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MiG-21: 1971 की जंग में अहम भूमिका निभाने वाले “उड़ते ताबूत” को मिली लाइफलाइन! वायुसेना अब क्यों नहीं करना चाहती रिटायर

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📍नई दिल्ली | 5 Dec, 2024, 11:40 AM

MiG-21: “उड़ता ताबूत” या Flying Coffin के नाम से मशहूर भारतीय वायुसेना (IAF) का मिग-21 बायसन एक बार फिर से चर्चा में है। 1960 के दशक से भारत के आसमान पर राज करने वाला मिग-21 बायसन पिछले कुछ दशकों से हो रहे हादसों के चलते भारतीय वायुसेना से फेज आउट होने की प्रक्रिया में है, जो पिछले कुछ समय से चरणबद्ध तरीके से वायुसेना से बाहर किया जा रहा है। मिग-21 बायसन को 2025 तक पूरी तरह से वापस लिए जाने की डेडलाइन तय की गई है। लेकिन अब यह डेडलाइन और आगे खिसक सकती है।

MiG-21: The Iconic 'Flying Coffin' of 1971 Gets a Lifeline! Tejas Jet Production Challenges Force IAF to Extend Service

MiG-21: तेजस एमके1ए में देरी बनी वजह

भारतीय वायु सेना के सूत्रों ने बताया कि स्वदेशी तेजस एमके1ए फाइटर जेट्स के उत्पादन में देरी के चलते मिग-21 बायसन की फेज आउट करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ा दिया गया है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) द्वारा निर्मित तेजस एमके1ए, जो अत्याधुनिक तकनीक और मल्टीरोल क्षमताओं से लैस है, मिग-21 का स्थान लेने के लिए तैयार है। परंतु इंजन सप्लाई की समस्या के कारण इसका उत्पादन समयसीमा से पीछे चल रहा है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, राजस्थान के बीकानेर स्थित नल एयरबेस, जहां वर्तमान में मिग-21 की आखिरी ऑपरेशन स्क्वाड्रन तैनात है, उसे जुलाई 2024 में पहले तेजस स्क्वाड्रन बनाया जाना था। परंतु तेजस की आपूर्ति में देरी ने इस योजना की राह में रोड़े अटका दिए हैं।

1964 में भारत के पहले सुपरसोनिक फाइटर जेट के रूप में शामिल किए गए मिग-21 ने दक्षिण एशिया में हवाई युद्ध के तौर-तरीकों को बदल दिया। 1971 के भारत-पाक युद्ध में इसने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और बांग्लादेश के गठन में योगदान दिया। 1999 के कारगिल युद्ध और 2019 के बालाकोट एयरस्ट्राइक में इसकी मौजूदगी ने इसे भारत के सैन्य इतिहास का अभिन्न हिस्सा बना दिया।

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हालांकि, मिग-21 का इतिहास विवादों से भी अछूता नहीं रहा। इसे “फ्लाइंग कॉफिन” का नाम इसलिए दिया गया क्योंकि इसके फ्लाइट ऑपरेशन के दौरान 400 से अधिक दुर्घटनाएं हुईं, जिसमें कई पायलटों ने अपनी जान गंवाई। बावजूद इसके, मिग-21 की क्षमता और इसकी रणनीतिक उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता।

वायुसेना की मौजूदा जरूरत

वर्तमान में भारतीय वायुसेना में मिग-21 बायसन के दो स्क्वाड्रन हैं, जिनमें कुल 31 विमान शामिल हैं। जबकि वायुसेना को कुल 42 स्क्वाड्रन जरूरत है, लेकिन फिलहाल यह आंकड़ा केवल 30 के करीब है। ऐसे में तेजस एमके1ए जैसे अत्याधुनिक विमानों की तैनाती बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

मिग-21 बायसन को सेवा विस्तार देने का मतलब यह है कि भारतीय वायुसेना को अपनी ऑपरेशनल कैपेबिलिटी बनाए रखने के लिए अभी भी पुराने विमानों पर निर्भर रहना पड़ रहा है।

तेजस एमके1ए, में Active Electronically Scanned Array (AESA) रडार, एडवांस इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और ज्यादा क्षमता वाले हथियार ले जाने की क्षमता है। लेकिन उत्पादन में देरी के चलते न केवल वायुसेना के ऑपरेशंस प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

एक रक्षा विशेषज्ञ ने बताया, “मिग-21 का सेवा विस्तार भारतीय वायुसेना की क्षमताओं को बनाए रखने के लिए एक रणनीतिक कदम है, लेकिन यह भी जरूरी है कि तेजस जैसे स्वदेशी विमानों का उत्पादन जल्द से जल्द शुरू हो।”

भारतीय वायुसेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “मिग-21 ने वर्षों तक हमारी वायुसेना की रीढ़ की हड्डी के रूप में काम किया है। हालांकि अब समय आ गया है कि इसे आराम दिया जाए और अत्याधुनिक विमानों को उसकी जगह दी जाए।”

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मिग-21 बायसन, जिसने अपनी उपयोगिता और इतिहास के माध्यम से भारतीय वायुसेना को परिभाषित किया है, अब अपने अंतिम दिनों की ओर बढ़ रहा है। हालांकि, तेजस एमके1ए के आने से भारतीय वायुसेना की ऑपरेशनल कैपेबिलिटी को मजबूती मिलेगी।

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  • MiG-21: 1971 की जंग में अहम भूमिका निभाने वाले "उड़ते ताबूत" को मिली लाइफलाइन! वायुसेना अब क्यों नहीं करना चाहती रिटायर

    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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