📍नई दिल्ली | 30 Jan, 2026, 10:49 AM
Indigenous Jet Engine India: भारत ने स्वदेशी जेट इंजन बनाने को लेकर तैयारियां शुरू कर दी हैं। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) के तहत काम करने वाली गैस टरबाइन रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट (जीटीआरई), बेंगलुरु ने देश की कंपनियों से एक खास पार्टनर चुनने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। जिसके तहत देश की किसी कंपनी को एडवांस्ड हाई थ्रस्ट क्लास जेट इंजन प्रोग्राम में डेवलपमेंट-कम-प्रोडक्शन पार्टनर बनाया जाएगा। चुनी गई कंपनी इस टर्बोफैन इंजन के निर्माण, टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन की जिम्मेदारी संभालेगी। यह पार्टनर भारत का अपना एडवांस्ड हाई थ्रस्ट क्लास जेट इंजन डेवलप करने और बनाने में अहम भूमिका निभाएगा।
भारत के पास अभी तक अपना स्वदेशी जेट इंजन नहीं है और इसके लिए वह दूसरे देशों पर निर्भर है। पिछले साल 15 अगस्त को लाल किला से 79वें स्वतंत्रता दिवस के भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जेट इंजन को लेकर मेड इन इंडिया पर जोर दिया था। उन्होंने युवा वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, टैलेंटेड यूथ और सरकार के सभी विभागों को सीधा आह्वान किया था कि भारत को अपने स्वदेशी फाइटर जेट्स के लिए अपना खुद का जेट इंजन बनाना चाहिए। उन्होंने इसे एक राष्ट्रीय चुनौती के रूप में पेश करते हुए कहा कि कोविड में वैक्सीन बनाई, यूपीआई बनाया, वैसे ही जेट इंजन भी भारत में बनना चाहिए। वहीं अब जीटीआरई ने इस पहल की शुरुआत कर दी है। (Indigenous Jet Engine India)
Indigenous Jet Engine India: क्यों अहम है यह कदम
जेट इंजन किसी भी फाइटर एयरक्राफ्ट का दिल होता है। अगर इंजन विदेशी हो, तो संकट के समय सप्लाई रुक सकती है, अपग्रेड में दिक्कत आ सकती है और ऑपरेशनल आजादी सीमित हो जाती है। भारत ने यह सब पहले भी देखा है।
कावेरी इंजन प्रोग्राम इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहा है। इस प्रोग्राम से बहुत कुछ सीखा गया, लेकिन वह इंजन पूरी तरह लड़ाकू विमान के लिए तैयार नहीं हो पाया। इसके बाद भारत ने तय किया कि इंजन टेक्नोलॉजी में आधे-अधूरे कदम नहीं, बल्कि पूरी ताकत झोंकनी होगी।
इसी सोच के साथ अब एडवांस्ड हाई थ्रस्ट क्लास इंजन प्रोग्राम शुरू किया गया है, जो भविष्य के पांचवी पीढ़ी के फाइटर जेट्स जैसे एएमसीए (एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) को ताकत देगा। (Indigenous Jet Engine India)
क्या किया है जीटीआरई ने
जीटीआरई ने भारतीय कंपनियों के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी किया है। इसका मतलब है कि सरकार अब निजी और सार्वजनिक भारतीय कंपनियों को इस प्रोजेक्ट में सीधे शामिल करना चाहती है। चुनी जाने वाली कंपनी सिर्फ पार्ट्स बनाने वाली नहीं होगी, बल्कि इंजन के निर्माण, असेंबली, टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन तक की जिम्मेदारी संभालेगी।
