंजनों के साथ कुल थ्रस्ट करीब 240 kN तक पहुंच जाएगा।

इतनी ज्यादा थ्रस्ट क्षमता एएमसीए एमके-2 को सुपरक्रूज, बेहतर एक्सेलेरेशन और हाई मैन्यूवरेबिलिटी जैसी खूबियां देगी। यही वजह है कि इस इंजन को “एडवांस्ड हाई थ्रस्ट क्लास” कैटेगरी में रखा गया है।

जहां तक ड्राई थ्रस्ट की बात है, तो स्वदेशी इंजन से करीब 73 से 75 kN प्रति इंजन ड्राई थ्रस्ट मिलने की उम्मीद की जा रही है। यह आंकड़ा आफ्टरबर्नर के बिना भी तेज रफ्तार और लंबी रेंज ऑपरेशन के लिए अहम माना जाता है।

किस तरह का इंजन बनेगा

यह इंजन एक मॉडर्न टर्बोफैन जेट इंजन होगा। इसमें लो प्रेशर कंप्रेसर, हाई प्रेशर कंप्रेसर, कंबस्टर, हाई प्रेशर टरबाइन, लो प्रेशर टरबाइन, आफ्टरबर्नर और एग्जॉस्ट सिस्टम जैसे सभी एडवांस्ड हिस्से शामिल होंगे।

इसके साथ गियरबॉक्स, फ्यूल सिस्टम, ऑयल सिस्टम और डिजिटल कंट्रोल सिस्टम यानी फाडेक (फुल अथॉरिटी डिजिटल इंजन कंट्रोल) भी पूरी तरह आधुनिक होंगे। (Indigenous Jet Engine India)

कई चरणों में बंटा प्रोजेक्ट

जीटीआरई ने इस पूरे प्रोजेक्ट को कई चरणों में बांटा है। पहले चरण में डिजाइन से जुड़े काम होंगे। इसमें ड्रॉइंग, थ्री-डी मॉडल, डिजाइन में बदलाव और टेस्ट के आधार पर सुधार शामिल होंगे।

दूसरे चरण में मैन्युफैक्चरिंग की तैयारी होगी। यानी किस हिस्से को कैसे बनाया जाएगा, कौन सी मशीन लगेगी, कौन सा मटेरियल इस्तेमाल होगा और क्वालिटी कैसे जांची जाएगी।

तीसरे चरण में असली मैन्युफैक्चरिंग शुरू होगी। इसमें पार्ट्स बनाना, सब-असेंबली तैयार करना और जरूरी टेस्ट करना शामिल होगा।

चौथे और सबसे अहम चरण में इंजन की असेंबली, बैलेंसिंग, इंस्ट्रूमेंटेशन और फाइनल टेस्टिंग होगी। इसके बाद इंजन को सर्टिफिकेशन के लिए तैयार किया जाएगा।

इस प्रोजेक्ट में जीटीआरई डिजाइन अथॉरिटी बना रहेगा। यानी इंजन का टेक्निकल कंट्रोल सरकार के पास रहेगा। वहीं चुनी गई कंपनी इंडस्ट्रियल एग्जिक्यूशन की जिम्मेदारी निभाएगी।

इसमें एयरवर्थिनेस एजेंसियों के साथ कोऑर्डिनेशन, क्वालिटी कंट्रोल, डॉक्यूमेंटेशन और लाइफ-साइकिल सपोर्ट भी शामिल होगा। (Indigenous Jet Engine India)

मजबूत फाइनेंशियल बैकग्राउंड जरूरी

जीटीआरई ने साफ कर दिया है कि यह काम हर किसी के बस का नहीं है। कंपनी के पास मजबूत फाइनेंशियल बैकग्राउंड होना जरूरी है। कम से कम 1500 करोड़ रुपये का टर्नओवर, अच्छी क्रेडिट रेटिंग और मजबूत फाइनेंशियल बैकिग जरूरी रखी गई है।

तकनीकी तौर पर कंपनी को टाइटेनियम, निकेल एलॉय, एडवांस्ड मटेरियल और हाई प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग का अनुभव होना चाहिए। इसके साथ ही एयरोस्पेस क्वालिटी सिस्टम जैसे एएस9100 का पालन जरूरी होगा।

इस प्रोजेक्ट के तहत करीब 10 साल में 18 इंजन तैयार किए जाएंगे। जीटीआरई ने साफ बोल दिया है कि सातवें साल से इंजन की डिलीवरी शुरू होगी, जो 10वें साल तक 18 तक पहुंच जाएगी। शुरुआत में इंजन बनाने की रफ्तार धीमी रहेगी, ताकि क्वालिटी और भरोसे को मजबूत किया जा सके।

