INS Mahe Delivery: कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड ने भारतीय नौसेना को अपनी पहली एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट ‘माहे’ (INS Mahe) सौंप दी है। यह आठ क्राफ्ट सीरीज की पहली यूनिट है जिसे कोचीन शिपयार्ड बना रहा है। वहीं इसकी कमीशनिंग नवंबर के आखिर तक की जाएगी।
‘माहे’ का नाम केंद्र शासित प्रदेश पुदुच्चेरी के ऐतिहासिक बंदरगाह माहे के नाम पर रखा गया है। माहे पूरी तरह से स्वदेशी डिजाइन और तकनीक से बनी है जो भारत की आत्मनिर्भरता की दिशा में एक और बड़ा कदम है।
‘माहे’ की लंबाई लगभग 78 मीटर और वजन करीब 1,100 टन है। इसे तटीय इलाकों में पनडुब्बियों की निगरानी और उन्हें नष्ट करने के लिए तैयार किया गया है। यह जहाज समुद्र में कम गहराई वाले क्षेत्रों में एंटी-सबमरीन वॉरफेयर मिशन को अंजाम देगा। इसके साथ ही यह लो इंटेंसिटी मैरीटाइम आपरेशंस (लिमो) और माइन बिछाने जैसे अभियानों में भी इस्तेमाल की जा सकती है।
इसमें एडवांस सोनार और रडार सिस्टम, हल्के टॉरपीडो, और मल्टी-फंक्शनल एंटी-सबमरीन रॉकेट्स लगे हैं। यह क्राफ्ट समुद्री निगरानी और तटीय सुरक्षा को मजबूत करेगी। यह पुराने अभय-क्लास कोरवेट्स की जगह लेगी। यह भारतीय नौसेना का ऐसा सबसे बड़ा शिप है। इसका साउंड सिग्नेचर भी कम होगा और यह पनडुब्बियों को आसानी से चकमा देगी। इस शिप को डेट नॉर्स्के वेरिटास नियमों के अनुसार बनाया गया है।
‘माहे’ के निर्माण में 80 फीसदी से अधिक स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है, जो भारत सरकार के ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान का हिस्सा। इस प्रोजेक्ट को रक्षा मंत्रालय की डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल ने 2013 में मंजूरी दी थी। इसके तहत कुल 16 नावों का निर्माण किया जाना है, जिनमें से 8 कोचीन शिपयार्ड और बाकी 8 गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स कोलकाता बना रहा है। कोचिन शिपयार्ड (सीएसएल) के बनाए शिप्स की डिलीवरी जून 2028 तक चलेगी।
⚓️ India’s Maritime Might: ‘Mahe’ Delivered to Indian Navy! 🇮🇳
A major boost for our naval power and the #AatmanirbharBharat mission!
‘Mahe,’ the first of eight Anti-Submarine Warfare Shallow Water Crafts (ASW SWC), was delivered to the Indian Navy by Cochin Shipyard Limited… pic.twitter.com/mjasCdUTbl
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) October 24, 2025
भारतीय नौसेना के पास फिलहाल दो एंटी-सबमरीन शैलो वॉटर क्राफ्ट (एएसडब्ल्यू-एसडब्ल्यूसी) कमीशन हो चुकी हैं। ये नावें तटीय इलाकों में पनडुब्बी रोधी अभियानों के लिए डिजाइन की गई हैं। ये दोनों नावें गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई) ने बनाई हैं। पहली नाव आईएनएस अर्नाला को 18 जून 2025 को कमीशन किया गया। जबकि दूसरे शिप ‘अंद्रोथ’ पहले ही 13 सितंबर को डिलीवर किया जा चुका है। जिसकी कमीशनिंग 6 अक्टूबर को विशाखापत्तनम में हुई थी।
‘माहे’ की डिलीवरी कोच्चि में एक विशेष समारोह में हुई। इस अवसर पर कमांडर अमित चंद्र चौबे, जो ‘माहे’ के कमांडिंग ऑफिसर हैं, और एस. हरिकृष्णन, डायरेक्टर (ऑपरेशंस), कोचिन शिपयार्ड ने औपचारिक दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए। इस मौके पर रियर एडमिरल आर.के. पांडे और नौसेना के अन्य वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे। उन्होंने कहा कि यह जहाज भारत की नौसैनिक क्षमता में नई ताकत जोड़ेगा।
इन शैलो वॉटर क्राफ्ट्स के आने से नौसेना को उन इलाकों में दुश्मन की पनडुब्बियों की खोज और निगरानी में मदद मिलेगी, जहां बड़े जहाज जैसे डिस्ट्रॉयर और फ्रिगेट्स वहां मुश्किल से जाते हैं। इससे भारत की तटीय रक्षा और समुद्री सीमा की सुरक्षा और अधिक मजबूत होगी।
BrahMos Missile Export: भारत अपनी सबसे ताकतवर ब्रह्मोस सुपरसॉनिक क्रूज मिसाइल को दो आसियान देशों को बेचने की तैयारी कर रहा है। दक्षिण-पूर्व एशिया के दो और देशों, वियतनाम और इंडोनेशिया के साथ कुल 455 मिलियन अमेरिकी डॉलर (करीब 3,800 करोड़ रुपये) के दो बड़े सौदों पर इस साल दिसंबर तक दस्तखत होने की उम्मीद है। रक्षा और सुरक्षा के वरिष्ठ अधिकारियों ने इसकी पुष्टि की है।
यह भारत के रक्षा निर्यात इतिहास के सबसे बड़े सौदों में से एक होगा। इससे न केवल भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ को मजबूती मिलेगी, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की रणनीतिक मौजूदगी भी और मजबूत होगी।
ब्रह्मोस मिसाइल को भारत के डीआरडीओ और रूस की एनपीओ माशिनोस्ट्रोयेनिया के संयुक्त सहयोग के साथ डेवलप किया था। यह मिसाइल मैक 3 की रफ्तार से उड़ान भर सकती है और 400 किलोमीटर से अधिक दूरी पर भी सटीक निशाना साध सकती है। इसे जमीन, समुद्र और हवा तीनों प्लेटफॉर्म से दागा जा सकता है।
फिलीपींस के साथ 2022 में हुआ सौदा सफल रहा था। भारत ने फिलिपींस को 375 मिलियन डॉलर की डील के तहत ब्रह्मोस का कोस्टल डिफेंस सिस्टम दिया था। जिसके बाद आसियान देशों का भारत पर भरोसा और बढ़ा है। फिलिपींस में ब्रह्मोस की सफलता के बाद अब वियतनाम और इंडोनेशिया भी इसे अपने नेवल एंड कोस्टल सिक्युरिटी सिस्टम्स का हिस्सा बनाना चाहते हैं। रक्षा सूत्रों के अनुसार, दोनों देशों के साथ बातचीत अंतिम चरण में है और कॉन्ट्रैक्ट दिसंबर तक साइन हो जाएंगे।
BrahMos Missile Export: आसियान देशों में क्यों बढ़ रही है ब्रह्मोस की मांग
दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देश इन दिनों में समुद्री विवादों और सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। चीन के बढ़ते प्रभाव और समुद्री दावों के बीच इन देशों को एक ऐसी मिसाइल सिस्टम की जरूरत थी जो तेज, भरोसेमंद और सटीक हो। ब्रह्मोस इस जरूरत को हर तरह से पूरा करती है।
यह मिसाइल कम ऊंचाई पर उड़ती है, इसे ट्रैक करना कठिन है और यह भारी पेलोड ले जा सकती है। इसके रखरखाव की लागत भी पश्चिमी देशों के वेपन सिस्टम की तुलना में कम है। साथ ही, भारत इन देशों को ट्रेनिंग, तकनीकी मदद और लॉजिस्टिक सपोर्ट भी दे रहा है।
भारत का सबसे बड़ा लाभ यह है कि वह किसी सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं है। इस कारण वह बिना किसी राजनीतिक शर्त या दबाव के हथियारों की सप्लाई करता है। यही वजह है कि आसियान देशों में भारत के डिफेंस इक्विपमेंट्स पर भरोसा बढ़ा है।
ग्रीस, ब्राजील और आर्मेनिया भी इच्छुक
सूत्रों ने बताया कि ग्रीस, ब्राजील और आर्मेनिया के साथ भी ब्रह्मोस को लेकर बात चल रही है। दो अरब डॉलर से ज्यादा के सौदे संभव हैं। ग्रीस सिटी टाइम्स का कहना है कि ईस्टर्न एजियन द्वीपों पर ब्रह्मोस लगाने से तुर्की नौसेना को रोकना आसान होगा। पेंता पोस्टाग्मा भी ब्रह्मोस को तुर्की के खिलाफ समुद्री वर्चस्व के लिए जरूरी बता चुका है। वहीं, ब्राजील अटलांटिक में अपनी सुरक्षा बढ़ाने के लिए ब्रह्मोस पर विचार कर रहा है।
