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ALH Dhruv Crash: भारतीय सेना के इस वर्कहॉर्स को लेकर आर्मी चीफ ने कही ये बड़ी बात, पांच साल में हो चुके हैं 15 क्रैश

ALH Dhruv Crash: Major Setback for HAL & IAF! LCH Prachand Could Face Similar Issues

ALH Dhruv Crash: भारतीय सेना के स्वदेशी एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर (ALH) ध्रुव और इसके आर्मर्ड वर्जन अटैक हेलीकॉप्टर रुद्र पर हाल के हादसों के बाद गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सेना दिवस परेड में इन हेलीकॉप्टरों की गैरमौजूदगी ने इस मुद्दे को और गरमा दिया है। सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने भरोसा दिलाते हुए कहा है कि ALH ध्रुव भारतीय सेना का ‘वर्कहॉर्स’ है और रहेगा। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि इन हेलीकॉप्टरों की फ्लाइंग सेफ्टी सुनिश्चित करना उनकी प्राथमिकता है।

ALH Dhruv Crash: Army Chief Defends 'Workhorse' Amid 15 Crashes in Five Years

जनरल द्विवेदी ने पुणे में आयोजित 77वें सेना दिवस परेड के मौके पर कहा, “ध्रुव हेलीकॉप्टर ने 2023-24 में 40,000 घंटे से अधिक की उड़ान भरी है। इस दौरान केवल एक बार तकनीकी गड़बड़ी हुई। यह हेलीकॉप्टर कठिन इलाकों में 15,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर सफलतापूर्वक काम कर रहा है। हमें इस प्लेटफॉर्म पर 100% भरोसा है।”

ALH Dhruv Crash: सेना दिवस परेड में नहीं शामिल हुआ ध्रुव

हालांकि, सेना दिवस परेड में ALH और रुद्र हेलीकॉप्टरों का शामिल न होना कई सवाल खड़े करता है। सेना दिवस परेड में चीता और चेतक हेलीकॉप्टरों ने हिस्सा लिया था। आर्मर्ड फोर्सेज ने हाल ही में इन हेलीकॉप्टरों की उड़ानों पर रोक लगा दी थी, क्योंकि 5 जनवरी को गुजरात के पोरबंदर में तटरक्षक बल का एक ALH ध्रुव दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। इस हादसे में दो पायलट और एक एयरक्रू गोताखोर की जान चली गई थी।

रिपब्लिक डे परेड में नहीं होंगे शामिल!

गणतंत्र दिवस के फ्लाईपास्ट में तीनों सेनाओं और तटरक्षक बल के हेलीकॉप्टर हिस्सा लेते हैं, लेकिन इस बार ध्रुव हेलीकॉप्टरों की भागीदारी को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। अधिकारियों के अनुसार, तटरक्षक बल के तीन ALH हेलीकॉप्टर फ्लाईपास्ट का हिस्सा बनने वाले थे, लेकिन हाल की दुर्घटनाओं के चलते इन्हें शामिल करने पर संशय है। ऐसी अटकलें हैं कि उनकी जगह अन्य हेलीकॉप्टर तैनात किए जा सकते हैं। फिलहाल, गणतंत्र दिवस पर ध्रुव हेलीकॉप्टरों के शामिल होने को लेकर किसी भी आधिकारिक बयान का इंतजार किया जा रहा है।

यह पहली बार नहीं है जब ध्रुव हेलीकॉप्टर पर सवाल उठे हैं। पिछले पांच वर्षों में ALH ध्रुव से जुड़ी 15 से अधिक दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। 2023 में ही कई बार इन हेलीकॉप्टरों की उड़ान रोककर गहन जांच की गई थी। हाल के हादसों ने एक बार फिर इनकी सुरक्षा और डिजाइन पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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हेलीकॉप्टर के मलबे को बेंगलुरु भेजा

पोरबंदर हादसे के बाद तटरक्षक बल और सेना ने अपने ALH बेड़े को अस्थायी रूप से ग्राउंड कर दिया है। इसके तहत सभी हेलीकॉप्टरों के ट्रांसमिशन सिस्टम, गियरबॉक्स और रोटर हब सहित अन्य उपकरणों की जांच की जा रही है। दुर्घटनाग्रस्त हेलीकॉप्टर के मलबे को बेंगलुरु ले जाया गया है, जहां HAL इसके ट्रांसमिशन सिस्टम, गियरबॉक्स और रोटर हब की गहन जांच कर रहा है। इस प्रक्रिया में दो सप्ताह तक का समय लग सकता है। विशेषज्ञ यह सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहे हैं कि भविष्य में ऐसी घटनाओं दोबारा न हों।

ALH ध्रुव, जिसे HAL द्वारा डिजाइन और विकसित किया गया है, भारत के रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का एक प्रमुख उदाहरण है। यह हेलीकॉप्टर भारतीय सेना, वायुसेना, नौसेना और तटरक्षक बल के अलावा सीमा सुरक्षा बल और अन्य नागरिक एजेंसियों द्वारा भी उपयोग में लिया जाता है। वर्तमान में तीनों सेनाओं और तटरक्षक बल के पास लगभग 330 ALH ध्रुव और 90 से अधिक रुद्र हेलीकॉप्टर हैं। इसके अलावा सीमा सुरक्षा बल और अन्य सिविल एजेंसियां भी एएलएच का उपयोग करती हैं। इस सभी हेलीकॉप्टरों को फिलहाल निरीक्षण और फ्लाइट सेफ्टी चेक के लिए खड़ा कर दिया गया है।

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हालांकि, इन हेलीकॉप्टरों के हाल में हुए हादसों से इनकी विश्वसनीयता को झटका मिला है। 2023 में, ALH बेड़े में इस्तेमाल होने वाले बूस्टर कंट्रोल रॉड्स की डिजाइन की समीक्षा की गई थी। ये रॉड्स हेलीकॉप्टर की उड़ान को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। HAL ने पुराने एल्युमिनियम रॉड्स को स्टील के नए रॉड्स से बदलने का काम किया था। इसके बावजूद हादसों का सिलसिला जारी रहा है।

पोरबंदर हादसे से पहले भी सितंबर 2024 में एक तटरक्षक बल यानी कोस्टगार्ड का एक ALH ध्रुव दुर्घटनाग्रस्त हुआ था। उस समय की गई जांच में कई सुरक्षा खामियां सामने आईं थीं। यह हादसा अरब सागर में हुआ था और इसमें भी तीन लोगों की मौत हो गई थी। उस घटना के बाद HAL ने मुख्य ड्राइव शाफ्ट, टेल रोटर असेंबली और अन्य उपकरणों की स्ट्रक्चरल सेफ्टी पर फोकस किया था।

सेना और HAL दोनों ने आश्वासन दिया है कि इस बार की जांच में सुरक्षा मानकों को और मजबूत किया जाएगा। जांच पूरी होने के बाद ही इन हेलीकॉप्टरों को दोबारा उड़ान भरने की अनुमति दी जाएगी। सेना का कहना है कि यह कदम सुरक्षा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

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हालांकि, इन सभी प्रयासों के बावजूद ALH ध्रुव और रुद्र हेलीकॉप्टर इस साल गणतंत्र दिवस परेड का हिस्सा बन पाएंगे या नहीं, इस पर अब भी संशय बना हुआ है। अधिकारियों के अनुसार, यदि जांच समय पर पूरी नहीं हुई तो इनकी जगह अन्य हेलीकॉप्टर तैनात किए जा सकते हैं।

ALH ध्रुव भारतीय सेना के लिए एक महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म है। यह कठिन से कठिन इलाकों में काम करने में सक्षम है और इसे भारतीय सेनाओं के “वर्कहॉर्स” के रूप में देखा जाता है। हालांकि, लगातार हो रही दुर्घटनाओं ने इसकी छवि पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

सेना प्रमुख ने कहा, “छोटी गड़बड़ियां”

सेना प्रमुख का कहना है कि दुनिया के अन्य हेलीकॉप्टरों के साथ भी हादसे होते हैं। उन्होंने इसे “छोटी गड़बड़ियां” बताया, जो किसी भी आधुनिक तकनीक के साथ हो सकती हैं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि ALH ध्रुव की बार-बार होने वाली दुर्घटनाओं का कारण इसके डिजाइन में कुछ मूलभूत खामियां हो सकती हैं, जिन्हें तुरंत सुधारने की जरूरत है।

सेना, वायुसेना और तटरक्षक बल द्वारा ALH हेलीकॉप्टरों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जा रहा है। ऐसे में इनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है। आगे की जांच और सुधारों से यह साफ होगा कि यह प्लेटफॉर्म भविष्य में कितनी विश्वसनीयता के साथ काम कर सकेगा।

Siachen 5G Network: सेना की ‘फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स’ ने रचा इतिहास, दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र सियाचिन में अब जवानों को मिलेगा 5जी इंटरनेट

Siachen 5G Network: Fire and Fury Corps Makes History, Brings 5G to the World’s Highest Battlefield

Siachen 5G Network: सियाचिन ग्लेशियर, जिसे दुनिया का सबसे ऊंचा युद्धक्षेत्र कहा जाता है, अब 5G कनेक्टिविटी से लैस हो गया है। रिलायंस जियो ने इस दुर्गम क्षेत्र में अपनी 4G और 5G सेवाएं शुरू कर एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। सेना दिवस के मौके पर इसका एलान किया गया।

Siachen 5G Network: Fire and Fury Corps Makes History, Brings 5G to the World’s Highest Battlefield

सियाचिन ग्लेशियर कराकोरम रेंज में 16,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है, और दुनिया के सबसे दुर्गम और चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में से एक है। यहां का तापमान -50°C तक गिर सकता है और बर्फीले तूफान आम बात हैं। इन कठोर परिस्थितियों में भी जियो ने 5G मोबाइल टॉवर स्थापित करके भारतीय सेना के जवानों को बेहतर कनेक्टिविटी उपलब्ध कराई है।

Siachen 5G Network: कैसे हुआ यह संभव?

