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114 राफेल के बाद भी क्यों रूस से Su-57 खरीदना चाहती है भारतीय वायुसेना? ये है पर्दे के पीछे की पूरी कहानी

असल में भारतीय वायुसेना अब “या तो यह, या वह” वाली सोच से आगे निकल चुकी है। उसकी रणनीति लेयर्ड और बैलेंस्ड फ्लीट बनाने की है...

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📍नई दिल्ली | 21 Jan, 2026, 1:13 PM

IAF Su-57 after Rafale: भारतीय वायुसेना इस समय एक बेहद अहम और चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रही है। एक तरफ चीन और पाकिस्तान से लगातार हवाई खतरा बढ़ रहा है, तो दूसरी तरफ वायुसेना के पास लड़ाकू स्क्वाड्रनों की भारी कमी बनी हुई है। इसी बीच भारत 114 अतिरिक्त राफेल लड़ाकू विमानों की खरीदने की भी तैयारी कर रहा है। लेकिन इसके बावजूद एक सवाल लगातार उठ रहा है भारत अगर मल्टीरोल फाइटर जेट राफेल खरीद रहा है, तो फिर भारतीय वायुसेना को रूस के पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर सु-57 Su-57 की जरूरत क्यों महसूस हो रही है।

IAF Su-57 after Rafale: स्क्वाड्रन की हो रही कमी: सबसे बड़ी मजबूरी

आज की तारीख में भारतीय वायुसेना के पास करीब 29 से 31 ऑपरेशनल स्क्वाड्रन ही बचे हैं, जबकि जरूरत 42 स्क्वाड्रन की है। यानी वायुसेना लगभग 11–13 स्क्वाड्रन की भारी कमी से जूझ रही है। लेकिन यह कमी अचानक नहीं आई। पिछले कुछ सालों में मिग-21, मिग-27, पुराने जगुआर रिटायर हो चुके हैं, जबकि मिराज-2000 जैसे फाइटर जेट भी 2030 तक सेवा से बाहर कर दिए जाएंगे।

दूसरी तरफ, चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी एयर फोर्स के पास 2030–35 तक 70 से ज्यादा स्क्वाड्रन होने का अनुमान है। चीन पहले ही जे-20 जैसे पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर बड़ी संख्या में तैनात कर चुका है। वहीं पाकिस्तान भी भविष्य में चीन से जे-35 जैसे स्टील्थ विमान खरीदने की तैयारी में है। ऐसे में भारत के सामने दो मोर्चों पर हवाई चुनौती लगातार गंभीर होती जा रही है। (IAF Su-57 after Rafale)

ऐसे में भारतीय वायुसेना के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि AMCA (एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) आने तक इस खतरनाक गैप को कैसे भरा जाए।

IAF Su-57 after Rafale: AMCA में अभी लगेगा वक्त

भारत का स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी का फाइटर विमान AMCA भारतीय वायुसेना के लिए उम्मीद की किरण जरूर है, लेकिन इसकी वास्तविकता यह है कि इसके बड़े पैमाने पर वायुसेना में शामिल होने में अभी काफी समय लगेगा। पहली उड़ान, इंजन डेवलपमेंट, स्टील्थ टेक्नोलॉजी, सेंसर और प्रोडक्शन- इन सभी चरणों को पूरा करने में कम से कम एक दशक का समय लग सकता है। खुद वायुसेना के पूर्व अधिकारियों का मानना है कि अगर AMCA 2035 से पहले आ भी जाए, तो वह बड़ी उपलब्धि होगी। इसका मतलब यह हुआ कि अगले 10 से 12 साल तक भारत के पास कोई स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी का विकल्प नहीं होगा। वहीं, चीन और पाकिस्तान के स्टील्थ विमानों के सामने संतुलन बनाए रखना रणनीतिक मजबूरी है। (IAF Su-57 after Rafale)

केवल राफेल क्यों काफी नहीं है?

इस बात में कोई शक नहीं कि राफेल दुनिया के सबसे बेहतरीन 4.5 जनरेशन फाइटर विमानों में से एक है। इसमें मिटिओर बीवीआर मिसाइल, स्पेक्ट्रा इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और बेहतरीन एवियोनिक्स हैं। ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों में इसकी क्षमता साबित भी हो चुकी है। लेकिन राफेल पूरी तरह स्टील्थ विमान नहीं है। इसकी रडार क्रॉस सेक्शन सीमित रूप से कम की गई है और यह दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा देने के लिए मुख्य रूप से इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग पर निर्भर करता है। इसका रडार क्रॉस सेक्शन लगभग 0.3–1 m² है। वहीं हाई-थ्रेट एयरस्पेस, जहां एस-400 या एचक्यू-9 जैसे एडवांस्ड एयर डिफेंस सिस्टम तैनात हों, वहां राफेल के लिए डीप स्ट्राइक करना ज्यादा जोखिम भरा हो सकता है। यही वह जगह है जहां पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर की जरूरत महसूस होती है। (IAF Su-57 after Rafale)

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Su-57 है डीप स्ट्राइक के लिए

