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Jashimuddin Rahmani: दिसंबर में गुपचुप भारत आया था बांग्लादेश का यह खुंखार आतंकवादी, बड़ी साजिश का हुआ पर्दाफाश

Jashimuddin Rahmani: Bangladeshi Terrorist's Secret India Visit Unveiled
Jashimuddin Rahmani

Jashimuddin Rahmani: बांग्लादेश का कुख्यात आतंकी जशीमुद्दीन रहमानी को लेकर बड़ खुलाासा हुआ है। खुफिया एजेंसियों के मुताबिक रहमानी ने पिछले दिनों भारत का गुपचुप दौरा किया था। अल-कायदा से जुड़े आतंकवादी संगठन अंसारुल्लाह बांग्ला टीम (एबीटी) का प्रमुख जशीमुद्दीन रहमानी ने पश्चिम बंगाल का दौरा किया था।

Jashimuddin Rahmani: Bangladeshi Terrorist's Secret India Visit Unveiled
Jashimuddin Rahmani

इस दौरान उसने भारत में मौजूद अंसारुल्लाह बांग्ला टीम (एबीटी) से जुड़े स्लीपर सेल के सदस्यों से मुलाकात की। सूत्रों का कहना है कि रहमानी भारत में किसी बड़ी साजिश को अंजाम देने की तैयारी कर रहा है। बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद, अंतरिम सरकार ने रहमानी को जेल से रिहा कर दिया था। रहमानी को 2013 में एक ब्लॉगर की हत्या के लिए गिरफ्तार किया गया था।

Jashimuddin Rahmani: कैसे की भारत में एंट्री?

खुफिया सूत्रों ने बताया कि आतंकी जशीमुद्दीन रहमानी के अल-कायदा से गहरे संबंध हैं। उसका संगठन अंसारुल्लाह बांग्ला टीम (एबीटी) अलकायदा के ईशारों पर काम करता है। बांग्लादेशी इस्लामी कट्टरपंथी जशीमुद्दीन रहमानी साल 2024 में दिसंबर के आखिरी सप्ताह में पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद आया था। वह मुर्शिदाबाद में लगभग साढ़े पांच घंटे भारत में रहा। इस दौरान उसने एबीटी स्लीपर सेल के सदस्यों के साथ मुलाकात की और एक गुप्त जगह पर दो घंटे की बैठक के बाद वह वापस लौट गया। सूत्रों ने बताया कि रहमानी ने भारत में प्रवेश कास्बा बॉर्डर के जरिए किया। उसे एबीटी के जिहादियों ने रिसीव किया और एक अज्ञात स्थान पर ले गए, जहां बैठक आयोजित की गई।

एबीटी और अल-कायदा: भारत के लिए बढ़ता खतरा

अंसारुल्लाह बांग्ला टीम (एबीटी) भारत में सुरक्षा के लिए लगातार खतरा बनता जा रहा है। अल-कायदा के भारतीय उपमहाद्वीप शाखा (AQIS) से जुड़े इस प्रतिबंधित संगठन ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी गतिविधियों से भारत और बांग्लादेश के खुफिया एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। मई 2024 की एक सुबह, असम में सुरक्षा बलों ने एक बड़े आतंकी साजिश को विफल कर दिया। जांच से पता चला कि इस साजिश के पीछे एबीटी का हाथ था। एबीटी ने असम और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में स्लीपर सेल का नेटवर्क तैयार कर रखा है। इस नेटवर्क का उद्देश्य स्थानीय युवाओं को कट्टरपंथी बनाना और आतंकी गतिविधियों के लिए उन्हें तैयार करना है।

खुफिया रिपोर्ट्स के मुताबिक एबीटी ने पाकिस्तान के आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के साथ हाथ मिलाया है। दोनों भारत में बड़े पैमाने पर हमले की योजना बना रहे हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, दोनों संगठनों ने ट्रेनिंग और हथियार भी जुटा लिए हैं। बांग्लादेश में, एबीटी लंबे समय से सक्रिय है। इसे 2016 में शेख हसीना सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया था। लेकिन हसीना सरकार गिरने के बाद से ही इस संगठन ने फिर से अपनी गतिविधियां तेज कर दी हैं। बांग्लादेश से सटे भारतीय क्षेत्रों में इसका प्रभाव बढ़ता जा रहा है।

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Jashimuddin Rahmani: बांग्लादेश का करना चाहते हैं तालिबानीकरण

सुरक्षा विशेषज्ञ शफी मोहम्मद मोस्तोफा और नताली जे. डॉयल की रिसर्च के मुताबिक, अंसारुल्लाह बांग्ला टीम (ABT) की उत्पत्ति अल-कायदा इन द इंडियन सबकॉन्टिनेंट (AQIS) के सहयोगी संगठन के रूप में हुई थी। इसके 3,000 बांग्लादेशी लड़ाकों ने अफगानिस्तान में अमेरिका और नाटो बलों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। ये लोग कट्टरपंथी विचारधारा के साथ बांग्लादेश लौटे। उनका उद्देश्य था बांग्लादेश को तालिबानीकृत अफगानिस्तान में बदलना। इसी उद्देश्य के तहत, 1992 में हरकत-उल-जिहाद अल-इस्लामी बांग्लादेश (HuJIB) और 1998 में जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (JMB) और जाग्रत मुस्लिम जनता बांग्लादेश (JMJB) का गठन किया गया।

2005 में, जेएमबी ने एक साथ बांग्लादेश के 64 में से 63 जिलों में 459 बम विस्फोट किए। इन हमलों ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। इसके बाद तत्कालीन सरकार ने जेएमबी और इसके वरिष्ठ नेताओं पर प्रतिबंध लगा दिया सरकार की सख्ती और हुजीब व जेएमबी के कमजोर होने के चलते अल-कायदा ने अपने आंदोलन को नया मोर्चा दिया। उसने बांग्लादेश में अंसारुल्लाह बांग्ला टीम (ABT) और अंसार अल-इस्लाम (AAI) जैसे संगठनों के जरिए अपनी गतिविधियां जारी रखीं।

ABT के शुरुआती सदस्य अल-कायदा के कट्टरपंथी प्रीचर अनवर अल-अवलाकी से प्रेरित थे। अवलाकी, जिसे 2011 में यमन में मार गिराया गया था, इस्लामिक आतंकवाद के प्रचार-प्रसार में अहम भूमिका निभा रहा था।

बांग्लादेश में मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने इस्लामी संगठन अंसारुल्लाह बांग्ला टीम (एबीटी) के प्रमुख जशीमुद्दीन रहमानी को इसी साल अगस्त में रिहा किया था। रहमानी को एक ब्लॉगर राजीब हैदर की हत्या में मदद करने और आतंकी संगठन अल-कायदा व उसके सहयोगी अल-कायदा इन द इंडियन सबकॉन्टिनेंट (AQIS) का सक्रिय समर्थक होने का दोषी ठहराया गया था। रहमानी अगस्त 2013 से गाजीपुर स्थित काशिमपुर हाई-सिक्योरिटी सेंट्रल जेल में बंद था। रहमानी को 2013 से 2016 के बीच सेक्युलर ब्लॉगरों और पत्रकारों की टारगेट किलिंग में शामिल पाया गया था। इन हत्याओं की जिम्मेदारी उनके संगठन एबीटी ने ली थी।

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एबीटी के आठ आतंकी तीन राज्यों से हुए थे गिरफ्तार

हाल ही में असम पुलिस के स्पेशल टास्क फोर्स (STF) ने 17 और 18 दिसंबर को एक ऑपरेशन के दौरान तीन राज्यों से अंसारुल्लाह बांग्ला टीम (ABT) के आठ सदस्यों को गिरफ्तार किया था। इनमें से एक बांग्लादेशी आतंकी मोहम्मद शाद रादी उर्फ मोहम्मद शाब शेख को केरल से गिरफ्तार किया गया था। वह देशभर में स्लीपर सेल बनाने के लिए नवंबर में भारत आया था। इस ऑपरेशन के तहत दो आतंकियों, मिनारूल शेख और मोहम्मद अब्बास अली, को पश्चिम बंगाल से गिरफ्तार किया गया। वहीं, पांच अन्य नूर इस्लाम मंडल, अब्दुल करीम मंडल, मोजीबर रहमान, हमीदुल इस्लाम और एनामुल हक को असम से पकड़ा गया। सूत्रों ने यब भी बताया कि नवंबर के दूसरे सप्ताह में जसीमुद्दीन शाद रदी के भाई सजीबुल के घर में ठहरा था। वहीं सजीबुल, मुस्तकीम से पूछताछ में सनसनीखेज जानकारी सामने आई है। जसीमुद्दीन ने नउदा क्षेत्र में अपना ठिकाना बनाया था।

कर चुका है पश्चिम बंगाल को आजाद करने की मांग

हाल ही में जशीमुद्दीन रहमानी का एक वीडियो भी वायरल हुआ था, जिसमें उसने भारत की अखंडता को चुनौती दी। इस वीडियो में रहमानी ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मोदी सरकार से बंगाल को आज़ाद कर, इसे स्वतंत्र घोषित करने की मांग की थी। रहमानी ने अपने विवादित बयान में भारत को “खंडित” करने और दिल्ली में “इस्लामी झंडा फहराने” की धमकी दी थी। यह वीडियो पिछले साल सितंबर के पहले सप्ताह में एक अस्पताल के वार्ड में शूट किया गया था, जिसमें रहमानी ने शेख हसीना के गिरने के एक महीने का जिक्र करते हुए “क्रांति” का संदर्भ अगस्त 5 को समाप्त हुए उन विरोध प्रदर्शनों से किया था, जिसके बाद शेख हसीना देश छोड़कर भाग गई थीं।

चीन के साथ “चिकन नेक” काटने की धमकी

रहमानी ने पश्चिम बंगाल को भारत से अलग करने और भारत के खिलाफ विभिन्न अलगाववादी आंदोलनों को समर्थन देने की बात कही थी। उसने कहा, “हम ममता बनर्जी से कहेंगे कि बंगाल को मोदी के शासन से आज़ाद करें और इसे स्वतंत्र घोषित करें।” चेतावनी देते हुए उसने कहा कि अगर भारत ने बांग्लादेश के प्रति आक्रामक रुख अपनाया, तो इसके गंभीर परिणाम होंगे। “बांग्लादेश, सिक्किम या भूटान की तरह नहीं है। यह 18 करोड़ मुसलमानों का देश है।

