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Saturday, August 30, 2025
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Indigenous Fighter Jet Engine: स्वदेशी जेट इंजन बनाने में कहां फंसा है पेंच? क्या सफरान और रोल्स-रॉयस से बातचीत हो गई फेल? या रिवर्स इंजीनियरिंग है आखिरी जुगाड़!

भारत के लिए स्वदेशी एयरो इंजन बनाना बड़ी चुनौती है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अप्रैल में कहा था कि देश लड़ाकू विमानों का इंजन बनाने के लिए वैश्विक कंपनियों से बातचीत जारी है, जिनमें सफरान और रोल्स-रॉयस जैसी कंपनियां भी शामिल हैं। भारत और फ्रांस की सफरान कंपनी के बीच कई दौर की बातचीत हो चुकी है। सफरान ने भारतीय इंजन प्रोजेक्ट्स में सहयोग की इच्छा जताई है, लेकिन टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को लेकर मतभेद बने हुए हैं...

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जीटीआरई (GTRE) के निदेशक डॉ. श्रीराममूर्ति कहते हैं, 9 कावेरी इंजन बनाए गए, जिन पर 3000 घंटे से ज्यादा टेस्टिंग हुई। 18 घंटे ऊंचाई पर भी परीक्षण किया गया और 57 घंटे एफटीबी किए गए और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुए एक ऑडिट ने भी यह माना है कि कावेरी इंजन उड़ान भरने लायक बनाया जा सकता है। हालांकि यह एलसीए (लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) के लिए समय पर सर्टिफाइड नहीं हो सका...
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📍नई दिल्ली | 16 Aug, 2025, 3:49 PM

Indigenous Fighter Jet Engine: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को देश में स्वदेशी लड़ाकू विमानों के लिए स्वदेशी जेट इंजनों को देश में ही बनाने की अपील की। अपने 103 मिनट के जोरदार भाषाण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वदेशी जेट इंजन बनाने पर जोर देते हुए कहा कि भारत के युवा वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, प्रोफेशनल्स और युवाओं को मेड-इन-इंडिया फाइटर जेट्स के लिए खुद के जेट इंजन डेवलप करने चाहिए। उन्होंने कहा कि जेट इंजनों का विकास सुनिश्चित करेगा कि भविष्य की रक्षा तकनीक पूरी तरह से स्वदेशी हो, जो 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के लिए जरूरी है।

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Indigenous Fighter Jet Engine: स्वदेशी तेजस को नहीं मिल रहा इंजन

दरअसल समस्या भारत के स्वदेशी लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट तेजस (LCA Mk-1A) के इंजन को लेकर है। इंजन की कमी के चलते यह प्रोग्राम जरूरत से ज्यादा पीछे चल रहा है। इसकी वजह अमेरिकी कंपनी जीई एयरोस्पेस से एफ404-आईएन20 इंजनों की सप्लाई में देरी है। हालांकि जीई पिछले कुछ महीनों से हर माह एक इंजन सप्लाई कर रहा है, लेकिन जरूरत इससे ज्यादा है। वहीं, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) इसके एडवांस वर्जन एलसीए एमके-2 कार्यक्रम के लिए भारत में एफ414 इंजनों के जॉइंट प्रोडक्शन के लिए जीई एयरोस्पेस से बातचीत कर रहा है। इस सौदे में 80 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर होगा और इसकी कीमत तकरीबन 1 अरब डॉलर है।

Indigenous Fighter Jet Engine: टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को लेकर मतभेद

वहीं, भारत के लिए स्वदेशी एयरो इंजन बनाना बड़ी चुनौती है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अप्रैल में कहा था कि देश लड़ाकू विमानों का इंजन बनाने के लिए वैश्विक कंपनियों से बातचीत जारी है, जिनमें सफरान और रोल्स-रॉयस जैसी कंपनियां भी शामिल हैं। भारत और फ्रांस की सफरान कंपनी के बीच कई दौर की बातचीत हो चुकी है। सफरान ने भारतीय इंजन प्रोजेक्ट्स में सहयोग की इच्छा जताई है, लेकिन टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को लेकर मतभेद बने हुए हैं। इसी तरह ब्रिटेन की रोल्स रॉयस ने भी भारत को इंजन डेवलपमेंट में मदद की पेशकश की है। लेकिन लागत और तकनीकी साझेदारी को लेकर ठोस नतीजा नहीं निकला है।

