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Vijay Diwas 2025: विजय दिवस ‘एट होम’ में भारतीय सेना ने दिखाई स्वदेशी की ताकत, AI से लेकर से ड्रोन टेक्नोलॉजी को किया शोकेस

भारत ने निगरानी के लिए एक नया स्वदेशी ड्रोन तैयार किया है, जिसे टेदर्ड हाइब्रिड एयरोस्टैटिक ड्रोन कहा जाता है। यह ड्रोन हीलियम गैस और इलेक्ट्रिक मोटर दोनों की मदद से उड़ता है...

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📍नई दिल्ली | 16 Dec, 2025, 1:47 PM

Vijay Diwas 2025: 54वें विजय दिवस के मौके पर भारतीय सेना ने नई दिल्ली स्थित आर्मी हाउस में विजय दिवस ‘एट होम’ कार्यक्रम का आयोजन किया। यह आयोजन 1971 के युद्ध में भारत की ऐतिहासिक जीत की स्मृति में किया गया। इस कार्यक्रम में भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू मुख्य अतिथि के तौर पर उपस्थित रहीं। इस मौके पर भारतीय सेना ने स्वदेशी तकनीकों, इनोवेशन और आत्मनिर्भर रक्षा क्षमताओं का व्यापक प्रदर्शन किया।

इस आयोजन में 73 देशों के राजदूत और उच्चायुक्त, वीरता पुरस्कार विजेता, खिलाड़ी, विभिन्न क्षेत्रों के विशिष्ट अतिथि और वरिष्ठ सैन्य अधिकारी शामिल हुए।

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AI बेस्ड सैटेलाइट इमेजरी एनालिसिस सिस्टम

विजय दिवस ‘एट होम’ में प्रदर्शित प्रमुख तकनीकों में भारतीय सेना ने एआई बेस्ड सैटेलाइट इमेजरी एनालिसिस सिस्टम को पेश किया। यह सिस्टम सैटेलाइट से प्राप्त तस्वीरों का तेज और सटीक विश्लेषण करता है। यह प्लेटफॉर्म इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल, सिंथेटिक एपर्चर रडार, हाइपरस्पेक्ट्रल और इंफ्रारेड इमेजरी को एक साथ प्रोसेस करता है। पहले इन तस्वीरों को मैन्युअली देखने और समझने में काफी समय लगता था, लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से अब बदलावों की पहचान, गतिविधियों की निगरानी और अहम संकेतों को तुरंत मार्क किया जा सकता है।

Vijay Diwas 2025
AI-Based Satellite Imagery Analysis system

यह सिस्टम iDEX के तहत विकसित किया गया है और इसे आईआईटी दिल्ली से जुड़े स्टार्टअप साइरन एआई ने तैयार किया है।

यह सिस्टम 40 से अधिक श्रेणियों में ऑब्जेक्ट पहचान सकता है, बदलावों को ट्रैक कर सकता है और ड्रोन से मिलने वाली इमेजरी का विश्लेषण कर रियल-टाइम अलर्ट जारी करता है। यह तकनीक भारतीय स्टार्टअप्स और शैक्षणिक संस्थानों के सहयोग से तैयार की गई है। इसका उपयोग आपदा प्रबंधन, भूमि उपयोग, कृषि आकलन और इंफ्रास्ट्रक्चर योजना जैसे नागरिक क्षेत्रों में भी किया जा सकता है।

नेटवर्क के बिना काम करने वाला AI-इन-ए-बॉक्स

भारतीय सेना ने एक पोर्टेबल AI सिस्टम को भी शोकेस किया। इसे “AI-इन-ए-बॉक्स” कहा जाता है। यह सिस्टम उन इलाकों के लिए डिजाइन किया गया है जहां इंटरनेट या मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं होता। कठिन और दुर्गम क्षेत्रों में यह सिस्टम डेटा का विश्लेषण कर निर्णय लेने में मदद करता है।

यह सिस्टम भारतीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गयाा है और यह लॉजिस्टिक्स प्लानिंग, रियल-टाइम सिचुएशनल अवेयरनेस और ट्रेनिंग में मददगार है। यह पूरी तरह सुरक्षित है और बाहर के किसी सर्वर से जुड़ा नहीं होता। आपदा के समय, दूरदराज इलाकों में राहत टीमों के लिए भी यह सिस्टम काफी उपयोगी साबित हो सकता है।

वज्रका ऑल-टेरेन वाहन: पहाड़ों का भरोसेमंद साथी

भारतीय सेना ने वज्रका ऑल-टेरेन वाहन तैयार किया है, जो बेहद संकरे और खड़े पहाड़ी रास्तों पर भी चल सकता है। यह वाहन खास तौर पर लद्दाख और ऊंचाई वाले इलाकों के लिए बनाया गया है।

