📍नई दिल्ली | 27 Jan, 2026, 3:20 PM
DRDO indigenous defence systems: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि ऑपरेशन सिंदूर ने साफ तौर पर यह साबित कर दिया है कि भारत के स्वदेशी रक्षा सिस्टम अब देश की ऑपरेशनल तैयारी को मजबूत कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भरता अब केवल एक सरकारी नीति नहीं रही, बल्कि यह देश की राष्ट्रीय सोच बन चुकी है।
डीआरडीओ के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले वैज्ञानिकों और तकनीकी कर्मचारियों को संबोधित करते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि यह बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आत्मनिर्भर भारत की दिशा में जो प्रयास किए गए हैं, उनका असर अब जमीन पर साफ दिखाई दे रहा है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान युद्ध क्षेत्र में डीआरडीओ की विकसित तकनीकों का प्रभावी इस्तेमाल हुआ और इससे भारतीय सशस्त्र बलों की ताकत और भरोसा दोनों बढ़े। (DRDO indigenous defence systems)
DRDO indigenous defence systems: युद्ध में काम आई स्वदेशी तकनीक
रक्षा मंत्री ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान यह साफ हुआ कि भारत अब केवल विदेश से खरीदे हथियारों पर निर्भर नहीं है। स्वदेशी हथियार प्रणालियां, सेंसर, मिसाइल, ड्रोन और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम्स ने भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना की तैयारी को और मजबूत किया। उन्होंने डीआरडीओ की तारीफ करते हुए कहा कि संगठन रक्षा क्षेत्र के तेजी से बदलते स्वरूप में अहम भूमिका निभा रहा है।
उन्होंने कहा कि आज के दौर में तकनीक बहुत तेजी से बदल रही है। जो तकनीक आज नई लगती है, वह चार-पांच साल में पुरानी हो सकती है। ऐसे में केवल सबसे ताकतवर बने रहना काफी नहीं है, बल्कि सबसे तेज सोचने और काम करने वाला देश ही आगे रहेगा। (DRDO indigenous defence systems)
‘सर्वाइवल ऑफ द फास्टेस्ट’ का दौर
राजनाथ सिंह ने वैज्ञानिकों से कहा कि आज के समय में हमें ‘सर्वाइवल ऑफ द फास्टेस्ट’ की सोच के साथ आगे बढ़ना होगा, न कि केवल ‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ पर निर्भर रहना होगा। उन्होंने कहा कि जो देश तेजी से सोचता है, जल्दी फैसले लेता है और नई तकनीक को तुरंत तैनात करता है, वही युद्ध और सुरक्षा के क्षेत्र में आगे रहता है।
उन्होंने डीआरडीओ के वैज्ञानिकों से अपील की कि वे इनोवेशन करें, तेजी से काम करें और जोखिम लेने से न डरें। रक्षा मंत्री ने कहा कि रिसर्च में असफलताएं आती हैं, लेकिन उनसे सीखना जरूरी है। (DRDO indigenous defence systems)
रिसर्च से तैनाती तक समय घटाने की जरूरत
रक्षा मंत्री ने इस बात पर खास जोर दिया कि रिसर्च से प्रोटोटाइप, प्रोटोटाइप से टेस्टिंग और टेस्टिंग से तैनाती के बीच लगने वाला समय कम किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सशस्त्र बलों में किसी भी सिस्टम की समय पर शामिल होना ही सबसे बड़ा पैमाना होना चाहिए।
राजनाथ सिंह ने कहा कि डीआरडीओ आमतौर पर डिजाइन और प्रोटोटाइप पर ध्यान देता है, जबकि उत्पादन का काम उद्योग करता है। लेकिन इस दोनों के बीच की दूरी को कम करना जरूरी है। उन्होंने सुझाव दिया कि अंतरराष्ट्रीय मॉडल की तरह को-डेवलपमेंट अप्रोच अपनाई जा सकती है, जिसमें इंडस्ट्री को शुरुआत से ही डिजाइन और विकास प्रक्रिया में शामिल किया जाए। (DRDO indigenous defence systems)
निजी क्षेत्र, स्टार्टअप और अकादमिक संस्थानों से साझेदारी