रिलायंस जियो ने भारतीय सेना की ‘फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स’ के साथ मिलकर इस मुश्किल काम को अंजाम दिया है। सेना के फायर एंड फ्यूरी सिग्नलर्स और सियाचिन वारियर्स ने जियो की टीम के साथ मिलकर उत्तरी ग्लेशियर पर पहला 5G मोबाइल टॉवर स्थापित किया।

जियो के उपकरणों को कठिन इलाकों और ठंडे मौसम में एयरलिफ्ट कर फ्रंट पोस्ट तक पहुंचाया गया। सेना ने रसद प्रबंधन और उपकरणों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए इस चुनौतीपूर्ण कार्य को पूरा किया। जियो ने अपनी स्वदेशी फुल-स्टैक 5G टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया है। इसके तहत प्लग-एंड-प्ले प्री-कॉन्फिगर्ड उपकरणों को लगाया गया है, ताकि ग्लेशियर के कठिन वातावरण में भी यह बेहतर ढंग से काम कर सके।

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इस प्रोजेक्ट के तहत 5G मोबाइल टॉवर उत्तरी ग्लेशियर पर एक अग्रिम चौकी पर लगाया गया है। सेना और जियो की संयुक्त टीम ने अत्यधिक दुर्गम इलाके और बर्फीले मौसम के बावजूद इस टॉवर को सफलतापूर्वक स्थापित किया।

रिलायंस जियो ने इस उपलब्धि को टेलीकॉम उद्योग में एक नई ऊंचाई के रूप में बताया। रिलायंस जियो का दावा है कि वह सियाचिन ग्लेशियर में 4G और 5G सेवाएं देने वाला पहला टेलीकॉम ऑपरेटर है। कंपनी के एक बयान में कहा गया, “सियाचिन ग्लेशियर पर 5G सेवाएं शुरू करके जियो ने एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। यह न केवल तकनीकी प्रगति का प्रतीक है, बल्कि हमारी सेना के जवानों के प्रति सम्मान और समर्थन का भी एक उदाहरण है।”

रिलायंस जियो के एक अधिकारी ने कहा, “यह प्रोजेक्ट हमारे सैनिकों की वीरता और उनकी जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। यह कदम सियाचिन जैसे दुर्गम क्षेत्रों में सैनिकों की ऑपरेशनल क्षमताओं को बढ़ाएगा।”

इस पहल के जरिए जियो ने लेह-लद्दाख क्षेत्र में अपनी नेटवर्क पहुंच को और मजबूत किया है। कंपनी पहले ही इस क्षेत्र के सीमावर्ती इलाकों में 4G सेवाएं प्रदान कर रही थी।

सेना बोली- हमारे बहादुर सैनिकों को समर्पित

भारतीय सेना ने इस उपलब्धि को “अदम्य साहस और तकनीकी दक्षता” का प्रतीक बताया। सेना ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा, “यह उपलब्धि हमारे बहादुर सैनिकों को समर्पित है, जो कठिन और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में देश की रक्षा करते हैं। इतनी ऊंचाई पर टावर लगाना न केवल तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण था, बल्कि अत्यधिक कठोर मौसम में इसे पूरा करना भी साहसिक कार्य था।”

सैनिकों के लिए क्यों जरूरी है यह सेवा?

सियाचिन ग्लेशियर पर तैनात भारतीय सेना के जवान कठिन परिस्थितियों में देश की रक्षा करते हैं। बर्फीली हवाओं, अत्यधिक ठंड और दुर्गम इलाकों में सैनिकों को अक्सर डिजिटल कनेक्टिविटी की कमी का सामना करना पड़ता है।
वहीं, सैनिक अब अपनी यूनिट्स और मुख्यालय से लगातार संपर्क में रह सकेंगे। इसके अलावा रियल-टाइम डेटा ट्रांसफर और निगरानी और खुफिया जानकारी के आदान-प्रदान में आसानी होगी। साथ ही, सैनिकों को अपने परिवारों से जुड़े रहने का अवसर मिलेगा, जो उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होगा। इस नेटवर्क के जरिए सैनिकों को न केवल बेहतर संचार सुविधा मिलेगी, बल्कि आपातकालीन स्थितियों में मदद भी जल्दी मिलेगी।

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2024 के अंत तक 42 से ज्यादा लगाए टावर

सिर्फ सियाचिन ही नहीं, लद्दाख के अन्य दुर्गम क्षेत्रों में भी 4G नेटवर्क तेजी से फैल रहा है। भारतीय सेना की फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स ने भारती एयरटेल के साथ मिलकर 2024 के अंत तक 42 नए 4G टावर स्थापित किए थे। ये टावर कारगिल, देमचोक, दौलत बेग ओल्डी (DBO), गलवान और पैंगोंग झील जैसे सुदूरवर्ती क्षेत्रों में लगाए गए हैं। इससे पहले, नवंबर 2024 तक केवल 20 टावर ही लगाए गए थे। लेकिन सेना और एयरटेल के संयुक्त प्रयासों से इस संख्या को मात्र डेढ़ महीने में दोगुना कर दिया गया।

सियाचिन और लद्दाख में इन परियोजनाओं को सफल बनाने के पीछे भारतीय सेना का महत्वपूर्ण योगदान है। सेना ने इन दुर्गम इलाकों में रसद पहुंचाने, उपकरणों को एयरलिफ्ट करने और स्थानीय प्रशासन के साथ समन्वय करने में अग्रणी भूमिका निभाई। सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस परियोजना को “राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय विकास के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक” बताया। उन्होंने कहा कि लद्दाख जैसे कठिन इलाकों में डिजिटल कनेक्टिविटी केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। सीमावर्ती क्षेत्रों में संचार नेटवर्क मजबूत होने से भारतीय सेना की ऑपरेशनल क्षमता में बढ़ोतरी हुई है। इसके अलावा, यह दुश्मन के किसी भी दावे का स्पष्ट जवाब भी है कि ये क्षेत्र भारतीय संप्रभुता के अभिन्न अंग हैं।

उन्होंने बताया कि सैनिकों और स्थानीय नागरिकों दोनों के लिए यह परियोजना अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हो रही है। पहले जहां सैनिकों के लिए अपने परिवारों से संपर्क साधना एक बड़ी चुनौती थी, अब वे इन 4G और 5G सेवाओं की मदद से वीडियो कॉल और अन्य डिजिटल सुविधाओं का लाभ उठा सकते हैं। इसके अलावा, स्थानीय समुदाय, जो अब तक डिजिटल सुविधाओं से अछूते थे, अब शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और रोजगार के नए अवसरों से जुड़ रहे हैं।

Drishti-10 Drone: पोरबंदर के पास समुद्र में दुर्घटनाग्रस्त हुआ अडानी डिफेंस का बनाया ये खास ड्रोन, ‘मेक इन इंडिया’ पर उठ रहे सवाल

Drishti-10 Drone Crashes Near Porbandar, Raises Questions on 'Make in India'

Drishti-10 Drone: गुजरात के पोरबंदर के पास सोमवार को एक इजरायली मूल का भारी-भरकम मिलिट्री ड्रोन ‘दृष्टि-10’ (Drishti-10 Drone) ट्रायल के दौरान समुद्र में दुर्घटनाग्रस्त हो गया। यह ड्रोन भारत में अडानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस द्वारा इजरायली कंपनी एल्बिट सिस्टम्स के लाइसेंस के तहत तैयार किया गया था। सूत्रों ने बताया कि ड्रोन को पोरबंदर नेवल एयर एन्क्लेव से ऑपरेट किया जा रहा था। यह ड्रोन ट्रायल के अंतिम चरण में था और इसे अभी भारतीय नौसेना को सौंपा जाना बाकी था। हादसे के बाद ड्रोन को समुद्र से निकाल लिया गया है, और तकनीकी विशेषज्ञ दुर्घटना के कारणों की जांच कर रहे हैं।

Drishti-10 Drone Crashes Near Porbandar, Raises Questions on 'Make in India'