976 सीसी इंजन से लैस यह वाहन एक मीटर चौड़े रास्तों पर भी चल सकता है, 30 डिग्री तक की चढ़ाई चढ़ सकता है और 14,000 फीट की ऊंचाई पर –20 डिग्री तापमान में भी काम कर सकता है। इसका उपयोग लॉजिस्टिक्स सपोर्ट, सर्च एंड रेस्क्यू, कैजुअल्टी इवैक्यूएशन और ड्रोन ऑपरेशंस में किया जा सकता

एडवांस ट्रस ब्रिज: फटाफट बनेगा पुल

भारतीय सेना ने एडवांस ट्रस ब्रिज नाम का एक नया स्वदेशी पुल तैयार किया है। यह पुल खास तौर पर सेना की तेज आवाजाही और आपदा के समय आम लोगों तक मदद पहुंचाने के लिए बनाया गया है। इस पुल को iDEX प्राइम कार्यक्रम के तहत विकसित किया गया है।

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इस पुल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह बहुत भारी सैन्य वाहनों का भार सह सकता है। इसे 60 मीटर तक की दूरी में लगाया जा सकता है। केवल 30 सैनिकों की टीम इस पुल को 15 से 18 घंटे में खड़ा कर सकती है। पुल की चौड़ाई 4.2 मीटर है, जिससे टैंक और बड़े वाहन आसानी से निकल सकते हैं। फिसलन रोकने के लिए इसमें खास सरफेस दिया गया है।

सेना का मानना है कि यह पुल पुराने बेली ब्रिज की जगह ले सकता है। इसकी उम्र लगभग 30 साल है। युद्ध के समय ही नहीं, बल्कि बाढ़, भूकंप और भूस्खलन के बाद टूटी सड़कों को जोड़ने में भी यह पुल बहुत काम आएगा।

रीसाइकल्ड असॉल्ट ट्रैक वे: प्लास्टिक कचरे से समाधान

भारतीय सेना और आईआईटी रुड़की ने मिलकर रीसाइकल्ड प्लास्टिक से बनी असॉल्ट ट्रैक वे विकसित की है। यह पारंपरिक एल्यूमिनियम ट्रैक वे की तुलना में हल्की है और ज्यादा भार सहन कर सकती है। यह अस्थायी रास्ता होता है, जिसे मिट्टी वाली जमीन, कीचड़ या टूटी सड़क पर बिछाया जाता है। जहां पुराने एल्यूमिनियम ट्रैक बहुत भारी होते थे, लेकिन यह नया ट्रैक हल्का है और ज्यादा भार सह सकता है।

इस ट्रैक वे का निर्माण कैंटोनमेंट्स से जुटाए गए प्लास्टिक कचरे, जैसे दूध के पैकेट्स, से किया गया है। 5,000 से अधिक वाहनों के ट्रायल में इसने स्थिरता और मजबूती साबित की है। इससे सैन्य और नागरिक दोनों क्षेत्रों में तेजी से अस्थायी रास्ते तैयार किए जा सकते हैं।

क्रायोकूलर: अब नाइट विजन पूरी तरह स्वदेशी

भारतीय सेना ने नाइट विजन उपकरणों में इस्तेमाल होने वाला क्रायोकूलर अब देश में ही बनाना शुरू कर दिया है। पहले इसे विदेश से मंगाया जाता था और इसकी कीमत बहुत ज्यादा थी। 500 mW क्रायोकूलर को स्वदेशी रूप से विकसित कर आत्मनिर्भरता की बड़ी उपलब्धि हासिल की है। पहले यह उपकरण 25 से 50 लाख रुपये की लागत से आयात किया जाता था, लेकिन अब इसे लगभग 4 लाख रुपये में देश में बनाया जा रहा है।

इससे सेना को नाइट विजन उपकरण जल्दी मिलेंगे और मरम्मत में भी कम समय लगेगा। इससे हर साल करोड़ों रुपये की बचत होगी। डीआरडीओ की एसएसपीएल लैब द्वारा विकसित यह तकनीक अब 509 आर्मी बेस वर्कशॉप में बनाई जा रही है। इससे हर साल करीब 50 करोड़ रुपये की बचत होगी और उपकरणों की मरम्मत भी जल्दी होगी।

