📍नई दिल्ली | 31 Mar, 2026, 8:51 PM
IAF Mountain Radar India: भारतीय वायुसेना की निगरानी क्षमता को मजबूत करने के लिए रक्षा मंत्रालय ने भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड के साथ करीब 1,950 करोड़ रुपये का समझौता किया है, जिसके तहत दो नए माउंटेन रडार खरीदे जाएंगे। इन रडार का मकसद उन इलाकों में निगरानी बढ़ाना है जहां अब तक नजर रखना मुश्किल रहा है।
यह डील पूरी तरह स्वदेशी श्रेणी के तहत की गई है, यानी इन रडार को भारत में ही डिजाइन, डेवलप और मैन्युफैक्चर किया जाएगा। इनका डिजाइन डीआरडीओ के इलेक्ट्रॉनिक्स एंड रडार डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट ने तैयार किया है, जबकि निर्माण का जिम्मा बीईएल को दिया गया है।
IAF Mountain Radar India: कहां लगाए जाएंगे नए रडार
इन दोनों रडार को देश के दो बेहद संवेदनशील इलाकों में तैनात करने की योजना है। पहला जम्मू-कश्मीर के गुलमर्ग क्षेत्र में लगाया जाएगा, जबकि दूसरा नागालैंड के फुत्सेरो इलाके में तैनात किया जाएगा। ये दोनों स्थान ऐसे हैं जहां पहाड़ी इलाके और गहरी घाटियां मौजूद हैं, जिससे निगरानी करना काफी मुश्किल होता है।
इन क्षेत्रों में लंबे समय से यह समस्या रही है कि आम रडार हर दिशा में सही तरीके से काम नहीं कर पाते। पहाड़ों की ऊंची-नीची बनावट के चलते कई जगहों पर “रडार शैडो जोन” बन जाते हैं, यानी ऐसे हिस्से जहां रडार की नजर नहीं पहुंच पाती।
🇮🇳 Aatmanirbhar Bharat Boost: ₹1,950 Cr Mountain Radar Deal for IAF
India has taken another major step towards defence self-reliance! 🚀
The Ministry of Defence (MoD) has signed a ₹1,950 crore contract with Bharat Electronics Limited (BEL) for the procurement of indigenously… pic.twitter.com/hTYldl47sJ— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) March 31, 2026
क्या होती है रडार शैडो की समस्या
पहाड़ी इलाकों में निगरानी करना मैदानों की तुलना में कहीं ज्यादा मुश्किल होता है। जब रडार किसी ऊंचे पहाड़ के पीछे के हिस्से को नहीं देख पाता, तो वहां एक तरह का ब्लाइंड स्पॉट बन जाता है। इसी को रडार शैडो कहा जाता है।
इसका फायदा दुश्मन उठा सकता है। कम ऊंचाई पर उड़ने वाले फाइटर जेट, ड्रोन या क्रूज मिसाइल ऐसे इलाकों का इस्तेमाल करके बिना पकड़े आगे बढ़ सकते हैं। यही वजह है कि इन इलाकों में अतिरिक्त और खास तरह के रडार की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी।
नए रडार कैसे करेंगे मदद
ये नए माउंटेन रडार खास तौर पर पहाड़ी इलाकों के लिए बनाए गए हैं। इन्हें ऐसे स्थानों पर लगाया जाएगा जहां से वे घाटियों और पहाड़ों के बीच छिपे हिस्सों को भी कवर कर सकें। इनकी खासियत यह है कि ये छोटे आकार वाले टारगेट्स जैसे छोटे ड्रोन या कम ऊंचाई पर उड़ने वाली मिसाइलों को भी ट्रैक कर सकते हैं।
इन रडार को आगे की पोजिशन पर तैनात किया जाएगा, ताकि दुश्मन की गतिविधियों का पहले ही पता लगाया जा सके। साथ ही ये लगातार निगरानी बनाए रखने में सक्षम होंगे, जिससे किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर तुरंत प्रतिक्रिया दी जा सके।
एयर डिफेंस सिस्टम का होंगे हिस्सा
भारतीय वायुसेना पहले से ही एक मजबूत सर्विलांस नेटवर्क का इस्तेमाल करती है। इसमें अलग-अलग तरह के रडार, हवाई चेतावनी सिस्टम, एयरोस्टैट और स्पेस बेस्ड इनपुट शामिल होते हैं। ये सभी मिलकर एक पूरा एयर पिक्चर तैयार करते हैं, जिससे यह पता चलता है कि आसमान में क्या गतिविधि चल रही है।
नए माउंटेन रडार भी इसी नेटवर्क का हिस्सा होंगे। इन्हें इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS) से जोड़ा जाएगा। इस सिस्टम के जरिए अलग-अलग जगहों से मिलने वाली जानकारी को एक साथ जोड़कर रीयल टाइम में स्थिति का आकलन किया जाता है। (IAF Mountain Radar India)
मौजूदा रडार सिस्टम के साथ तालमेल
भारतीय वायुसेना के पास पहले से कई तरह के रडार सिस्टम मौजूद हैं। इनमें रोहिणी मीडियम रेंज रडार शामिल है, जो मध्यम दूरी तक निगरानी कर सकता है। इसके अलावा अरुद्र रडार है, जिसकी रेंज काफी ज्यादा है और यह लंबी दूरी तक नजर रख सकता है।
अश्विनी लो लेवल रडार भी इस्तेमाल किया जाता है, जो कम ऊंचाई पर उड़ने वाले लक्ष्यों को पकड़ने में सक्षम है। लेकिन पहाड़ी इलाकों में इन रडार की क्षमता सीमित हो जाती है। ऐसे में नए माउंटेन रडार इन सिस्टम्स के बीच की कमी को पूरा करेंगे और एक बेहतर कवरेज देंगे। (IAF Mountain Radar India)
ड्रोन और मिसाइल से बढ़ी चुनौती
हाल के युद्धों में यह साफ देखा गया है कि कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोन और प्रिसीजन गाइडेड हथियार एक बड़ी चुनौती बन चुके हैं। ये छोटे आकार के होते हैं और कई बार पारंपरिक रडार से बच निकलते हैं।
पश्चिम एशिया और रूस-यूक्रेन युद्ध में इस तरह के हथियारों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ है। इससे यह समझ आया है कि केवल लंबी दूरी के रडार पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि हर स्तर पर निगरानी जरूरी है।
इस पूरे प्रोजेक्ट की एक खास बात यह भी है कि यह पूरी तरह स्वदेशी तकनीक पर आधारित है। रडार का डिजाइन देश में तैयार किया गया है और इसका निर्माण भी भारतीय कंपनी द्वारा ही किया जाएगा।
इन रडार के साथ जरूरी उपकरण और इंफ्रास्ट्रक्चर भी तैयार किया जाएगा, ताकि इन्हें सीमावर्ती इलाकों में आसानी से ऑपरेट किया जा सके। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मौसम और भौगोलिक परिस्थितियां काफी कठिन होती हैं, इसलिए इन सिस्टम को उसी हिसाब से डिजाइन किया गया है।
रडार के इंस्टॉलेशन और कमीशनिंग के बाद यह लगातार काम करते हुए सीमाओं पर नजर रखेंगे। इनके जरिए वायुसेना को समय पर जानकारी मिलेगी, जिससे जरूरत पड़ने पर तुरंत कार्रवाई की जा सके। (IAF Mountain Radar India)

