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Modi Xi Putin SCO: ट्रंप ने दिया रूस, भारत और चीन को मल्टीपोलर दुनिया बनाने का मौका, क्या फिर से जिंदा हो गया है RIC?

Modi Xi Putin SCO Meeting in Tianjin Sparks Buzz, What is RIC?

Modi Xi Putin SCO: तियानजिन में एससीओ समिट के दौरान पीएम मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की फोटो वायरल हुई। इस फोटो में दुनिया की तीन महाशक्तियां एक साथ नजर आ रही हैं। वहीं इन तस्वीरों के अलग-अलग मायने भी निकाले जा रहे हैं। इस तस्वीर को न्यू ग्लोबल ऑर्डर से जोड़ कर देखा जा रहा है। जानकारों का कहना है कि अगर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप भारत पर 50 फीसदी का टैरिफ न लगाते तो, तीनों का इस तरह साथ आना मुश्किल था। वहीं इस तस्वीर को आरआईसी यानी रूस, इंडिया और चीन स्ट्रक्चर से जोड़ कर देखा जा रहा है, जिसकी प्रस्तावना खुद रूस ने ही लिखी थी।

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Modi Xi Putin SCO: ट्रंप ने भारत को किया मजबूर

ट्रंप ने जब से व्हाइट हाउस में वापसी की है, उन्होंने भारत पर 50% तक भारी टैरिफ लगा दिए हैं। इस वजह से भारत की स्टील, ऑटोमोबाइल और दवा जैसी इंडस्ट्रीज को लगड़ा झटका लगा है। ट्रंप के सलाहकारों ने सार्वजनिक तौर पर मोदी सरकार की नीतियों को “अनफेयर” और “लूट” तक कह दिया। ट्रंप ने खुद कहा, “इंडिया हमें बहुत बड़ा चूना लगा रहा है, अब हमें सख्त जवाब देना होगा।”

भारत ने ट्रंप के इन कदमों का जवाब ट्रेड वार से नहीं दिया, बल्कि दरवाजा बातचीत के लिए खुला रखा। संदेश साफ था कि दशकों से बने भारत-अमेरिका रिश्तों को एक राष्ट्रपति की आक्रामक नीतियों के कारण खराब नहीं किया जाएगा।

लेकिन ट्रंप सरकार की टैरिफ और लगातार हो रही बयानबाजी ने भारत को नई रणनीतिक सोच अपनाने पर मजबूर किया। भारत अब मल्टीपोलर और मल्टीलेटरल व्यवस्था का पक्षधर बनकर उभर रहा है, जिसमें वह रूस और चीन के साथ मिलकर वैश्विक संतुलन की दिशा तय करने की कोशिश कर रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि जैसे शीत युद्ध के बाद भारत-अमेरिका संबंध सामान्य हुए थे, वैसे ही आज की परिस्थितियां भी रणनीतिक प्राथमिकताओं के हिसाब से भारत को नए रास्ते चुनने पर मजबूर कर रही हैं। भारत और चीन के नजदीक आने की बड़ी वजह भी ट्रंप की विनाशकारी नीतियां हैं, जो न केवल अमेरिका बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए खतरनाक है।

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि एससीओ का यह फोटो अमेरिका को लंबे समय तक परेशान करेगा। ट्रंप को इसके लिए नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिए, क्योंकि उनकी टैरिफ नीति ही नए ग्लोबल ऑर्डर की शुरुआत का मोड़ साबित हो रही है।

Modi Xi Putin SCO: भारत-रूस-चीन (RIC) की अहमियत

भारत, रूस और चीन का पुराना आरआईसी स्ट्रक्चर और एससीओ अब ऐसे मंच बनते दिख रहे हैं, जहां भारत खुद को अमेरिका और पश्चिमी देशों की नीतियों के मुकाबले एक स्वतंत्र ताकत के रूप में पेश कर रहा है। जुलाई में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था, “बहुध्रुवीय दुनिया हमारी सबसे बड़ी ताकत है और हमें देखना होगा कि ब्रिक्स आने वाले समय में इसका मार्गदर्शन कैसे कर सकता है।” वहीं, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी भारत का समर्थन करते हुए कहा था, “हम एकतरफा संरक्षणवाद का विरोध करने में एकजुट खड़े हैं।”

Modi Xi Putin SCO: RIC को जिंदा करने की कोशिश

रूस की मध्यस्थता को समझने के लिए RIC यानी रूस-भारत-चीन त्रिकोण की पृष्ठभूमि जानना जरूरी है। इस विचार को 1998 में रूस के प्रधानमंत्री रहे येवगेनी प्रिमाकोव ने पेश किया था। उनका मानना था कि यह त्रिपक्षीय सहयोग अमेरिकी प्रभुत्व का संतुलन बना सकता है। तब से मास्को इस मंच को मजबूत करने की कोशिश करता आ रहा है।

2025 के हालात में भी रूस फिर से उसी आरआईसी को जिंदा करने की कोशिश कर रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों ने भारत के साथ रिश्तों में तनाव पैदा किया है। व्यापार पर 50% तक के शुल्क ने नई दिल्ली को परेशान किया और वॉशिंगटन ने बार-बार भारत की डिफेंस पॉलिसी की आलोचना की।

इसी माहौल में रूस ने भारत को साधने का प्रयास तेज किया है। मास्को जानता है कि अगर भारत उसके साथ बना रहता है, तो पश्चिमी देशों का दबाव कम किया जा सकता है। यही वजह है कि पुतिन और लावरोव बार-बार आरआईसी को पुनर्जीवित करने की बात करते हैं।

2020-2021 के बाद आरआईसी काफी हद तक निष्क्रिय हो गया। कोविड महामारी और भारत-चीन तनाव ने इसे कमजोर किया। लेकिन 2024-2025 में इसे पुनर्जीवित करने की कोशिशें शुरू हुईं। मई 2025 में रूसी विदेश मंत्री लावरोव ने अपनी भारत यात्रा के दौरान आरआईसी को बहाल करने की अपील की। चीन ने इसका समर्थन किया, लेकिन भारत ने सावधानी बरती।

रूस का दांव और “ग्रेटर यूरेशिया”

दरअसल मास्को लंबे समय से चाहता है कि भारत और चीन के बीच स्थिरता बनी रहे ताकि वह अपने ‘ग्रेटर यूरेशिया’ विजन को आगे बढ़ा सके। इस विजन को राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने 2015 में सामने रखा था। इसके तहत रूस चाहता है कि एशिया-यूरोप के बड़े देश और क्षेत्रीय संगठन एक साझा धुरी पर काम करें। भारत, चीन और रूस इस धुरी के सबसे अहम हिस्से हैं।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर राजन कुमार का मानना है कि रूस द्वारा रूस-भारत-चीन (RIC) प्रारूप को दोबारा शुरू करने की कोशिश “रूस की केवल इच्छाशक्ति हो सकती है, जो मौजूदा वास्तविक दुनिया और मौजूदा भू-राजनीतिक हालात में संभव नहीं दिखती।” हालांकि, उन्होंने रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव की इस चेतावनी से सहमति जताई कि पश्चिमी देश भारत-चीन संबंधों को “फूट डालो और राज करो” की नीति के जरिए कमजोर करना चाहते हैं।

Drone Security: सेनाओं को सप्लाई हो रहे ड्रोनों में चीनी पुर्जों का पता लगाना मुश्किल! तस्करी से भारत लाए जा रहे पार्ट्स, सुरक्षा को बड़ा खतरा!

Drone Security Concerns: Chinese Components and Foreign Dependence Raise Alarm in India

Drone Security: ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेनाओं का फोकस ड्रोन टेक्नोलॉजी पर है। ड्रोन को लेकर सेनाओं में नई फॉर्मेशन की जा रही हैं। वहीं ड्रोन में इस्तेमाल होने वाले कंपोनेंट्स को लेकर भी सेना में लगातार सवाल उठते रहे हैं। सरकार ने कुछ समय पहले एक एडवाइजरी भी जारी करके ड्रोन बनाने वाली कंपनियों से कहा था कि वे अपने ड्रोनों में चीनी पार्ट्स का इस्तेमाल न करें। इसके लिए सरकार एक पॉलिसी भी लाने की तैयारी कर रही है, जिसे जल्द मंजूरी मिलने की संभावना है। वहीं, सेना, नौसेना और वायुसेना के अफसरों ने सरकार से कहा है कि भारतीय ड्रोनों में इस्तेमाल होने वाले कई कंपोनेंट्स कहां से आ रहे हैं, यह पता लगाना मुश्किल है।

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Drone Security: कंपोनेंट्स की स्मगलिंग

सूत्रों ने बताया कि सबसे बड़ी समस्या यह है कि ड्रोन में इस्तेमाल होने वाले जरूरी कंपोनेंट्स कहां बन रहे हैं और कहां से आ रहे हैं, यह पता लगाना मुश्किल है। इनमें इलेक्ट्रॉनिक स्पीड कंट्रोलर, फ्लाइट कंट्रोलर, ट्रांसमीटर, रिसीवर, एन्क्रिप्शन और ऑथेंटिकेशन सिस्टम शामिल हैं। इन कंपोनेंट्स में से कई के बारे में संदेह जताया जा रहा है कि वे चीन से आए हैं। इनमें से कई कंपोनेंट्स स्मगलिंग के जरिए भारत लाए जाते हैं, ऐसा सप्लाई चेन को छिपाने के लिए किया जाता है। ये कई देशों से भारत लाए जाते हैं, जिससे यह पता नहीं चलता कि इन्हें कहां और किस देश में बनाया गया है। वहीं ये कंपोनेंट्स भारत में बन रहे कई ड्रोनों में भी इस्तेमाल हो रहे हैं। अब ये चीन में बने हैं या किसी और देश के, ये पता लगाना मुश्किल है।

