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Military Hardware IGST Cut: मिलिट्री हार्डवेयर हुए सस्ते, 18 फीसदी IGST खत्म, ड्रोन और मिसाइल पर पड़ेगा असर

Military Hardware IGST Cut Cheaper After 18 Percent in India

Military Hardware IGST Cut: भारत सरकार ने डिफेंस सेक्टर के लिए एक बड़ा फैसला लिया है। अब से मिलिट्री हार्डवेयर यानी सैन्य साजोसामान पर लगने वाला 18 फीसदी इंटीग्रेटेड गुड्स एंड सर्विस टैक्स (IGST) पूरी तरह से खत्म कर दिया गया है। इसका सीधा असर यह होगा कि जहाज से लॉन्च होने वाली मिसाइलें, डीप सबमर्जेंस रेस्क्यू वेसल, फ्लाइट मोशन सिम्युलेटर, इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस वेपन सिस्टम, मानव रहित जलपोत यानी अनमैन्ड अंडरवॉटर व्हीकल और कई तरह के इक्विपमेंट्स अब पहले से कम कीमत पर मिलेंगे।

Emergency Defence Procurement Rules: आपातकालीन हथियार सौदों पर नई सख्ती, एक साल में डिलीवरी नहीं तो रद्द होगा कॉन्ट्रैक्ट

यह फैसला वित्त मंत्रालय की ओर से 56वीं जीएसटी काउंसिल बैठक की सिफारिशों पर लिया गया। रक्षा मंत्रालय और तीनों सेनाओं का कहना है कि यह सुधार न केवल ऑपरेशनल रेडीनेस बढ़ाएगा, बल्कि भविष्य के सैन्य अभियानों के लिए भी तैयारी को मजबूत करेगा।

Military Hardware IGST Cut: इंपोर्ट पर टैक्स का असर खत्म

इंटीग्रेटेड गुड्स एंड सर्विस टैक्स दरअसल राज्यों के बीच होने वाली सप्लाई और इंपोर्ट पर लगाया जाता है। जब भी विदेश से कोई मिलिट्री इक्पिमेंट खरीदा जाता था तो उस पर कस्टम ड्यूटी के साथ इंटीग्रेटेड गुड्स एंड सर्विस टैक्स भी देना पड़ता था। अब नए सुधार के बाद यह टैक्स हटा दिया गया है। यानी, जहाज से लॉन्च होने वाली मिसाइल, रॉकेट, ड्रोन, अंडरवॉटर वेसल और आर्टिलरी वेंपस के लिए आने वाले स्पेयर पार्ट्स भारत में सस्ते हो जाएंगे।

Military Hardware IGST Cut: ड्रोन सेक्टर को मिली बड़ी राहत

ड्रोन इंडस्ट्री के लिए यह सुधार किसी वरदान से कम नहीं माना जा रहा। ड्रोन फेडरेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष स्मित शाह ने कहा कि पहले कैमरे वाले ड्रोन पर 5 फीसदी, 18 फीसदी और यहां तक कि 28 फीसदी तक जीएसटी लगने को लेकर भ्रम बना रहता था। इसकी वजह से कई बार कंपनियों को विवाद और कंप्लायंस जोखिम झेलने पड़ते थे।

अब सरकार ने नियम साफ कर दिया है। सैन्य ड्रोन पर टैक्स जीरो कर दिया गया है, जबकि कमर्शियल ड्रोन पर केवल 5 फीसदी जीएसटी लगेगा। इससे न केवल लागत कम होगी बल्कि ऑपरेटरों और ग्राहकों को सीधा फायदा मिलेगा।

गरुड़ा एयरोस्पेस के सीईओ अग्निश्वर जयप्रकाश ने कहा कि कृषि क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले ड्रोन की सबसे बड़ी लागत उनकी बैटरी होती है। अब बैटरी को जीएसटी से मुक्त कर दिया गया है। इससे ग्राहकों को लागत में राहत मिलेगी और कंपनियों की मुनाफा भी बढ़ेगा।

