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Explained: हिंद महासागर की निगरानी के लिए भारत बना रहा साइलेंट वॉरियर HEAUV, क्यों कहा जा रहा इसे नौसेना के लिए गेमचेंजर

Explained- Why India’s HEAUV is a Gamechanger for Naval Undersea Surveillance

HEAUV: डीआरडीओ ने अपने हाई एंड्योरेंस ऑटोनॉमस अंडरवाटर व्हीकल (HEAUV) का ट्रायल शुरू कर दिया है। यह एक ऐसा पानी के नीचे चलने वाला व्हीकल है जो बिना इंसान की मदद के खुद काम कर सकता है। पिछले एक साल से इसकी टेस्टिंग चल रही है और हाल ही में मार्च 2025 में एक झील में इसका सफल ट्रायल हुआ। DRDO ने बताया कि इस टेस्ट में HEAUV ने पानी की सतह पर और पानी के अंदर दोनों जगह शानदार प्रदर्शन किया। इसमें लगे सोनार और कम्युनिकेशन सिस्टम ने भी बिना किसी गड़बड़ी के काम किया।

Explained- Why India’s HEAUV is a Gamechanger for Naval Undersea Surveillance

क्या है HEAUV?

इस प्रोजेक्ट की शुरुआत मार्च 2024 में कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (CSL) में हुई थी, जो इस प्रोजेक्ट में DRDO का पार्टनर है। HEAUV को DRDO की नेवल साइंस एंड टेक्नोलॉजिकल लैबोरेटरी (NSTL) ने बनाया है। यह 6 टन वजनी है, करीब 10 मीटर लंबा है और इसकी चौड़ाई 1 मीटर है। यह 300 मीटर की गहराई तक पानी में जा सकता है। इसे इस तरह बनाया गया है कि यह 3 नॉट की रफ्तार से 15 दिन तक लगातार चल सकता है, और इसकी सबसे ज्यादा रफ्तार 8 नॉट है। HEAUV का डिज़ाइन मॉड्यूलर है, यानी इसमें अलग-अलग मिशन के लिए अलग-अलग उपकरण लगाए जा सकते हैं।

HEAUV क्यों बनाया गया?

DRDO के मुताबिक, HEAUV को बनाने का मकसद यह है कि यह भारतीय नौसेना की ताकत को बढ़ाएगा, खासकर उन इलाकों में, जहां पहुंचना मुश्किल या खतरनाक है। यह व्हीकल बड़े जहाजों की मदद करेगा और इंसानों या महंगे उपकरणों को खतरे में डाले बिना काम करेगा। HEAUV का इस्तेमाल कई तरह के मिशन में हो सकता है, जैसे दुश्मन की पनडुब्बियों को ढूंढना, पानी में बारूदी सुरंगों को हटाना, जासूसी करना और समुद्र की गहराई व पानी की जानकारी इकट्ठा करना।

Explained- Why India’s HEAUV is a Gamechanger for Naval Undersea Surveillance

HEAUV में क्या है खास?

HEAUV में DRDO की लैब LRDE का बनाया एक खास X-बैंड रडार लगा है, जो 360 डिग्री तक देख सकता है। यह रडार पानी के नीचे के टारगेट को ढूंढने और उनकी निगरानी करने में मदद करता है। साथ ही, यह टक्कर से बचने के लिए भी काम करता है। रडार को एक खास 45 बार प्रेशर रेटेड मास्ट में रखा गया है। इस वाहन में कई तरह के कम्युनिकेशन सिस्टम हैं, जैसे एकॉस्टिक, UHF, C बैंड और सैटकॉम।

HEAUV में पानी के नीचे देखने के लिए दो मुख्य सोनार लगे हैं – एक सामने देखने वाला सोनार और दूसरा साइड में लगा फ्लैंक ऐरे सोनार। इसके अलावा, बारूदी सुरंगों को ढूंढने के लिए साइड स्कैन सोनार भी है। ये दोनों सोनार DRDO की नेवल फिजिकल एंड ओशनोग्राफिक लैबोरेटरी (NPOL) ने बनाए हैं। इस वाहन को चलाने के लिए ढेर सारी बैटरियां लगी हैं, जो इसके इलेक्ट्रिक मोटर और प्रोपेलर को पावर देती हैं। भविष्य में DRDO की नेवल मैटेरियल्स रिसर्च लैबोरेटरी (NMRL) इसमें हाइड्रोजन फ्यूल सेल पावर प्लांट लगाने की योजना बना रही है।

भारतीय नौसेना को HEAUV की जरूरत

भारतीय रक्षा मंत्रालय ने 2018 में एक रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन जारी की थी, जिसमें नौसेना के लिए 8 HEAUV खरीदने की बात कही गई थी। इनका इस्तेमाल पनडुब्बी रोधी युद्ध (ASW), बारूदी सुरंग हटाने (MCM), जासूसी (ISR) और समुद्र की जानकारी इकट्ठा करने के लिए होना था। 2023 में, रक्षा मंत्रालय ने भारत की डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर 2020 के तहत मेक-II कैटेगरी में एक एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EoI) जारी किया, जिसमें भारतीय कंपनियों से नौसेना के लिए ASW के लिए HEAUV बनाने को कहा गया। लेकिन तब तक DRDO का HEAUV प्रोजेक्ट काफी आगे बढ़ चुका था।

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ऐसा माना जा रहा है कि DRDO का HEAUV ही नौसेना की जरूरतों को पूरा करने वाला मुख्य दावेदार होगा, क्योंकि अभी तक कोई दूसरा स्वदेशी HEAUV नहीं बना है। नौसेना को कम से कम 8 HEAUV की जरूरत होगी, लेकिन ऑपरेशनल जरूरतों को देखते हुए यह संख्या और बढ़ सकती है।

दूसरे शिपयार्ड भी रेस में

जहां CSL इस प्रोजेक्ट में DRDO के साथ काम कर रहा है, वहीं दूसरी शिपयार्ड गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) भी 2027 तक एक स्वदेशी HEAUV-ASW बनाने की कोशिश कर रही है। यह भारत के रक्षा मंत्रालय की 5वीं पॉजिटिव इंडिजनाइजेशन लिस्ट (PIL) का हिस्सा है। मझगांव डॉक्स (MDL) ने भी 2023 में एक EoI जारी किया था, जिसमें अपना HEAUV-ASW बनाने की बात कही थी।

HEAUV से नौसेना को होगा क्या फायदा?

HEAUV के नौसेना में शामिल होने से भारत की समुद्री ताकत में बड़ा इजाफा होगा। अभी भारतीय नौसेना को आधुनिक पनडुब्बियों की कमी का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि खरीद प्रोग्राम में देरी हो रही है। HEAUV इस कमी को कुछ हद तक पूरा कर सकता है। हालांकि, इसे पूरी तरह तैयार होने में अभी समय लगेगा, क्योंकि इसके लिए कई और टेस्ट और समुद्री परीक्षण किए जाने बाकी हैं।

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चल रहा है XLUUV प्रोजेक्ट भी

भारतीय नौसेना एक और बड़े प्रोजेक्ट पर काम कर रही है, जिसमें 12 एक्स्ट्रा लार्ज अनमैन्ड अंडरवाटर व्हीकल (XLUUV) बनाए जाएंगे। यह प्रोजेक्ट मेक-1 स्कीम के तहत है। 2024 में रक्षा मंत्रालय ने 2,500 करोड़ रुपये (लगभग 290 मिलियन डॉलर) की लागत से 100 टन वजनी XLUUV बनाने की मंजूरी दी थी। यह XLUUV दुश्मन की पनडुब्बियों और जहाजों पर हमला करने, बारूदी सुरंग हटाने, सुरंग बिछाने और निगरानी करने में सक्षम होगा। जल्द ही शिपयार्ड चुनने के लिए टेंडर जारी किया जाएगा।

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China Tests Non-Nuclear Hydrogen Bomb: What It Means for Future Warfare, Explained

Non-Nuclear Hydrogen Bomb: बीजिंग ने एक बार फिर दुनिया को चौंकाया है। चीन ने हाल ही में एक “नॉन-न्यूक्लियर हाइड्रोजन बम” का सफल परीक्षण किया है, जो पारंपरिक परमाणु हथियारों से अलग है। इस बम में रेडिएशन नहीं है, लेकिन इसकी गर्मी और तबाही की क्षमता किसी पारंपरिक विस्फोटक से कहीं ज्यादा है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है, जब अमेरिका ताइवान को सैन्य मदद बढ़ा रहा है और दक्षिण चीन सागर में चीन अपनी ताकत दिखाने की कोशिश कर रहा है। इस बम में मैग्नीशियम हाइड्राइड का इस्तेमाल किया गया है, जो परंपरागत परमाणु बमों से बिल्कुल अलग है। इसलिए इसे ग्रीन परमाणु बम भी कहा जा रहा है।

China Tests Non-Nuclear Hydrogen Bomb: What It Means for Future Warfare, Explained

Non-Nuclear Hydrogen Bomb: क्या है यह नया हथियार?

यह बम परमाणु नहीं है, लेकिन इसकी ताकत हल्के में नहीं ली जा सकती। यह बम सिर्फ 2 किलोग्राम वजनी है और इसे चाइना स्टेट शिपबिल्डिंग कॉरपोरेशन (सीएसएससी) के 705 रिसर्च इंस्टीट्यूट ने बनाया है। यह संस्थान पानी के नीचे इस्तेमाल होने वाले हथियारों के लिए मशहूर है। इस बम में मैग्नीशियम हाइड्राइड का उपयोग होता है, जो हाइड्रोजन गैस को स्टोर करने में बहुत कारगर है। यह सॉलिड स्टेट हाइड्रोजन स्टोरेज मैटेरियल है, जो पारंपरिक गैस टैंकों से ज्यादा हाइड्रोजन स्टोर कर सकता है।

जब इस बम को सक्रिय किया जाता है, तो मैग्नीशियम हाइड्राइड तेजी से गर्म होकर हाइड्रोजन गैस छोड़ता है। यह गैस हवा के संपर्क में आते ही 1,000 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा गर्मी वाला आग का गोला बनाती है, जो दो सेकंड से ज्यादा समय तक जलता रहता है। यह समय सामान्य टीएनटी (एक विस्फोटक) के धमाके से 15 गुना ज्यादा है। इसकी गर्मी इतनी तेज है कि यह एल्यूमीनियम जैसी धातुओं को भी पिघला सकती है। साथ ही, इस बम की ताकत को कंट्रोल किया जा सकता है, जिससे यह बड़े इलाके में एकसमान नुकसान पहुंचा सकता है।

Non-Nuclear Hydrogen Bomb: कैसे हुआ बम का परीक्षण?

