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IOL-SAFRAN Deal: भारत में बनेंगे अब आर्टिलरी और मिसाइलों के हाई-प्रिसिजन सिस्टम, मेक-इन-इंडिया को नई रफ्तार

सिग्मा 30एन अभी कई देशों की सेनाओं में इस्तेमाल किया जा रहा है और इसकी विश्वसनीयता भी साबित हो चुकी है। भारत में भी पिनाका जैसे सिस्टम्स में इसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल हो रहा है...

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📍नई दिल्ली | 22 Dec, 2025, 5:39 PM

IOL-SAFRAN Deal: भारत में रक्षा उपकरणों का घरेलू उत्पादन बढ़ाने और बाहरी देशों पर से निर्भरता घटाने के लिए इंडिया ऑप्टेल लिमिटेड (आईओएल) ने फ्रांस की सफ्रान इलेक्ट्रॉनिक्स एंड डिफेंस के साथ समझौता किया है। इस साझेदारी के तहत, भारत में दो ऐसे हाई-प्रिसिजन डिफेंस सिस्टम तैयार होंगे। भारतीय सेना इनका इस्तेमाल अपनी आर्टिलरी, एयर डिफेंस और मिसाइल प्लेटफॉर्म्स में करेगी।

22 दिसंबर को आईओएल के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर तुषार त्रिपाठी और साफरान के ग्लोबल डिफेंस बिजनेस यूनिट के प्रमुख अलेक्जांद्र जीगलर ने इस पर दस्तखत किए। डिफेंस प्रोडक्शन सेक्रेटरी संजीव कुमार भी मौके पर मौजूद थे। दरअसल, ये जनवरी 2024 में हुए एमओयू का अगला कदम है जिसके तहत अब सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि प्रोडक्शन का ट्रांसफर भी इसमें शामिल है। (IOL-SAFRAN Deal)

IOL-SAFRAN Deal: सिग्मा 30एन डिजिटल रिंग लेजर जायरो इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम

इस साझेदारी के तहत जो दो सिस्टम भारत में बनने जा रहे हैं, वे भारतीय सेना के लिए काफी अहम हैं। पहला है सिग्मा 30एन डिजिटल रिंग लेजर जायरो इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम। यह बेहद सटीक नेविगेशन सिस्टम है। इसे आर्टिलरी गंस, एयर डिफेंस सिस्टम, मिसाइल और रडार में इस्तेमाल किया जाता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे जीपीएस की जरूरत नहीं पड़ती। यानी अगर जंग के वक्त दुश्मन ने जीपीएस सिग्नल जाम कर दिया, तब भी ये सिस्टम गन या मिसाइल को एकदम सही दिशा और पोजिशन की जानकारी देता है। (IOL-SAFRAN Deal)

सिग्मा 30एन अभी कई देशों की सेनाओं में इस्तेमाल किया जा रहा है और इसकी विश्वसनीयता भी साबित हो चुकी है। भारत में भी पिनाका जैसे सिस्टम्स में इसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल हो रहा है।

दूसरा सिस्टम है सीएम3-एमआर डायरेक्ट फायरिंग साइट। यह एक मॉडर्न साइटिंग सिस्टम है, जिसमें डे कैमरा, थर्मल इमेजिंग और लेजर रेंज फाइंडर मिलते हैं। इसका इस्तेमाल आर्टिलरी गनों की डायरेक्ट फायरिंग और एंटी-ड्रोन सिस्टम्स में होता है। ड्रोन से बढ़ते खतरे के दौर में यह सिस्टम और भी जरूरी हो जाता है। यह साइट हल्की है, मजबूत है, और झटकों में भी टारगेट को स्टेबल रखती है यानी फायरिंग के वक्त सटीकता बनी रहती है। (IOL-SAFRAN Deal)

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इस पूरी डील में आईओएल का रोल काफी बड़ा है। कंपनी भारत में ही इन दोनों सिस्टम्स का निर्माण, फाइनल असेंबली, टेस्टिंग, क्वालिटी कंट्रोल और लाइफ-साइकिल सपोर्ट देखेगी। अब सेना को इन सिस्टम्स के लिए विदेश के भरोसे नहीं बैठना पड़ेगा।

IOL-SAFRAN Deal: डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम होगा और मजबूत 

आईओएल पहले से ही ऑप्टो-इलेक्ट्रॉनिक्स की फील्ड में काम कर रही है। कंपनी नाइट विजन डिवाइस, साइट्स और दूसरे एडवांस इक्विपमेंट्स बनाती है। अब इसमें साफरान की एडवांस टेक्नोलॉजी जुड़ जाएगी और आईओएल की इंडस्ट्रियल ताकत भी, जिससे भारत का डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम और मजबूत होगा। साथ में देश में रोजगार भी बढ़ेगा और भारतीय कंपनियों को हाई-टेक डिफेंस प्रोडक्शन का तजुर्बा भी मिलेगा। (IOL-SAFRAN Deal)

इस समझौते का स्ट्रैटेजिक इम्पोर्टेंस भी है। आज के दौर में फौज के लिए आर्टिलरी और एयर डिफेंस सिस्टम्स में सटीकता और रफ्तार सबसे जरूरी चीजें हैं। सिग्मा 30एन जैसे नेविगेशन सिस्टम और सीएम3-एमआर जैसी फायरिंग साइट्स भारतीय सेना की ताकत को मजबूती, खासतौर पर जब सीमाओं पर तनाव हो और नई-नई टेक्नोलॉजी की डिमांड लगातार बढ़ती जा रही हो। (IOL-SAFRAN Deal)

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