उसने आगे धमकी दी कि अगर भारत ने कोई कदम उठाया, तो वह चीन की मदद से सिलिगुड़ी कॉरिडोर, जिसे “चिकन नेक” कहा जाता है, को काट देंगे। उन्होंने पूर्वोत्तर के राज्यों को भारत से अलग होने और “स्वतंत्रता आंदोलन” में शामिल होने के लिए कहा। रहमानी ने कश्मीर को स्वतंत्रता के लिए तैयार होने का संदेश दिया था और पाकिस्तान व अफगानिस्तान से मदद से कश्मीर को आज़ाद करने की बात कही। उसने खालिस्तान आंदोलन का भी समर्थन करते हुए पंजाब में अलगाववाद को प्रोत्साहित करने की बात कही थी।

इससे पहले रक्षा समाचार ने खुलासा किया था कि पाकिस्तान ने एक मालवाहक जहाज से 70 से ज्यादा प्रशिक्षित आतंकियों को बांग्लादेश भेजा था और ये सभी आतंकी कुछ देर बाद ही रहस्यमय तरीके से गायब हो गए। खुफिया सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तान, रोहिंग्या शरणार्थियों का इस्तेमाल कर बांग्लादेश में जमात-उल-मुजाहिदीन (JMB) को सक्रिय करने की कोशिशों में भी जुटा है। खुफिया सूत्रों ने बताया कि 13 नवंबर को कराची से आए एक कार्गो जहाज से 70 “अज्ञात पाकिस्तानी नागरिक” चटगांव बंदरगाह उतारे गए। ये सभी व्यक्ति कुछ ही घंटों में बिना किसी दस्तावेज़ और ट्रेस के गायब हो गए। सूत्र बताते हैं कि पाकिस्तान अब रोहिंग्या मुसलमानों का इस्तेमाल करके जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (JMB) को सक्रिय करने की योजना बना रहा है। खासकर उत्तर बांग्लादेश में बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी (BJI) के माध्यम से इस साजिश को अंजाम देने की तैयारी है।

बांग्लादेश से 70 पाकिस्तानी आतंकवादी हुए लापता!

इससे पहले रक्षा समाचार ने खुलासा किया था कि पाकिस्तान ने एक कार्गो जहाज के जरिए 70 से अधिक प्रशिक्षित आतंकवादियों को बांग्लादेश भेजा, जो कुछ ही समय बाद रहस्यमय तरीके से गायब हो गए। खुफिया सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान अब रोहिंग्या शरणार्थियों का उपयोग कर बांग्लादेश में जमात-उल-मुजाहिदीन (JMB) को सक्रिय करने की कोशिश कर रहा है।

खुफिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 13 नवंबर को कराची से आए एक मालवाहक जहाज से चटगांव बंदरगाह पर 70 “अज्ञात पाकिस्तानी नागरिक” उतारे गए। लेकिन कुछ ही घंटों के भीतर, ये सभी लोग बिना किसी आधिकारिक दस्तावेज या ट्रेस के गायब हो गए। सूत्रों ने बताया कि पाकिस्तान अब रोहिंग्या मुस्लिम समुदाय का इस्तेमाल करते हुए जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (JMB) को पुनः सक्रिय करने की योजना बना रहा है। यह साजिश खासकर उत्तर बांग्लादेश में, बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी (BJI) के माध्यम से अंजाम देने की तैयारी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की इस रणनीति का उद्देश्य बांग्लादेश में अस्थिरता फैलाना और भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में असुरक्षा की स्थिति पैदा करना है। बांग्लादेश की सुरक्षा एजेंसियां और अंतरराष्ट्रीय खुफिया नेटवर्क इस मामले की गहन जांच कर रहे हैं।

Explainer Army Day: जानें इस साल 15 जनवरी को किस शहर में मनाया जाएगा आर्मी डे, क्या है सेना दिवस मनाने की परंपरा?

Explainer Army Day: Pune Gears Up for Historic January 15 Parade

Explainer Army Day: 15 जनवरी 2025 को भारतीय सेना दिवस का आयोजन पुणे में किया जाएगा। यह पहला मौका है जब पुणे इस प्रतिष्ठित कार्यक्रम की मेजबानी करेगा।  इससे पहले सेना दिवस दिल्ली में आयोजित होता था, लेकिन 2023 से इसे अन्य शहरों में मनाने की परंपरा शुरू की गई। 2023 में बेंगलुरु और 2024 में लखनऊ के बाद पुणे तीसरा शहर है जो इस ऐतिहासिक आयोजन का साक्षी बनेगा। 15 जनवरी को पुणे के बॉम्बे इंजीनियरिंग ग्रुप (BEG) एंड सेंटर में सेना दिवस का आयोजन किया जाएगा।

Explainer Army Day: Pune Gears Up for Historic January 15 Parade

Explainer Army Day: क्यों चुना गया पुणे?

भारत के रक्षा इतिहास में पुणे का विशेष स्थान है। इसे न केवल “पूर्व का ऑक्सफोर्ड” कहा जाता है, बल्कि यहां राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) और दक्षिणी कमान मुख्यालय भी है। पुणे न केवल सैन्य नेतृत्व के प्रशिक्षण का केंद्र है, बल्कि डिफेंस स्ट्रेटेजी को लेकर यहां कई इनोवेशंस भी हुए हैं। वहीं पुणे इस एतिहासिक समारोह के आयोजन का उद्देश्य सेना को जनता के करीब लाना और उन लोगों को सम्मानित करना है जिन्होंने देश की सेना में योगदान दिया है। पुणे को चुनना सेना की ऐतिहासिक जड़ों को वर्तमान समय के साथ जोड़ने की पहल है।

Explainer Army Day: इस बार सेना दिवस पर क्या होगा खास?

पुणे में पहली बार सेना दिवस 2025 का आयोजन किया जाएगा, जिसमें कई नई और अनूठी पहलें देखने को मिलेंगी। इस बार कार्यक्रम तीन प्रमुख विषयों पर केंद्रित होगा: आधुनिकीकरण, समावेशिता और जनभागीदारी। पुणे के सदर्न कमांड परेड ग्राउंड में सेना के अत्याधुनिक हथियारों और टेक्नोलाजी के क्षेत्र में किए गए नए अविष्कारों को दिखाया जाएगा।

इसमें पिनाका मल्टीपल लॉन्चर रॉकेट सिस्टम, अर्जुन Mk-1A टैंक, K9 वज्र होवित्जर और मेक इन इंडिया के तहत विकसित ड्रोन सिस्टम भी शामिल होंगे। बता दें कि यह भारतीय सेना के मॉर्डेनाइजेशन के 2025 रोडमैप का हिस्सा है, जिसमें आधुनिक तकनीकों को अपनाने और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने पर जोर दिया जाएगा।

Explainer Army Day: Pune Gears Up for Historic January 15 Parade
Robotic Mule

इसके अलावा इस परेड में सबसे खास हैं आठ क्वाड्रुपेडल अनमैन्ड ग्राउंड व्हीकल्स (Q-UGV) , जिन्हें ‘रोबोटिक म्यूल’ भी कहा जाता है। इन रोबोटिक म्यूल्स को नई दिल्ली स्थित एरोआर्क प्राइवेट लिमिटेड ने विकसित किया है। ये उपकरण टेली-ऑपरेबल और ऑटोनॉमस दोनों ही तरीकों से चलाए जा सकते हैं। खास बात यह है कि ये कठिन इलाकों और विभिन्न मौसम परिस्थितियों में भी काम करने में सक्षम हैं। पहले सेना के अभियानों में पारंपरिक म्यूल (खच्चर) अपनी मज़बूत कद-काठी और दुर्गम इलाकों में पहुंचने की क्षमता के चलते अहम भूमिका निभाते थे, लेकिन भविष्य की युद्ध रणनीति में ये रोबोटिक म्यूल बड़ी भूमिका अदा कर सकते हैं।

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वहीं इस बार सेना दिवस पर महिलाओं की भागीदारी इस आयोजन का एक प्रमुख आकर्षण होगी। सेना महिलाओं की भूमिका को बढ़ाने और उन्हें नेतृत्वकारी भूमिकाओं में शामिल करने के लगातार कोशिश कर रही है। इस पहल के तहत महिला अधिकारियों और सैनिकों की उपलब्धियों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा, जिससे यह संदेश दिया जा सके कि भारतीय सेना सभी को बराबर की निगाह से देखती है।

Explainer Army Day: Pune Gears Up for Historic January 15 Parade
Explainer Army Day: Pune Gears Up for Historic January 15 Parade

आम जनता के लिए इस आयोजन को और भी खास बनाने के लिए पैराशूट जंपिंग, युद्धाभ्यास के लाइव प्रदर्शन और सेना बैंड द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इन प्रदर्शनों का उद्देश्य युवाओं को सेना में करियर बनाने के लिए प्रेरित करना और जनता में सेना के प्रति गर्व की भावना को बढ़ाना है।

पुणे का चयन इस आयोजन के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है, क्योंकि यह शहर भारतीय सेना की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। नेशनल डिफेंस एकेडमी (NDA) और सदर्न कमांड हेडक्वार्टर्स जैसी संस्थाओं के साथ पुणे मिलिट्री ट्रेनिंग और स्ट्रेटेजी का एक बड़ा केंद्र है। इस आयोजन के माध्यम से सेना ने जनता के साथ अपने जुड़ाव को और मजबूत करने का प्रयास किया है।

Explainer Army Day: क्यों मनाया जाता है सेना दिवस?

