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Su-30MKI ASPJ: सुखोई-30 को मिलेगा नया “अदृश्य कवच”, छू भी नहीं पाएंगी दुश्मन की मिसाइलें, स्वदेशी जैमर पॉड के लिए जारी की RFI

सुखोई-30 भारतीय वायुसेना की रीढ़ है और फिलहाल वायुसेना के लगभग 60 फीसदी फाइटर जेट्स इसी कैटेगरी के हैं। यह विमान 2002 से सेवा में है और इसे लगातार अपडेट किया जा रहा है…

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📍नई दिल्ली | 14 Nov, 2025, 11:02 PM

Su-30MKI ASPJ: भारतीय वायुसेना अपने सबसे भरोसेमंद सुखोई-30एमकेआई लड़ाकू विमानों के बेड़े को और एडवांस बनाने की तैयारी कर रही है। वायुसेना ने हाल ही में एयरक्राफ्ट सेल्फ-प्रोटेक्शन जैमर (एएसपीजे) सिस्टम की खरीद के लिए रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन (आरएफआई) जारी किया है। यह सिस्टम विमान को दुश्मन के रडार, मिसाइल और इलेक्ट्रॉनिक हमलों से बचाने में मदद करेगा।

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यह खरीद प्रक्रिया पूरी तरह मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत कार्यक्रम से जुड़ी है। अक्टूबर के आखिर में जारी आरएफआई के तहत वायुसेना चाहती है कि इन जैमर पॉड्स में कम से कम 50 फीसदी स्वदेशी सामग्री हो। इस खरीद के तहत सभी 100 एएसपीजे पॉड और उससे जुड़े उपकरणों की डिलीवरी 36 महीनों के भीतर पूरी की जानी है।

Su-30MKI ASPJ: सुपर सुखोई प्रोग्राम का हिस्सा

यह पहल भारतीय वायुसेना के महत्वाकांक्षी सुपर सुखोई प्रोग्राम का हिस्सा है, जिसके तहत 260 से ज्यादा सुखोई-30 विमानों को 4.5 जनरेशन के स्तर तक अपग्रेड किया जा रहा है। इस परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 65,000 करोड़ रुपये है और इसमें नया AESA रडार, नया ग्लास कॉकपिट, आधुनिक सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और नई मिसाइलें शामिल होंगी।

सुखोई-30 भारतीय वायुसेना की रीढ़ है और फिलहाल वायुसेना के लगभग 60 फीसदी फाइटर जेट्स इसी कैटेगरी के हैं। यह विमान 2002 से सेवा में है और इसे लगातार अपडेट किया जा रहा है। इस विमान में पहले से ही ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल जैसे एडवांस वेपंस लगे हुए हैं। अब इन नए एएसपीजे पॉड के आने से विमान की सर्वाइवल क्षमता और बढ़ जाएगी।

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Su-30MKI ASPJ: क्या है एएसपीजे

वायुसेना ने आरएफआई में एएसपीजे के लिए कई तकनीकी शर्तें तय की हैं। इसमें AESA आधारित जामिंग तकनीक,डिजिटल रेडियो फ्रीक्वेंसी मेमरी (डीआरएफएम), 360-डिग्री कवरेज, गैलियम नाइट्राइड (GaN) बेस्ड ट्रांसमीटर और रियल-टाइम थ्रेट अडप्टेशन जैसी क्षमताएं शामिल हैं। डीआरएफएम तकनीक दुश्मन के रडार को भ्रमित करने और फॉल्स टारगेट बनाने के लिए इस्तेमाल होती है। इसका इस्तेमाल कई आधुनिक लड़ाकू विमानों में किया जाता है।

यह पूरा सिस्टम सुखोई-30 के मौजूदा एवियोनिक्स, जैसे रडार वार्निंग रिसीवर (आरडब्ल्यूआर), मिसाइल अप्रोच वार्निंग सिस्टम और डेटा लिंक के साथ पूरी तरह इंटीग्रेट किया जाएगा। एएसपीजे पॉड विमान के अंडर-विंग पाइलॉन पर लगाया जाएगा और इससे विमान की उड़ान क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

