Tejas Mk-1A delivery India: अगर सब कुछ ठीक रहा हो तो अक्टूबर के महीने में भारतीय वायुसेना के लिए गुड न्यूज आने वाली है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने संकेत दिया है कि इस महीने दो तेजस मार्क-1A लड़ाकू विमान इंडियन एयरफोर्स को सौंप दिए जाएंगे। यह डिलीवरी लगभग दो साल की देरी के बाद हो रही है।
सूत्रों के अनुसार, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड इसी महीने तेजस-मार्क 1A के फायरिंग टेस्ट पूरे करेगा। इन ट्रायल्स में बियॉन्ड विजुअल रेंज मिसाइल एस्ट्रा, शॉर्ट रेंज मिसाइल ASRAAM और लेजर गाइडेड बॉम्ब का इस्तेमाल किया जाएगा। सफल परीक्षणों के बाद ही एयरफोर्स को विमान सौंपे जांएगे।
हालांकि इससे पहले भी तेजस के फायरिंग टेस्ट किए गए थे। उस दौरान शुरुआती परीक्षण सफल रहे, लेकिन बाद में तकनीकी गड़बड़ियों के चलते एक टेस्ट असफल रहा। इसके बाद सॉफ्टवेयर में अहम बदलाव किए गए। अब हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को उम्मीद है कि सभी परीक्षण सफल रहेंगे और अक्टूबर में दो तेजस एयरफोर्स के बेड़े में शामिल हो जाएंगे।
साथ ही, अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक इस वित्त वर्ष मार्च 2026 तक 10 इंजन और दिसंबर 2026 तक 20 और इंजन डिलीवर करेगी। इससे तेजस की सप्लाई में रफ्तार आएगी और इंडियन एयरफोर्स की स्क्वाड्रनों की कमी कुछ हद तक पूरी हो सकेगी।
वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने हाल ही में कहा था कि इंडियन एयरफोर्स को हर साल 35 से 40 नए लड़ाकू विमानों की जरूरत है। मौजूदा स्थिति में एयरफोर्स के पास 31 फाइटर स्क्वाड्रन हैं। 26 सितंबर को मिग-21 की दो स्क्वाड्रन रिटायर होने के बाद यह संख्या घटकर केवल 29 रह जाएगी। बता दें कि मिग-21 इस महीने 26 सितंबर को रिटायर हो जाएगा।
दरअसल, एयरफोर्स के लिए 42 स्क्वाड्रन की संख्या “सैंक्शनड स्ट्रेंथ” मानी जाती है। यह क्षमता इसलिए तय की गई थी ताकि भारत टू-फ्रंट वॉर यानी पाकिस्तान और चीन दोनों मोर्चों पर एक साथ लड़ाई की स्थिति में भी तैयार रह सके।
Tejas Mk-1A delivery India: 113 अतिरिक्त इंजनों की खरीद
सरकार ने हाल ही में 97 नए तेजस मार्क-1A लड़ाकू विमानों की खरीद को मंजूरी दी है। यह सौदा लगभग 62,000 करोड़ रुपये का है। इससे पहले फरवरी 2021 में एयरफोर्स ने 83 तेजस मार्क-1A का ऑर्डर 48,000 करोड़ रुपये में दिया था।
इन्हीं विमानों के लिए हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने पहले 99 GE-404 इंजनों का ऑर्डर किया था। जीई ने मार्च 2025 में पहला इंजन हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को सौंपा। अगले साल तक 12 इंजन और उसके बाद हर साल 20-20 इंजन डिलीवर किए जाएंगे।
अब हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड और जीई के बीच 113 अतिरिक्त इंजनों की खरीद का नया सौदा लगभग 1 बिलियन डॉलर का होने वाला है। यह ऑर्डर हाल ही में मंजूर किए गए 97 नए विमानों के लिए होगा।
GE-414 पर चल रही बात
तेजस मार्क-1A के अलावा, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड और जीई के बीच एक और अहम प्रोजेक्ट पर बातचीत चल रही है। इसमें भारत में ही GE-414 इंजन का संयुक्त उत्पादन करने की योजना है। यह इंजन तेजस मार्क-2 प्रोग्राम के लिए इस्तेमाल होगा। इस सौदे के तहत लगभग 80% तकनीक का ट्रांसफर भारत को मिलेगा। इसकी कीमत भी लगभग 1 बिलियन डॉलर मानी जा रही है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने स्वतंत्रता दिवस भाषण में इस प्रोजेक्ट को “मेक इन इंडिया डिफेंस सेक्टर” की दिशा में एक बड़ा कदम बताया था। उन्होंने कहा था कि भारत को आत्मनिर्भर बनने के लिए अपने जेट इंजन देश में ही बनाने होंगे।
तेजस Vs मिग-21
तेजस मार्क-1A का सबसे बड़ा रोल पुराने मिग-21 फाइटर जेट्स को रिप्लेस करना है। मिग-21, जो 1960 के दशक से इंडियन एयरफोर्स का हिस्सा रहे हैं, अब रिटायरमेंट की कगार पर हैं। 26 सितंबर को मिग-21 की अंतिम दो स्क्वाड्रन भी सेवा से बाहर हो जाएंगी।
तेजस मार्क-1A में आधुनिक एवियोनिक्स, मल्टी-रोल क्षमता और इंडिजिनस हथियार सिस्टम हैं। खासतौर पर DRDO द्वारा विकसित एस्ट्रा मिसाइल और रुद्रम मिसाइल को इसमें इंटीग्रेट किया जा रहा है। इससे एयरफोर्स की “बियॉन्ड विजुअल रेंज” क्षमता और दुश्मन के एयर डिफेंस को दबाने की ताकत कई गुना बढ़ जाएगी।
एयरफोर्स की मौजूदा चुनौती
इंडियन एयरफोर्स इस समय “नंबर गैप” की समस्या से जूझ रही है। कई पुराने विमानों को चरणबद्ध तरीके से रिटायर किया जा रहा है, जबकि नए विमानों की डिलीवरी अपेक्षित समय पर नहीं हो पा रही है। तेजस मार्क-1A की सप्लाई में देरी ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है।
हालांकि, आने वाले महीनों में तेजस की डिलीवरी बढ़ने की संभावना है। जीई इंजनों की समय पर आपूर्ति और एचएएल की उत्पादन क्षमता में सुधार से एयरफोर्स को धीरे-धीरे नई ताकत मिलेगी।
Beijing Victory Day Parade 2025: चीन ने द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की हार की 80वीं वर्षगांठ को बेहद भव्य अंदाज में मनाया। बीजिंग के तियानमेन स्क्वायर पर आयोजित इस विजय दिवस परेड में चीन ने न केवल अपने अतीत की यादें ताजा कीं, बल्कि भविष्य की सैन्य ताकत का भी दमखम दिखाया। इस आयोजन में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मौजूदगी के साथ रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग-उन भी शामिल हुए।
कार्यक्रम में कंबोडिया, लाओस, थाईलैंड और म्यांमार जैसे दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के नेता भी मौजूद रहे। यूरोप से हंगरी, सर्बिया और बेलारूस जैसे देशों के प्रतिनिधियों ने भी हिस्सा लिया, जबकि अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगी इस आयोजन से दूर रहे।
Beijing Victory Day Parade 2025: प्रोपेगैंडा का अहम हिस्सा
चीन ने इस परेड को जापान की हार के तौर पर नहीं बल्कि दुनिया को अपनी बढ़ती ताकत के संदेश के तौर पर इस्तेमाल किया। बीजिंग ने इसे अपने प्रोपेगैंडा का अहम हिस्सा बनाया। हाल के दिनों में चीन ने अमेरिका की भूमिका पर सवाल उठाते हुए और खुद को जापान की हार में निर्णायक ताकत के रूप में पेश करने की कोशिश की।
ट्रंप ने अपने ट्रुथ सोशल अकाउंट पर चीन को संबोधित करते हुए लिखा, “बड़ा सवाल यह है कि क्या चीन के राष्ट्रपति शी ने अमेरिका द्वारा चीन को आजादी दिलाने के लिए दी गई बड़ी मदद और “खून” का जिक्र करेंगे, जो एक शत्रु विदेशी आक्रमणकारी से लड़ने में दी गई थी। कई अमेरिकियों ने चीन की जीत और सम्मान के लिए अपनी जान गंवाई। मुझे आशा है कि उनकी वीरता और बलिदान को सही तरीके से सम्मान और याद किया जाएगा। राष्ट्रपति शी और चीन के अद्भुत लोगों को एक शानदार और यादगार उत्सव की शुभकामनाएं। कृपया व्लादिमीर पुतिन और किम जोंग उन को मेरी गर्मजोशी भरी शुभकामनाएं दें, क्योंकि आप अमेरिका के खिलाफ साजिश रचते हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड जे. ट्रम्प।”
विशेषज्ञों का कहना है कि इस आयोजन का मकसद चीन को वैश्विक राजनीति के केंद्र में दिखाना और पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) को एक आधुनिक, तकनीकी रूप से सक्षम सेना के रूप में प्रस्तुत करना था।
Beijing Victory Day Parade 2025: सिस्टम-ऑफ-सिस्टम्स वॉरफेयर
इस परेड का सबसे अहम पहलू था PLA का सिस्टम-ऑफ-सिस्टम्स ऑपरेशन पर जोर। इसमें रडार और ऑप्टिकल सेंसर, एयरबोर्न अर्ली वॉर्निंग एयरक्राफ्ट और ड्रोन काउंटर टेक्नोलॉजी का प्रदर्शन किया गया। इसका मकसद यह दिखाना था कि चीन की सेना अब सिर्फ पारंपरिक युद्ध नहीं, बल्कि मॉडर्न मल्टीडायमेंशनल वॉरफेयर लड़ने में सक्षम है।
परेड में दिखाए गए हथियारों और मिसाइलों से साफ था कि चीन अब फुल न्यूक्लियर ट्रायड (जमीनी, हवाई और पनडुब्बी से परमाणु हमला करने की क्षमता) को मजबूती दे रहा है।
DF-61 ICBM
DF-61: चीन का नया रोड-मोबाइल ICBM
बीजिंग परेड में सबसे ज्यादा चर्चा DF-61 इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) की रही। इसे 12-एक्सल ट्रांसपोर्टर-इरेक्टर-लॉन्चर (TEL) पर ले जाया गया। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह मिसाइल पुराने DF-41 की जगह ले सकती है।
DF-61 में MIRV तकनीक यानी एक साथ कई वारहेड्स ले जाने की क्षमता हो सकती है। इसका रोड-मोबाइल डिजाइन इसे दुश्मन के पहले हमले से सुरक्षित बनाता है। अमेरिकी रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीन का परमाणु भंडार 2030 तक 1,000 से ज्यादा वारहेड्स तक पहुंच सकता है और DF-61 इस रणनीति का अहम हिस्सा है।
DF-31BJ
DF-31BJ: नया साइलो-बेस्ड मिसाइल वेरिएंट
इस परेड में DF-31BJ नाम का नया वर्जन भी दिखा, जिसे खास तौर पर साइलो से लॉन्च करने के लिए बनाया गया है। PLA के पास पहले से DF-31 के मोबाइल वर्जन हैं, लेकिन साइलो वेरिएंट से इसके लॉन्च की तैयारी का समय और भी कम हो जाएगा।
JL3 Submarine-Launched ICBM
