📍नई दिल्ली | 26 Dec, 2025, 11:51 AM
K-4 Missile Test: भारत ने हाल ही में बंगाल की खाड़ी में स्वदेशी न्यूक्लियर सबमरीन आईएनएस अरिहंत से 3,500 किलोमीटर तक मार करने वाली के-4 सबमरीन-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण किया। खास बात यह 3,500 किमी रेंज वाली मिसाइल परमाणु हथियार ले जा सकती है। हालांकि यह टेस्ट पहले 3 दिसंबर को होना था, लेकिन श्रीलंका में चक्रवात आने की वजह से इसे टालना पड़ा। लेकिन इस बार भारत ने बेहद गोपनीय तरीके से इस परीक्षण का अंजाम दिया। आइए पांच प्वाइंट्स में समझते हैं इस बार ये टेस्ट क्यों है खास।
K-4 Missile Test: अब पॉन्टून नहीं, असली पनडुब्बी से टेस्ट
यह के-4 मिसाइल का आईएनएस अरिघात से दूसरा सफल परीक्षण है। इससे पहले नवंबर 2024 में इसी पनडुब्बी से के-4 का पहला टेस्ट किया गया था। शुरुआत में के-4 मिसाइल के ज्यादातर टेस्ट समुद्र में बनाए गए अंडरवाटर प्लेटफॉर्म यानी सबमर्सिबल पॉन्टून से किए जाते थे। लेकिन अब ऑपरेशनल न्यूक्लियर सबमरीन आने के बाद से सभी टेस्ट इसी से हो रहे हैं। वहीं, सबमरीन से बार-बार सफल लॉन्च होना इस बात का संकेत है कि यह सिस्टम अब धीरे-धीरे पूरी तरह ऑपरेशनल हो रहा है। (K-4 Missile Test)
INS अरिघात को अगस्त 2024 में भारतीय नौसेना में शामिल किया गया था। यह भारत की दूसरी स्वदेशी न्यूक्लियर बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन है और इसे खास तौर पर लंबी दूरी की परमाणु मिसाइलों के लिए तैयार किया गया है।
K-4 Missile Test: के-15 से कहीं ज्यादा लंबी मारक क्षमता
आईएनएस अरिघात से पहले भारत की पहली परमाणु पनडुब्बी आईएनएस अरिहंत पर मुख्य तौर पर के-15 मिसाइलें तैनात थीं। के-15 मिसाइल की रेंज करीब 750 किलोमीटर थी। इसके मुकाबले के-4 मिसाइल की रेंज करीब 3,500 किलोमीटर है। लंबी रेंज का फायदा यह है कि पनडुब्बी को दुश्मन के तट के बहुत करीब जाने की जरूरत नहीं पड़ती। इससे पनडुब्बी की सुरक्षा बढ़ती है और उसकी पहचान होने की संभावना कम हो जाती है। यही वजह है कि के-4 को भारत की समुद्री परमाणु क्षमता के लिए बेहद अहम माना जाता है। (K-4 Missile Test)
K-4 Missile Test: भारत की स्ट्रैटेजिक फोर्सेस कमांड का अहम रोल
इस पूरे टेस्ट को पूरी तरह गोपनीय रखा गया है। दरअसल यह भारत की स्ट्रैटेजिक फोर्सेस कमांड के तहत आता है, जिसे स्ट्रैटेजिक न्यूक्लियर कमांड भी कहा जाता है। यह भारतीय सशस्त्र बलों की एक विशेष ट्राई-सर्विसेज कमांड है, जो न्यूक्लियर कमांड अथॉरिटी का हिस्सा है और देश के परमाणु हथियारों के प्रबंधन, प्रशासन और ऑपरेशनल कंट्रोल के लिए जिम्मेदार है। यह कमांड 4 जनवरी 2003 को अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने बनाई थी, ताकि भारत की न्यूक्लियर ट्रायड (जमीन, हवा और समुद्र आधारित परमाणु क्षमता) को प्रभावी ढंग से संभाला जा सके। (K-4 Missile Test)