Drone Security: भारतीय सेना में DJI ड्रोन

आज भी सेना में चीनी कंपनी डीजेआई के ड्रोन जमकर इस्तेमाल किए जा रहे हैं। ये ड्रोन न केवल राजधानी बल्कि चीनी सरहद एलएसी से सटे रणनीतिक इलाकों में भी खूब इस्तेमाल किए जा रहे हैं। सेना के वरिष्ठ अफसरों से जब इसके बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि यह ड्रोन पहले खरीदे गए थे, फिलहाल कोई भी ड्रोन चीन से नहीं खरीदा गया है। वहीं पुराने ड्रोनों को चरणबद्ध तरीके से हटाया जाएगा। लेकिन तब तक ये ड्रोन भारतीय सेना के लिए बड़ा खतरा बने रहेंगे।

Drone Security: चीन का साइबर सुरक्षा कानून बड़ा खतरा

सूत्रों का कहना है कि चीन का 2015 का साइबर सुरक्षा कानून एक बड़ा खतरा है। इस कानून के तहत हर चीनी कंपनी को अपने प्रोडक्ट्स से जुड़ा डेटा सरकार के साथ साझा करना जरूरी है, चाहे वह डेटा चीन के अंदर से आया हो या दुनिया के किसी और हिस्से से। रक्षा सूत्रों के मुताबिक, इसका मतलब है कि अगर भारतीय सेनाओं के ड्रोन सिस्टम में चीनी सब-सिस्टम लगा है, तो उसकी मदद से लाइव या रिकॉर्डेड डेटा चीन तक पहुंच सकता है। यह डेटा दुश्मन देशों के सर्वर तक जा सकता है और भारत की सुरक्षा को बड़ा खतरा पैदा कर सकता है।

Drone Security: विदेशी सैटेलाइट का इस्तेमाल

भारतीय सेनाओं के लिए दूसरी बड़ी समस्या है ड्रोन ऑपरेशन में विदेशी सैटेलाइट नेटवर्क का इस्तेमाल। अभी भारतीय सेना के कई ड्रोन स्टारलिंक या चीन के कियानफान जैसे विदेशी सैटेलाइट पर निर्भर हैं। भारत का स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम NavIC अभी पूरी तरह से काम नहीं कर रहा है। इसके चलते भारत को विदेशी जीपीएस पर भरोसा करना पड़ रहा है। बता दें कि 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान अमेरिका ने भारत को जीपीएस डेटा देने से मना कर दिया था।

Drone Security: नौसेना भी विदेशी कंपनियों पर निर्भर

सूत्रों के मुतााबिक भारतीय नौसेना के बेड़े में मौजूद कई रिमोटली पायलेटेड एयरक्राफ्ट (RPA) भी विदेशी कंपनियों पर निर्भर हैं। वहीं नौसेना को समुद्री नक्शे (mapping) के लिए उन्हें विदेशी ऑरिजनल इक्विपमेंट्स मैन्युफैक्चर्रर्स के पर भरोसा रहना पड़ता है, जो ऑपरेशनल इंडीपेंडेंस के लिहाज से सही नहीं है। इसके अलावा, नौसेना के ड्रोन ऐसे सॉफ्टवेयर्स पर चलते हैं जिन्हें समय-समय पर अपडेट की जरूरत होती है। ये अपडेट विदेशी कंपनियों से भेजे जाते हैं। सूत्र बताते हैं कि अपडेट्स में लंबा वक्त लगता है और उस दौरान सिस्टम के हैक होने का डेटा चोरी होने का बड़ा खतरा होता है। इसके अलावा नौसेना भी विदेशी सैटेलाइट सर्विस प्रोवाइडर्स पर भी निर्भर है, जिससे ऑपरेशनल डेटा के लीक होने का खतरा हमेशा बना रहता है।

एक साल से अटकी है पॉलिसी!

सूत्रों के मुताबिक, भारत सरकार जल्द ही सेना में इस्तेमाल होने वाले ड्रोनों के लिए सिक्योरिटी फ्रेमवर्क पॉलिसी लाने की तैयारी कर रही है। आर्मी डिजाइन ब्यूरो की तरफ से इसका प्रपोजल सरकार को पहले ही सौंपा जा चुका है। सितंबर या अक्टूबर तक इस पॉलिसी को मंजूरी मिल जाएगी। लेकिन तब तक भारतीय सेनाओं को ऐसे सिस्टम्स पर काम करना पड़ रहा है, जिनमें न केवल संदिग्ध विदेशी तकनीक शामिल है, बल्कि डेटा लीक और हैकिंग का खतरा भी लगातार बना हुआ है।

भारतीय बाजार में उपलब्ध ज्यादातर ड्रोन और क्वाडकॉप्टर या तो पूरी तरह चीनी हैं या फिर उनमें चीनी कंपोनेंट्स का इस्तेमाल किया गया है। जिसके चलते सेना ने ड्रोन खरीद से जुड़ी नई नीति लागू की है। पहले केवल इतना सर्टिफिकेट देना काफी होता था कि ड्रोन में कोई चीनी कंपोनेंट का इस्तेमाल नहीं हुआ है। लेकिन अब इसके साथ एक और जरूरी शर्त जोड़ दी गई है।

कंपनियों को यह भी सर्टिफिकेट देना होगा कि ड्रोन में कोई “मिलिशियस कोड” यानी ऐसा सॉफ्टवेयर या प्रोग्राम मौजूद नहीं है, जो सिस्टम को हैक कर सके या नेटवर्क को नुकसान पहुंचा सके। जांच के दौरान जिन ड्रोनों में चीनी पार्ट्स पाए जाते हैं, उन्हें तुरंत रेस से बाहर कर दिया जाता है और संबंधित कंपनियों के कॉन्ट्रैक्ट रद्द कर दिए जाते हैं। इसी के चलते पिछले साल एक कंपनी का बड़ा कॉन्ट्रैक्ट रद्द कर दिया गया था। सेना ने इस कंपनी से तीन अलग-अलग तरह के लॉजिस्टिक ड्रोनों की खरीद का ऑर्डर दिया था। लेकिन जांच में गड़बड़ी सामने आने के बाद सौदा रोक दिया गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, जिन ड्रोनों की डिलीवरी कैंसिल की गई, उनकी संख्या लगभग 400 के आसपास थी।

साथ ही, रक्षा मंत्रालय में इस सुझाव पर भी चर्चा हो रही है कि यूएवी और काउंटर-यूएवी के अहम पुर्जों को “पॉजिटिव इंडिजेनाइजेशन लिस्ट” में जोड़ा जाए। इसका मतलब यह होगा कि तय समय सीमा के बाद इन पुर्जों का आयात पूरी तरह बंद कर दिया जाएगा और इन्हें सिर्फ भारत में ही बनाया जाएगा। साथ ही मार्च 2019 में जारी की गई “डिफेंस प्लेटफॉर्म्स में इस्तेमाल होने वाले कंपोनेंट्स और स्पेयर्स की इंडिजेनाइजेशन पॉलिसी” की दोबारा समीक्षा करने की बात भी कही गई है। इसके तहत भारतीय कंपनियों द्वारा बनाए गए पुर्जों का मुफ्त और बिना किसी शर्त के टेस्टिंग की जा सकेगी।

Modi-Xi Meeting in Tianjin: क्या भारत से अपनी शर्तों पर अच्छे संबंध चाहता है चीन? सीमा विवाद क्यों है अब भी बड़ी चुनौती?

Modi-Xi Meeting in Tianjin: Border Peace Still a Challenge Despite Progress

Modi-Xi Meeting in Tianjin: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात शंघाई सहयोग संगठन (SCO) सम्मेलन के दौरान तियानजिन में हुई। यह बैठक ऐसे समय में हुई जब भारत और अमेरिका के रिश्तों में ट्रंप प्रशासन की टैरिफ पॉलिसी के चलते तनाव आया है। लिहाजा, इस मुलाकात पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी थीं।

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प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “हमारे विशेष प्रतिनिधियों के बीच बॉर्डर मैनेजमेंट को लेकर सहमति बनी है। कैलाश मानसरोवर यात्रा फिर से शुरू हुई है और दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानों को भी बहाल किया जा रहा है। 2.8 अरब लोगों के हित आपसी सहयोग से जुड़े हैं। भारत रिश्तों को आपसी विश्वास, सम्मान और संवेदनशीलता के आधार पर आगे ले जाना चाहता है।”

राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा, “दुनिया परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। भारत और चीन दो सबसे प्राचीन सभ्यताएं हैं। हम दोनों ग्लोबल साउथ का हिस्सा हैं। ड्रैगन और एलिफेंट का साथ आना एशिया और पूरी दुनिया के लिए जरूरी है।”

Modi-Xi Meeting in Tianjin: सीमा पर क्या हैं हालात: शांति लेकिन नहीं है भरोसा

हालांकि भारत और चीन ने डिसएंगेजमेंट की प्रक्रिया पूरी करने का दावा किया है, लेकिन जमीनी हालात अब भी चिंताजनक हैं। सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, “गलवान और पैंगोंग झील के उत्तरी किनारे पर अस्थायी बफर जोन बनाए गए थे। इन्हें अस्थायी कहा गया था, लेकिन अब तक गश्त पूरी तरह बहाल नहीं हुई। भारतीय जवान उन इलाकों में नहीं जा पा रहे जिन्हें वे पहले नियमित रूप से गश्त करते थे।”

एक अन्य अधिकारी ने बताया, “पीएलए की कई ब्रिगेड अब भी आगे की चौकियों पर मौजूद हैं। उनके पास टैंक, तोपें और सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम तैनात हैं। उन्होंने अपने डिफेंस रेजिमेंट्स को पीछे नहीं हटाया है। यह भरोसा न होने की सबसे बड़ी वजह है।”

पूर्वी लद्दाख में तैनात एक अधिकारी ने कहा, “हमारी प्राथमिकता पैट्रोलिंग राइट्स को बहाल करना है। जब तक हमारे जवान पारंपरिक इलाकों में गश्त नहीं कर पाते, तब तक सीमा पर स्थायी शांति की बात अधूरी रहेगी।”