इसके उलट सु-57 को शुरुआत से ही स्टील्थ पेनेट्रेशन और डीप स्ट्राइक के लिए डिजाइन किया गया है। इसकी स्टील्थ शेपिंग, रडार-एब्जॉर्बिंग मटीरियल और इंटरनल वेपन बे इसे दुश्मन के रडार से काफी हद तक छिपाकर अंदर तक जाने की क्षमता देते हैं। वहीं इसका रडार क्रॉस सेक्शन 0.1–0.5 m² है, जो राफेल से बेहतर है। वहीं, इंटरनल वेपन बे होने से रडार क्रॉस सेक्शन कम होता है। जबकि राफेल में एक्सटर्नल वेपन बे है। हालांकि सु-57 की यह कमजोरी भी है, क्योंकि इंटरनल वेपन बे होने से यह ज्यादा बड़े हथियार नहीं सकता। लेकिन सु-57 की लंबी रेंज, ज्यादा पेलोड और भविष्य में हाइपरसोनिक हथियार ले जाने की क्षमता इसे एक खास तरह का स्ट्राइक प्लेटफॉर्म बनाती है। (IAF Su-57 after Rafale)

यही वजह है कि भारतीय वायुसेना सु-57 को राफेल के विकल्प के तौर पर नहीं, बल्कि उसके कॉम्प्लीमेंटरी के तौर पर देख रही है। वायुसेना की सोच यह है कि राफेल एयर सुपीरियरिटी, मल्टी-रोल और रोजमर्रा के अभियानों में मुख्य भूमिका निभाएगा, जबकि सु-57 जैसे स्टील्थ विमान का इस्तेमाल डे-वन मिशन, डीप स्ट्राइक और हाई-वैल्यू टारगेट्स को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है। यह विमान दुश्मन के इलाके में रडार से बचते हुए अंदर घुसकर, एयर डिफेंस सिस्टम, रडार स्टेशन, कमांड सेंटर और एयरबेस जैसे हाई-वैल्यू टारगेट्स को निशाना बना सकता है। वहीं, 2035 तक AMCA आने तक सु-57 इंटरिम फिफ्थ जनरेशन ब्रिज का काम करेगा। अगर डील फाइनल होती है, तो यह राफेल की तरह ही सफल कॉम्बिनेशन साबित हो सकता है। (IAF Su-57 after Rafale)

रूस का क्या है ऑफर

इस पूरे समीकरण में रूस का ऑफर भी एक अहम भूमिका निभा रहा है। रूस भारत को सु-57 के लिए लगभग पूरा टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, सोर्स कोड एक्सेस और लाइसेंस्ड प्रोडक्शन का प्रस्ताव दे रहा है। यह वही मॉडल है, जिस पर पहले सु-30एमकेआई भारत में बनाया गया था। इसके अलावा कीमत भी पश्चिमी स्टील्थ विमानों की तुलना में काफी कम बताई जा रही है। इससे भारत को न सिर्फ लागत में फायदा होगा, बल्कि स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी भी मिलेगी, यानी किसी एक देश या सैंक्शन पर पूरी तरह निर्भरता नहीं रहेगी। वहीं, इसमें ब्रह्मोस-एनजी को भी इंटीग्रट किया जा सकेगा। (IAF Su-57 after Rafale)

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इंजन और सैंक्शन की चिंता

हालांकि चुनौतियां भी कम नहीं हैं। सु-57 का नया इंजन AL-51 अभी पूरी तरह मैच्योर नहीं माना जाता और रूस पर लगे पश्चिमी सैंक्शन भी एक बड़ा जोखिम हैं। इसके अलावा यह भी चिंता है कि कहीं विदेशी डील्स की वजह से स्वदेशी तेजस और AMCA प्रोग्राम पर असर न पड़े। इस मुद्दे पर एक्सपर्ट्स की राय बंटी हुई है। कुछ का मानना है कि ज्यादा विदेशी खरीद से स्वदेशी प्रोजेक्ट्स में देरी होगी, जबकि दूसरे कहते हैं कि यह इंटरिम समाधान है, जो AMCA को बिना दबाव के डेवलप होने का समय देगा।

असल में भारतीय वायुसेना अब “या तो यह, या वह” वाली सोच से आगे निकल चुकी है। उसकी रणनीति लेयर्ड और बैलेंस्ड फ्लीट बनाने की है, जिसमें सु-30एमकेआई हैवी फायरपावर देगा, तो राफेल हाई-टेक मल्टी-रोल भूमिका निभाएगा, वहीं, तेजस बड़ी संख्या में स्वदेशी ताकत बनेगा और भविष्य में AMCA पांचवीं पीढ़ी की रीढ़ बनेगा। अगर सु-57 आता भी है, तो वह इसी स्ट्रक्चर में एक खास भूमिका निभाएगा। (IAF Su-57 after Rafale)

मुख्य फाइटर एयरक्राफ्ट और उनके रोल्स

दरअसल वायुसेना ने अपनी फ्लीट को परतदार यानी लेयर्ड तरीके से तैयार किया है, जिसमें हर तरह के लड़ाकू विमान की अपनी अलग जिम्मेदारी तय है।