JL-3: पनडुब्बी से दागी जाने वाली मिसाइल
चीन की नई JL-3 सबमरीन-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल (SLBM) भी परेड में दिखाई गई। इसकी रेंज लगभग 10,000 किलोमीटर बताई जा रही है। इसका मतलब है कि चीन के पास अब ऐसी पनडुब्बियां हैं जो अपने समुद्री क्षेत्र से बाहर गए बिना ही अमेरिका तक हमला कर सकती हैं।
इसे Type 094A पनडुब्बियों से लॉन्च किया जा सकता है। यह मिसाइल Type 094A और Type 096 पनडुब्बियों से लॉन्च करने के लिए बनाई गई है, जो चीन की समुद्री परमाणु हथियारों की डिलीवरी क्षमता को बढ़ाती है। इसकी रेंज 10,000 से 12,000 किमी तक बताई जाती है, जो इसे अमेरिका के पूरे पूर्वी तट, हवाई और यूरोपीय ठिकानों तक पहुंचने की क्षमता देती है। यह मिसाइल तीन चरणों वाली ठोस ईंधन प्रणाली पर काम करती है, जो इसे तेजी से लॉन्च करने और कम प्रक्षेपण समय (10-15 मिनट) देने में सक्षम बनाती है। इसके साथ ही, यह मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टारगेटेबल री-एंट्री व्हीकल्स (MIRVs) से लैस है, यानी यह एक साथ कई परमाणु वारहेड्स (3-6) ले जा सकता है, जो अलग-अलग लक्ष्यों पर सटीक हमला कर सकते हैं।
JL-3 की सटीकता बहुत एडवांस है, जिसमें सर्कुलर एरर प्रोबेबल (CEP) 100-150 मीटर के आसपास है। इसे बाइदू नेविगेशन सिस्टम और इनर्शियल गाइडेंस के साथ जोड़ा गया है। मिसाइल की लंबाई लगभग 13-14 मीटर और वजन 40-50 टन है। इसकी मारक क्षमता में 250-500 किलोटन के परमाणु वारहेड्स शामिल हैं, जो बड़े शहरों या सैन्य ठिकानों को नष्ट करने के लिए काफी हैं।
पूर्व PLA कर्नल झोउ बो ने इसे चीन की रणनीति में बड़ी उपलब्धि बताया। RAND के विश्लेषक रेमंड कुओ के मुताबिक, JL-3 से लैस पनडुब्बियां दुश्मन के तट के पास पहुंचकर सिर्फ 5 मिनट की चेतावनी में हमला कर सकती हैं।
DF-5C
DF-5C: 20,000 किलोमीटर तक मार करने वाली मिसाइल
चीन ने परेड में DF-5C नाम की नई लिक्विड-फ्यूल्ड इंटरकॉन्टिनेंटल मिसाइल भी पेश की। इसकी रेंज 20,000 किलोमीटर से ज्यादा बताई गई है, यानी यह पूरी दुनिया को निशाने पर ले सकती है। विशेषज्ञ यांग चेंगजुन के मुताबिक, DF-5C में DF-41 की तकनीक भी शामिल है। इसमें तेज़ी से तैनाती, हाइपरसोनिक गति, मल्टीपल वारहेड (MIRV) और बेहद सटीक गाइडेंस सिस्टम जैसी खूबियां हैं।
YJ-17
YJ सीरीज की नई एंटी-शिप मिसाइलें
परेड में चीन ने YJ सीरीज की चार नई मिसाइलें भी पेश कीं, जिन्हें खास तौर पर समुद्र में दुश्मन के जहाज़ों और एयरक्राफ्ट कैरियर्स को निशाना बनाने के लिए तैयार किया गया है। सबसे पहले YJ-15 दिखाई गई, जो रैमजेट इंजन से चलने वाली सुपरसोनिक मिसाइल है। यह इतनी तेज है कि मैक 3 से मैक 4 की रफ्तार तक जा सकती है और अपने स्पीड से ही दुश्मन के डिफेंस सिस्टम को दबाव में ला देती है।
इसके बाद YJ-17 सामने आई, जिसे हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल (HGV) कहा जाता है। इसकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह उड़ने के दौरान लगातार दिशा बदल सकती है और दुश्मन के एडवांस्ड एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा दे सकती है।
इसी श्रृंखला में YJ-19 को सबसे खतरनाक माना जा रहा है। यह स्क्रैमजेट इंजन से लैस मिसाइल है, जो मैकh 10 तक की रफ्तार पकड़ सकती है। इसकी मारक क्षमता और गति इतनी जबरदस्त है कि इसे खास तौर पर अमेरिका के एयरक्राफ्ट कैरियर्स के लिए चुनौती बताया जा रहा है।
सबसे आखिर में चीन ने YJ-20 को दिखाया, जो एक हाइपरसोनिक बैलिस्टिक एंटी-शिप मिसाइल है। यह लंबी दूरी से लॉन्च होकर बेहद सटीक तरीके से दुश्मन के जहाज को निशाना बना सकती है और अपने हाई-एल्टीट्यूड मैन्युवरिंग के कारण रोक पाना लगभग असंभव माना जाता है।
KJ-600
KJ-600 अर्ली वार्निंग एयरक्राफ्ट
यह एक नया हवाई चेतावनी और नियंत्रण विमान है, जो पहली बार सार्वजनिक रूप से दिखाया गया। यह दुश्मन विमानों और मिसाइलों का पता लगाने और वास्तविक समय में जानकारी देने में सक्षम है।इसमें एईएसए (Active Electronically Scanned Array) रडार लगा है, जो 400 किमी तक दुश्मन विमानों, ड्रोन और मिसाइलों का पता लगाने में सक्षम है। यह रीयल टाइम में डेटा प्रोसेसिंग के साथ एयर डिफेंस को मजबूत करता है और विमानवाहक पोत से ऑपरेट हो सकता है।
J-20S twin-seat Stealth Air Superiority Fighter
J-20S फाइटर जेट (दो-सीटर)
J-20 का एडवांस दो-सीटर संस्करण, जो स्टील्थ तकनीक से लैस है। यह गति (मैक 2+) और बहुउद्देश्यीय क्षमता (हवा से हवा और हवा से जमीन हमले) के साथ PL-15 मिसाइलें और लेजर-गाइडेड बम ले सकता है। यह पहली बार परेड में प्रदर्शित हुआ और प्रशिक्षण व मल्टी-रोल मिशन के लिए डिजाइन किया गया है। -20 का यह दो-सीटर संस्करण स्टील्थ तकनीक से लैस है, जो रडार से बचने में सक्षम है। यह PL-15 हवा से हवा मिसाइलें (150+ किमी रेंज), PL-10 शॉर्ट-रेंज मिसाइलें, और लेजर-गाइडेड बम ले सकता है। दो-सीटर डिजाइन पायलट प्रशिक्षण और संयुक्त मिशन (जैसे हवा से जमीन हमले) के लिए है। यह परेड में पहली बार देखा गया।
HQ-19, HQ-12, and HQ-29
HQ-19, HQ-12 और HQ-29 (सरफेस-टू-एयर मिसाइलें)
ये छह नई मिसाइलें एयर डिफेंस के लिए हैं। HQ-19 यह एक एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम है, जो 3000+ किमी रेंज की इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलों (ICBM) को मध्य और ऊपरी वायुमंडल में इंटरसेप्ट कर सकता है। इसमें मल्टी-लेयर रडार और हाई स्पीड (मैक 6+) है।
जबकि HQ-12 मध्यम दूरी की मिसाइल (100-150 किमी रेंज) है, जो क्रूज मिसाइलों और लो-फ्लाइंग टारगेट्स को निशाना बनाने में सक्षम है। वहीं, HQ-29 क्रूज मिसाइलों और विमानों को निशाना बनाने में सक्षम हैं। यह शॉर्ट-रेंज डिफेंस सिस्टम (50-70 किमी) है, जो ड्रोन और हेलिकॉप्टर जैसे नजदीकी खतरों से निपटने के लिए डिजाइन किया गया है।
PCH-191 modular long-range rocket launchers
PCH-191 मॉड्यूलर लॉन्ग-रेंज रॉकेट लॉन्चर्स
ये मोबाइल लॉन्चर 300-400 किमी रेंज के रॉकेट दाग सकते हैं। इनका मॉड्यूलर डिजाइन उन्हें विभिन्न युद्धक्षेत्रों में अनुकूलित करने की अनुमति देता है, जिसमें सटीकता और तुरंत तैनाती शामिल है। PCH-191 एक 8×8 व्हील्ड हाई-मोबिलिटी ऑफ-रोड चेसिस (Wanshan WS2400) पर आधारित है, जिसका वजन लगभग 45 टन है। यह -22°C से 55°C तापमान और सभी मौसमों में संचालित हो सकता है। इसमें दो स्वतंत्र मॉड्यूलर लॉन्च सेल हैं, जो विभिन्न प्रकार के गोला-बारूद ले सकते हैं। प्रत्येक सेल को 5 × 300 मिमी रॉकेट्स, 4 × 370 मिमी रॉकेट्स, या 1 × 750 मिमी मिसाइल से लैस किया जा सकता है।
300 मिमी रॉकेट्स रेंज 70-150 किमी है, जिसमें सटीकता 10 मीटर के भीतर है। ये उच्च-विस्फोटक और क्लस्टर वारहेड्स ले सकते हैं। 370 मिमी “फायर ड्रैगन 280” गाइडेड रॉकेट्स की रेंज 280 किमी तक है, जो सटीक हमलों के लिए डिज़ाइन किए गए हैं। 750 मिमी “फायर ड्रैगन 480” टैक्टिकल बैलिस्टिक मिसाइल अधिकतम रेंज 500 किमी है, जो ताइवान जैसे क्षेत्रों को मुख्यभूमि से लक्षित करने में सक्षम है। ये परमाणु या पारंपरिक वारहेड्स ले सकते हैं। बैटरी स्तर पर 20 सेकंड और सिंगल लॉन्चर पर 15 सेकंड में हमला शुरू करने की क्षमता है। इसका रॉकेट्स के साथ सर्कुलर एरर प्रोबेबल (CEP) 50 मीटर से कम है। वहीं पूर्ण सैवलो 67 हेक्टेयर क्षेत्र को कवर कर सकता है।
India Submarine Plan: भारतीय नौसेना आने वाले वर्षों में अपनी पनडुब्बी क्षमता को बड़ा उछाल देने जा रही है। रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, नौसेना को जल्द ही 9 नई डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां मिलने वाली हैं। इनमें तीन पनडुब्बियां फ्रांसीसी स्कॉर्पीन क्लास का फॉलोऑन ऑर्डर होंगी और छह पनडुब्बियां प्रोजेक्ट 75 इंडिया (P75-I) के तहत बनाई जाएंगी। इन दोनों प्रोजेक्ट्स पर कीमतों और शर्तों को लेकर बातचीत अंतिम दौर में है।
अभी इन सौदों पर लागत और शर्तों को लेकर बातचीत चल रही है। जैसे ही कीमत तय होगी, मामला कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) के पास मंजूरी के लिए जाएगा। माना जा रहा है कि यह सौदा भारतीय नौसेना की ताकत को अगले कई दशकों तक समुद्र में रणनीतिक बढ़त देगा।
India Submarine Plan: प्रोजेक्ट पी-75 कैसे शुरू हुआ
भारत का सबमरीन प्रोग्राम काफी पुराना है। साल 1997 में रक्षा मंत्रालय ने 24 नई पनडुब्बियों की योजना बनाई थी। इसी के तहत प्रोजेक्ट 75 की शुरुआत हुई।
भारत ने 2005 में फ्रांस के नेवल ग्रुप के साथ स्कॉर्पीन क्लास पनडुब्बियों के लिए करार किया था। इसके तहत छह पनडुब्बियां बनाने का समझौता हुआ था। इनका निर्माण मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL), मुंबई में किया गया।
दिसंबर 2017 में पहली पनडुब्बी आईएनएस कलवरी नौसेना में शामिल हुई। इसके बाद सितंबर 2019 में खंडेरी, मार्च 2021 में करंज, नवंबर 2021 में वेला, जनवरी 2023 में वागीर और 2024 में छठी और आखिरी पनडुब्बी वागशीर भी नौसेना को मिल गई। इन पनडुब्बियों ने भारतीय नौसेना की पानी के भीतर अटैक कैपेबिलिटी को मजबूत किया।