इस परीक्षण की जानकारी चीन की एक जर्नल Journal of Projectiles, Rockets, Missiles and Guidance में प्रकाशित हुई है। इसके अनुसार, इस बम की ताकत को जांचने के लिए कई प्रयोग किए गए। इनमें इसकी ऊर्जा को एक खास दिशा में भेजने की क्षमता को परखा गया। इसमें बताया गया कि 2 मीटर की दूरी पर बम से 428.43 किलोपास्कल का ओवरप्रेशर दर्ज किया गया, यह टीएनटी के धमाके से 40 प्रतिशत कम था, लेकिन इसकी गर्मी टीएनटी से कहीं ज्यादा थी।

पहले धमाके में मैग्नीशियम हाइड्राइड का पाउडर छोटे-छोटे टुकड़ों में टूट जाता है। ये टुकड़े गर्म होने पर हाइड्रोजन गैस छोड़ते हैं, जो हवा में मिलकर दूसरा और ज्यादा गर्म आग का गोला बनाता है। यह गर्मी और गैस का चक्र बार-बार चलता रहता है, जिससे यह बम सामान्य विस्फोटकों से ज्यादा खतरनाक बन जाता है। इसकी गर्मी आसपास की हर धातु और इन्फ्रास्ट्रक्चर को पिघला सकती है।

इस साल शानक्सी प्रांत में मैग्नीशियम हाइड्राइड का एक बड़ा उत्पादन कारखाना शुरू हुआ, जो हर साल 150 टन सामग्री बना सकता है। पहले यह मटेरियल सिर्फ प्रयोगशालाओं में थोड़ी मात्रा में बनती थी।

Non-Nuclear Hydrogen Bomb: क्या इसका सैन्य इस्तेमाल हो सकता है?

यह हाइड्रोजन बम सिर्फ एक धमाका नहीं करता। यह कई सेकंड तक जलने वाला आग का गोला बनाता है, जो बड़े इलाके को तबाह कर सकता है। PLA (चीन की सेना) इसका उपयोग दुश्मन की टुकड़ियों को खुले मैदान में जलाने, संचार केंद्रों को नष्ट करने, या सीमित क्षेत्रों में टारगेटेड स्ट्राइक के लिए कर सकती है।

चीन की सेना (पीएलए) इस बम का इस्तेमाल कई तरह से कर सकती है। मान लीजिए दुश्मन की कोई सप्लाई लाइन है, यह बम उस पूरे रास्ते को भस्म कर सकता है, वो भी बिना बड़े क्षेत्र में विनाश फैलाए। यही नहीं, यह बम पुलों, फ्यूल डिपो या बंकर जैसी संवेदनशील जगहों पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की तरह भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

क्लीन एनर्जी की तरफ बढ़ी पीएलए?

चीन अपने रक्षा बजट में 7.2% की बढ़ोतरी के साथ 249 बिलियन डॉलर खर्च कर रहा है, और यह रकम आधुनिक और पर्यावरण के अनुकूल सैन्य तकनीकों के डेवलपमेंट में लगाई जा रही है। PLA पहले से ही सोलर, विंड और हाइड्रोजन एनर्जी जैसी क्लीन एनर्जी को अपने नौसेना और ग्राउंड ऑपरेशंस में इस्तेमाल कर रहा है। उदाहरण के लिए, Type 055 Renhai-Class में इंटीग्रेटेड इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन (आईईपी) सिस्टम लगा है, जो उसकी रफ्तार और क्षमता को और बढ़ा देता है। वहीं, LandSpace का बनाया Zhuque-2 नाम का रॉकेट दुनिया का पहला ऐसा रॉकेट है, जो लिक्विड मिथेन और ऑक्सीजन से चलकर ऑर्बिट तक पहुंचा।

क्यों है चिंता की बात?

चीन ने यह कदम अमेरिका और ताइवान के बढ़ते रिश्तों के बीच उठाया है। PLA ने हाल ही में ताइवान के चारों ओर बड़ी सैन्य ड्रिल की थी। अमेरिका ने इसे “इंटिमिडेशन” कहा और ताइवान के साथ अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। ऐसे में यह हाइड्रोजन बम परीक्षण चीन के शक्ति प्रदर्शन का संकेत माना जा रहा है।

इस बम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह परमाणु बम जैसा असर छोड़ता है, लेकिन परमाणु हथियारों के नियमों के दायरे में नहीं आता। इसका मतलब है कि चीन युद्ध के समय इसे बिना ‘न्यूक्लियर वारफेयर’ घोषित किए भी इस्तेमाल कर सकता है।

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भारत जैसे देश के लिए यह चिंता का विषय इसलिए है क्योंकि चीन पहले से ही LAC (भारत-चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा) पर तनाव बनाए हुए है। अगर इस तरह की हथियार प्रणाली सीमावर्ती क्षेत्रों में तैनात होती है, तो बड़ी चुनौती मिल सकती है।

क्या है भारतीय नौसेना का Deep Ocean Watch प्रोजेक्ट? हिंद महासागर में चीनी पनडुब्बियों की होगी अंडरवॉटर जासूसी!

Indian Navy Deep Ocean Watch to track Chinese Submarines

Deep Ocean Watch: भारतीय नौसेना हिंद महासागर क्षेत्र (Indian Ocean Region – IOR) में अपनी रणनीतिक स्थिति को और मजबूत करने के लिए बड़ी तैयारी कर रही है। भारतीय नौसेना इस इलाके में एक अत्याधुनिक अंडरवाटर निगरानी नेटवर्क बनाने जा रही है। नौसेना ने इस प्रोजेक्ट का नाम ‘डीप ओशन वॉच’ रखा है। इस प्रोजेक्ट के तहत हिंद महासागर क्षेत्र यानी बंगाल की खाड़ी, नब्बे डिग्री पूर्वी रिज, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में समुद्री गतिविधियों पर कड़ी नजर रखी जाएगी। यह कदम विशेष रूप से क्षेत्र में चीन की बढ़ती सैन्य मौजूदगी और भारत के रणनीतिक समुद्री मार्गों की सुरक्षा को देखते हुए उठाया गया है।

Indian Navy Deep Ocean Watch to track Chinese Submarines

क्या है ‘Deep Ocean Watch’?

‘डीप ओशन वॉच’ परियोजना के तहत भारतीय नौसेना एक इंटीग्रेटेड सर्विलांस मैकेनिज्म डेवलप करेगी, जिसमें लेटेस्ट डिटेक्शन सिस्टम का इस्तेमाल किया जाएगा। इसमें विशेष प्रकार के टो किए गए सोनार सिस्टम (Towed Array Sonars) शामिल होंगे, जो कि भारत के P-8I Poseidon समुद्री टोही विमान और कोलकाता-क्लास के डेस्ट्रॉयर वारशिप्स से ऑपरेट किए जाएंगे। ये सोनार सिस्टम बेहद कम फ्रीक्वेंसी वाली ध्वनि तरंगों को भेजकर समुद्र के नीचे मौजूद वस्तुओं की पहचान करेंगे।

इस नेटवर्क में ‘मैग्नेटिक एनॉमली डिटेक्टर’ (Magnetic Anomaly Detector – MAD) एक्टिव लो-फ्रीक्वेंसी सोनार सिस्टम और सुपरकंडक्टिंग क्वांटम इंटरफेरेन्स डिवाइस (स्क्विड) जैसे सेंसर शामिल होंगे। मैग्नेटिक एनॉमली डिटेक्टर पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में तब आने वाले बदलाव को पहचानती है, जब कोई बड़ा मेटल ऑब्जेक्ट (जैसे पनडुब्बी) समुद्र में मौजूद हो। यह सिस्टम समुद्र की सतह से लेकर समुद्र की गहराई तक की गतिविधियों पर नजर रखने में सक्षम होगा। वहीं, स्क्विड सेंसर समुद्र के नीचे से निकलने वाले कमजोर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिग्नल्स को डिटेक्ट करेंगे।

नौसेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि यह नेटवर्क 5,000 किलोमीटर से अधिक क्षेत्र को कवर करेगा, जिसमें बंगाल की खाड़ी से लेकर दक्षिणी हिंद महासागर और नब्बे डिग्री पूर्वी रिज तक का क्षेत्र शामिल है। इसके तहत नब्बे डिग्री पूर्वी रिज पर एक अंडरवाटर सोनार सिस्टम की स्थापना की योजना बनाई है। यह सिस्टम समुद्र के नीचे मौजूद ज्वालामुखी पर्वत श्रृंखलाओं के बीच से गुजरने वाली पनडुब्बियों की गतिविधियों को ट्रैक करने में मदद करेगा।

Deep Ocean Watch का रणनीतिक महत्व

हिंद महासागर क्षेत्र में 40 से अधिक देश शामिल हैं, जो विश्व समुद्री व्यापार का एक प्रमुख केंद्र है। मलक्का स्ट्रेट, जो इस क्षेत्र का एक प्रमुख समुद्री चोक पॉइंट है, विश्व व्यापार का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा वहन करता है। इस क्षेत्र में चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी नेवी (पीएलएएन) की बढ़ती गतिविधियां भारत के लिए चिंता का विषय रही हैं। इस क्षेत्र में भारत की समुद्री गतिविधियों की निगरानी और सुरक्षा सुनिश्चित करना नौसेना की प्राथमिकता है।

यह निगरानी नेटवर्क भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता है, खासकर जब चीन की सेना अपने पड़ोसी देशों में नौसैनिक अड्डों का निर्माण कर रही है। उदाहरण के तौर पर, कंबोडिया में स्थित रेम नौसैनिक अड्डा और म्यांमार के कोको द्वीप जैसी जगहों को चीन अपनी समुद्री रणनीति के तहत विकसित कर रहा है। ये इलाके भारत के अंडमान-निकोबार द्वीप समूह से महज कुछ सौ किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं।

‘डीप ओशन वॉच’ परियोजना को इस इलाके में भारत की समुद्री प्रभुत्व की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। यह नेटवर्क न केवल चीन की पनडुब्बी गतिविधियों पर नजर रखेगा, बल्कि क्षेत्र में समुद्री डकैती और अवैध गतिविधियों को रोकने में भी मदद करेगा। इसके अलावा, यह भारत को क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए एक मंच प्रदान करेगा। नौसेना ने बताया कि इस नेटवर्क से मिले डाटा को भारत के समुद्री डोमेन अवेयरनेस (एमडीए) फ्रेमवर्क्स और इंफॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर-आईओआर (आईएफसी-आईओआर) के साथ इंटीग्रेट किया जाएगा।

कहां-कहां लगेगा Deep Ocean Watch नेटवर्क?