सुखोई-30

इस पूरी फ्लीट की रीढ़ माने जाते हैं सु-30एमकेआई लड़ाकू विमान। संख्या के लिहाज से भी यही विमान सबसे ज्यादा हैं और भूमिका के लिहाज से भी इन्हें वायुसेना का हेवीवेट फाइटर माना जाता है। सु-30 का इस्तेमाल एयर सुपीरियरिटी हासिल करने, लंबी दूरी से दुश्मन के विमानों को इंटरसेप्ट करने और भारी ग्राउंड अटैक व डीप स्ट्राइक मिशनों में किया जाता है। इसके अलावा यह एयर डिफेंस सिस्टम को दबाने वाले मिशनों में भी अहम भूमिका निभाता है। ब्रह्मोस जैसी लंबी दूरी की मिसाइल ले जाने की क्षमता और सुपरक्रूज जैसी खूबियों की वजह से यह दो मोर्चों की जंग की स्थिति में वायुसेना की सबसे बड़ी ताकत बना हुआ है। फिलहाल इसे और ज्यादा सक्षम बनाने के लिए ‘सुपर सुखोई’ अपग्रेड पर भी काम चल रहा है। (IAF Su-57 after Rafale)

राफेल

इसके बाद आता है राफेल लड़ाकू विमान, जिसे वायुसेना का हाई-एंड मल्टी-रोल प्लेटफॉर्म माना जाता है। अभी वायुसेना के पास राफेल के 36 विमान हैं, जिनकी तैनाती अंबाला और हाशिमारा में की जा चुकी है। राफेल की भूमिका एयर सुपीरियरिटी से लेकर सटीक प्रिसिजन स्ट्राइक, न्यूक्लियर डिलीवरी और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर के जरिए दुश्मन के एयरस्पेस में घुसपैठ तक फैली हुई है। मिटिओर बीवीआर मिसाइल और स्पेक्ट्रा इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट इसे बेहद खतरनाक बनाते हैं। यही वजह है कि सरकार ने 114 अतिरिक्त राफेल विमानों की खरीद को भी मंजूरी दी है, ताकि मीडियम वेट सेगमेंट में वायुसेना की ताकत को तेजी से बढ़ाया जा सके। (IAF Su-57 after Rafale)

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एचएएल तेजस  

स्वदेशी मोर्चे पर एचएएल का बनाायाा लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट एलसीए तेजस वायुसेना की भविष्य की संख्या आधारित ताकत के रूप में उभर रहा है। तेजस मार्क-1 और मार्क-1A को लाइट मल्टी-रोल फाइटर के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। इन्हें दरअसल मिग-21 विमानों की पुरानी होती फ्लीट को रिप्लेस करने के लिए बनाया गया था। लेकिन 1980 से शुरू हुआ यह प्रोजेक्ट आज भी वायुसेना की जरूरत को पूरा नहीं कर पाया है। तेजस विमानों की भूमिका मुख्य रूप से एयर डिफेंस, क्लोज एयर सपोर्ट, हल्के ग्राउंड अटैक और पायलटों के ट्रांजिशन व ट्रेनिंग से जुड़ी है। तेजस पूरी तरह स्वदेशी प्लेटफॉर्म है और आने वाले वर्षों में इसकी संख्या तेजी से बढ़ने की उम्मीद है। मार्क-1ए के बड़े ऑर्डर के बाद वायुसेना को भरोसा है कि तेजस भविष्य में उसकी रीढ़ बनेगा, जबकि मार्क-2 को मीडियम वेट कैटेगरी में 2030 के बाद लाने की योजना है। (IAF Su-57 after Rafale)

मिराज-2000

वायुसेना की फ्लीट में कुछ पुराने लेकिन भरोसेमंद विमान भी अभी अहम भूमिका निभा रहे हैं। मिराज-2000 ऐसा ही एक विमान है, जिसने कारगिल जैसे अभियानों में अपनी क्षमता साबित की थी। अपग्रेड के बाद यह अभी भी मल्टी-रोल और प्रिसिजन स्ट्राइक मिशनों में इस्तेमाल किया जा रहा है। हालांकि, 2030 के आसपास इसे धीरे-धीरे फेज-आउट करने की योजना है। (IAF Su-57 after Rafale)

मिग-29

इसी तरह मिग-29 अपग्रेडेड संस्करण भी अभी एयर डिफेंस और इंटरसेप्शन की भूमिका में तैनात हैं। हालांकि ये विमान अब उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच चुके हैं, जहां अगले एक-दो दशक में इन्हें भी सेवा से हटाना तय माना जा रहा है। जगुआर जैसे विमान, जो कभी डीप पेनेट्रेशन और टैक्टिकल बॉम्बिंग के लिए जाने जाते थे, अब तकनीकी रूप से पुराने हो चुके हैं। दारिन-3 जैसे अपग्रेड के बावजूद इन्हें भी 2030 तक चरणबद्ध तरीके से रिटायर करने की तैयारी है। (IAF Su-57 after Rafale)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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