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भारतीय सेना के डिप्टी चीफ बोले- AI से तेज हुए युद्ध के फैसले, लेकिन 10 प्रतिशत गलती भी पड़ सकती है भारी

"एआई पर पूरी तरह निर्भर होना भी खतरनाक हो सकता है। एआई सिस्टम डेटा के आधार पर निर्णय सुझाते हैं। लेकिन युद्ध के मैदान में डेटा हमेशा साफ और सही नहीं होता। धूल, धुआं, छलावा, दुश्मन की चाल और कई अन्य कारकों के कारण सेंसर और सिस्टम कभी-कभी गलत जानकारी भी दे सकते हैं"

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📍नई दिल्ली | 11 Mar, 2026, 7:43 PM

AI in Modern Warfare: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर भारतीय सेना डिप्टी चीफ लेफ्टिनेंट जनरल विपुल सिंघल का कहना है कि युद्ध का स्वरूप भी पहले की तुलना में बिल्कुल अलग हो गया है। ऐसे में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई भविष्य के युद्धों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा, लेकिन अंतिम फैसला हमेशा इंसान यानी कमांडर को ही लेना होगा। वहीं, आर्मी डिजाइन ब्यूरो के एडीजी मेजर जनरल सीएस मान का कहना है कि एआई सिस्टम की सबसे बड़ी ताकत डेटा होती है, लेकिन यही उसकी कमजोरी भी बन सकती है।

AI in Modern Warfare: कमांडर ही लेता है अंतिम फैसला

नई दिल्ली में आयोजित तीन दिवसीय सिनर्जिया कॉन्क्लेव में “द एआई होराइजन: इंटेलिजेंट सिस्टम में भरोसे की कमी” विषय पर बोलते हुए भारतीय सेना के डिप्टी चीफ (इन्फॉर्मेशन सिस्टम्स एंड टेक्नोलॉजी) लेफ्टिनेंट जनरल विपुल सिंघल ने आधुनिक युद्ध में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की बढ़ती भूमिका पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि तकनीक तेजी से बदल रही है और युद्ध का स्वरूप भी लगातार बदल रहा है, लेकिन इसके बावजूद अंतिम फैसला लेने की जिम्मेदारी अभी भी इंसान यानी कमांडर की ही होती है।

लेफ्टिनेंट जनरल सिंघल भारतीय सेना में डिप्टी चीफ (इन्फॉर्मेशन सिस्टम्स एंड टेक्नोलॉजी) लेफ्टिनेंट जनरल विपुल सिंघल ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि जब उन्होंने करीब 35 साल पहले सेना जॉइन की थी, तब हालात बिल्कुल अलग थे। उस समय ऑपरेशन रूम में कागज के नक्शे होते थे और सूचनाएं धीरे-धीरे अलग-अलग सोर्सेज से आती थीं। कभी टेलीफोन कॉल के जरिए, कभी किसी रिपोर्ट के जरिए या किसी नोट के जरिए जानकारी मिलती थी। अधिकारी इन सूचनाओं को नक्शे पर पिन लगाकर चिन्हित करते थे और फिर सारी जानकारी जोड़कर कमांडर को दी जाती थी। कमांडर उसी आधार पर फैसला निर्णय लेते थे कि आगे क्या कार्रवाई करनी है। (AI in Modern Warfare)

उन्होंने कहा कि उस समय फैसला लेने की प्रक्रिया धीमी थी और जानकारी भी सीमित होती थी। लेकिन धीरे-धीरे तकनीक बढ़ने लगी। कुछ साल बाद कंप्यूटर, डिजिटल प्रेजेंटेशन और बेहतर कम्युनिकेशन सिस्टम आने लगे। इससे जानकारी मिलने की गति बढ़ गई, लेकिन तब भी फैसला लेने की प्रक्रिया पूरी तरह इंसानों पर ही निर्भर थी। (AI in Modern Warfare)

एआई के कारण फैसले का समय हुआ कम

लेफ्टिनेंट जनरल सिंघल ने कहा कि आज युद्ध के मैदान में सबसे बड़ा बदलाव फैसला लेने के समय में कमी है। आज के हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। अब ऑपरेशन रूम में डिजिटल मैप्स, सैटेलाइट फीड, ड्रोन, सेंसर और सर्विलांस सिस्टम से लगातार जानकारी आती रहती है। कमांडर के सामने एक साथ कई सोर्सेज से डेटा पहुंचता है और एआई बेस्ड सिस्टम कुछ ही सेकंड में एनालिसिस करके सुझाव भी देने लगते हैं कि किस टारगेट पर कब और कैसे कार्रवाई करनी चाहिए।

