📍नई दिल्ली | 10 Dec, 2025, 1:24 PM
Mid Air refueller RFP India: भारतीय वायुसेना ने छह नए मिड-एयर रिफ्यूलिंग एयरक्राफ्ट के लिए रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल जारी किया है। यह सभी विमान सामान्य कमर्शियल पैसेंजर जेट से कन्वर्ट किए जाएंगे। इस प्रोजेक्ट में इजराइल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड की टीम को सबसे मजबूत दावेदार बताया जा रहा है। दोनों ने पहले भी कई एयरक्राफ्ट कन्वर्जन प्रोजेक्ट में साथ काम किया है।
यह आरएफपी नवंबर में जारी किया गया था। इसके तहत भारतीय वायुसेना एक ऐसी क्षमता विकसित करना चाहती है, जो लंबी दूरी के मिशन को बिना जमीन पर उतरे पूरा करने में मददगार हो। मिड-एयर रिफ्यूलिंग की यह तकनीक किसी भी आधुनिक एयरफोर्स के लिए बेहद जरूरी मानी जाती है, क्योंकि यह लड़ाकू विमानों को हवा में ही ईंधन भरने की सुविधा देती है। इससे विमान लंबे ऑपरेशन कर पाते हैं और मुश्किल परिस्थितियों में भी अपनी मौजूदगी बनाए रखते हैं।
वायुसेना का लक्ष्य करीब 12 मिड-एयर रिफ्यूलर शामिल करने का है। मौजूदा आरएफपी छह कन्वर्टेड एयरक्राफ्ट के लिए है। इसके बाद एक अलग आरएफपी छह नए बने रिफ्यूलर के लिए जारी किया जाएगा, जिनका निर्माण सीधे ओईएम (ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर) द्वारा किया जाएगा।
आरएफपी में यह नियम रखा गया है कि जिस कंपनी को यह काम मिलेगा, उसे कम से कम 30 फीसदी हिस्सा भारत में ही बनाना होगा। वहीं यह शर्त कई विदेशी कंपनियों के लिए मुश्किल बन जाती है। कारण यह है कि सिर्फ छह रिफ्यूलर विमान का ऑर्डर बहुत छोटा माना जाता है। इतनी कम संख्या के लिए भारत में बड़ी फैक्ट्री या प्रोडक्शन लाइन लगाना विदेशी कंपनियों के लिए महंगा और गैर-फायदेमंद हो सकता है। इस वजह से इजराइल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड की टीम को सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है, क्योंकि दोनों पहले से मिलकर ऐसे कन्वर्जन प्रोजेक्ट पर काम कर चुके हैं और भारत में ही निर्माण की क्षमता रखते हैं।
भारत के पास फिलहाल छह रूसी आईएल-78 एमकेआई टैंकर हैं, जिन्हें 2003 में शामिल किया गया था। समय बीतने के साथ इन विमानों में मेंटेनेंस और सर्विसेबिलिटी से जुड़ी दिक्कतें आ रही हैं। स्पेयर पार्ट्स की कमी और पुरानी तकनीक के चलते ये अकसर उपलब्ध नहीं रह पाते हैं। इसके चलते नई रिफ्यूलिंग क्षमता को डेवलप करना वायुसेना की जरूरत बन गई है।
इजराइल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने अप्रैल 2022 में एक समझौता किया था, जिसके तहत वे भारत में कमर्शियल बोइंग 767 पैसेंजर जेट को मल्टी-मिशन टैंकर ट्रांसपोर्ट विमान में कन्वर्ट करेंगे। इसी तरह का मॉडल इटली और जापान की सेनाएं भी इस्तेमाल करती हैं। इजराइल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज के पास कई सालों से पुराने कमर्शियल विमानों को लेटेस्ट रिफ्यूलिंग प्लेटफॉर्म में बदलने का अनुभव है। इस सेक्टर में यह कंपनी दुनिया की प्रमुख खिलाड़ियों में से एक है।
भारत को हाल ही में अमेरिका की कंपनी मेट्रिया मैनेजमेंट से एक केसी-135 स्ट्रैटो टैंकर पट्टे पर मिला है। यह एक पूरी तरह वेट-लीज व्यवस्था है, जिसमें विमान चलाने से लेकर मेंटेनेंस तक का पूरा काम अमेरिकी कंपनी करेगी। इससे फिलहाल वायुसेना को कुछ राहत मिली है, लेकिन लंबे समय के लिए वायुसेना को अपने रिफ्यूलर शामिल करना जरूरी है।
वायुसेना के लड़ाकू विमान सुखोई-30 राफेल, और तेजस लंबी दूरी के मिशन कर सकते हैं। उत्तरी सीमा से लेकर समुद्री इलाकों तक, कई ऑपरेशन ऐसे हैं जहां मिड-एयर रिफ्यूलिंग की जरूरत पड़ती है। नए रिफ्यूलर आने के बाद इन मिशनों में वायुसेना की क्षमता और बढ़ जाएगी।
पिछले दशक में वायुसेना कई बार टैंकर खरीदने का प्रयास कर चुकी है। यूरोप की एयरबस कंपनी का ए330 और अमेरिका का केसी-46 पेगासस पहले कंपटीशन में शामिल थे, लेकिन ऊंची लागत और तकनीकी चुनौतियों के चलते इन्हें मंजूरी नहीं मिल सकी। नए आरएफपी से उम्मीद है कि प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ेगी।
वायुसेना के एक अधिकारी के मुताबिक, यह परियोजना उन अधिकांश जरूरतों को पूरा करेगी जो आने वाले सालों में फोर्स को लंबी दूरी तक तैनाती करने में मदद करेंगी। वायुसेना लगातार उत्तरी और समुद्री मोर्चों पर अपनी मौजूदगी बनाए रखती है। ऐसे में अतिरिक्त रिफ्यूलिंग क्षमता उसके ऑपरेशन को मजबूती देगी।