नौसेना ने बताया कि इस परियोजना के कुछ क्षेत्रों को खासतौर पर चिन्हित किया गया है। इनमें नाइंटी ईस्ट रिज (Ninety East Ridge) भी है, जो बंगाल की खाड़ी से लेकर दक्षिणी हिंद महासागर तक फैली हुई है। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में इसे लगाया जाएगा, जहां भारत की ट्राई-सर्विस कमांड मौजूद है और जो मलक्का जलडमरूमध्य (मलक्का स्ट्रेट) के रास्ते को कंट्रोल करती है। इसके अलावा बंगाल की खाड़ी, जहां चीनी गतिविधियों की आशंका लगातार बनी हुई है।

नौसेना का कहना है, इस सिस्टम की प्रभावशीलता का परीक्षण बंगाल की खाड़ी में किया जाएगा, जहां समुद्री यातायात और पनडुब्बी गतिविधियां सबसे अधिक हैं। इसके अलावा, नौसेना ने इस नेटवर्क को और मजबूत करने के लिए भविष्य में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और मशीन लर्निंग (एमएल) तकनीकों को शामिल करने की योजना बनाई है। यह तकनीकें इस नेटवर्क को स्वचालित रूप से संदिग्ध गतिविधियों का विश्लेषण करने और झूठे सिग्नल्स को कम करने में मदद करेंगी।

देशों ने किया स्वागत

इस प्रोजेक्ट के एलान के बाद क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर प्रतिक्रियाएं आने लगी हैं। मालदीव और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों ने भारत के इस कदम का स्वागत किया है, क्योंकि यह क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा को बढ़ावा देगा। हालांकि, कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह परियोजना क्षेत्र में भारत-चीन तनाव को और बढ़ा सकती है। चीन ने अभी तक इस परियोजना पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है, लेकिन माना जा रहा है कि वह इस कदम को अपनी समुद्री रणनीति के लिए एक चुनौती के रूप में देखेगा।

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इसके अलावा, भारत ने इस परियोजना के तहत क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देने की योजना बनाई है। नौसेना ने बताया कि वह इस नेटवर्क से प्राप्त जानकारी को क्वाड देशों (भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया) के साथ साझा करने पर विचार कर रही है। इस कदम से क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा के लिए एक कंबाइंड स्ट्रेटेजी को बढ़ावा मिलेगा।

Dhruv Helicopter Crisis: जमीन पर फंसे पंख, आसमान में फंसी सेना की ताकत! इमरजेंसी में कैसे पूरे होंगे मिशन?

Dhruv Helicopter Crisis: Grounding Hits Army Ops, Readiness Takes a Blow

Dhruv Helicopter Crisis: पांच जनवरी 2025 में पोरबंदर के पास एक ध्रुव हेलीकॉप्टर के क्रैश में दो कोस्ट गार्ड पायलटों और एक एयरक्रू डाइवर की मौत के बाद लगभग 330 ट्विन-इंजन ‘ध्रुव’ एडवांस लाइट हेलिकॉप्टरों (ALH) को ग्राउंडेड कर दिया गया था। यानी उनके उड़ने पर अस्थाई तौर पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। इस बात को भी चार महीने से अधिक समय हो चुका है। लेकिन अभी तक भारतीय सुरक्षा बलों में ध्रुव की उड़ान फिर से शुरू नहीं हो सकी है। जिसका असर सेना की ऑपरेशनल तैयारियों पर पड़ रहा है।

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Dhruv Helicopter Crisis: दोहरे संकट से जूझ रही हैं भारतीय सेनाएं

भारतीय सेनाएं इन दिनों एक दोहरे संकट से जूझ रही हैं। एक तरफ पुराने और एक इंजन वाले चेतक-चीता हेलीकॉप्टरों की खराब सर्विसेबिलिटी और बार-बार होने वाले हादसे हैं, तो दूसरी ओर अत्याधुनिक कहे जाने वाले ‘ध्रुव’ एडवांस लाइट हेलीकॉप्टर (ALH) का लंबा ग्राउंडिंग पीरियड। भारतीय सेनाएं इन दिनों हेलीकॉप्टरों की कमी से जूझ रही हैं। ये हेलिकॉप्टर सशस्त्र बलों की रीढ़ माने जाते हैं, जो चीन और पाकिस्तान के साथ लगती सीमाओं पर फॉरवर्ड पोस्ट तक सप्लाई, निगरानी, टोही और खोज-बचाव मिशनों में अहम भूमिका निभाते हैं।

Dhruv Helicopter Crisis: प्राइवेट कंपनियों की लेनी पड़ रही मदद

लेकिन ट्विन-इंजन ‘ध्रुव’ एडवांस लाइट हेलिकॉप्टरों (ALH) के ग्राउंडेड होने की वजह से सेनाओं को सीमावर्ती इलाकों में जरूरी सामान और रसद पहुंचाने के लिए प्राइवेट सिविल एविएशन कंपनियों की मदद लेनी पड़ी। एएलएच के ग्राउंडेड होने का साफ असर इस साल सर्दियों में देखने को मिला। जब ऊंचाई वाले इलाके पूरी तरह से बर्फ ढक गए और सड़क मार्ग बंद हो गए। जिसके बाद सेना के ‘सूर्य कमान’ ने एक निजी कंपनी के साथ समझौता कर सिविल हेलीकॉप्टरों के जरिये हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्रों में फॉरवर्ड पोस्ट तक सप्लाई शुरू की।

इससे पहले नवंबर 2024 से सेना की उत्तरी और मध्य कमान ने पवन हंस, ग्लोबल वेक्ट्रा, हिमालयन हैली सर्विसेज़ और थम्बी एविएशन जैसी निजी कंपनियों से करीब 70 करोड़ रुपये के अनुबंध किए थे। इन कंपनियों ने 1,500 घंटे से अधिक उड़ानों के जरिए लगभग 900 टन रसद सामग्री जम्मू-कश्मीर, हिमाचल और उत्तराखंड के दुर्गम क्षेत्रों तक पहुंचाई।

भारत-चीन सीमा पर फैली 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के कई हिस्से आज भी सड़क संपर्क से जुड़े हुए नहीं हैं। इन दुर्गम इलाकों में रसद और जरूरी सामान पहुंचाने का एकमात्र साधन वायुसेना और सेना के हेलीकॉप्टर ही होते हैं। लेकिन जब से ‘ध्रुव’ हेलीकॉप्टरों को ग्राउंड किया गया है, यह चुनौती पहले से कहीं अधिक गंभीर हो गई है।

बता दें कि भारतीय सेना ‘ध्रुव’ हेलीकॉप्टरों का उपयोग ऊंचाई वाले क्षेत्रों में रसद पहुंचाने, सैन्य सामग्री की आपूर्ति और आपातकालीन सेवाओं के लिए करती रही है। इन इलाकों में इनकी प्रदर्शन क्षमता बेहतरीन रही है। हालांकि, बीते कुछ वर्षों में लगातार तकनीकी खामियों और दुर्घटनाओं के कारण इनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं। इसी वजह से अब सेना ने सीमावर्ती इलाकों में रसद और इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण के लिए निजी एविएशन कंपनियों की मदद लेनी पड़ी।

Dhruv Helicopter Crisis: सिम्युलेटर पर पायलट

ध्रुव हेलिकॉप्टरों के ग्राउंड होने से मिलिट्री ऑपरेशंस पर भी असर पड़ रहा है। सेना के सूत्रों का कहना है, “पिछले तीन महीनों से अग्रिम क्षेत्रों में आपूर्ति, निगरानी और सर्च एंड रेस्क्यू मिशंस बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। पायलट अपने फ्लाइंग स्किल्स खो रहे हैं और उन्हें सिम्युलेटर पर प्रैक्टिस करनी पड़ रही है। यह हमारी रणनीतिक तैयारियों के लिए खतरनाक है।” सबसे ज्यादा प्रभावित 11.5 लाख सैनिकों वाली भारतीय सेना हुई है, जो अपने ज्यादातर अधिकांश ऑपरेशंस के लिए इन हेलिकॉप्टरों पर निर्भर है।

भारतीय सेनाएं पहले ही हेलीकॉप्टरों की कमी से जूझ रही हैं। वहीं 330 ध्रुव हेलिकॉप्टरों के ग्राउंड होने के बाद स्थिति और विकट हो गई है। सुरक्षा बलों ने अगले 10-15 वर्षों में 1,000 से अधिक नए हेलिकॉप्टरों की जरूरत बताई है, जिसमें 484 लाइट यूटिलिटी हेलिकॉप्टर (LUH) और 419 इंडियन मल्टी-रोल हेलीकॉप्टर (IMRH) शामिल हैं। इसके अलावा, हाल ही में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के साथ 62,700 करोड़ रुपये की लागत से 156 ‘प्रचंड’ लाइट कॉम्बैट हेलिकॉप्टरों का सौदा हुआ है, जिनकी डिलीवरी 2028-2033 के बीच होनी है।

ALH पर HAL ने दी थी ये सफाई

पोरबंदर हादसे की वजह हेलीकॉप्टर के स्वाशप्लेट में क्रैक आना बताया गया था। यह हिस्सा रोटर ब्लेड की दिशा नियंत्रित करता है और हेलीकॉप्टर को हवा में स्थिर रखने में मदद करता है। एचएएचल के मुताबिक यह मटेरियल फेलियर का मामला था और बाकी हेलीकॉप्टरों में भी इसी तरह की खराबी की आशंका के चलते पूरी ALH फ्लीट को ग्राउंड कर दिया गया। 11 अप्रैल को एचएएचल की तरफ से एक आधिकारिक बयान भी जारी किया गया था। जिसमें कहा गया था कि बिना तथ्यात्मक जानकारी के लिखी जा रही रिपोर्टें कंपनी की छवि को नुकसान पहुंचाने का प्रयास हैं। एचएएल ने यह भी कहा कि वह समस्या के हल के लिए भारतीय वायुसेना और अन्य बलों के साथ मिलकर काम कर रही है।

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सेना, वायुसेना, नौसेना में कितने ध्रुव

ध्रुव ALH हेलीकॉप्टर सेना, वायुसेना, नौसेना और कोस्ट गार्ड के लिए पिछले दो दशकों से एक भरोसेमंद साथी रहे हैं। 5.5 टन वजनी ये हेलीकॉप्टर हाई-एल्टीट्यूड पोस्टों, अग्रिम चौकियों, दुर्गम क्षेत्रों में रसद पहुंचाने, रेस्क्यू मिशन, रेकी और ऑब्जरवेशन कार्यों में तैनात रहते हैं। अकेले भारतीय सेना के पास 180 से अधिक ALH हैं, जिनमें से 60 ‘रुद्र’ जैसे वेपनीइज्ड वर्जन हैं। जबकि वायुसेना के पास 75, नौसेना के पास 24 और कोस्ट गार्ड के पास 19 ALH हैं।