सेना दिवस हर साल 15 जनवरी को मनाया जाता है, यह उस दिन की याद दिलाता है जब 1949 में फील्ड मार्शल केएम करियप्पा ने जनरल फ्रांसिस बुचर से भारतीय सेना के पहले भारतीय कमांडर-इन-चीफ के रूप में पदभार संभाला था। यह दिन सैनिकों की वीरता और बलिदान को सम्मानित करने के साथ-साथ सेना की राष्ट्रीय सुरक्षा में योगदान को बताता है। इन दिन सेना की वारता औऱ बलिदान को याद किया जाता है। वहीं, इस साल के कार्यक्रम में न केवल भारतीय सेना की ताकत और उपलब्धियों को दिखाया जाएगा, बल्कि इसे जनता के साथ जोड़ने के नए प्रयास भी किए जाएंगे।

ब्रिटिश शासन के दौरान, भारतीय सेना का नेतृत्व ब्रिटिश अधिकारियों के हाथ में रहता था। लेकिन आज़ादी के बाद, करियप्पा के नेतृत्व में सेना ने न सिर्फ अपनी स्वायत्तता हासिल की, बल्कि आधुनिक भारत की सुरक्षा और संरक्षा की नींव भी मजबूत की। 15 जनवरी का दिन इसी महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतीक है।

शुरुआत में यह समारोह मुख्य रूप से दिल्ली में होता था, जहां करियप्पा परेड ग्राउंड (दिल्ली कैंट) में परेड और अन्य कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे। बाद में, सेना दिवस की शोभा को देश के अन्य हिस्सों तक ले जाने के लिए इसे अलग-अलग शहरों में मनाया जाने लगा, ताकि देश की बाकी आम जनता भी सेना की बहादुरी और बलिदान के बारे में जान सके।

सेना दिवस पहली बार साल 2023 में दिल्ली से बाहर आयोजित किया गया। उस वर्ष बेंगलुरु को चुना गया, जहां सेना दिवस का आयोजन बड़े ही भव्य पैमाने पर किया गया। बेंगलुरु के मिलिट्री इंस्टिट्यूशन्स और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) जैसी संस्थाओं ने इस आयोजन को और खास बना दिया।

इसके बाद 2024 में लखनऊ को सेना दिवस की मेजबानी करने का अवसर मिला। उत्तर प्रदेश में पूर्व सैनिकों की एक बड़ी आबादी रहती है। लखनऊ में सेना दिवस मनाने से इन पूर्व सैनिकों को भी सम्मान का अवसर मिला।

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K9 Vajra

क्या है भारतीय सेना का 2025 का रोडमैप

भारतीय सेना ने 2025 के लिए आधुनिकरण और रणनीतिक तैयारियों पर आधारित एक व्यापक रोडमैप तैयार किया है। यह रोडमैप सेना की युद्धक क्षमता को बढ़ाने और भविष्य की चुनौतियों से निपटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स और साइबर क्षमताओं को अपनाने पर जोर दिया गया है। इन तकनीकों का इस्तेमाल भविष्य की जटिल युद्ध स्थितियों में तेजी से निर्णय लेने और संचालन की क्षमता को बढ़ाने के लिए किया जाएगा।

लद्दाख और पूर्वोत्तर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। इन इलाकों में एडवांस सर्विलांस सिस्टम और बेहतर कनेक्टिविटी के जरिए तैनात सैनिकों की क्षमता को बढ़ाने की योजना है।

पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की दिशा में नई योजनाएं बनाई गई हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य सैनिकों और उनके परिवारों का जीवन स्तर बेहतर बनाना है।

‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत, सेना ने भारतीय स्टार्टअप्स और उद्योगों के साथ मिलकर स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। यह कदम आत्मनिर्भरता को मजबूत करेगा और रक्षा उपकरणों के आयात पर निर्भरता को कम करेगा।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सेना ने सहयोग को बढ़ाने के लिए संयुक्त अभ्यास और ज्ञान-साझा करने के कार्यक्रमों का आयोजन करने की योजना बनाई है। इसका उद्देश्य वैश्विक सैन्य रणनीतियों को समझना और अपनी क्षमताओं को बेहतर करना है।

भारतीय सेना का यह रोडमैप बदलते समय और मॉर्डन वारफेयर की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इससे न केवल सेना की युद्धक क्षमता में वृद्धि होगी बल्कि सैनिकों और उनके परिवारों के कल्याण को भी प्राथमिकता मिलेगी।

Nimisha Priya Update: निमिषा मामले में आया नया मोड़, इस देश ने बढ़ाया मदद का हाथ, कहा- फांसी की सजा टालने के लिए हूथियों से करेंगे बात

Nimisha Priya Case: Iran Offers Help, Promises Talks with Houthis for Clemency

Nimisha Priya Update: यमन में हत्या के आरोप में मौत की सजा का सामना कर रही भारतीय नर्स निमिषा प्रिया में नया मोड़ आया है। अब इस मामले में ईरान ने मदद का भरोसा दिया है। ईरान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “हम इस नर्स के मामले को उठाएंगे और जो कुछ भी कर सकते हैं, करेंगे।” वहीं ईरान के इस बयान से निमिषा प्रिया के परिवार और उसकी फांसी की सजा टालने के लिए लड़ाई लड़ रहे लोगों में उम्मीद की नई किरण जगी है।

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Nimisha Priya Update: ईरान का सहयोग क्यों है महत्वपूर्ण?

यमन में ईरान का प्रभाव और हूथी विद्रोहियों के साथ उसके करीबी संबंधों को देखते हुए, ईरान का समर्थन इस मामले में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। ईरानी अधिकारी ने स्पष्ट किया है कि वह इस मामले में माफी पाने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे।

भारत सरकार की कोशिशें

भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा है कि सरकार इस मामले में सभी विकल्पों पर विचार कर रही है। विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने बयान में कहा, “हम निमिषा प्रिया की सजा से अवगत हैं। परिवार इस मामले में जरूरी विकल्प तलाश रहा है, और सरकार हर संभव मदद कर रही है।” विदेश मंत्रालय (MEA) के आधिकारिक प्रवक्ता रंधीर जायसवाल ने कहा, “हम यमन में निमिषा प्रिया को दी गई सजा से अवगत हैं। हमें जानकारी है कि प्रिया का परिवार इस मामले में प्रासंगिक विकल्पों की तलाश कर रहा है।

Explainer Nimisha Priya: कौन हैं निमिषा प्रिया और क्यों हो रही है उनकी फांसी की सजा पर चर्चा? क्या ब्लड मनी से बचेगी उनकी जान?

क्या है Nimisha Priya का मामला?

केरल की रहने वाली निमिषा प्रिया को 2017 में यमनी नागरिक तलाल अब्दो महदी की हत्या के आरोप में मौत की सजा सुनाई गई थी। यह मामला यमन के उन इलाकों में चल रहा है, जो हूथी विद्रोहियों के नियंत्रण में हैं। हूथी नेतृत्व ने हाल ही में उनकी सजा की पुष्टि कर दी है।

निमिषा प्रिया 2008 में यमन गई थीं और एक नर्स के रूप में काम कर रही थीं। वहां उन्होंने महदी के साथ साझेदारी में एक क्लिनिक खोला। लेकिन जल्द ही उनके रिश्ते खराब हो गए। महदी ने निमिषा के साथ कथित तौर पर दुर्व्यवहार किया, उनका पासपोर्ट जब्त कर लिया और उन्हें प्रताड़ित किया।

ब्लड मनी: माफी का रास्ता

2020 में सना की अदालत ने निमिषा प्रिया को फांसी की सजा सुनाई थी। हालांकि, उनके परिवार और वकीलों ने इस सजा के खिलाफ अपील की, लेकिन नवंबर 2023 में यमन की सुप्रीम ज्यूडिशियल काउंसिल ने उनकी अपील खारिज कर दी। इसके बावजूद, यमन के शरिया कानून के तहत “ब्लड मनी” (खून बहाने का मुआवजा) के जरिए माफी की संभावना अब भी बनी हुई है।

यमन में ब्लड मनी, जिसे अरबी में “दीया” कहा जाता है, एक पुरानी परंपरा है। इसके तहत आरोपी मृतक के परिवार को आर्थिक मुआवजा देकर अपनी सजा से राहत पा सकता है। इसी विकल्प के तहत निमिषा प्रिया का परिवार और उनके समर्थक अब महदी के परिवार को मनाने की कोशिश कर रहे हैं।

मामले से जुड़े एक वकील ने बताया कि यदि महदी का परिवार ब्लड मनी स्वीकार कर लेता है, तो निमिषा की फांसी टल सकती है। हालांकि, इस प्रक्रिया में कई चुनौतियां हैं, जिनमें समय और धन जुटाना सबसे बड़ी बाधा है।

निमिषा के परिवार ने ब्लड मनी के रूप में 70 लाख रुपये की धनराशि जुटाने की पहल शुरू की है। यह प्रयास न केवल समय के खिलाफ है, बल्कि यह दर्शाता है कि मानवता और न्याय की उम्मीदें अभी भी जिंदा हैं।

समर्थन जुटाने की पहल

निमिषा प्रिया के समर्थन में भारत और विदेश में कई लोग सक्रिय हैं। धन जुटाने के लिए कैंपेन चलाए जा रहे हैं और इस मामले में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव बनाने की कोशिशें जारी हैं। निमिषा के परिवार ने भारतीय नागरिकों और सरकार से मदद की अपील की है। उनकी मां ने कहा, “तलाल ने मेरी बेटी को झूठे कागजातों और बंदूक के दम पर प्रताड़ित किया। अगर उसे न्याय नहीं मिला, तो उसकी जान चली जाएगी।”

परिवार का दावा है कि निमिषा ने अपनी जान बचाने के लिए यह कदम उठाया। उनकी मां ने कहा, “महदी ने हमारी बेटी को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया। उसने हमारी बेटी को कैद कर रखा था और हमारे परिवार को तोड़ने की कोशिश की।”

परिवार का यह भी कहना है कि निमिषा ने महदी के खिलाफ पुलिस में शिकायत की थी, लेकिन महदी के प्रभाव और यमन की व्यवस्था के कारण कोई कार्रवाई नहीं की गई। परिवार ने भारतीय समाज से अपील की है कि वे ब्लड मनी जुटाने और न्याय दिलाने के इस संघर्ष में साथ खड़े हों।

