📍नई दिल्ली | 12 Jan, 2026, 11:34 AM
Air LORA missile India: घातक इजराइली एयर लोरा और रैम्पेज मिसाइलों को भारत में ही बनाने की तैयारी शुरू हो गई हैं। हाल के महीनों में इन दोनों मिसाइलों ने जिस तरह का प्रदर्शन किया है, उसके बाद भारतीय वायुसेना का भरोसा इन हथियारों पर और मजबूत हुआ है। खासतौर पर ऑपरेशन सिंदूर के दौरान रैम्पेज मिसाइल की सफलता ने यह साबित कर दिया कि ये हथियार युद्ध में भी बेहद सटीक और भरोसेमंद हैं।
Air LORA missile India: ऊपर से नीचे की ओर अटैक करती है लोरा
सूत्रों के मुताबिक, भारतीय वायुसेना ने कुछ समय पहले इजराइल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज से सीमित संख्या में एयर लोरा यानी लॉन्ग रेंज आर्टिलरी मिसाइलें खरीदी थीं। इन मिसाइलों के टेस्ट किए गए, जिसमें नतीजे बेहद शानदार थे। इसके साथ ही ऑपरेशन सिंदूर में रैम्पेज मिसाइल ने दुश्मन के ठिकानों पर जिस सटीकता से हमला किया, उसने वायुसेना के अफसरों को भी हैरान कर दिया। अब इसी अनुभव के आधार पर यह फैसला लिया जा रहा है कि सिर्फ मिसाइलें खरीदने के बजाय, उनका उत्पादन भारत में ही किया जाए। (Air LORA missile India)
एयर लोरा मिसाइल को आम क्रूज मिसाइल से बिल्कुल अलग माना जाता है। यह जमीन से दागी जाने वाली लोरा मिसाइल का एरियल वर्जन है, जिसे फाइटर जेट से ऊंचाई पर छोड़ा जाता है। जैसे ही यह मिसाइल छोड़ी जाती है, यह बैलिस्टिक मिसाइल की तरह बेहद तेज रफ्तार से नीचे की ओर गिरती है। इसकी सबसे खास बात यह है कि इसका हमला लगभग सीधा ऊपर से नीचे की ओर होता है। इस वजह से दुश्मन के मजबूत बंकर, कमांड सेंटर और रनवे भी इसकी मार से नहीं बच पाते। आमतौर पर एयर डिफेंस सिस्टम सामने से आने वाले खतरों के लिए तैयार रहते हैं, लेकिन एयर लोरा ऊपर से लगभग नब्बे डिग्री के एंगल पर गिरती है, जिससे उसे रोक पाना बेहद मुश्किल हो जाता है। (Air LORA missile India)
नहीं पकड़ पाते रडार
इस मिसाइल की रफ्तार भी इसकी सबसे बड़ी ताकत है। इतनी तेज स्पीड में गिरने वाली मिसाइल को दुश्मन के रडार पकड़ ही नहीं पाते या फिर पकड़ भी लें, तो उनके पास जवाबी हमले का समय नहीं बचता। यही वजह है कि एस-300 जैसे आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम भी इस मिसाइल के सामने बेबस नजर आते हैं। भारतीय वायुसेना के लिए यह एक बड़ा गेम चेंजर साबित हो सकती है, क्योंकि इसके जरिए दुश्मन के एयर स्पेस में घुसे बिना, बहुत अंदर तक सटीक मार की जा सकती है।
सुपरसोनिक एयर-टू-ग्राउंड मिसाइल है रैम्पेज
वहीं दूसरी तरफ रैम्पेज मिसाइल भी लोरा से कम नहीं है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इस मिसाइल का इस्तेमाल बेहद सटीक स्ट्राइक के लिए किया गया था। रैम्पेज एक सुपरसोनिक एयर-टू-ग्राउंड मिसाइल है, जिसे सुखोई-30 एमकेआई, जगुआर और मिग जैसे लड़ाकू विमानों से दागा जा सकता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह दुश्मन के रडार और एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा देते हुए अपने टारगेट तक पहुंच जाती है। ऑपरेशन सिंदूर में इस मिसाइल का प्रदर्शन भारतीय वायुसेना के लिए आंखें खोलने वाला रहा। (Air LORA missile India)
इसी के बाद अब यह महसूस किया गया कि अगर युद्ध के समय मिसाइलों की सप्लाई के लिए विदेशों पर निर्भर रहा गया, तो मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। किसी भी बड़ी जंग के दौरान सप्लाई चेन बाधित हो सकती है। इसी वजह से आत्मनिर्भर भारत की सोच के तहत अब इन मिसाइलों का निर्माण देश के अंदर करने पर जोर दिया जा रहा है। अगर एयर लोरा और रैम्पेज का उत्पादन भारत में शुरू होता है, तो इनकी लागत में भी काफी कमी आएगी। अभी सीमित संख्या में मिसाइलें इसलिए खरीदी जाती हैं, क्योंकि ये बेहद महंगी होती हैं। लेकिन देश में बनने के बाद हजारों की संख्या में इन मिसाइलों को स्टॉक करना संभव हो सकेगा। (Air LORA missile India)
एयर लोरा मिसाइल के लिए नेवी भी इच्छुक
भारतीय नौसेना भी एयर लोरा मिसाइल में दिलचस्पी दिखा रही है। नौसेना चाहती है कि जमीन और समुद्र में मौजूद दुश्मन के ठिकानों पर सटीक और तेज हमला करने के लिए इस मिसाइल का इस्तेमाल किया जाए। अगर इसका उत्पादन भारत में होता है, तो वायुसेना और नौसेना दोनों को एक ही तरह के हथियार, स्पेयर पार्ट्स और मेंटेनेंस सुविधा मिल सकेगी। इससे लॉजिस्टिक व्यवस्था भी आसान हो जाएगी। (Air LORA missile India)
रक्षा सूत्रों का कहना है कि भारत और इजराइल मिलकर एक जॉइंट वेंचर कंपनी बना सकते हैं, जो इन मिसाइलों का निर्माण करेगी। इसमें भारत की कंपनियों को गाइडेंस सिस्टम, प्रोपल्शन और वारहेड जैसे अहम हिस्सों में काम करने का मौका मिलेगा। इससे न सिर्फ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर होगा, बल्कि भविष्य में भारत खुद भी इससे ज्यादा एडवांस मिसाइलें डेवलप कर सकेगा। (Air LORA missile India)