Chinese parts in Drones: ‘मेक इन इंडिया’ के नाम पर भारतीय सेना में सप्लाई हो रहे चाइनीज ड्रोन! RTI कार्यकर्ता ने IdeaForge पर की कार्रवाई की मांग

Chinese Parts in Drones- RTI Activist Targets IdeaForge

Chinese parts in Drones: क्या भारतीय सेना को सप्लाई किए जा रहे ड्रोन में चीनी पार्ट्स का इस्तेमाल हो रहा है? एक आरटीआई कार्यकर्ता ने सवाल उठाए हैं कि भारतीय सेना को सप्लाई हो रहे ड्रोन में चीनी पार्ट्स का उपयोग किया जा रहा है। आरटीआई कार्यकर्ता तेज प्रताप सिंह ने गुरुवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बड़ा आरोप लगाते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO), रक्षा मंत्रालय (MoD) और वाणिज्य मंत्रालय से मांग की है कि वे IdeaForge और उसकी दो सहयोगी कंपनियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करें। इन कंपनियों पर आरोप है कि इन्होंने भारतीय सेना के ड्रोन खरीद टेंडर में ऐसे मिनी सर्विलांस ड्रोन पेश किए, जिनमें चीनी पुर्जे लगे थे।

Chinese Parts in Drones- RTI Activist Targets IdeaForge

Chinese parts in Drones: क्या है पूरा मामला?

गौरतलब है कि भारतीय सेना ने हाल ही में कुल 80 मिनी सर्विलांस ड्रोन की खरीद के लिए दो टेंडर GEM/2024/B/5044136 और GEM/2024/B/5044183 निकाले थे। ये टेंडर पछले साल जुलाई और अगस्त में Government e-Marketplace (GeM) प्लेटफॉर्म पर जारी किए गए थे। इन टेंडरों के लिए दो कंपनियों रोहल टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड और डिफटेक एंड ग्रीनइंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने हिस्सा लिया। इन दोनों कंपनियों ने आइडियाफोर्ज कंपनी के Q6 V2 D&N UAVs ड्रोन को पेश किया।

हालांकि, GeM की तकनीकी जांच में यह सामने आया कि इन ड्रोन में चीनी पार्ट्ल लगे थे। इसके आधार पर दोनों कंपनियों को ‘मेक इन इंडिया’ पॉलिसी और रक्षा खरीद मानकों का उल्लंघन करने के चलते अयोग्य घोषित कर दिया गया। GeM ने अपनी जांच में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया, “प्रोडक्ट में चीन निर्मित पार्ट्स पाए गए, इसलिए यह गैर-अनुपालक है” और “तकनीकी मूल्यांकन समिति (TEC) के दौरान उत्पाद में चीनी उपकरण पाए गए।” टेंडर के रिजल्ट फरवरी 2025 में घोषित किए गए थे।

Chinese parts in Drones: क्या हैं RTI कार्यकर्ता के आरोप?

आरटीआई कार्यकर्ता तेज प्रताप सिंह ने इस मामले को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ते हुए कहा कि चीनी पार्ट्स वाले ड्रोन्स का उपयोग भारतीय सेना और अन्य सुरक्षा बलों के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है। उनका कहना है कि अगर सेना को ऐसे ड्रोन दिए जाते हैं जिनमें विदेशी वो भी चीन जैसे संवेदनशील देश के पुर्जे लगे हों, तो इससे हमारी जानकारी लीक होने का खतरा बढ़ जाता है। उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ), रक्षा मंत्रालय, और वाणिज्य मंत्रालय को शिकायत दर्ज कर IdeaForge के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। सिंह ने यह भी दावा किया कि आइडियाफोर्ज के ड्रोन्स पहले भी सशस्त्र बलों को सप्लाई किए जा चुके हैं। उन्होंने दावा किया कि उनमें से कुछ को पाकिस्तान और चीन द्वारा हैक भी किया गया है।

Chinese Parts in Drones- RTI Activist Targets IdeaForge

सिंह के वकील पियो हेरोल्ड जेम्स ने कहा, “यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है। भारतीय सेना इन ड्रोन्स का उपयोग सीमावर्ती क्षेत्रों में करती है, जहां चीनी पार्ट्स की मौजूदगी सैनिकों की जान को खतरे में डाल सकती है। IdeaForge के ड्रोन्स न केवल ‘मेक इन इंडिया’ पॉलिसी का उल्लंघन करते हैं, बल्कि जनरल फाइनेंशियल रूल्स, 2017 के नियम 144 (xi) का भी पालन नहीं करते। इसलिए, इन ड्रोन्स का आगे उपयोग करने से पहले इनका गहन मूल्यांकन आवश्यक है।”

Chinese parts in Drones: पहले भी सामने आया था मामला

हालांकि यह पहली बार नहीं है जब सेना को सप्लाई किए जा रहे ड्रोन में चीनी पार्ट्स मिलने की मामला सामने आया हो। इससे पहले भी पिछले साल अगस्त में ऐसा ही एक मामला उठा था। उस समय खुलासा हुआ था कि स्वदेशी के नाम पर कुछ कंपनियां भारतीय सशस्त्र बलों को चीनी पार्ट्स वाले ड्रोन्स सप्लाई कर रही हैं। इस खुलासे के बाद भारतीय सेना ने एक लॉजिस्टिक ड्रोन कॉन्ट्रैक्ट को रद्द कर दिया और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए एक सिस्टम बनाने की बात कही गई थी। लेकिन नया मामला सामने आने के बाद लगता है कि चीनी पार्ट्स वाले ड्रोन्स को ‘मेक इन इंडिया’ के तहत अभी भी बेचने की कोशिशें जारी हैं।

Chinese parts in Drones: कंपनी ने दी सफाई

इन आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए IdeaForge ने बयान जारी किया, जिसमें उन्होंने कहा कि यह “गुमराह करने वाली जानकारी” है। कंपनी का कहना है कि जो पार्ट्स टेक्निकल चेकअप में सामने आए, वे ‘गैर-महत्वपूर्ण’ थे और एक स्विस कंपनी ने इन्हें बनाया था, जिनकी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट चीन में है। कंपनी ने यह भी कहा कि ये ड्रोन केवल ट्रायल के लिए लाए गए गए थे और अगली बार ऐसे पार्ट्स को इस्तेमाल नहीं किया जाएगा।

IdeaForge का यह भी कहना है कि वह लंबे समय से डिफेंस टेंडर्स में हिस्सा ले रही है और हमेशा सभी नियामक मानकों का पालन किया है। कंपनी ने कहा, “इस मुद्दे को राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरे के तौर पर पेश करना गलत है।”

क्या सेना को वाकई है खतरा?

रक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि जब ड्रोन जैसी तकनीक का इस्तेमाल सीमा क्षेत्रों में निगरानी और ऑपरेशन के लिए हो रहा हो, तब उसमें किसी भी चीनी पार्ट्स का मौजूद होना चिंताजनक है। इससे डाटा लीकेज या ड्रोन को रिमोटली कंट्रोल जैसे साइबर खतरों की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।

हालांकि भारतीय सेना ने इस पूरे विवाद पर पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि कथित ‘हैकिंग’ की घटनाएं दरअसल तकनीकी गड़बड़ियां थीं, जिन्हें बाद में ठीक कर लिया गया। सेना ने इसे “क्रॉस-बॉर्डर जैमिंग” जैसी सामान्य घटना बताया था और कहा था कि इसे हैकिंग कहना सही नहीं होगा।

क्या है ‘मेक इन इंडिया’ नीति का उल्लंघन?

रक्षा मंत्रालय के दिशानिर्देशों के अनुसार, टेंडरों में पेश किए जाने वाले सभी डिफेंस इक्विपमेंट्स ‘मेक इन इंडिया’ पॉलिसी के अंतर्गत होने चाहिए। इसके तहत स्थानीय स्तर पर निर्मित या डिज़ाइन किए गए प्रोडक्ट्स को प्राथमिकता दी जाती है। अगर किसी प्रोडक्ट में विदेशी पार्ट्स हिस्से मिलते हैं, खासकर ऐसे देशों के जिनसे भारत के कूटनीतिक संबंध बेहद संवेदनशील हैं, तो डिफेंस इक्विपमेंट्स इस नीति के अंतर्गत अयोग्य माने जाते हैं।

आइडियाफोर्ज पर ड्रोनों को वर्चुअली लॉक करने का आरोप

हाल ही में एक दूसरे मामले में चेन्नई मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट कोर्ट ने ideaForge के सीएफओ विपुल जोशी के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया है था। और कंपनी सीईओ अंकित मेहता, निदेशक राहुल सिंह, महाप्रबंधक सोमिल गौतम और विपुल जोशी को भी आरोपी बनाया था। यह मामला यह मामला 15 ड्रोन की सप्लाई से जुड़ा है, जिनकी कीमत 2.2 करोड़ रुपये बताई गई है। बताया जाता है कि जून 2023 में Garuda Aerospace ने ideaForge से 15 ड्रोन खरीदे थे। आरोप है कि ideaForge ने इन ड्रोन को सॉफ्टवेयर के ज़रिए रिमोट से लॉक कर दिया, जिससे वे बेकार हो गए। गरुड़ा का दावा है कि इस वजह से ओडिशा सरकार के साथ उनका 70 करोड़ का प्रोजेक्ट रद्द हो गया और कंपनी को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया।

ideaForge का कहना था, “ग्राहक ने हमारे बौद्धिक संपदा अधिकारों को हड़पने की कोशिश की और हमारे उपकरणों में छेड़छाड़ कर राज्य सरकारों के समक्ष झूठी जानकारी दी। जब हमने उन्हें ऐसा करने से रोका, तो उन्होंने हमें परेशान करने के लिए यह केस दर्ज कराया।”

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इस मामले में कंपनी एफआईआर और चार्जशीट को रद्द करने की मांग के साथ मद्रास हाईकोर्ट भी पहुंची थी, लेकिन हाईकोर्ट ने धोखाधड़ी के मामले में चार्जशीट खारिज करने से इनकार कर दिया था, और गैर-जमानती वारंट भी जारी कर दिए थे। जिसके बाद ideaForge ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया था, ताकि उनके खिलाफ चल रही निचली अदालत की कार्रवाई पर रोक लगाई जा सके, लेकिन उन्हें वहां से भी कोई राहत नहीं मिली।

China helping Houthis: अमेरिका का आरोप- चीन की मदद से हूती विद्रोही साध रहे हैं अमेरिकी युद्धपोतों पर निशाना!