पूर्वी लद्दाख में 2020 से 2022 के बीच बने “नो पैट्रोल बफर जोन” भारत के लिए नुकसानदेह साबित हुए हैं। इनमें गलवान, पैंगोंग त्सो का उत्तर किनारा, कैलाश रेंज और गोगरा-हॉट स्प्रिंग्स जैसे क्षेत्र शामिल हैं। ये बफर जोन अस्थायी तौर पर बनाए गए थे, जिनकी चौड़ाई 3 से 10 किलोमीटर तक है। भारतीय अधिकारियों के मुताबिक, इन्हें केवल अस्थायी व्यवस्था के तौर पर स्वीकार किया गया था, लेकिन अब तक कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है।

Modi-Xi Meeting in Tianjin: सीमा विवाद अब भी वहीं का वहीं

सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ रिटायर्ड कोमोडर सी. उदय भास्कर ने कहा, “तियानजिन में जो हुआ उसे प्रगति तो कहा जा सकता है, लेकिन इसे ‘ब्रेकथ्रू’ कहना सही नहीं होगा। सीमा विवाद अब भी वहीं का वहीं है। दोनों देशों की कोशिश फिलहाल संवाद बनाए रखने और रिश्तों को स्थिर करने तक ही सीमित है।”

उन्होंने कहा, तियानजिन बैठक का नतीजा सावधानी से स्वागत करने लायक है। यह दोनों नेताओं का उस सहमति को राजनीतिक स्तर पर समर्थन था, जो अगस्त की शुरुआत में चीन के विदेश मंत्री वांग यी की दिल्ली यात्रा के दौरान बनी थी। भारत सरकार के आधिकारिक बयान में कहा गया कि “दोनों नेताओं ने पिछले साल रूस के कजान में हुई मुलाकात के बाद से रिश्तों में सकारात्मक प्रगति और स्थिरता का स्वागत किया।”

Modi-Xi Meeting in Tianjin: संदेह और अविश्वास कायम है

पूर्व राजनयिक विजय गोखले का कहना है, तियानजिन में सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात को न केवल दिल्ली बल्कि दुनिया की कई राजधानियों में गंभीरता से देखा जा रहा है। उन्होंने कहा, “भारत हमेशा से चाहता है कि चीन के साथ कामकाजी रिश्ते बने रहें। लेकिन 2020 की गलवान झड़प ने उस प्रक्रिया को झटका दिया था। अब तियानजिन की बैठक को उसी प्रक्रिया की बहाली माना जा रहा है। फिर भी संदेह और अविश्वास कायम है।”

वह कहते हैं, राजीव गांधी के बाद से भारत के हर प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने चीन के साथ स्थिर रिश्ते बनाए रखने की कोशिश की है। नरेंद्र मोदी भी इससे अलग नहीं हैं। हालांकि यह सच है कि मौजूदा भारत-चीन संबंध हाल के दशकों की तुलना में कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण हैं, लेकिन हर प्रधानमंत्री को यही उम्मीद रही है कि वे सीमा पर स्थिरता लाएंगे और चीन के साथ संबंधों को सही दिशा में मोड़ेंगे।

उन्होंने कहा, हालांकि, यह भी सच है कि भारत-चीन संबंधों ने कई बार गंभीर झटके खाए हैं। 2017 का डोकलाम संकट, 2020 की गलवान झड़प ने इस दिशा में हुई प्रगति को बाधित किया है। इस बार भी, तिआनजिन की बैठक से उम्मीद की जा रही है कि यह फिर से दोनों देशों के बीच भरोसे का माहौल बना सकती है। इसके साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि भारत और चीन, दो बड़े एशियाई देश, वैश्विक अस्थिरता के दौर में स्थिरता बनाए रखने की दिशा में एक साझा इच्छा रखते हैं।

उन्होंने कहा कि भारत को अब देखना होगा कि चीन के शब्दों के पीछे ठोस कार्रवाई भी होती है या नहीं। चीन ने पहले भी कहा है कि भारत को कृषि उत्पाद, दवा उद्योग और आईटी सेवाओं के लिए बड़ा बाजार मिलेगा। लेकिन जब भी भारत ने अपने निर्यात को बढ़ाने की कोशिश की, तो चीन ने गैर-शुल्क बाधाओं और “प्रतिबंधों” का सहारा लिया।

वह आगे कहते हैं, भारत को यह समझना होगा कि अमेरिका अगर अपनी विदेश नीति को केवल अपने स्वार्थ के आधार पर पुन: संतुलित करता है, तो भारत को भी चीन के साथ रणनीतिक पुनर्संतुलन तलाशने का अधिकार है। भारत के लिए अब सवाल यह है कि क्या वह चीन और अमेरिका दोनों के साथ संतुलित संबंध बनाए रख सकता है। तिआनजिन की बैठक इस बात का संकेत हो सकती है कि भारत एक नए संतुलन की ओर बढ़ रहा है, जहां भारत-चीन संबंध और भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी साथ-साथ चलें।

Modi-Xi Meeting in Tianjin: कांग्रेस ने उठाए सवाल

कांग्रेस ने इस बैठक पर सवाल उठाए। पार्टी नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पर लिखा, “गलवान में 20 जवानों की शहादत के बावजूद मोदी सरकार चीन के साथ सुलह की राह पर है। प्रधानमंत्री ने चीन की आक्रामकता को नजरअंदाज कर दिया है।”

कांग्रेस के आधिकारिक हैंडल से पोस्ट किया गया, “ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन पाकिस्तान की मदद कर रहा था। फिर भी प्रधानमंत्री मोदी ने शी जिनपिंग से हाथ मिलाया और मुस्कुराते हुए तस्वीरें खिंचवाईं।”

चीनी सेना अभी भी अग्रिम मोर्चों पर

भारतीय सेना के एक वरिष्ठ कमांडर ने कहा, “चीनी सेना की कुछ ब्रिगेड जरूर 100 किलोमीटर पीछे हटी हैं, लेकिन कई अब भी अग्रिम मोर्चों पर मौजूद हैं। इसका मतलब यह है कि वे किसी भी वक्त अपनी स्थिति बदल सकते हैं। हमें हर स्थिति के लिए तैयार रहना होता है। डिप्लोमेसी जरूरी है, लेकिन हमारी जिम्मेदारी है कि किसी भी संभावित खतरे का सामना करने के लिए हम तैयार रहें।” एक कॉम्बाइंड आर्म्स ब्रिगेड में लगभग 4,500 से 5,000 सैनिक होते हैं, जिनके पास टैंक, बख्तरबंद गाड़ियां, तोपखाना और सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें होती हैं।

उन्होंने आगे कहा, “चीनी सेना ने सीमा पर बुनियादी ढांचे का विस्तार किया है। नई सड़कें, पुल और एयरबेस बनाए हैं। हमें बराबरी पर खड़े रहने के लिए बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है।” उन्होंने साफ कहा, “भले ही सीमा पर अब स्थिति पहले जैसा ‘हाई अलर्ट’ नहीं है, लेकिन अविश्वास बना हुआ है। जब तक डिएस्केलेशन और डी-इंडक्शन पूरा नहीं होता, तब तक कोई भी पक्ष ढील नहीं देगा।”

व्यापार असंतुलन का क्या होगाा?

तियानजिन में हुई बैठक में आर्थिक मुद्दों पर भी बात हुई। भारत ने व्यापार असंतुलन का मुद्दा उठाया। चीन भारत से कम खरीदता है जबकि भारत चीन से मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और रोजमर्रा की चीजें बड़ी मात्रा में आयात करता है।

इसके अलावा, चीन द्वारा यारलुंग त्सांगपो (ब्रह्मपुत्र) पर विशाल जलविद्युत परियोजना बनाए जाने की योजना पर भारत ने अपनी चिंता जताई। सूत्र मानते हैं कि इसका असर असम और अरुणाचल प्रदेश के जल संसाधनों पर पड़ सकता है। क्योंकि चीन ने हाइड्रोलॉजिकल डेटा शेयर करने को लेकर कुछ भी नहीं कहा है।

Woman IAF pilot: दिल्ली हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला; महिला को एयरफोर्स पायलट के पद पर नियुक्त करे वायु सेना

Woman IAF pilot delhi high court verdict
Source: IAF

Woman IAF pilot: दिल्ली हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए केंद्र सरकार को आदेश दिया है कि एक महिला उम्मीदवार को भारतीय वायुसेना में पायलट के पद पर नियुक्त किया जाए। कोर्ट ने कहा कि आज के समय में सशस्त्र बलों में लैंगिक भेदभाव की कोई जगह नहीं है।

Supreme Court on JAG Posts: सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की सेना की भर्ती नीति, अब जज एडवोकेट जनरल में लिंग के आधार पर नहीं होगा भेदभाव

यह फैसला जस्टिस सी. हरि शंकर और जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला की बेंच ने सुनाया। मामला 2023 में आयोजित नेशनल डिफेंस एकेडमी और नेवल एकेडमी परीक्षा से जुड़ा हुआ था, जिसमें महिला उम्मीदवार ने सातवां स्थान हासिल किया था।

Woman IAF pilot: क्या है पूरा मामला

याचिकाकर्ता ने कोर्ट में दलील दी थी कि 17 मई 2023 को जारी नोटिफिकेशन के तहत वायुसेना की फ्लाइंग ब्रांच में 92 पद निकाले गए थे, जिनमें से केवल दो सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित थीं। नतीजों की घोषणा के बाद दोनों महिला सीटें भर गईं, लेकिन कुल 90 में से केवल 70 सीटें ही भरी गईं और बाकी 20 पद खाली रह गए।