सोशल मीडिया पर #SaveNimishaPriya अभियान

निमिषा प्रिया की कहानी सामने आने के बाद, यह मामला पूरे देश में चर्चा का केंद्र बन गया। उनकी फांसी की सजा ने कई सवाल खड़े कर दिए, जिससे मानवाधिकार संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम जनता ने उनकी रिहाई के लिए आवाज बुलंद की।

सोशल मीडिया पर #SaveNimishaPriya नाम से एक बड़ा अभियान शुरू किया गया है, जिसके तहत लोगों से ब्लड मनी के लिए धन जुटाने की अपील की जा रही है। इस अभियान को पूरे देश से समर्थन मिल रहा है, और हजारों लोग इसे शेयर कर अपनी एकजुटता दिखा रहे हैं।

कई मानवाधिकार संगठनों ने भी निमिषा को माफी देने और उनकी सजा पर पुनर्विचार करने की मांग की है। वहीं, केरल के कई सामाजिक संगठनों ने राज्य और केंद्र सरकार से अनुरोध किया है कि वे इस मामले में हस्तक्षेप करें और निमिषा की जान बचाने के लिए हरसंभव कदम उठाएं।

लोगों का मानना है कि निमिषा ने जो किया, वह आत्मरक्षा का प्रयास था। उन्हें एक और मौका मिलना चाहिए ताकि वे अपने जीवन को नई दिशा दे सकें। इस अभियान ने सामाजिक और कानूनी समर्थन जुटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

Ladakh 4G Network: भारतीय सेना की बदौलत डिजिटल क्रांति से जुड़े लद्दाख के ‘फर्स्ट विलेज’, अकेले 5 माह में लगाए 40 नए 4जी टावर

Ladakh 4G Network: Indian Army brings Bringing Connectivity in India’s First Villages

Ladakh 4G Network: लद्दाख के सीमावर्ती और दूरस्थ गांवों में जून 2024 तक 4G मोबाइल कनेक्टिविटी नहीं थी। यह क्षेत्र डिजिटल क्रांति से अछूता था, जिससे स्थानीय समुदाय आधुनिक सुविधाओं से वंचित थे। भारतीय सेना ने इस समस्या का समाधान करने के लिए भारती एयरटेल के साथ मिलकर देश के ‘पहले गांव’ में कनेक्टिविटी सुनिश्चित करने का जिम्मा उठाया। भारतीय सेना ने अकेले  पांच महीनों में ही 42 से ज्यादा 4जी कनेक्टिविटी वाले मोबाइल टावर लगाए हैं।

Ladakh 4G Network: Indian Army brings Bringing Connectivity in India’s First Villages

Ladakh 4G Network: फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स ने निभाई अहम भूमिका

भारतीय सेना की फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स ने इस पहल में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने सभी टेलीकॉम सर्विस प्रोवाइडर्स के साथ मिलकर इन गांवों में मोबाइल टावर स्थापित किए। केवल पांच महीनों में ही 42 एयरटेल 4G मोबाइल टावर लगाए गए हैं। ये टावर कारगिल, सियाचिन, देमचोक, दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ) और गलवान जैसे सुदूरवर्ती क्षेत्रों में लगाए गए हैं। यह चुनौतीपूर्ण कार्य 13,000 फीट से अधिक की ऊंचाई और माइनस 40 डिग्री सेल्सियस के कठोर मौसम में संभव हो सका। इनमें सीमावर्ती गांव और वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के क्षेत्र शामिल हैं, जहां तैनात भारतीय सैनिक कठिन सर्दियों का सामना कर रहे हैं।

Ladakh 4G Network: सैनिकों और नागरिकों को मिला बड़ा फायदा

इस परियोजना को पूरा करने के लिए अत्यंत कड़ी योजना और प्रयास किए गए। मुश्किल पहाड़ियों, सीमित सड़क संपर्क और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों ने इस कार्य को चुनौतीपूर्ण बना दिया, लेकिन सेना और एयरटेल ने इन बाधाओं को पार कर सफलता हासिल की। इस पहल का सबसे बड़ा फायदा उन सैनिकों को हुआ जो लद्दाख में तैनात हैं। अब वे अपने परिवारों से जुड़े रह सकते हैं। वहीं, स्थानीय समुदायों को भी डिजिटल कनेक्टिविटी का लाभ मिला है।

पर्यटन और आर्थिक अवसरों को मिलेगा बढ़ावा

सैन्य सूत्रों ने कहा कि इस परियोजना का फायदा केवल कम्यूनिकेशन तक सीमित नहीं रहेगा। यह इस इलाके में शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और रोजगार के अवसरों को बढ़ावा देगा। स्थानीय समुदाय अब डिजिटल दुनिया का हिस्सा बन पाएंगे, जिससे उनके जीवन में सुधार आएगा।

डिजिटल कनेक्टिविटी ने इन क्षेत्रों में पर्यटन को बढ़ावा देने का मार्ग प्रशस्त किया है। अब इन क्षेत्रों में न केवल पर्यटक आसानी से पहुंच सकेंगे, बल्कि स्थानीय लोगों को ऑनलाइन शिक्षा, दूरस्थ स्वास्थ्य सेवाओं और सरकारी योजनाओं तक भी बेहतर पहुंच मिलेगी।

इससे पहले 16 नवंबर, 2024 तक ही भारतीय सेना ने एयरटेल के साथ मिल कर मात्र 20 टावर ही लगाए थे। लेकिन मात्र डेढ़ महीने में ही भारतीय सेना ओर एय़रटेल के अथक प्रयासों से यह संख्या 40 तक पहुंच गई।

चुशुल के कांउसलर कोनचोक स्टैनजिन लंबे समय से कर रहे थे मांग

21 अगस्त 2024 को एलएसी के नजदीक पैंगोंग झील के किनारे बसे फोबरंग गांव में एयरटेल 4जी नेटवर्क लगाया था। चीन सीमा के नजदीक बसे चुशुल के कांउसलर, कोनचोक स्टैनजिन ने नेटवर्क लॉन्च किया था। वे लंबे समय से यहां टावर लगाने की मांग कर रहे थे। कोनचोक स्टेंजिन ने ही टावर के लिए सोलर पावर प्लांट उपलब्ध कराया, भारतीय सेना ने ऑप्टिकल फाइबर केबल (ओएफसी) बिछाई, और ग्रामीणों ने बैटरी बैंक का निर्माण किया। एयरटेल ने नेटवर्क टावर स्थापित किया।

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डिजिटल कनेक्टिविटी से मुख्यधारा से जुड़ेगा लद्दाख

भारतीय सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस पहल की प्रशंसा करते हुए कहा, “इन ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मजबूत संचार नेटवर्क सुनिश्चित करना न केवल सैन्य अभियानों के लिए, बल्कि स्थानीय समुदायों के कल्याण के लिए भी अत्यंत आवश्यक है। यह परियोजना राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय विकास के प्रति हमारी प्रतिबद्धता का प्रतीक है।” उन्होंने कहा,
भारतीय सेना की इस पहल ने न केवल स्थानीय समुदायों की जिंदगी को आसान बनाया है, बल्कि सरकार की विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को पूरा करने में भी योगदान दिया है। डिजिटल कनेक्टिविटी इन सुदूरवर्ती क्षेत्रों को देश के मुख्यधारा से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

4जी नेटवर्क की उपलब्धता स्थानीय समुदायों के लिए नए अवसर लेकर आएगी। यह परियोजना शिक्षा के नए आयाम खोलेगी, स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बनाएगी और स्थानीय व्यापार को प्रोत्साहित करेगी। इसके साथ ही, यह क्षेत्र के समग्र विकास और आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगी।

भारतीय सेना और एयरटेल की यह पहल, लद्दाख जैसे सुदूरवर्ती और दुर्गम क्षेत्रों में विकास और कनेक्टिविटी का एक नया अध्याय लिखने के साथ-साथ, वहां की जनता के जीवन स्तर को ऊपर उठाने की दिशा में एक अहम प्रयास है।

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Army Sports Conclave 2024: Indian Army’s Mega Plan for 2036 Olympics Glory!

Army Sports Conclave 2024: भारतीय सेना ने खेल क्षेत्र में अपनी अहम भूमिका को और मजबूत करते हुए 30 दिसंबर 2024 को दिल्ली कैंट स्थित मानेकशॉ सेंटर में ‘आर्मी स्पोर्ट्स कॉन्क्लेव 2024’ का आयोजन किया। इस कार्यक्रम में 200 से अधिक गणमान्य व्यक्तियों ने हिस्सा लिया, जिनमें एथलीट, खेल महासंघों के प्रतिनिधि और भारतीय खेल जगत के प्रमुख संस्थाओं के लोग शामिल थे। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य भारत के खेल क्षेत्र को वैश्विक मंच पर मजबूत करना और 2036 ओलंपिक्स की मेजबानी के लिए देश की तैयारियों को दिशा देना था।

Army Sports Conclave 2024: Indian Army’s Mega Plan for 2036 Olympics Glory!

इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में युवा मामलों और खेल मंत्री डॉ. मनसुख मंडाविया और राजस्थान सरकार के मंत्री कर्नल (सेवानिवृत्त) राज्यवर्धन सिंह राठौड़ मौजूद थे। इनके अलावा, थलसेना अध्यक्ष जनरल उपेंद्र द्विवेदी भी इस कार्यक्रम में मौजूद रहे।

Army Sports Conclave 2024: मिशन ओलंपिक्स विंग की उपलब्धियां

2024 में भारतीय सेना के मिशन ओलंपिक्स विंग ने शानदार प्रदर्शन किया है। एथलीटों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई पदक जीते।

  • तीरंदाजी: 13 राष्ट्रीय और 8 अंतरराष्ट्रीय पदक
  • एथलेटिक्स: 104 पदक
  • मुक्केबाजी: 74 पदक
  • डाइविंग: 11 पदक
  • कुश्ती: 45 पदक
  • वेटलिफ्टिंग: 49 पदक

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Army Sports Conclave 2024: पेरिस ओलंपिक्स और पैरालंपिक्स 2024

पेरिस ओलंपिक्स और पैरालंपिक्स 2024 में भारतीय सेना ने देश की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सेना के 13 खिलाड़ियों ने ओलंपिक्स में भारत का प्रतिनिधित्व किया। इनमें सूबेदार नीरज चोपड़ा का ऐतिहासिक सिल्वर मेडल (भाला फेंक में 89.45 मीटर) विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसके अलावा, सूबेदार अविनाश साबले ने 3000 मीटर स्टीपलचेज में दूसरा स्थान हासिल किया।

वहीं, पैरालंपिक्स में, सेना के पैरा-एथलीटों ने भी अपनी शानदार प्रतिभा का प्रदर्शन किया और दो कांस्य पदक जीते। इनमें नायब सूबेदार होकातो सेमा (सीटेड शॉट पुट F-57) और नाइक गजेंद्र सिंह की पत्नी सिमरन (T-12 200 मीटर) ने अपने-अपने इवेंट में पदक हासिल किए। ये प्रदर्शन भारतीय सेना की खेल उत्कृष्टता के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं।

2036 ओलंपिक्स की तैयारी

भारत 2036 ओलंपिक्स की मेजबानी की तैयारी कर रहा है, और इस दिशा में भारतीय सेना अग्रणी भूमिका निभा रही है। 2001 में स्थापित मिशन ओलंपिक्स विंग ने अब तक राष्ट्रमंडल खेल 2022, एशियाई खेल 2022 और पेरिस ओलंपिक्स 2024 जैसे प्रतिष्ठित इवेंट्स में भारत के लिए पदक जीते हैं।

2036 ओलंपिक्स के लिए सेना ने एक व्यापक रोडमैप तैयार किया है। इसके तहत जिन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। सेना के प्रशिक्षण में शारीरिक और मानसिक सहनशक्ति को प्रमुखता दी जाती है। अनुशासन, धैर्य और मानसिक मजबूती पर आधारित यह प्रशिक्षण खिलाड़ियों को वैश्विक चुनौतियों के लिए तैयार करता है। साथ ही, खेल विज्ञान का समावेश एक बड़ा कदम है, जिसमें खेल चिकित्सा विशेषज्ञ, पोषण विशेषज्ञ और खेल वैज्ञानिकों की मदद से खिलाड़ियों की फिटनेस और प्रदर्शन को बढ़ावा दिया जा रहा है।

Army Sports Conclave 2024: Indian Army’s Mega Plan for 2036 Olympics Glory!

सेना ने महिला खेलों को बढ़ावा देने के लिए ‘आर्मी गर्ल्स स्पोर्ट्स कंपनी’ को बेहतरीन सुविधाओं और विशेषज्ञ कोचिंग के साथ सशक्त बनाया है। पैरालंपिक खेलों के लिए पुणे में ‘आर्मी पैरालंपिक नोड’ को ‘पैरास्पोर्ट्स सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ में परिवर्तित किया जा रहा है, जो दिव्यांग खिलाड़ियों के विकास को नई ऊंचाई देगा।

इसके अलावा, पूर्व ओलंपियनों और खेल पेशेवरों की मदद से कोचिंग और मेंटरशिप को सशक्त किया जा रहा है, ताकि युवा प्रतिभाएं अपने सपनों को साकार कर सकें। सेना देश में एक खेल-केंद्रित समाज की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

‘आर्मी स्पोर्ट्स कॉन्क्लेव 2024’ ने भारतीय खेल जगत के विभिन्न हितधारकों को एक मंच पर लाकर चुनौतियों और अवसरों पर चर्चा करने का मौका दिया। इसमें मुख्य जोर यह सुनिश्चित करने पर था कि भारतीय एथलीट अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार हों।

Republic Day Tickets: मात्र 20 रुपये में देखें गणतंत्र दिवस 2025 की परेड, टिकटों की बिक्री हुई शुरू, आज ही करें बुक

Republic Day Tickets: watch Republic Day Parade 2025 Starting at Rs 20!

Republic Day Tickets: इस साल 26 जनवरी को होने वाले गणतंत्र दिवस परेड और 29 जनवरी को आयोजित होने वाले बीटिंग रिट्रीट समारोह के लिए टिकटों की बिक्री शुरू हो गई है। रक्षा मंत्रालय की तरफ से इस बात की जानकारी दी गई है कि लोग इन टिकटों को ऑनलाइन और दिल्ली के विभिन्न काउंटरों से खरीद सकते हैं।

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इस साल रक्षा मंत्रालय ने टिकट बिक्री में डिजिटल तकनीक का बेहतर उपयोग करने का निर्णय लिया है। ‘आमंत्रण’ मोबाइल ऐप और वेबसाइट के माध्यम से टिकट खरीदने की प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाया गया है। इससे लोगों को लंबी कतारों से बचने और आसानी से टिकट खरीदने का मौका मिलेगा।

डिजिटल माध्यमों के उपयोग से यह भी सुनिश्चित किया गया है कि टिकट वितरण में पारदर्शिता बनी रहे और टिकटों का दुरुपयोग रोका जा सके।

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Republic Day Tickets: ये हैं टिकटों की कीमतें  

इस बार रक्षा मंत्रालय ने गणतंत्र दिवस परेड और बीटिंग रिट्रीट के लिए टिकटों की कीमत काफी सस्ती और सुलभ रखी है। गणतंत्र दिवस परेड के लिए टिकट ₹20 और ₹100 में खरीदे जा सकते हैं।

बीटिंग रिट्रीट की रिहर्सल, जो 28 जनवरी को होगी, के टिकट ₹20 में उपलब्ध होंगे। वहीं, 29 जनवरी को होने वाले मुख्य बीटिंग रिट्रीट समारोह के लिए टिकट ₹100 में मिलेंगे। यह कीमतें सभी वर्गों के लोगों को इन ऐतिहासिक आयोजनों का हिस्सा बनने का मौका देती हैं।

टिकटों की बिक्री 11 जनवरी तक जारी रहेगी, जब तक हर दिन के लिए निर्धारित कोटा खत्म नहीं हो जाता।

Republic Day Tickets: कहां से खरीदें टिकट

टिकट खरीदने के लिए रक्षा मंत्रालय ने आधिकारिक वेबसाइट aamantran.mod.gov.in और ‘आमंत्रण’ मोबाइल ऐप की सुविधा दी है। यह ऐप मोबाइल सेवा ऐप स्टोर से डाउनलोड किया जा सकता है। ऐप के लिए क्यूआर कोड भी आधिकारिक प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है।

दिल्ली में निम्नलिखित पांच जगहों पर टिकट खरीदने की सुविधा:
1. सेना भवन (गेट नंबर 2)
2. शास्त्री भवन (गेट नंबर 3 के पास)
3. जन्तर मंतर (मुख्य द्वार)
4. प्रगति मैदान (गेट नंबर 1)
5. राजीव चौक मेट्रो स्टेशन (गेट नंबर 7 और 8)

इन स्थानों पर टिकट 2 जनवरी से 11 जनवरी के बीच सुबह 10 बजे से दोपहर 1 बजे तक और फिर दोपहर 2 बजे से शाम 4:30 बजे तक खरीदे जा सकते हैं।

चाहिए होगी फोटो आईडी 

गणतंत्र दिवस और बीटिंग रिट्रीट समारोह में शामिल होने के लिए टिकट के साथ एक वैध फोटो पहचान पत्र की जरूरत होगी। इसमें आधार कार्ड, वोटर आईडी, ड्राइविंग लाइसेंस, पासपोर्ट या किसी अन्य सरकारी पहचान पत्र का उपयोग किया जा सकता है।

यह सुनिश्चित किया गया है कि सुरक्षा कारणों से प्रत्येक व्यक्ति की पहचान सत्यापित हो सके। इसलिए, टिकट खरीदने के समय ही फोटो आईडी अनिवार्य रूप से प्रस्तुत करनी होगी

कार्यक्रम और गणतंत्र दिवस का महत्व

गणतंत्र दिवस समारोह का इतिहास भारत के स्वतंत्रता संग्राम और संविधान निर्माण की गौरवशाली यात्रा से जुड़ा हुआ है। 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ और देश ने खुद को एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया।

इस दिन को राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाने का उद्देश्य हर नागरिक को यह याद दिलाना है कि भारत की विविधता में एकता और लोकतांत्रिक मूल्य कितने महत्वपूर्ण हैं।

बीटिंग रिट्रीट की परंपरा:

बीटिंग रिट्रीट समारोह की शुरुआत ब्रिटिश शासनकाल में हुई थी। यह परंपरा भारतीय सेना द्वारा अपनाई गई और आज इसे एक राष्ट्रीय आयोजन का रूप दिया गया है। यह समारोह 29 जनवरी को विजय चौक पर आयोजित किया जाता है, और इसमें भारतीय बैंड पारंपरिक और आधुनिक धुनों का प्रदर्शन करते हैं।

अधिक जानकारी के लिए

गणतंत्र दिवस समारोह और इससे जुड़े कार्यक्रमों की जानकारी के लिए आधिकारिक पोर्टल rashtraparv.mod.gov.in पर विजिट कर सकते हैं।

रक्षा मंत्रालय ने इन आयोजनों के लिए पूरी तैयारी कर ली है। अब यह नागरिकों पर निर्भर है कि वे इन राष्ट्रीय आयोजनों का हिस्सा बनकर इस खास मौके को यादगार बनाएं।

Anti-Drone Ammunition: ‘ड्रोन वॉरफेयर’ से निपटने को तैयार भारतीय सेना, ZU-23 एंटी-एयरक्राफ्ट गन को देश में ही मिलेगा अपडेटेड गोला-बारूद

Anti-Drone Ammunition: Indian Army issued RFI for manufacturing of ZU-23 mm Anti-Drone ammunition