China helping Houthis: Satellite Firm Allegedly Helping Target US Warships

China helping Houthis: अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि चीन की पीएलए से जुड़ी एक सैटेलाइट कंपनी यमन में ईरान के समर्थन वाले हूती विद्रोहियों को लाल सागर में अमेरिकी युद्धपोतों और अंतरराष्ट्रीय जहाजों को निशाना बनाने के लिए खुफिया जानकारी मुहैया करा रही है। इस कंपनी पर हूतियों को सैटेलाइट इमेज मुहैया कराने का आरोप है, जिससे वे रेड सी में सटीक हमले कर पा रहे हैं। बता दें कि यह दावा ऐसे समय में सामने आया है जब अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध गहराता जा रहा है और लाल सागर में हूती हमलों के कारण वैश्विक व्यापार पर खतरा मंडरा रहा है।

China helping Houthis: Satellite Firm Allegedly Helping Target US Warships

अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, चांग गुआंग सैटेलाइट टेक्नोलॉजी कंपनी लिमिटेड (CGSTL) का संबंध चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) से है, औऱ यह कंपनी हूती विद्रोहियों को सैटेलाइट इमेजरी दे रही है। ट्रम्प प्रशासन ने बार-बार बीजिंग को चेतावनी दी है कि सीजीएसटीएल की गतिविधियां क्षेत्रीय स्थिरता और अमेरिकी हितों के लिए खतरा हैं।

China helping Houthis: चीन ने किया “नजरअंदाज”

वॉशिंगटन ने कई बार बीजिंग को इस मुद्दे पर अपनी चिंता से अवगत कराया है, लेकिन चीन ने अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया। अमेरिका का कहना है कि चीन ने इन चिंताओं को “नजरअंदाज” किया है।

अमेरिकी विदेश विभाग की प्रवक्ता टैमी ब्रूस ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि, “CGSTL सीधे तौर पर ईरान समर्थित हूती आतंकवादियों के हमलों में शामिल है। अमेरिका किसी भी ऐसी गतिविधि को बर्दाश्त नहीं करेगा जो विदेशी आतंकवादी संगठनों को समर्थन देती हो।” उनका कहना है कि वॉशिंगटन की चेतावनियों के बावजूद बीजिंग का मौन समर्थन” चीन के शांति समर्थन के दावों की “खोखली सच्चाई” को उजागर करता है। उन्होंने कहा, “हम अपने सहयोगियों से आग्रह करते हैं कि वे चीनी कम्युनिस्ट पार्टी और चीनी कंपनियों को उनके शब्दों से नहीं, बल्कि उनके कार्यों से आंकें।”

China helping Houthis: लाल सागर में जहाजों पर बढ़ रहे हूती हमले

हूती विद्रोहियों ने 2023 में इजरायल और हमास के बीच युद्ध शुरू होने के बाद लाल सागर में जहाजों पर हमले शुरू किए। यह युद्ध हमास के 7 अक्टूबर 2023 को इजरायल पर हमले के जवाब में शुरू हुआ था, जिसमें हमास को भी ईरान का समर्थन प्राप्त है। लाल सागर ग्लोबल ट्रेड के लिए एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है, और हूती हमलों ने इस क्षेत्र में अमेरिकी नौसेना और अंतरराष्ट्रीय जहाजों को खतरे में डाल दिया है।

हाल के हफ्तों में अमेरिका ने यमन में हूती ठिकानों पर हमले तेज कर दिए हैं। हाल ही में एक बड़े सैन्य हमले ने क्षेत्र में तनाव को और बढ़ा दिया है, जिसका खुलासा “सिग्नलगेट” लीक के माध्यम से हुआ। ट्रम्प प्रशासन ने लाल सागर में हूतियों के हमलों को गंभीरता से लिया है। क्योंकि हूती हमले वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए खतरा बने हुए हैं। हाल ही में अमेरिकी सेना ने हूती ठिकानों पर हवाई और नौसैनिक हमले किए हैं, जिनमें रडार सिस्टम, हवाई रक्षा, और बैलिस्टिक मिसाइल व ड्रोन लॉन्च साइट्स को निशाना बनाया गया है। इन हमलों को ‘ऑपरेशन रफ राइडर’ नाम दिया गया है।

नवंबर 2023 से जनवरी 2025 तक, हूतियों के 190 से अधिक हमलों में 100 से ज्यादा व्यापारिक जहाजों को मिसाइलों और ड्रोनों से निशाना बनाया, जिनमें दो जहाज डूब गए और चार नाविक मारे गए। इसके अलावा, हूतियों ने अमेरिकी युद्धपोतों और इजरायली शहरों, जैसे तेल अवीव और इलात, पर भी हमले किए, जिसमें तेल अवीव में एक ड्रोन हमले में एक नागरिक की मौत हुई।

जनवरी 2025 में गाजा-इजरायल युद्ध में संघर्ष विराम के बाद हूतियों ने अपने हमले रोक दिए थे। हालांकि, 2 मार्च 2025 को इजरायल के गाजा में मानवीय सहायता को रोकने के बाद हूतियों ने चार दिन की समय सीमा दी और फिर से “इजरायली” जहाजों को निशाना बनाने की धमकी दी। इस धमकी के जवाब में अमेरिका ने 15 मार्च से हूती ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हमले शुरू किए।

China helping Houthis: मिलिट्री-सिविल फ्यूजन नीति के तहत काम करती है CGSTL

CGSTL की स्थापना 2014 में जिलिन प्रांत की सरकार और चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज के एक उपसंस्थान चांगचुन के साथ संयुक्त उपक्रम के तौर पर हुई थी। हालांकि यह खुद को एक ‘कमर्शियल’ कंपनी बताती है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह चीन की “मिलिट्री-सिविल फ्यूजन” नीति के तहत काम करती है, जिसके तहत कंपनियों को पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) को जरूरत अनुसार तकनीक और जानकारी प्रदान करनी होती है।

पामीर कंसल्टिंग के चीनी सैन्य और खुफिया विशेषज्ञ जेम्स मुल्वेनन के अनुसार, “CGSTL दिखने में व्यावसायिक है लेकिन इसकी जड़ें PLA और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी में गहराई से जुड़ी हैं।” अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस कंपनी के अब तक 100 सैटेलाइट ऑर्बिट में हैं और 2025 तक यह संख्या 300 तक पहुंचाने की योजना है, जिससे हर 10 मिनट में धरती के किसी भी स्थान की तस्वीर ली जा सकेगी।

China helping Houthis: पहले भी घिर चुकी है सीजीएसटीएल

वहीं, वॉशिंगटन स्थित चीनी दूतावास का कहना है कि उन्हें इस संबंध में कोई जानकारी नहीं है। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि चीन न केवल इस मामले में चुप्पी साधे हुए है, बल्कि उसकी नीतिगत सहमति भी इन हमलों के लिए अप्रत्यक्ष समर्थन का संकेत देती है।

चीन के मिलिट्री-सिविल फ्यूजन कार्यक्रम के तहत, कंपनियों को सरकार के आदेश पर अपनी तकनीक पीएलए के साथ साझा करनी होती है। ब्लूपाथ लैब्स के चीन रक्षा विशेषज्ञ मैथ्यू ब्रुजेस ने कहा कि सीजीएसटीएल के चीनी सरकार, कम्युनिस्ट पार्टी और सेना से गहरे संबंध हैं। हालांकि, 2020 के बाद इसके पीएलए संबंधों का सार्वजनिक उल्लेख कम हुआ है, जिससे लगता है कि कंपनी इन संबंधों को सार्वजनिक रूप से उजागर करने से बच रही है। उन्होंने यह भी बताया कि सीजीएसटीएल ने सैन्य खुफिया सहित अपने अनुप्रयोगों के बारे में वरिष्ठ चीनी अधिकारियों को ब्रीफिंग दी है और पीएलए के शीर्ष जनरल झांग यूसिया सहित कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के सामने अपनी तकनीक का प्रदर्शन किया है।

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पेंटागन के अनुसार, 2023 में चीन ने 200 सैटेलाइट्स कक्षा में स्थापित किए, जो अमेरिका के बाद दूसरा सबसे बड़ा आंकड़ा है। चीन अपनी सैटेलाइट तकनीक का निर्यात भी कर रहा है, जिसमें सीजीएसटीएल द्वारा उपयोग की जाने वाली रिमोट-सेंसिंग सैटेलाइट्स शामिल हैं। हाल के सालों में अमेरिका ने सैन्य संबंधों के आरोप में दर्जनों चीनी वाणिज्यिक समूहों पर प्रतिबंध लगाए हैं। ट्रम्प प्रशासन ने हाल ही में चीन से आयात पर 145 प्रतिशत का भारी शुल्क लगाया है, जिससे दोनों देशों के बीच व्यापार युद्ध और तनाव बढ़ गया है।

India Defence Export Strategy: भारत अब हथियार खरीदने के लिए दूसरे देशों को देगा सस्ता कर्ज, रूस के पुराने ग्राहकों पर है फोकस

India Defence Export Strategy: ‘मेक इन इंडिया’ नीति के तहत डिफेंस एक्सपोर्ट को बढ़ावा देने के लिए सरकार अमेरिका और रूस की तर्ज पर अब बड़ी रणनीति अपनाने जा रही है। भारत अब मिसाइलों, हेलीकॉप्टरों और युद्धपोतों को निर्माण कर रहा है और अब रक्षा निर्यात को बढ़ावा देने के लिए विदेशी बाजार तलाश रहा है। इसके लिए भारत ने सस्ते ऋण और स्ट्रेटेजिक डिप्लोमेसी का सहारा लिया है, जिसका लक्ष्य रूस के पारंपरिक ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित करना है।

India Defence Export Strategy EXIM Bank to Fund Arms Deals in Brazil, Armenia

रॉयटर्स की एक खबर के मुताबिक भारत का Export-Import Bank (EXIM Bank) अब उन देशों को भी सस्ते और लंबी अवधि के सस्ते कर्ज मुहैया कराएगा, जिन्हें राजनीतिक अस्थिरता या क्रेडिट रिस्क के चलते परंपरागत बैंक लोन नहीं मिल पाते। सरकार की इस रणनीति का उद्देश्य है कि उन देशों को हथियार बेचे जाएं, जो दशकों से रूसी हथियारों के लिए निर्भर रहे हैं।