K-4 Missile Test: सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी हुई मजबूत
सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी परमाणु युद्ध की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा है। इसका मतलब है कि अगर कोई दुश्मन देश भारत पर पहला परमाणु हमला करता है और भारत के जमीनी ठिकाने, एयर बेस या कमांड सेंटर को नष्ट करने की कोशिश करता है, तब भी भारत के पास जवाबी परमाणु हमला करने की गारंटीड क्षमता बची रहेगी। यह क्षमता इसलिए जरूरी है, क्योंकि यह दुश्मन को पहला हमला करने से रोकती है। उसे पता होता है कि हमला करने पर भी वह खुद पूरी तरह तबाह हो जाएगा। इसे म्यूचुअल एश्योर्ड डिस्ट्रक्शन या क्रेडिबल डिटरेंस कहा जाता है। भारत की आधिकारिक नीति “नो फर्स्ट यूज” है, इसलिए सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी उसके लिए बेहद अहम है। (K-4 Missile Test)
K-4 Missile Test: चीनी वैसल्स को दिया गच्चा: कैट-एंड-माउस गेम की पूरी कहानी
रिपोर्ट्स के मुताबिक यह ट्रायल विशाखापट्टनम के तट से दूर समुद्री क्षेत्र में किया गया, जहां दिसंबर के मध्य में जारी नोटैम यानी नोटिस टू एयरमेन के जरिए बड़े इलाके को ट्रायल के लिए सुरक्षित घोषित किया गया था। दरअसल जब भी भारत कोई मिसाइल टेस्ट करने की योजना बनाता है, तो चीनी वैसल्स उस इलाके के इर्द-गिर्द एकत्रित हो जाते हैं, ताकि मिसाइल टेस्ट का डेटा जुटाया जा सके और चीन उन्हें अपनी मिसाइलों को अपग्रेड करने के लिए इस्तेमाल कर सके। कुछ दिनों पहले भी इस क्षेत्र में एक नहीं बल्कि चीन चीनी रिसर्च जहाज मौजूद थे।
सूत्रों का कहना है कि यह परीक्षण पहले 1 से 3 दिसंबर के बीच होना था, लेकिन 3 दिसंबर को टेस्ट रेंज के पास एक चीनी जहाज देखे जाने के बाद इसे टाल दिया गया। यह चाइनीज ओशन मिनरल रिसोर्सेज वेसल था, जिसे टेस्ट रेंज की दक्षिणी सीमा से करीब 115 नॉटिकल मील दूर देखा गया। हालांकि उस दौरान श्रीलंका में चक्रवात भी आ गया था, जो मिसाइल टेस्ट टालने की बड़ी वजह भी बना। (K-4 Missile Test)
भारत ने कई बार 1-4 दिसंबर, 17-20 दिसंबर, 22-24 दिसंबर में नोटैम जारी किए। जिनकी रेंज लगभग 3,000-3,500 किमी थी। हर बार नोटैम जारी होते ही चीन के 4-5 रिसर्च वैसल्स शी यान 6, शेन हाय यी हाओ, लान हाई 101, द यांग यी हाओ उस इलाके में पहुंच जाते थे। वहीं, चीन का एक लुयांग–III श्रेणी का डेस्ट्रॉयर, एक जियांगकाई–II फ्रिगेट और एक फुची क्लास टैंकर भी इस इलाके में थे। ये सभी जहाज चीन के 48वें एंटी-पायरेसी एस्कॉर्ट फोर्स का हिस्सा थे और उस समय गल्फ ऑफ एडन के पास तैनात थे। ये जहाज मिसाइल की ट्रैजेक्टरी, टेलीमेट्री डेटा, अकॉस्टिक सिग्नेचर और डेब्रिस कलेक्ट करने में सक्षम हैं। जिससे चीन भारत की मिसाइल टेक्नोलॉजी की जासूसी कर सकता है। (K-4 Missile Test)