महिला याचिकाकर्ता ने कोर्ट से आग्रह किया कि उसे इन 20 खाली पदों में से एक पर नियुक्ति दी जाए। उसने कहा कि भर्ती के नोटिफिकेशन में कहीं भी यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि 90 सीटें केवल पुरुष उम्मीदवारों के लिए आरक्षित हैं।

केंद्र सरकार ने दिया ये तर्क

केंद्र सरकार की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि शेष 90 सीटें केवल पुरुष उम्मीदवारों के लिए थीं। उनका कहना था कि इन खाली पदों को बाद में अन्य भर्ती प्रक्रियाओं जैसे एयरफोर्स कॉमन एडमिशन टेस्ट (AFCAT) और संयुक्त रक्षा सेवा परीक्षा (CDSE) के जरिए भरा जाएगा।

हालांकि, अदालत ने इस तर्क को खारिज कर दिया। जजों ने कहा कि नोटिफिकेशन में कहीं भी यह उल्लेख नहीं था कि 90 पद केवल पुरुषों के लिए सुरक्षित हैं। यह पद महिला और पुरुष दोनों उम्मीदवारों के लिए खुले थे।

कोर्ट ने सख्त शब्दों में कहा कि “आज के समय में महिला और पुरुष के बीच का फर्क केवल एक क्रोमोसोमल परिस्थिति है। इससे अधिक महत्व देना न तो तार्किक है और न ही प्रासंगिक। हम सौभाग्य से अब उस दौर में नहीं हैं जब पुरुष और महिला उम्मीदवारों के बीच भेदभाव किया जा सकता था।”

12 पन्नों के अपने फैसले में अदालत ने केंद्र को आदेश दिया कि महिला उम्मीदवार को तुरंत फ्लाइंग ब्रांच के 20 खाली पदों में से एक पर नियुक्त किया जाए।

कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार खुद अपनी नीतियों में लैंगिक संतुलन की बात करती है और अधिसूचना में भी यह लिखा गया था कि “सरकार ऐसी वर्कफोर्स चाहती है जो लैंगिक संतुलन को दर्शाती हो।” ऐसे में महिला उम्मीदवार को अवसर न देना भेदभाव होगा।

महिला उम्मीदवार ने न केवल परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन किया बल्कि उसके पास “फिट टू फ्लाई” मेडिकल सर्टिफिकेट भी था। इसके बावजूद उन्हें नियुक्ति नहीं मिली। याचिकाकर्ता के वकील साहिल मोंगिया ने कोर्ट में कहा कि उम्मीदवार महिला मेरिट लिस्ट में सातवें स्थान पर थीं और सभी आवश्यक योग्यताएं पूरी करती थीं।

उन्होंने दलील दी कि जब 20 सीटें खाली रह गईं, तो उन्हें भरने के लिए योग्य महिला उम्मीदवारों पर विचार किया जाना चाहिए था। अदालत ने भी इस दलील को सही ठहराते हुए कहा कि किसी भी योग्य उम्मीदवार को सिर्फ लिंग के आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

जस्टिस हरि शंकर और जस्टिस शुक्ला ने कहा कि भेदभाव को जगह देने का मतलब है अतीत की उन गलतियों को दोहराना, जो अब समाज में स्वीकार्य नहीं हैं। उन्होंने कहा कि सशस्त्र बलों में भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है और सरकार की नीतियां भी इसी दिशा में संकेत करती हैं।

बता दें कि हाल के वर्षों में महिलाओं की भूमिका भारतीय सशस्त्र बलों में लगातार बढ़ी है। वायुसेना में महिला पायलटों की संख्या भी पहले से अधिक हो रही है। इस फैसले के बाद महिला उम्मीदवारों के लिए और अधिक रास्ते खुल सकते हैं। महिला अधिकारियों को पहले से ही फाइटर पायलट, हेलीकॉप्टर पायलट और विभिन्न ग्राउंड ड्यूटी ब्रांचों में नियुक्त किया जा रहा है।

Operation Sindoor IAF weapons: बड़ा खुलासा! वायुसेना के 50 से भी कम हथियारों के आगे झुका था पाकिस्तान, घबरा कर बंद कर दिए थे रडार

Operation Sindoor IAF weapons: Air Marshal Tiwari reveals IAF used fewer than 50 weapons to force Pakistan to truce
Indian Air Force Vice Chief Air Marshal Narmdeshwar Tiwari

Operation Sindoor IAF weapons: भारतीय वायुसेना के वाइस चीफ ऑफ एयर स्टाफ एयर मार्शल नरमदेश्वर तिवारी ने शनिवार को ऑपरेशन सिंदूर को लेकर बड़ा खुलासा किया। उन्होंने न केवल इस सैन्य अभियान के कई नए फुटेज शेयर किए बल्कि यह भी बताया कि भारतीय वायुसेना ने 50 से भी कम हथियारों का इस्तेमाल कर पाकिस्तान को सीज फायर की मेज पर बैठने पर मजबूर कर दिया।

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दिल्ली में आयोजित एनडीटीवी डिफेंस समिट के दौरान एयर मार्शल तिवारी ने कहा कि पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत के सामने कई विकल्प थे। वायुसेना के पास टारगेट्स की लंबी सूची मौजूद थी, लेकिन इनमें से नौ प्रमुख ठिकानों को चुनकर निशाना बनाया गया। उन्होंने कहा, “सबसे अहम बात यह है कि 50 से कम हथियारों के इस्तेमाल करके हमने इस युद्ध को समाप्त कर दिया। यही इस अभियान का सबसे बड़ा सबक है।”

Operation Sindoor IAF weapons: पहलगाम हमले के बाद ऑपरेशन की तैयारी

22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 लोगों की जान चली गई थी। इस हमले के बाद भारत सरकार ने स्पष्ट किया कि जवाब कड़ा और साफ-साफ नजर आने वाला होना चाहिए। जिसके बाद 7 मई को भारतीय वायुसेना ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के तहत पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में मौजूद आतंकवादी ठिकानों पर सटीक हमले किए।

एयर मार्शल तिवारी ने बताया कि 24 अप्रैल तक सभी विकल्पों पर चर्चा पूरी हो चुकी थी और नौ टारगेट तय कर लिए गए थे। बस राजनीतिक मंजूरी का इंतजार था। 7 मई की सुबह भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में मौजूद आतंकी और मिलिट्री ठिकानों पर हमला किया। इसके लिए सुखोई-30 एमकेआई, राफेल और मिराज-2000 लड़ाकू विमानों से ब्रहमोस, स्कैल्प, क्रिस्टल मेज-2 और रैम्पेज मिसाइलें दागी गईं।

Operation Sindoor IAF weapons: यह थे तीन उद्देश्य

एयर मार्शल तिवारी ने बताया कि नई दिल्ली से सेना को तीन साफ-साफ निर्देश मिले थे। पहला, जवाब इतना मजबूत होना चाहिए कि दुश्मन और दुनिया दोनों इसे साफ देख सकें। दूसरा, यह कार्रवाई भविष्य के लिए एक संदेश बने और आतंकवादी हमले दोहराने की हिम्मत कोई न कर सके। तीसरा, तीनों सेनाओं को पूरी ऑपरेशनल स्वतंत्रता दी गई, ताकि हालात बिगड़ने पर वे पूरी तरह से युद्ध के लिए भी तैयार रहें।

उन्होंने कहा कि वायुसेना की सटीक कार्रवाई से यह संदेश साफ चला गया कि भारत आतंकवाद को किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं करेगा।

Operation Sindoor IAF weapons: चलाया SEAD/DEAD अभियान

हमले के उसी दिन शाम को पाकिस्तान की तरफ से ड्रोन और लॉयटरिंग म्यूनिशन भारतीय सीमाओं की ओर भेजे गए। एयर मार्शल तिवारी ने बताया कि करीब 300 से ज्यादा ड्रोन और हाइपरसोनिक CM-400 जैसे हथियारों का इस्तेमाल किया गया। लेकिन भारत के इंटग्रेटेड डिफेंस सिस्टम ने इन्हें नाकाम कर दिया।

भारतीय वायुसेना ने इसके जवाब में “SEAD/DEAD अभियान” चलाया। यानी दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को टारगेट किया गया। इसमें पाकिस्तान के कई राडार और सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल सिस्टम (SAM) को निशाना बनाया गया।

तिवारी ने कहा कि पाकिस्तान ने जानबूझकर अपना एयरस्पेस बंद नहीं किया था ताकि भारत पर किसी नागरिक विमान को गिराने का आरोप लगाया जा सके। लेकिन भारतीय वायुसेना ने बेहद सावधानी बरतते हुए केवल सैन्य ठिकानों को ही निशाना बनाया।

Operation Sindoor IAF weapons: सटीकता से कार्रवाई

8 और 9 मई को पाकिस्तान ने और बड़े पैमाने पर ड्रोन और हथियार दागे। उनका मकसद भारतीय एयर डिफेंस सिस्टम को थका देना था। लेकिन भारतीय वायुसेना ने न सिर्फ इसे विफल किया बल्कि पाकिस्तान के अहम एयरबेस और रडार ठिकानों को तबाह कर दिया।

भारतीय हमलों में चकला, सरगोधा, रहिम यार खान, साकर और मुरिदके जैसे ठिकानों को सटीकता से निशाना बनाया गया। तिवारी ने बताया कि पाकिस्तान ने कई रडार डर के मारे खुद ही बंद कर दिए गए ताकि वे भारतीय हमलों से बच सकें।

उन्होंने कहा, “हमारे हथियार इतने सटीक थे कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह आरोप भी नहीं लगा पाया कि नागरिक ठिकानों पर हमला हुआ है।”

ऑपरेशन सिंदूर में वायुसेना की रणनीति

एयर मार्शल तिवारी ने खुलासा किया कि ऑपरेशन सिंदूर में केवल हथियारों की संख्या पर नहीं, बल्कि उनके सही इस्तेमाल पर ध्यान दिया गया। उन्होंने कहा कि नौ ठिकानों को चुनकर सटीक हमले किए गए और इन्हीं हमलों से पाकिस्तान को संघर्ष विराम के लिए राजी होना पड़ा।