Indigenous Fighter Jet Engine
Cavari Engine

Indigenous Fighter Jet Engine: 80 के दशक में शुरू हुआ था कावेरी प्रोजेक्ट

दरअसल भारत अभी से नहीं बल्कि बहुत पहले से स्वदेशी इंजन बनाने के लिए प्रयासरत है। भारत ने 1980 के दशक में कावेरी इंजन प्रोजेक्ट शुरू किया था। यह इंजन तेजस विमान के लिए इस्तेमाल होना था। लेकिन तकनीकी दिक्कतों और जरूरी थ्रस्ट की कमी के चलते यह प्रोजेक्ट असफल हो गया। इसके बावजूद कावेरी प्रोजेक्ट से भारतीय वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को बड़ी सीख मिली। आज भी इसका इस्तेमाल रिसर्च और ड्रोन इंजन प्रोग्राम्स में किया जा रहा है।

Indigenous Fighter Jet Engine: चार देशों के पास ही इंजन बनाने की क्षमता

भारत का गैस टरबाइन अनुसंधान संस्थान (Gas Turbine Research Establishment- GTRE) डीआरडीओ (DRDO) का ही हिस्सा है। जो भारत के स्वदेशी एयरो-इंजन विकास कार्यक्रम में जुटा हुआ है। जीटीआरई (GTRE) के निदेशक डॉ. श्रीराममूर्ति कहते हैं, पूरी दुनिया में केवल चार देश अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और रूस ही लड़ाकू विमान के लिए उड़ने योग्य इंजन बना पाए हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यूरोपियन EJ200 इंजन का डेवलपमेंट 1982 में शुरू हुआ और पहली बार 2001 में सर्विस में आया। यह इंजन 90 किलो न्यूटन का थ्रस्ट देता था। इसे बनाने 20 साल लगे और लगभग 2.5 अरब डॉलर की लागत आई। इसी तरह फ्रांस का M88 इंजन 1978 में शुरू हुआ और 1996 में सेवा में आया। इसे बनाने में भी लगभग 20 साल लगे और लगभग 2 बिलियन डॉलर का खर्च आया।

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उन्होंने कहा कि दुनिया में पहले टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट का काम शुरू होता ह, जहां टेक्नोलॉजी रेडिनेस लेवल (टीआरएल) को लेवल 5 तक पहुंचाया जाता है, जिसके बाद इंजन का डेवलपमेंट शुरू होता है, जिसमें कंपोनेंट बनाने में 5-6 साल और कुल इंजन डेवलपमेंट में 10 साल का समय लगता है।

Indigenous Fighter Jet Engine: भारत में हाई एल्टीट्यूड टेस्टिंग फैसिलिटी नहीं

वह बताते हैं कि कावेरी इंजन का काम टीआरएल 2-3 से ही शुरू कर दिया गया। टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट और इंजन डेवलपमेंट प्रोग्राम दोनों साथ-साथ चलाए गए। डिजाइन बार-बार बदलना पड़ा, जरूरी मटेरियल और टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी रही। कई अहम हिस्सों के लिए विदेशी मदद लेनी पड़ी। खास तौर पर महत्वपूर्ण फोर्जिंग्स के लिए 40,000 टन हाइड्रोलिक प्रेस की जरूरत थी जो भारत में नहीं थी, इसलिए विदेश पर निर्भर रहना पड़ा। नतीजतन समय पर इंजन बनाने में देरी हुई। लेकिन बावजूद इसके हमने इंजन बनाया गया और जीटी विशेष फ्लाइंग टेस्ट बेड (FTB) में अधिकतम रेटिंग पर टेस्टिंग की गई। इंजन की पूरी टेस्टिंग करने के लिए भारत में हाई एल्टीट्यूड टेस्टिंग फैसिलिटी नहीं थी। इसलिए दो इंजनों को विदेश ले जाया गया। जहां फैन फ्लटर और आफ्टरबर्नर स्क्रीन जैसी दिक्कतें आईं। फैन या कंप्रेसर के लिए 20 मेगावाट टेस्टिंग फैसिलिटी की जरूरत थी।

