📍नई दिल्ली | 25 Feb, 2026, 1:18 PM
Super Sukhoi Upgrade: भारतीय वायुसेना अपने सबसे बड़े फाइटर जेट बेड़े सु-30एमकेआई को अपग्रेड करने के लिए नई रणनीति पर काम कर रही है। “सुपर सुखोई अपग्रेड” नाम से चल रहे इस प्रोग्राम को अभी तक कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी यानी सीसीएस की अंतिम मंजूरी नहीं मिली है। इसी देरी के चलते वायुसेना अब एक साथ दो विकल्पों पर काम करने की योजना बना रही है, जिसे ड्यूल-ट्रैक स्ट्रैटेजी कहा जा रहा है।
इस रणनीति के तहत एक तरफ स्वदेशी अपग्रेड प्रोग्राम जारी रहेगा, वहीं दूसरी तरफ रूस के साथ मिलकर एक पैरेलल अपग्रेड प्लान पर भी विचार किया जा रहा है। इसका मकसद यह है कि वायुसेना की ऑपरेशनल तैयारी पर कोई असर न पड़े। (Super Sukhoi Upgrade)
Super Sukhoi Upgrade: क्या है सुपर सुखोई प्रोग्राम
सुपर सुखोई प्रोग्राम के तहत भारतीय वायुसेना के सु-30एमकेआई फाइटर जेट्स को आधुनिक बनाया जाना है। शुरुआत में करीब 84 विमानों को अपग्रेड करने की योजना है, लेकिन आगे चलकर पूरी फ्लीट के बड़े हिस्से को अपग्रेड करने का टारगेट रखा गया है। फिलहाल वायुसेना के पास लगभग 260 से ज्यादा सु-30एमकेआई विमान हैं।
इस प्रोग्राम में स्वदेशी तकनीक पर जोर दिया जा रहा है। इसमें डीआरडीओ और एचएएल मिलकर काम कर रहे हैं। अपग्रेड के तहत नए रडार, आधुनिक एवियोनिक्स, डिजिटल कॉकपिट और बेहतर इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम लगाए जाने हैं। (Super Sukhoi Upgrade)
देरी क्यों बनी चिंता की वजह
इस प्रोजेक्ट को नवंबर 2023 में शुरुआती मंजूरी यानी एओएन मिल चुकी थी, लेकिन अंतिम मंजूरी अभी बाकी है। अधिकारियों के अनुसार, अगर मंजूरी जल्द भी मिलती है तो इस पूरे अपग्रेड को पूरा होने में कई साल लग सकते हैं। शुरुआती ऑपरेशनल क्लियरेंस में लगभग पांच साल और पूरी तरह तैयार होने में सात साल तक का समय लग सकता है।
यही वजह है कि वायुसेना केवल इसी प्रोग्राम पर निर्भर नहीं रहना चाहती और उसने दूसरा विकल्प भी तलाशना शुरू कर दिया है। (Super Sukhoi Upgrade)
रूस के साथ पैरेलल अपग्रेड प्लान
सूत्रों के अनुसार, वायुसेना रूस के साथ मिलकर सु-30 के लिए एक अलग अपग्रेड प्लान पर विचार कर रही है। हाल ही में रूस की एक टीम ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के नासिक प्लांट का दौरा भी किया है।
इस पैरेलल प्लान में खास तौर पर रडार और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम को मजबूत करने पर ध्यान दिया जाएगा। इसके अलावा रूस ने नए और ज्यादा ताकतवर एएल-41एफ-1 इंजन देने का प्रस्ताव भी रखा है, जिसे वर्तमान एएल-31 इंजन से बेहतर माना जाता है। नया इंजन 15 फीसदी ज्यादा थ्रस्ट देता है। (Super Sukhoi Upgrade)
दोनों ट्रैक कैसे करेंगे काम
इस योजना के तहत भारत और रूस दोनों अपने-अपने हिस्से का काम करेंगे। भारत में एचएएल और डीआरडीओ सिस्टम का इंटीग्रेशन और डेवलपमेंट करेंगे, जबकि रूस से कुछ जरूरी तकनीक और उपकरण लिए जा सकते हैं। यह मॉडल पहले मिग-21 बाइसन अपग्रेड में भी अपनाया गया था।
इसका उद्देश्य यह है कि अपग्रेड का काम तेजी से हो और वायुसेना के बेड़े में किसी तरह की क्षमता की कमी न आए। (Super Sukhoi Upgrade)
विरूपाक्ष एईएसए रडार की तैयारी
स्वदेशी अपग्रेड में विरूपाक्ष एईएसए रडार लगाया जाएगा, जो मौजूदा रडार से ज्यादा ताकतवर माना जा रहा है। इसमें गैलियम नाइट्राइड तकनीक का इस्तेमाल होगा, जिससे दुश्मन को ज्यादा दूरी से पहचानना संभव होगा।
इसके अलावा इन विमानों में ब्रह्मोस-ईआर मिसाइल, अस्त्र एयर-टू-एयर मिसाइल और रुद्रम एंटी-रेडिएशन मिसाइल जैसे आधुनिक हथियार शामिल किए जाएंगे। इससे विमान की मारक क्षमता और बढ़ेगी। जबकि इंडीजीनियस कंटेंट 70 से 78 फीसदी तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। (Super Sukhoi Upgrade)
क्यों जरूरी है यह अपग्रेड
भारतीय वायुसेना के सामने स्क्वाड्रन की संख्या से जुड़ी चुनौती भी है। मौजूदा समय में वायुसेना के पास जरूरी संख्या से कम स्क्वाड्रन हैं। ऐसे में मौजूदा विमानों को आधुनिक बनाना जरूरी हो जाता है, ताकि उनकी क्षमता बनी रहे। इसी को ध्यान में रखते हुए वायुसेना ने यह ड्यूल-ट्रैक रणनीति अपनाने का फैसला किया है, जिसमें स्वदेशी और विदेशी दोनों विकल्पों को साथ लेकर चलने की कोशिश की जा रही है। (Super Sukhoi Upgrade)