लगातार बढ़ रहा डिफेंस एक्सपोर्ट
वहीं, ब्रह्मोस एक्सपोर्ट कॉन्ट्रैक्ट मिलने से भारत के रक्षा उद्योग को बड़ा आर्थिक लाभ मिलेगा। लखनऊ स्थित ब्रह्मोस इंटीग्रेशन एंड टेस्टिंग फैसिलिटी में हर साल करीब 100 मिसाइलें बनाने की क्षमता है। इससे भारत की न केवल उत्पादन क्षमता बढ़ेगी बल्कि रोजगार के अवसरों में भी बढ़ोतरी होगी।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी कहा है कि ब्रह्मोस सिर्फ एक हथियार नहीं है, बल्कि भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता और इनोवेशन की पहचान है। उन्होंने हाल ही में कहा था कि दुनिया अब भारत की डिफेंस तकनीक पर भरोसा करती है और यह हमारे आत्मनिर्भर भारत मिशन के लिए बड़ी उपलब्धि है।
भारत का रक्षा निर्यात पिछले कुछ सालों में तेजी से बढ़ा है। वित्त वर्ष 2024–25 में भारत ने 2.76 बिलियन डॉलर का डिफेंस एक्सपोर्ट किया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 12 फीसदी अधिक है। अब भारत के रक्षा उत्पाद 100 से अधिक देशों में एक्सपोर्ट किए जा रहे हैं।
BrahMos Missile Export: 800 किमी रेंज वाला वर्जन भी तैयार
इसके अलावा भारत ब्रह्मोस का 800 किमी रेंज वाला वर्जन भी तैयार कर रहा है। हाल ही में बंगाल की खाड़ी में ब्रह्मोस का सफल परीक्षण भी किया गया था। यह परीक्षण अक्टूबर महीने में हुआ। मिसाइल में नया रामजेट इंजन और हाइब्रिड नेविगेशन सिस्टम लगाया गया, जो इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम और जीएनएसएस का कंपोजिशन है। इससे जैमिंग से बचाव होता है। वहीं इसकी सटीकता एक मीटर से भी कम रही। ब्रह्मोस पहले 290 किलोमीटर तक मार कर सकती थी। एमटीसीआर नियमों के बाद 2017 में इसे 450-500 किलोमीटर तक बढ़ाया गया। अब 800 किलोमीटर रेंज के लिए ईंधन टैंक बढ़ाया गया है। सॉफ्टवेयर में बदलाव किया गया है। साथ ही कंपोजिट मैटेरियल का इस्तेमाल हुआ है। इससे यह ईंधन ज्यादा ले जा सकती है। डीआरडीओ सूत्रों ने बताया कि 800 किलोमीटर रेंज वाला वर्जन 2027 के आखिर तक पूरी तरह तैयार हो जाएगा।
BRO Project Arunank: सीमाई इलाकों में सड़कों के निर्माण और देश के दुर्गम इलाकों में विकास की पहचान बन चुके सीमा सड़क संगठन यानी बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन ने अरुणाचल प्रदेश के नाहरलगुन में चल रहे प्रोजेक्ट अरुणांक का 18वां स्थापना दिवस मनाया। यह आयोजन उन इंजीनियरों, मजदूरों और अधिकारियों की मेहनत का प्रतीक था, जिन्होंने देश के सबसे कठिन इलाकों में सड़कों और पुलों का निर्माण कर सुरक्षा और विकास दोनों को मजबूत किया है।
BRO Project Arunank की शुरुआत वर्ष 2008 में हुई थी। इसका उद्देश्य अरुणाचल प्रदेश के दुर्गम पहाड़ी इलाकों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ना और सीमावर्ती इलाकों में तैनात सशस्त्र बलों को सुरक्षित व तेज आवाजाही सुनिश्चित करना था। पिछले 17 सालों में इस प्रोजेक्ट ने 696 किलोमीटर सड़कों और 1.18 किलोमीटर लंबे प्रमुख पुलों का निर्माण और रखरखाव किया है।
इस परियोजना की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक 278 किलोमीटर लंबी हापोली–सरली–हुरी सड़क का निर्माण रहा, जिसे आजादी के बाद पहली बार ब्लैकटॉप किया गया। यह सड़क कुरुंग कुमेय जिले के सबसे दुर्गम इलाकों को जोड़ती है और इसने स्थानीय लोगों के जीवन में बड़ा बदलाव लाया है।
BRO Project Arunank ने निर्माण में कई नवीन तकनीकों को अपनाया है, जिनमें स्टील स्लैग, कट-एंड-कवर टनल्स, जिओ सेल्स, प्लास्टिक शीट्स, जीजीबीएफएस कंक्रीट और गेबियन वॉल्स शामिल हैं। इन तकनीकों ने न केवल सड़कों की मजबूती बढ़ाई है बल्कि लागत घटाने और पर्यावरण के संरक्षण में भी मदद की है।
बीआरओ ने हाल के सालों में कई रणनीतिक सड़कों का काम पूरा किया है। ली–हुरी रोड को नेशनल हाइवे डेवलपमेंट लिमिटेड मानकों के अनुसार अपग्रेड किया गया है, वहीं किमिन–पोटिन रोड को डबल लेन बनाया गया। दिसंबर 2022 में माजा सेक्टर तक सड़क कनेक्टिविटी पूरी की गई, जो चीन सीमा से सटे अंतिम इलाकों में आता है। आने वाले महीनों में टीसीसी–माजा रोड का उद्घाटन भी प्रस्तावित है।
स्थापना दिवस पर नहरलागुन–जोरम टॉप–संग्राम–जीरो–नहरलागुन मार्ग पर एक मोटरेबल एक्सपेडिशन आयोजित किया गया। इसका उद्देश्य स्थानीय लोगों में सड़क सुरक्षा और यातायात अनुशासन को बढ़ावा देना था। इस यात्रा ने दिखाया कि बीआरओ ने कितनी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में सड़कों को आधुनिक और सुरक्षित बनाया है।
पर्यावरण संरक्षण को लेकर भी प्रोजेक्ट अरुणांक अग्रणी रहा है। ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के तहत अरुणाचल प्रदेश में 23,850 पेड़ लगाए गए। यह अभियान बीआरओ की ग्रीन और सस्टेनेबल कंस्ट्रक्शन पॉलिसी को आगे बढ़ाता है।
स्थापना दिवस पर बीआरओ ने अपने कैजुअल पैड लेबरर्स यानी अस्थायी श्रमिकों के लिए कल्याणकारी उपायों की भी घोषणा की। इनमें बेहतर आवास, गर्म कपड़े, स्वास्थ्य जांच शिविर और सुरक्षित पानी-सैनिटेशन की सुविधाएं शामिल हैं। ये मजदूर बीआरओ की रीढ़ माने जाते हैं, जो हर मौसम में सीमाओं पर काम करते हैं।
ब्रिगेडियर स्तर के वरिष्ठ अधिकारियों और स्थानीय प्रशासन के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में कार्यक्रम संपन्न हुआ। इस मौके पर प्रोजेक्ट अरुणांक की उपलब्धियों की सराहना की गई और कहा गया कि यह परियोजना भारत की सामरिक मजबूती, आत्मनिर्भरता और विकास की दिशा में एक जीवंत प्रतीक है।
Indian Navy Commanders Conference 2025: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर भारत की इच्छाशक्ति, क्षमता और सामरिक तैयारी का प्रतीक था। उन्होंने कहा कि यह अभियान पूरी दुनिया के लिए यह संदेश था कि भारत किसी भी चुनौती का जवाब देने के लिए हमेशा तैयार है। रक्षा मंत्री ने यह बात नई दिल्ली में आयोजित नौसेना कमांडर्स सम्मेलन को संबोधित करते हुए कही।
उन्होंने कहा कि भारतीय नौसेना ने इस ऑपरेशन के दौरान ऐसा खौफ का माहौल बनाया कि पाकिस्तान की नौसेना को अपने तट के पास ही रहना पड़ा। उन्होंने कहा कि दुनिया ने भारतीय नौसेना की ऑपरेशनल रेडीनेस, प्रोफेशनल कैपेबिलिटी और स्ट्रेंथ को प्रत्यक्ष रूप से देखा।
राजनाथ सिंह ने कहा, “भारतीय नौसेना की मौजूदगी हिंद महासागर क्षेत्र में हमारे मित्र देशों के लिए भरोसे का प्रतीक है, जबकि जो देश इस क्षेत्र को अस्थिर करना चाहते हैं, उनके लिए यह असुविधा का कारण है।”
Indian Navy Commanders Conference 2025: हिंद महासागर बना नई भू-राजनीति का केंद्र