सरकार का इरादा सिर्फ प्रोटोटाइप तक सीमित नहीं है। भविष्य में करीब 200 इंजन बनाने का रास्ता भी इसी प्रोजेक्ट से खुलेगा। इसका मतलब है कि भारत में पहली बार एक पूरी मिलिट्री जेट इंजन प्रोडक्शन लाइन खड़ी हो सकती है। (Indigenous Jet Engine India)

क्यों बदल सकता है भारत का भविष्य

अगर यह प्रोजेक्ट अपने लक्ष्य तक पहुंचता है, तो भारत उन गिने-चुने देशों में शामिल हो जाएगा, जो अपने दम पर एडवांस्ड फाइटर जेट इंजन बना सकते हैं। इससे न सिर्फ रक्षा क्षेत्र मजबूत होगा, बल्कि एयरोस्पेस इंडस्ट्री को भी नई ऊंचाई मिलेगी। (Indigenous Jet Engine India)

भारतीय सेना को मिले दो लंबी दूरी के ‘सूर्यास्त्र’ यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर, अब लाइव-फायर ट्रायल की तैयारी

Suryastra rocket launcher
Indian Army Receives Long-Range ‘Suryastra’ Rocket Launchers, Live-Fire Trials Awaited

Suryastra rocket launcher: भारतीय सेना को ‘सूर्यास्त्र’ यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम की दो यूनिट्स मिल गई हैं। अब इन सिस्टम्स के लाइव-फायर ट्रायल्स की तैयारी चल रही है, जो आने वाले महीनों में किए जाएंगे। अगर ये फायरिंग टेस्ट सफल रहते हैं, तो सेना स्तर पर बड़े ऑर्डर यानी रेजिमेंटल लेवल इंडक्शन का रास्ता साफ हो सकता है।

सूर्यास्त्र सिस्टम को इसी सप्ताह हुई गणतंत्र दिवस परेड और 15 जनवरी को जयपुर में हुई आर्मी डे परेड में पहली बार सार्वजनिक तौर पर दिखाया गया था। कार्तव्य पथ पर इसकी मौजूदगी ने साफ संकेत दिया कि भारतीय सेना अब लंबी दूरी की, सटीक और तेजी से वार करने वाली रॉकेट आर्टिलरी को प्राथमिकता दे रही है। (Suryastra rocket launcher)

Suryastra rocket launcher: ऑपरेशन सिंदूर के बाद सामने आई जरूरत

सूर्यास्त्र की जरूरत ऑपरेशन सिंदूर के बाद और ज्यादा साफ हुई। इस ऑपरेशन के दौरान सेना ने महसूस किया कि दुश्मन के इलाके के अंदर तक सटीक हमला करने के लिए डीप-स्ट्राइक रॉकेट कैपेबिलिटी बेहद जरूरी है। खासतौर पर तब, जब पड़ोसी देशों के पास लंबी दूरी के गाइडेड रॉकेट और मिसाइल सिस्टम मौजूद हैं।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक, इसी अनुभव के आधार पर भारतीय सेना ने सूर्यास्त्र जैसे सिस्टम को इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट रूट के जरिए हासिल करने का फैसला लिया, ताकि लंबी खरीद प्रक्रिया में समय न जाए और तुरंत ऑपरेशनल क्षमता बढ़ाई जा सके। (Suryastra rocket launcher)

इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट के तहत हुई डील

भारतीय सेना ने यह सौदा इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट (ईपी) नियमों के तहत किया है। इस रूट के जरिए सेना 300 करोड़ रुपये तक के हथियार और सिस्टम तुरंत खरीद सकती है, बशर्ते उनकी परफॉर्मेंस पहले से जानी-पहचानी हो।

इस मामले में सूर्यास्त्र के लिए करीब 292 करोड़ रुपये का शुरुआती कॉन्ट्रैक्ट किया गया है। इस डील में दो लॉन्चर, स्पेयर पार्ट्स, जरूरी म्यूनिशन और पूरा सपोर्ट पैकेज शामिल है। सेना को दो लॉन्चर के साथ एक रिप्लेनिशमेंट-कम-लोडर व्हीकल भी मिला है, जो फील्ड में रॉकेट्स को तेजी से लोड करने में मदद करता है। (Suryastra rocket launcher)

कौन बना रहा है सूर्यास्त्र

सूर्यास्त्र को भारत में निबे लिमिटेड (NIBE Limited) बना रही है, जो एक प्राइवेट डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग कंपनी है। इसमें तकनीकी सहयोग इजरायल की मशहूर डिफेंस कंपनी एल्बिट सिस्टम्स का है।

एल्बिट सिस्टम्स के मुताबिक, यह प्रोजेक्ट एक तरह से लीड प्रोग्राम है। यानी पहले छोटे पैमाने पर सिस्टम दिया गया है और लाइव-फायर डेमॉन्स्ट्रेशन के बाद इसे बड़े स्तर पर बढ़ाया जा सकता है। एल्बिट इस सिस्टम में फायर कंट्रोल, एडवांस म्यूनिशन और सिस्टम इंटीग्रेशन का काम संभाल रही है, जबकि लॉन्चर का निर्माण भारत में किया जा रहा है। (Suryastra rocket launcher)