मॉस्को की डिफेंस इंडस्ट्री में कहा जा रहा है कि Su-57E को लंबे समय से 5th जनरेशन के तौर पर पेश किया गया। वहीं भारत की इस शर्त के बाद पूरी दुनिया में रूस के दावे पर सवाल उठने लगेंगे। वहीं, भारत का कहना है टेक्नोलॉजी कंट्रोल उसके हाथ में हो…https://t.co/UXRxQO6cbb#Su57E…
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) September 3, 2025
ये सभी डीजल-इलेक्ट्रिक स्कॉर्पीन क्लास सबमरीन भारतीय नौसेना के लिए गहरे पानी में “साइलेंट किलर” साबित हो रही हैं। अब इन्हीं का फॉलोऑन ऑर्डर देकर भारत तीन और स्कॉर्पीन क्लास सबमरीन लेगा। जिसकी अनुमानित लागत 36,000 करोड़ रुपये है।
India Submarine Plan: प्रोजेक्ट 75 इंडिया (P75-I)
जहाँ स्कॉर्पीन क्लास मौजूदा जरूरतें पूरी कर रही हैं, वहीं प्रोजेक्ट 75 इंडिया (P75-I) भविष्य की चुनौतियों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इस प्रोजेक्ट के तहत छह अत्याधुनिक स्टेल्थ डीजल-इलेक्ट्रिक सबमरीन बनाई जाएंगी। इन पनडुब्बियों में एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) सिस्टम होगा। AIP तकनीक से पनडुब्बी को सतह पर आए बिना लंबे समय तक पानी के भीतर ऑपरेट करने की क्षमता मिलती है। यह तकनीक भारतीय महासागर जैसे विशाल क्षेत्र में ऑपरेशन के लिए बेहद जरूरी मानी जाती है।
इस प्रोजेक्ट की लागत लगभग 65,000 करोड़ रुपये आंकी गई है। जर्मनी की थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (TKMS) और MDL मिलकर इसका निर्माण करेंगे। यह भारत का अब तक का सबसे बड़ा “मेक इन इंडिया” रक्षा सहयोग माना जा रहा है।
India Submarine Plan: भारतीय नौसेना की मौजूदा क्षमता
भारत के पास इस समय 17 डीजल-इलेक्ट्रिक सबमरीन और 2 न्यूक्लियर बैलेस्टिक मिसाइल सबमरीन (SSBN) हैं। इसके अलावा, भारत ने हाल ही में दो न्यूक्लियर अटैक सबमरीन (SSN) बनाने की मंजूरी भी दी है।
स्वदेशी SSN प्रोजेक्ट पर भी काम चल रहा है, जिसे 2036-37 तक नौसेना में शामिल किया जा सकता है। इन सबमरीन के शामिल होने के बाद भारत हिंद महासागर क्षेत्र में चीन जैसी बड़ी नौसेनाओं को चुनौती देने में सक्षम होगा।
पुरानी सोवियत कालीन किलो क्लास और जर्मन HDW क्लास पनडुब्बियां अपनी सर्विस लाइफ के अंत तक पहुंच चुकी हैं।
नौसेना को अपनी ताकत बनाए रखने के लिए नई पनडुब्बियों की तत्काल जरूरत है। प्रोजेक्ट 75 और P75-I इसी रणनीति का हिस्सा हैं। भारतीय महासागर में चीन की नौसेना की मौजूदगी लगातार बढ़ रही है। चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी नेवी (PLAN) लगातार नई परमाणु और परंपरागत पनडुब्बियां बना रही है। ऐसे में भारत के लिए अपनी अंडरवॉटर वॉरफेयर कैपेबिलिटी बढ़ाना जरूरी हो गया है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि इन दोनों प्रोजेक्ट्स से भारतीय नौसेना को दुश्मन की पनडुब्बियों को रोकने और हिंद महासागर क्षेत्र में मजबूत पकड़ बनाए रखने में मदद मिलेगी।
पाकिस्तान की हंगोर पनडुब्बियां और भारत की बढ़त
पाकिस्तान के पास फिलहाल आठ पनडुब्बियां हैं। इसमें से तीन चीन में बनी हंगोर क्लास (युआन क्लास का एक्सपोर्ट वर्जन) हैं। 2015 में पाकिस्तान ने चीन से प्रोजेक्ट S-26 के तहत आठ पनडुब्बियों का सौदा किया था। इनमें से चार चीन में और बाकी चार कराची शिपयार्ड में बन रही हैं।
हालांकि, इन हंगोर क्लास पनडुब्बियों में कई खामियां हैं। इनमें लगा प्रोपल्शन सिस्टम और सेंसर भारतीय स्कॉर्पीन पनडुब्बियों जितने आधुनिक नहीं हैं। साथ ही, जर्मनी के MTU डीजल इंजन पर लगे प्रतिबंध के चलते चीन को मजबूरी में अपना CHD-620 इंजन लगाना पड़ा, जिसकी विश्वसनीयता संदिग्ध है।
पनडुब्बियों की सबसे बड़ी ताकत उनका स्टेल्थ (गुप्त रहने की क्षमता) होती है। लेकिन चीनी पनडुब्बियां अपेक्षाकृत ज्यादा शोर करती हैं, जिससे उन्हें ट्रैक करना आसान हो जाता है। भारतीय नौसेना की एंटी-सबमरीन वॉरफेयर (ASW) तकनीक के सामने ये पनडुब्बियां टिक नहीं पाएंगी।
1971 के युद्ध में भारतीय नौसेना ने पाकिस्तानी पनडुब्बी PNS गाजी को विशाखापत्तनम के पास डुबो दिया था। रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि मौजूदा हंगोर क्लास पनडुब्बियों का भी भविष्य कुछ ऐसा ही हो सकता है।
India Submarine Plan: न्यूक्लियर सबमरीन बनाने में जुटा भारत
डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों के साथ-साथ भारत न्यूक्लियर सबमरीन पर भी काम कर रहा है। सरकार ने दो न्यूक्लियर अटैक सबमरीन (SSN) बनाने को मंजूरी दी है। स्वदेशी SSN पर काम जारी है और अनुमान है कि 2036-37 तक पहली पनडुब्बी नौसेना में शामिल हो जाएगी।
Su-57E stealth fighter: रूस भारत में अपने पांचवी पीढ़ी के फाइटर एयरक्राफ्ट सुखोई एसयू-57 की मैन्युफैक्चरिंग लेकर निवेश की योजनाओं पर काम कर रहा है। माना जा रहा है कि भारत सरकार इस साल के आखिर में होने वाली पुतिन की भारत यात्रा के दौरान एसयू-57 बनाने की डील पर साइन कर सकती है। इस डील से पहले इस बात की भी जानकारी मिली है कि भारतीय वायुसेना की तरफ से एसयू-57 के कंपोनेंट्स में बदलाव करने की बात कही है। भारत की तरफ से शर्त रखी गई है कि इस फाइटर जेट में रूसी रडार की बजाय भारतीय रडार लगाया जाए।
सूत्रों ने बताया कि भारत ने साफ कहा है कि अगर इस विमान को भारतीय वायुसेना में शामिल करना है तो इसमें लगे रूसी रडार और मिशन सिस्टम को हटाकर स्वदेशी भारतीय सिस्टम लगाया जाए। Su-57E में फिलहाल N036 “ब्येल्का” AESA रडार लगा है। यह गैलियम आर्सेनाइड (GaAs) टेक्नोलॉजी पर आधारित है। वायुसेना का कहना है कि यह रडार मॉडर्न वॉरफेयर के मुताबिक नहीं है और अगले दौर की एयर बैटल की जरूरतों को पूरी तरह नहीं पूरा कर सकता।
सूत्रों ने बताया कि इस रडार की डिटेक्शन रेंज, पावर एफिशिएंसी और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर रसिस्टेंस कैपेसिटी उतनी मजबूत नहीं है जितनी अगली पीढ़ी के विमानों में होनी चाहिए। भारत की तरफ से कहा गया है कि यह तकनीक अब पुरानी हो चुकी है और इसे नई गैलियम नाइट्राइड (GaN) तकनीक से बने रडार से बदलना चाहिए।
इलैक्ट्रॉनिक वॉरफेयर के लिए बने हैं उत्तम और विरूपाक्ष
सूत्रों का कहना है कि भारत चाहता है कि इस रडार को बदलकर डीआरडीओ के बनाए गैलियम नाइट्राइड (GaN) आधारित AESA रडार लगाए जाएं। जिनका इस्तेमाल तेजस फाइटर जेट में भी किया जा रहा है। इनमें उत्तम AESA रडार और अपग्रेड हो रहे सुखोई-30एमकेआई जेट्स के लिए तैयार किया जा रहा विरूपाक्ष रडार शामिल हैं। ये दोनों रडार गैलियम नाइट्राइड (GaN) तकनीक पर आधारित हैं, जिन्हें आधुनिक एयर कॉम्बैट के लिए अधिक कारगर माना जाता है। गैलियम नाइट्राइड तकनीक वाले इन रडारों की थर्मल हैंडलिंग और पावर एफिशिएंसी भी बेहतर है, साथ ही ये रेंज भी ज्यादा देते हैं और सिग्नल क्वॉलिटी भी बेहतर रखते हैं।
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) September 2, 2025
सूत्रों का कहना है कि नई दिल्ली ने रूस से यह शर्त रखी है कि अगर सौदा करना है तो Su-57E में भारतीय रडार शामिल किए जाएंगे। बता दें कि गैलियम नाइट्राइड (GaN) तकनीक पर आधारित उत्तम AESA रडार और विरूपाक्ष रडार में मॉडर्न इलैक्ट्रॉनिक वॉरफेयर की क्षमता है।
Su-57E stealth fighter: रूस के दावों पर सवाल हुए खड़े
डीआरडीओ का कहना है कि गैलियम नाइट्राइड तकनीक फ्यूचर वॉरफेयर में निर्णायक भूमिका निभाएगी। यही वजह है कि अमेरिका का F-35, चीन का J-20 और जापान का अगली पीढ़ी का J/F-X प्रोग्राम भी इसी तकनीक पर आधारित रडार का इस्तेमाल कर रहे हैं। भारत का दावा है कि उसके स्वदेशी रडार वैश्विक स्तर की तकनीक से पीछे नहीं हैं और इन्हें SU-57E जैसे विमानों पर लगाना पूरी तरह संभव है।
हालांकि रूस इस फाइटर जेट को पांचवी पीढ़ी के एयरक्राफ्ट के तौर पर प्रचारित करता आया है। वहीं भारत के यह कहने के बाद कि इसमें लगे रडार मॉडर्न वॉरफेयर के मुताबिक नहीं है, इसके बाद रूस के दावों पर सवाल खड़े हों गए हैं। जानकारों का कहना है कि अगर भारत जैसे बड़े ग्राहक ने इसके रडार सिस्टम को नकार दिया तो इसका असर दुनिया भर में रूस की छवि पर पड़ेगा।
Su-57E stealth fighter: भारत ने ली राफेल से सीख
सूत्रों का कहना है कि भारत को अपने स्वदेश में बने रडार सिस्टम पर पूरा भरोसा है। और वह अब विदेशी तकनीक पर निर्भर नहीं है। वहीं अगर एसयू-57 में भारतीय रडार का इस्तेमाल होता है कि इससे पूरी दुनिया में उसकी साख बढ़ेगी और विदेशों में निर्यात के रास्ते भी खुलेंगे। साथ ही भारत यह भी जानता है कि मॉस्को आसानी से अपने सबसे बड़े हथियार खरीदारों में से एक को नहीं खो सकता।