भारत भी चीन की रणनीति को लगातार समझता रहा और जानबूझकर नोटैम जारी करता था, जैसे ही चीन के जहाज आते थे, फिर भारत नोटैम कैंसल कर देता था। इससे चीन के जहाज बेकार घूमते रहते, ईंधन बर्बाद होता और उनकी लोकेशन पता चल जाती। भारतीय नौसेना चीफ एडमिरल दिनेश त्रिपाठी ने भी कहा कि चीनी जहाजों की मौजूदगी में टेस्ट को “रीकैलिब्रेट” (समायोजित) करना अब सामान्य प्रक्रिया है।
जिसके बाद सभी फेक/डिकॉय नोटैम जारी के बाद, भारत ने बिना कोई नया नोटैम जारी किए 23 दिसंबर को टेस्ट कर दिया। हालांकि चीनी जहाज उस इलाके में जरूर थे, लेकिन उन्हें पता ही नहीं चला कि टेस्ट हो रहा है, क्योंकि कोई पूर्व चेतावनी नहीं थी। के-4 मिसाइल सफलतापूर्वक लॉन्च हुई, सभी पैरामीटर पूरे हुए, लेकिन कोई जासूसी डेटा चीन को नहीं मिल पाया। (K-4 Missile Test)
के-4 के बाद के-5 और के-6 की तैयारी
भारत की न्यूक्लियर ट्रायड में जमीन से मार करने वाली मिसाइलें, हवा से हमला करने वाले विमान और समुद्र से हमला करने वाली पनडुब्बियां शामिल हैं। समुद्र से दागी जाने वाली मिसाइलें इस ट्रायड का सबसे सुरक्षित हिस्सा मानी जाती हैं, क्योंकि पनडुब्बियां लंबे समय तक समुद्र के भीतर छिपी रह सकती हैं। (K-4 Missile Test)
के-4 मिसाइल का डेवलपमेंट भारत के डिफेंस रिसर्च फ्रेमवर्क के तहत किया गया है। इसे डीआरडीओ ने तैयार किया है। इसके कई अहम हिस्सों का निर्माण पुणे और नासिक स्थित डीआरडीओ की प्रयोगशालाओं में किया गया है।
मिसाइल का रॉकेट मोटर, प्रोपेलेंट और लॉन्च सिस्टम पूरी तरह स्वदेशी तकनीक पर आधारित है। के-4 एक सॉलिड फ्यूल मिसाइल है, जो पानी के भीतर से कोल्ड लॉन्च तकनीक के जरिए बाहर निकलती है और फिर हवा में अपने इंजन को एक्टिव करती है। (K-4 Missile Test)
के-4 मिसाइल की लंबाई करीब 10 से 12 मीटर है और इसका वजन 17 से 20 टन के बीच है। यह लगभग 2 टन तक का वारहेड ले जाने में सक्षम है। मिसाइल को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह दुश्मन की मिसाइल डिफेंस सिस्टम को चकमा दे सके। यह मिसाइल इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम पर आधारित है और जरूरत पड़ने पर टर्मिनल फेज में दिशा बदलने की क्षमता भी रखती है।
वहीं, के-4 के बाद भारत के-5 और के-6 जैसी लंबी दूरी की मिसाइलों पर भी काम कर रहा है। के-5 की रेंज 5,000 किलोमीटर से ज्यादा बताई जाती है, जबकि के-6 को और भी लंबी दूरी के लिए विकसित किया जा रहा है।
इसके अलावा आईएनएस अरिघात के बाद भारत की तीसरी परमाणु पनडुब्बी आईएनएस अरिधमान पर भी काम अंतिम चरण में बताया जा रहा है। इसके 2026 की शुरुआत में नौसेना में शामिल होने की संभावना जताई जा रही है। इसके अलावा अरिहंत श्रेणी की अगली पनडुब्बियां भी निर्माणाधीन हैं। भविष्य में आने वाली नई पनडुब्बियों में ज्यादा मिसाइल ट्यूब और अधिक एडवांस रिएक्टर लगाए जाने की योजना है। इससे भारत की समुद्री क्षमता और मजबूत होगी। (K-4 Missile Test)


