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अब दुश्मन के ड्रोनों को ‘बंदी’ बनाएगी भारतीय सेना! खरीदेगी ये खास ‘जाल’

अब तक ज्यादातर सिस्टम ड्रोन को जाम करने या मार गिराने में एक्सपर्ट थे, लेकिन कई बार ऐसे हालात हो जाते हैं जिनमें ड्रोन को सही सलामत पकड़ना ज्यादा उपयोगी होता है...

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📍नई दिल्ली | 13 Feb, 2026, 11:34 PM

Indian Army Drone Catcher System: ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जिस तरह से पाकिस्तान ने खुफिया जानकारियां जुटाने के लिए सस्ते और छोटे ड्रोन इस्तेमाल किए थे, उसे देखते हुए भारतीय सेना भी कमर कस रही है। अब छोटे और कम दिखाई देने वाले दुश्मन ड्रोनों से निपटने के लिए सेना नई तैयारी कर रही है। रक्षा मंत्रालय ने सेना के लिए “ड्रोन कैचर सिस्टम” यानी डीसीएस खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके लिए सेना की तरफ से रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन यानी आरएफआई जारी की गई है। (Indian Army Drone Catcher System)

पिछले कुछ समय से कम रडार सिग्नेचर यानी लो-आरसीएस वाले ड्रोन और अनमैन्ड एरियल सिस्टम (यूएएस) का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। छोटे आकार और कम रडार पहचान के कारण इन्हें पकड़ना और गिराना पारंपरिक एयर डिफेंस सिस्टम के लिए चुनौती बनता जा रहा है। (Indian Army Drone Catcher System)

Indian Army Drone Catcher System: क्यों जरूरी हुआ ड्रोन कैचर सिस्टम?

आरएफआई के शुरुआत में साफ कहा गया है कि लो-आरसीएस ड्रोन, चाहे अकेले आएं या झुंड यानी स्वॉर्म में, अब एक बड़ा खतरा बन चुके हैं। हाल के ऑपरेशनों में भी ऐसे ड्रोन का इस्तेमाल देखा गया, जिसने सेना को अलग से “ड्रोन पकड़ने” वाली क्षमता डेवलप करने की जरूरत का अहसास कराया।

अब तक ज्यादातर सिस्टम ड्रोन को जाम करने या मार गिराने में एक्सपर्ट थे, लेकिन कई बार ऐसे हालात हो जाते हैं जिनमें ड्रोन को सही सलामत पकड़ना ज्यादा उपयोगी होता है। इससे उसकी तकनीक, कैमरा, डेटा और सोर्स के बारे में अहम जानकारी मिल सकती है। यही काम यह नया ड्रोन कैचर सिस्टम करेगा। (Indian Army Drone Catcher System)

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ड्रोन कैचर सिस्टम में क्या-क्या होगा?

आरएफआई के मुताबिक यह सिस्टम तीन मुख्य हिस्सों से मिलकर बनेगा– ड्रोन सेंसर, ड्रोन कैचर और ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन (जीसीएस)। ड्रोन सेंसर इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे (ईएसए) टेक्नोलॉजी या उससे बेहतर तकनीक पर आधारित होगा। इसे 360 डिग्री कवरेज देना होगा और एक साथ कम से कम 20 ड्रोन को डिटेक्ट और ट्रैक करने की क्षमता रखनी होगी। यह भी शर्त रखी गई है कि ये सेंसर 0.01 वर्ग मीटर के छोटे आरसीएस वाले टारगेट्स को भी कम से कम 4 किलोमीटर की दूरी से पहचान सकें।

ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन इस पूरे सिस्टम का दिमाग होगा। सेंसर से मिली जानकारी यहीं आएगी, जहां माइक्रोप्रोसेसर के जरिए टारगेट की गणना की जाएगी और ड्रोन कैचर को निर्देश भेजे जाएंगे। जीसीएस में लैपटॉप या टैबलेट आधारित इंटरफेस होगा, जिसमें दुश्मन ड्रोन की दिशा, दूरी और ऊंचाई जैसी जानकारी दिखेगी। (Indian Army Drone Catcher System)