सूर्यास्त्र क्या है और क्यों है खास

सूर्यास्त्र असल में एक यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम है, जो इजरायल के पीयूएलएस (PULS – प्रिसाइज एंड यूनिवर्सल लॉन्चिंग सिस्टम) पर आधारित है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि एक ही प्लेटफॉर्म से अलग-अलग रेंज और अलग-अलग कैलिबर के रॉकेट और मिसाइल फायर किए जा सकते हैं।

इस सिस्टम को ट्रक पर लगाया गया है, जिससे इसकी मोबिलिटी बहुत ज्यादा है। फायर करने के बाद यह तुरंत अपनी जगह बदल सकता है। इसे ही “शूट-एंड-स्कूट” क्षमता कहा जाता है, जो दुश्मन के काउंटर-फायर से बचने में बेहद अहम होती है। (Suryastra rocket launcher)

150 से 300 किलोमीटर तक मार

सूर्यास्त्र की मारक क्षमता इसे बेहद खतरनाक बनाती है। एक लॉन्चर में दो तरह के म्यूनिशन लगाए जा सकते हैं।
पहला है 306 मिलीमीटर ‘एक्स्ट्रा’ प्रिसिजन-गाइडेड रॉकेट, जिसकी रेंज करीब 150 किलोमीटर है और इसमें लगभग 120 किलो का वारहेड होता है। दूसरा है 370 मिलीमीटर ‘प्रेडेटर हॉक’ टैक्टिकल मिसाइल, जो 300 किलोमीटर तक के टारगेट को मार सकती है और इसमें करीब 140 किलो का वारहेड लगा होता है।

इन दोनों म्यूनिशन की सटीकता बहुत ज्यादा है। इनका सीईपी (सर्कुलर एरर प्रोबेबलिटी) करीब 10 मीटर बताया जाता है, यानी टारगेट से बहुत कम दूरी पर वार कर सकती है।

सूर्यास्त्र की एक और बड़ी ताकत डिजिटल फायर ऑर्डर के साथ काम करने की क्षमता है। टारगेट की जानकारी मिलते ही सिस्टम बहुत कम समय में फायर कर सकता है। इससे दुश्मन को प्रतिक्रिया देने का मौका कम मिलता है।

सूत्र बताते हैं कि यह सिस्टम खासतौर पर कमांड सेंटर्स, एयरफील्ड्स, एयर डिफेंस साइट्स और आर्टिलरी पोजिशन जैसे हाई-वैल्यू टारगेट्स के लिए बनाया गया है।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने फतह-2 गाइडेड रॉकेट दागने की कोशिश की थी, जिसे भारतीय सेना ने सिरसा के पास इंटरसेप्ट कर लिया था। पाकिस्तान दावा करता है कि इस रॉकेट की रेंज 400 किलोमीटर तक है।

वहीं चीन और पाकिस्तान दोनों के पास अलग-अलग रॉकेट और मिसाइल फोर्स हैं। इसी को देखते हुए सेना प्रमुख पहले ही कह चुके हैं कि भारत भी एक मजबूत रॉकेट-कम-मिसाइल फोर्स तैयार कर रहा है, जो बैलिस्टिक मिसाइल, क्रूज मिसाइल और मल्टी-बैरेल रॉकेट लॉन्चर को एक साथ मैनेज कर सके।

सूर्यास्त्र उसी दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। (Suryastra rocket launcher)

पिनाका और ब्रह्मोस के साथ तालमेल

भारतीय सेना के पास पहले से पिनाका जैसे मल्टी-बैरेल रॉकेट लॉन्चर हैं, जिनकी रेंज 70 से 120 किलोमीटर तक है। वहीं ब्रह्मोस जैसी सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की रेंज अलग भूमिका निभाती है। सूर्यास्त्र इन दोनों के बीच का गैप भरता है। यह पिनाका से ज्यादा दूर मार कर सकता है और ब्रह्मोस की तुलना में कम खर्चीला है।

अब सबकी नजरें आने वाले लाइव-फायर ट्रायल्स पर टिकी हैं। अगर ये टेस्ट सफल रहते हैं, तो भारतीय सेना सूर्यास्त्र को बड़े पैमाने पर शामिल कर सकती है। इससे न सिर्फ सेना की डीप-स्ट्राइक क्षमता बढ़ेगी, बल्कि मेक इन इंडिया के तहत भारत में रॉकेट आर्टिलरी के उत्पादन को भी बड़ा बढ़ावा मिलेगा। (Suryastra rocket launcher)