Anti-Drone Ammunition: दुनियाभर में चल रहे हालिया युद्धों में ड्रोन के इस्तेमाल को लेकर तेजी देखी गई है। ड्रोन छोटे आकार, कम लागत और एडवांस टेक्नोलॉजी के चलते दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को कमजोर करने और सटीक हमले करने में सक्षम हैं। इन खतरों से निपटने के लिए भारतीय सेना अब बड़ी तैयारी कर रही है। भारतीय रक्षा मंत्रालय ने भारतीय उद्योगों से 23mm एंटी-ड्रोन गोला-बारूद की सप्लाई के लिए रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (RFI) जारी किया है। (RFI) जारी किया है। भारतीय सेना ड्रोन और लोइटरिंग म्यूनिशन जैसे हवाई खतरों से निपटने के लिए अब बड़ी तैयारी में जुट गई है।

Anti-Drone Ammunition: Indian Army issued RFI for manufacturing of ZU-23 mm Anti-Drone ammunition
Shilka एंटी-एयरक्राफ्ट गन

क्या है ZSU-23-4 Shilka एंटी-एयरक्राफ्ट गन

ZSU-23-4 शिल्का वेपन सिस्टम एक ऑटोमैटिक एंटी-एयरक्राफ्ट गन सिस्टम है, जिसे सोवियत संघ ने डिजाइन किया था। इसमें चार 23 मिमी की ऑटोमौटिक तोपें (2A7) लगी हैं, जो तेज रफ्तार से फायरिंग करने और कम ऊंचाई पर उड़ने वाले हवाई खतरों जैसे लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर और ड्रोन को मार गिरा सकती हैं। इसकी प्रभावी फायरिंग रेंज 2.5 किमी है और फायरिंग स्पीड 4,000 राउंड प्रति मिनट तक पहुंच सकती है।

शिल्का प्रणाली में इन-बिल्ट रडार और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल फायर कंट्रोल सिस्टम है, जो दिन और रात के किसी भी समय दुश्मन के लक्ष्यों को ट्रैक कर सकता है। इसे किसी भी गाड़ी पर लगाया जा सकता है, जिससे इसे आसानी से सीमावर्ती क्षेत्रों और ऊंचाई वाले स्थानों पर तैनात किया जा सकता है।

Anti-Drone Ammunition: Indian Army issued RFI for manufacturing of ZU-23 mm Anti-Drone ammunition
ZU 23mm

Anti-Drone Ammunition: क्या है ZU 23mm सिस्टम

ZU 23mm सिस्टम एक डबल बैरल एंटी-एयरक्राफ्ट ऑटोकैनन है, जिसे रूसी मूल का माना जाता है। इसका पूरा नाम “जेनिटनाया उस्तानोवका” है। भारतीय सेना के पास लगभग 470 ZU-23 सिस्टम हैं, जिन्हें सोवियत संघ से खरीदा गया था और भारत में ही अपग्रेड किया गया। इस अपग्रेड में इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल फायर कंट्रोल सिस्टम जोड़ा गया, जो दुश्मन को ट्रैक कर उसकी पहचान करने और सटीक हमला करने की क्षमता प्रदान करता है।

यह सिस्टम कम ऊंचाई पर उड़ने वाले हवाई खतरों को खत्म करने में सक्षम है। इसका काम करने का तरीका “गैस ऑपरेटेड एक्शन” पर आधारित है। इस ऑटोकैनन का वजन लगभग 0.95 टन है, जबकि इसकी लंबाई 10 फीट और बैरल की लंबाई 6.5 फीट है, जो इसे लंबी दूरी तक मारक क्षमता प्रदान करती है। पूरे सिस्टम की चौड़ाई 9.5 फीट और ऊंचाई 4 फीट है।

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इस सिस्टम को संचालित करने के लिए दो लोगों की जरूरत होती है- एक गनर और एक कमांडर। यह 23 मिमी कैलिबर के गोले दागने में सक्षम है और माइनस 10 डिग्री से प्लस 90 डिग्री तक के कोण पर हमला कर सकता है। इसके अलावा, यह 360 डिग्री घूमकर दुश्मन के हर दिशा में निशाना साध सकता है।

यह सिस्टम एक मिनट में 2,000 गोलियां दागने की क्षमता रखता है। इसके गोले 50 राउंड की बेल्ट में लोड किए जाते हैं। इसकी मारक दूरी ढाई किलोमीटर तक होती है, जहां यह सटीकता के साथ हमला कर सकता है।

ZU 23mm सिस्टम को किसी भी गाड़ी पर लगाया जा सकता है, जिससे इसे आसानी से सीमा पर तैनात किया जा सकता है। इसे ट्रक से बांधकर या विमान में लोड करके ऊंचाई वाले स्थानों तक पहुंचाया जा सकता है।

भारत में इस सिस्टम के 320 यूनिट खींचकर तैनात करने वाले सिस्टम हैं, जबकि बाकी ट्रकों पर लगाए गए हैं। यह बहुमुखी सिस्टम दुश्मन के हवाई खतरों से निपटने के लिए एक महत्वपूर्ण हथियार है, जो सेना की ताकत को बढ़ाता है।

Anti-Drone Ammunition: क्यों चाहिए 23mm एंटी-ड्रोन गोला-बारूद?

23mm एंटी-ड्रोन गोला-बारूद मौजूदा ZU-23 और शिल्का हथियार प्रणालियों जैसे एंटी-एयरक्राफ्ट गन के साथ इस्तेमाल के लिए डिज़ाइन किया गया है। लेकिन इनसे दागे जाने वाले मौजूदा गोला-बारूद के हिट करने का संभावित औसत काफी कम है। इन गनों के ऑपरेट करने में इंसानों की भूमिका होने की वजह से सटीकता की कमी रहती है। इस कमी को पूरा करने के लिए 23 मिमी एंटी-ड्रोन गोला-बारूद तैयार किया जा रहा है, जिसमें आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल होगा। बता दें कि इन एंटी-एयरक्राफ्ट गन में 23 मिमी आर्मर पियर्सिंग इनसेन्डियरी ट्रेसर (एपीआईटी) और हाई एक्सप्लोसिव इनसेन्डियरी ट्रेसर (एचईआईटी) एम्युनिशन का इस्तेमाल किया जाता है।

यहां देखें सेना की तरफ से जारी RFI

ये गोला-बारूद छोटे आकार और कम रडार क्रॉस-सेक्शन वाले ड्रोन को नष्ट करने में सक्षम होने चाहिए। मौजूदा गोला-बारूद की तुलना में इसमें हाई “हिट प्रॉबेबिलिटी” होगी, जिससे यह मॉर्डन वारफेयर में ज्यादा प्रभावी साबित होगा। भारतीय सेना के पास ZU 23 मिमी और शिल्का हथियार प्रणाली जैसे एंटी-एयरक्राफ्ट गन हैं, लेकिन इनसे दागे जाने वाले मौजूदा गोला-बारूद का हिट करने का संभावित औसत कम है।

Anti-Drone Ammunition: होनी चाहिए ये खूबियां

23 मिमी एंटी-ड्रोन गोला-बारूद का डिज़ाइन भारतीय सेना की जरूरतों और मॉर्डन वारफेयर की चुनौतियों को ध्यान में रखकर किया गया है। इस गोला-बारूद को ZU 23 मिमी और शिल्का सिस्टम जैसे मौजूदा हथियारों के साथ इस्तेमाल किया जा सकेगा।

इन गोला-बारूद में एक प्रॉक्सिमिटी या टाइम्ड फ्यूज सिस्टम होगा, जैसे ही यह ड्रोन के पास पहुंचेगा यह सक्रिय हो जाएगा। टाइम्ड फ्यूज को पहले से प्रोग्राम किया जाएगा ताकि यह निश्चित दूरी (जैसे 1000 मीटर, 1500 मीटर, 2500 मीटर आदि) पर विस्फोट कर सके। इससे दुश्मन के ड्रोन को नष्ट करने में आसानी होगी।

प्री-फ्रैगमेंटेड शेल का डिज़ाइन इस तरह से तैयार किया गया है कि इसके टुकड़े बड़े क्षेत्र में फैलकर दुश्मन के ड्रोन को अधिकतम नुकसान पहुंचा सकें। ये टुकड़े उचित आकार, संख्या और डेनसिटी में होंगे, जिससे ड्रोन को नष्ट करने की संभावना बढ़ जाएगी।

वहीं, इस गोला-बारूद की शेल्फ लाइफ कम से कम 10 साल तक होनी चाहिए। इसका मतलब यह है कि यह लंबे समय तक बिना किसी खराबी के स्टोरेज में रखा जा सकता है। इससे भारतीय सेना की लॉजिस्टिक्स और कॉस्ट मैनेजमेंट में भी मदद मिलेगी।

साथ ही, यह गोला-बारूद -30°C से +45°C के बीच के तापमान में पूरी क्षमता से काम करने की खूबी होनी चाहिए। इसके अलावा, इसे बिना किसी स्पेशल स्टोरेज सिस्टम के कठिन परिस्थितियों में भी सुरक्षित रखा जा सके। भारत की जलवायु और सैन्य हालातों को देखते हुए यह बेहद जरूरी है।

रूस ने बनाया “ड्रोन किलर” सिस्टम

बता दें कि जेडएसयू-23-4 शिल्का सिस्टम का उपयोग पहले से ही रूसी सेना में किया जाता रहा है। इसकी फायरिंग रेंज 2.5 किमी है और यह तेजी से फायर कर सकता है। वहीं यूक्रेन के साथ चल रहे युद्ध को देखते हुए रूस ने “ड्रोन किलर” सिस्टम लॉन्च किया है। रूस ने ड्रोन से मुकाबला करने के लिए बीटीआर-82 व्हीकल पर ज़ेडएसयू-23-4 शिल्का सिस्टम की दो 23 मिमी एंटी-एयरक्राफ्ट गन लगााई हैं। यह सिस्टम विशेष रूप से ड्रोन जैसे आधुनिक हवाई खतरों से निपटने के लिए डिजाइन किया गया है।

‘मेक इन इंडिया’ पहल को बढ़ावा

रक्षा मंत्रालय के इस प्रस्ताव के तहत, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों (DPSUs) और निजी उद्योगों को अपने-अपने सॉल्यूशंस पेश करने का मौका दिया गया है। मंत्रालय ने कंपनियों से आग्रह किया है कि वे इसमें हिस्सा लें और भारतीय सेना की जरूरतों को पूरा करने के लिए तकनीकी जानकारी और प्रपोजल साझा करें।

भारतीय सेना ने इस परियोजना के लिए एक “सिंगल स्टेज-टू बिड सिस्टम” अपनाया है। इसका मतलब है कि टेक्निकल और कॉमर्शियल प्रपोजल अलग-अलग लिफाफों में जमा किए जाएंगे। सभी तकनीकी प्रस्तावों का मूल्यांकन एक टेक्निकल इवैल्यूएशन कमेटी द्वारा किया जाएगा। वहीं, आरएफआई जमा करने की अंतिम तिथि 17 फरवरी 2025 तय की गई है।

Ganga Task Force: भारतीय सेना की गोमती को नई जिंदगी देने की तैयारी! जानें कैसे गंगा टास्क फोर्स बदलेगी नदी की तस्वीर

Ganga Task Force: Indian Army’s Mission to Revive Gomti River!

