📍नई दिल्ली | 9 Feb, 2026, 11:12 PM
Indigenous Jet Engine India: भारत में पहली बार स्वदेशी फाइटर जेट AMCA के लिए स्वदेशी जेट इंजन बनाने की तैयारियां शुरू कर दी हैं। डीआरडीओ के तहत काम करने वाली बेंगलुरु स्थित गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट यानी जीटीआरई ने इंडिजिनस एयरो गैस टरबाइन इंजन कंपोनेंट्स के निर्माण को लेकर इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने के लिए रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन याानी आरएफआई जारी की है।
इसका मकसद भविष्य के फाइटर जेट, खासकर एएमसीए के लिए लगभग 120 किलो न्यूटन थ्रस्ट क्लास का स्वदेशी टर्बोफैन इंजन डेवलप करना है। (Indigenous Jet Engine India)
Indigenous Jet Engine India: क्यों जरूरी है यह कदम
भारत अभी तक अपने फाइटर जेट इंजन के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहा है। इंजन किसी भी लड़ाकू विमान का दिल होता है। अगर इंजन विदेश से आता है तो सप्लाई, अपग्रेड और मैंटेनेस के मामले में कई तरह की सीमाएं खड़ी हो सकती हैं। कावेरी इंजन प्रोग्राम से अनुभव मिला कि केवल रिसर्च काफी नहीं है, बल्कि मजबूत मैन्युफैक्चरिंग ढांचा भी उतना ही जरूरी है।
इसी अनुभव से सीखते हुए जीटीआरई अब इंजन के क्रिटिकल कंपोनेंट्स जैसे कंप्रेसर, टरबाइन, कंबस्टर, आफ्टरबर्नर और हाई टेम्परेचर मटेरियल्स के निर्माण के लिए देश में अत्याधुनिक उत्पादन क्षमता विकसित करना चाहता है। (Indigenous Jet Engine India)
क्या है आरएफआई का मकसद
फरवरी में जारी आरएफआई का मुख्य उद्देश्य यह जानना है कि कौन सी भारतीय या विदेशी ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर कंपनियां भारत में इंजन कंपोनेंट्स के निर्माण के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा कर सकती हैं।
यह आरएफआई कोई सीधा टेंडर नहीं है, बल्कि सूचना जुटाने की प्रक्रिया है। इसमें इच्छुक कंपनियों से उनकी तकनीकी क्षमता, अनुभव, मशीनिंग सुविधाएं, हाई प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग और क्वालिटी सिस्टम के बारे में जानकारी मांगी गई है। जो कंपनियां इसमें शामिल होना चाहती हैं, उन्हें पहले नॉन डिस्क्लोजर एग्रीमेंट पर दस्तखत करने होंगे। उसके बाद विस्तृत दस्तावेज साझा किए जाएंगे।
सबमिशन की अंतिम तारीख 23 अप्रैल तय की गई है। जीटीआरई स्पष्ट कर चुका है कि इस प्रक्रिया का मकसद लंबी अवधि के लिए डिजाइन के साथ-साथ पूरा स्वदेशी इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम तैयार करना है। (Indigenous Jet Engine India)
ईओआई के जरिए पार्टनर की तलाश
आरएफआई से पहले जीटीआरई ने इसी साल जनवरी में ईओआई जारी की थी। इसका उद्देश्य एक डेवलपमेंट-कम-प्रोडक्शन पार्टनर चुनना है। यानी ऐसी भारतीय कंपनी जो इंजन के डिजाइन को वास्तविक उत्पादन, असेंबली, टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन तक ले जा सके।