अपनी इसी रणनीति के तहत पिछले साल सरकार ने एक बड़ा फैसला किया था, कि वह विदेशी मिशनों में रक्षा अताशे (डिफेंस अटैच) की संख्या में बढ़ोतरी करेगी। भारत ने फैसला लिया है कि वह मार्च 2026 तक 20 से अधिक नए डिफेंस अताशे विदेशी दूतावासों में तैनात करेगा। ये अधिकारी न केवल भारत के हथियारों की मार्केटिंग करेंगे, बल्कि संबंधित देशों की रक्षा जरूरतों का मूल्यांकन कर उन्हें भारतीय कंपनियों से जोड़ेंगे। सूत्रों के अनुसार, भारत अब अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और दक्षिण पूर्व एशिया के देशों जैसे अल्जीरिया, मोरक्को, गयाना, तंजानिया, अर्जेंटीना, इथियोपिया और कंबोडिया पर खास फोकस कर रहा है।

India Defence Export Strategy: रूस-यूक्रेन युद्ध बना टर्निंग प्वाइंट

दरअसल 2022 में रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद से ग्लोबल वेपंस सप्लाई चेन प्रभावित हुई है। दुनिया के सबसे बड़े हथियार आपूर्तिकर्ता देश अमेरिका और रूस अब अपनी प्राथमिकताएं बदल चुके हैं। पश्चिमी देशों ने अपनी गोदामों से यूक्रेन को हथियार भेजे, जबकि रूस के रक्षा कारखाने अपनी आंतरिक मांग पूरी करने में व्यस्त हो गए। इसी दौरान भारत जैसे देश नए विकल्प के तौर पर उभर कर सामने आए। इसका असर यह हुआ कि एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के कई देश अब नए विकल्प तलाश रहे हैं। भारत ने इस मौके को पहचानते हुए और अपनी डिफेंस एक्सपोर्ट स्ट्रेटेजी को इस तरह से तैयार किया कि अब वह न सिर्फ सस्ता बल्कि भरोसेमंद विकल्प बन सकता है।

India Defence Export Strategy: भारत का बढ़ता रक्षा उत्पादन

भारत ने 2023-24 वित्तीय वर्ष में 14.8 बिलियन डॉलर के हथियारों का उत्पादन किया, जो 2020 की तुलना में 62 फीसदी अधिक है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत ने पिछले एक दशक में अपने हथियार निर्यात को 230 मिलियन डॉलर से बढ़ाकर 2.3 बिलियन डॉलर कर लिया है, हालांकि यह अभी भी 3.5 बिलियन डॉलर के लक्ष्य से पीछे है। मोदी सरकार ने 2029 तक हथियार निर्यात को दोगुना कर 6 बिलियन डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है।

भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी कम लागत क्षमता है। उदाहरण के लिए, भारत 155 मिमी तोपखाने के गोले को 300 से 400 डॉलर प्रति गोला की कीमत पर बना सकता है, जबकि यूरोपीय देशों में कीमत 3,000 डॉलर से अधिक है। इसी तरह, भारतीय हॉवित्जर की कीमत लगभग 3 मिलियन डॉलर है, जो यूरोपीय मॉडल के कीमत की आधी है।

रूस-अमेरिका देते रहे हैं हथियार खरीदने के लिए कर्ज

अभी तक रूस और अमेरिका जैसे प्रमुख हथियार निर्यातक देश ही हथियार खरीदने के लिए कर्ज या वित्तीय मदद देने में अग्रणी रहे हैं। अपने रणनीतिक हितों को बढ़ावा देने के लिए हथियार सौदों के साथ फाइनेंसिंग या क्रेडिट गारंटी की पेशकश करते रहे हैं। रूस, अपनी सरकारी हथियार निर्यात एजेंसी रोसोबोरोनएक्सपोर्ट के जरिए कई देशों को हथियारों के साथ-साथ सस्ते ऋण देता रहा है। विशेष रूप से अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के देश, जो सोवियत काल से रूसी हथियारों पर निर्भर थे, इन वित्तीय सुविधाओं का लाभ उठाते रहे हैं। यहां तक कि रूस ने भारत, वियतनाम और अल्जीरिया जैसे देशों को हथियार सौदों के लिए क्रेडिट लाइन दी है।

वहीं, अमेरिका अपने फॉरेन मिलिट्री फाइनेंसिंग (FMF) कार्यक्रम के तहत सहयोगी देशों को हथियार खरीद के लिए लोन देता रहा है। इजरायल, मिस्र, जॉर्डन और नाटो सहयोगियों जैसे देशों के लिए यह लोन बेहद आम हैं। अमेरिका की इस रणनीति से न केवल हथियारों की बिक्री बढ़ती है, बल्कि इसका ज्योपॉलिटिकल असर भी पड़ता है और उसे मजबूत मिलती है।

वहीं हाल के सालों में चीन ने भी अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया में हथियार बिक्री के साथ सस्ते ऋण की पेशकश शुरू की है, खासकर उन देशों को जो बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का हिस्सा हैं। वहीं, फ्रांस और तुर्की भी अपने हथियार सौदों में क्रेडिट गारंटी या फाइनेंस की पेशकश करते हैं, विशेष रूप से उन ग्राहकों को जो उनके रणनीतिक हितों से जुड़े हैं। इसके अलावा इजरायल ने भी कुछ मामलों में हथियार सौदों के लिए लोन दिए हैं, हालांकि इसका दायरा रूस और अमेरिका के मुकाबले बेहद सीमित है।

India Defence Export Strategy EXIM Bank to Fund Arms Deals in Brazil, Armenia

India Defence Export Strategy: निजी कंपनियों की भागीदारी भी बढ़ी

सरकारी कंपनियों के साथ-साथ अब भारत की निजी रक्षा कंपनियां भी इस अभियान में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। अदाणी डिफेंस, SMPP जैसी कंपनियां अब बड़े पैमाने पर 155 मिमी तोप गोला और अन्य सैन्य उपकरण बना रही हैं। SMPP के सीईओ के अनुसार, “अब ग्लोबल लेवल पर भारत से गोला-बारूद की भारी मांग हो रही है, और हमने इसके लिए नया प्लांट भी तैयार किया है।

अर्मेनिया बना भारत की इस रणनीति का पहला उदाहरण

भारत की नई रणनीति का पहला बड़ा उदाहरण अर्मेनिया है, जहां हाल ही में पहली बार भारत ने डिफेंस अताशे को तैनात किया गया। अर्मेनिया पहले रूस से हथियार लेता था, लेकिन अब भारत की ओर रुख कर रहा है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) के अनुसार, 2022 से 2024 के बीच अर्मेनिया के कुल हथियार आयात में भारत की हिस्सेदारी 43% रही है।

बड़े हथियारों की बिक्री पर फोकस

पश्चिमी देशों की तुलना में भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी कम लागत और उत्पादन क्षमता है। अभी भारत मुख्यतया छोटे हथियार, गोला-बारूद और डिफेंस इक्विपमेंट्स ही निर्यात करता है, लेकिन अब सरकार चाहती है कि हेलिकॉप्टर, रडार, मिसाइल और युद्धपोत जैसे हाई-एंड सिस्टम्स का भी बड़ा हिस्सा हो। लंदन के इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज के रिसर्चर विराज सोलंकी ने कहा, “जब तक भारत अपने स्वदेशी उपकरणों का अधिक बार उपयोग नहीं करता और उनकी प्रभावशीलता का प्रदर्शन नहीं करता, तब तक संभावित खरीदारों को समझाना मुश्किल होगा।”

इसके बावजूद, भारत अपनी मिसाइल प्रणालियों जैसे आकाश और युद्धपोतों के निर्यात को बढ़ाने के लिए उत्साहित है। भारत की रणनीति में दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के देश प्रमुख लक्ष्य हैं। ब्राज़ील में हाल ही में EXIM बैंक का ऑफिस खोला गया है। भारत ने ब्राज़ील को ‘आकाश’ मिसाइल सिस्टम और युद्धपोत बेचने की बातचीत शुरू कर दी है। इसके अलावा, भारत की भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) ने भी साओ पाउलो में एक मार्केटिंग ऑफिस खोला है। EXIM बैंक को इस रणनीति का केंद्र बनाया गया है, जो अब अपने कॉमर्शियल पोर्टफोलियो से ऐसे सौदों को सपोर्ट करेगा। यह पोर्टफोलियो 2023-24 में $18.32 बिलियन तक पहुंच चुका है।

भारतीय नौसेना के रिटायर्ड कमांडर और KPMG डिफेंस के एडवाइजर गौतम नंदा का कहना है, “भारत ने न तो अपनी उत्पादन क्षमता घटाई, न ही उसे कभी युद्ध की संभावना से इनकार किया। आज भारत के पास वो अनुभव और उत्पादन लाइनें हैं जो पश्चिमी देशों ने पोस्ट-कोल्ड वॉर में बंद कर दी थीं।”

Pantsir air defence missile-gun system: भारत आ रहा है यह खास एयर डिफेंस सिस्टम, भारत डायनामिक्स लिमिटेड और रूस की Rosoboronexport के बीच हुआ समझौता

हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को हाई-एंड सिस्टम्स बेचने के लिए खुद उन हथियारों का इस्तेमाल करके उनका ट्रैक रिकॉर्ड दिखाना होगा। IISS के विशेषज्ञ विराज सोलंकी के अनुसार, “जब तक भारत अपने बनाए गए आधुनिक हथियारों का पर्याप्त प्रदर्शन नहीं करेगा, तब तक खरीदारों का पूरी तरह भरोसा नहीं मिलेगा।”

AMCA Sixth Generation Engine: भारत का स्टेल्थ फाइटर अब सीधे 6th-Gen इंजन से भरेगा उड़ान, DRDO चीफ का एलान

AMCA Sixth Generation Engine- DRDO Confirms AMCA to Skip 5th-Gen Engine

AMCA Sixth Generation Engine: रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के चीफ डॉ. समीर वी. कामत ने स्वदेशी स्टेल्थ फाइटर प्रोजेक्ट AMCA (Advanced Medium Combat Aircraft) को लेकर बड़ा बयान दिया है। डीआरडीओ चीफ ने कहा है कि भारत अब अपने इस पांचवीं पीढ़ी के फाइटर प्रोजेक्ट में फिफ्थ जनरेशन इंजन की जगह सिक्स्थ जनरेशन इंजन लगाएगा।

AMCA Sixth Generation Engine- DRDO Confirms AMCA to Skip 5th-Gen Engine

AMCA Sixth Generation Engine:  6वीं पीढ़ी का इंजन क्यों चाहिए

डॉ. कामत ने कहा कि “कावेरी इंजन एक चौथी पीढ़ी का इंजन है और AMCA के लिए हमें छठवीं पीढ़ी के इंजन की जरूरत है।” यानी भारत अब पिछली तकनीकी सीमाओं को पार कर सीधे उस इंजन टेक्नोलॉजी पर काम करेगा, जो अभी अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देशों में ही रिसर्च स्टेज में है। इसमें सबसे अहम भूमिका निभा रही है वैरिएबल साइकिल इंजन (VCE) टेक्नोलॉजी। यह टेक्नोलॉजी मिशन के अनुसार हाई थ्रस्ट और फ्यूल एफिशिएंसी के बीच स्विच कर सकती है।

AMCA Sixth Generation Engine: क्या है VCE तकनीक और क्यों है खास?