रक्षा मंत्री ने कहा कि आज हिंद महासागर विश्व राजनीति का नया केंद्र बन गया है। यह अब केवल व्यापार का क्षेत्र नहीं रहा, बल्कि यह प्रतिस्पर्धा और सहयोग दोनों का मंच बन गया है। उन्होंने कहा कि पिछले छह महीनों में भारतीय नौसेना ने अभूतपूर्व स्तर पर तैनाती की है, हमारे युद्धपोत, पनडुब्बियां और नौसैनिक विमान हर तरफ एक्टिव हैं।
उन्होंने बताया कि भारतीय नौसेना ने हाल के महीनों में लगभग 335 कमर्शियल वेसेल्स को सुरक्षित मार्ग दिया है, जिनमें करीब 1.2 मिलियन मीट्रिक टन कार्गो और 5.6 बिलियन डॉलर का सामान शामिल था। यह इस बात का प्रमाण है कि भारत अब वैश्विक समुद्री अर्थव्यवस्था में एक भरोसेमंद और सक्षम साझेदार बन चुका है।
आयात पर निर्भर नहीं नौसेना
राजनाथ सिंह ने कहा कि एक आत्मनिर्भर नौसेना किसी भी आत्मविश्वासी राष्ट्र की रीढ़ होती है। उन्होंने बताया कि पिछले दस वर्षों में नौसेना के लगभग 67 फीसदी पूंजीगत अनुबंध (कैपिटल एक्विजिशन कॉन्ट्रैक्ट्स) भारतीय कंपनियों के साथ किए गए हैं।
उन्होंने कहा कि “आज हमारी नौसेना अपने उपकरण खुद बना रही है। हम अब केवल आयात पर निर्भर नहीं हैं। हम अपने देश के इंजीनियरों, छोटे-मझौले उद्योगों और स्टार्ट-अप्स की क्षमता पर भरोसा करते हैं।”
Indian Navy Commanders Conference 2025
रक्षा मंत्री ने बताया कि नौसेना वर्तमान में आईडेक्स, टीडीएफ, सिप्रिंट और मेक-इन-इंडिया जैसी योजनाओं के तहत 194 स्वदेशी प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही है। इन परियोजनाओं ने न केवल नौसेना को तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर बनाया है, बल्कि देश के निजी उद्योगों और युवाओं को भी इनोवेशन से जोड़ा है।
तकनीक और इंटेलिजेंस पर आधारित हैं युद्ध
रक्षा मंत्री ने कहा कि आज के युद्ध पूरी तरह तकनीक और इंटेलिजेंस पर आधारित हैं। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार आत्मनिर्भरता, इंडीजीनस इनोवेशन और आधुनिक तकनीकों पर विशेष ध्यान दे रही है।
उन्होंने कहा, “समुद्री तैयारी अब केवल जहाजों या पनडुब्बियों तक सीमित नहीं है। यह अब नेटवर्क-सेंट्रिक और ऑटोनोमस सिस्टम्स पर आधारित है। हमें दुश्मन की आधुनिक तकनीकों से खुद को सुरक्षित रखना है और अपनी तकनीकी क्षमताओं को लगातार बढ़ाना है।”
1.27 लाख रोजगार पैदा हुए
राजनाथ सिंह ने कहा कि आत्मनिर्भर भारत के तहत नौसेना न केवल रक्षा उत्पादन कर रही है बल्कि यह राष्ट्र निर्माण में भी योगदान दे रही है। उन्होंने कहा, “हर जहाज और पनडुब्बी के निर्माण से एक नई नौकरी बनती है। हर इंजन के साथ एक नई कौशल क्षमता जुड़ती है और हर स्वदेशी सिस्टम से भारत की निर्भरता कम होती है।”
उन्होंने बताया कि प्रोजेक्ट 17ए के जहाजों में 75 फीसदी से अधिक स्वदेशी सामग्री शामिल है, जिससे मझगांव डॉक और गार्डन रीच शिपबिल्डर्स में लगभग 1.27 लाख रोजगार पैदा हुए हैं।
रक्षा मंत्री ने बताया कि नौसेना ने हाल ही में छोटे शिपयार्ड्स और एमएसएमई के साथ सहयोग बढ़ाया है। हाल के महीनों में लगभग 315 करोड़ रुपये के कॉन्ट्रैक्ट छोटे जहाज बनाने के लिए दिए गए हैं। उन्होंने कहा कि नौसेना ने अपने एविएशन सेक्टर में कई इनोवेशन किए हैं। मल्टी-रोल मैरीटाइम रिकॉनिसेंस एयरक्राफ्ट, यूटिलिटी हेलीकॉप्टर्स, ट्विन इंजन डेक फाइटर्स और नेवल शिपबोर्न ड्रोन सिस्टम्स जैसे प्रोजेक्ट्स घरेलू उद्योग को नई दिशा दे रहे हैं।
बुद्धिमानी से इस्तेमाल भी जरूरी
राजनाथ सिंह ने कहा कि किसी भी देश की जीत केवल हथियारों या जहाजों से नहीं होती। रणनीति, निर्णय-क्षमता, समय और भौगोलिक समझ भी उतनी ही अहम होती है। उन्होंने कहा, “हमें आधुनिक उपकरणों के साथ-साथ सही रणनीति बनानी होगी। फ्लीट का आकार और आधुनिकीकरण जरूरी है, लेकिन प्लेटफॉर्म्स का बुद्धिमानी से इस्तेमाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है।”
नौसेना की तीन ताकतें
रक्षा मंत्री ने कहा कि भविष्य की नौसेना तीन स्तंभों पर खड़ी होगी- जिनमें क्षमता, लोग और साझेदारी अहम होगी। उन्होंने बताया कि क्षमता का मतलब तकनीक और ताकत से है, लोग यानी हमारे नाविक और उनके परिवार, और साझेदारी का मतलब उद्योग, शिक्षण संस्थान और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से है। उन्होंने कहा कि जब ये तीनों साथ आएंगे, तो भारतीय नौसेना एक और मजबूत और भरोसेमंद ताकत बनकर उभरेगी।
Indian Navy Commanders Conference 2025
नौसेना प्रमुख ने जताया गर्व
सम्मेलन की शुरुआत 22 अक्टूबर को नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के. त्रिपाठी के उद्घाटन संबोधन से हुई। उन्होंने टीम नेवी की सामूहिक मेहनत, पेशेवर क्षमता और लगातार ऑपरेशनल तैयारी की सराहना की। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर भारतीय नौसेना के साहस, समर्पण और दक्षता का प्रतीक रहा है और इस पर पूरे देश को गर्व है।
एडमिरल त्रिपाठी ने कहा कि मौजूदा भू-रणनीतिक माहौल में भारतीय नौसेना राष्ट्रीय समुद्री हितों की रक्षा के लिए हमेशा तैयार है। उन्होंने कहा कि नौसेना ने पिछले एक वर्ष में कई सफल अभियानों को अंजाम दिया है और अपनी युद्धक तैयारियों को उच्चतम स्तर पर बनाए रखा है।
नौसेना प्रमुख ने कहा कि भारतीय नौसेना अब हिंद महासागर क्षेत्र में पसंदीदा सिक्योरिटी पार्टनर के रूप में उभर रही है। उन्होंने बताया कि आईओएस सागर जैसी तैनातियां और आइकेमे जैसे अभियानों ने नौसेना को क्षेत्रीय स्थिरता में अग्रणी भूमिका दी है। ये सभी कदम महासागर यानी (म्यूचुअल एंड होलिस्टिक एडवांसमेंट फॉर सिक्युरिटी अक्रोस ऑल रीजन्स) के विजन के तहत लिए जा रहे हैं।
फ्यूचर रेडी फोर्स बनने की तैयारी
एडमिरल त्रिपाठी ने कहा कि नौसेना एक “कोहेसिव फोर्स” बन चुकी है, जो अपने जवानों के कल्याण, फिटनेस और प्रशिक्षण पर ध्यान दे रही है। उन्होंने बताया कि नौसेना में नई तकनीकों का तेजी से जोड़ा जा रहा है और आईडेक्स जैसे कार्यक्रमों के जरिए से कई भारतीय कंपनियां इस मिशन का हिस्सा बन रही हैं। उन्होंने कहा कि नौसेना का लक्ष्य है कि वर्ष 2047 तक पूरी तरह आत्मनिर्भर नेवी बनकर “फ्यूचर रेडी फोर्स” के तौर पर खड़ी हो।
एडमिरल त्रिपाठी ने नौसेना के सात मुख्य प्राथमिकताओं पर ध्यान केंद्रित करने की बात कही। उन्होंने युद्ध क्षमता, फोर्स लेवल, फ्लीट मेंटेनेंस, नई तकनीक, कर्मियों का विकास, आर्गेनाइजेशनल फ्लेक्सिबिलिटी और राष्ट्रीय एजेंसियों के साथ तालमेल पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि इन क्षेत्रों में निरंतर प्रगति से भारतीय नौसेना हर समय, हर जगह और हर परिस्थिति में भारत के समुद्री हितों की रक्षा करने के लिए तैयार रहेगी।
वायुसेना प्रमुख ने दिया जॉइंटनेस पर जोर