वायुसेना के मुताबिक, कम समय में तेज और निर्णायक हमले करने की क्षमता ही भारत की सबसे बड़ी ताकत है। इस पूरे अभियान के दौरान भारतीय सेनाओं के बीच तालमेल और टेक्टिकल प्लानिंग का लेवल स्तर देखने को मिला जिसने पाकिस्तान को चौंका दिया। उन्होंने खुलासा किया कि मई 2025 में चले इस अभियान में वायुसेना ने 50 से भी कम एयर-लॉन्च हथियारों का इस्तेमाल कर पाकिस्तान के एयरबेस, राडार साइट और कमांड सेंटर को तबाह कर दिया। इनमें से कई ठिकाने परमाणु प्रतिष्ठानों के नजदीक भी थे।

एयर मार्शल तिवारी ने कहा कि यह पूरा अभियान एक “टेक्स्टबुक उदाहरण” था कि कैसे सीमित संसाधनों से सटीक और निर्णायक वार किया जा सकता है। उन्होंने इसे “कोएर्सिव डिप्लोमेसी” यानी दबाव डालने वाली कूटनीति और लागत प्रभावी वायु शक्ति का बेहतरीन नमूना बताया।

एयर मार्शल तिवारी ने कहा, “यह पहली बार हुआ कि इतने कम हथियारों से हमने इस जंग को खत्म कर दिया। इससे हमारी योजना और एयरपावर की क्षमता का पता चलता है।”

तिवारी ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने यह दिखा दिया कि एयरपावर का इस्तेमाल अगर सटीक और योजनाबद्ध तरीके से किया जाए तो बड़े नतीजे हासिल किए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि यह अभियान इस बात का उदाहरण है कि भारत अब किसी भी आतंकी हमले का जवाब अपने तरीके से देने में सक्षम है।

Self-Reliance in Defence: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह बोले- रक्षा में आत्मनिर्भरता अब विकल्प नहीं, बल्कि अस्तित्व की शर्त

Rajnath Singh: Self-Reliance in Defence is a Condition for Survival
Defence Minister Rajnath Singh (Photo: PIB)

Self-Reliance in Defence: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने शुक्रवार को राजधानी दिल्ली में आयोजित एनडीटीवी के ‘वारफेयर इन द ट्वेंटी फर्स्ट सेंचुरी’ डिफेंस कॉन्क्लेव में जोर देकर कहा कि आज के समय में आत्मनिर्भरता सिर्फ एक नारा नहीं बल्कि भारत की सुरक्षा और अस्तित्व की शर्त है। उन्होंने कहा कि आतंकवाद, महामारी और क्षेत्रीय संघर्षों के बीच यदि भारत को अपनी पहचान बनाए रखनी है तो रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर होना बेहद जरूरी है।

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रक्षा मंत्री ने साफ किया कि यह आत्मनिर्भरता किसी भी तरह का संरक्षणवाद नहीं है। उन्होंने कहा, “यह सुरक्षा कवच नहीं बल्कि संप्रभुता की पहचान है। जब एक युवा, तकनीक और ऊर्जा से भरा देश आत्मनिर्भरता की राह पर बढ़ता है तो पूरी दुनिया उसे देखकर रुक जाती है। यही भारत की असली ताकत है, जो हमें वैश्विक दबावों से और मजबूत बनाती है।”

Self-Reliance in Defence: ऑपरेशन सिंदूर का किया जिक्र

राजनाथ सिंह ने हाल ही में हुए ऑपरेशन सिंदूर को भारत की बढ़ती स्वदेशी ताकत का सबसे बड़ा उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान पर निर्णायक जीत और भारतीय सेना के तेज और सटीक हमलों के पीछे वर्षों की तैयारी और आत्मनिर्भर डिफेंस सिस्टम की भूमिका रही। रक्षा मंत्री ने कहा, “ऑपरेशन सिंदूर कुछ दिनों की लड़ाई की कहानी जरूर लगती है, लेकिन इसके पीछे वर्षों की रणनीतिक तैयारी और आत्मनिर्भर डिफेंस इक्विपमेंट्स पर निर्भरता है।”

Self-Reliance in Defence: सुदर्शन चक्र मिशन और एयर डिफेंस सिस्टम

रक्षा मंत्री ने प्रधानमंत्री द्वारा घोषित सुदर्शन चक्र मिशन को भारत की सुरक्षा का भविष्य बताया। इस मिशन के तहत अगले दस वर्षों में देश के अहम ठिकानों को स्वदेशी तकनीक से बने एयर डिफेंस सिस्टम से सुरक्षित किया जाएगा। राजनाथ सिंह ने जानकारी दी कि 23 अगस्त 2025 को डीआरडीओ ने स्वदेशी एयर डिफेंस वेपन सिस्टम का सफल परीक्षण किया, जिसमें एक साथ तीन लक्ष्यों को भेदा गया। उन्होंने कहा कि यह सफलता प्रधानमंत्री के विजन की दिशा में पहला बड़ा कदम है।

Self-Reliance in Defence: भारत में ही बन रहे हैं वॉरशिप

रक्षा मंत्री ने बताया कि आज सभी युद्धपोत भारत में ही बन रहे हैं। हाल ही में कमीशन किए गए आईएनएस हिमगिरी और आईएनएस उदयगिरि जैसे स्टेल्थ फ्रिगेट्स आधुनिक हथियारों और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम से लैस हैं और यह दिखाते हैं कि अब नौसेना किसी विदेशी युद्धपोत पर निर्भर नहीं है।

Self-Reliance in Defence: स्वदेशी एयरो-इंजन प्रोजेक्ट

रक्षा मंत्री ने ऐलान किया कि भारत अब स्वदेशी एयरो-इंजन प्रोजेक्ट पर काम शुरू कर चुका है। लंबे समय से यह क्षेत्र भारत की कमजोरी माना जाता रहा है, लेकिन अब सरकार ने इस चुनौती को स्वीकार कर लिया है। राजनाथ सिंह ने कहा कि पहले सवाल होता था कि क्या भारत इतना जटिल इंजन बना सकता है, लेकिन आज सवाल यह है कि इसे कितनी जल्दी बनाया और तैनात किया जा सकता है।

Self-Reliance in Defence: डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर

रक्षा मंत्री ने उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में बनाए गए डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर का जिक्र करते हुए कहा कि इनसे आत्मनिर्भरता और इनोवेशन को बढ़ावा मिला है। उन्होंने कहा कि ये कॉरिडोर अब विकास के नए इंजन बन चुके हैं और भविष्य में इन्हें अन्य राज्यों तक भी विस्तार दिया जाएगा।

रक्षा निर्यात में बड़ी छलांग

राजनाथ सिंह ने गर्व के साथ कहा कि 2014 में जहां रक्षा निर्यात 700 करोड़ रुपये से भी कम था, वहीं 2025 में यह बढ़कर लगभग 24,000 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। उन्होंने कहा कि यह सफलता सिर्फ सरकारी कंपनियों की वजह से नहीं बल्कि निजी उद्योग, स्टार्टअप और उद्यमियों के योगदान से संभव हुई है।

रक्षा मंत्री ने कहा कि सरकार ने रक्षा क्षेत्र में कई बड़े सुधार किए हैं। डिफेंस लाइसेंसिंग प्रक्रिया को आसान बनाया गया है, विदेशी निवेश (FDI) की सीमा 74 प्रतिशत तक बढ़ाई गई है और मेक इन इंडिया की प्रक्रिया को सरल किया गया है ताकि निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ सके।

उन्होंने कहा कि iDEX योजना ने युवाओं और स्टार्टअप्स के लिए डिफेंस इनोवेशन का नया रास्ता खोल दिया है। आज भारतीय युवा ऐसे समाधान पेश कर रहे हैं, जिनके लिए पहले भारत को विदेशी तकनीक पर निर्भर रहना पड़ता था।

रक्षा मंत्री ने कहा कि भारत ने महिलाओं को कॉम्बैट रोल में शामिल कर ऐतिहासिक कदम उठाया है। आज महिलाएं लड़ाकू विमान उड़ा रही हैं, युद्धपोतों को नेविगेट कर रही हैं और कठिन इलाकों में सीमाओं की रक्षा कर रही हैं।

मीडिया पर कही ये बात

राजनाथ सिंह ने मीडिया की भूमिका पर भी बात की और कहा कि युद्ध के समय एक सही रिपोर्ट करोड़ों लोगों का मनोबल बढ़ा सकती है, जबकि छोटी सी गलती जानलेवा हो सकती है। उन्होंने कहा कि मीडिया स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी निभाए।

रक्षा मंत्री ने कहा कि घरेलू रक्षा उत्पादन 1.5 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच चुका है, जिसमें 25 फीसदी निजी क्षेत्र का योगदान है। उन्होंने बताया कि रक्षा क्षेत्र अब केवल खर्च नहीं बल्कि डिफेंस इकोनॉमिक्स का हिस्सा है, जो नौकरियां, इनोवेशन और औद्योगिक विकास का बड़ा जरिया बन चुका है।

India defence indigenisation: रक्षा सचिव बोले- मेक इन इंडिया के तहत भारत में मैन्युफैक्चरिंग करें विदेशी कंपनियां, वरना नहीं मिलेंगे बड़े ऑर्डर, HALE और MALE ड्रोन पर फोकस

India defence indigenisation: Defence Secretary Rajesh Kumar said- Atmanirbhar Bharat in defence is a necessity, not just policy
Defence Secretary Rajesh Kumar Singh