ऐसी स्थिति में कमांडर के पास फैसला लेने के लिए बहुत कम समय होता है। यही कारण है कि एआई पर भरोसा करने और मानव निर्णय के बीच संतुलन बनाना बेहद जरूरी हो जाता है। (AI in Modern Warfare)

एआई पर भरोसा करना क्यों चुनौती है

अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि आधुनिक युद्ध में यह भी मानकर चलना पड़ता है कि दुश्मन के पास भी लगभग वही जानकारी होती है जो हमारे पास होती है। इसलिए फैसला लेने की रफ्तार बहुत महत्वपूर्ण हो गई है।

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लेकिन उन्होंने चेतावनी भी दी कि एआई पर पूरी तरह निर्भर होना भी खतरनाक हो सकता है। उन्होंने कहा कि एआई सिस्टम डेटा के आधार पर निर्णय सुझाते हैं। लेकिन युद्ध के मैदान में डेटा हमेशा साफ और सही नहीं होता। धूल, धुआं, छलावा, दुश्मन की चाल और कई अन्य कारकों के कारण सेंसर और सिस्टम कभी-कभी गलत जानकारी भी दे सकते हैं।

अगर ऐसी स्थिति में एआई गलत निष्कर्ष निकाल ले तो उससे बड़ा नुकसान हो सकता है। इसलिए अंतिम फैसला हमेशा इंसान के हाथ में ही रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर एआई 90 प्रतिशत सही है तो भी बाकी 10 प्रतिशत गलती युद्ध के मैदान में बहुत बड़ा जोखिम बन सकती है। (AI in Modern Warfare)

कमांडर की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण

उन्होंने एक उदाहरण देकर समझाया कि मान लीजिए किसी इलाके में सेंसर को गतिविधि दिखाई देती है। एआई सिस्टम इसे दुश्मन की गतिविधि मान सकता है और हमला करने की सलाह दे सकता है। लेकिन एक अनुभवी कमांडर को महसूस हो सकता है कि कुछ गड़बड़ है। अगर वह थोड़ा रुककर जांच करता है तो पता चल सकता है कि वहां नागरिकों की आवाजाही हो रही थी, जो अभी सिस्टम के डेटा में शामिल नहीं हुई थी। अगर कमांडर ने बिना सोचे एआई की सलाह मान ली होती तो निर्दोष लोगों को बड़ा नुकसान हो सकता था।

उन्होंने कहा कि एआई को केवल एक सहायक उपकरण के रूप में इस्तेमाल करना चाहिए, फैसला लेने वाला अंतिम साधन नहीं बनाना चाहिए। अंतिम जिम्मेदारी हमेशा कमांडर की ही होती है, क्योंकि युद्ध के फैसलों में इंसानों की जान दांव पर लगी होती है। (AI in Modern Warfare)

एआई सिस्टम के लिए कड़े मानक जरूरी

उन्होंने कहा कि जब एआई सिस्टम किसी वेपन सिस्टम से जुड़ जाते हैं तो वे खुद एक तरह से हथियार का हिस्सा बन जाते हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें भी वही ट्रायल और सर्टिफिकेशन प्रक्रिया से गुजरना चाहिए जिससे पारंपरिक हथियार गुजरते हैं। जैसे किसी मिसाइल या हथियार को सेना में शामिल करने से पहले कई चरणों के परीक्षण होते हैं, उसी तरह एआई सिस्टम को भी कठोर परीक्षण से गुजरना चाहिए। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि सिस्टम युद्ध के मैदान में सुरक्षित और भरोसेमंद तरीके से काम करे।