सम्मेलन के पहले दिन वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने भी नौसेना कमांडर्स को संबोधित किया। उन्होंने भारतीय नौसेना की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि भारतीय वायुसेना और नौसेना को जॉइंट प्लानिंग और ऑपरेशन के जरिए अपनी क्षमताओं को और मजबूत करना चाहिए। उन्होंने भारतीय नौसेना की सराहना करते हुए कहा कि नौसेना ने हिंद महासागर क्षेत्र में चुनौतियों का सामना करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि जॉइंट ऑपरेशंस, इंटरऑपरेबिलिटी और इंटीग्रेटेड मिशन प्लानिंग से राष्ट्रीय सुरक्षा और अधिक मजबूत होगी।
Defence Procurement Manual-2025: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने गुरुवार को डिफेंस प्रोक्योरमेंट मैनुअल-2025 (डीपीएम) जारी किया। यह नया मैनुअल 1 नवंबर 2025 से लागू होगा। इसके जरिए भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना समेत रक्षा मंत्रालय से जुड़े विभाग तकरीबन 1 लाख करोड़ रुपये की सालाना खरीद को नए नियमों के तहत कर सकेंगे। नए मैनुअल को यह आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया, और आधुनिक युद्ध की जरूरतों जैसे ड्रोन, एआई और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है।
रक्षा मंत्री ने साउथ ब्लॉक में आयोजित समारोह में कहा कि डीपीएम-2025 न केवल प्रोसिजर को सुव्यवस्थित करेगा, बल्कि यह डिफेंस सर्विसेज की ऑपरेशनल प्रिपेयर्डनेस के लिए जरूरी सामान और सर्विसेज समय पर उपलब्ध कराने में भी मदद करेगा। उन्होंने कहा कि इससे सेना की ऑपरेशनल तैयारी में सुधार होगा और छोटे-मझोले उद्योगों व स्टार्ट-अप्स को भी रक्षा क्षेत्र में नए अवसर मिलेंगे।
Defence Procurement Manual-2025: नए मैनुअल में क्या बदला
डिफेंस प्रोक्योरमेंट मैनुअल 2025 (Defence Procurement Manual-2025) को रक्षा मंत्रालय और एचक्यू इंटीग्रेटिड डिफेंस स्टाफ ने सेवाओं और सभी हितधारकों से विचार-विमर्श के बाद तैयार किया है। नए डीपीएम-2025 में कई पुराने नियमों को बदला गया है ताकि जल्दी फैसले हो सकें और “ईज ऑफ डूइंग बिजनेस” को बढ़ावा मिले। अब सामान की डिलीवरी में देरी होने पर लगने वाला जुर्माना घटा दिया गया है। पहले यह हर हफ्ते 0.5 फीसदी था, लेकिन अब खासकर स्वदेशीकरणवाले मामलों में इसे सिर्फ 0.1 फीसदी प्रति सप्ताह रखा गया है।
मैनुअल में यह भी तय किया गया है कि अगर कोई भारतीय कंपनी या निजी उद्योग कोई डिफेंस इक्विपमेंट्स बनाता है, तो उसे पांच साल तक का आश्वस्त ऑर्डर मिल सकते हैं। इससे घरेलू उद्योगों को प्रोत्साहन मिलेगा।
Defence Procurement Manual-2025: अब नहीं लेनी होगा ओएफबी से एनओसी
पहले किसी भी खरीद के लिए आर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड (ओएफबी) से ‘नो ओब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ लेना जरूरी होता था, जिससे प्रक्रिया धीमी हो जाती थी। नए डिफेंस प्रोक्योरमेंट मैनुअल 2025 में इस शर्त को हटा दिया गया है। अब सेनाएं जरूरत के हिसाब से सीधे खरीद कर सकेंगी।
इसके अलावा, जहाजों की मरम्मत और हवाई उपकरणों के रखरखाव में भी नए नियम लागू किए गए हैं। इसमें पहले से 15 फीसदी अतिरिक्त काम का प्रावधान रहेगा, ताकि प्लेटफॉर्म की सर्विसिंग जल्दी हो और ऑपरेशनल तैयारियां बनी रहें।
स्वदेशी निर्माण और तकनीक पर जोर
नए मैनुअल में एक खास अध्याय “इनोवेशन और स्वदेशीकरण के जरिए आत्मनिर्भरता को बढ़ावा” जोड़ा गया है। इसका उद्देश्य रक्षा निर्माण में भारत को आत्मनिर्भर बनाना है। इस अध्याय के तहत स्वदेशी डिजाइन, विकास और तकनीकी इनोवेशन को बढ़ावा दिया जाएगा।
रक्षा मंत्रालय का कहना है कि इससे देश के निजी और सरकारी क्षेत्र दोनों को एक समान अवसर मिलेंगे और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत का लक्ष्य और मजबूत होगा।
कंसल्टेंसी सेवाओं को भी किया शामिल
डीपीएओ 2025 (Defence Procurement Manual-2025) में पहली बार सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) खरीद और परामर्श सेवाओं को शामिल किया गया है। इससे डिजिटल सिस्टम के जरिए खरीद प्रक्रिया और पारदर्शी होगी। मैनुअल को दो हिस्सों में तैयार किया गया है। पहले वॉल्यूम में मुख्य नियम दिए गए हैं और दूसरे वॉल्यूम में फॉर्म, आदेश और जरूरी परिशिष्ट शामिल हैं।
पुराने और नए आरएफपी नियमों में अंतर
रक्षा मंत्रालय ने बताया कि 1 नवंबर 2025 के बाद जो भी रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) जारी होंगे, वे डीपीएम 2025 के नियमों के तहत होंगे। 31 अक्टूबर तक जारी आरएफपी पुराने डीपीएम 2009 के अनुसार ही पूरे किए जाएंगे।
सूत्रों का कहना है कि पुराने डीपीएम 2009 (Defence Procurement Manual-2025) में हालांकि स्वदेशीकरण पर जोर था, लेकिन नीतियां सीमित थीं। आयात पर निर्भरता अधिक थी। वहीं, डीपीएसयू को प्राथमिकता दी जाती थी, तो निजी क्षेत्र की भागीदारी कम थी। वहीं, नए डीपीएम 2025 को बॉय (इंडियन-आईडीडीएम) को प्राथमिकता दी गई है। जिसमें डिजाइन, डेवलपमेंट और मैन्युफैक्चरिंग भारत में ही हो। साथ ही निजी क्षेत्र की कंपनियों को भी शामिल किया जाए।
उन्होंने बताया कि पुराना डीपीएम मल्टी-लेयर था और अप्रूवल्स में देरी होती थी, जिससे खरीद में 6-12 महीने लगते थे। वहीं नए मैनुअल में फैसले लेने के लिए अधिक वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार दिए गए हैं। 50 लाख रुपये तक लिमिटेड टेंडरिंग और प्रोप्राइटरी खरीद के लिए प्रावधान दिए गए हैं। साथ ही ई-प्रोक्योरमेंट और डिजिटल टूल्स से प्रक्रिया 30-50 फीसदी तक तेज हो जाएगी। वहीं, पुराने डीपीएम में मैनुअल प्रक्रियाओं के चलते भ्रष्टाचार की गुंजाइश रहती थी। वहीं, डीपीएसयू से एनओसी जरूरी थी, जो निजी कंपनियों के लिए बड़ी बाधा थी।
Defence Acquisition Council: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) ने गुरुवार को 79,000 करोड़ रुपये के रक्षा प्रस्तावों को मंजूरी दी। इन प्रस्तावों में भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना के लिए कई अत्याधुनिक सिस्टम्स की खरीद और इंडीजीनस प्रोडक्शन की मंजूरी दी गई है। अधिकांश प्रोजेक्ट ‘बॉय इंडियन इंडिजेनसली डिजाइंड, डेवलप्ड एंड मैन्युफैक्चर्ड (इंडियन-आईडीडीएम)’ कैटेगरी के तहत हैं, जिनका उद्देश्य देश में रक्षा उपकरणों का निर्माण बढ़ाना और आत्मनिर्भर भारत पहल को रफ्तार देना है। इन प्रस्तावों को मंजूरी मिलने के बाद भारतीय सेनाओं की सामरिक तैयारी, ऑपरेशनल रिस्पॉन्स और तकनीकी श्रेष्ठता में जरूरी सुधार होगा।
Defence Acquisition Council: भारतीय सेना के लिए नाग
भारतीय सेना के लिए तीन प्रमुख प्रोजेक्ट्स को एक्सेप्टेंस ओएफ नेसेसिटी (एओएन) दी गई है। इनमें नाग मिसाइल सिस्टम एमके-2 (ट्रैक्ड), ग्राउंड बेस्ड मोबाइल इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस सिस्टम (जीबीएमईएस) और हाई मोबिलिटी व्हीकल्स (एचएमवी) शामिल हैं।
#DAC Clears Rs 79,000 Cr Defence Boost!