Ganga Task Force: भारतीय सेना की टेरिटोरियल आर्मी (Territorial Army) ने गोमती नदी के संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। भारत की पवित्र नदियों की स्वच्छता और संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, दुनिया की पहली कंपोजिट इकोलॉजिकल टास्क फोर्स (CETF), जिसे गंगा टास्क फोर्स (GTF) के नाम से जाना जाता है, उसने एक बड़ी पहल की है। इस मिशन के तहत गंगा टास्क फोर्स (Ganga Task Force) की एक नई कंपनी को लखनऊ में तैनात किया गया है। गंगा टास्क फोर्स (GTF) अभी तक गंगा नदी की स्वच्छता और संरक्षण में जुटती थी, लेकिन अब गोमती नदी के पुनर्जीवन के लिए भी काम करेगी। इस पहल का औपचारिक शुभारंभ 1 जनवरी 2025 को लखनऊ छावनी में हुआ।

Ganga Task Force: Indian Army’s Mission to Revive Gomti River!

गंगा नदी की स्वच्छता और संरक्षण में उल्लेखनीय योगदान देने वाली गंगा टास्क फोर्स (GTF) अब गोमती नदी के लिए भी काम करेगी। इस टास्क फोर्स में अधिकांश सदस्य पूर्व सैनिक हैं, जिनका एकमात्र उद्देश्य गंगा की पवित्रता को बनाए रखना है।

उद्घाटन समारोह के दौरान टेरिटोरियल आर्मी के ग्रुप हेडक्वार्टर के कमांडर ब्रिगेडियर चिन्मय मधवाल ने गंगा टास्क फोर्स के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल अरविंद प्रसाद एस को प्रतीकात्मक ध्वज सौंपा। इस कार्यक्रम में सैन्य और नागरिक क्षेत्रों के कई गणमान्य लोग मौजूद थे, जिनमें बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. वेंकटेश दत्ता भी शामिल थे।

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डॉ. दत्ता ने गोमती नदी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और इसके सामने मौजूद समस्याओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने इस पहल की सराहना करते हुए इसे नदी के पुनर्जीवन के लिए एक सकारात्मक पहल बताया।

Ganga Task Force: Indian Army’s Mission to Revive Gomti River!

क्या करेगी Ganga Task Force?

भारतीय सेना की गंगा टास्क फोर्स बटालियन ने इस अभियान के तहत प्रदूषण की निगरानी को प्राथमिकता दी है। गंगा टास्क फोर्स की टीमें नदी के घाटों और किनारों पर नियमित गश्त करेंगी। यह गश्त न केवल प्रदूषण के कारणों की पहचान करेगी, बल्कि उन्हें रोकने के लिए ठोस कदम भी उठाएगी।

इसके साथ ही, यह टीम सार्वजनिक जागरूकता अभियान भी शुरू करेगीी। इन अभियानों का उद्देश्य स्थानीय लोगों को स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण के महत्व के बारे में जागरूक करना है। स्वच्छता बनाए रखने, कचरा प्रबंधन और नदी के प्रति संवेदनशीलता विकसित करने पर जोर दिया जाएगा।

गोमती नदी के किनारों को मजबूत करने के लिए किनारों का स्थिरीकरण एक अहम हिस्सा होगा। इस प्रयास का लक्ष्य कटाव रोकना और नदी के किनारों को संरक्षित करना है, जिससे यह लंबे समय तक सुरक्षित और स्थिर बने रहें।

इसके अलावा, प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र का पुनर्निर्माण भी इस योजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। नदी के आसपास पौधारोपण और पारिस्थितिकी तंत्र के विकास के जरिए जैव विविधता को बढ़ावा देने के लिए कदम उठाए जाएंगे।

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उत्तर प्रदेश के कई जिलों से होकर बहती है गोमती नदी

गोमती नदी गंगा की एक सहायक नदी है, और उत्तर प्रदेश के कई जिलों से होकर बहती है। गोमती को लखनऊ शहर की जीवनरेखा माना जाता है, लेकिन हाल के वर्षों में बढ़ते प्रदूषण और अतिक्रमण ने इसे संकट में डाल दिया है। नदी का जल स्तर कम होता जा रहा है, और इसका पारिस्थितिकीय संतुलन बिगड़ चुका है।

राजीव गांधी ने शुरू किया था गंगा एक्शन प्लान

गंगा सफाई का प्रयास पिछले कई दशकों से चलता आ रहा है। 1986 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए गंगा एक्शन प्लान शुरू किया था। गंगा नदी को स्वच्छ और संरक्षित करने के लिए नमामि गंगे मिशन की शुरुआत 2014 में की गई थी। इस मिशन के तहत कई नालों को गंगा में गिरने से रोका गया, घाटों को साफ किया गया, और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाए गए।

वहीं, गंगा टास्क फोर्स के माध्यम से प्रदूषण की निगरानी, प्लास्टिक कचरे को हटाने और स्वच्छता अभियानों को लागू किया गया। इसके साथ ही, स्थानीय समुदायों को जागरूक करने और उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए कई कार्यक्रम चलाए गए।

नई कंपनी को जल शक्ति मंत्रालय के तहत राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) के तहत स्थापित किया गया है। इसके लिए रक्षा मंत्रालय द्वारा सितंबर 2024 में आदेश जारी किए गए थे।

गंगा टास्क फोर्स का यह प्रयास सेना और आम नागरिकों के बीच एक मजबूत सहयोग का प्रतीक है। यह पहल न केवल गोमती नदी के लिए, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति एक राष्ट्रीय जागरूकता अभियान का हिस्सा है। भारतीय सेना ने इस पहल के माध्यम से यह संदेश दिया है कि हर व्यक्ति का योगदान महत्वपूर्ण है।

The Ganga Task Force is a specialized team responsible for the preservation and restoration of the Ganga River. Committed to maintaining the ecological balance and promoting sustainable practices, the Ganga Task Force plays a crucial role in ensuring the long-term health and vitality of this iconic waterway. Through their diligent efforts, the Ganga Task Force strives to protect the river’s sacred and environmental significance for future generations.

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Mountain Artillery Retires: Mules Make Way for Drones, ATVs & Robotic Mules in Indian Army

Mountain Artillery: भारतीय सेना ने अपनी ऐतिहासिक और बहादुर पशु परिवहन (माउंटेन आर्टिलरी) यूनिट्स को श्रद्धांजलि देने के लिए एक खास डाक कवर जारी किया है। यह आयोजन सेना की उन यूनिट्स को याद करने के लिए किया गया, जिन्होंने दुर्गम पहाड़ों और कठिन हालात में सेना का साथ दिया। इस मौके पर सेना के वरिष्ठ अधिकारी (क्वार्टर मास्टर जनरल), लेफ्टिनेंट जनरल प्रीत मोहिंद्रा सिंह (निदेशालय आपूर्ति एवं परिवहन), और वरिष्ठ कर्नल कमांडेंट के साथ मेजर जनरल एमके खान (सहायक निदेशालय सेना डाक सेवा) और सेना सेवा कोर के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।

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Mountain Artillery: खच्चरों का सेना के साथ पुराना रिश्ता

भारतीय सेना का खच्चरों के साथ एक गहरा और ऐतिहासिक रिश्ता रहा है। 250 से ज्यादा सालों तक ये पशु, कठिन इलाकों में सेना के अभियानों की रीढ़ रहे। चाहे वह हिमालय की बर्फीली चोटियां हों या दुर्गम पहाड़ी इलाके, खच्चरों ने हर चुनौती को पार करते हुए रसद, हथियार और अन्य जरूरी सामान सैनिकों तक पहुंचाया। खच्चरों की खासियत उनकी ताकत, सहनशक्ति और कठिन हालात में काम करने की क्षमता रही। इन्हीं गुणों ने उन्हें सेना के लिए अनमोल साथी बना दिया।

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ये खच्चर वहां तक पहुंच जाते हैं, आधुनिक वाहन और तकनीक भी बेकार साबित हो जाती हैं, म्यूल (खच्चर) और उनके देखभालकर्ता, जिन्हें ‘म्यूलटियर’ कहा जाता है, हमेशा से भरोसेमंद साथी रहे हैं।

इस मोके पर लेफ्टिनेंट जनरल वीएमबी कृष्णन ने कहा, “यह कदम हमारे पारंपरिक मूल्यों को बनाए रखने का एक प्रतीक है। यह दिखाता है कि भारतीय सेना अपने हर साथी की सेवा को महत्व देती है।”

मेजर जनरल एमके खान ने कहा, “यह कवर म्यूल और उनके म्यूलटियर्स की कहानियों को जीवित रखने का एक प्रयास है। उनके योगदान को याद करना हमारा कर्तव्य है।”

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Mountain Artillery: तकनीक ने ली खच्चरों की जगह

अब समय बदल गया है। जहां पहले खच्चरों ने रसद पहुंचाने का काम किया, वहीं अब ड्रोन, ऑल-टेरेन व्हीकल्स और रोबोटिक म्यूल्स ने उनकी जगह ले ली है। सेना आधुनिक तकनीकों को अपनाकर अपनी कार्यक्षमता को और मजबूत कर रही है। इन्हीं परिवर्तनों के चलते सेना की ‘एनिमल ट्रांसपोर्ट’ यूनिट्स को अब सक्रिय सेवा से हटाया जा रहा है। यह कदम सेना की बढ़ती आधुनिकता और भविष्य की सैन्य जरूरतों को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है।