सरल शब्दों में कहें, तो लैब में बने डिजाइन को उड़ने लायक इंजन में बदलने की पूरी जिम्मेदारी इसी भारतीय कंपनी के कंधों पर होगी। (Indigenous Jet Engine India)
कैसा होगा यह नया जेट इंजन
जिस इंजन को बनाने की योजना है, वह आज की दुनिया के सबसे एडवांस्ड मिलिटरी इंजनों की कैटेगरी में आएगा। इसमें 10:1 का थ्रस्ट-टू-वेट रेशियो होगा, यानी इंजन हल्का होने के बावजूद बेहद ताकतवर होगा।
इस इंजन की एक खास क्षमता सुपरक्रूज होगी। इसका मतलब है कि फाइटर जेट बिना आफ्टरबर्नर जलाए भी सुपरसोनिक रफ्तार से उड़ सकेगा। इससे ईंधन की बचत होगी और विमान की रेंज और स्टेल्थ दोनों बढ़ेंगी।
इसके अलावा इंजन का इंफ्रारेड सिग्नेचर कम रखा जाएगा, ताकि दुश्मन के सेंसर और मिसाइल इसे आसानी से ट्रैक न कर सकें। इंजन में सिंगल क्रिस्टल ब्लेड्स का इस्तेमाल होगा, जो बहुत ज्यादा तापमान सह सकती हैं और इंजन की उम्र बढ़ाती हैं। (Indigenous Jet Engine India)
क्या है एडवांस्ड हाई थ्रस्ट क्लास इंजन
एएमसीए यानी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट एक ट्विन-इंजन फाइटर जेट है, इसलिए इसकी ताकत को आमतौर पर प्रति इंजन थ्रस्ट के आधार पर समझा जाता है। एएमसीए को दो अलग-अलग चरणों में डेवलप किया जा रहा है और दोनों में इंजन को लेकर रणनीति भी अलग है।
एएमसीए के एमके-1 वर्जन में शुरुआती तौर पर अमेरिकी जीई एफ414 इंजन लगाने की योजना है। यह इंजन आफ्टरबर्नर के साथ लगभग 98 किलो-न्यूटन (kN) तक का अधिकतम थ्रस्ट देता है। चूंकि विमान में दो इंजन होंगे, इसलिए कुल थ्रस्ट करीब 196 kN के आसपास रहेगा। यह कॉन्फिगरेशन शुरुआती ऑपरेशनल जरूरतों को पूरा करने के लिए चुना गया है, ताकि एयरक्राफ्ट की डेवलपमेंट टाइमलाइन प्रभावित न हो।
वहीं एएमसीए एमके-2 के लिए पूरी तरह अलग और ज्यादा महत्वाकांक्षी योजना है। इस वर्जन में स्वदेशी हाई-थ्रस्ट इंजन लगाने का लक्ष्य रखा गया है, जिसे जीटीआरई और साफरान के सहयोग से को-डेवलप किया जाएगा। इस इंजन की प्लान्ड आफ्टरबर्नर थ्रस्ट क्षमता लगभग 120 kN प्रति इंजन होगी, जिसे भविष्य में 140 kN तक स्केल किया जा सकेगा। इस तरह दो इंजनों के साथ कुल थ्रस्ट करीब 240 kN तक पहुंच जाएगा।
इतनी ज्यादा थ्रस्ट क्षमता एएमसीए एमके-2 को सुपरक्रूज, बेहतर एक्सेलेरेशन और हाई मैन्यूवरेबिलिटी जैसी खूबियां देगी। यही वजह है कि इस इंजन को “एडवांस्ड हाई थ्रस्ट क्लास” कैटेगरी में रखा गया है।
जहां तक ड्राई थ्रस्ट की बात है, तो स्वदेशी इंजन से करीब 73 से 75 kN प्रति इंजन ड्राई थ्रस्ट मिलने की उम्मीद की जा रही है। यह आंकड़ा आफ्टरबर्नर के बिना भी तेज रफ्तार और लंबी रेंज ऑपरेशन के लिए अहम माना जाता है।
किस तरह का इंजन बनेगा
यह इंजन एक मॉडर्न टर्बोफैन जेट इंजन होगा। इसमें लो प्रेशर कंप्रेसर, हाई प्रेशर कंप्रेसर, कंबस्टर, हाई प्रेशर टरबाइन, लो प्रेशर टरबाइन, आफ्टरबर्नर और एग्जॉस्ट सिस्टम जैसे सभी एडवांस्ड हिस्से शामिल होंगे।