भारत फिलहाल Su-57E की तुलना अमेरिका के F-35A से कर रहा है, लेकिन यहां मामला केवल विमान की रेंज या स्टील्थ क्षमता का नहीं है। भारत के लिए सबसे अहम मुद्दा है – टेक्नोलॉजी पर कंट्रोल। सूत्रों का कहना है कि फ्रांस के राफेल सौदे से भारत ने बड़ी सीख ली है। राफेल का सोर्स कोड फ्रांस ने भारत को नहीं दिया, जिससे भारतीय मिसाइल सिस्टम्स को पूरी तरह इंटीग्रेट करने में दिक्कतें आईं। उनमें स्वदेशी एस्ट्रा और रुद्रम जैसे हथियारों को पूरी तरह राफेल पर इंटीग्रेट नहीं किया जा सका। यही वजह है कि अब भारत ने तय कर लिया है कि भविष्य की सभी डील्स में सोर्स कोड एक्सेस और लोकल टेक्नोलॉजी इंटीग्रेशन जरूरी होगा।
Su-57E stealth fighter: फिफ्थ जनरेशन की दो से तीन स्क्वाड्रन
भारतीय वायुसेना की योजना है कि अगले कुछ वर्षों में दो से तीन स्क्वाड्रन फिफ्थ जनरेशन विमानों की जरूरत पूरी की जाए। एसयू-57ई और अमेरिकी एफ-35 इस दौड़ में प्रमुख हैं। वहीं भारत का अपना एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) प्रोजेक्ट भी चल रहा है, जिसकी पहली उड़ान 2028 तक तय मानी जा रही है। रूस ने यह भी संकेत दिया है कि अगर भारत एसयू-57ई खरीदता है तो इसमें स्वदेशी एस्ट्रा मिसाइल और भविष्य के प्रिसीजन स्ट्राइक हथियार भी लगाए जा सकते हैं।
एसयू-57ई को भारत में बनाने की तैयारी
वहीं रूस ने भारत को लुभाने के लिए एक बड़ा प्रस्ताव रखा है। जानकारी के मुताबिक, रूसी राजदूत डेनिस अलीपोव ने हाल ही में कहा कि रूस ने भारत को फुल सोर्स कोड एक्सेस देने की पेशकश की है ताकि भारतीय सिस्टम्स को आसानी से Su-57E में इंटीग्रेट किया जा सके। इतना ही नहीं, नासिक की एचएएल की फैक्टरी में जहां पहले से ही 222 से ज्यादा सुखोई-30MKI बन चुके हैं, वहां पर एसयू-57ई का उत्पादन शुरू हो सकता है। रूसी मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक रूस भारत को पूरी तकनीकी मदद और औद्योगिक ढांचा मुहैया कराने को तैयार है।
आंकलन करने में जुटीं रूसी एजेंसियां
वहीं रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन अपनी भारत यात्रा के दौरान Su-57 विमान का ऑफर कर सकते हैं। रूसी एजेंसियां यह आंकलन भी कर रही हैं कि भारत में इन विमानों के निर्माण के लिए कितनी पूंजी और संसाधन की जरूरत होगी। इसके अलावा भारत की दूसरी फैक्ट्रियां, जहां पहले से ही रूसी उपकरण बनाए जाते हैं, उन्हें भी इस काम में इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे लागत कम करने में मदद मिलेगी। बता दें कि करीब दस साल पहले भारत रूस के फिफ्थ जेनरेशन फाइटर एयरक्राफ्ट प्रोग्राम (FGFA) का हिस्सा था, लेकिन मतभेदों के चलते उसने इससे हाथ खींच लिया था। अब मौजूदा वैश्विक हालात को देखते हुए यह प्रोजेक्ट फिर से शुरू हो सकता है।
MiG-21 retirement India: भारतीय वायुसेना (IAF) की शान रहे सुपरसोनिक लड़ाकू विमान मिग-21 अब इतिहास बनने जा रहे हैं। 62 साल तक आकाश में अपनी ताकत का परिचय देने के बाद ये विमान 26 सितंबर 2025 को चंडीगढ़ में आयोजित एक भव्य समारोह में विदाई लेंगे। वायुसेना के अधिकारियों ने पुष्टि की है कि यह दिन मिग-21 की लंबी और गौरवशाली यात्रा का अंतिम पड़ाव होगा।
आधिकारिक तौर पर इसे हमेशा मिकोयान-गुरेविच-21 (MiG-21) कहा गया। लेकिन भारतीय वायुसेना और पायलटों ने इसे कई नाम दिए। 2000 के दशक में रूस की मदद से अपग्रेड हुए इसके संस्करण को मिग-21 बाइसन नाम मिला, जिसमें लेटेस्ट एवियोनिक्स और नई तकनीकें जोड़ी गईं। 1971 के भारत-पाक युद्ध में जब इसने दुश्मन को मात दी, तब इसे ‘विजय’ और ‘त्रिशूल’ जैसे नामों से भी नवाजा गया। इसकी तेज रफ्तार और हमलावर क्षमता के चलते इसे ‘तलवार’ भी कहा गया। वहीं, 1971 के युद्ध में पाकिस्तानी विमानों के खिलाफ इसकी सफलता ने इसे ‘गन विद विंग्स’ यानी ‘पंखों वाली तोप’ भी नाम दिया गया था।
Photo: IAF
MiG-21 retirement India: केवल दो स्क्वॉड्रन बचे सेवा में
फिलहाल भारतीय वायुसेना के पास मिग-21 के सिर्फ दो स्क्वॉड्रन बचे हैं, नंबर 23 स्क्वॉड्रन (Panthers) और नंबर 3 स्क्वॉड्रन (Cobras)। दोनों राजस्थान के बिकानेर स्थित नल एयरबेस पर तैनात हैं। इन विमानों की जगह अब धीरे-धीरे स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमान एलसीए तेजस एमके-1ए ले रहे हैं। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी ने 97 नए तेजस एमके-1ए की खरीद के लिए 66,000 करोड़ रुपये के सौदे को मंजूरी दी है।
✈️ A Historic Flight Before the Farewell!
CAS took to the skies in a MiG-21 Bison at Nal, flying both solo and in formation with Sqn Ldr Priya Sharma – just a month before the legendary jet is officially phased out.
The IAF will soon bid goodbye to the MiG-21, its first… pic.twitter.com/2dwRkbN3zU
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) August 25, 2025
MiG-21 retirement India: 1963 में आया था सर्विस में
मिग-21 भारत का पहला सुपरसोनिक जेट था, जिसे 1963 में भारतीय वायुसेना में शामिल किया गया। आने वाले दशकों में वायुसेना ने इसके कई वर्जन इस्तेमाल किए, जिनमें टाइप 77 (मिग-21एफएल), टाइप 96 (मिग-21 एम), और टाइप 75 (मिग-21 पीएफ) शामिल थे। इन विमानों ने 1965 और 1971 के युद्धों में भी पाकिस्तान को करारा जवाब दिया। साथ ही, 1999 के कारगिल युद्ध में भी इन विमानों ने अहम भूमिका निभाई।
MiG-21 retirement India: जब एक मिग-21 ने चार साबरे को पछाड़ा
एयर मार्शल (रिटायर्ड) पृथ्वी सिंह बरार उस दौर को याद करते हुए कहते हैं, “1971 में मैंने पाकिस्तान के रफीकुल एयरबेस पर 500 किलो के दो बम गिराए। वापसी के दौरान देखा कि चार अमेरिकी साबरे फाइटर जेट मेरे पीछे पड़ गए। मुझे लगा अब बचना मुश्किल है, लेकिन मिग-21 की स्पीड और मेरी ट्रेनिंग ने कमाल कर दिया। पाकिस्तानी विमान पीछा नहीं कर पाए और मैं सुरक्षित लौट आया।” बरार का मानना है कि मिग-21 केवल एक फाइटर जेट नहीं था, बल्कि हर पायलट का साथी और भरोसेमंद दोस्त था।
Photo: IAF
MiG-21 retirement India: फ्लाइंग कॉफिन का टैग
मिग-21 का इतिहास गौरवशाली होने के साथ-साथ विवादों से भी घिरा रहा। बार-बार हुए हादसों के चलते मीडिया ने इसे फ्लाइंग कॉफिन और विडो मेकर जैसे नाम भी दिए। 2013 में संसद में उस समय के रक्षा मंत्री एके एंटनी ने बताया था कि 1963 से 2012 के बीच मिग-21 के 482 हादसे हुए और इनमें 171 पायलटों की जान गई। हालांकि, एयर मार्शल बरार कहते हैं, “पायलटों की शहादत दुखद है, लेकिन मिग-21 ने कभी हमें ऑपरेशन्स में निराश नहीं किया। अगर हादसे हुए, तो उनके पीछे कई वजह थीं। दुनिया की दूसरी वायु सेनाओं में भी हादसों की दर कम नहीं रही है।”
2019 में F-16 को मार गिराया
मिग-21 बाइसन की एयर पावर का एक और उदाहरण 2019 में देखने को मिला। उस समय विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान ने अपने मिग-21 से पाकिस्तान के F-16 को मार गिराया। हालांकि पाकिस्तान ने इस दावे से इंकार किया, लेकिन भारत ने असलियत दुनिया के सामने रखी। यहां तक कि इस घटना के बाद अमेरिका भी अचंभे में पड़ गया था। क्योंकि अमेरिका का मानना था कि उसके एफ-16 फााइटर जेट को गिराना इतना आसान नहीं है।
400 से अधिक मिग-21
एक समय ऐसा था जब भारतीय वायुसेना के पास 19 स्क्वॉड्रन में 400 से अधिक मिग-21 तैनात थे। 2017 से 2024 के बीच कम से कम चार स्क्वॉड्रन को चरणबद्ध तरीके से हटाया गया। असल में मिग-21 को 2022 तक रिटायर किया जाना था, लेकिन स्वदेशी लड़ाकू विमान तेजस की धीमी डिलीवरी के चलते इसे कुछ साल और सेवा में बनाए रखा गया।
मिग-21 को हमेशा उसकी तेज रफ्तार और चुस्ती के लिए पहचाना गया। यही वजह थी कि इसे लंबे समय तक भारतीय वायुसेना की रीढ़ माना गया। यह विमान इतनी रफ्तार से उड़ सकता था कि दुश्मन को पलभर में मात दे दे। इस सुपरसोनिक जेट की टॉप स्पीड 2,174 किलोमीटर प्रति घंटा थी, जिसे मैक 1.76 कहा जाता है। यानी यह ध्वनि की गति से लगभग दोगुना तेज उड़ सकता था। इसका स्ट्रक्चर 14.7 मीटर लंबा और 7.15 मीटर चौड़ा (विंगस्पैन) था। ऊंचाई की बात करें तो यह विमान 18,000 मीटर तक उड़ान भरने में सक्षम था।
ईंधन के मामले में मिग-21 में 3,831 लीटर क्षमता वाला टैंक था, जिससे यह लंबी दूरी भी तय कर सकता था। इसके अलावा, यह विमान 9,800 किलोग्राम तक का अधिकतम भार लेकर उड़ सकता था। इसमें हथियार, मिसाइल और अन्य जरूरी उपकरण शामिल रहते थे।
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HAL ने बनाया भारत का मिग-21
हालांकि यह विमान सोवियत संघ में डिजाइन हुआ था, लेकिन भारत में इसकी असेंबली और उत्पादन का जिम्मा हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने उठाया। भारत में 1,200 से अधिक मिग-21 तैयार किए गए, जो वायुसेना की रीढ़ साबित हुए।
2000 के दशक में भारतीय वायुसेना और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने मिग-21 में बड़ा अपग्रेड भी किया। पुराने इंजनों की खामियों को सुधारा गया और आधुनिक उपकरण लगाए गए। इस अपग्रेडेड संस्करण को मिग-21 बाइसन नाम दिया गया। 2001 में इसके आधुनिक रूप को पहली बार शामिल किया गया और इसकी पहली स्क्वॉड्रन बनी 3 स्क्वॉड्रन कोबरा।
क्या होती है नंबर प्लेटिंग?