Ekam AI: सेना का अपना AI प्लेटफॉर्म

Ekam AI भारतीय सेना का खुद का सुरक्षित आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म है। यह पूरी तरह भारत में बना है और बाहर के किसी सिस्टम पर निर्भर नहीं है। इससे रिपोर्ट पढ़ना, जानकारी समझना और फैसले लेना आसान होता है। इसे बिना तकनीकी ज्ञान के भी इस्तेमाल किया जा सकता है। यह किसी विदेशी क्लाउड या सॉफ्टवेयर पर निर्भर नहीं रहता।

यह स्वदेशी लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स पर आधारित है। यह प्लेटफॉर्म सुरक्षित, एयर-गैप्ड वातावरण में काम करता है और डेटा संप्रभुता सुनिश्चित करता है। यह रियल-टाइम इंटेलिजेंस, डॉक्यूमेंट एनालिसिस और निर्णय सहायता प्रदान करता है, जिससे फील्ड से लेकर मुख्यालय तक काम आसान होता है।

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इलेक्ट्रिक टैक्टिकल ऑल-टेरेन व्हीकल ‘वीर’

ई-टीएटीवी ‘वीर’ एक स्वदेशी इलेक्ट्रिक टैक्टिकल वाहन है। ‘वीर’ की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह बहुत कम आवाज़ करता है। इसमें 400 हॉर्स पावर की इलेक्ट्रिक मोटर लगी है, जिसके साथ पेट्रोल इंजन भी है, ताकि जरूरत पड़ने पर ज्यादा दूरी तय की जा सके। यह वाहन एक बार चार्ज होने पर लगभग 520 किलोमीटर तक चल सकता है। यह वाहन कम शोर और कम थर्मल सिग्नेचर के कारण गश्त और इंटेलिजेंस, सर्वेलांस एंड रिकॉनिसेंस (आईएसआर) मिशनों के लिए उपयोगी है। यह व्हीकल गश्त, निगरानी, रसद और घायल सैनिकों को निकालने जैसे कामों में इस्तेमाल किया जा सकता है। कम आवाज और कम गर्मी पैदा करने की वजह से दुश्मन के लिए इस वाहन को पहचानना बहुत मुश्किल होता है।

फायर फाइटिंग रोबोट: जान जोखिम में डाले बिना बुझाएगा आग

भारतीय सेना ने आग बुझाने के लिए एक स्वदेशी फायर फाइटिंग रोबोट तैयार किया है। इस रोबोट को स्वदेशी एम्प्रेसा प्राइवेट लिमिटेड ने भारतीय सेना के साथ मिलकर iDEX कार्यक्रम के तहत बनाया है। यह रोबोट उन जगहों पर काम करता है, जहां आग बहुत तेज होती है और इंसानों का जाना खतरनाक होता है। इसे दूर से कंट्रोल किया जा सकता है, जिससे फायर फाइटर्स को आग के पास जाने की जरूरत नहीं पड़ती।

इस रोबोट में कैमरा और थर्मल सेंसर लगे हैं, जो आग और गर्मी की सही जानकारी देते हैं। इससे यह पता चलता है कि आग कहां है और कितनी फैल चुकी है। इसी जानकारी के आधार पर आग बुझाने की कार्रवाई की जाती है।

फायर फाइटिंग रोबोट बहुत मजबूत है और ज्यादा तापमान में भी काम कर सकता है। यह सेना के ठिकानों के साथ-साथ फैक्ट्रियों, रिहायशी इलाकों और आपदा वाले क्षेत्रों में भी उपयोगी है, जहां इंसानों की जान को खतरा होता है।

टेदर्ड हाइब्रिड एयरोस्टैटिक ड्रोन

भारत ने निगरानी के लिए एक नया स्वदेशी ड्रोन तैयार किया है, जिसे टेदर्ड हाइब्रिड एयरोस्टैटिक ड्रोन कहा जाता है। यह ड्रोन हीलियम गैस और इलेक्ट्रिक मोटर दोनों की मदद से उड़ता है, जिससे यह कम बिजली में लंबे समय तक हवा में बना रह सकता है।

यह ड्रोन एक ही जगह पर 24 घंटे तक लगातार निगरानी कर सकता है और करीब 10 किलोमीटर तक के इलाके पर नजर रख सकता है। इसे जमीन से एक तार (केबल) के जरिए जोड़ा जाता है, जिससे इसका कंट्रोल और डेटा लिंक सुरक्षित रहता है।

यह ड्रोन सेना के लिए निगरानी में मददगार है। इसके अलावा इसका इस्तेमाल सर्वे, मैपिंग, मौसम की जानकारी, बाढ़ की निगरानी और जंगल में आग का पता लगाने जैसे कामों में भी किया जा सकता है। पुलिस और प्रशासन भी बड़े कार्यक्रमों या संवेदनशील इलाकों में इससे निगरानी कर सकते हैं। यह पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से बना है।