Indigenous Fighter Jet Engine
LCA Tejas Mk1A Fighter Jet

जिसके चलते कुछ कमी रही, जिससे एलसीए को समय पर सर्टिफाइड इंजन नहीं दिया जा सका। वह बताते हैं कि दुनिया में टीआरएल 4-5 तक पहुंचाने का काम अकादमिक और आरएंडडी संस्थान करते हैं। उस समय अकादमिक, आरएंडडी संस्थान और उद्योग के बीच सीमित सहयोग था। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि इसे राष्ट्रीय मिशन के तौर पर अपनाना चाहिए, जहां अकादमिक, स्टार्टअप, आरएंडडी संस्थान और इंडस्ट्रीज को इंटीग्रेट किया जा सके।

डॉ. श्रीराममूर्ति के मुताबिक, कावेरी इंजन पर खर्च 250 मिलियन डॉलर था, जबकि दुनिया 2.5 अरब डॉलर से ज्यादा खर्च कर रही थी। उस वक्त टीम की कमी थी, जिसकी जवाबदेही और जिम्मेदारी भी जरूरी होती है। यह न केवल कावेरी के लिए बल्कि 25 किलो न्यूटन हिंदुस्तान टर्बो फैन इंजन या 1200 किलोवाट हिंदुस्तान टर्बो शाफ्ट इंजन के लिए भी है।

बनाए 9 कावेरी इंजन

वह कहते हैं फिर भी, 9 कावेरी इंजन बनाए गए, जिन पर 3000 घंटे से ज्यादा टेस्टिंग हुई। 18 घंटे ऊंचाई पर भी परीक्षण किया गया और 57 घंटे एफटीबी किए गए और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुए एक ऑडिट ने भी यह माना है कि कावेरी इंजन उड़ान भरने लायक बनाया जा सकता है। हालांकि यह एलसीए (लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) के लिए समय पर सर्टिफाइड नहीं हो सका।

उन्होंने बताया कि इंजन का डिजाइन शुरू में LCA (लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) के लिए था, लेकिन देरी हुई। इसके बावजूद भारत ने इस इंजन को आगे बढ़ाते हुए कई नई चीजें हासिल कीं। देरी के बावजूद अब भारत ने बहुत कुछ सीख लिया है इंजन बनाने के लिए अपनी खुद की तकनीकी क्षमता तैयार कर ली है। इसी इंजन के साथ हाइड्रोलिक पंप और पावर सिस्टम जोड़े गए। भारत ने चौथी पीढ़ी के इंजन बनाने का अनुभव हासिल कर लिया है। “स्मार्ट इंजन” बनाने का काम किया गया, जो खास मिशनों में इस्तेमाल हो सकता है। हमारी प्रयोगशालाओं ने टर्बोचार्जर भी बनाया और सर्टिफाइड किया।

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110 किलो-न्यूटन का इंजन है लक्ष्य

क्या भारत वेट इंजन (जो आफ्टरबर्नर के साथ अधिक ताकत देता है) पर काम करेगा, क्योंकि चर्चा में हमेशा 110 किलो-न्यूटन (AMCA इंजन) की ही बात होती है। इस पर जीटीआरई के निदेशक डॉ. श्रीराममूर्ति ने जवाब दिया, “हमारा लक्ष्य 110 किलो-न्यूटन का इंजन है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि कंपेरिजन करते वक्त हमें ध्यान रखना चाहिए कि जैसे अमेरिका का एफ414 इंजन 120 किलो-न्यूटन की ताकत देता है, वैसे ही हमारा क्राइटेरिया होगा। उन्होंने यह भी कहा कि भारत इस काम को अंतरराष्ट्रीय इंजन कंपनियों के साथ मिलकर, यानी को-डिजाइन और को-डेवलपमेंट के जरिए आगे बढ़ाएगा। साथ ही, जीटीआरई और डिफेंस रिसर्च इंटीट्यूशंस ने पहले से ही एडवांस टेक्नोलॉजी पर काम शुरू कर दिया है।