वायुसेना की भाषा में नंबर प्लेटिंग का मतलब है कि कोई स्क्वॉड्रन अस्थायी तौर पर सक्रिय नहीं रहती। उसका नाम, इतिहास और परंपरा सुरक्षित रखी जाती है। जब भविष्य में नए एयरक्राफ्ट उपलब्ध होते हैं, तो उसी स्क्वॉड्रन को फिर से उसी नाम और पहचान के साथ सक्रिय किया जाता है। इस बार मिग-21 के रिटायरमेंट के बाद जब स्क्वॉड्रन को नए स्वदेशी लड़ाकू विमान तेजस एमके1ए मिलेंगे, तो वही स्क्वॉड्रन अपने गौरवशाली इतिहास और परंपराओं के साथ फिर से उड़ान भरेंगी।
वायुसेना प्रमुख ने उड़ान भर दी श्रद्धांजलि
मिग-21 की विदाई से पहले वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने खुद इस विमान में उड़ान भरी। राजस्थान के नाल एयरबेस से उन्होंने मिग-21 में उड़ान भरी। दिलचस्प बात यह है कि एयर चीफ ने अपने फ्लाइंग करियर की शुरुआत भी मिग-21 से ही की थी। इस उड़ान से पहले एयर चीफ ने एक दिन तक मिग-21 की पूरी ट्रेनिंग ली और फिर अगले दिन सोलो उड़ान भरी। उन्होंने मिग-21 को फॉर्मेशन उड़ान में भी शामिल किया। यह दो मिग-21 विमानों की फॉर्मेशन थी, जिसमें एक विमान को स्क्वॉड्रन लीडर प्रिया उड़ा रही थीं और दूसरा एयर चीफ़ खुद संभाल रहे थे। इस फॉर्मेशन की कमान स्क्वॉड्रन लीडर प्रिया के हाथों में थी। इस उड़ान के साथ एयर चीफ मार्शल सिंह ने न सिर्फ अपने करियर की यादों को ताजा किया बल्कि मिग-21 को एक सम्मानजनक विदाई भी दी।
मिग-21 उड़ाने वाले एयरफोर्स चीफ्स
भारतीय वायुसेना में मिग-21 का सफर सिर्फ पायलटों तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि वायुसेना प्रमुखों के करियर का भी सााथी रह। पूर्व एयर चीफ मार्शल आरकेएस भदौरिया ने अपने रिटायरमेंट से महज 15 दिन पहले इस लड़ाकू विमान में आखिरी उड़ान भरी थी। 13 सितंबर 2021 को उन्होंने हलवारा स्थित 23 स्क्वॉड्रन से मिग-21 उड़ाया। दिलचस्प बात यह रही कि भदौरिया का फ्लाइंग करियर भी इसी ‘पैंथर्स’ स्क्वॉड्रन से मिग-21 उड़ाते हुए शुरू हुआ था और उसी स्क्वॉड्रन, उसी एयरबेस और उसी विमान के साथ उनका करियर पूरा हुआ।
इससे पहले, सितंबर 2019 में तत्कालीन एयर चीफ मार्शल बीएस धनोआ ने भी अपने रिटायरमेंट से पहले मिग-21 में उड़ान भरी। यह उड़ान उन्होंने उस समय के विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान के साथ मिग-21 के दो-सीटर वर्जन में भरी थी। धनोआ का मिग-21 से रिश्ता करगिल युद्ध से भी जुड़ा रहा। 1999 में उन्होंने फ्रंटलाइन ग्राउंड अटैक स्क्वॉड्रन की कमान संभाली थी।
मई 2019 में, करगिल युद्ध में शहीद हुए स्क्वॉड्रन लीडर अजय आहूजा को श्रद्धांजलि देने के लिए धनोआ ने मिग-21 से ‘मिसिंग मैन’ फॉर्मेशन में उड़ान भरी थी। उस समय उन्होंने मिग-21 टाइप 96 उड़ाया। जनवरी 2017 में भी उन्होंने उत्तरलाई एयरबेस से सिंगल-सीटर मिग-21 उड़ाया था।
धनोआ से पहले, किसी एयरफोर्स चीफ ने अकेले मिग-21 उड़ान 2000-2001 में भरी थी। उस वक्त एयर चीफ मार्शल एवाई टिपनिस (सेवानिवृत्त) ने बरेली और चंडीगढ़ से मिग-21 में उड़ान भरकर यह संदेश दिया था कि डेल्टा-विंग वाला यह विमान पूरी तरह सक्षम है और अपने समय में वायुसेना की रीढ़ रहा है।
Modi Xi Putin SCO: तियानजिन में एससीओ समिट के दौरान पीएम मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की फोटो वायरल हुई। इस फोटो में दुनिया की तीन महाशक्तियां एक साथ नजर आ रही हैं। वहीं इन तस्वीरों के अलग-अलग मायने भी निकाले जा रहे हैं। इस तस्वीर को न्यू ग्लोबल ऑर्डर से जोड़ कर देखा जा रहा है। जानकारों का कहना है कि अगर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप भारत पर 50 फीसदी का टैरिफ न लगाते तो, तीनों का इस तरह साथ आना मुश्किल था। वहीं इस तस्वीर को आरआईसी यानी रूस, इंडिया और चीन स्ट्रक्चर से जोड़ कर देखा जा रहा है, जिसकी प्रस्तावना खुद रूस ने ही लिखी थी।
ट्रंप ने जब से व्हाइट हाउस में वापसी की है, उन्होंने भारत पर 50% तक भारी टैरिफ लगा दिए हैं। इस वजह से भारत की स्टील, ऑटोमोबाइल और दवा जैसी इंडस्ट्रीज को लगड़ा झटका लगा है। ट्रंप के सलाहकारों ने सार्वजनिक तौर पर मोदी सरकार की नीतियों को “अनफेयर” और “लूट” तक कह दिया। ट्रंप ने खुद कहा, “इंडिया हमें बहुत बड़ा चूना लगा रहा है, अब हमें सख्त जवाब देना होगा।”
भारत ने ट्रंप के इन कदमों का जवाब ट्रेड वार से नहीं दिया, बल्कि दरवाजा बातचीत के लिए खुला रखा। संदेश साफ था कि दशकों से बने भारत-अमेरिका रिश्तों को एक राष्ट्रपति की आक्रामक नीतियों के कारण खराब नहीं किया जाएगा।
लेकिन ट्रंप सरकार की टैरिफ और लगातार हो रही बयानबाजी ने भारत को नई रणनीतिक सोच अपनाने पर मजबूर किया। भारत अब मल्टीपोलर और मल्टीलेटरल व्यवस्था का पक्षधर बनकर उभर रहा है, जिसमें वह रूस और चीन के साथ मिलकर वैश्विक संतुलन की दिशा तय करने की कोशिश कर रहा है।
सबसे बड़ी समस्या यह है कि ड्रोन में इस्तेमाल होने वाले जरूरी कंपोनेंट्स कहां बन रहे हैं और कहां से आ रहे हैं, यह पता लगाना मुश्किल है। इनमें इलेक्ट्रॉनिक स्पीड कंट्रोलर, फ्लाइट कंट्रोलर, ट्रांसमीटर, रिसीवर, एन्क्रिप्शन और ऑथेंटिकेशन सिस्टम शामिल हैं…https://t.co/rdYsLgAGyc…
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) September 1, 2025
विशेषज्ञों का कहना है कि जैसे शीत युद्ध के बाद भारत-अमेरिका संबंध सामान्य हुए थे, वैसे ही आज की परिस्थितियां भी रणनीतिक प्राथमिकताओं के हिसाब से भारत को नए रास्ते चुनने पर मजबूर कर रही हैं। भारत और चीन के नजदीक आने की बड़ी वजह भी ट्रंप की विनाशकारी नीतियां हैं, जो न केवल अमेरिका बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए खतरनाक है।
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि एससीओ का यह फोटो अमेरिका को लंबे समय तक परेशान करेगा। ट्रंप को इसके लिए नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिए, क्योंकि उनकी टैरिफ नीति ही नए ग्लोबल ऑर्डर की शुरुआत का मोड़ साबित हो रही है।
Modi Xi Putin SCO: भारत-रूस-चीन (RIC) की अहमियत
भारत, रूस और चीन का पुराना आरआईसी स्ट्रक्चर और एससीओ अब ऐसे मंच बनते दिख रहे हैं, जहां भारत खुद को अमेरिका और पश्चिमी देशों की नीतियों के मुकाबले एक स्वतंत्र ताकत के रूप में पेश कर रहा है। जुलाई में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था, “बहुध्रुवीय दुनिया हमारी सबसे बड़ी ताकत है और हमें देखना होगा कि ब्रिक्स आने वाले समय में इसका मार्गदर्शन कैसे कर सकता है।” वहीं, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी भारत का समर्थन करते हुए कहा था, “हम एकतरफा संरक्षणवाद का विरोध करने में एकजुट खड़े हैं।”
Modi Xi Putin SCO: RIC को जिंदा करने की कोशिश
रूस की मध्यस्थता को समझने के लिए RIC यानी रूस-भारत-चीन त्रिकोण की पृष्ठभूमि जानना जरूरी है। इस विचार को 1998 में रूस के प्रधानमंत्री रहे येवगेनी प्रिमाकोव ने पेश किया था। उनका मानना था कि यह त्रिपक्षीय सहयोग अमेरिकी प्रभुत्व का संतुलन बना सकता है। तब से मास्को इस मंच को मजबूत करने की कोशिश करता आ रहा है।
2025 के हालात में भी रूस फिर से उसी आरआईसी को जिंदा करने की कोशिश कर रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों ने भारत के साथ रिश्तों में तनाव पैदा किया है। व्यापार पर 50% तक के शुल्क ने नई दिल्ली को परेशान किया और वॉशिंगटन ने बार-बार भारत की डिफेंस पॉलिसी की आलोचना की।
इसी माहौल में रूस ने भारत को साधने का प्रयास तेज किया है। मास्को जानता है कि अगर भारत उसके साथ बना रहता है, तो पश्चिमी देशों का दबाव कम किया जा सकता है। यही वजह है कि पुतिन और लावरोव बार-बार आरआईसी को पुनर्जीवित करने की बात करते हैं।
2020-2021 के बाद आरआईसी काफी हद तक निष्क्रिय हो गया। कोविड महामारी और भारत-चीन तनाव ने इसे कमजोर किया। लेकिन 2024-2025 में इसे पुनर्जीवित करने की कोशिशें शुरू हुईं। मई 2025 में रूसी विदेश मंत्री लावरोव ने अपनी भारत यात्रा के दौरान आरआईसी को बहाल करने की अपील की। चीन ने इसका समर्थन किया, लेकिन भारत ने सावधानी बरती।