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ड्रोन फॉरेंसिक टूल – SKYNET-INTEL

भारतीय सेना ने ड्रोन से जुड़ी जानकारी निकालने के लिए एक खास स्वदेशी सिस्टम बनाया है, जिसका नाम स्काइनेट-इंटेल है। यह सिस्टम iDEX कार्यक्रम के तहत सेना और भारतीय कंपनियों ने मिलकर डेवलप किया है।

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जब कोई दुश्मन ड्रोन पकड़ा जाता है या गिराया जाता है, तो स्काइनेट-इंटेल उसकी उड़ान की जानकारी, जीपीएस रास्ता, मिशन डाटा, रेडियो सिग्नल और सेंसर डाटा निकाल सकता है। इससे पता चलता है कि ड्रोन कहां से आया, कहां जाना था और उसका मकसद क्या था। पाकिस्तान इसे आए तुर्की के ड्रोन की फॉरेंसिक जांच इसी के जरिए की गई थी।

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यह सिस्टम सुरक्षित नेटवर्क पर काम करता है और सेना को दुश्मन की रणनीति समझने में मदद करता है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ड्रोन की अहम भूमिका को देखते हुए यह टूल और भी उपयोगी साबित हुआ है।

प्रोजेक्ट संभव

प्रोजेक्ट SAMBHAV के तहत भारतीय सेना और एयरटेल ने मिलकर दूर-दराज इलाकों में 4जी मोबाइल नेटवर्क पहुंचाने की व्यवस्था की है। इसके लिए एक पोर्टेबल सिस्टम बनाया गया है, जिसे आसानी से कहीं भी ले जाया जा सकता है।

यह सिस्टम वनवेब सैटेलाइट नेटवर्क से जुड़कर काम करता है, इसलिए जहां मोबाइल टावर या फाइबर नहीं है, वहां भी नेटवर्क मिल सकता है। पहाड़ों, सीमावर्ती इलाकों और आपदा प्रभावित क्षेत्रों में यह बहुत उपयोगी है।

इससे सेना के साथ-साथ आम लोगों को भी संचार सुविधा मिलती है। यह तकनीक आपदा के समय संपर्क बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभा सकती है।

रूबिक परमानेंट डिफेंस

रूबिक परमानेंट डिफेंस एक खास तरह का तैयार किया गया सुरक्षा ढांचा है, जिसे सेना के जवान बहुत कम समय में बना सकते हैं। यह खास तौर पर पहाड़ी और ऊंचाई वाले इलाकों के लिए बनाया गया है।

इसके छोटे-छोटे कंक्रीट ब्लॉक बहुत हल्के होते हैं, जिन्हें दूर-दराज पोस्ट तक आसानी से ले जाया जा सकता है। जवान सिर्फ 2–3 दिन में एक मजबूत, गोली और धमाके से बचाने वाला बंकर तैयार कर सकते हैं।

इस सिस्टम से सामान ढोने और मजदूरों की जरूरत बहुत कम हो जाती है। यह आगे की चौकियों को मजबूत बनाने में बहुत कारगर साबित हो रहा है।

टैक्टिकल LAN रेडियो

भारतीय सेना ने टैक्टिकल लैन रेडियो नाम का एक तेज और सुरक्षित कम्युनिकेशन सिस्टम तैयार किया है। यह सिस्टम पूरी तरह भारत में बना है और iDEX पहल के तहत विकसित किया गया है।

यह रेडियो लंबी दूरी तक तेज और सुरक्षित डेटा भेज सकता है। इसका इस्तेमाल युद्ध क्षेत्र में, ड्रोन नेटवर्क, सेंसर सिस्टम और आपदा के समय संचार के लिए किया जा सकता है।

सेना के साथ-साथ यह तकनीक सिविल एविएशन, स्मार्ट सिटी और दूर-दराज़ इलाकों में इंटरनेट कनेक्टिविटी के लिए भी उपयोगी है। यह भारत को संचार तकनीक में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक अहम कदम है।

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    रक्षा समाचार न्यूज डेस्क भारत की अग्रणी हिंदी रक्षा समाचार टीम है, जो Indian Army, Navy, Air Force, DRDO, रक्षा उपकरण, युद्ध रणनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी विश्वसनीय और विश्लेषणात्मक खबरें पेश करती है। हम लाते हैं सटीक, सरल और अपडेटेड Defence News in Hindi। हमारा उद्देश्य है – "हर खबर, देश की रक्षा से जुड़ी।"

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