सूत्रों का कहना है कि चूंकि ड्रोन नौसेना को अभी तक आधिकारिक रूप से सौंपा नहीं गया था, इसलिए इस दुर्घटना से नौसेना पर कोई फाइनेंशियल घाटा नहीं हुआ है।

क्या है Drishti-10 Drone की खूबी

दृष्टि-10 ड्रोन इजरायली हर्मीस 900 स्टारलाइनर पर आधारित है और इसे भारतीय सशस्त्र बलों के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन किया गया है। यह ड्रोन लंबी दूरी की खुफिया जानकारी, निगरानी, और लक्ष्यों की पहचान जैसे महत्वपूर्ण मिशनों के लिए तैयार किया गया है। दृष्टि-10 की सबसे बड़ी खासियत इसकी लंबी उड़ान क्षमता है। यह ड्रोन 36 घंटे तक लगातार उड़ान भर सकता है, जिससे यह सीमा पर लंबे समय तक निगरानी और गश्त कर सकता है। इसके अलावा, यह 30,000 फीट की ऊंचाई तक उड़ सकता है, जिसके चलते यह ज्यादा ऊंचाई वाले इलाकों में भी बखूबी काम करता है।

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इस ड्रोन की पेलोड क्षमता 450 किलोग्राम तक है, और इस पर हथियार और उपकरण लादे जा सकते हैं। यह सैटकॉम तकनीक से लैस है, ताकि दूरदराज वाले इलाकों में भी यह काम कर सकता है। इसमें इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इंफ्रारेड सेंसर लगे हैं, जिससे यह दिन और रात दोनों समय प्रभावी ढंग से काम कर सकता है।

2023 में, भारतीय सेना और नौसेना ने आपातकालीन खरीद प्रावधानों के तहत ऐसे दो-दो ड्रोन का ऑर्डर दिया था। इनमें से पहला ड्रोन जनवरी 2023 में नौसेना को सौंपा गया था, जबकि दूसरा ड्रोन जून में सेना को डिलीवर किया गया।
सोमवार को दुर्घटनाग्रस्त हुआ ड्रोन नौसेना को दिया जाना था।

भारतीय सेनाओं को वर्तमान में लगभग 150 नए मध्यम ऊंचाई और लंबी उड़ान क्षमता वाले ड्रोन (MALE) की आवश्यकता है। ये ड्रोन इजरायली सर्चर और हेरोन मार्क-1 और मार्क-2 जैसे ड्रोन की जगह लेंगे, जो लंबे समय से भारतीय सेनाओं द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे हैं।

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अमेरिकी MQ-9B प्रीडेटर की खरीद

भारत ने अक्टूबर 2024 में अमेरिका के साथ 31 एडवांस MQ-9B प्रीडेटर ड्रोन की खरीद के लिए 32,350 करोड़ रुपये के एक ऐतिहासिक अनुबंध पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते को भारतीय सेनाओं की क्षमताओं को मजबूत करने और आधुनिक तकनीक से लैस करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा था।

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समझौते के तहत, भारतीय नौसेना को 15 MQ-9B सी गार्जियन ड्रोन मिलेंगे, जो समुद्री निगरानी और सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। इसके अलावा, भारतीय सेना और वायुसेना को 8-8 स्काई गार्जियन ड्रोन सौंपे जाएंगे। ये ड्रोन एडवांस सेंसर, हेलफायर मिसाइल, और GBU-39B प्रिसिजन गाइडेड ग्लाइड बम जैसे अत्याधुनिक हथियारों से लैस होंगे।

MQ-9B प्रीडेटर ड्रोन को ज्यादा ऊंचाई और लंबी दूरी की उड़ान के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह 30 घंटे से अधिक समय तक संचालन करने और खतरों का सटीकता से पता लगाने में सक्षम है। इस समझौते से भारत की समुद्री और हवाई सुरक्षा को नई मजबूती मिलेगी और देश की सैन्य शक्ति को एक नई दिशा मिलेगी।

सी गार्डियन ड्रोन हो चुका है दुर्घटनाग्रस्त

हाालंकि ऐसा नहीं है कि केवल दृष्टि-10 के साथ ही दुर्घटनाग्रस्त हुआ है। इससे पहले पिछले साल चेन्नई के पास बंगाल की खाड़ी में एक सी गार्डियन ड्रोन दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। यह ड्रोन अमेरिकी कंपनी जनरल एटॉमिक्स से भारतीय नौसेना ने लीज पर लिया था और अरक्कोणम स्थित नौसेना के वायु स्टेशन आईएनएस राजाली से ऑपरेट हो रहा था। 2020 में, नौसेना ने एक साल की अवधि के लिए दो MQ-9B सी गार्डियन ड्रोन लीज पर लिए थे।

Frontline Naval Ships: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुंबई में INS सूरत, INS नीलगिरी और INS वाघशीर को राष्ट्र को किया समर्पित

PM Modi Dedicates INS Surat, INS Nilgiri, and INS Vaghsheer to the Nation in Mumbai

Frontline Naval Ships: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 जनवरी 2025 को मुंबई के नेवल डॉकयार्ड में आयोजित एक भव्य समारोह में भारतीय नौसेना के तीन प्रमुख युद्धपोत – INS सूरत, INS नीलगिरी, और INS वाघशीर – को राष्ट्र को समर्पित किए। इस मौके पर प्रधानमंत्री ने भारतीय सशस्त्र बलों की वीरता को सलाम करते हुए कहा कि यह दिन भारत के समृद्ध समुद्री इतिहास और आत्मनिर्भर भारत अभियान के लिए मील का पत्थर साबित होगा।

PM Modi Dedicates INS Surat, INS Nilgiri, and INS Vaghsheer to the Nation in Mumbai

प्रधानमंत्री मोदी ने इस कार्यक्रम को भारतीय नौसेना की अद्भुत क्षमताओं और भारत की बढ़ती समुद्री ताकत का प्रतीक बताया। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि पहली बार एक विध्वंसक (डिस्ट्रॉयर), एक फ्रिगेट, और एक पनडुब्बी को एक साथ कमीशन किया गया है।

प्रधानमंत्री ने नौसेना की सराहना करते हुए कहा कि यह तीनों युद्धपोत मेक इन इंडिया के तहत निर्मित किए गए हैं, जो भारत की आत्मनिर्भरता और रक्षा क्षेत्र में बढ़ते कौशल का प्रमाण है। उन्होंने इस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए भारतीय नौसेना और निर्माण में शामिल सभी स्टेकहोल्डर्स को बधाई दी।

प्रधानमंत्री ने कार्यक्रम में कहा, “आज का कार्यक्रम हमारे गौरवशाली अतीत और उज्ज्वल भविष्य को जोड़ने का प्रतीक है। भारत का समुद्री इतिहास अत्यंत समृद्ध रहा है, और आज का यह अवसर उसी परंपरा को आगे बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।”

PM Modi Dedicates INS Surat, INS Nilgiri, and INS Vaghsheer to the Nation in Mumbai

Frontline Naval Ships:  INS सूरत, INS नीलगिरी और INS वाघशीर की खूबियां

INS सूरत प्रोजेक्ट 15बी के तहत निर्मित चौथा और अंतिम गाइडेड मिसाइल विध्वंसक है। इसे दुनिया के सबसे उन्नत विध्वंसकों में से एक माना जाता है। यह 75% स्वदेशी सामग्री से निर्मित है और अत्याधुनिक हथियारों और सेंसर सिस्टम से सुसज्जित है।

INS नीलगिरी, प्रोजेक्ट 17ए के तहत निर्मित पहला स्टील्थ फ्रिगेट, भारतीय नौसेना के वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो द्वारा डिजाइन किया गया है। इसमें उच्च स्तरीय स्टील्थ, समुद्री रक्षा और लंबे समय तक समुद्री परिचालन की क्षमता है।

INS वाघशीर, प्रोजेक्ट 75 स्कॉर्पीन पनडुब्बी परियोजना का छठा और अंतिम मॉडल है। इसे फ्रांस के नेवल ग्रुप के सहयोग से बनाया गया है। यह पनडुब्बी आधुनिक तकनीकों और गुप्त संचालन क्षमताओं से लैस है।

भारत की समुद्री शक्ति का बढ़ता प्रभाव

प्रधानमंत्री ने भारत की बढ़ती समुद्री ताकत पर जोर देते हुए कहा कि आज भारत को ग्लोबल साउथ में एक भरोसेमंद और जिम्मेदार भागीदार के रूप में देखा जा रहा है। उन्होंने कहा कि भारत हमेशा से खुले, सुरक्षित, समावेशी और समृद्ध इंडो-पैसिफिक क्षेत्र का समर्थक रहा है।

PM Modi Dedicates INS Surat, INS Nilgiri, and INS Vaghsheer to the Nation in Mumbai

उन्होंने SAGAR (Security And Growth for All in the Region) के विजन का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत तटीय देशों के विकास के लिए प्रतिबद्ध है। साथ ही, उन्होंने भारतीय नौसेना के कार्यों की सराहना की, जिसने हाल ही में भारतीय महासागर क्षेत्र में कई मानवीय मिशनों और आपदा राहत कार्यों को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है।

