📍नई दिल्ली | 5 Oct, 2025, 12:22 PM
Missile Production to private sector: भारत सरकार ने चीन-पाकिस्तान की दोहरी चुनौती को देखते हुए बड़ा फैसला लिया है। लंबे समय तक चलने वाले युद्ध की स्थिति में सेना के पास हथियारों की कमी न हो, इसके लिए सरकार ने मिसाइल और गोला-बारूद के उत्पादन को निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया है। रक्षा मंत्रालय के इस फैसले को ‘आत्मनिर्भरता’ की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। इस कदम से न केवल देश की उत्पादन क्षमता में इजाफा होगा बल्कि विदेशी निर्भरता भी कम होगी।
Missile Production to private sector
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब हाल में हुए ऑपरेशन सिंदूर ने यह साबित किया कि भविष्य के युद्ध पारंपरिक तरीकों की बजाय स्टैंड-ऑफ वेपन्स और लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों से लड़े जाएंगे। इस ऑपरेशन में पाकिस्तान ने चीन निर्मित लॉन्ग रेंज एयर-टू-एयर और एयर-टू-सरफेस मिसाइलों का इस्तेमाल किया था, जिसके बाद भारत ने अपनी मिसाइल निर्माण नीति में अहम बदलाव करने का निर्णय लिया।
अब निजी कंपनियां बनाएंगी मिसाइल और गोला-बारूद
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, रक्षा मंत्रालय ने रेवेन्यू प्रोक्योमेंट मैनुअल में संशोधन किया है। पहले किसी भी निजी कंपनी को बम और गोला-बारूद निर्माण इकाई लगाने के लिए म्यूनिशन्स इंडिया लिमिटेड से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेना जरूरी था। लेकिन अब इस अनिवार्यता को हटा दिया गया है।
इसका मतलब है कि अब निजी कंपनियां 105 मिमी, 130 मिमी, 150 मिमी आर्टिलरी शेल्स, पिनाका मिसाइल, 1000 पाउंड बम, मोर्टार बम, हैंड ग्रेनेड और छोटे व मध्यम कैलिबर की गोलियां और हथियार बना सकेंगी। इसके अलावा, रक्षा मंत्रालय ने डीआरडीओ को भी पत्र लिखकर यह बताया है कि मिसाइल विकास और Missile Production to private sector इंटीग्रेशन में निजी कंपनियों को शामिल करने का निर्णय लिया गया है।
बीडीएल और बीईएल तक सीमित नहीं रहेगा उत्पादन
अब तक भारत में मिसाइलों का निर्माण मुख्य रूप से भारत डायनेमिक्स लिमिटेड और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड जैसी सरकारी कंपनियों तक सीमित था। ये दोनों कंपनियां डीआरडीओ के तहत काम करती हैं और आकाश, एस्ट्रा, कॉन्कर्स, मिलन जैसी सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें और टॉरपीडो बनाती हैं।
लेकिन सशस्त्र बलों की जरूरतें अब इतनी बड़ी हो गई हैं कि केवल इन कंपनियों से मांग पूरी नहीं हो सकती। इसीलिए, रक्षा मंत्रालय ने पारंपरिक मिसाइलों के विकास में निजी क्षेत्र को लाने का फैसला किया है, जबकि सामरिक मिसाइलों का विकास डीआरडीओ के अधीन ही रहेगा।
ऑपरेशन सिंदूर से मिली सीख
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने चीन से मिली लॉन्ग रेंज मिसाइलों और रॉकेट्स का इस्तेमाल किया। वहीं, भारत ने भी अपने आधुनिक एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम का इस्तेमाल कर पाकिस्तान के एक अवाक्स एयरक्राफ्ट (संभावित रूप से SAAB AEW या Dassault DAC-20 ELINT) को पंजाब प्रांत में 314 किलोमीटर अंदर गिराया। यह कार्रवाई 10 मई की सुबह हुई जिसने दिखाया कि भारत के पास लंबी दूरी तक मार करने की क्षमता है।
वहीं, रूस-यूक्रेन युद्ध और मिडल ईस्ट में संघर्ष के कारण हथियारों और गोला-बारूद की अंतरराष्ट्रीय मांग बहुत बढ़ गई है। ऐसे में भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि लंबी अवधि तक चले किसी संघर्ष के दौरान उसे विदेशी कंपनियों से महंगे दामों पर आपातकालीन खरीदारी न करनी पड़े।
रक्षा मंत्रालय के इस Missile Production to private sector फैसले से घरेलू रक्षा उद्योग को बड़ा प्रोत्साहन मिलेगा। निजी कंपनियों के आने से उत्पादन क्षमता बढ़ेगी, और भारतीय सशस्त्र बलों को समय पर और पर्याप्त मात्रा में गोला-बारूद उपलब्ध कराया जा सकेगा।
सरकार का मानना है कि भविष्य के युद्ध ब्रह्मोस, निर्भय, प्रलय और शौर्य जैसी मिसाइलों पर निर्भर होंगे, क्योंकि अब लड़ाकू विमानों का युग खत्म हो रहा है और ओवर-द-होराइजन मिसाइलों व एयर डिफेंस सिस्टम का युग शुरू हो चुका है।
यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब भारत को पश्चिम में पाकिस्तान और उत्तर में चीन से दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। पाकिस्तान को चीन से लगातार हथियारों की सप्लाई होती रहती है। इसलिए भारत को अपने मिसाइल स्टोरेज को मजबूत करना और उत्पादन क्षमता को घरेलू स्तर पर बढ़ाना रणनीतिक तौर पर जरूरी हो गया है।