Su-30MKI ASPJ: इन कंपनियों ने बनाए एएसपीजे

भारत के कई स्वदेशी रक्षा उद्योग इस परियोजना में भाग लेने के लिए तैयार हैं। चेन्नई की कंपनी डेटा पैटर्न ने पहले ही अपने टैलोन शील्ड एएसपीजे पॉड का डेमो पेश किया है जो गैलियम नाइट्राइड (GaN) बेस्ड एईएसए का इस्तेमाल करता है। इस सिस्टम ने सुखोई-30 पर ग्राउंड टेस्ट पूरा कर लिया है और फ्लाइट टेस्ट जारी हैं। यह सिस्टम विदेश से काफी सस्ता है और लगभग 70 फीसदी तक स्वदेशी है।

इसके अलवा भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड भी डीआरडीओ की डेवलपमेंट एजेंसी डीएआरई के साथ मिलकर इस पॉड को बना रही है। बीईएल इजराइल की एल्टा कंपनी के साथ तकनीकी सहयोग कर सकती है, क्योंकि एल्टा का स्कॉर्पस सिस्टम दुनिया का सबसे आधुनिक स्टैंड-ऑफ जैमर माना जाता है।

इसके अलावा एलएंटी डिफेंस भी डीआरएफएम तकनीक पर काम कर रही है। इस परियोजना में कई एमएसएमई भी शामिल होंगी जो पावर एम्प्लीफायर, आरएफ मॉड्यूल, डिजिटल प्रोसेसर और अन्य सब-इक्विपमेंट बनाएंगी। इस तरह यह परियोजना भारत में एक बड़ा डिफेंस सप्लाई चेन नेटवर्क तैयार करेगी।

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Su-30MKI ASPJ: स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर आर्किटेक्चर

वायुसेना ने आरएफआई में यह भी उल्लेख किया है कि यह परियोजना न केवल सुखोई-30 के लिए, बल्कि भविष्य के कई लड़ाकू विमानों जैसे तेजस एमके-1ए, तेजस एमके-2 और एमएससीए के इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम के डेवलपमेंट में भी मदद करेगी। एएसपीजे पॉड को “स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिकक वारफेयर आर्किटेक्चर” के तौर पर देखा जा रहा है।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान महसूस हुई थी जरूरत

सूत्रों का कहना है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सुखोई-30 में एएसपीजे की काफी जरूरत महसूस की गई थी। उस समय पाकिस्तान के साथ सीमा पर हुए संघर्ष में इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर क्षमताए बेहद अहम साबित हुई थीं। रिपोर्टों के अनुसार, सुखोई-30 विमानों को कई बार दुश्मन के रडार और मिसाइल लॉक से बचने के लिए आक्रामक और रक्षात्मक इलेक्ट्रॉनिक उपायों का सहारा लेना पड़ा था। एएसपीजे पॉड की कमी महसूस की गई थी क्योंकि पुराने सैप-518 और ईएल/एल-8222 पॉड अब मॉडर्न वारफेयर की जरूरतें पूरी नहीं कर पा रहे थे।

इसी के चलते https://indianairforce.nic.in/ ने इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम को प्राथमिकता दी और एएसपीजे के लिए आरएफआई जारी कर दी। एएसपीजे पॉड के आने के बाद सुखोई-30 की इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा 30 से 40 फीसदी तक बढ़ने की संभावना है। क्योंकि जामिंग सिस्टम दुश्मन के फायर-कंट्रोल रडार को जैम कर सकता है, बल्कि जीपीएस सिग्नल को प्रभावित कर सकता है और विमान के आसपास एक ‘इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा घेरा’ तैयार कर सकता है।

सूत्रों का कहना है कि अगले साल की शुरुआत तक चयनित कंपनियों को रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) जारी किया जाएगा। अनुमान है कि 2027 तक प्रोटोटाइप तैयार हो सकते हैं और 36 महीनों में सभी 100 एएसपीजे पॉड वायुसेना को मिल जाएंगे।

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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