प्रधानमंत्री ने कहा, “भारत आज केवल अपनी रक्षा के लिए नहीं, बल्कि समुद्री व्यापार, आपूर्ति श्रृंखलाओं और ऊर्जा सुरक्षा के लिए भी समर्पित है। हमारी नौसेना ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय का विश्वास अर्जित किया है, और आज का यह कार्यक्रम इस विश्वास को और मजबूत करेगा।”

मेक इन इंडिया का असर

प्रधानमंत्री ने आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत रक्षा क्षेत्र में हो रहे सुधारों और उपलब्धियों का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि भारत ने हाल ही में 1.25 लाख करोड़ रुपये का रक्षा उत्पादन किया है और 100 से अधिक देशों को रक्षा उपकरण निर्यात कर रहा है।

उन्होंने कहा कि भारतीय नौसेना ने पिछले एक दशक में 33 जहाजों और सात पनडुब्बियों को अपने बेड़े में शामिल किया है, जिनमें से 39 जहाज भारतीय शिपयार्ड में निर्मित हुए हैं। उन्होंने INS विक्रांत और INS अरिघात जैसे उदाहरणों का उल्लेख करते हुए कहा कि यह स्वदेशी निर्माण भारत की तकनीकी दक्षता और क्षमता को दर्शाता है।

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प्रधानमंत्री ने कहा, “मेक इन इंडिया पहल न केवल भारतीय सशस्त्र बलों की क्षमताओं को बढ़ा रही है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी नई ऊंचाइयों तक ले जा रही है।”

उन्होंने भारतीय नौसेना के शिपबिल्डिंग पारिस्थितिकी तंत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि देश में वर्तमान में 60 बड़े जहाज निर्माणाधीन हैं, जिनकी अनुमानित लागत ₹1.5 लाख करोड़ है।

PM Modi Dedicates INS Surat, INS Nilgiri, and INS Vaghsheer to the Nation in Mumbai

समुद्री व्यापार और आर्थिक सहयोग पर जोर

प्रधानमंत्री मोदी ने भारत के तेजी से बढ़ते समुद्री व्यापार और आर्थिक सहयोग पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि भारतीय महासागर क्षेत्र में 95% व्यापारिक गतिविधियां होती हैं, जिससे इस क्षेत्र में एक मजबूत भारतीय नौसेना की जरूरत और बढ़ जाती है।

उन्होंने कहा कि वधावन पोर्ट जैसे बड़े परियोजनाओं से न केवल समुद्री व्यापार को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि हजारों रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे।

इस कार्यक्रम में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि INS सूरत, INS नीलगिरी और INS वाघशीर की कमीशनिंग केवल नौसेना की ताकत नहीं, बल्कि पूरे देश की ताकत का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि भारतीय नौसेना को आधुनिक और स्वदेशी तकनीकों से लैस करना सरकार की प्राथमिकता है।

इस मौके पर महाराष्ट्र के राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और कई अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। रक्षा क्षेत्र में भारत की प्रगति को देखते हुए, यह कार्यक्रम भारतीय सैन्य इतिहास में एक महत्वपूर्ण दिन के रूप में दर्ज हो गया।

Robotic Mules: सेना दिवस परेड के बाद अब रिपब्लिक डे परेड में कर्तव्य पथ पर सेना के जवानों संग कदमताल करते दिखेंगे ये रोबोटिक खच्चर

Robotic Mules: Can They Replace the Emotional Bond Veterans Shared with Army Mules?

Robotic Mules: 77वें सेना दिवस परेड में भारतीय सेना के ‘रोबोटिक खच्चरों’ (Robotic Mules) ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा। बुधवार को पुणे में आयोजित इस परेड में इन अत्याधुनिक तकनीकी उपकरणों ने अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन किया। यह मशीनी खच्चर न केवल सेना के ऑपरेशंस को मजबूती देंगी, बल्कि भारतीय सेना के भविष्य में तकनीकी क्रांति का प्रतीक भी बनेंगे। इन रोबोटिक खच्चरों को भारत-चीन सीमा एलएसी पर भी तैनात किया गया है।

Robotic Mules: Set to Dazzle at Republic Day Parade After Army Day Debut

ये रोबोटिक खच्चर दरअसल अनमैन्ड ग्राउंड व्हीकल्स (UGVs) हैं। इन्हें इस साल गणतंत्र दिवस परेड में भी दिल्ली के कर्तव्य पथ पर प्रदर्शित किया जाएगा, जहां आम जनता इनकी क्षमताओं को नज़दीक से देख सकेगी।

भारतीय सेना ने पिछले साल 100 रोबोटिक खच्चरों को शामिल किया था, जिनका उद्देश्य ऊंचाई वाले इलाकों और चुनौतीपूर्ण भूभाग में रसद और निगरानी क्षमताओं को बढ़ाना है। इन्हें खासतौर पर उन इलाकों के लिए डिज़ाइन किया गया है, कठोर जहां मौसम और दुर्गम रास्तों के चलते आम उपकरणों के इस्तेमाल में दिक्कत होती है।

Robotic Mules की खूबियां

  • ये रोबोटिक खच्चर -40°C से +55°C तक के तापमान में भी काम कर सकते हैं।
  • ये खड़ी ढलानों और सीढ़ियों पर चढ़ने में सक्षम हैं।
  • प्रत्येक खच्चर 15 किलोग्राम तक का पेलोड ले जा सकता है, जिसमें हथियार भी शामिल हैं।
  • इलेक्ट्रो-ऑप्टिक्स और इंफ्रारेड सेंसर से लैस, ये खच्चर आसपास की वस्तुओं और खतरों की पहचान कर सकते हैं।
  • युद्ध के दौरान घायल सैनिकों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने में ये म्यूल्स मदद कर सकते हैं।

2020 में गलवान घाटी में भारत-चीन सीमा विवाद के बाद भारतीय सेना ने अपनी ऑपरेशनल क्षमताओं को बढ़ाने के लिए तकनीकी सुधारों पर जोर दिया। सेना का लक्ष्य 2030 तक पशु परिवहन पर निर्भरता को 50-60% तक कम करना है। इन रोबोटिक खच्चरों का उपयोग इसी लक्ष्य को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

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रोबोटिक खच्चरों के निर्माता एयरोएआरसी के सीईओ अर्जुन अग्रवाल ने बताया, “ये म्यूल्स तीन साल तक बिना बड़ी मरम्मत के काम कर सकते हैं। ये खच्चर सभी प्रकार की बाधाओं को पार कर सकते हैं। यह पानी में जा सकते हैं, नदियों को पार कर सकते हैं, और 3D मैपिंग करने के लिए कैमरे और अन्य उपकरण ले जाने में सक्षम हैं।”

वहीं, जब दुश्मन की घुसपैठ होती है, तो यह खच्चर खतरे की पहचान करता है और कमांडर को जानकारी देता है। इससे जोखिम कम होता है और त्वरित कार्रवाई की जा सकती है।

खास बात यह है कि ये रोबोटिक म्यूल्स आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तकनीक से लैस हैं। ये ऑटोमैटिकली तौर पर काम कर सकते हैं और कमांड के आधार पर अपने आप निर्णय लेने में सक्षम हैं।

जहां भारतीय सेना रोबोटिक खच्चरों को अपनी क्षमताओं में शामिल कर रही है, वहीं चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) पहले से ही रोबोटिक कुत्तों का उपयोग कर रही है। यह दिखाता है कि भविष्य के युद्ध संचालन में तकनीकी उपकरण कितने महत्वपूर्ण होंने वाले हैं।

2030 तक का लक्ष्य

भारतीय सेना का उद्देश्य अपने ऑपरेशंस में स्वदेशी तकनीक और उपकरणों का उपयोग बढ़ाना है। ये रोबोटिक खच्चर न केवल दुर्गम इलाकों में सैनिकों का साथ देंगे, बल्कि सेना की रसद और निगरानी क्षमताओं को भी बेहतर बनाएंगे।

Dhruv choppers: सेना दिवस परेड में स्वदेशी ALH ध्रुव और रूद्र ने नहीं भरी उड़ान, रिपब्लिक डे पर भी फ्लाईपास्ट से हो सकते हैं बाहर

HAL on Dhruv ALH glitch Issued Statement army fleet check

Dhruv choppers: 26 जनवरी को होने वाले गणतंत्र दिवस समारोह में स्वदेशी एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर (एएलएच) और इसके आर्मर्ड वर्जन रुद्र के हिस्सा लेने पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। हाल ही में 5 जनवरी को गुजरात के पोरबंदर में तटरक्षक बल का एक एएलएच दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसके बाद सेना और अन्य बलों ने जांच पूरी होने तक अपने पूरे एएलएच बेड़े की उड़ान पर रोक लगा दी थी।

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इस दुर्घटना में दो पायलट और एक एयरक्रू गोताखोर की मौत हो गई थी, जिसके बाद इन हेलीकॉप्टरों की फ्लाइंग सेफ्टी को लेकर गंभीर सवाल उठे थे। अधिकारियों के अनुसार, दुर्घटना के कारणों की जांच जारी है, और विस्तृत विश्लेषण के लिए दुर्घटनाग्रस्त हेलीकॉप्टर के मलबे को बेंगलुरु स्थित हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के पास भेजा जा रहा है।