इस प्रोग्राम के तहत अगले लगभग दस सालों में 18 प्रोटोटाइप और प्री-प्रोडक्शन इंजन डेवलप किए जाने हैं। सातवें साल से इंजन की डिलीवरी शुरू होगी और दसवें साल तक यह संख्या 18 तक पहुंच जाएगी। आगे चलकर 200 से ज्यादा इंजनों के सीरियल प्रोडक्शन का रास्ता भी इसी आधार पर खुलेगा।
वहीं इस पूरे प्रोजेक्ट में डिजाइन अथॉरिटी बना रहेगा। इसका मतलब है कि तकनीकी नियंत्रण और बौद्धिक संपदा अधिकार भारत सरकार के पास रहेंगे। चुनी गई कंपनी उत्पादन और इंडस्ट्रियल एग्जिक्यूशन की जिम्मेदारी निभाएगी। (Indigenous Jet Engine India)
कैसा होगा यह इंजन
यह एक मॉडर्न टर्बोफैन जेट इंजन होगा। इसमें लो प्रेशर कंप्रेसर, हाई प्रेशर कंप्रेसर, कंबस्टर, हाई और लो प्रेशर टरबाइन, आफ्टरबर्नर और एडवांस्ड एग्जॉस्ट सिस्टम शामिल होंगे। इंजन में फुल अथॉरिटी डिजिटल इंजन कंट्रोल यानी फाडेक सिस्टम होगा, जो पूरी तरह डिजिटल कंट्रोल देगा।
इंजन का थ्रस्ट-टू-वेट रेशियो लगभग 10:1 रखने का टारगेट है। इसका मतलब है कि इंजन हल्का होते हुए भी ज्यादा ताकत देगा। इसमें सुपरक्रूज क्षमता होगी, यानी फाइटर जेट बिना आफ्टरबर्नर के भी सुपरसोनिक गति से उड़ सकेगा। इंफ्रारेड सिग्नेचर कम रखने की कोशिश की जाएगी ताकि दुश्मन के सेंसर से बचाव हो सके। (Indigenous Jet Engine India)
किन कंपनियों की हो सकती है भूमिका
हालांकि अभी आधिकारिक तौर पर यह घोषित नहीं किया गया है कि कौन सी कंपनी अंतिम रूप से चुनी जाएगी। लेकिन इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट में देश की कई बड़ी कंपनियों की संभावित भूमिका देखी जा रही है। एचएएल पहले से ही एयरोस्पेस निर्माण में अग्रणी है और असेंबली तथा इंटीग्रेशन में उसकी मजबूत पकड़ है। वहीं भारत फोर्ज लिमिटेड हाई स्ट्रेंथ फोर्जिंग और टरबाइन ब्लेड निर्माण में विशेषज्ञता रखती है। लार्सन एंड टूब्रो जटिल डिफेंस सिस्टम और सब-सिस्टम इंटीग्रेशन में अनुभवी है। (Indigenous Jet Engine India)
इसी तरह पीटीसी इंडस्ट्रीज हाई प्रिसिजन कास्टिंग में जानी जाती है और मिश्र धातु निगम लिमिटेड हाई टेम्परेचर अलॉय और विशेष धातुओं के उत्पादन में अग्रणी है। इंजन के लिए निकेल बेस्ड सुपर अलॉय, टाइटेनियम और सिंगल क्रिस्टल ब्लेड जैसे उन्नत मटेरियल्स की जरूरत होगी, जहां मिधानी की भूमिका अहम हो सकती है।
जीटीआरई ने साफ कर दिया है कि यह प्रोजेक्ट किसी आम कंपनी के बस का नहीं है। इच्छुक कंपनी के पास कम से कम 1500 करोड़ रुपये का टर्नओवर, मजबूत वित्तीय स्थिति, एयरोस्पेस क्वालिटी सिस्टम जैसे एएस9100 का अनुपालन और हाई प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग का अनुभव होना जरूरी है।
साथ ही एयरवर्थिनेस एजेंसियों के साथ समन्वय, सर्टिफिकेशन प्रक्रिया और लाइफ साइकिल सपोर्ट की क्षमता भी जरूरी होगी। (Indigenous Jet Engine India)
बदल सकती है तस्वीर
अगर यह प्रोग्राम अपने लक्ष्य तक पहुंचता है, तो भारत उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल हो जाएगा जो खुद का एडवांस्ड फाइटर जेट इंजन डिजाइन और बना सकते हैं। इससे न केवल रक्षा आत्मनिर्भरता बढ़ेगी, बल्कि देश में हाई टेक मैन्युफैक्चरिंग, मटेरियल साइंस और एयरोस्पेस इंडस्ट्री को नई दिशा मिलेगी। (Indigenous Jet Engine India)