इसके साथ गियरबॉक्स, फ्यूल सिस्टम, ऑयल सिस्टम और डिजिटल कंट्रोल सिस्टम यानी फाडेक (फुल अथॉरिटी डिजिटल इंजन कंट्रोल) भी पूरी तरह आधुनिक होंगे। (Indigenous Jet Engine India)
कई चरणों में बंटा प्रोजेक्ट
जीटीआरई ने इस पूरे प्रोजेक्ट को कई चरणों में बांटा है। पहले चरण में डिजाइन से जुड़े काम होंगे। इसमें ड्रॉइंग, थ्री-डी मॉडल, डिजाइन में बदलाव और टेस्ट के आधार पर सुधार शामिल होंगे।
दूसरे चरण में मैन्युफैक्चरिंग की तैयारी होगी। यानी किस हिस्से को कैसे बनाया जाएगा, कौन सी मशीन लगेगी, कौन सा मटेरियल इस्तेमाल होगा और क्वालिटी कैसे जांची जाएगी।
तीसरे चरण में असली मैन्युफैक्चरिंग शुरू होगी। इसमें पार्ट्स बनाना, सब-असेंबली तैयार करना और जरूरी टेस्ट करना शामिल होगा।
चौथे और सबसे अहम चरण में इंजन की असेंबली, बैलेंसिंग, इंस्ट्रूमेंटेशन और फाइनल टेस्टिंग होगी। इसके बाद इंजन को सर्टिफिकेशन के लिए तैयार किया जाएगा।
इस प्रोजेक्ट में जीटीआरई डिजाइन अथॉरिटी बना रहेगा। यानी इंजन का टेक्निकल कंट्रोल सरकार के पास रहेगा। वहीं चुनी गई कंपनी इंडस्ट्रियल एग्जिक्यूशन की जिम्मेदारी निभाएगी।
इसमें एयरवर्थिनेस एजेंसियों के साथ कोऑर्डिनेशन, क्वालिटी कंट्रोल, डॉक्यूमेंटेशन और लाइफ-साइकिल सपोर्ट भी शामिल होगा। (Indigenous Jet Engine India)
मजबूत फाइनेंशियल बैकग्राउंड जरूरी
जीटीआरई ने साफ कर दिया है कि यह काम हर किसी के बस का नहीं है। कंपनी के पास मजबूत फाइनेंशियल बैकग्राउंड होना जरूरी है। कम से कम 1500 करोड़ रुपये का टर्नओवर, अच्छी क्रेडिट रेटिंग और मजबूत फाइनेंशियल बैकिग जरूरी रखी गई है।
तकनीकी तौर पर कंपनी को टाइटेनियम, निकेल एलॉय, एडवांस्ड मटेरियल और हाई प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग का अनुभव होना चाहिए। इसके साथ ही एयरोस्पेस क्वालिटी सिस्टम जैसे एएस9100 का पालन जरूरी होगा।
इस प्रोजेक्ट के तहत करीब 10 साल में 18 इंजन तैयार किए जाएंगे। जीटीआरई ने साफ बोल दिया है कि सातवें साल से इंजन की डिलीवरी शुरू होगी, जो 10वें साल तक 18 तक पहुंच जाएगी। शुरुआत में इंजन बनाने की रफ्तार धीमी रहेगी, ताकि क्वालिटी और भरोसे को मजबूत किया जा सके।
सरकार का इरादा सिर्फ प्रोटोटाइप तक सीमित नहीं है। भविष्य में करीब 200 इंजन बनाने का रास्ता भी इसी प्रोजेक्ट से खुलेगा। इसका मतलब है कि भारत में पहली बार एक पूरी मिलिट्री जेट इंजन प्रोडक्शन लाइन खड़ी हो सकती है। (Indigenous Jet Engine India)
क्यों बदल सकता है भारत का भविष्य
अगर यह प्रोजेक्ट अपने लक्ष्य तक पहुंचता है, तो भारत उन गिने-चुने देशों में शामिल हो जाएगा, जो अपने दम पर एडवांस्ड फाइटर जेट इंजन बना सकते हैं। इससे न सिर्फ रक्षा क्षेत्र मजबूत होगा, बल्कि एयरोस्पेस इंडस्ट्री को भी नई ऊंचाई मिलेगी। (Indigenous Jet Engine India)