Dhruv Choppers: सेना दिवस परेड में नहीं दिखा ALH

एएलएच हेलीकॉप्टर बुधवार को पुणे में आयोजित हुई सेना दिवस परेड में भी शामिल नहीं हुए। सेना दिवस परेड गणतंत्र दिवस की तरह ही एक भव्य औपचारिक समारोह है। इसमें चेतक और चीता हेलीकॉप्टरों ने भी हिस्सा लिया, लेकिन एएलएच गायब दिखा। इस समारोह में सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी मौजूद थे।

तीनों सेनाओं और तटरक्षक बल के पास कुल मिलाकर लगभग 330 एएलएच हैं, जबकि सेना और वायुसेना के पास 90 से अधिक रुद्र हेलीकॉप्टर हैं। जबकि कोस्ट गार्ड के पास 19 हेलीकॉप्टर हैं। सीमा सुरक्षा बल और अन्य सिविल एजेंसियां भी एएलएच का उपयोग करती हैं। इस सभी हेलीकॉप्टरों को फिलहाल निरीक्षण और फ्लाइट सेफ्टी चेक के लिए खड़ा कर दिया गया है।

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पिछले पांच सालों में एएलएच से जुड़ी करीब 15 दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। हाल ही में सितंबर 2024 में पोरबंदर के पास एक और तटरक्षक हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हुआ था, जिसमें तीन लोगों की मौत हो गई थी। उस घटना के बाद तटरक्षक बल ने अपने पूरे बेड़े की जांच की थी।

उस समय जांच का फोकस मुख्य ड्राइव शाफ्ट, टेल रोटर असेंबली और अन्य महत्वपूर्ण उपकरणों की स्ट्रक्चरल सेफ्टी पर था। सेना ने 2023 में भी अपने ध्रुव हेलीकॉप्टरों को भी रोककर व्यापक जांच की थी, जिसमें बूस्टर कंट्रोल रॉड्स की डिजाइन की भी समीक्षा की गई थी।

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2023 में एएलएच हेलीकॉप्टरों के कमियों को दूर करने और उनमें सुधार के लिए एचएएल ने बड़ी पहल की थी। सभी एएलएच हेलीकॉप्टरों पर पुराने एल्युमिनियम बूस्टर कंट्रोल रॉड्स को स्टील रॉड्स से बदल दिया गया था। ये रॉड्स हेलीकॉप्टर की स्पीड को कंट्रोल करने में पायलटों की मदद करते हैं। रॉड्स की विफलता गंभीर दुर्घटनाओं का कारण बन सकती है।

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बेंगलुरु स्थित सेंटर फॉर मिलिट्री एयरवर्थनेस एंड सर्टिफिकेशन (CEMILAC) ने अप्रैल 2023 में एएलएच हेलीकॉप्टरों की डिजाइन समीक्षा का आदेश दिया था। इसके तहत बूस्टर कंट्रोल रॉड्स की मजबूती बढ़ाने के लिए सुधार किए गए।

पोरबंदर दुर्घटना के बाद एचएएल ने हेलीकॉप्टर के ट्रांसमिशन सिस्टम, गियरबॉक्स, और रोटर हब सहित अन्य उपकरणों की व्यापक जांच शुरू की है। इसमें दो सप्ताह से अधिक समय लग सकता है। यदि कोई समस्या पाई जाती है, तो सुधारात्मक कदम उठाने में अतिरिक्त समय लग सकता है।

गणतंत्र दिवस फ्लाईपास्ट में में तीनों सेनाओं और तटरक्षक बल के हेलीकॉप्टर हिस्सा लेते हैं, लेकिन इस बार इस पर असर पड़ सकता है। फिलहाल, गणतंत्र दिवस परेड में ध्रुव हेलीकॉप्टरों के हिस्सा लेने को लेकर सभी ने चुप्पी साध रखी है। कहा जा रहा है कि उनकी जगह अन्य हेलीकॉप्टर तैनात किए जा सकते हैं। अधिकारियों ने बताया कि इस साल गणतंत्र दिवस के फ्लाईपास्ट में तीनों सेनाओं के हेलिकॉप्टरों के साथ तीन तट रक्षक ALH को भी हिस्सा लेना था।

एएलएच हेलीकॉप्टर को बेंगलुरु स्थित हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) ने डिजाइन किया है। लेकिन हाल की घटनाओं ने इसकी उड़ान सुरक्षा पर सवाल खड़े किए हैं। सेना प्रमुख ने कहा है कि एविएशन सिक्योरिटी सर्वोच्च प्राथमिकता है। जब तक सभी जांच पूरी नहीं हो जातीं, तब तक इन हेलीकॉप्टरों की उड़ान पर रोक बनी रहेगी।

Explainer: क्या है आर्मी की ‘भारत रणभूमि दर्शन’ योजना? अब आम लोग भी जा सकेंगे सियाचिन, गलवान और डोकलाम, सेना देगी शौर्य पत्र

Explainer: What is the Army's 'Bharat Ranbhoomi Darshan' Initiative? Tourists to Visit Siachen, Galwan, and Doklam

Explainer Bharat Ranbhoomi Darshan: भारतीय सेना ने एक नई और अनोखी योजना शुरू करने का ऐलान किया है, जिसे ‘भारत रणभूमि दर्शन’ (Bharat RannBhoomi Darshan) नाम दिया गया है। इस पहल का उद्देश्य आम नागरिकों को उन ऐतिहासिक रणभूमियों तक पहुँचने का अवसर देना है, जहाँ भारतीय सैनिकों ने अपनी वीरता और बलिदान की मिसाल पेश की है। इस योजना की शुरुआत 15 जनवरी को आर्मी डे के अवसर पर होगी। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह इस दिन एक विशेष वेबसाइट लॉन्च करेंगे, जो इस योजना से जुड़ी जानकारी और बुकिंग सेवाएँ प्रदान करेगी।

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जा सकेंगे गलवान घाटी, डोकलाम

‘भारत रणभूमि दर्शन’ (Bharat RannBhoomi Darshan) योजना के तहत, आम लोग अब गलवान घाटी, डोकलाम, सियाचिन बेस कैंप, लिपुलेख दर्रा, बूमला और किबितु जैसे ऐतिहासिक और सामरिक महत्व वाले स्थलों की यात्रा कर सकेंगे। इन स्थानों को शौर्य गंतव्य के रूप में विकसित किया गया है। सेना का कहना है कि इन स्थलों पर जाकर टूरिस्ट न केवल इन इलाकों की भौगोलिक कठिनाइयों को समझ पाएंगे, बल्कि उन घटनाओं से भी रूबरू होंगे, जिनमें भारतीय जवानों ने अदम्य साहस दिखाया।

दिए जाएंगे शौर्य पत्र 

इस योजना के तहत टूरिस्टों को उनकी यात्राओं के आधार पर शौर्य पत्र प्रदान किए जाएंगे। ये पत्र तीन श्रेणियों में दिए जाएंगे: सिल्वर, गोल्ड और प्लैटिनम। इन पत्रों को इस आधार पर दिया जाएगा कि टूरिस्ट ने कितने शौर्य स्थलों का दौरा किया है। इससे लोगों को अधिक से अधिक स्थलों पर जाने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा और सेना के बलिदान को नज़दीक से जानने का मौका मिलेगा।

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योजना के तहत गलवान और डोकलाम जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को भी शामिल किया गया है। गलवान घाटी, जहां 2020 में भारतीय सेना ने चीनी सैनिकों के साथ बहादुरी से सामना किया था, और डोकलाम, जहां 2017 में भारतीय जवानों ने चीन की हरकतों का मुंहतोड़ जवाब दिया था, इन क्षेत्रों में अब टूरिस्टों को जाने की अनुमति दी जाएगी। इन स्थलों को देखने के दौरान टूरिस्टों को गाइडेड टूर की सुविधा दी जाएगी, जहां उन्हें इन इलाकों के ऐतिहासिक और सामरिक महत्व के बारे में विस्तार से जानकारी मिलेगी।

भारत के गौरवशाली अतीत का अनुभव कर सकेंगे लोग

सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने रक्षा समाचार डॉट कॉम के साथ खास बातचीत में इस योजना को सीमावर्ती इलाकों के विकास के लिए एक अहम कदम बताया। उन्होंने कहा कि इस पहल से न केवल इन क्षेत्रों में पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि स्थानीय समुदायों को भी आर्थिक लाभ होगा। उनका कहना है कि जब सीमावर्ती इलाकों में टूरिस्टों की आवाजाही बढ़ती है और आर्थिक गतिविधियां मजबूत होती हैं, तो यह दुश्मन के उन दावों को कमजोर करता है जो वे इन क्षेत्रों पर करते हैं। सेना प्रमुख ने बताया कि ‘भारत रणभूमि दर्शन’ के माध्यम से देशवासी भारत के गौरवशाली अतीत का अनुभव कर सकेंगे।