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इसमें ऐसी खास सामग्री का डेवलपमेंट शामिल है, जो बहुत अधिक तापमान सहन कर सके। इसके साथ ही नई डिजाइन तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे इंजन का डिजाइन जल्दी तैयार हो सके। इन प्रयासों में देश के विभिन्न रिसर्च इंस्टीट्यूशंस और विश्वविद्यालयों का भी सहयोग लिया जा रहा है, ताकि तकनीकी विकास को और मजबूत बनाया जा सके।

रिवर्स इंजीनियरिंग के जरिये बनाए इंजन

एयर वाइस मार्शल सुरेश सिंह का कहना है कि जीटीआरई ने बेहतरीन काम किया है लेकिन सही परिणाम नहीं मिला। सुधार हमेशा होते हैं। गलत क्या हुआ, इसे स्वीकार किए बिना सुधार नहीं होगा। वह कहते हैं कि इंजन मानव बुद्धि की बेहतरीन खोज है और यही वायुसेना को गति, फुर्ती और निर्णायक शक्ति देता है। लेकिन किसी भी विदेशी कंपनी से पूरी तकनीक मिलने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। कोई भी देश 100% तकनीक साझा नहीं करता क्योंकि इससे उसका आर्थिक और सामरिक हित प्रभावित होता है।

इसलिए भारत को आत्मनिर्भर होकर इंजन बनाना होगा। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि ब्रिटेन, अमेरिका और रूस ने शुरुआती दिनों में रिवर्स इंजीनियरिंग के जरिये इंजन बनाए। भारत को भी इसी तरह तेजी से आगे बढ़ना होगा। एवीएम सुरेश सिंह के मुताबिक, भारत में एक मजबूत एयरो इंजन विकसित करने के लिए मिशन एयरो इंजन शुरू करना ताहिए। इंजन को 20 हिस्सों में बांटकर छोटे-मध्यम उद्योगों को सौंपें, जो बेसिक रिसर्च, डेवलपमेंट, टेस्टिंग और इंटीग्रेशन का काम करें। एक कंसोर्टियम आखिरी इंटीग्रेशन और टेस्टिंग की जिम्मेदारी लेगा। इसमें पूरा निवेश सरकार की तरफ से हो। कंसोर्टियम का लीड पार्टनर स्थायी रहेगा, लेकिन अन्य पार्टनर रिस्क और रेवेन्यू के आधार पर बदल सकते हैं।

10 से 12 साल लग सकते हैं इंजन बनाने में

वैंप टेक्नोलॉजीज के चीफ वेंकट राजू कहते हैं, भारत का उद्योग अब इस चुनौती के लिए पूरी तरह तैयार है। उन्होंने सबसे पहले जीटीआरई (GTRE) के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि भारत स्पेशल कंपोनेंट्स और इक्विपमेंट्स अब देश में ही बना सकता है। फ्यूल सिस्टम बनाने का अनुभव भी उद्योग के पास मौजूद है। पहले भारतीय कंपनियां केवल कुछ पुर्जे बनाती थीं, लेकिन अब वे पार्ट्स से सिस्टम तक का सफर तय कर चुकी हैं।