तीसरा और सबसे अहम हिस्सा है ड्रोन कैचर। यह खुद एक ड्रोन होगा, जो दुश्मन ड्रोन के पास जाकर उस पर जाल फेंकेगा और उसे निष्क्रिय करेगा। इसे पूरी तरह ऑटोनॉमस यानी स्वायत्त रूप से काम करने में सक्षम होना होगा।

सिर्फ जाल ही नहीं, इलेक्ट्रॉनिक हमला भी

इस सिस्टम में केवल जाल फेंककर ड्रोन पकड़ने की सुविधा ही नहीं होगी, बल्कि एक जैमर सबसिस्टम भी होगा । यह रेडियो फ्रीक्वेंसी डिनायल, सिलेक्टिव जीएनएसएस डिनायल और जीएनएसएस डीसैप्शन जैसी इलेक्ट्रॉनिक तकनीकों का इस्तेमाल करेगा।

अगर दुश्मन ड्रोन सैटेलाइट नेविगेशन या रेडियो सिग्नल के जरिए कंट्रोल हो रहा है, तो यह सिस्टम उसके सिग्नल को काट या भ्रमित कर सकता है। इससे ड्रोन अपना रास्ता भटक सकता है या जमीन पर गिर सकता है। (Indian Army Drone Catcher System)

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हर इलाके में करे काम

सेना ने स्पष्ट किया है कि यह सिस्टम भारत के हर तरह के इलाके में काम करने योग्य होना चाहिए। इसमें मैदान, रेगिस्तान, तटीय इलाके और 4500 मीटर तक की ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्र शामिल हैं।

साथ ही, ये सिस्टम ऑपरेटिंग टेम्परेचर माइनस 15 डिग्री सेल्सियस से लेकर प्लस 45 डिग्री सेल्सियस के अलावा 95 प्रतिशत तक नमी में काम करना चाहिए। (Indian Army Drone Catcher System)

मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम के साथ इंटीग्रेशन

आरएफआई में यह भी कहा गया है कि ड्रोन सेंसर को “आकाशतीर” कमांड एंड रिपोर्टिंग मॉड्यूल के साथ इंटीग्रेट करने की क्षमता होनी चाहिए। इसका मतलब है कि यह सिस्टम अलग-थलग नहीं रहेगा, बल्कि सेना के मौजूदा एयर डिफेंस नेटवर्क का हिस्सा बन सकेगा।

इस तरह दुश्मन ड्रोन की जानकारी बड़े एयर डिफेंस सिस्टम तक भी पहुंचाई जा सकेगी और जरूरत पड़ने पर मिसाइल या अन्य हथियारों से भी कार्रवाई हो सकेगी। (Indian Army Drone Catcher System)

इंडिजिनियस कंटेंट पर जोर

आरएफआई में साफ कहा गया है कि कुल इंडिजिनियस कंटेंट यानी स्वदेशी सामग्री कम से कम 50 फीसदी होनी चाहिए, जो डिफेंस एक्विजिशन प्रोसिजर 2020 के नियमों के मुताबिक है।

इसका मतलब है कि कंपनियों को भारत में ही ज्यादा से ज्यादा निर्माण और तकनीक विकसित करनी होगी। इससे देश की रक्षा इंडस्ट्री को बढ़ावा मिलेगा और विदेशी निर्भरता कम होगी।

यह अभी शुरुआती चरण है। कंपनियों को 17 मार्च तक जानकारी और प्रपोजल जमा करने होंगे। इसके बाद तकनीकी मूल्यांकन, ट्रायल और फिर कॉन्ट्रैक्ट नेगोशिएशन की प्रक्रिया चलेगी। अगर सब कुछ तय समय पर आगे बढ़ा, तो आने वाले कुछ सालों में सेना के पास एक डेडिकेटेड ड्रोन कैचर क्षमता होगी। (Indian Army Drone Catcher System)

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  • हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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