इन ऐतिहासिक युद्धक्षेत्रों पर कदम रखते ही आप अदम्य साहस और बलिदान की कहानियों से जुड़ेंगे। ये पवित्र स्थल भारत की सैन्य विरासत का प्रतीक हैं, जो आपको इतिहास को फिर से जीने और हमारे नायकों का सम्मान करने का अवसर देते हैं।

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पिछले कुछ वर्षों में भारतीय सेना और सरकार ने सीमावर्ती इलाकों के विकास के लिए कई परियोजनाएं शुरू की हैं, जिनमें वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम भी शामिल है। इन योजनाओं का उद्देश्य सीमाओं पर भारत की उपस्थिति को मज़बूत करना है। ‘भारत रणभूमि दर्शन’ योजना उसी कड़ी का हिस्सा है।

इस योजना का एक और उद्देश्य युवाओं और आम नागरिकों को भारतीय सेना के बलिदान और वीरता से जोड़ना है। सेना का मानना है कि जब लोग इन स्थलों पर जाएँगे, तो वे न केवल देशभक्ति की भावना से भर जाएँगे, बल्कि भारतीय सेना के इतिहास और उनके द्वारा किए गए बलिदान को गहराई से समझ पाएँगे।

यह है वेबसाइट

योजना को लागू करने के लिए भारतीय सेना ने एक डेडिकेटेड वेबसाइट (www.bharatrannbhoomidarshan.gov.in) तैयार की है, जहां टूरिस्ट अपनी यात्रा की योजना बना सकेंगे। वेबसाइट के माध्यम से टूरिस्टों को सभी आवश्यक जानकारी, मार्गदर्शन और बुकिंग की सुविधा दी जाएगी। इसके अलावा, इन क्षेत्रों में स्थानीय गाइड और इंफ्रास्ट्रक्चर को भी विकसित किया जा रहा है, ताकि टूरिस्टों को सुरक्षित और यादगार अनुभव मिल सके।

भारतीय सेना की यह पहल न केवल सीमावर्ती क्षेत्रों में विकास लाने का एक साधन है, बल्कि यह देशवासियों को अपनी सेना के बलिदान के प्रति जागरूक करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास भी है। इस योजना से इन क्षेत्रों में पर्यटन और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा, जो भारत की सीमाओं को और मजबूत बनाएगा।

Explainer Integrated battle Groups: क्या है इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप? ब्यूरोक्रेसी से परेशान सेना प्रमुख ने क्यों दी पूरा IBG प्रोजेक्ट कैंसिल करने की धमकी!

Explainer: What Are Integrated Battle Groups and Why Is the Army Chief Considering Cancelling the IBG Project?

Explainer Integrated battle Groups: भारतीय सेना के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप (IBG) पर अंतिम फैसला जल्द ही लिया जा सकता है। सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा है कि यह प्रोजेक्ट 2025 तक लागू होगा या इसे रद्द कर दिया जाएगा। सेना की इस नई रणनीति का उद्देश्य युद्ध के दौरान तेज़ और प्रभावी कार्रवाई को सुनिश्चित करना है।

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आर्मी डे की प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान एक सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि इस विषय पर रक्षा मंत्रालय में सभी संबंधित अधिकारियों को प्रजेंटेशन दिया जा चुका है। हालांकि, उनकी तरफ से कुछ सवाल और सुझाव आए हैं, जिन पर विचार किया जा रहा है। जनरल द्विवेदी ने सीधे-सीधे उत्तर देते हुए कहा, “आईबीजी कब तक तैयार होगी, इसकी सटीक टाइमलाइन देना मुश्किल है क्योंकि ब्यूरोक्रेसी इनवॉल्व होती है, ऐसे मामलों में समय लगता है।” उन्होंने यह भी कहा कि यह परियोजना या तो इसी साल पूरी हो जाएगी, या फिर इसे पूरी तरह खत्म कर दिया जाएगा।

कुछ महीने पहले, सेना ने आईबीजी के निर्माण के लिए सरकारी स्वीकृति पत्र (जीएसएल) का मसौदा प्रस्तुत किया था, जिसका उद्देश्य सीमाओं पर युद्ध क्षमताओं को बढ़ाना है।

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Explainer Integrated battle Groups: क्या है IBG? 

भारतीय सेना आधुनिक युद्धक्षेत्र की चुनौतियों से निपटने के लिए इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप्स (IBG) स्ट्रेटेजिक फॉर्मेशन पर काम कर रही है। IBG को सेना की पारंपरिक संरचनाओं से अलग, छोटे, चुस्त और आत्मनिर्भर फाइटर युनिट के तौर में विकसित किया जा रहा है। सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने IBG की अवधारणा पर बात करते हुए कहा, “हर IBG आत्मनिर्भर होगा, जिसमें इलाके और ऑपरेशनल जरूरतों के अनुसार सभी जरूरी सैन्य शाखाओं और सेवाओं का संयोजन होगा।”

IBG को छोटे और फ्लेक्सिबल फॉर्मेशन के तौर पर डिजाइन किया गया है, जो किसी भी खतरे का सामना करने के लिए तेजी से प्रतिक्रिया दे सके। प्रत्येक IBG में पैदल सेना, तोपखाना, बख्तरबंद इकाइयां, इंजीनियर, सिग्नल और एयर डिफेंस जैसी ब्रांचों को भी शामिल किया जाएगा। IBG का नेतृत्व मेजर-जनरल रैंक के अधिकारी द्वारा किए जाने की उम्मीद है। प्रत्येक आईबीजी में लगभग 5,000 कर्मियों की सैन्य ताकत होगी, जो एक ब्रिगेड (3,000-3,500 सैनिक) से बड़ी होगी, लेकिन एक डिवीजन (10,000-12,000 सैनिक) से छोटी होगी। यह फॉर्मेशन IBG को 12 से 48 घंटों के भीतर युद्ध के लिए तैयार होने में सक्षम बनाएगी।

IBG की प्रारंभिक योजना के तहत दो युनिट बनाई जाएंगी। पहली IBG को 9 कोर के तहत पाकिस्तान के साथ लगी पश्चिमी सीमा पर तैनात किया जाएगा, जबकि दूसरी IBG को 17 स्ट्राइक कोर के तहत चीन के साथ उत्तरी सीमा पर चुनौतीपूर्ण इलाकों में तैनात किया जाएगा। यह युनिट्स दुश्मन की हरकतों का तेजी से जवाब देने और सीमाओं पर भारतीय सेना की ताकत को और मजबूत बनाने के लिए तैयार की जा रही हैं।

छोटे और चुस्त फॉर्मेशन से दुश्मन को देंगे मात

IBG के जरिए सेना की पारंपरिक संरचना में बदलाव लाने का लक्ष्य है। IBG छोटे और चुस्त फॉर्मेशन के जरिए दुश्मन के खिलाफ तेज़ी से हमले करने में सक्षम होगी। यह तकनीकी रूप से एडवांस और आधुनिक युद्धक्षेत्र की जरूरतों के अनुकूल होगी। IBG बड़ी सैन्य संरचनाओं के धीमे और बोझिल तरीकों को बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

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सेना प्रमुख जनरल द्विवेदी ने कहा कि IBG की अवधारणा पर काम लगभग पूरा हो चुका है। “हमने इस प्रोजेक्ट पर रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों को प्रजेंटेशन दे दिया है। हालांकि, उनके कुछ सवाल थे जिन पर विचार किया जा रहा है।” उन्होंने यह भी कहा कि IBG कब तक तैयार होगी, इसकी सटीक समयसीमा देना मुश्किल है। “जहां ब्यूरोक्रेसी शामिल होती है, वहां थोड़ा वक्त लगता है। लेकिन हमें उम्मीद है कि 2025 तक यह प्रोजेक्ट सफलतापूर्वक लागू हो जाएगा। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो इसे रद्द करने का भी फैसला भी लिया जा सकता है।”

‘हिमविजय’ सैन्य अभ्यास से मिली थी प्रेरणा

IBG के कॉन्सेप्ट को अक्तूबर 2019 में भारतीय सेना की उत्तरी थिएटर कमांड द्वारा किए गए ‘हिमविजय’ सैन्य अभ्यास के बाद लागू करने की योजना बनाई गई। इस अभ्यास में पहाड़ी इलाकों में सेना की तेज़ और प्रभावी प्रतिक्रिया की क्षमता का परीक्षण किया गया था। हिमालयी क्षेत्र जैसे चुनौतीपूर्ण इलाकों में IBG को विशेष रूप से उपयुक्त माना जा रहा है। 2019 में हुए ‘हिमविजय’ नामक अभूतपूर्व और नए सैन्य अभ्यास से सीखे गए सबक शामिल किए गए हैं।

भारतीय सेना की यह पहल आधुनिक युद्ध की जरूरतों को पूरा करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। IBG की तैनाती से सीमाओं पर भारत की सैन्य शक्ति और संचालन क्षमता को एक नई दिशा मिलेगी। हालांकि, इसके क्रियान्वयन के लिए वित्तीय और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को पूरा करना अभी बाकी है। सेना को उम्मीद है कि IBG 2025 तक भारतीय रक्षा रणनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव लाएगा।

