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K-4 Missile Test: 3500 किमी तक मार सकेगी भारत की के-4 मिसाइल, स्वदेशी न्यूक्लियर सबमरीन INS Arihant से किया सफल टेस्ट

इससे पहले आईएनएस अरिहंत पर के-15 मिसाइलें तैनात थीं, जिनकी रेंज करीब 750 किलोमीटर थी। के-4 मिसाइल की तैनाती से इसकी रेंज में कई गुना इजाफा हुआ है...

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📍नई दिल्ली/विशाखापट्टनम | 25 Dec, 2025, 11:30 AM

K-4 Missile Test: जब ऊपर आसमान में हलचल मची हो या जमीन पर शोर हो, तो समंदर के नीचे एक अलग ही शांति पसरी रहती है। इसी शांति के बीच भारत ने हाल ही में एक ऐसा कदम उठाया, जिसकी गूंज दूर तक जाती है। जिस समय पूरी दुनिया सो रही थी, तब भारत ने अपनी मैरीटाइम न्यूक्लियर कैपेबिलिटी को और मजबूत करते हुए एक बड़ी उपलब्धि हासिल की। बंगाल की खाड़ी में देश की पहली स्वदेशी न्यूक्लियर सबमरीन आईएनएस अरिहंत से के-4 सबमरीन-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल का सफल यूजर ट्रायल किया। इस मिसाइल की मारक क्षमता करीब 3,500 किलोमीटर थी। इस ट्रायल के बाद भारत का न्यूक्लियर ट्रायड और मजबूत हुआ है।

हालांकि इस ट्रायल को लेकर रक्षा मंत्रालय या डीआरडीओ की तरफ से कोई औपचारिक बयान जारी नहीं किया गया है, लेकिन डिफेंस सूत्रों ने इसकी पुष्टि की है। यह ट्रायल विशाखापट्टनम के तट से दूर समुद्री क्षेत्र में किया गया, जहां दिसंबर के मध्य में जारी नोटैम यानी नोटिस टू एयरमेन के जरिए बड़े इलाके को ट्रायल के लिए सुरक्षित घोषित किया गया था।

K-4 Missile Test: मुश्किल होता है समुद्र से मिसाइल परीक्षण

समुद्र के नीचे से बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण तकनीकी रूप से बेहद मुश्किल माना जाता है। पनडुब्बी से छोड़ी जाने वाली मिसाइल पहले पानी के अंदर से गैस प्रेशर की मदद से बाहर निकलती है और फिर सतह के ऊपर आते ही उसका इंजन एक्टिव होता है।

के-4 मिसाइल को खास तौर पर भारत की अरिहंत क्लास न्यूक्लियर पनडुब्बियों के लिए डिजाइन किया गया है। यह दो-स्टेज सॉलिड फ्यूल रॉकेट पर आधारित बैलिस्टिक मिसाइल है, जिसकी लंबाई करीब 12 मीटर और वजन लगभग 17 टन बताया गया है। यह मिसाइल करीब दो टन तक का पेलोड ले जा सकती है, जिसमें न्यूक्लियर वारहेड भी शामिल हो सकते हैं।

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मिसाइल में सटीकता के लिए एडवांस्ड इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम के साथ जीपीएस और नाविक सपोर्ट दिया गया है। सर्कुलर एरर प्रोबेबल यानी सीईपी बहुत कम होने की वजह से इसे हाई एक्युरेसी मिसाइल माना जाता है। इसके अलावा, इसमें मैन्यूवरेबल री-एंट्री व्हीकल की क्षमता भी है, जिससे यह मिसाइल डिफेंस सिस्टम को चकमा भी दे सकती है।

K-4 Missile Test: के-15 से के-4 तक का सफर

इससे पहले आईएनएस अरिहंत पर के-15 मिसाइलें तैनात थीं, जिनकी रेंज करीब 750 किलोमीटर थी। के-4 मिसाइल की तैनाती से इसकी रेंज में कई गुना इजाफा हुआ है। इससे भारत की मैरीटाइम न्यूक्लियर कैपेबिलिटी बढ़ी है। के-4 मिसाइल के जरिए समुद्र में तैनात पनडुब्बी से कहीं अधिक दूर तक लक्ष्य को भेदने की क्षमता मिलती है।

K-4 Missile Test: भारत के पास दो एसएसबीएन

भारत के पास इस समय दो ऑपरेशनल नाभिकीय बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां हैं। आईएनएस अरिहंत पहली ऐसी पनडुब्बी है, जिसे 2016 में कमीशंड किया गया था और 2018 में यह पूरी तरह ऑपरेशनल हुई। इसके बाद अगस्त 2024 में भारत की दूसरी एसएसबीएन आईएनएस अरिघात को नौसेना में शामिल किया गया। यह पनडुब्बी पहले की तुलना में ज्यादा स्वदेशी तकनीक से लैस है और इसमें भी के-4 मिसाइल को लगाया गया है।