भारतीय सेना का आर्मी सर्विस कॉर्प्स (ASC) उन सेवाओं में से एक है, जो सेना की लॉजिस्टिक्स और आपूर्ति का आधार है। इसकी शुरुआत लगभग 250 साल पहले हुई थी और शुरू में इसका फोकस एनिमल ट्रांसपोर्ट पर था। समय के साथ, ASC ने अपने दायरे का विस्तार करते हुए आधुनिक लॉजिस्टिक्स और आपूर्ति प्रबंधन में भी महारत हासिल की।

ASC की ‘एनिमल ट्रांसपोर्ट’ यूनिट्स, जो माउंटेन आर्टिलरी का हिस्सा थीं, भारत के हर युद्ध क्षेत्र में सक्रिय रही हैं। ये यूनिट्स युद्ध के दौरान, खासकर 1962 के भारत-चीन युद्ध और 1999 के कारगिल संघर्ष के दौरान, महत्वपूर्ण साबित हुईं।

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खास डाक कवर का क्या है मतलब

जारी किया गया डाक कवर इन यूनिट्स के योगदान को सहेजने और आने वाली पीढ़ियों को उनकी कहानियां सुनाने का एक प्रयास है। यह उन खच्चरों और उनके संचालकों को सलाम करता है, जिन्होंने अपनी मेहनत और ताकत से भारतीय सेना को हर मुश्किल को पार करने में मदद की।

पशु परिवहन यूनिट्स का योगदान सिर्फ सामान ढोने तक सीमित नहीं था। ये इकाइयां सैनिकों की जान बचाने और दुश्मन के खिलाफ लड़ाई में अहम भूमिका निभाती थीं। कारगिल युद्ध और अन्य अभियानों में उनकी भूमिका आज भी प्रेरणादायक है। स्वतंत्रता के बाद, पशु परिवहन का उपयोग सीमावर्ती क्षेत्रों में और ज्यादा बढ़ गया। 1962 में चीन के साथ हुए युद्ध के दौरान म्यूलटियर्स ने हिमालय की ऊंची चोटियों पर रसद पहुंचाई। इसी तरह, 1999 के कारगिल युद्ध में, जब टोलोलिंग और टाइगर हिल जैसे क्षेत्रों में सड़कें नहीं थीं, म्यूल ही सेना का एकमात्र सहारा थे।

आज, जब सेना आधुनिक तकनीकों को अपनाकर खुद को भविष्य के लिए तैयार कर रही है, तब भी यह कदम दिखाता है कि परंपरा और इतिहास को भूला नहीं जा सकता। म्यूलटियर्स और उनके पशु, जो भारतीय सेना की पहचान का हिस्सा रहे हैं, हमेशा याद किए जाएंगे।

भारतीय सेना का यह कदम दिखाता है कि तकनीकी प्रगति के बावजूद सेना अपनी जड़ों को सम्मान देती है और उन्हें सहेजने की हर संभव कोशिश करती है।

यह खास डाक कवर सेना की माउंटेड हेरिटेज को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का एक जरिया है। यह हमें याद दिलाता है कि कैसे खच्चरों और उनके संचालकों ने सेना को हर चुनौती में मजबूती दी। उनकी यह कहानी हमेशा भारतीय सेना की गौरवशाली यात्रा का हिस्सा बनी रहेगी।

The Mountain Artillery is an essential component of modern military operations. Its specialized skills and equipment enable it to operate effectively in rugged and difficult terrain. The Mountain Artillery’s ability to provide precision firepower in challenging environments significantly enhances its tactical capabilities. With its expertise in mountain warfare, this unit plays a crucial role in maintaining military readiness and securing strategic objectives.

Year of Reforms: साल 2025 भारतीय सेनाओं के लिए होगा खास, रक्षा मंत्रालय इस साल मनाएगा ‘ईयर ऑफ रिफॉर्म्स’

Year of Reforms: 2025 to Mark a Transformative Year for Indian Armed Forces

Year of Reforms: 2025 भारतीय सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम साबित होगा। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 2025 को ‘ईयर ऑफ रिफॉर्म्स’ ‘Year of Reforms’ घोषित किया है, जिसका उद्देश्य सशस्त्र बलों को तकनीकी रूप से एडवांस बनाना और युद्ध के लिए रेडी फोर्स में बदलना है। यह घोषणा नए साल की पूर्व संध्या पर रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक के बाद की गई।

Year of Reforms: 2025 to Mark a Transformative Year for Indian Armed Forces

रक्षा मंत्री ने कहा, “यह कदम देश की रक्षा तैयारियों में अभूतपूर्व प्रगति का आधार बनेगा और 21वीं सदी की चुनौतियों के बीच भारत की सुरक्षा और संप्रभुता सुनिश्चित करेगा।”

Year of Reforms: क्या होगा मुख्य फोकस?

‘सुधार वर्ष’ के तहत कई बड़े बदलावों और परियोजनाओं पर काम किया जाएगा। इनका उद्देश्य सशस्त्र बलों के विभिन्न क्षेत्रों में सुधार करना और उन्हें आधुनिक युद्ध के लिए तैयार करना है। रक्षा मंत्रालय ने 2025 में जिन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देने का निर्णय लिया है, उनमें शामिल हैं:

1. जॉइंटनेस और इंटीग्रेशन:

तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल के लिए संयुक्त संचालन को बढ़ावा देना। इसके तहत इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड्स की स्थापना की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे।

2. नए डोमेन में सुधार:

सशस्त्र बलों को साइबर, अंतरिक्ष, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), मशीन लर्निंग, हाइपरसोनिक तकनीक, और रोबोटिक्स जैसे क्षेत्रों में महारत दिलाने की योजना बनाई गई है। भविष्य के युद्धों में इन तकनीकों के महत्व को ध्यान में रखते हुए नए टैक्टिक्स और प्रक्रियाएं विकसित की जाएंगी।

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3. अधिग्रहण प्रक्रिया में सुधार:

सैन्य साजोसामान खरीद की प्रक्रिया को तेज और सरल बनाया जाएगा, ताकि भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना को जल्द से जल्द उन्नत क्षमताएं मिल सकें।

4. सार्वजनिक-निजी भागीदारी:

रक्षा क्षेत्र और नागरिक उद्योगों के बीच प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और ज्ञान साझा करने को प्रोत्साहित किया जाएगा। इसमें मेक इन इंडिया पहल के तहत सार्वजनिक-निजी भागीदारी को और मजबूत किया जाएगा।

5. वैश्विक रक्षा निर्यातक के रूप में भारत:

भारत को एक विश्वसनीय रक्षा उत्पाद निर्यातक के रूप में स्थापित करने के लिए अनुसंधान और विकास (R&D) तथा विदेशी रक्षा निर्माताओं के साथ साझेदारी की जाएगी। इससे भारतीय कंपनियों को वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाने का मौका मिलेगा।

6. सेवानिवृत्त सैनिकों का कल्याण:

सुधार योजनाओं में पूर्व सैनिकों के कल्याण को प्राथमिकता दी जाएगी। उनके अनुभवों का उपयोग कर सशस्त्र बलों की क्षमताओं को और उन्नत किया जाएगा।

7. भारतीय संस्कृति और आत्मनिर्भरता पर जोर:

सुधार प्रक्रिया में भारतीय संस्कृति और स्वदेशी क्षमताओं को शामिल करते हुए आधुनिक सैन्य रणनीतियों से सीख ली जाएगी। इसका उद्देश्य आत्मनिर्भर भारत की दिशा में मजबूती से बढ़ना है।

भारतीय सशस्त्र बलों में सुधार की प्रक्रिया नई नहीं है। 1999 के कारगिल युद्ध के बाद कारगिल समीक्षा समिति ने कई सुधारों की सिफारिश की थी। उसी के बाद मुख्य रक्षा अध्यक्ष (CDS) पद का गठन और थिएटर कमांड्स का विचार शुरू हुआ। हालांकि, इन सुधारों को पूरी तरह लागू करने में समय लगा।

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2020 में चीन के साथ सीमा तनाव के दौरान भारत ने देखा कि युद्ध के नए स्वरूपों के लिए तत्काल बदलाव की जरूरत है। तब से, मेक इन इंडिया , आत्मनिर्भर भारत, और उन्नत हथियार प्रणालियों के विकास पर जोर दिया जा रहा है।

2024 था Year of Tech Absorption

पिछला वर्ष, यानी 2024, भारतीय रक्षा मंत्रालय द्वारा ‘प्रौद्योगिकी अवशोषण का वर्ष’ (Year of Tech Absorption) के रूप में मनाया गया। इसका मुख्य उद्देश्य भारतीय सशस्त्र बलों में उन्नत तकनीकों को शामिल करना और भविष्य की चुनौतियों के लिए उन्हें तकनीकी रूप से मजबूत बनाना था।

  • आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI): सेना ने दुश्मन की गतिविधियों पर नज़र रखने और रणनीतिक निर्णय लेने में AI आधारित उपकरणों का इस्तेमाल किया।
  • ड्रोन और सैटेलाइट: असम बाढ़ के दौरान ड्रोन और सैटेलाइट इमेजिंग से सैकड़ों लोगों को बचाया गया।
  • स्वदेशी निर्माण: DRDO ने उन्नत रडार और हथियार प्रणालियों का सफल परीक्षण किया, जो आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक बड़ा कदम था।
  • डिजिटल इंटरऑपरेबिलिटी: सेना, नौसेना और वायुसेना ने साझा डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम शुरू किया, जिससे तेज़ और संगठित संचालन संभव हुआ।

2024 ने सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण की नींव रखी, जो 2025 के ‘ईयर ऑफ रिफॉर्म्स’ की तैयारी के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ।

The Year of Reforms marked a significant turning point in our society. These reforms have brought about fundamental changes in various sectors, reshaping our economy, education system, and legal framework. The impact of the Year of Reforms will continue to be felt for years to come, as we strive towards a more progressive and equitable society.