रूस का दांव और “ग्रेटर यूरेशिया”
दरअसल मास्को लंबे समय से चाहता है कि भारत और चीन के बीच स्थिरता बनी रहे ताकि वह अपने ‘ग्रेटर यूरेशिया’ विजन को आगे बढ़ा सके। इस विजन को राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने 2015 में सामने रखा था। इसके तहत रूस चाहता है कि एशिया-यूरोप के बड़े देश और क्षेत्रीय संगठन एक साझा धुरी पर काम करें। भारत, चीन और रूस इस धुरी के सबसे अहम हिस्से हैं।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर राजन कुमार का मानना है कि रूस द्वारा रूस-भारत-चीन (RIC) प्रारूप को दोबारा शुरू करने की कोशिश “रूस की केवल इच्छाशक्ति हो सकती है, जो मौजूदा वास्तविक दुनिया और मौजूदा भू-राजनीतिक हालात में संभव नहीं दिखती।” हालांकि, उन्होंने रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव की इस चेतावनी से सहमति जताई कि पश्चिमी देश भारत-चीन संबंधों को “फूट डालो और राज करो” की नीति के जरिए कमजोर करना चाहते हैं।
Drone Security: ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेनाओं का फोकस ड्रोन टेक्नोलॉजी पर है। ड्रोन को लेकर सेनाओं में नई फॉर्मेशन की जा रही हैं। वहीं ड्रोन में इस्तेमाल होने वाले कंपोनेंट्स को लेकर भी सेना में लगातार सवाल उठते रहे हैं। सरकार ने कुछ समय पहले एक एडवाइजरी भी जारी करके ड्रोन बनाने वाली कंपनियों से कहा था कि वे अपने ड्रोनों में चीनी पार्ट्स का इस्तेमाल न करें। इसके लिए सरकार एक पॉलिसी भी लाने की तैयारी कर रही है, जिसे जल्द मंजूरी मिलने की संभावना है। वहीं, सेना, नौसेना और वायुसेना के अफसरों ने सरकार से कहा है कि भारतीय ड्रोनों में इस्तेमाल होने वाले कई कंपोनेंट्स कहां से आ रहे हैं, यह पता लगाना मुश्किल है।
सूत्रों ने बताया कि सबसे बड़ी समस्या यह है कि ड्रोन में इस्तेमाल होने वाले जरूरी कंपोनेंट्स कहां बन रहे हैं और कहां से आ रहे हैं, यह पता लगाना मुश्किल है। इनमें इलेक्ट्रॉनिक स्पीड कंट्रोलर, फ्लाइट कंट्रोलर, ट्रांसमीटर, रिसीवर, एन्क्रिप्शन और ऑथेंटिकेशन सिस्टम शामिल हैं। इन कंपोनेंट्स में से कई के बारे में संदेह जताया जा रहा है कि वे चीन से आए हैं। इनमें से कई कंपोनेंट्स स्मगलिंग के जरिए भारत लाए जाते हैं, ऐसा सप्लाई चेन को छिपाने के लिए किया जाता है। ये कई देशों से भारत लाए जाते हैं, जिससे यह पता नहीं चलता कि इन्हें कहां और किस देश में बनाया गया है। वहीं ये कंपोनेंट्स भारत में बन रहे कई ड्रोनों में भी इस्तेमाल हो रहे हैं। अब ये चीन में बने हैं या किसी और देश के, ये पता लगाना मुश्किल है।
Drone Security: भारतीय सेना में DJI ड्रोन
आज भी सेना में चीनी कंपनी डीजेआई के ड्रोन जमकर इस्तेमाल किए जा रहे हैं। ये ड्रोन न केवल राजधानी बल्कि चीनी सरहद एलएसी से सटे रणनीतिक इलाकों में भी खूब इस्तेमाल किए जा रहे हैं। सेना के वरिष्ठ अफसरों से जब इसके बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि यह ड्रोन पहले खरीदे गए थे, फिलहाल कोई भी ड्रोन चीन से नहीं खरीदा गया है। वहीं पुराने ड्रोनों को चरणबद्ध तरीके से हटाया जाएगा। लेकिन तब तक ये ड्रोन भारतीय सेना के लिए बड़ा खतरा बने रहेंगे।
Drone Security: चीन का साइबर सुरक्षा कानून बड़ा खतरा
सूत्रों का कहना है कि चीन का 2015 का साइबर सुरक्षा कानून एक बड़ा खतरा है। इस कानून के तहत हर चीनी कंपनी को अपने प्रोडक्ट्स से जुड़ा डेटा सरकार के साथ साझा करना जरूरी है, चाहे वह डेटा चीन के अंदर से आया हो या दुनिया के किसी और हिस्से से। रक्षा सूत्रों के मुताबिक, इसका मतलब है कि अगर भारतीय सेनाओं के ड्रोन सिस्टम में चीनी सब-सिस्टम लगा है, तो उसकी मदद से लाइव या रिकॉर्डेड डेटा चीन तक पहुंच सकता है। यह डेटा दुश्मन देशों के सर्वर तक जा सकता है और भारत की सुरक्षा को बड़ा खतरा पैदा कर सकता है।
Drone Security: विदेशी सैटेलाइट का इस्तेमाल
भारतीय सेनाओं के लिए दूसरी बड़ी समस्या है ड्रोन ऑपरेशन में विदेशी सैटेलाइट नेटवर्क का इस्तेमाल। अभी भारतीय सेना के कई ड्रोन स्टारलिंक या चीन के कियानफान जैसे विदेशी सैटेलाइट पर निर्भर हैं। भारत का स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम NavIC अभी पूरी तरह से काम नहीं कर रहा है। इसके चलते भारत को विदेशी जीपीएस पर भरोसा करना पड़ रहा है। बता दें कि 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान अमेरिका ने भारत को जीपीएस डेटा देने से मना कर दिया था।
Drone Security: नौसेना भी विदेशी कंपनियों पर निर्भर
सूत्रों के मुतााबिक भारतीय नौसेना के बेड़े में मौजूद कई रिमोटली पायलेटेड एयरक्राफ्ट (RPA) भी विदेशी कंपनियों पर निर्भर हैं। वहीं नौसेना को समुद्री नक्शे (mapping) के लिए उन्हें विदेशी ऑरिजनल इक्विपमेंट्स मैन्युफैक्चर्रर्स के पर भरोसा रहना पड़ता है, जो ऑपरेशनल इंडीपेंडेंस के लिहाज से सही नहीं है। इसके अलावा, नौसेना के ड्रोन ऐसे सॉफ्टवेयर्स पर चलते हैं जिन्हें समय-समय पर अपडेट की जरूरत होती है। ये अपडेट विदेशी कंपनियों से भेजे जाते हैं। सूत्र बताते हैं कि अपडेट्स में लंबा वक्त लगता है और उस दौरान सिस्टम के हैक होने का डेटा चोरी होने का बड़ा खतरा होता है। इसके अलावा नौसेना भी विदेशी सैटेलाइट सर्विस प्रोवाइडर्स पर भी निर्भर है, जिससे ऑपरेशनल डेटा के लीक होने का खतरा हमेशा बना रहता है।
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) August 30, 2025
एक साल से अटकी है पॉलिसी!
सूत्रों के मुताबिक, भारत सरकार जल्द ही सेना में इस्तेमाल होने वाले ड्रोनों के लिए सिक्योरिटी फ्रेमवर्क पॉलिसी लाने की तैयारी कर रही है। आर्मी डिजाइन ब्यूरो की तरफ से इसका प्रपोजल सरकार को पहले ही सौंपा जा चुका है। सितंबर या अक्टूबर तक इस पॉलिसी को मंजूरी मिल जाएगी। लेकिन तब तक भारतीय सेनाओं को ऐसे सिस्टम्स पर काम करना पड़ रहा है, जिनमें न केवल संदिग्ध विदेशी तकनीक शामिल है, बल्कि डेटा लीक और हैकिंग का खतरा भी लगातार बना हुआ है।
भारतीय बाजार में उपलब्ध ज्यादातर ड्रोन और क्वाडकॉप्टर या तो पूरी तरह चीनी हैं या फिर उनमें चीनी कंपोनेंट्स का इस्तेमाल किया गया है। जिसके चलते सेना ने ड्रोन खरीद से जुड़ी नई नीति लागू की है। पहले केवल इतना सर्टिफिकेट देना काफी होता था कि ड्रोन में कोई चीनी कंपोनेंट का इस्तेमाल नहीं हुआ है। लेकिन अब इसके साथ एक और जरूरी शर्त जोड़ दी गई है।
कंपनियों को यह भी सर्टिफिकेट देना होगा कि ड्रोन में कोई “मिलिशियस कोड” यानी ऐसा सॉफ्टवेयर या प्रोग्राम मौजूद नहीं है, जो सिस्टम को हैक कर सके या नेटवर्क को नुकसान पहुंचा सके। जांच के दौरान जिन ड्रोनों में चीनी पार्ट्स पाए जाते हैं, उन्हें तुरंत रेस से बाहर कर दिया जाता है और संबंधित कंपनियों के कॉन्ट्रैक्ट रद्द कर दिए जाते हैं। इसी के चलते पिछले साल एक कंपनी का बड़ा कॉन्ट्रैक्ट रद्द कर दिया गया था। सेना ने इस कंपनी से तीन अलग-अलग तरह के लॉजिस्टिक ड्रोनों की खरीद का ऑर्डर दिया था। लेकिन जांच में गड़बड़ी सामने आने के बाद सौदा रोक दिया गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, जिन ड्रोनों की डिलीवरी कैंसिल की गई, उनकी संख्या लगभग 400 के आसपास थी।
साथ ही, रक्षा मंत्रालय में इस सुझाव पर भी चर्चा हो रही है कि यूएवी और काउंटर-यूएवी के अहम पुर्जों को “पॉजिटिव इंडिजेनाइजेशन लिस्ट” में जोड़ा जाए। इसका मतलब यह होगा कि तय समय सीमा के बाद इन पुर्जों का आयात पूरी तरह बंद कर दिया जाएगा और इन्हें सिर्फ भारत में ही बनाया जाएगा। साथ ही मार्च 2019 में जारी की गई “डिफेंस प्लेटफॉर्म्स में इस्तेमाल होने वाले कंपोनेंट्स और स्पेयर्स की इंडिजेनाइजेशन पॉलिसी” की दोबारा समीक्षा करने की बात भी कही गई है। इसके तहत भारतीय कंपनियों द्वारा बनाए गए पुर्जों का मुफ्त और बिना किसी शर्त के टेस्टिंग की जा सकेगी।