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हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि टेस्टिंग के लिए सरकार का सहयोग बेहद जरूरी है। हाई एल्टीट्यूड टेस्टिंग, डिजाइन टूल्स, सिमुलेशन, मटेरियल इंजीनियरिंग और प्रिसीजन मैन्युफैक्चरिंग में सरकार के सहयोग की जरूरत है। उन्होंने कहा, रणनीतिक तौर पर से विदेशी कंपनियों से साझेदारी समस्या का हल नहीं है, क्योंकि इससे सही टेक्नोलॉजी हासिल नहीं हो सकती। लेकिन तत्कालिक जरूरतों को देखते हुए, सीमित सहयोग पर काम किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि पूरे प्रोजेक्ट के लिए लगभग 12 से 15 हजार करोड़ रुपये का बजट लगेगा। इसमें विकास, उत्पादन और बड़े पैमाने पर निर्माण सब शामिल होंगे और इसे पूरा करने में 10 से 12 साल लग सकते हैं। क्योंकि सिर्फ टेस्टिंग फेज में ही 5 साल का समय लग जाएगा, इसलिए इस पर जल्द से जल्द फैसला लेना जरूरी है।

भारतीय ने बनाया चीनी स्टेल्थ एयरक्राफ्ट

एविएशन एक्सपर्ट अनुराग त्रिपाठी का कहना है, भारत को AMCA (एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) के लिए 120 किलो-न्यूटन वाले जेट इंजन की जरूरत और उसे समय पर तैयार करने के लिए हमें अपनी रणनीति बदलनी होगी। उनका कहना था कि भारत के प्रयासों में कोई चूक नहीं थी, लेकिन फिर भी जरूरी तकनीक नहीं बन सकी।

उन्होंने चीन की तरक्की का उदाहरण देते हुए बताया कि वे सिर्फ रिवर्स इंजीनियरिंग या सरकारी सौदों पर निर्भर नहीं हुए। बल्कि उन्होंने एक भारतीय वैज्ञानिक और इंजीनियर नोशर गवादिया को रखा, जो अमेरिका से स्टील्थ तकनीक लेकर आए। वे अमेरिकी कंपनी में काम करते थे और रिटायर होने के बाद चीन ने उन्हें काम पर रखा। वे कहते हैं चीनी स्टेल्थ तकनीक के पिता मुंबई के पारसी नोशेर गवादिया हैं। चीन ने उन्हें पैसे और संसाधन उपलब्ध कराए, जिसके बाद चीन ने J-35 फाइटर जेट बनाया।

भारत ने क्यों नहीं खरीदी Eurofighter बनाने वाली कंपनी

त्रिपाठी ने बताया कि स्पेन में स्थित एक जेट इंजन बनाने वाकी कंपनी जिसने Eurofighter Typhoon का प्रोडक्शन किया था। उस कंपनी को 2022 में एक अमेरिकी कंपनी (Bain Private Equity) ने $1.5 बिलियन में खरीदा था। भारत ने क्यों इतना बड़ा मौका गंवाा दिया। भारत ने बोली क्यों नहीं लगाई। हम भी उस कंपनी को खरीद सकते थे। यह एक बड़ी चूक थी।

त्रिपाठी ने सुझाव दिया कि भारत को एक ऐसा स्ट्रक्चर बनाना चाहिए, जहां वैश्विक तकनीकी क्षमता और इंसानी प्रतिभा को आकर्षित किया जाए। वे कहते हैं कि DRDO और GTRE जैसी संस्थाओं को इस प्रक्रिया में मुख्य साझेदार बनाया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि एचएल ने इंजन निर्माण में लंबे समय से काम किया है, लेकिन उन्हें पर्याप्त संसाधन और सहायता नहीं मिले। उन्होंने कहा कि भारत ने गलतियां नहीं कीं, लेकिन फिर भी हमारे पास आधुनिक फाइटर इंजन नहीं है। जबकि चीन ने विदेशी टैलेंट के जरिए तकनीक हासिल की। भारत को भी दुनिया भर से भारतीय मूल के विशेषज्ञों को अपने साथ जोड़कर यह स्वदेशी इंजन बनाने का काम शुरू करना चाहिए।

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हरेंद्र चौधरी
हरेंद्र चौधरीhttp://harendra@rakshasamachar.com
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवादों, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं। 📍 Location: New Delhi, in 🎯 Area of Expertise: Defence, Diplomacy, National Security

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