India defence indigenisation: भारत के रक्षा सचिव राजेश कुमार ने साफ कहा है कि HALE और MALE ड्रोन फ्यूचर बैटलफील्ड में निर्णायक साबित होंगे। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी यह साफ हो गया कि ड्रोन युद्ध की तस्वीर बदल रहे हैं और इन्हें तेजी से आत्मनिर्भर भारत कार्यक्रम में शामिल करना होगा। उन्होंने आगे कहा कि आत्मनिर्भर भारत की नीति अब सिर्फ एक सरकारी पहल नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की जरूरत बन चुकी है। उन्होंने बताया कि मौजूदा वैश्विक हालात और लगातार बदलते अंतरराष्ट्रीय समीकरणों के बीच भारत को अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए रक्षा उत्पादन में पूरी तरह आत्मनिर्भर होना ही होगा।

ALH Dhruv: रक्षा सचिव बोले- ध्रुव हेलीकॉप्टर के बेड़े का ग्राउंड होना आर्म्ड फोर्सेस के लिए बड़ा झटका, ऑपरेशनल एफिशिएंसी पर पड़ रहा असर

India defence indigenisation: भारत में मैन्युफैक्चरिंग करें विदेशी कंपनियां

एनडीटीवी के डिफेंस समिट में रक्षा सचिव राजेश कुमार ने कहा कि 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद से रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता पर लगातार ध्यान दिया जा रहा है। उन्होंने बताया कि पिछले साल डिफेंस सेक्टर में लगभग 1.6 लाख करोड़ रुपये खर्च किए गए, जिनमें से 81 प्रतिशत रकम देश के भीतर ही खर्च हुई। उनका कहना था कि आने वाले समय में रक्षा पूंजीगत खर्च का कम से कम 75 फीसदी हिस्सा घरेलू उद्योगों से लिया जाएगा।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अगर भारत को विदेशी कंपनियों से किसी तकनीक या उत्पादन की आवश्यकता होगी, तो उन्हें भारत में निवेश और निर्माण करना ही होगा। यानी कोई भी विदेशी कंपनी बिना मेक इन इंडिया में भागीदारी किए बड़े ऑर्डर नहीं पा सकेगी।

रक्षा सचिव ने कहा कि यह कदम सिर्फ राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए नहीं बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देने के लिए महत्वपूर्ण है। उन्होंने हाल ही में किए गए एक अध्ययन का हवाला दिया, जिसमें पाया गया कि रक्षा क्षेत्र में घरेलू खर्च से जीडीपी पर 2.4 गुना प्रभाव पड़ता है। इससे रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं और इंडस्ट्री का विस्तार होता है।

India defence indigenisation: 2023-24 में दो लाख करोड़ रुपये के डिफेंस कॉन्ट्रैक्ट साइन

उन्होंने याद दिलाया कि 25-30 साल पहले भारत के रक्षा क्षेत्र में प्राइवेट कंपनियों की भूमिका लगभग नगण्य थी। उस समय डीआरडीओ और सार्वजनिक उपक्रम जैसे ऑर्डनेंस फ़ैक्ट्रियां ही प्रमुख थीं। लेकिन अब धीरे-धीरे प्राइवेट सेक्टर ने अपनी जगह बना ली है और कई मामलों में उनकी तकनीक अत्याधुनिक स्तर तक पहुंच चुकी है।

राजेश कुमार ने कहा कि वे सरकारी और निजी कंपनियों में कोई फर्क नहीं देखते। उनके अनुसार दोनों भारतीय कंपनियां हैं और रक्षा मंत्रालय की नजर में समान हैं। उन्होंने कहा कि मंत्रालय का काम है इन्हें बराबरी का मौका देना और लगातार ऑर्डर देते रहना।। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि पिछले वित्तीय वर्ष में लगभग दो लाख करोड़ रुपये के डिफेंस कॉन्ट्रैक्ट साइन किए गए, जो अब तक का सबसे बड़ा रिकॉर्ड है।

India defence indigenisation: ऑपरेशन सिंदूर के बाद ड्रोन पर फोकस

उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए बताया कि इस संघर्ष ने भारत के लिए ड्रोन तकनीक की अहमियत साबित कर दी। उन्होंने माना कि इस क्षेत्र में अभी सुधार की गुंजाइश है, लेकिन भारतीय निजी कंपनियों ने अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन किया। हाल ही में हुए कई ट्रायल्स में कुछ घरेलू ड्रोन निर्माताओं को सफलता मिली है और उन्हें जल्द ही ऑर्डर मिलने की संभावना है।

रक्षा सचिव ने बताया कि भारत तीन स्तरों पर ड्रोन निर्माण को आगे बढ़ा रहा है। पहला स्तर है अमेरिका की जनरल एटॉमिक्स के साथ एमक्यू-9बी सी गार्डियन ड्रोन (HALE) का करार। दूसरा स्तर है मध्यम ऊंचाई वाले ड्रोन (MALE) जिन्हें भारत में ही डिजाइन और डेवलप किया जाएगा। तीसरा स्तर है छोटे और स्वार्म ड्रोन जिन्हें कॉम्बैट एम्युनिशन की तरह इस्तेमाल किया जाएगा।

तेजस पर बोली ये बड़ी बात

उन्होंने तेजस लड़ाकू विमान परियोजना पर भी विस्तार से जानकारी दी। उनका कहना था कि यह विमान भारतीय वायुसेना के पुराने मिग-21 को बदलने के लिए तैयार किया जा रहा है। अब तक 40 से अधिक तेजस वायुसेना में शामिल हो चुके हैं, जबकि 80 और निर्माणाधीन हैं। सितंबर तक दो नए तेजस पूरी तरह हथियारों के साथ तैयार कर दिए जाएंगे। उन्होंने कहा कि अब से तेजस के नए ऑर्डर तभी दिए जाएंगे, जब पुराने कॉन्ट्रैक्ट की पूरी डिलीवरी हो जाएगी।

उन्होंने डीआरडीओ और घरेलू इंडस्ट्री को और मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अत्याधुनिक जेट इंजन बनाने में भारत अब तक पीछे रहा है, लेकिन सरकार ने इस दिशा में ठोस कदम उठाने का फैसला कर लिया है। फिलहाल फ्रांस के साथ साझेदारी में एक नई इंजन परियोजना को मंजूरी दिलाने की प्रक्रिया चल रही है, जो आने वाले वर्षों में भारतीय लड़ाकू विमानों के लिए अहम साबित होगी।

उन्होंने यह भी माना कि युद्ध जैसे हालात लंबे समय तक चल सकते हैं, इसलिए भारत को अपने युद्ध भंडार यानी वॉर वेस्टेज रिजर्व को दोगुना करने की जरूरत है। इसके लिए गोलाबारूद और मिसाइलों के उत्पादन में सार्वजनिक उपक्रमों के साथ-साथ निजी कंपनियों को भी शामिल किया जाएगा।

नौसेना को मिलेंगे 59 वॉरशिप!

जहाज निर्माण और नौसेना के विस्तार पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि इस समय 59 वॉरशिप भारत के विभिन्न शिपयार्ड्स में निर्माणाधीन हैं। आने वाले वर्षों में सभी नौसैनिक प्रोजेक्ट घरेलू शिपयार्ड्स में ही पूरे किए जाएंगे। निजी और सरकारी कंपनियों के बीच प्रतियोगिता को बढ़ावा देने से उत्पादन क्षमता और गुणवत्ता दोनों में सुधार होगा।

रक्षा सचिव ने छोटे और मध्यम उद्योगों की भूमिका पर भी प्रकाश डाला। उनके अनुसार रक्षा क्षेत्र से जुड़ी लगभग 15,000 एमएसएमई कंपनियां सक्रिय हैं और इन्हें ऑर्डर मिलने से लाखों नौकरियां पैदा होती हैं। उन्होंने कहा कि मंत्रालय का काम इन कंपनियों को विजिबिलिटी और स्थिर ऑर्डर देना है ताकि वे लगातार विकास कर सकें।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अपने अनुभव पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि शुरुआती एक-दो दिन थोड़ी चिंता रही, लेकिन जल्द ही विश्वास हो गया कि भारत की सेनाएं हर स्थिति से निपटने में सक्षम हैं। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री कार्यालय से लगातार संवाद होता रहा और हर सुबह स्थिति की समीक्षा की जाती थी। उनका कहना था कि भारत ने उस संघर्ष में साबित कर दिया कि अगर दुश्मन संघर्ष को आगे बढ़ाता है तो हम और आगे बढ़कर जवाब देने की क्षमता रखते हैं।

Indian Navy NUH RFI: सेना के बाद नेवी को भी चाहिए 76 नेवल यूटिलिटी हेलिकॉप्टर, जारी हुए 276 प्लेटफॉर्म के RFI, मेक इन इंडिया को मिलेगी प्राथमिकता

Indian Navy NUH RFI: India fast-tracks helicopter procurement with dual RFIs for 276 platforms

Indian Navy NUH RFI: भारत ने अपने हेलिकॉप्टर बेड़े को आधुनिक बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। हाल ही में रक्षा मंत्रालय ने एक साथ दो बड़े रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन (RFI) जारी किए हैं, जिनके तहत कुल 276 नए हेलिकॉप्टरों की खरीद की जाएगी। इन हेलिकॉप्टरों का इस्तेमाल सेना, वायुसेना, नौसेना और कोस्ट गार्ड द्वारा किया जाएगा।

LUH RFI: पुराने चेतक-चीता बेड़े की जगह सेना और वायुसेना को चाहिए 200 नए हल्के हेलिकॉप्टर, जारी की आरएफआई, ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी को प्राथमिकता

पहला रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन इस महीने जारी किया गया है, जिसमें 200 रिकॉनिसेंस एंड सर्विलांस हेलिकॉप्टर (RSH) की तत्काल जरूरत बताई गई है। इनमें से 120 हेलिकॉप्टर भारतीय सेना और 80 हेलिकॉप्टर भारतीय वायुसेना को दिए जाएंगे। इन हेलिकॉप्टरों का इस्तेमाल सीमावर्ती इलाकों में निगरानी करने, सैनिकों को तेजी से पहुंचाने और दुर्गम इलाकों में छोटी लेकिन अहम कार्रवाइयों के लिए किया जाएगा।