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नई जगह पर पेंटिंग

1971 surrender painting row: 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में पाकिस्तान के आत्मसमर्पण की ऐतिहासिक पेंटिंग को हटाकर सेना प्रमुख के लाउंज में एक नई पेंटिंग लगाए जाने पर उठे विवाद पर सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इस बदलाव को सेना के इतिहास, वर्तमान और भविष्य के प्रतीकात्मक संदेश के साथ जोड़ा। बता दें कि रक्षा समाचार डॉट कॉम ने सबसे पहले इस मुद्दे को उठाया था।

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नई जगह पर पेंटिंग

पिछले महीने यह पेंटिंग साउथ ब्लॉक स्थित आर्मी चीफ लाउंज से हटाकर मानेकशॉ सेंटर में स्थापित की गई थी। इसके स्थान पर “कर्म क्षेत्र” नामक एक नई पेंटिंग लगाई गई, जिसे सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल थॉमस जैकब ने तैयार किया है।

सेना प्रमुख ने नई पेंटिंग “कर्म क्षेत्र” के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि यह भारतीय सेना के विकास और आधुनिक रणनीतिक सोच को दर्शाती है। यह पेंटिंग भारतीय संस्कृति, धर्म और सैन्य परंपरा का एक प्रतीक है।

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नई पेंटिंग में पूर्वी लद्दाख के पैंगोंग झील के बर्फीले पहाड़, भगवान कृष्ण का रथ और चाणक्य को दिखाया गया है। सेना प्रमुख ने इसे सेना की रणनीतिक बुद्धिमत्ता और तकनीकी उन्नति का प्रतीक बताया।

उन्होंने कहा, “यदि भारतीय चाणक्य को नहीं पहचानते, तो उन्हें अपने सांस्कृतिक दृष्टिकोण की ओर लौटने की जरूरत है। यह पेंटिंग सेना के अतीत, वर्तमान और भविष्य का संगम है।”

सेना प्रमुख ने कहा, “वह पेंटिंग हमारे अतीत, वर्तमान और भविष्य को दर्शाती है। कुछ लोगों ने टिप्पणी की कि पेंटिंग में दिखाया गया रथ माइथोलॉजिकल (पौराणिक) है। अगर आप मूल भारतीय संविधान देखें, तो उसके अध्याय चार में कृष्ण और अर्जुन भी रथ में हैं। तो क्या संविधान भी पौराणिक है? यह सवाल आप खुद से पूछिए।”

आगे उन्होंने कहा, “जो लोग यह कह रहे हैं कि पेंटिंग में एक ब्राह्मण खड़ा है, उन्हें समझना चाहिए कि वह चाणक्य हैं। अगर भारत में कोई चाणक्य को नहीं पहचानता, तो यह जरूरी है कि हम अपनी सभ्यता और सांस्कृतिक विरासत को फिर से समझें।”

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1971 surrender painting row: क्या कहा है सेना प्रमुख ने

“जहां तक ​​इस पेंटिंग का सवाल है, मैं आपको बता दूं कि दो चीफ लाउंज हैं। यहां एक चीफ लाउंज है और साउथ ब्लॉक में एक चीफ लाउंज है। जैसा कि आप जानते हैं, शायद साल के अंत तक हमें साउथ ब्लॉक खाली कर देना चाहिए। अगर थल सेना भवन जो निर्माणाधीन है, समय पर बन जाता है तो हम वहां से चले जाएंगे। 16 दिसंबर को मानेकशॉ सेंटर में आत्मसमर्पण की पेंटिंग लगाने की तारीख इसलिए चुनी गई क्योंकि वह एक शुभ तिथि है, जब हमें इसे लगाना चाहिए था…अगर आप भारत के स्वर्णिम इतिहास को देखें, तो इसमें तीन अध्याय हैं। इसमें ब्रिटिश काल, मुगल काल और उससे पहले का काल है। इसलिए अगर आप इसे और उस विजन को जोड़ना चाहते हैं, जो मैंने आपको शुरुआत में दिया है, तो प्रतीकात्मकता महत्वपूर्ण हो जाती है…एक आत्मसमर्पण चित्र है जो चीफ लाउंज में है, जो यहां मानेकशॉ सेंटर में है और एक नया चित्र है जो वहां है। यह भी बताया गया है कि ये पौराणिक हैं…”- भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी 

1971 War Surrender Painting: थम नहीं रहा है पेंटिंग की जगह बदलने पर विवाद, रिटायर्ड ब्रिगेडियर ने सेना पर उठाए सवाल, कहा- मानेकशॉ सेंटर का बदलें नाम

पूर्व सैनिकों ने जताई थी नाराजगी

1971 की सरेंडर पेंटिंग को हटाने और नई पेंटिंग लगाने के फैसले पर कई पूर्व सैनिकों ने नाराजगी जाहिर की थी। सेना प्रमुख ने इस पर कहा कि ऐतिहासिक पेंटिंग का महत्व कम नहीं हुआ है। उन्होंने स्पष्ट किया, “हमारे पास दो चीफ लाउंज हैं। एक साउथ ब्लॉक में और दूसरा मानेकशॉ सेंटर में। सरेंडर पेंटिंग को मानेकशॉ सेंटर में स्थापित करना एक सोचा-समझा निर्णय था, और 16 दिसंबर को इसे लगाने के लिए शुभ दिन चुना गया।”

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भारतीय सेना ने शानदार विजय प्राप्त की थी। यह युद्ध बांग्लादेश की मुक्ति के लिए लड़ा गया था, जिसमें पाकिस्तान के 93,000 सैनिकों ने भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण किया। यह दिन भारतीय सेना के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है।

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सरेंडर पेंटिंग इसी ऐतिहासिक पल का प्रतिनिधित्व करती है और इसे मानेकशॉ सेंटर में प्रमुखता से रखा गया है। सेना प्रमुख ने कहा कि यह पेंटिंग हमारी सेना की ताकत और इतिहास का प्रतीक है और इसे उचित स्थान दिया गया है।

जनरल द्विवेदी ने भारतीय इतिहास के तीन अध्यायों का उल्लेख किया: ब्रिटिश काल, मुगल काल और उससे पहले का युग। उन्होंने कहा कि सेना की प्रतीकात्मकता को इन अध्यायों से जोड़ने की जरूरत है।

उन्होंने कहा, “यह पेंटिंग हमारी सेना के मूल्यों को केवल ऐतिहासिक घटनाओं तक सीमित नहीं रखती, बल्कि यह हमारे सांस्कृतिक और रणनीतिक दृष्टिकोण को भी प्रदर्शित करती है।”

1971 War Surrender Painting: थम नहीं रहा है पेंटिंग की जगह बदलने पर विवाद, रिटायर्ड ब्रिगेडियर ने सेना पर उठाए सवाल, कहा- मानेकशॉ सेंटर का बदलें नाम

किसने बनाई नई पेंटिंग?

नई पेंटिंग ‘कर्म क्षेत्र – कर्मों का क्षेत्र’ 28 मद्रास रेजिमेंट के लेफ्टिनेंट कर्नल थॉमस जैकब द्वारा बनाई गई है। यह पेंटिंग सेना को “धर्म के रक्षक” के रूप में प्रस्तुत करती है। इसमें सेना को केवल राष्ट्र का रक्षक नहीं, बल्कि न्याय और देश के मूल्यों की सुरक्षा के लिए लड़ने वाले संरक्षक के रूप में दिखाया गया है।

इस पेंटिंग में भारतीय सेना की तकनीकी उन्नति और आधुनिक क्षमताओं को प्रदर्शित किया गया है। पृष्ठभूमि में बर्फ से ढकी पहाड़ियां दिखाई देती हैं, जबकि दाईं ओर पूर्वी लद्दाख की पैंगोंग त्सो झील और बाईं ओर गरुड़ व भगवान श्रीकृष्ण का रथ नजर आता है। इसके अलावा, पेंटिंग में चाणक्य और आधुनिक सैन्य उपकरण जैसे टैंक, ऑल-टेरेन व्हीकल्स, इन्फैंट्री व्हीकल्स, पेट्रोल बोट्स, स्वदेशी लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर्स और एएच-64 अपाचे अटैक हेलीकॉप्टर्स को भी जगह दी गई है।

खाली करना होगा सााउथ ब्लॉक

सेना प्रमुख ने यह भी बताया कि साउथ ब्लॉक में स्थित चीफ लाउंज को इस साल के अंत तक खाली करना होगा, क्योंकि थल सेना भवन का निर्माण कार्य प्रगति पर है। यह भवन भारतीय सेना के आधुनिक दृष्टिकोण का प्रतीक होगा।

सेना प्रमुख ने कहा, “थल सेना भवन में हमारा स्थानांतरण भारतीय सेना के नए अध्याय की शुरुआत करेगा। यह भवन केवल एक ऑफिस नहीं, बल्कि हमारी परंपरा और भविष्य का केंद्र बनेगा।”