तकनीक को बेहतर तरीके से समझें कमांडर

उप सेना प्रमुख ने कहा कि कमांडरों को भी तकनीक को बेहतर तरीके से समझना होगा। उन्हें यह जानना होगा कि एआई सिस्टम किस डेटा के आधार पर फैसले सुझा रहा है और उसका विश्लेषण कैसे किया गया है। अगर सिस्टम पूरी तरह “ब्लैक बॉक्स” की तरह होगा और उसके अंदर क्या चल रहा है यह समझ में नहीं आएगा, तो उस पर भरोसा करना मुश्किल होगा। इसलिए एआई सिस्टम को अधिक पारदर्शी बनाना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि भारत की परंपरा में शक्ति और धर्म साथ-साथ चलते हैं। इसका मतलब है कि ताकत का इस्तेमाल हमेशा जिम्मेदारी और नैतिकता के साथ होना चाहिए। उन्होंने कहा कि एआई का इस्तेमाल भी इसी सिद्धांत के साथ होना चाहिए। तकनीक का उद्देश्य मानवता की रक्षा करना होना चाहिए, न कि उसे खतरे में डालना। (AI in Modern Warfare)

सिस्टम पर करना होगा भरोसा

वहीं, कॉन्क्लेव में बोलते हुए आर्मी डिजाइन ब्यूरो के एडीजी मेजर जनरल सीएस मान ने कहा कि आज दुनिया एक ऐसे दौर में है जिसे अक्सर ग्रे-जोन युद्ध कहा जाता है। इसमें खतरे केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहते, बल्कि साइबर स्पेस, इनफॉरमेशन सिस्टम और टेक्निकल सिस्टम तक फैल जाते हैं। ऐसे माहौल में एआई, ड्रोन, ऑटोनॉमस सिस्टम और डिसीजन सपोर्ट सिस्टम जैसी तकनीकें तेजी से सेना के काम का हिस्सा बन रही हैं।

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मेजर जनरल मान ने कहा कि इन तकनीकों से सेना की क्षमता जरूर बढ़ती है, लेकिन एक बड़ी समस्या विश्वास की कमी है। युद्ध के समय सैनिक और कमांडर को सिस्टम पर पूरी तरह भरोसा होना चाहिए। अगर उन्हें मशीन के फैसले पर भरोसा नहीं होगा, तो उस तकनीक का पूरा फायदा नहीं मिल पाएगा।

उन्होंने कहा कि सैन्य क्षेत्र में “ट्रस्ट” यानी भरोसे का मतलब सिर्फ तकनीक का सही काम करना नहीं है। असली भरोसा तब बनता है जब कमांडर और सैनिक यह महसूस करें कि वे युद्ध की स्थिति में मशीन के सुझाव पर भरोसा कर सकते हैं। क्योंकि कई बार युद्ध के मैदान में फैसला कुछ ही सेकंड में लेना होता है और उसी पर सैनिकों की जान निर्भर करती है।

कई एआई सिस्टम “ब्लैक बॉक्स” की तरह

मेजर जनरल मान ने कहा कि कई रिसर्च बताती हैं कि मिलिट्री एआई सिस्टम पर अभी भी पूरी तरह भरोसा नहीं किया जाता। एक अध्ययन के अनुसार लगभग 70 प्रतिशत ऑपरेटर एआई आधारित सिस्टम पर पूरी तरह निर्भर होने में झिझक महसूस करते हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि कई एआई सिस्टम “ब्लैक बॉक्स” की तरह होते हैं। यानी वे निर्णय तो देते हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं करते कि उस निर्णय तक वे कैसे पहुंचे।

उन्होंने बताया कि एआई से जुड़ी मुख्य समस्याओं को तीन हिस्सों में समझा जा सकता है। पहला है एक्सप्लेनबिलिटी, यानी सिस्टम अपने निर्णय का कारण समझा पाए। दूसरा है रॉबस्टनेस, यानी सिस्टम कठिन परिस्थितियों में भी सही तरीके से काम करे। तीसरा है ह्यूमन-एआई सहयोग, यानी इंसान और मशीन के बीच सही तालमेल। (AI in Modern Warfare)

डेटा पॉइजनिंग का शिकार हो सकता है एआई सिस्टम

मेजर जनरल मान ने समझाया कि अगर किसी एआई सिस्टम को गलत डेटा दे दिया जाए, जिसे डेटा पॉइजनिंग कहा जाता है, तो वह गलत निष्कर्ष निकाल सकता है। उदाहरण के तौर पर अगर किसी ड्रोन या सेंसर को दुश्मन द्वारा हैक कर लिया जाए, तो वह दोस्त और दुश्मन की पहचान गलत कर सकता है। इससे गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।