दूसरा रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन 22 अगस्त को 76 नेवल यूटिलिटी हेलिकॉप्टर (NUH) के लिए जारी की गई। इसमें 51 हेलिकॉप्टर नौसेना और 25 कोस्ट गार्ड को दिए जाएंगे। इन हेलिकॉप्टरों से समुद्री निगरानी और तटीय सुरक्षा को और मजबूत किया जाएगा।

दोनों ही खरीद प्रक्रियाओं में कहा गया है कि भारत मेक इन इंडिया पहल को प्राथमिकता देगा। इसका मतलब है कि इन हेलिकॉप्टरों का उत्पादन और तकनीक का बड़ा हिस्सा भारत में ही बनाया जाएगा।

सरकार इस बार समयसीमा पर खास ध्यान दे रही है। रिकॉनिसेंस और सर्विलांस हेलिकॉप्टरों के लिए कंपनियों को 18 अक्टूबर तक प्रस्ताव भेजने का समय दिया गया है और 2026 की शुरुआत में रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल जारी किया जाएगा। इसके बाद 2027 के मध्य तक कॉन्ट्रैक्ट साइन होने की उम्मीद है और 2028 से हेलिकॉप्टरों की डिलीवरी शुरू हो जाएगी। नेवल यूटिलिटी हेलिकॉप्टर कार्यक्रम का शेड्यूल भी इसी तरह रहेगा और 2029-30 तक इनकी सप्लाई होने लगेगी।

भारतीय सेना लंबे समय से पुराने चीता और चेतक हेलिकॉप्टरों को रिप्लेस करने की कोशिश कर रही है। ये हेलिकॉप्टर 1960 के दशक से सेवा में हैं और कई बार तकनीकी खामियों की वजह से हादसे हो चुके हैं। हालांकि हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी HAL ने सेना के लिए लाइट यूटिलिटी हेलिकॉप्टर भी बनाया, लेकिन ऑटोपायलट और फ्लाइट कंट्रोल सॉफ्टवेयर में दिक्कतों के चलते यह परियोजना समय पर आगे नहीं बढ़ पाई। यही वजह है कि अब सरकार ने विदेशी कंपनियों को भी इस प्रतिस्पर्धा में शामिल करने का रास्ता खोला है।

इस बड़ी खरीद में कई कंपनियां दिलचस्पी दिखा रही हैं। एयरबस अपने H145M मॉडल को टाटा के साथ साझेदारी के जरिए पेश कर रही है। एमडी हेलिकॉप्टर्स हल्के टेक्टिकल जरूरतों के लिए MD 530F ला रही है। रूस का KA-226T भी इस दौड़ में है, लेकिन कीमत और लोकल मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ी शर्तों के चलते इस पर अनिश्चय है। इस बीच मुंबई की मैक्स एयरोस्पेस एंड एविएशन भी इस प्रक्रिया में उतरी है। कंपनी Bell 407Xi हेलिकॉप्टर पेश कर रही है, जो ऊंचाई वाले इलाकों और कठिन मौसम में काम करने के लिए बेहतरीन माना जाता है।

मैक्स एयरोस्पेस ने हाल ही में महाराष्ट्र सरकार के साथ एक बड़ा समझौता किया है। जून में कंपनी ने 960 मिलियन डॉलर का एमओयू साइन किया, जिसके तहत नागपुर एयरपोर्ट के पास एक हेलिकॉप्टर असेंबली और टेस्टिंग प्लांट बनाया जाएगा। नागपुर पहले से ही एयरोस्पेस सेक्टर का मजबूत सेंटर है और 2026 तक यह प्लांट चालू हो जाएगा। इसके बाद अगले आठ साल में यहां बड़े पैमाने पर हेलिकॉप्टर निर्माण शुरू होगा।

नेवल यूटिलिटी हेलिकॉप्टर कार्यक्रम की चर्चा 2014 से चल रही है, लेकिन इस बार जारी RFI को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। नौसेना ने साफ कर दिया है कि नए हेलिकॉप्टरों में ब्लेड फोल्डिंग की सुविधा होनी चाहिए ताकि जहाजों पर इन्हें आसानी से रखा जा सके। साथ ही इनमें पहियों वाला लैंडिंग गियर और पहले से ऑपरेशनल सेवा का अनुभव होना भी अनिवार्य होगा।

बता दें कि रक्षा मंत्रालय ने इस साल का बजट नौ फीसदी बढ़ाया है और इसे सुधारों का साल बताया है। हेलिकॉप्टरों की खरीद को उसी व्यापक योजना का हिस्सा माना जा रहा है। मंत्रालय का मकसद अब छोटे अपग्रेड की बजाय बड़े स्तर पर पूरी सिस्टम को आधुनिक बनाना है।

Indian Army Restructuring: पाकिस्तान और चीन ने किया कोई दुस्साहस तो काल बनेंगे भैरव कमांडोज! 23 बटालियन खड़ी करने की तैयारी, ऑपरेशन सिंदूर के बाद सेना ने शुरू की री-स्ट्रक्चरिंग

Indian Army Restructuring Bhairav Commandos Operation Sindoor

Indian Army Restructuring: पाकिस्तान और चीन से एक साथ चुनौती झेल रही भारतीय सेना ने अपने स्ट्रक्चर में बड़े बदलाव करते हुए भैरव कमांडोज (Bhairav Commandos) की बटालियन तैयार की है। इन्हें अक्टूबर के आखिर तक तैनात कर दिया जााएगा। इसके लिए सेना पूरी तैयारियों में जुटी है। सेना ने पहले चरण में पांच यूनिट्स खड़ी की हैं, जिनमें से तीन उधमपुर स्थित उत्तरी मोर्चे यानी नॉर्दन कमांड में लद्दाख, श्रीनगर और नागरोटा और एक पश्चिमी रेगिस्तानी सेक्टर और एक पूर्वोत्तर के पहाड़ी इलाके में तैनात की जा रही हैं। बता दें कि लद्दाख में 14 कोर, श्रीनगर में 15 कोर और नागरोटा में 16 कोर तैनात है।

Bhairav Vs Ghatak Platoon: क्या भैरव फोर्स के आने के बाद खत्म हो जाएगी बटालियन में घातक प्लाटून? जानिए क्या है सेना का असली प्लान?

रक्षा सूत्रों के मुताबिक, यह कदम ऑपरेशन सिंदूर के बाद उठाया गया है। जिसमें पाकिस्तान ने चीन की मदद से भारत के खिलाफ रियल-टाइम इंटेलिजेंस और टेक्नोलॉजी सपोर्ट का इस्तेमाल किया था। 7 से 10 मई तक चार दिनों तक इस युद्ध से भारतीय सेना को यह सबक मिला कि पुराने स्ट्रक्चर के साथ-साथ अब नई, तेज और हल्की यूनिट्स की जरूरत है, जो सीमा पर तुरंत कार्रवाई कर सकें और स्पेशल फोर्सेस को राहत दे सकें।

Indian Army Restructuring: ऑपरेशन सिंदूर से मिली सीख

मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर ने भारतीय सेना को दिखा दिया कि मॉडर्न वॉरफेयर का स्वरूप कितना बदल चुका है। ड्रोन, लाइट म्यूनिशंस, नेटवर्क्ड इंटेलिजेंस और इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस ने यह साबित कर दिया कि दुश्मन को सीमा पार से भी रियल-टाइम मदद मिल सकती है। खुफिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीन ने पाकिस्तान को भारतीय टुकड़ियों की मूवमेंट और हथियारों की तैनाती की जानकारी लगातार मुहैया कराई थी।

यही वजह रही कि सेना ने युद्ध के बाद तुरंत नए स्ट्रक्चर का एलान कर दिया। आर्मी चीफ जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस के अवसर पर कहा कि अब सेना रूद्र ब्रिगेड्स, शक्तिबाण रेजिमेंट्स और भैरव बटालियन जैसे नए फॉर्मेशन खड़े करेगी।

Indian Army Restructuring: भैरव बटालियन में 250 जवान

भैरव कमांडोज दरअसल लाइट कमांडो बैटालियन है, जिनमें लगभग 250 जवान होंगे। ये रेगुलर इन्फैंट्री और पैरा स्पेशल फोर्सेस के बीच की कड़ी माने जा रहे हैं। सेना इन्हें अपने मौजूदा रेगुलर 415 इन्फैंट्री बटालियनों से चुन रही है। इसे सेव एंड रेज मॉडल कहा जा रहा है, यानी नई भर्ती के बजाय मौजूदा टुकड़ियों से सैनिक चुनकर इन्हें रीऑर्गेनाइज्ड किया जा रहा है।

योजना के मुताबिक मौजूदा सैनिकों से धीरे-धीरे 23 भैरव बटालियन खड़ी की जाएं। सूत्रों ने बताया कि फिलहाल पहली पांच यूनिट्स 31 अक्टूबर तक तैयार करने का टारगेट रखा गया है। ये यूनिटें सेना की मौजूदा 10 पैरा-स्पेशल फोर्सेस और 5 पैरा (एयरबोर्न) बटालियनों के अतिरिक्त होंगी। इन प्रत्येक बटालियनों में करीब 620 सैनिक होते हैं, जिन्हें बेहद मुश्किल ट्रेनिंग के बाद चुना जाता है।

भैरव कमांडोज को लेटेस्ट वेपंस, गैजेट्स और ड्रोन से लैस किया जाएगा। इनका मकसद है तेजी से कार्रवाई करना, दुश्मन की पोजीशन पर हिट एंड रन ऑपरेशन करना और स्पेशल फोर्सेस को उन मुश्किल मिशनों के लिए खाली करना जिन्हें सामान्य सैनिक पूरा नहीं कर सकते। एक अन्य सूत्र ने बताया, “भैरव बटालियन में सात से आठ अधिकारी होंगे। भैरव कमांडो कई महीनों तक अपने-अपने रेजिमेंटल सेंटर्स में खास ट्रेनिंग लेंगे। इसके बाद उन्हें अपने-अपने इलाकों में तैनात स्पेशल फोर्सेस यूनिट्स के साथ एक महीने तक अटैच किया जाएगा, जहां उन्हें एडवांस ट्रेनिंग दी जाएगी।