रक्षा मंत्री ने कहा कि अब समय आ गया है कि डीआरडीओ पारंपरिक क्षेत्रों से आगे बढ़े और पब्लिक सेक्टर, प्राइवेट सेक्टर, एमएसएमई, स्टार्टअप और अकादमिक संस्थानों के साथ मिलकर काम करे। उन्होंने कहा कि लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट तेजस इसका सबसे अच्छा उदाहरण है, जो डीआरडीओ और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के सहयोग से संभव हुआ।
उन्होंने कहा कि सरकार का समर्थन तभी सार्थक होगा, जब डीआरडीओ एकाधिकार वाले रिसर्च मॉडल से निकलकर सहयोग आधारित इकोसिस्टम की ओर बढ़े। इससे ही आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को हासिल किया जा सकेगा। (DRDO indigenous defence systems)
रक्षा निर्यात में रिकॉर्ड बढ़ोतरी
राजनाथ सिंह ने बताया कि आत्मनिर्भरता के प्रयासों के चलते भारत का रक्षा निर्यात पिछले एक दशक में तेजी से बढ़ा है। वर्ष 2014 में जहां रक्षा निर्यात 1,000 करोड़ रुपये से भी कम था, वहीं आज यह बढ़कर लगभग 24,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।
उन्होंने कहा कि सरकार ने 2029-30 तक 50,000 करोड़ रुपये के रक्षा निर्यात का लक्ष्य तय किया है। इसके लिए डीआरडीओ को डिजाइन के शुरुआती चरण से ही निर्यात बाजार को ध्यान में रखना होगा। खासकर ड्रोन, रडार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और गोला-बारूद जैसे क्षेत्रों में भारत के पास बड़ी संभावनाएं हैं।
रक्षा मंत्री ने कहा कि निर्यात पर ध्यान देने से लागत की भरपाई होती है, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भरोसा बढ़ता है और रणनीतिक साझेदारियां मजबूत होती हैं। (DRDO indigenous defence systems)
वैज्ञानिक ही डीआरडीओ की असली ताकत
राजनाथ सिंह ने डीआरडीओ के वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और तकनीशियनों को संगठन की असली ताकत बताया। उन्होंने कहा कि इन लोगों को सीखने के अवसर देने के साथ-साथ नेतृत्व की जिम्मेदारियां भी दी जानी चाहिए। साथ ही यह भरोसा भी होना चाहिए कि उनके विचारों को सुना जाएगा।
उन्होंने कहा कि रिसर्च में असफलता कोई अंत नहीं होती, बल्कि वह सीखने का मौका होती है। जरूरी यह है कि आगे बढ़ते रहें।
इस मौके पर डीआरडीओ ने अपने समर्पित वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों को सम्मानित किया। डॉ. भगवंतम टेक्नोलॉजी लीडरशिप अवॉर्ड 2024 हैदराबाद स्थित एडवांस्ड सिस्टम्स लैबोरेटरी के निदेशक बी. वी. पापाराव को दिया गया। उन्हें अग्नि मिसाइल और लंबी दूरी की हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल के लिए एमआईआरवी तकनीक के विकास में योगदान के लिए सम्मानित किया गया। (DRDO indigenous defence systems)
डॉ. नागचौधुरी लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड 2024 चेन्नई स्थित सीवीआरडीई के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. बालगुरु वी को दिया गया। उन्होंने एमबीटी अर्जुन एमके-1 और भारतीय लाइट टैंक ‘जोरावर’ जैसे अहम प्लेटफॉर्म को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इसके अलावा, तीन सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक उत्कृष्टता पुरस्कार और दो सर्वश्रेष्ठ तकनीकी उत्कृष्टता पुरस्कार भी प्रदान किए गए।

आकाश मिसाइल पर किताब का विमोचन
कार्यक्रम के दौरान ‘आकाश’ मिसाइल सिस्टम पर आधारित एक किताब का भी विमोचन किया गया। यह किताब आकाश मिसाइल के पहले प्रोजेक्ट डायरेक्टर डॉ. प्रह्लाद राम राव और पूर्व प्रोजेक्ट डायरेक्टर डॉ. जी. चंद्रमौली ने मिलकर लिखी है। यह किताब आकाश मिसाइल की यात्रा को अवधारणा से लेकर सफल तैनाती तक विस्तार से बताती है।
आकाश मिसाइल सिस्टम डीआरडीओ की वैज्ञानिक क्षमता और आत्मनिर्भर भारत की भावना का मजबूत प्रतीक माना जाता है। (DRDO indigenous defence systems)