उन्होंने कहा कि एआई सिस्टम की मजबूती यानी रॉबस्टनेस भी एक बड़ी चुनौती है। कई एआई सिस्टम अलग-अलग देशों के हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर, डेटा सेट और ओपन सोर्स लाइब्रेरी पर आधारित होते हैं। अगर इनमें से किसी भी हिस्से में कमजोरी हो, तो पूरा सिस्टम प्रभावित हो सकता है। (AI in Modern Warfare)

एआई और इंसान के बीच संतुलन बनाना जरूरी

मेजर जनरल मान ने कहा कि एक सर्वे के अनुसार 60 प्रतिशत से ज्यादा सैनिक ऐसे मामलों में इंसान द्वारा लिया गया फैसला ज्यादा भरोसेमंद मानते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि एआई बेकार है, बल्कि यह बताता है कि एआई और इंसान के बीच संतुलन बनाना जरूरी है।

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जनरल मान के मुताबिक एआई सिस्टम की सबसे बड़ी ताकत डेटा होती है, लेकिन यही उसकी कमजोरी भी बन सकती है। एआई की एक और चुनौती डेटा से जुड़ी है। किसी भी एआई सिस्टम को काम करने के लिए बड़े पैमाने पर डेटा की जरूरत होती है। लेकिन मिलिट्री एरिया में दुश्मन के हथियार, उपकरण और रणनीति से जुड़ा डेटा आसानी से उपलब्ध नहीं होता। ऐसे में एआई मॉडल को सही ढंग से ट्रेनिंग करना मुश्किल हो जाता है।

उन्होंने बताया कि कई बार सेना को अपने ही डेटा के आधार पर मॉडल तैयार करना पड़ता है और बाकी चीजों को दुश्मन मानकर विश्लेषण करना पड़ता है। लेकिन इसमें भी जोखिम होता है, क्योंकि अगर मॉडल 90 फीसदी सही है तो बाकी 10 प्रतिशत गलती भी गंभीर परिणाम दे सकती है। (AI in Modern Warfare)

“ट्रस्टवर्दी एआई” बनाना जरूरी

मेजर जनरल मान ने कहा कि इन चुनौतियों से निपटने के लिए भरोसेमंद एआई सिस्टम विकसित करना जरूरी है। इसके लिए दुनिया भर में कई प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि हाल के वर्षों में “ट्रस्टवर्दी एआई” यानी भरोसेमंद एआई को लेकर कई स्ट्रक्चर तैयार किए गए हैं।

इन ढांचों में कुछ मूल सिद्धांत तय किए गए हैं। इनमें विश्वसनीयता, मजबूती, सुरक्षा, पारदर्शिता और निष्पक्षता जैसे तत्व शामिल हैं। इन सिद्धांतों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि एआई सिस्टम सुरक्षित और भरोसेमंद तरीके से काम करें।

उन्होंने यह भी कहा कि एआई सिस्टम को साइबर हमलों के खिलाफ परखने के लिए विशेष परीक्षण किए जाने चाहिए। इससे यह पता चलेगा कि सिस्टम कठिन परिस्थितियों में कितना भरोसेमंद है।

एआई को लेकर हो लीगल फ्रेमवर्क 

मेजर जनरल मान ने आगे कहा कि कमांडरों को एआई सिस्टम की कार्यप्रणाली समझने का अधिकार होना चाहिए। जब कमांडर को यह पता होगा कि मशीन किस आधार पर फैसला दे रही है, तभी वह उस पर भरोसा कर सकेगा। उन्होंने कहा कि एआई के इस्तेमाल में एक लीगल फ्रेमवर्क भी जरूरी है। अगर युद्ध के दौरान एआई आधारित सिस्टम के कारण कोई गलती हो जाए, तो जिम्मेदारी किसकी होगी, यह पहले से तय होना चाहिए। इससे कमांडर अनावश्यक कानूनी डर के बिना फैसले ले सकेंगे।

उन्होंने भरोसा जताया कि भारत इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है और भविष्य में “मेड-इन-इंडिया” भरोसेमंद एआई सिस्टम सेना की ताकत को और मजबूत बनाएंगे। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि सबसे बड़ी चुनौती इन नीतियों को जमीन पर लागू करना है।

उनके अनुसार अगर सही तरीके से काम किया जाए तो एआई भविष्य में सेना के लिए एक शक्तिशाली और भरोसेमंद उपकरण बन सकता है। (AI in Modern Warfare)

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  • हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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