इसके अलावा, तीसरी न्यूक्लियर सबमरीन आईएनएस अरिधमन का निर्माण भी चल रहा है। यह भारत की तीसरी रिहंत क्लास की एस-4 स्वदेशी न्यूक्लियर-पावर्ड बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन है। नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी ने 2 दिसंबर को पुष्टि की थी कि यह सबमरीन अपने अंतिम ट्रायल चरण में है और बहुत जल्द कमीशन की जाएगी। यह सबमरीन आईएनएस अरिहंत और आईएनएस अरिघात से थोड़ी बड़ी (7,000 टन डिस्प्लेसमेंट) है, ज्यादा के-4 सबमरीन-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल (3,500 किमी रेंज) कैरी कर सकती है। इसमें बेहतर स्टेल्थ, एडवांस्ड सीएमएस और ऑप्टिमाइज्ड 83 मैगावॉट रिएक्टर से लैस। यह महीनों तक पानी के नीचे रहकर नौसेना को सेकंड-स्ट्राइक कैपेबिलिटी देगी।

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इसके अलावा भारत की चौथी न्यूक्लियर-पावर्ड बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन कोडनेम एस-4 स्टार भी तैयार हो रही है। यह अरिहंत क्लास की आखिरी सबमरीन है। इसका निर्माण पूरा हो चुका है, अब हार्बर और सी ट्रायल्स की तैयारी चल रही है। इसकी कमीशनिंग 2026 के अंत या 2027 की शुरुआत में होने की उम्मीद है। इसका वजन करीब 7,000 टन है और इसमें 75 फीसदी इंडिजिनस कंटेंट है। इसमे 8 के-4 मिसाइल लॉन्च ट्यूब्स लगाए जा सकते हैं, जिनकी रेंज 3,500 किमी तक है। इसके बाद नेक्स्ट जेनरेशन एस5 क्लास सबमरीन बनाई जाएंगी, जिनमें 12-16 मिसाइल्स लगाई जा सकेंगी।

K-4 Missile Test: एटीवी प्रोग्राम के तहत तैयार हो रहीं पनडुब्बियां

भारत का एडवांस्ड टेक्नोलॉजी वेसल यानी एटीवी प्रोग्राम कई दशकों से चल रहा है। इसी प्रोग्राम के तहत अरिहंत क्लास और आगे की पनडुब्बियों को तैयार किया गया है। शुरुआती पनडुब्बियों में 83 मेगावाट का न्यूक्लियर रिएक्टर लगाया गया है, जबकि आगे आने वाली बड़ी पनडुब्बियों में ज्यादा क्षमता वाले प्रेसराइज्ड लाइट वाटर रिएक्टर लगाने की योजना है।

K-4 Missile Test: क्या है न्यूक्लियर ट्रायड

भारत की न्यूक्लियर ट्रायंगल अरेंजमेंट में जमीन, हवा और समुद्र तीनों शामिल हैं। जमीन आधारित बैलिस्टिक मिसाइलों में अग्नि-5 जैसी मिसाइलें शामिल हैं, जिनकी मारक क्षमता पांच हजार किलोमीटर से ज्यादा है। वायुसेना के पास राफेल, सुखोई-30 एमकेआई और मिराज-2000 जैसे लड़ाकू विमान हैं, जो विशेष हथियार ले जाने में सक्षम हैं। समुद्री में न्यूक्लियर सबमरीन सबसे सुरक्षित और भरोसेमंद मानी जाती हैं, क्योंकि इन्हें ढूंढना बेहद मुश्किल होता है।

ट्राई-सर्विस स्ट्रैटेजिक फोर्सेज कमांड के अधीन

इन न्यूक्लियर सबमरीन और मिसाइलों का ऑपरेशन ट्राई-सर्विस स्ट्रैटेजिक फोर्सेज कमांड के अधीन होता है। यह कमान देश की न्यूक्लियर एसेट्स के ऑपरेशन और कॉर्डिनेशन के लिए जिम्मेदार है। के-4 मिसाइल का परीक्षण इसी सिस्टम के तहत किया गया।

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चीन और अमेरिका के पास भी हैं न्यूक्लियर सबमरीन

दुनिया में अमेरिका, रूस और चीन के पास बड़ी संख्या में न्यूक्लियर सबमरीन और इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलें हैं। चीन के पास जिन क्लास की पनडुब्बियां हैं, उनमें जेएल-2 और जेएल-3 जैसी लंबी दूरी की मिसाइलें तैनात हैं। अमेरिका के पास ओहायो क्लास एसएसबीएन हैं। भारत की पनडुब्बियां साइज और संख्या में भले ही कम हों, लेकिन के-4 जैसी मिसाइलों की तैनाती से उसकी मैरीटाइम न्यूक्लियर कैपेबिलिटी लगातार मजबूत होती जा रही है।

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