📍नई दिल्ली | 26 Mar, 2026, 7:35 PM
Military Drone Security Framework: भारतीय रक्षा मंत्रालय ने सेना में इस्तेमाल होने वाले ड्रोन को लेकर बड़ा और सख्त फैसला लिया है। अब कोई भी ड्रोन सीधे सेना में शामिल नहीं होगा। अब भारतीय सेनाओं के लिए खरीदे जाने वाले हर ड्रोन को 20 पॉइंट सिक्योरिटी टेस्ट पास करना जरूरी होगा। यह कदम खास तौर पर उस खतरे को देखते हुए उठाया गया है, जिसमें “मेड इन इंडिया” के नाम पर इस्तेमाल हो रहे ड्रोन के अंदर चीनी हार्डवेयर या सॉफ्टवेयर पाए गए हैं।
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब सेना के भीतर यह चिंता बढ़ रही थी कि कुछ ड्रोन दिखने में भारतीय हैं, लेकिन उनके अंदर लगे अहम कंपोनेंट्स विदेशी हो सकते हैं, जो सुरक्षा के लिए खतरा बन सकते हैं।
Military Drone Security Framework: नया ड्रोन सिक्योरिटी फ्रेमवर्क तैयार
रक्षा मंत्रालय ने एक नया सिक्योरिटी फ्रेमवर्क तैयार किया है, जिसके तहत हर ड्रोन को खरीद से पहले सख्त जांच से गुजरना होगा। यह फ्रेमवर्क सेना, नौसेना और वायुसेना के साथ मिलकर तैयार किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी ड्रोन सिस्टम बिना पूरी जांच के सेना में शामिल न हो।
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इस नई व्यवस्था में ड्रोन को सिर्फ उड़ान क्षमता के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी साइबर सुरक्षा, डेटा सुरक्षा और कंट्रोल सिस्टम की मजबूती के आधार पर भी जांचा जाएगा। (Military Drone Security Framework)
चीन से जुड़ा है खतरा
भारतीय एजेंसियों को यह इनपुट मिल रहे थे कि कई ड्रोन में ऐसे पार्ट्स लगे हैं जो चीन में बने हैं। यह हार्डवेयर या फर्मवेयर के जरिए ड्रोन की गतिविधियों पर नजर रख सकते हैं या उसे कंट्रोल भी कर सकते हैं।
इसका खतरा सिर्फ जासूसी तक सीमित नहीं है। अगर किसी ड्रोन का कंट्रोल बाहर से लिया जा सके, तो वह मिशन के दौरान गलत दिशा में जा सकता है या संवेदनशील जानकारी बाहर भेज सकता है। इसी वजह से अब हर ड्रोन को पूरी तरह जांचने का फैसला लिया गया है। (Military Drone Security Framework)
सीमा पर हुई घटना ने बढ़ाई चिंता
पिछले साल एक घटना ने इस खतरे को और गंभीर बना दिया। पूर्वी सेक्टर में चीन सीमा के पास उड़ रहा एक भारतीय ड्रोन अचानक अपनी दिशा से भटक गया और चीन के नियंत्रण वाले इलाके में पहुंच गया। रिपोर्ट के मुताबिक, चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने उस ड्रोन का कंट्रोल अपने हाथ में ले लिया। कुछ समय तक उसे ऑपरेट करने के बाद उन्होंने उसे वापस लौटा दिया। यह ड्रोन इजरायली तकनीक पर बेस्ड था और इसमें एन्क्रिप्टेड डेटा लिंक भी था, इसके बावजूद उसका कंट्रोल छिन जाना सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील था।
सात बड़े खतरों की हुई पहचान
नए फ्रेमवर्क में ड्रोन से जुड़े सात प्रमुख खतरों की पहचान की गई है। इसमें ड्रोन और ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन के बीच कम्युनिकेशन लिंक को इंटरसेप्ट करना, जीपीएस जैमिंग या स्पूफिंग, फर्मवेयर के जरिए कंट्रोल हासिल करना, डेटा चोरी, इंटरनेट के जरिए डेटा बाहर भेजना, बाहर से भेजे गए मैलिशियस अपडेट और नेटवर्क से जुड़े डिवाइसेस के जरिए अतिरिक्त डेटा कलेक्शन शामिल हैं। इन सभी खतरों को ध्यान में रखते हुए टेस्टिंग सिस्टम तैयार किया गया है, ताकि ड्रोन के हर हिस्से को अलग-अलग स्तर पर जांचा जा सके। (Military Drone Security Framework)
कैसे काम करेगा 20 पॉइंट टेस्ट सिस्टम
रक्षा मंत्रालय ने जो नया सिस्टम बनाया है, उसमें कुल 20 टेस्ट होंगे। इनमें 10 हार्डवेयर से जुड़े होंगे और 10 सॉफ्टवेयर से। हार्डवेयर टेस्ट में ड्रोन के अंदर लगे इंटीग्रेटेड सर्किट की जांच की जाएगी। यह देखा जाएगा कि कहीं उनमें छेड़छाड़ तो नहीं हुई है। इसके अलावा सिक्योर बूट सिस्टम, प्रिंटेड सर्किट बोर्ड की परतों की जांच और अलग-अलग हिस्सों के बीच होने वाले कम्युनिकेशन की सिक्योरिटी भी चेक की जाएगी।