The Defence Acquisition Council (DAC), led by Raksha Mantri Shri Rajnath Singh, has approved proposals worth Rs 79,000 Crore to modernize the Armed Forces.
Key Acquisitions Include:
Army: NAMIS Mk-II Missiles, GBMES (Electronic…
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार (@RakshaSamachar) October 23, 2025
सेना के लिए स्वीकृत नाग मिसाइल सिस्टम (नामिस) एक स्वदेशी ट्रैक्ड एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल सिस्टम है, जो दुश्मन के टैंकों, बंकरों और फील्ड फोर्टिफिकेशन को नष्ट करने में सक्षम होगी। यह सिस्टम डीआरडीओ ने डेवलप किया है और “फायर एंड फॉरगेट” टेक्नोलॉजी पर बेस्ड है। इस सिस्टम के शामिल होने से सीमावर्ती इलाकों खासकर लद्दाख और पूर्वोत्तर क्षेत्रों में एंटी-टैंक क्षमता में कई गुना बढ़ोतरी होगी।
जीबीएमईएस सेना को दुश्मन के रडार और कम्यूनिकेशन की रियल टाइम जानकारी देगा। यह भी डीआरडीओ ने डेवलप किया है और इसका प्रोजेक्ट कोडनेम हिमराज है। यह सिस्टम 70 मेगाहर्ट्ज से 40 गीजाहर्ट्ज तक, रडार और कम्यूनिकेशन बैंड दोनों को कवर करता है। इसमें कम्यूनिकेशन इंटेलिजेंस रिसीवर भी शामिल है, जो 30-1000 मेगाहर्ट्ज रेंज में काम करता है। यह दुश्मन के रडार सिग्नलों को ट्रैक करके इलेक्ट्रॉनिक अटैक और काउंटरमेजर्स के लिए डेटा प्रदान करता है। यह हिमशक्ति इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम का हिस्सा है, जो 10,000 वर्ग किमी क्षेत्र में जेमिंग कर सकता है। यह सिस्टम चौबीसों घंटे निगरानी करने में सक्षम है और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर में भारत को फायदा मिलेगा।
वहीं, हाई मोबिलिटी व्हीकल्स (एचएमवी) को कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में लॉजिस्टिक्स सप्लाई और सामान के परिवहन के लिए मंजूरी दी गई है। ये भारी-भरकम मल्टीपर्पज ट्रक हैं, जो लद्दाख के हिमालयी क्षेत्र, राजस्थान के रेगिस्तानी इलाके, और पूर्वोत्तर के जंगली/दलदली क्षेत्रों में रसद और सैनिकों को ट्रांसपोर्ट करने के लिए डिजाइन किए गए हैं। यह सिस्टम जीपीएस नेविगेशन और कम्यूनिकेशन सिस्टम से लैस है। सेना के पास पहले से पुराने लगभग 10,000 अशोक लेलैंड स्टालिन औऱ टाटा एलपीटीए 2038 एचएमवी हैं, जिन्हें अपग्रेड/रिप्लेस करना है। नए एचएमवी इनके अपग्रेडेड वर्जन होंगे, जिसमें क्रेन और बेहतर टेक्नोलॉजी होगी। जल्द ही रक्षा मंत्रालय टेंडर आरएअफपी जारी करेगा। वहीं इनकी डिलीवरी 2026-2028 के बीच शुरू होने की उम्मीद है। वहीं, नए एचएमवी को एयरलिफ्ट भी किया जा सकेगा। इनमें मटेरियल हैंडलिंग क्रेन लगे होंगे, जिससे ऊंचे पहाड़ी इलाकों या रेगिस्तानी क्षेत्रों में सप्लाई चेन को मजबूत किया जा सकेगा।
Defence Acquisition Council: भारतीय नौसेना के लिए एलपीडी और सरफेस गन
भारतीय नौसेना के लिए डीएसी ने कई अहम प्रस्तावों को मंजूरी दी है। इनमें लैंडिंग प्लेटफार्म डॉक्स (एलपीडी), 30एमएम नेवल सरफेस गंस (एनएसजी), एडवांस्ड लाइट वेट टॉरपीडोज, इलेक्ट्रो आप्टिकल इन्फ्रा-रेड सर्च और ट्रैक सिस्टम्स, और स्मार्ट एम्युनिशन फोर 76 एमएम सुपर रैपिड गन माउंट्स शामिल हैं।
लैंडिंग प्लेटफार्म डॉक्स की खरीद से नौसेना को एम्फीबियस ऑपरेशन यानी समुद्र से तटीय इलाकों में तेजी से सैनिक कार्रवाई करने में मदद मिलेगी। यह प्लेटफॉर्म भारतीय नौसेना को सेना और वायुसेना के साथ संयुक्त मिशन करने में सक्षम बनाएगा। इनका उपयोग मानवीय सहायता और आपदा राहत अभियानों में भी किया जा सकेगा।
एडवांस्ड लाइट वेट टॉरपीडोज को डीआरडीओ के नेवल साइंस एंड टेक्नोलॉजिकल लेबोरेटरी, विशाखापट्टनम ने डेवलप किया है। यह टॉरपीडो पारंपरिक, परमाणु और मिडजेट पनडुब्बियों को निशाना बनाने में सक्षम है। इसकी तैनाती से नौसेना की एंटी-सबमैरीन वॉरफेयर को बड़ी मजबूती मिलेगी। लाइटवेट टॉरपीडो को जहाजों, पनडुब्बियों, और हेलीकॉप्टरों से लॉन्च किया जा सकता है। यह एडवांस्ड लाइट वेट टॉरपीडोज वरुणास्त्र औऱ तक्षक का लाइट वेट वर्जन है। वरुणास्त्र का वजन 1,500 किग्रा हैं और इसकी रेंज 40 किमी हैं। वहीं तक्षक टॉरपीडो की रेंज लगभग 7-12 किलोमीटर है। वहीं, एडवांस्ड लाइट वेट टॉरपीडोज की रेंज 20-40 किलोमीटर है। लाइट वेट टॉरपीडोज हिंद महासागर में चीनी पनडुब्बियों (जैसे टाइप-039 युआन-क्लास) और पाकिस्तानी पनडुब्बियों (जैसे अगोस्ता-90B) को निशाना बना सकेंगी।
वहीं, 30एमएम नेवल सरफेस गन को लो इंटेंसिटी मैरीटाइम आपरेशंस और एंटी-पाइरेसी मिशनों के लिए मंजूरी दी गई है। इससे भारतीय नौसेना और तटरक्षक बल की समुद्री सुरक्षा और गश्ती क्षमता में बढ़ोतरी होगी।
जबकि इलेक्ट्रो आप्टिकल इन्फ्रा-रेड सर्च एंड ट्रैक सिस्टम (ईओ/ऐआर एसटीएस) और स्मार्ट एम्युनिशन नौसैनिक जहाजों की निगरानी और सटीक हमले की क्षमता को बढ़ाएंगे। ये सिस्टम खराब मौसम और लो विजिबिलिटी में भी टारगेट की पहचान करने में सक्षम हैं।
Defence Acquisition Council: भारतीय वायुसेना के लिए आटोनोमस अटैक सिस्टम
भारतीय वायुसेना के लिए डीएसी ने आटोनोमस अटैक सिस्टम कोलेबोरेटिव लॉन्ग रेंज टारगेट सैचुरेशन/डिस्ट्रक्शन सिस्टम और अन्य प्रस्तावों को एक्सेप्टेंस ओएफ नेसेसिटी (एओएन) जारी किया है। यह सिस्टम एक एडवांस आटोनोमस ड्रोन स्वॉर्म नेटवर्क है, जो स्वयं टेकऑफ और लैंडिंग करने, लंबी दूरी तक नेविगेट करने और पहले से तय इलाके क्षेत्र में पेलोड डिलीवर कर सकता है। इस सिस्टम की खासियत यह है कि यह ड्रोनों के झुंड में दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को सैचुरेट (बहुत सारे हमलों से ओवरलोड) कर सकता है और सामूहिक हमले यानी कोआर्डिनेटेड स्ट्राइक जैसा माहौल बना सकता है। आटोनोमस यूएवी स्वार्म सिस्टम में 100 से ज्यादा ड्रोन्स शामिल हो सकते हैं। यह सिस्टम एआई-बेस्ड है, जो खुद फैसले ले सकता है।
रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि लगभग सभी प्रस्तावों में 70 से 90 फीसदी तक स्वदेशी सामग्री शामिल होगी। इन परियोजनाओं में डीआरडीओ, एचएएल, भारत डायनामिक्स लिमिटेड (बीडीएल), मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स, टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, और एल एंड टी डिफेंस जैसी भारतीय कंपनियों की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इन स्वीकृत प्रस्तावों का कुल वित्तीय प्रभाव वित्त वर्ष 2025-26 के बजट प्रावधानों के भीतर रहेगा।
बैठक की अध्यक्षता करते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि यह मंजूरी भारत की सेनाओं को फ्यूचर बैटलफील्ड के लिए तैयार करेगी। उन्होंने कहा कि डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल के फैसले भारत को एक मजबूत, तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर और सक्षम रक्षा शक्ति बनाने की दिशा में आगे बढ़ाएंगे।
Ocean Sky 2025: भारतीय वायुसेना पहली बार स्पेन में आयोजित हो रही ओशन स्काई 2025 (Ocean Sky 2025) मल्टीनेशनल एयर कॉम्बैट एक्सरसाइज में भाग ले रही है। यह अभ्यास 20 से 31 अक्टूबर 2025 तक स्पेन के गैंडो एयर बेस, ग्रैन कैनारिया द्वीप पर चल रहा है।
यह सालाना मिलिट्री एक्सरसाइज स्पेनिश एयर एंड स्पेस फोर्स द्वारा आयोजित की जाती है और यूरोप के सबसे बड़े एयर कॉम्बैट ट्रेनिंग मिशन में से एक है। इस वर्ष भारत की भागीदारी ने इसे विशेष बना दिया है। अभ्यास का उद्देश्य मित्र देशों की सेनाओं के बीच इंटरऑपरेबिलिटी (परस्पर सहयोग), म्युचुअल लर्निंग (पारस्परिक सीख) और जॉइंट कॉम्बैट स्किल्स को बढ़ाना है।
Ladakh Celebrates International Snow Leopard Day!
On October 23, 2025, the Indian Army’s Fire and Fury Corps joined hands with the Ministry of Environment, Forest and Climate Change (MoEFCC) and Ladakh UT to raise crucial awareness for the safe future of the majestic Snow… pic.twitter.com/tCLI77wlWo
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार (@RakshaSamachar) October 23, 2025
भारतीय वायुसेना इस अभ्यास में अपने सुखोई-30एमकेआई लड़ाकू विमानों और सी-17 ग्लोबमास्टर ट्रांसपोर्ट विमान के साथ भाग ले रही है। अभ्यास के दौरान विभिन्न देशों की सेनाएं एयर डिफेंस सिमुलेशन, डिसिमिलर एयर कॉम्बैट ट्रेनिंग और संयुक्त मिशन अभ्यासों में हिस्सा ले रही हैं।
ओशन स्काई 2025 में भारत के अलावा स्पेन, अमेरिका, ग्रीस, जर्मनी और पुर्तगाल जैसे देश शामिल हैं। स्पेनिश वायुसेना अपने यूरोफाइटर टाइफून विमानों के साथ हिस्सा ले रही है, जबकि अमेरिकी वायुसेना ने एफ-15ई स्ट्राइक ईगल और जर्मनी ने ईएफ-2000 विमानों को तैनात किया है।
Ocean Sky 2025
रक्षा मंत्रालय के अनुसार, यह अभ्यास भारत-स्पेन रक्षा सहयोग को और मजबूत करेगा तथा भारतीय वायुसेना को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप प्रशिक्षण और अनुभव प्राप्त करने का अवसर देगा।
Defence Stocks: भारत फोर्ज के शेयरों में बुधवार को 5 फीसदी की तेजी दर्ज की गई। यह उछाल उस खबर के बाद आया जिसमें बताया गया कि भारतीय सेना ने कंपनी को 2,700 करोड़ रुपये का ऑर्डर दिया है। यह ऑर्डर सेना के लिए 4.25 लाख नई क्लोज क्वॉर्टर बैटल (CQB) कार्बाइन राइफलें बनाने के लिए दिया गया है। यह ऑर्डर मेक इन इंडिया पहल का हिस्साा
इस डील के तहत भारत फोर्ज लगभग 2.5 लाख कार्बाइन राइफलें सेना को सप्लाई करेगी, जबकि शेष 1.75 लाख राइफलें अदाणी ग्रुप की डिफेंस कंपनी पीएलआर सिस्टम्स बनाएगी।
भारत फोर्ज शेयर प्राइस
इस खबर के बाद कंपनी के शेयर ने ट्रेडिंग सत्र में तेजी दिखाई और 1,304.90 रुपये प्रति शेयर तक पहुंच गया, जो पिछले बंद भाव 1,243.60 रुपये से करीब 5 फीसदी अधिक था। भारत फोर्ज का मौजूदा मार्केट कैपिटल 62,247 करोड़ रुपये है। पिछले पांच सालों में कंपनी के शेयरों ने 163 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की है।
रक्षा समाचार डॉट कॉम ने कल बताया था कि यह डील भारतीय सेना के लंबे समय से चल रहे सीक्यूबी कार्बाइन प्रोक्योरमेंट प्रोग्राम का हिस्सा है। नए 5.56 मिमी कैलिबर के कार्बाइन राइफलें सैनिकों को नजदीकी मुकाबले में मदद मिलेगी। इन हथियारों में डीआरडीओ की तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जो आधुनिक युद्धक्षेत्र की जरूरतों को ध्यान में रखकर डेवलप की गई है।
ये कार्बाइन पुरानी 9 मिमी स्टर्लिंग कार्बाइन की जगह लेगी। बता दें कि दोनों कंपनियों को अगले साल से डिलीवरी शुरू करनी है।
भारत फोर्ज कंपनी तीन प्रमुख क्षेत्रों ऑटोमोबाइल, इंडस्ट्रियल और डिफेंस सेक्टर में काम करती है। रक्षा क्षेत्र में, कंपनी हाई-प्रिसिजन हथियार पार्ट्स, रॉकेट लॉन्चर कंपोनेंट्स, और आधुनिक राइफल सिस्टम्स का उत्पादन करती है।