बता दें कि 27 अगस्त बुधवार को स्पेशल फोर्सेस ऑपरेशन्स के लिए एक नई ट्राई-सर्विसेज जॉइंट डॉक्ट्रिन जारी की थी। इस नए फॉर्मेशन में थलसेना की स्पेशल फोर्सेस के अलावा वायुसेना के लगभग 1,600 गरुड़ कमांडो (27 फ्लाइट्स में तैनात) और नौसेना के 1,400 से ज्यादा मरीन कमांडो (मार्कोस) को भी शामिल किया गया है।

Indian Army Restructuring: शक्तिबाण और दिव्यास्त्र

सेना के इस बड़े बदलाव में केवल कमांडोज ही नहीं, बल्कि आर्टिलरी की नई यूनिट्स भी शामिल हैं। सूत्र बताते हैं कि शक्तिबाण आर्टिलरी रेजिमेंट्स पूरी तरह से ड्रोन और लाइट म्यूनिशंस से लैस होंगी। हर रेजीमेंट में तीन बैटरियां होंगी दो मिड और लॉन्ग-रेंज लाइट म्यूनिशंस वाली और तीसरी स्वॉर्म ड्रोन और रिमोटली पायलेटेड एयरक्राफ्ट सिस्टम यानी RPAS से लैस होगी।

इसके अलावा पुरानी आर्टिलरी रेजीमेंट्स में भी दिव्यास्त्र बैटरीज जोड़ी जा रही हैं। यानी अब हर आर्टिलरी रेजीमेंट में कम से कम एक ऐसी बैटरी होगी, जो रीयल-टाइम सेंसर टू शूटर मिशन को अंजाम दे सके। इसका मतलब यह है कि निगरानी से लेकर हमले तक की पूरी प्रक्रिया खुद यूनिट्स कर पाएंगी, और किसी बाहरी इंटेलिजेंस पर निर्भर नहीं रहेंगी।

Indian Army Restructuring: रूद्र ब्रिगेड्स का गठन

इसी क्रम में सेना ने रूद्र ऑल-आर्म्स ब्रिगेड्स भी खड़ी की हैं। इन ब्रिगेड्स में इन्फैंट्री, आर्मर, मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री, आर्टिलरी, इंजीनियर्स, एयर डिफेंस, UAVs और स्पेशल फोर्सेस सब एक ही फॉर्मेशन में लाए जाएंगे। यह ब्रिगेड्स पारंपरिक इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप्स (IBGs) से अलग होंगी। जहां IBG को मेजर जनरल लीड करते हैं, वहीं रूद्र ब्रिगेड्स को ब्रिगेडियर लीड करेंगे। यह साइज में सामान्य ब्रिगेड से बड़ी लेकिन डिवीजन से छोटी होंगी।

Indian Army Restructuring: क्यों अहम है यह बदलाव

सेना के जानकारों का कहना है कि युद्ध के समय स्पेशल फोर्सेस को कई बार छोटे-छोटे मिशनों में लगाना पड़ता है। इससे उनकी क्षमता बड़े मिशनों पर कम हो जाती है। भैरव कमांडोज इस गैप को भरेंगे। साथ ही शक्तिबाण रेजिमेंट्स और दिव्यास्त्र बैटरीज बैटलफील्ड को पूरी तरह नेटवर्क्ड बना देंगी, जहां हर तोप और हर ड्रोन सीधे सेंसर डेटा के आधार पर काम करेगा। इस तरह सेना का यह कदम पोस्ट-सिंदूर वॉर री-स्ट्रक्चरिंग है, जिसमें पुराने स्ट्रक्चर को बदले बिना मौजूदा संसाधनों को नए तरीके से इस्तेमाल किया जा रहा है।

ECHS Scheme for Disabled Cadets: ट्रेनिंग में घायल कैडेट्स को बड़ी राहत, अब ECHS से मिलेगा मुफ्त इलाज, रक्षा मंत्रालय का बड़ा फैसला

ECHS Scheme for Disabled Cadets: Defence Ministry Grants Free Medical Facilities to Injured Trainees

ECHS Scheme for Disabled Cadets: ट्रेनिंग के दौरान घायल होकर स्थायी विकलांगता का शिकार होने वाले भारतीय सेना के अफसर कैडेट्स के लिए सरकार ने बड़ा राहत देने वाला कदम उठाया गया है। रक्षा मंत्रालय ने आदेश जारी कर कहा है कि ऐसे कैडेट्स को एक्स-सर्विसमेन कॉन्ट्रिब्यूटरी हेल्थ स्कीम (ECHS) के तहत चिकित्सा सुविधाएं दी जाएंगी। यह फैसला उस समय आया है जब सुप्रीम कोर्ट ने खुद संज्ञान लेकर सरकार से पूछा था कि इन कैडेट्स के लिए बेहतर देखभाल, मुआवजा और बीमा की व्यवस्था क्यों नहीं की जा रही।

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यह कदम ऐसे समय में आया है जब कोर्ट और मीडिया रिपोर्ट्स ने बार-बार इस गंभीर समस्या की ओर ध्यान खींचा। दरअसल, अब तक ट्रेनिंग के दौरान विकलांग हुए कैडेट्स को एक्स-सर्विसमेन का दर्जा नहीं दिया जाता था। नतीजतन, वे ECHS जैसी योजनाओं के दायरे से बाहर थे और केवल एक मामूली से एक्स-ग्रेशिया रकम पर निर्भर थे।

ECHS Scheme for Disabled Cadets: क्या है रक्षा मंत्रालय का आदेश

रक्षा मंत्रालय की तरफ से जारी आदेश में कहा गया है कि अब ऐसे कैडेट्स जिन्हें ट्रेनिंग के दौरान मेडिकल ग्राउंड पर बाहर कर दिया जाता है, उन्हें ECHS की सुविधाओं का लाभ मिलेगा। इसके तहत वे ECHS की सदस्यता ले सकेंगे, आउट पेशेंट और इन पेशेंट दोनों तरह की सुविधाओं का लाभ उठा सकेंगे और एम्पैनल्ड अस्पतालों में कैशलेस इलाज करा सकेंगे।

मंत्रालय ने यह भी साफ किया कि कैडेट्स से किसी तरह की एकमुश्त सदस्यता फीस नहीं ली जाएगी। वर्तमान में एक्स-सर्विसमेन अधिकारियों के लिए यह फीस 1.20 लाख रुपये है, लेकिन कैडेट्स को इससे छूट दी गई है।

Supreme Court on Cadets Medical Relief

ECHS Scheme for Disabled Cadets: सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप

18 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए इस मामले पर सुनवाई की थी। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और आर. महादेवन की बेंच ने सरकार से कहा था कि इस मामले को मानवीय दृष्टिकोण से हल किया जाए। कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि अब तक करीब 500 कैडेट्स अलग-अलग स्तर की विकलांगता के शिकार हो चुके हैं। अकेले नेशनल डिफेंस एकेडमी (NDA) से ही 2021 से जुलाई 2025 के बीच 20 कैडेट्स मेडिकल कारणों से बाहर कर दिए गए।

कोर्ट ने इस तरफ भी ध्यान दिलाया कि फिलहाल इन कैडेट्स को केवल 40,000 रुपये तक की मासिक सहायता मिलती है, जबकि उनका औसतन मेडिकल खर्च ही 50,000 रुपये से ऊपर है।

जस्टिस नागरत्ना ने एक मीडिया रिपोर्ट पर संज्ञान लिया और इसे चीफ जस्टिस बी.आर. गवई की अनुमति से स्वतः संज्ञान याचिका के रूप में दर्ज किया गया।

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने चंडीगढ़ के कैडेट विक्रांत राज का भी जिक्र किया। विक्रांत एनडीए में ट्रेनिंग के दौरान सिर पर गंभीर चोट लगने से ब्रेन हैमरेज का शिकार हुए और छह महीने तक कोमा में रहे। आज वे सामान्य कामकाज करने में असमर्थ हैं। उनकी मां ने बताया कि फिजियोथेरेपी और प्राइवेट हॉस्पिटल के इलाज का खर्च इतना ज्यादा है कि परिवार पर भारी बोझ आ गया है। कोर्ट ने इस मामले में सरकार से विशेष जवाब मांगा है।

सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने आश्वासन दिया कि सरकार 4 सितंबर तक इस मुद्दे पर जवाब दाखिल करेगी। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि प्रभावित कैडेट्स की ओर से आने वाले सुझाव लिखित रूप में सरकार तक पहुंचाए जाएं।

कोर्ट ने सरकार से पूछा कि क्या इन कैडेट्स को बीमा कवर दिया जा सकता है, ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार की दुर्घटना या मृत्यु की स्थिति में उनके परिवार को सुरक्षा मिल सके। साथ ही यह भी जांचने को कहा गया कि क्या इन्हें ‘राइट्स ऑफ पर्सन्स विद डिसएबिलिटीज एक्ट, 2016’ के तहत अधिकार मिल सकते हैं।

कोर्ट ने सुनवाई में कहा कि सरकार की यह जिम्मेदारी है कि जो युवा देश की रक्षा के लिए खुद को तैयार करने के दौरान घायल या विकलांग हो जाते हैं, उन्हें अनदेखा न किया जाए। अदालत ने जोर दिया कि इन्हें स्वास्थ्य बीमा, पर्याप्त मुआवजा और पुनर्वास प्रशिक्षण जैसी सुविधाएं मिलनी ही चाहिए।