वहीं सॉफ्टवेयर टेस्ट में यह देखा जाएगा कि ड्रोन में इस्तेमाल हो रहे क्रिप्टोग्राफिक-की कितनी सुरक्षित हैं। ऑपरेटिंग सिस्टम की मेमोरी प्रोटेक्शन, डेटा ट्रांसफर के दौरान सिक्योरिटी और फर्मवेयर को बिना अनुमति बदले जाने से रोकने की क्षमता की भी जांच होगी। साथ ही यह देखा जाएगा कि ड्रोन का ऑपरेटिंग सिस्टम, डेटा ट्रांसफर और कंट्रोल सिस्टम सुरक्षित है या नहीं। इसमें यह भी जांचा जाएगा कि कहीं ड्रोन को दूर से हैक करके कंट्रोल तो नहीं किया जा सकता।
आठ अहम हिस्सों पर खास नजर
ड्रोन के आठ हिस्सों को सबसे ज्यादा संवेदनशील माना गया है। इनमें इलेक्ट्रॉनिक स्पीड कंट्रोलर, फ्लाइट कंट्रोलर, उसका फर्मवेयर, ट्रांसमिशन यूनिट, आईएनएस और जीपीएस मॉड्यूल, सेंसर, ग्राउंड डेटा टर्मिनल और ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन का सॉफ्टवेयर शामिल हैं। इन हिस्सों में अगर कोई भी कमजोरी होती है, तो पूरा सिस्टम खतरे में आ सकता है। इसलिए इन पर सबसे ज्यादा सख्ती रखी गई है। (Military Drone Security Framework)
किन ड्रोन पर लागू होंगे नियम
अभी यह नियम छोटे और हल्के ड्रोन पर लागू किया गया है, जिन्हें लो, स्लो और स्मॉल कैटेगरी में रखा जाता है। इसमें नैनो, माइक्रो और छोटे क्वाडकॉप्टर और हेक्साकॉप्टर जैसे ड्रोन शामिल हैं। ये वही ड्रोन हैं, जो सेना में निगरानी, टोही और सीमित ऑपरेशन के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल होते हैं। इन्हीं में सबसे ज्यादा सुरक्षा खतरे भी सामने आए हैं।
टेस्टिंग कहां और कैसे होगी
ड्रोन की जांच भारत में ही होगी। इसके लिए सिर्फ उन्हीं लैब को अनुमति दी जाएगी, जो एनएबीएल से मान्यता प्राप्त हों या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता हासिल कर चुकी हों। फिलहाल क्वालिटी काउंसिल ऑफ इंडिया ही एक ऐसी संस्था है, जो पूरी टेस्टिंग प्रक्रिया को संभाल सकती है। इसके अलावा डायरेक्टरेट जनरल ऑफ क्वालिटी एश्योरेंस सिकंदराबाद में एक नई टेस्टिंग सुविधा तैयार कर रहा है। (Military Drone Security Framework)
गलत जानकारी देने पर सख्त कार्रवाई
अगर कोई कंपनी अपने ड्रोन के पार्ट्स या सॉफ्टवेयर के बारे में गलत जानकारी देती है, तो उसके खिलाफ तुरंत कार्रवाई होगी। ऐसे विक्रेताओं को सीधे सस्पेंड किया जा सकता है या भविष्य के कॉन्ट्रैक्ट से बाहर किया जा सकता है और ब्लैकलिस्ट भी किया जा सकता है।
रक्षा उत्पादन विभाग एक सेंट्रल डेटाबेस भी बनाएगा, जिसमें उन कंपनियों और ड्रोन मॉडल्स की जानकारी होगी जो सभी टेस्ट पास कर चुके हैं। एक बार मंजूरी मिलने के बाद उसी मॉडल को दोबारा टेस्ट की जरूरत नहीं होगी, जब तक उसमें कोई बदलाव न किया जाए।
इसके अलावा ड्रोन को सेना में शामिल करने के बाद भी उसकी निगरानी जारी रहेगी। समय-समय पर उसके सॉफ्टवेयर अपडेट और सुरक्षा जांच की जाएगी। अगर किसी ड्रोन में बाद में कोई कमजोरी पाई जाती है, तो उसे तुरंत ठीक किया जाएगा या सिस्टम से हटाया जा सकता है। (Military Drone Security Framework)
बनी हुई है सप्लाई चेन की चुनौती
हालांकि यह नया फ्रेमवर्क काफी सख्त है, लेकिन एक बड़ी चुनौती अभी भी बनी हुई है। भारत में चिप स्तर पर पूरी तरह स्वदेशी निर्माण अभी शुरुआती चरण में है। पहले एक सॉफ्टवेयर सिस्टम के जरिए हार्डवेयर के सोर्स को ट्रैक किया जाता था, लेकिन नवंबर 2024 में उसे बंद कर दिया गया। इसके बाद सप्लाई चेन की पूरी ट्रेसबिलिटी अभी भी एक अधूरी कड़ी बनी हुई है। इस वजह से यह सुनिश्चित करना मुश्किल होता है कि हर पार्ट पूरी तरह सुरक्षित है या नहीं। इसलिए फिलहाल टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। (Military Drone Security Framework)