Brazil-India Defence Deal: भारत और ब्राजील के बीच संभावित रक्षा सहयोग को लेकर इस सप्ताह कई विदेशी मीडिया रिपोर्टों में स्वैप डील, बॉर्टर सिस्टम या आपसी रक्षा खरीद समझौते की चर्चा सामने आई। कुछ रिपोर्टों में यह दावा किया गया कि ब्राजील भारत से 32 तेजस एमके1ए फाइटर जेट और 24 प्रचंड अटैक हेलिकॉप्टर खरीदने को तैयार है, जबकि बदले में भारत ब्राजील के 80 सी-390एम मिलेनियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट खरीदेगा।
Brazil-India Defence Deal: क्या लिखा था ब्राजीलियाई मीडिया में
ब्राजील के रक्षा मामलों पर नजर रखने वाले एयर डेटा न्यूज ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि दोनों देश “म्यूचुअल डिफेंस डील” या कहा जाए तो बार्टर सिस्टम डील पर विचार कर रहे हैं। इस रिपोर्ट में कहा गया कि ब्राजील और भारत के बीच चल रही वार्ताओं में एक “दोतरफा रक्षा सहयोग समझौता” शामिल है, जिसमें भारत की ओर से सी-390 मिलेनियम ट्रांसपोर्ट विमान की खरीद और इसके बदले ब्राजील की ओर से तेजस एमके1ए लड़ाकू विमान और लाइट कॉम्बैट हेलिकॉप्टर प्रचंड की खरीद का प्रस्ताव शामिल हो सकता है।
कहा जा रहा है कि 32 तेजस और 24 प्रचंड की लागत लगभग 3.5 से 4 बिलियन अमेरिकी डॉलर होगी। जबकि 80 सी-390 मिलेनियम की लागत लगभग 7 से 8 बिलियन अमेरिकी डॉलर होगी।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि यह साझेदारी तकनीकी सहयोग, स्थानीय असेंबली और को-प्रोडक्शन पर आधारित होगी, जिससे भारत और ब्राजील दोनों के एयरोस्पेस सेक्टर में नई संभावनाएं खुलेंगी।
भारत में ब्राजीलियाई राजदूत केनेथ द नोब्रिगा के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया कि दोनों देश “रक्षा क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए समान रूप से इच्छुक हैं।” रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट (एमटीए) प्रोग्राम के तहत 40 से 80 विमान खरीदने की योजना बनाई गई है। इसमें ब्राजील का सी-390 मिलेनियम, अमेरिका का लॉकहीड सी-130जे, और यूरोप का एयरबस ए400एम शामिल हैं।
Brazil-India Defence Deal: तेजस और प्रचंड में ब्राजील की दिलचस्पी
एयर डेटा न्यूज की रिपोर्ट में कहा गया कि ब्राजील अपनी वायुसेना में पुराने एफ-5 टाइगर II फाइटर जेट्स को बदलने के लिए भारतीय तेजस एमके1ए विमान में दिलचस्पी दिखा रहा है। इसके अलावा, ब्राजील के अमेजन जैसे दुर्गम इलाकों में ऑपरेशन के लिए भारत में बने लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर एलसीएच प्रचंड की क्षमताओं का अध्ययन किया जा रहा है। ब्राजील की वायुसेना के पास पहले एमआई-35 अटैक हेलिकॉप्टर थे, जिन्हें बाद में सेवा से हटा दिया गया है। रिपोर्ट में कहा गया कि प्रचंड उनकी जगह विकल्प बन सकते हैं।
Brazil-India Defence Deal: “कोई स्वैप डील नहीं हुई”
वहीं, इन रिपोर्टों के सामने आने के कुछ घंटों बाद ही ब्राजील सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि भारत-ब्राजील डिफेंस टॉक में किसी तरह की “बार्टर डील” या “एक्सचेंज एग्रीमेंट” पर चर्चा नहीं हुई है। ब्राजील के उपराष्ट्रपति गेराल्डो अल्कमिन, रक्षा मंत्री जोसे मूसियो और वायुसेना प्रमुख लेफ्टिनेंट ब्रिगेडियर मार्सेलो डामासेनो ने नई दिल्ली में भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात की थी।
बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत में उपराष्ट्रपति अल्कमिन ने कहा- “ऐसी किसी स्वैप डील की कोई चर्चा नहीं हुई। एम्ब्रेयर पहले से भारत में सक्रिय है और भारतीय कंपनियों के साथ सहयोग कर रही है। लेकिन किसी व्यावसायिक सौदे को रक्षा वार्ता से जोड़ना गलत है।”
ब्राजील के दूतावास ने भी नई दिल्ली में जारी एक बयान में कहा, “भारत-ब्राजील की रक्षा साझेदारी ‘परस्पर खरीद’ पर नहीं, बल्कि दोनों देशों की रक्षा उद्योगों की तकनीकी गुणवत्ता और रणनीतिक विश्वास पर आधारित है।” दूतावास ने आगे कहा कि दोनों देश रक्षा निर्माण और संयुक्त तकनीकी विकास में सहयोग बढ़ाने पर ध्यान दे रहे हैं।
ब्राजील ने यह भी बताया कि उसने नई दिल्ली में एम्ब्रेयर का एक स्थायी दफ्तर खोला है और दोनों देशों के बीच रक्षा और एविएशन टेक्नोलॉजी में साझेदारी के लिए एमओयू पर दस्तखत किए गए हैं।
आकाश मिसाइल सिस्टम में रूचि
भारत और ब्राजील के बीच हाल के वर्षों में रक्षा सहयोग लगातार बढ़ा है। भारत का स्वदेशी आकाश मिसाइल सिस्टम, गरुड़ 105 वी2 गन, और ऑफशोर पेट्रोल वेसल जैसे प्लेटफॉर्म्स ब्राजील के मिलिटरी इवैल्यूएशन प्रोग्राम्स का हिस्सा हैं।
ब्राजील आकाश मिड रेंज सरफेस टू एयर मिसाइल का परीक्षण कर रहा है। हालांकि बजटीय कारणों और राजनीतिक प्रक्रियाओं के चलते इसकी खरीद में देरी है, लेकिन ब्राजील के रक्षा मंत्रालय ने कहा कि यह इवैल्यूएशन टेक्निकल लेवल पर हो रहा है और किसी अन्य सौदे से जुड़ा नहीं है।
ब्राजील के डिफेंस ग्रुप एम्ब्रेयर, टॉरस आरमास, अविब्रस, अटेक और सीबीसी पहले से ही भारतीय रक्षा कंपनियों के साथ साझेदारी में हैं। इनमें महिंद्रा डिफेंस, जिंदल डिफेंस, और एसएसएस डिफेंस जैसे भारतीय साझेदार शामिल हैं। इसके अलावा स्माल ऑर्म्स, अम्यूनिशन, एयरोस्पेस सिस्टम, और कॉप्लेक्स डिफेंस प्लेटफॉर्म्स का को-प्रोडक्शन शामिल है।
नियुक्त किया एयर और नेवल अताशे
ब्राजील ने हाल ही में नई दिल्ली में अपने दूतावास में एयर और नेवल अताशे को नियुक्त किया है। दक्षिण अमेरिका के किसी भी देश की ओर से पहली बार ऐसा किया है। हालांकि पहले से ही भारतीय राजधानी में एक ब्राजीलियाई आर्मी अताशे तैनात है।
एमटीए में फिट है एंब्रेयर सी-390!