Variable Cycle Engine, पारंपरिक जेट इंजनों के मुकाबले बेहद एडवांस है। यह इंजन एयरफ्लो और बायपास रेशियो को जरूरत के मुताबिक बदल सकता है, जिससे यह एक ही समय में ज्यादा ताकत, कम ईंधन खपत और बेहतर थर्मल कंट्रोल देता है। इससे न सिर्फ विमान लंबी दूरी तक उड़ान भर सकता है, बल्कि भविष्य में उसमें लेज़र वेपन जैसी एनर्जी-इंटेंसिव सिस्टम्स को भी ताकत दी जा सकती है। इस तकनीक से न केवल 25% बेहतर ईंधन दक्षता मिलती है, बल्कि लंबी उड़ान रेंज, एडवांस थर्मल मैनेजमेंट और डायरेक्टेड-एनर्जी वेपंस जैसे लेजर सिस्टम को सपोर्ट करती है। यह इंजन AMCA को सुपरक्रूज (बिना आफ्टरबर्नर के 1.2 मैक की गति) और एडवांस सिस्टम जैसे AESA रडार और स्वार्म ड्रोन कंट्रोल जैसी क्षमताएं देगा।

5वीं पीढ़ी को स्किप करने का जोखिम

विशेषज्ञों का मानना है कि जहां कावेरी प्रोग्राम जैसी पुराने प्रोजेक्ट्स में 1980 के दशक से अब तक भी कई चुनौतियां बनी हुई हैं, वहीं सीधे छठवीं पीढ़ी पर छलांग लगाना तकनीकी और लॉजिस्टिक दोनों ही स्तरों पर भारत के लिए एक बड़ी चुनौती हो सकती है। लेकिन एक वर्ग ऐसा भी है जो डीआरडीओ के इस विजन को सपोर्ट कर रहा है। उनका मानना है कि चीन और अमेरिका पहले से ही अपने 6th-gen प्रोजेक्ट्स (जैसे J-XX और NGAD) पर काम कर रहे हैं, और भारत को प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए यह कदम उठाना जरूरी है।

AMCA Sixth Generation Engine: कावेरी से लीं कई सीखें

डीआरडीओ प्रमुख ने यह भी बताया कि कावेरी इंजन प्रोग्राम के अनुभवों से काफी कुछ सीखने को मिला है। अब GTRE (Gas Turbine Research Establishment) नए अलॉयज, 3D प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से डिज़ाइन ऑप्टिमाइजेशन की ओर बढ़ रही है। इस बार मिशन में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय कंपनियों जैसे सैफरान (फ्रांस) और रोल्स-रॉयस (यूके) के साथ साझेदारी की संभावनाएं भी तलाशी जा रही हैं।

10,000 करोड़ के निवेश की योजना

डीआरडीओ अगले 10 वर्षों में इंजन रिसर्च और डेवलपमेंट पर लगभग 10,000 करोड़ रुपये का निवेश करने की योजना बना रहा है। इस प्रोजेक्ट में गोदरेज एयरोस्पेस, एलएंडटी जैसे भारतीय निजी क्षेत्र के साझेदारों को भी शामिल किया जाएगा ताकि तकनीक का न सिर्फ विकास हो, बल्कि घरेलू उत्पादन क्षमता भी मजबूत हो।

AMCA Mk-2: सुपरक्रूज़ और लेजर वेपंस के लिए तैयार

AMCA का पहला वर्जन 5वीं पीढ़ी की क्षमताओं के साथ आएगा, लेकिन Mk-2 वेरिएंट, जिसे 2040 तक सेवा में लाने की योजना है, उसमें छठवीं पीढ़ी की खूबियां, जैसे स्वार्म ड्रोन कंट्रोल, ऑप्शनल मैनिंग (यानि पायलट रहित मोड) और एडवांस्ड सेंसर्स शामिल होंगे। इस सबके लिए एक बेहद एडवांस इंजन जरूरी है, जो बिना आफ्टरबर्नर के Mach 1.2 की स्पीड (सुपरक्रूज़) पकड़ सके।

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2032 तक होगा इंजन का प्रोटोटाइप तैयार

डीआरडीओ की योजना है कि VCE का एक वर्किंग प्रोटोटाइप 2032 तक तैयार कर लिया जाए। अगर यह लक्ष्य समय पर हासिल किया गया तो भारत दुनिया के उन चंद देशों में शामिल हो जाएगा जो छठवीं पीढ़ी की इंजन टेक्नोलॉजी में महारत रखते हैं। DRDO ने 2032 तक VCE प्रोटोटाइप का परीक्षण शुरू करने की योजना बनाई है।

अभी दुनिया में कई देश छठवीं पीढ़ी का इंजन को डेवलप करने में जुटे हुए हैं। केवल कुछ ही देश, जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका Adaptive Engine Transition Program (AETP) पर काम कर रहा है, यूनाइटेड किंगडम और फ्रांस Future Combat Air System (FCAS) इंजन पर रिसर्च कर रहे हैं। ऐसे में DRDO भारत के AMCA के लिए 6th-gen इंजन बना देता है, तो यह भारत को वैश्विक सैन्य शक्ति के रूप में एक नई ऊंचाई देगा। चीन की ओर से आने वाले J-XX प्रोजेक्ट और अमेरिका के NGAD (Next-Generation Air Dominance) जैसे प्रोग्राम से मुकाबले के लिए यह जरूरी भी है। इससे भारत न सिर्फ अपनी वायुसेना की ताकत बढ़ा पाएगा, बल्कि रक्षा निर्यात में भी एक नया अध्याय जोड़ सकेगा। यह प्रोजेक्ट देश की ‘आत्मनिर्भर भारत’ नीति को भी मजबूती देगा।

Drone Shield on Tanks: T-90 और T-72 टैंकों पर यह खास कवच लगाएगी भारतीय सेना, हमले से पहले ही ढेर होंगे दुश्मन के ड्रोन

Drone Shield on Tanks: Indian Army to Equip T-90 & T-72 with Anti-Drone Systems

Drone Shield on Tanks: रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान टैंकों को उड़ाने में जिस तरह से आत्मघाती ड्रोनों का इस्तेमाल किया गया, इससे भारतीय सेना भी सतर्क हो गई है। भारतीय सेना अब अपने पुराने रूसी मूल के टैंकों T-72 ‘अजेय’ और T-90S ‘भीष्म’ को ड्रोन हमलों से बचाने के लिए हाईटेक एंटी-ड्रोन सिस्टम से लैस करने की तैयारी कर रही है। बता दें कि यूक्रेन में चल रही जंग में रूस के हजारों टैंक ड्रोन और आधुनिक मिसाइल हमलों में तबाह हो चुके हैं। इस युद्ध ने दिखा दिया है कि भविष्य के युद्ध बंदूक-बमों से नहीं, बल्कि छोटे, स्मार्ट और आत्मघाती ड्रोन से भी लड़े जाएंगे।

Drone Shield on Tanks: Indian Army to Equip T-90 & T-72 with Anti-Drone Systems

खतरे की घंटी: कैसे ड्रोन बन रहे हैं टैंकों के लिए काल?

भारत के पास करीब 2400 T-72 और 1300 से ज्यादा T-90 भीष्म टैंक हैं। इन टैंकों को मुख्य तौर पर पाकिस्तान के साथ पांरपरिक युद्ध के डिजाइन किया गया था। लेकिन अब ये टैंक ड्रोन हमलों के लिए बेहद संवेदनशील माने जा रहे हैं। यूक्रेन में जो हो रहा है, उससे सबक लेते हुए अब इन टैंकों की सुरक्षा को लेकर सेना ज्यादा सतर्क हो गई है। पिछले एक साल में ही यूक्रेन ने करीब 3,000 रूसी टैंकों और 9,000 बख्तरबंद वाहनों को नष्ट कर दिया है। ये हमले आमतौर पर ड्रोन, आर्टिलरी और एंटी-टैंक मिसाइलों के जरिए किए गए। यूक्रेन के फर्स्ट-पर्सन व्यू (एफपीवी) ड्रोन, स्वार्म ड्रोन, लॉइटरिंग यूएवी और कामिकाजा ड्रोनों ने रूसी टैंकों को भारी नुकसान पहुंचाया है।

सेना को है ‘काउंटर अनमैन्ड एरियल सिस्टम्स’ की तलाश

इसी को देखते हुए भारतीय सेना अब ‘काउंटर अनमैन्ड एरियल सिस्टम्स’ (C-UAS) की तलाश में है, जिन्हें सीधे तौर पर टैंकों पर लगाया जा सके और जो किसी भी प्रकार के ड्रोन हमले को समय रहते पहचानकर उसे नष्ट कर सकें। सेना ने हाल ही में ऐसे 75 C-UAS सिस्टम की खरीद के लिए ‘रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन’ (RFI) जारी किया है।

इन एंटी-ड्रोन सिस्टम में दो तरह की क्षमताएं होनी चाहिए, पहला ‘सॉफ्ट किल’ और दूसरा ‘हार्ड किल’। सॉफ्ट किल सिस्टम में सैटेलाइट बेस्ड नेविगेशन और रेडियो फ्रीक्वेंसी सिग्नल को जाम करने की क्षमता होगी। यानी ये ड्रोन को भ्रमित कर उन्हें नियंत्रित करने से रोक देगा। यह सिस्टम दुश्मन ड्रोन के जीपीएस या रडार सिग्नल को जाम कर उसे भटका सकता है। वहीं, हार्ड किल सिस्टम ड्रोन की लोकेशन की जानकारी टैंक पर लगे एंटी-एयरक्राफ्ट मशीन गन को देगा, ताकि सीधे फायर करके ड्रोन को नष्ट किया जा सके।

Drone Shield on Tanks: टैंकों के डिजाइन पर न पड़े कोई असर

सेना के एक अधिकारी के मुताबिक, “इन सिस्टम्स को इस तरह से डिजाइन करना होगा कि वह टैंक की बनावट और कार्यक्षमता में कोई बाधा न डाले। न ही टैंकों की मोबिलिटी, एनबीसी (न्यूक्लियर, बायोलॉजिकल, केमिकल) सुरक्षा और गहराई में पानी पार करने की क्षमता पर कोई असर न पड़े।” चूंकि टैंकों का डिजाइन ‘लेथालिटी, मोबिलिटी और सर्वाइवबिलिटी’ पर आधारित होता है, इसलिए इन पर ज्यादा अतिरिक्त वजन नहीं डाला जा सकता। इसलिए सेना हल्के और कॉम्पैक्ट एंटी-ड्रोन सिस्टम चाहती है। इसके अलावा T-90 और T-72 जैसे भारी टैंकों में पहले से सीमित जगह होती है, इसलिए इनमें अतिरिक्त कवच जोड़ना व्यावहारिक नहीं है।

Drone Shield on Tanks: कैसे होंगे भविष्य के टैंक?