Modi-Xi Meeting in Tianjin: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात शंघाई सहयोग संगठन (SCO) सम्मेलन के दौरान तियानजिन में हुई। यह बैठक ऐसे समय में हुई जब भारत और अमेरिका के रिश्तों में ट्रंप प्रशासन की टैरिफ पॉलिसी के चलते तनाव आया है। लिहाजा, इस मुलाकात पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी थीं।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “हमारे विशेष प्रतिनिधियों के बीच बॉर्डर मैनेजमेंट को लेकर सहमति बनी है। कैलाश मानसरोवर यात्रा फिर से शुरू हुई है और दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानों को भी बहाल किया जा रहा है। 2.8 अरब लोगों के हित आपसी सहयोग से जुड़े हैं। भारत रिश्तों को आपसी विश्वास, सम्मान और संवेदनशीलता के आधार पर आगे ले जाना चाहता है।”
राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा, “दुनिया परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। भारत और चीन दो सबसे प्राचीन सभ्यताएं हैं। हम दोनों ग्लोबल साउथ का हिस्सा हैं। ड्रैगन और एलिफेंट का साथ आना एशिया और पूरी दुनिया के लिए जरूरी है।”
Modi-Xi Meeting in Tianjin: सीमा पर क्या हैं हालात: शांति लेकिन नहीं है भरोसा
हालांकि भारत और चीन ने डिसएंगेजमेंट की प्रक्रिया पूरी करने का दावा किया है, लेकिन जमीनी हालात अब भी चिंताजनक हैं। सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, “गलवान और पैंगोंग झील के उत्तरी किनारे पर अस्थायी बफर जोन बनाए गए थे। इन्हें अस्थायी कहा गया था, लेकिन अब तक गश्त पूरी तरह बहाल नहीं हुई। भारतीय जवान उन इलाकों में नहीं जा पा रहे जिन्हें वे पहले नियमित रूप से गश्त करते थे।”
एक अन्य अधिकारी ने बताया, “पीएलए की कई ब्रिगेड अब भी आगे की चौकियों पर मौजूद हैं। उनके पास टैंक, तोपें और सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम तैनात हैं। उन्होंने अपने डिफेंस रेजिमेंट्स को पीछे नहीं हटाया है। यह भरोसा न होने की सबसे बड़ी वजह है।”
पूर्वी लद्दाख में तैनात एक अधिकारी ने कहा, “हमारी प्राथमिकता पैट्रोलिंग राइट्स को बहाल करना है। जब तक हमारे जवान पारंपरिक इलाकों में गश्त नहीं कर पाते, तब तक सीमा पर स्थायी शांति की बात अधूरी रहेगी।”
पूर्वी लद्दाख में 2020 से 2022 के बीच बने “नो पैट्रोल बफर जोन” भारत के लिए नुकसानदेह साबित हुए हैं। इनमें गलवान, पैंगोंग त्सो का उत्तर किनारा, कैलाश रेंज और गोगरा-हॉट स्प्रिंग्स जैसे क्षेत्र शामिल हैं। ये बफर जोन अस्थायी तौर पर बनाए गए थे, जिनकी चौड़ाई 3 से 10 किलोमीटर तक है। भारतीय अधिकारियों के मुताबिक, इन्हें केवल अस्थायी व्यवस्था के तौर पर स्वीकार किया गया था, लेकिन अब तक कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है।
Modi-Xi Meeting in Tianjin: सीमा विवाद अब भी वहीं का वहीं
सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ रिटायर्ड कोमोडर सी. उदय भास्कर ने कहा, “तियानजिन में जो हुआ उसे प्रगति तो कहा जा सकता है, लेकिन इसे ‘ब्रेकथ्रू’ कहना सही नहीं होगा। सीमा विवाद अब भी वहीं का वहीं है। दोनों देशों की कोशिश फिलहाल संवाद बनाए रखने और रिश्तों को स्थिर करने तक ही सीमित है।”
उन्होंने कहा, तियानजिन बैठक का नतीजा सावधानी से स्वागत करने लायक है। यह दोनों नेताओं का उस सहमति को राजनीतिक स्तर पर समर्थन था, जो अगस्त की शुरुआत में चीन के विदेश मंत्री वांग यी की दिल्ली यात्रा के दौरान बनी थी। भारत सरकार के आधिकारिक बयान में कहा गया कि “दोनों नेताओं ने पिछले साल रूस के कजान में हुई मुलाकात के बाद से रिश्तों में सकारात्मक प्रगति और स्थिरता का स्वागत किया।”
Modi-Xi Meeting in Tianjin: संदेह और अविश्वास कायम है
पूर्व राजनयिक विजय गोखले का कहना है, तियानजिन में सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात को न केवल दिल्ली बल्कि दुनिया की कई राजधानियों में गंभीरता से देखा जा रहा है। उन्होंने कहा, “भारत हमेशा से चाहता है कि चीन के साथ कामकाजी रिश्ते बने रहें। लेकिन 2020 की गलवान झड़प ने उस प्रक्रिया को झटका दिया था। अब तियानजिन की बैठक को उसी प्रक्रिया की बहाली माना जा रहा है। फिर भी संदेह और अविश्वास कायम है।”
वह कहते हैं, राजीव गांधी के बाद से भारत के हर प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने चीन के साथ स्थिर रिश्ते बनाए रखने की कोशिश की है। नरेंद्र मोदी भी इससे अलग नहीं हैं। हालांकि यह सच है कि मौजूदा भारत-चीन संबंध हाल के दशकों की तुलना में कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण हैं, लेकिन हर प्रधानमंत्री को यही उम्मीद रही है कि वे सीमा पर स्थिरता लाएंगे और चीन के साथ संबंधों को सही दिशा में मोड़ेंगे।
उन्होंने कहा, हालांकि, यह भी सच है कि भारत-चीन संबंधों ने कई बार गंभीर झटके खाए हैं। 2017 का डोकलाम संकट, 2020 की गलवान झड़प ने इस दिशा में हुई प्रगति को बाधित किया है। इस बार भी, तिआनजिन की बैठक से उम्मीद की जा रही है कि यह फिर से दोनों देशों के बीच भरोसे का माहौल बना सकती है। इसके साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि भारत और चीन, दो बड़े एशियाई देश, वैश्विक अस्थिरता के दौर में स्थिरता बनाए रखने की दिशा में एक साझा इच्छा रखते हैं।
उन्होंने कहा कि भारत को अब देखना होगा कि चीन के शब्दों के पीछे ठोस कार्रवाई भी होती है या नहीं। चीन ने पहले भी कहा है कि भारत को कृषि उत्पाद, दवा उद्योग और आईटी सेवाओं के लिए बड़ा बाजार मिलेगा। लेकिन जब भी भारत ने अपने निर्यात को बढ़ाने की कोशिश की, तो चीन ने गैर-शुल्क बाधाओं और “प्रतिबंधों” का सहारा लिया।
वह आगे कहते हैं, भारत को यह समझना होगा कि अमेरिका अगर अपनी विदेश नीति को केवल अपने स्वार्थ के आधार पर पुन: संतुलित करता है, तो भारत को भी चीन के साथ रणनीतिक पुनर्संतुलन तलाशने का अधिकार है। भारत के लिए अब सवाल यह है कि क्या वह चीन और अमेरिका दोनों के साथ संतुलित संबंध बनाए रख सकता है। तिआनजिन की बैठक इस बात का संकेत हो सकती है कि भारत एक नए संतुलन की ओर बढ़ रहा है, जहां भारत-चीन संबंध और भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी साथ-साथ चलें।
Modi-Xi Meeting in Tianjin: कांग्रेस ने उठाए सवाल
कांग्रेस ने इस बैठक पर सवाल उठाए। पार्टी नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पर लिखा, “गलवान में 20 जवानों की शहादत के बावजूद मोदी सरकार चीन के साथ सुलह की राह पर है। प्रधानमंत्री ने चीन की आक्रामकता को नजरअंदाज कर दिया है।”
कांग्रेस के आधिकारिक हैंडल से पोस्ट किया गया, “ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन पाकिस्तान की मदद कर रहा था। फिर भी प्रधानमंत्री मोदी ने शी जिनपिंग से हाथ मिलाया और मुस्कुराते हुए तस्वीरें खिंचवाईं।”
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) September 1, 2025
चीनी सेना अभी भी अग्रिम मोर्चों पर
भारतीय सेना के एक वरिष्ठ कमांडर ने कहा, “चीनी सेना की कुछ ब्रिगेड जरूर 100 किलोमीटर पीछे हटी हैं, लेकिन कई अब भी अग्रिम मोर्चों पर मौजूद हैं। इसका मतलब यह है कि वे किसी भी वक्त अपनी स्थिति बदल सकते हैं। हमें हर स्थिति के लिए तैयार रहना होता है। डिप्लोमेसी जरूरी है, लेकिन हमारी जिम्मेदारी है कि किसी भी संभावित खतरे का सामना करने के लिए हम तैयार रहें।” एक कॉम्बाइंड आर्म्स ब्रिगेड में लगभग 4,500 से 5,000 सैनिक होते हैं, जिनके पास टैंक, बख्तरबंद गाड़ियां, तोपखाना और सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें होती हैं।
उन्होंने आगे कहा, “चीनी सेना ने सीमा पर बुनियादी ढांचे का विस्तार किया है। नई सड़कें, पुल और एयरबेस बनाए हैं। हमें बराबरी पर खड़े रहने के लिए बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है।” उन्होंने साफ कहा, “भले ही सीमा पर अब स्थिति पहले जैसा ‘हाई अलर्ट’ नहीं है, लेकिन अविश्वास बना हुआ है। जब तक डिएस्केलेशन और डी-इंडक्शन पूरा नहीं होता, तब तक कोई भी पक्ष ढील नहीं देगा।”
व्यापार असंतुलन का क्या होगाा?