ब्राजील का एंब्रेयर सी-390 मिलेनियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट भारतीय वायुसेना के लिए चल रहे एमटीए प्रोजेक्ट का एक प्रमुख दावेदार है। यह विमान 26 टन तक का पेलोड ले जा सकता है और कच्चे या छोटे रनवे पर भी लैंडिंग और टेकऑफ करने में सक्षम है। भारतीय वायुसेना वर्तमान में पुराने एंटोनोव एन-32 और इल्यूशिन Il-76 बेड़े को बदलने की कोशिशों में है। वहीं, सी-390 का मुकाबलालॉकहीड सी-130जे और एयरबस ए400एम जैसे विमानों से है। एम्ब्रेयर ने भारत में लोकल असेंबली और जॉब क्रिएशन की पेशकश की है।
बता दें कि भारतीय वायुसेना के पास लगभग 100-104 एन-32 मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट विमान हैं। जिनकी पेलोड क्षमता लगभग 7.5 टन है। इनका उपयोग सामरिक परिवहन, सैनिकों की ढुलाई, और आपदा राहत के लिए किया जाता है। हालांकि कुछ एएन-32 को अपग्रेड भी किया गया है, जिसमें बेहतर एवियोनिक्स और इंजन शामिल हैं
वहीं, भारतीय वायुसेना के पास लगभग 17 इल्यूशिन Il-76एमडी विमान हैं। जिनकी पेलोड क्षमता लगभग 40-48 टन है। इनका उपयोग भारी उपकरण, टैंक, और लंबी दूरी के परिवहन के लिए होता है।
क्या है एमटीए की रिक्वॉयरमेंट
मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट (एमटीए) प्रोजेक्ट के तहत 18 से 30 टन तक की पेलोड क्षमता वाले जहाज चाहिए, जो स्वदेशी जोरावर लाइट टैंक (25 टन वजन) को भी ढो सकें। साथ ही अनप्रिपेयर्ड रनवे जैसे लद्दाख और पूर्वोत्तर के एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउंड्स पर काम करने की क्षमता हो। इसके अलावा मल्टी-रोल फंक्शनैलिटी जैसे कार्गो ट्रांसपोर्ट, ट्रूप्स (सैनिकों) की ढुलाई, पैराट्रूपर्स (पैराशूट सैनिकों) को भी ले जा सके। इसके अलावा सीलिंग क्षमता अधिकतम 40,000 फीट तक की हो। यानी इस उंचाई तक उड़ान भर सके।
Agniveer Retention Rate: भारतीय सेना ने स्पष्ट किया है कि आर्मी कमांडर्स कॉन्फ्रेंस में अग्निवीर रिटेंशन रेट को 25 फीसदी से बढ़ाकर 75 फीसदी करने का प्रस्ताव पूरी तरह से गलत और काल्पनिक हैं। सेना ने गुरुवार को एक आधिकारिक बयान जारी करते हुए कहा कि इस तरह की रिपोर्टें “बिना सत्यापन प्रकाशित की गईं” हैं।
इंडियन एक्सप्रेस ने खबर छापी थी कि सरकार जैसलमेर में चल रही आर्मी कमांडर्स कॉन्फ्रेंस के एजेंडे में अग्निवीर नीति में बदलाव का प्रस्ताव रखा गया है। जिसमें 25 फीसदी से बढ़ा कर 75 फीसदी अग्निवीरों को स्थाई करने का प्रस्ताव है। इस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि जैसलमेर में चल रही आर्मी कमांडर्स कॉन्फ्रेंस के एजेंडे में अग्निवीर नीति में बदलाव, थिएटर कमांड पर चर्चा और मिशन सुदर्शन चक्र की समीक्षा शामिल है।
भारतीय सेना ने इन सभी दावों को सिरे से खारिज करते हुए कहा, “यह रिपोर्ट पूरी तरह से काल्पनिक और गलत है। कॉन्फ्रेंस के एजेंडा से जुड़ी जो बातें इस लेख में कही गई हैं, वे सत्य नहीं हैं। यह एक क्लोज-डोर और क्लासिफाइड बैठक होती है।
आर्मी हेडक्वार्टर ने अपने बयान में कहा कि कॉन्फ्रेंस की प्रकृति पूरी तरह स्ट्रैटेजिक और क्लासिफाइड होती है, जिसमें एजेंडा या चर्चाओं की जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाती। सेना के प्रवक्ता ने कहा कि रिपोर्ट में शामिल अधिकांश बिंदु जैसे कि अग्निवीर रिटेंशन का प्रतिशत बढ़ाना, मिशन सुदर्शन चक्र की समीक्षा और थिएटर कमांड से जुड़ी चर्चाएं कॉन्फ्रेंस का हिस्सा नहीं हैं।
Agniveer Retention Rate
सेना का कहना है, “आर्मी कमांडर्स कॉन्फ्रेंस के सभी सेशन राष्ट्रीय सुरक्षा, ऑपरेशनल रणनीति और संगठनात्मक सुधारों पर केंद्रित होते हैं। इस बैठक में क्या चर्चा होगी, यह पहले से सार्वजनिक नहीं किया जाता।
आर्मी कमांडर्स कॉन्फ्रेंस भारतीय सेना का सबसे महत्वपूर्ण डिसिजन मेकिंग प्लेटफॉर्म है। यह बैठक साल में दो बार होती है। इस कॉन्फ्रेंस में सेना प्रमुख, सातों कमान के प्रमुख, उप-सेना प्रमुख और अन्य वरिष्ठ अधिकारी भाग लेते हैं। जिसमें ऑपरेशनल तैयारियों, ट्रेनिंग, संगठनात्मक बदलाव और प्रशासनिक मुद्दों की समीक्षा करते हैं। यह दो चरणों में होती है, पहली दिल्ली में और दूसरी किसी फील्ड लोकेशन पर।
जैसलमेर में चल रही यह बैठक ऑपरेशन सिंदूर के बाद पहली बार हो रही है। इस बैठक में सुरक्षा स्थिति, सीमावर्ती इलाकों की तैयारियां और संसाधन आवंटन जैसे विषयों पर चर्चा की जा रही है। सेना ने कहा कि यह मंच किसी नीति परिवर्तन या भर्ती-संबंधी फैसला की सार्वजनिक घोषणा के लिए नहीं होता। ऐसे किसी प्रस्ताव का उल्लेख करना गलत है।
अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक, सेना इस मुद्दे पर विचार कर रही है क्योंकि पहला अग्निवीर बैच अगले साल चार वर्ष की सेवा पूरी करेगा, और ऐसे में यह तय करना आवश्यक है कि कितने अग्निवीरों को स्थायी सेवा में रखा जाए। अभी तक नीति के अनुसार केवल 25 फीसदी अग्निवीरों को स्थायी सेवा में रखा जाता है, जबकि बाकी को सिविल सेक्टर में रीसेटलमेंट के लिए भेजा जाता है।
रिपोर्ट में रिटेंशन रेट बढ़ाने के पीछे वजह बताई गई है कि सीमावर्ती इलाकों में लगातार तैनाती, प्रशिक्षण लागत और कर्मियों की निरंतरता को बनाए रखना जरूरी है। इससे सेना में अनुभवी जवानों की संख्या बनी रहेगी और प्रशिक्षण में निवेश का लाभ लंबे समय तक मिलेगा।
साथ ही, इस बार के सम्मेलन में इक्विपमेंट्स का स्टैंडर्डाइजेशन, कॉमन लॉजिस्टिक चेन और जॉइंट ट्रेनिंग पर भी चर्चा होगी।” इसके अलावा, रिपोर्ट में मिशन सुदर्शन चक्र के तहत चल रही पहलों की समीक्षा और वेटरन्स के बेहतर उपयोग की बात भी शामिल थी। वर्तमान में अधिकांश वेटरन्स केवल आर्मी वेलफेयर एजुकेशन सोसाइटी ईसीएचएस पॉलीक्लिनिक जैसी सीमित भूमिकाओं में एक्टिव हैं। वहीं सेना देख रही है कि कैसे इन्हें फॉर्मेशंस और ट्रेनिंग सेंटर्स में अहम भूमिकाएं दी जा सकती हैं।
इसके अलावा अखबार की रिपोर्ट में सेना, नौसेना और वायुसेना के बीच बेहतर जॉइंटनेस के लिए कई उपायों पर चर्चा होने की बात कही गई है, जिनमें कॉमन ट्रेनिंग, स्टैंडर्डाइज्ड लॉजिस्टिक्स चेन, और इंटीग्रेटेड पोस्टिंग सिस्टम शामिल हैं। सेना का मानना है कि आधुनिक युग में किसी भी देश की सैन्य ताकत केवल हथियारों से नहीं, बल्कि जॉइंट कॉर्डिनेशन से तय होती है। ऑपरेशन सिंदूर ने यह दिखा दिया कि जब तीनों सेनाएं एक लक्ष्य पर साथ काम करती हैं, तो परिणाम निर्णायक होते हैं।
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