सेना अब भविष्य के टैंकों को हवाई हमलों से बचाने के लिए शुरू से ही डिजाइन में बदलाव कर रही है। 25 टन वजनी स्वदेशी लाइट टैंक ‘Zorawar’ परियोजना के तहत बनाए जा रहे हैं, जिनमें इनबिल्ट एंटी-ड्रोन सिस्टम होंगे। लगभग 17,500 करोड़ रुपये की लागत से बनाए जा रहे 354 लाइट टैंकों को ऊंचाई वाले जैसे लद्दाख और अरुणाचल जैसे सीमावर्ती इलाकों में तैनात किया जाएगा।

सेना के एक अन्य अधिकारी का कहना है, “हम अब हर नए टैंक प्रोजेक्ट में एंटी-एरियल थ्रेट्स और नेटवर्क कनेक्टिविटी जैसे आधुनिक फीचर्स को प्राथमिकता दे रहे हैं। इससे न सिर्फ टैंक की अपनी सुरक्षा होगी, बल्कि पूरी यूनिट की एरिया सुरक्षा भी सुनिश्चित की जा सकेगी।”

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चीन के खिलाफ लगाए थे T-90 और T-72 टैंक

2020 में पूर्वी लद्दाख के गलवान क्षेत्र में भारत-चीन सीमा तनाव के दौरान भारतीय सेना ने 15,000 फीट की ऊंचाई पर टी-90 भीष्म और टी-72 टैंकों की तैनाती की थी। भारतीय सेना के लिए यह एक तरह से तकनीकी और लॉजिस्टिक चमत्कार ही था। भारत ने इन टैंकों को चुशूल, देमचोक, और दौलत बेग ओल्डी जैसे क्षेत्रों में तैनात किया था। ये टैंक ऊंचाई वाले कठिन इलाकों और माइनस 40 डिग्री तक के तापमान में प्रभावी ढंग से काम कर सकते हैं।  लेकिन अब सेना समझ चुकी है कि ऊंचाई वाले इलाकों में हल्के, फुर्तीले और ड्रोन-प्रूफ टैंकों की जरूरत है।

Porsche 911 at Bumla Pass: जब अरुणाचल प्रदेश में भारत-चीन सीमा पर पहुंची पोर्श 911, तवांग में स्पोर्ट्स कारें देख भौंचक्के रह गए चीनी सैनिक

Porsche 911 at Bumla Pass: Chinese Soldiers Stunned by Sports Cars on Indo-China Border
Image Source: @SirishChandran

Porsche 911 at Bumla Pass: समुद्र तल से 15,200 फीट से अधिक की ऊंचाई पर भारत-चीन सीमा पर स्थित बुमला पास हाल ही में एक अनोखे और रोमांचक नजारे का गवाह बना। बुमला पास अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिले में भारत-चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर स्थित है। 1962 के भारत-चीन युद्ध का गवाह रहे बुमला पास पर भारतीय और चीनी सैनिक आंख में आंख डाल कर खड़े रहते हैं। हाल ही में यह इलाका पोर्श 911 जैसी लग्जरी स्पोर्ट्स कारों की आवाजों से गूंज उठा। बूमला में स्पोर्ट्स कारें वहां तक पहुंची, जहां चीनी सेना की पोस्ट हैं। अपनी सीमा चौकियों के पास इन महंगी स्पोर्ट्स कारों को देख कर चीनी सेना भी हैरान हो गई।

Porsche 911 at Bumla Pass: Chinese Soldiers Stunned by Sports Cars on Indo-China Border
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Porsche 911 at Bumla Pass: बुमला पास के लिए चाहिए विशेष परमिट  

बुमला पास, अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिले में भारत-चीन सीमा पर स्थित है। यह स्थान अपनी प्राकृतिक सुंदरता और सामरिक महत्व के लिए जाना जाता है। यह दर्रा समुद्र तल से लगभग 15,200 फीट (4,572 मीटर) की ऊंचाई पर है और तवांग शहर से 37 किलोमीटर की दूरी पर है। दूसरी ओर, यह चीन के त्सोना काउंटी के त्सोना ढोंग शहर से 43 किलोमीटर दूर है। यह इलाका भारतीय सेना के नियंत्रण में है और यहां आने के लिए विशेष परमिट की जरूरत होती है, जो तवांग में ठहरने वाले होटलों से आसानी से प्राप्त किया जा सकता है।

1962 के भारत-चीन युद्ध का गवाह रहा है बुमला पास

यह दर्रा 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान चर्चा में आया था, जब यहां बुमला की लड़ाई लड़ी गई थी। इस युद्ध में चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ने भारत पर हमला किया था, और बुमला पास उन प्रमुख स्थानों में से एक था, जहां भीषण युद्ध हुआ था। युद्ध के बाद यह क्षेत्र लंबे समय तक व्यापार और आवागमन के लिए बंद रहा। हालांकि, 2006 में, 44 साल बाद, बुमला पास को व्यापार के लिए फिर से खोल दिया गया। आज यह अरुणाचल प्रदेश और तिब्बत के बीच एक व्यापारिक बिंदु के तौर पर कार्य करता है। इसके अलावा, बुमला पास भारतीय सेना और चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के बीच नियमित परामर्श और बातचीत के लिए पांच आधिकारिक बॉर्डर पर्सनल मीटिंग (BPM) पॉइंट्स में से एक है।

Porsche 911 at Bumla Pass: एडवेंचर ड्राइविंग का मिलेगा मजा

हाल ही में ऑटो पत्रकार सिरिश चंद्रन (@SirishChandran) ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में इस अनुभव को साझा किया, जिसमें उन्होंने बताया कि कैसे वे 12 अप्रैल 2025 को पोर्श 911 ड्राइव करते हुए भारत-चीन सीमा तक पहुंचे। सिरिश चंद्रन ने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में बताया कि नई सड़कों के कारण अब बुमला पास तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। उन्होंने लिखा, “इसका श्रेय नई नीति को जाता है, जिसके तहत सीमा तक अच्छी सड़कें बनाई गई हैं, ताकि सैन्य रसद को सुगम बनाया जा सके और सीमा पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सके।” उनकी पोस्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि ट्रांस-अरुणाचल हाईवे, खासकर डंबुक से पासीघाट तक का रास्ता, स्पोर्ट्स कारों के लिए एकदम बढ़िया है। एडवेंचर ड्राइविंग का मजा लेने वालों को यहां के रास्तों पर तेज मोड़, सियांग नदी के दृश्य, और शानदार सड़कें देखने को मिलेंगी।

Porsche 911 at Bumla Pass: Chinese Soldiers Stunned by Sports Cars on Indo-China Border
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स्पोर्ट्स कारें देख चीनी सैनिक हुए हैरान

अपनी पोस्ट में साझा की गई तस्वीरों में वह बुमला पास पर खड़े नजर आ रहे हैं, और उनके पीछे चीनी सैनिक हैरानी से उनकी स्पोर्ट्स कारों को देख रहे हैं। सिरिश ने लिखा, “बुमला में चीनी सैनिकों को देखते हुए, जो विश्वास नहीं कर पा रहे कि वे क्या देख रहे हैं! भारत की ओर से स्पोर्ट्स कारें सीधे भारत-चीन सीमा तक पहुंच गईं।” उन्होंने यह भी बताया कि ट्रांस-अरुणाचल हाईवे के पूरा होते ही सरकार ने हिमालय की सीमा के साथ एक नई सड़क का टेंडर भी पूरा कर लिया है, जो भविष्य में और भी रोमांचक ड्राइविंग अनुभव प्रदान करेगी।

रिटायर्ड मेजर जनरल ने जताई खुशी

वहीं, 2003 से 2005 तक बुमला में अपनी यूनिट की कमान संभाल चुके मेजर जनरल (रिटायर्ड) राजू चौहान ने बुमला तक स्पोर्ट्स कारें पहुंचने पर खुशी जताई है। उन्होंने बताया, “एक वक्त था जब हमारे 4×4 वाहनों को भी बुमला तक पहुंचने में काफी मुश्किल होती थी। आज बुमला में पोर्श को देखना और सेला टनल का निर्माण देखना वाकई शानदार है। अविश्वसनीय भारत!”

Porsche 911 at Bumla Pass: पर्यटन को मिल रहा बढ़ावा

बुमला पास अब केवल एक सामरिक स्थल नहीं है, बल्कि यह पर्यटन के नक्शे पर भी अपनी जगह बना रहा है। भारत सरकार की ‘भारत रणभूमि दर्शन’ पहल के तहत, सीमावर्ती क्षेत्रों में 77 युद्ध स्मारकों को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा रहा है, जिनमें बुमला पास भी शामिल है। इस पहल का उद्देश्य सीमा पर्यटन को बढ़ावा देना, देशभक्ति की भावना को प्रोत्साहित करना, और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है।

Border Tourism: जल्द ही पर्यटकों के लिए खुलेगा गलवान! टूरिज्म बढ़ाने के लिए सेना खोलेगी कई सीमा से सटे इलाके

हालांकि, बुमला पास की यात्रा आसान नहीं है। यहां की ऊंचाई, ठंडा मौसम, और सख्त नियम कुछ चुनौतियां पेश करते हैं। यहां फोटोग्राफी की इजाजत नहीं है, और केवल अरुणाचल प्रदेश में पंजीकृत वाहनों को ही प्रवेश दिया जाता है। फिर भी, यहां का अनुभव अविस्मरणीय है। यहां एक छोटा सा रेस्टोरेंट भी है, जहां भारतीय सेना यहां आने वाले पर्यटकों को मैगी, सूप, और चाय उपलब्ध कराती है।