तियानजिन में हुई बैठक में आर्थिक मुद्दों पर भी बात हुई। भारत ने व्यापार असंतुलन का मुद्दा उठाया। चीन भारत से कम खरीदता है जबकि भारत चीन से मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और रोजमर्रा की चीजें बड़ी मात्रा में आयात करता है।
इसके अलावा, चीन द्वारा यारलुंग त्सांगपो (ब्रह्मपुत्र) पर विशाल जलविद्युत परियोजना बनाए जाने की योजना पर भारत ने अपनी चिंता जताई। सूत्र मानते हैं कि इसका असर असम और अरुणाचल प्रदेश के जल संसाधनों पर पड़ सकता है। क्योंकि चीन ने हाइड्रोलॉजिकल डेटा शेयर करने को लेकर कुछ भी नहीं कहा है।
Woman IAF pilot: दिल्ली हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए केंद्र सरकार को आदेश दिया है कि एक महिला उम्मीदवार को भारतीय वायुसेना में पायलट के पद पर नियुक्त किया जाए। कोर्ट ने कहा कि आज के समय में सशस्त्र बलों में लैंगिक भेदभाव की कोई जगह नहीं है।
यह फैसला जस्टिस सी. हरि शंकर और जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला की बेंच ने सुनाया। मामला 2023 में आयोजित नेशनल डिफेंस एकेडमी और नेवल एकेडमी परीक्षा से जुड़ा हुआ था, जिसमें महिला उम्मीदवार ने सातवां स्थान हासिल किया था।
Woman IAF pilot: क्या है पूरा मामला
याचिकाकर्ता ने कोर्ट में दलील दी थी कि 17 मई 2023 को जारी नोटिफिकेशन के तहत वायुसेना की फ्लाइंग ब्रांच में 92 पद निकाले गए थे, जिनमें से केवल दो सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित थीं। नतीजों की घोषणा के बाद दोनों महिला सीटें भर गईं, लेकिन कुल 90 में से केवल 70 सीटें ही भरी गईं और बाकी 20 पद खाली रह गए।
महिला याचिकाकर्ता ने कोर्ट से आग्रह किया कि उसे इन 20 खाली पदों में से एक पर नियुक्ति दी जाए। उसने कहा कि भर्ती के नोटिफिकेशन में कहीं भी यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि 90 सीटें केवल पुरुष उम्मीदवारों के लिए आरक्षित हैं।
केंद्र सरकार ने दिया ये तर्क
केंद्र सरकार की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि शेष 90 सीटें केवल पुरुष उम्मीदवारों के लिए थीं। उनका कहना था कि इन खाली पदों को बाद में अन्य भर्ती प्रक्रियाओं जैसे एयरफोर्स कॉमन एडमिशन टेस्ट (AFCAT) और संयुक्त रक्षा सेवा परीक्षा (CDSE) के जरिए भरा जाएगा।
हालांकि, अदालत ने इस तर्क को खारिज कर दिया। जजों ने कहा कि नोटिफिकेशन में कहीं भी यह उल्लेख नहीं था कि 90 पद केवल पुरुषों के लिए सुरक्षित हैं। यह पद महिला और पुरुष दोनों उम्मीदवारों के लिए खुले थे।
कोर्ट ने सख्त शब्दों में कहा कि “आज के समय में महिला और पुरुष के बीच का फर्क केवल एक क्रोमोसोमल परिस्थिति है। इससे अधिक महत्व देना न तो तार्किक है और न ही प्रासंगिक। हम सौभाग्य से अब उस दौर में नहीं हैं जब पुरुष और महिला उम्मीदवारों के बीच भेदभाव किया जा सकता था।”
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) September 1, 2025
12 पन्नों के अपने फैसले में अदालत ने केंद्र को आदेश दिया कि महिला उम्मीदवार को तुरंत फ्लाइंग ब्रांच के 20 खाली पदों में से एक पर नियुक्त किया जाए।
कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार खुद अपनी नीतियों में लैंगिक संतुलन की बात करती है और अधिसूचना में भी यह लिखा गया था कि “सरकार ऐसी वर्कफोर्स चाहती है जो लैंगिक संतुलन को दर्शाती हो।” ऐसे में महिला उम्मीदवार को अवसर न देना भेदभाव होगा।
महिला उम्मीदवार ने न केवल परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन किया बल्कि उसके पास “फिट टू फ्लाई” मेडिकल सर्टिफिकेट भी था। इसके बावजूद उन्हें नियुक्ति नहीं मिली। याचिकाकर्ता के वकील साहिल मोंगिया ने कोर्ट में कहा कि उम्मीदवार महिला मेरिट लिस्ट में सातवें स्थान पर थीं और सभी आवश्यक योग्यताएं पूरी करती थीं।
उन्होंने दलील दी कि जब 20 सीटें खाली रह गईं, तो उन्हें भरने के लिए योग्य महिला उम्मीदवारों पर विचार किया जाना चाहिए था। अदालत ने भी इस दलील को सही ठहराते हुए कहा कि किसी भी योग्य उम्मीदवार को सिर्फ लिंग के आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
जस्टिस हरि शंकर और जस्टिस शुक्ला ने कहा कि भेदभाव को जगह देने का मतलब है अतीत की उन गलतियों को दोहराना, जो अब समाज में स्वीकार्य नहीं हैं। उन्होंने कहा कि सशस्त्र बलों में भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है और सरकार की नीतियां भी इसी दिशा में संकेत करती हैं।
बता दें कि हाल के वर्षों में महिलाओं की भूमिका भारतीय सशस्त्र बलों में लगातार बढ़ी है। वायुसेना में महिला पायलटों की संख्या भी पहले से अधिक हो रही है। इस फैसले के बाद महिला उम्मीदवारों के लिए और अधिक रास्ते खुल सकते हैं। महिला अधिकारियों को पहले से ही फाइटर पायलट, हेलीकॉप्टर पायलट और विभिन्न ग्राउंड ड्यूटी ब्रांचों में नियुक्त किया जा रहा है।
Indian Air Force Vice Chief Air Marshal Narmdeshwar Tiwari
Operation Sindoor IAF weapons: भारतीय वायुसेना के वाइस चीफ ऑफ एयर स्टाफ एयर मार्शल नरमदेश्वर तिवारी ने शनिवार को ऑपरेशन सिंदूर को लेकर बड़ा खुलासा किया। उन्होंने न केवल इस सैन्य अभियान के कई नए फुटेज शेयर किए बल्कि यह भी बताया कि भारतीय वायुसेना ने 50 से भी कम हथियारों का इस्तेमाल कर पाकिस्तान को सीज फायर की मेज पर बैठने पर मजबूर कर दिया।
दिल्ली में आयोजित एनडीटीवी डिफेंस समिट के दौरान एयर मार्शल तिवारी ने कहा कि पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत के सामने कई विकल्प थे। वायुसेना के पास टारगेट्स की लंबी सूची मौजूद थी, लेकिन इनमें से नौ प्रमुख ठिकानों को चुनकर निशाना बनाया गया। उन्होंने कहा, “सबसे अहम बात यह है कि 50 से कम हथियारों के इस्तेमाल करके हमने इस युद्ध को समाप्त कर दिया। यही इस अभियान का सबसे बड़ा सबक है।”
Operation Sindoor IAF weapons: पहलगाम हमले के बाद ऑपरेशन की तैयारी
22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 लोगों की जान चली गई थी। इस हमले के बाद भारत सरकार ने स्पष्ट किया कि जवाब कड़ा और साफ-साफ नजर आने वाला होना चाहिए। जिसके बाद 7 मई को भारतीय वायुसेना ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के तहत पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में मौजूद आतंकवादी ठिकानों पर सटीक हमले किए।
एयर मार्शल तिवारी ने बताया कि 24 अप्रैल तक सभी विकल्पों पर चर्चा पूरी हो चुकी थी और नौ टारगेट तय कर लिए गए थे। बस राजनीतिक मंजूरी का इंतजार था। 7 मई की सुबह भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में मौजूद आतंकी और मिलिट्री ठिकानों पर हमला किया। इसके लिए सुखोई-30 एमकेआई, राफेल और मिराज-2000 लड़ाकू विमानों से ब्रहमोस, स्कैल्प, क्रिस्टल मेज-2 और रैम्पेज मिसाइलें दागी गईं।
Operation Sindoor IAF weapons: यह थे तीन उद्देश्य
एयर मार्शल तिवारी ने बताया कि नई दिल्ली से सेना को तीन साफ-साफ निर्देश मिले थे। पहला, जवाब इतना मजबूत होना चाहिए कि दुश्मन और दुनिया दोनों इसे साफ देख सकें। दूसरा, यह कार्रवाई भविष्य के लिए एक संदेश बने और आतंकवादी हमले दोहराने की हिम्मत कोई न कर सके। तीसरा, तीनों सेनाओं को पूरी ऑपरेशनल स्वतंत्रता दी गई, ताकि हालात बिगड़ने पर वे पूरी तरह से युद्ध के लिए भी तैयार रहें।
उन्होंने कहा कि वायुसेना की सटीक कार्रवाई से यह संदेश साफ चला गया कि भारत आतंकवाद को किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं करेगा।
Operation Sindoor IAF weapons: चलाया SEAD/DEAD अभियान
हमले के उसी दिन शाम को पाकिस्तान की तरफ से ड्रोन और लॉयटरिंग म्यूनिशन भारतीय सीमाओं की ओर भेजे गए। एयर मार्शल तिवारी ने बताया कि करीब 300 से ज्यादा ड्रोन और हाइपरसोनिक CM-400 जैसे हथियारों का इस्तेमाल किया गया। लेकिन भारत के इंटग्रेटेड डिफेंस सिस्टम ने इन्हें नाकाम कर दिया।
रक्षा मंत्री ने प्रधानमंत्री द्वारा घोषित सुदर्शन चक्र मिशन को भारत की सुरक्षा का भविष्य बताया। इस मिशन के तहत अगले दस वर्षों में देश के अहम ठिकानों को स्वदेशी तकनीक से बने एयर डिफेंस सिस्टम से सुरक्षित किया जाएगाhttps://t.co/R2qV8KZ4Qp#RajnathSingh#DefenceNews…
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) August 30, 2025
भारतीय वायुसेना ने इसके जवाब में “SEAD/DEAD अभियान” चलाया। यानी दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को टारगेट किया गया। इसमें पाकिस्तान के कई राडार और सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल सिस्टम (SAM) को निशाना बनाया गया।
तिवारी ने कहा कि पाकिस्तान ने जानबूझकर अपना एयरस्पेस बंद नहीं किया था ताकि भारत पर किसी नागरिक विमान को गिराने का आरोप लगाया जा सके। लेकिन भारतीय वायुसेना ने बेहद सावधानी बरतते हुए केवल सैन्य ठिकानों को ही निशाना बनाया।
Operation Sindoor IAF weapons: सटीकता से कार्रवाई
8 और 9 मई को पाकिस्तान ने और बड़े पैमाने पर ड्रोन और हथियार दागे। उनका मकसद भारतीय एयर डिफेंस सिस्टम को थका देना था। लेकिन भारतीय वायुसेना ने न सिर्फ इसे विफल किया बल्कि पाकिस्तान के अहम एयरबेस और रडार ठिकानों को तबाह कर दिया।
भारतीय हमलों में चकला, सरगोधा, रहिम यार खान, साकर और मुरिदके जैसे ठिकानों को सटीकता से निशाना बनाया गया। तिवारी ने बताया कि पाकिस्तान ने कई रडार डर के मारे खुद ही बंद कर दिए गए ताकि वे भारतीय हमलों से बच सकें।
उन्होंने कहा, “हमारे हथियार इतने सटीक थे कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह आरोप भी नहीं लगा पाया कि नागरिक ठिकानों पर हमला हुआ है।”
ऑपरेशन सिंदूर में वायुसेना की रणनीति
एयर मार्शल तिवारी ने खुलासा किया कि ऑपरेशन सिंदूर में केवल हथियारों की संख्या पर नहीं, बल्कि उनके सही इस्तेमाल पर ध्यान दिया गया। उन्होंने कहा कि नौ ठिकानों को चुनकर सटीक हमले किए गए और इन्हीं हमलों से पाकिस्तान को संघर्ष विराम के लिए राजी होना पड़ा।
वायुसेना के मुताबिक, कम समय में तेज और निर्णायक हमले करने की क्षमता ही भारत की सबसे बड़ी ताकत है। इस पूरे अभियान के दौरान भारतीय सेनाओं के बीच तालमेल और टेक्टिकल प्लानिंग का लेवल स्तर देखने को मिला जिसने पाकिस्तान को चौंका दिया। उन्होंने खुलासा किया कि मई 2025 में चले इस अभियान में वायुसेना ने 50 से भी कम एयर-लॉन्च हथियारों का इस्तेमाल कर पाकिस्तान के एयरबेस, राडार साइट और कमांड सेंटर को तबाह कर दिया। इनमें से कई ठिकाने परमाणु प्रतिष्ठानों के नजदीक भी थे।
एयर मार्शल तिवारी ने कहा कि यह पूरा अभियान एक “टेक्स्टबुक उदाहरण” था कि कैसे सीमित संसाधनों से सटीक और निर्णायक वार किया जा सकता है। उन्होंने इसे “कोएर्सिव डिप्लोमेसी” यानी दबाव डालने वाली कूटनीति और लागत प्रभावी वायु शक्ति का बेहतरीन नमूना बताया।
एयर मार्शल तिवारी ने कहा, “यह पहली बार हुआ कि इतने कम हथियारों से हमने इस जंग को खत्म कर दिया। इससे हमारी योजना और एयरपावर की क्षमता का पता चलता है।”
तिवारी ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने यह दिखा दिया कि एयरपावर का इस्तेमाल अगर सटीक और योजनाबद्ध तरीके से किया जाए तो बड़े नतीजे हासिल किए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि यह अभियान इस बात का उदाहरण है कि भारत अब किसी भी आतंकी हमले का जवाब अपने तरीके से देने में सक्षम है।
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