Zorawar Tank: क्या सेना ने रिजेक्ट कर दिया है स्वदेशी जोरावर टैंक? ट्रायल्स को लेकर सेना प्रमुख ने दी बड़ी जानकारी

Zorawar Tank: Army Plans 354 Units, Trials Underway with Improvements in Progress

Zorawar Tank: पिछले साल दिसंबर में भारतीय सेना के स्वदेशी लाइट टैंक (ILT) ने लद्दाख के न्योमा इलाके में 4200 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया था। उस समय रक्षा मंत्रालय की तरफ से कहा गया था कि इस टैंक ने विभिन्न रेंज से गोले दागे और हर बार सटीक निशाना लगाया। लेकिन अब सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने जोरावर टैंक को लेकर बड़ी बात कही है। उन्होंने कहा है कि सेना ने लगभग 354 टैंकों को शामिल करने की योजना बनाई है। इन टैंकों के लिए जनवरी 2023 में ‘आवश्यकता की स्वीकृति’ (Acceptance of Necessity – AON) दी गई थी।

Zorawar Tank: Army Plans 354 Units, Trials Underway with Improvements in Progress

354 Zorawar Tank को शामिल करने की योजना

सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने सोमवार को आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि सेना ने लगभग 354 टैंकों को शामिल करने की योजना बनाई है। इन टैंकों के लिए जनवरी 2023 में ‘आवश्यकता की स्वीकृति’ (Acceptance of Necessity – AON) दी गई थी। इसके बाद अप्रैल 2023 में 17,000 करोड़ रुपये से अधिक की परियोजना के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) जारी किया गया।

उन्होंने कहा कि सेना इस परियोजना को दो चरणों में पूरा करना चाहती है। पहले चरण में 59 टैंकों का निर्माण डीआरडीओ की पहल के तहत होगा, जबकि 295 टैंक ‘मेक इन इंडिया’ के तहत बनाए जाएंगे।

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‘तथाकथित जोरावर’ में कुछ सुधारों का सुझाव

जोरावर लाइट टैंक ने 4,200 मीटर से अधिक ऊंचाई पर विभिन्न रेंज पर गोले दागे और हर बार सटीक निशाना साधा।  इस टैंक ने लद्दाख की दुर्गम पहाड़ियों में सफलतापूर्वक ट्रायल्स पूरे किए हैं। सेना प्रमुख ने बताया कि इन ट्रायल्स से प्राप्त अनुभव के आधार पर ‘तथाकथित ज़ोरावर’ में कुछ सुधारों का सुझाव दिया गया है। वर्तमान में टैंक को चेन्नई वापस लाया जा रहा है, जहां इन सुधारों पर काम किया जाएगा। सुधार के बाद इसे नए चरण के परीक्षणों के लिए तैयार किया जाएगा।

सैन्य सूत्रों के मुताबिक टैंक को चेन्नई भेजा गया है, जहां उसमें कुछ जरूरी सुधार किए जाने हैं। इसमें वक्त लग सकता है। जिसके चलते भारतीय सेना में इसे शामिल करने में अभी और देरी हो सकती है। पहले कहा जा रहा था कि अगर इसके सभी परीक्षण सफल हुए तो जोरावर को 2027 तक सेना में शामिल किया जा सकता है। लेकिन अब इसमें और देरी हो सकती है।

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क्या कहा था सेना प्रमुख ने?

जहां तक ज़ोरावर लाइट टैंक का सवाल है, हम शुरुआत में लगभग 354 टैंकों के साथ शुरुआत करना चाहते हैं और जनवरी 2023 में हमने AON (आवश्यकता की स्वीकृति) दी है, जिसके लिए अप्रैल 2023 में रुचि की अभिव्यक्ति (expression of interest) दी गई थी और यह राशि 17 हज़ार करोड़ से अधिक थी। इसलिए अब तक हम मेक-1 के हिस्से के रूप में 295 और DRDO पहल के हिस्से के रूप में 59 पर विचार कर रहे हैं। जैसा कि आप जानते हैं कि कुछ वेंटरंस ने हाथ मिलाया है और हमने हल्के टैंक ‘तथाकथित ज़ोरावर’ की झलक देखी है और यह पहले से ही उच्च ऊंचाई पर परीक्षण कर रहा है और मैंने इस पर काम कर रहे महानिदेशक से बात की है और आज जब हम बात कर रहे हैं, तो इसने चेन्नई की यात्रा शुरू कर दी है और इन ट्रायल्स के दौरान जिस तरह के सुधारों का सुझाव दिया गया है, हम इसके नए वर्जन में देखेंगे। उसके बाद हम इसके और ट्रायल्स करेंगे।

जनरल जोरावर सिंह के सम्मान में रखा नाम

जोरावर लाइट टैंक को खास तौर पर ऊंचाई वाले क्षेत्रों और कठिन इलाकों के लिए डिजाइन किया गया है। यह टैंक न केवल हल्का है, बल्कि ऊंचाई पर भी सटीकता और दमखम के साथ काम करने में सक्षम है।

इस टैंक का नाम जनरल जोरावर सिंह के सम्मान में रखा गया है, जिन्होंने 19वीं सदी में लद्दाख, तिब्बत और गिलगित-बाल्टिस्तान में अद्भुत सैन्य विजय हासिल की थी। यह टैंक आधुनिक युद्ध के मानकों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है, जिसमें गतिशीलता, मारक क्षमता और सुरक्षा का संतुलन शामिल है।

जोरावर लाइट टैंक का पहला प्रोटोटाइप जुलाई 2024 में एलएंडटी के हजीरा मैन्युफैक्चरिंग डिवीजन में पेश किया गया था। यह प्रोटोटाइप जोरावर टैंक प्रोजेक्ट को स्वीकृति मिलने के केवल 19 महीनों के भीतर तैयार किया गया। पहले प्रोटोटाइप ने लद्दाख की बर्फीली चोटियों और राजस्थान के बीकानेर के पास महाजन फील्ड फायरिंग रेंज रेगिस्तान में फायरिंग टेस्ट सफलतापूर्वक पूरे किए हैं। इसके अलावा, दूसरे प्रोटोटाइप का निर्माण जारी है ताकि सेना के फीडबैक के आधार पर बदलाव किए जा सकें।

वहीं, इसके दूसरे प्रोटोटाइप का निर्माण वर्तमान में प्रगति पर है, जो इस परियोजना की विकास प्रक्रिया को गति देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे भारतीय सेना को टैंक के डिजाइन में सुधार करने और पहले प्रोटोटाइप से प्राप्त फीडबैक के आधार पर आवश्यक बदलाव लागू करने का अवसर मिलेगा।

चीन ने तैनात किया हल्का टैंक ZTQ-15

2020 में गलवान घाटी में भारत और चीन के बीच हुई झड़प के बाद से भारत ने अपनी सीमा पर सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने का काम तेज कर दिया है। चीन ने एलएसी (वास्तविक नियंत्रण रेखा) पर अपने हल्के टैंक ZTQ-15 तैनात किए हैं। जोरावर टैंक को इन्हीं चीनी टैंकों का मुकाबला करने के लिए डिजाइन किया गया है।

जोरावर टैंक को लद्दाख, सियाचिन और अन्य दुर्गम क्षेत्रों में तैनात करने की योजना है, ताकि भारत की सीमाएं अधिक सुरक्षित हो सकें।

Zorawar Tank की खासियतें

जोरावर टैंक को हल्के वजन और दमदार प्रदर्शन के लिए तैयार किया गया है।

  • लगभग 25 टन, जो इसे ऊंचाई वाले इलाकों में तैनात करने के लिए आदर्श बनाता है।
  • 105 मिमी की गन, एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल और मॉड्यूलर एक्सप्लोसिव रिएक्टिव आर्मर।
  • ड्रोन इंटीग्रेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एंटी-एयरक्राफ्ट गन से लैस।
  • इसे एयरक्राफ्ट, रेल और सड़क मार्ग से आसानी से तैनात किया जा सकता है।
  • डीआरडीओ ने तैयार किया है माउंटेन टैंक ‘जोरावर’
  • इसे चलाने के लिए सिर्फ तीन लोगों की जरूरत होती है.

जोरावर लाइट टैंक को लार्सन एंड टुब्रो (एलएंडटी) और डीआरडीओ ने “मेक इन इंडिया” पहल के तहत तैयार किया है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी सक्रिय सुरक्षा प्रणाली (Active Protection System) है, जो इसे एंटी-टैंक मिसाइलों और अन्य खतरों से बचाने में सक्षम बनाती है।

इसके अलावा, जोरावर टैंक अम्फीबियस क्षमता से लैस है, यानी यह पानी और जमीन दोनों पर काम कर सकता है। यह विशेषता इसे पैंगोंग झील जैसे जलक्षेत्रों में तैनात करने के लिए आदर्श बनाती है। टैंक की इस अनूठी विशेषता से सेना को बहुस्तरीय लड़ाई के लिए बेहतर तैयारी मिलती है।