भारतीय ड्रोन कंपनी आइडियाफोर्ज के सीईओ अंकित मेहता ने कहा कि इस सुधार से भारतीय UAV यानी मानव रहित हवाई वाहन क्षमता में तेजी आएगी। इसका फायदा न केवल सीमा पर निगरानी में होगा बल्कि मैपिंग, निरीक्षण, आपदा प्रबंधन और कृषि जैसे क्षेत्रों में भी देखने को मिलेगा।

उन्होंने कहा कि 0% टैक्स से भारतीय निर्माता अपने ऑपरेशन्स को और बड़े पैमाने पर चला पाएंगे। साथ ही डिफेंस सेक्टर में ज्यादा कॉन्टैक्ट अधिक अनुबंध हासिल कर पाएंगे और बेहतर क्षमता वाले किफायती ड्रोन बना पाएंगे।

Military Hardware IGST Cut: किन पर खत्म हुआ टैक्स

सूत्रों के अनुसार, अब जिन वस्तुओं पर IGST नहीं लगेगा, उनमें शामिल हैं जहाज से लॉन्च होने वाली मिसाइलें, जो नौसेना की ताकत बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसके साथ ही, डीप सबमर्जेंस रेस्क्यू वेसल यानी गहरे समुद्र में बचाव कार्य करने वाले जहाज भी इस दायरे में आएंगे।

फ्लाइट मोशन सिम्युलेटर, जो पायलटों के प्रशिक्षण में अहम होते हैं, उन पर भी अब अतिरिक्त कर का बोझ नहीं रहेगा। इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस वेपन सिस्टम, जो देश की हवाई सुरक्षा को मजबूत करने के लिए जरूरी है, वह भी इस सूची में शामिल है।

इसके अलावा, अनमैन्ड अंडरवॉटर वेसल यानी बिना पायलट के पानी के भीतर चलने वाले सिस्टम को भी छूट दी गई है। नौसेना के लिए सोनाबॉय, जिनका इस्तेमाल पनडुब्बियों का पता लगाने और ट्रैकिंग के लिए किया जाता है, अब कम लागत पर उपलब्ध होंगे।

100 मिलीमीटर से बड़े कैलिबर वाले रॉकेट भी इस श्रेणी में आते हैं, जो आर्टिलरी की क्षमता को बढ़ाने में उपयोगी हैं। साथ ही, हाई-परफॉर्मेंस बैटरियां, जो ड्रोन और अन्य आधुनिक रक्षा प्रणालियों के लिए जरूरी हैं, उन्हें भी इस कर छूट का फायदा मिलेगा।

इसके अलावा आर्टिलरी हथियार, राइफल, एयरक्राफ्ट, रॉकेट लॉन्चर, AK-630 नेवल गन और लाइट मशीन गन से जुड़े स्पेयर पार्ट्स, सब-असेंबली, टूल्स और टेस्टिंग इक्विपमेंट को भी IGST से छूट दी गई है।

यह फैसला ऐसे समय आया है जब भारतीय सेना तेज गति से आधुनिकीकरण की ओर बढ़ रही है। 22 अप्रैल को हुए पहलगाम आतंकी हमले में 26 लोगों की मौत के बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया था। इसके बाद रक्षा मंत्रालय ने आपातकालीन शक्तियों के तहत हथियार और उपकरणों की खरीद को बढ़ावा दिया।

24 जून को रक्षा मंत्रालय ने इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट की पांचवीं किश्त के तहत 1,981.90 करोड़ रुपये के 13 अनुबंध किए थे। इसमें ड्रोन, काउंटर-ड्रोन सिस्टम, लोइटरिंग म्यूनिशन, रडार और शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस सिस्टम शामिल थे।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम न केवल लागत घटाएगा बल्कि भारत के मेक इन इंडिया कार्यक्रम को भी रफ्तार देगा। जब विदेशी आयात पर टैक्स कम होगा तो भारतीय कंपनियों के लिए अपने प्रोडक्ट्स को डिफेंस कॉन्ट्रैक्ट में शामिल करना आसान होगा।

डीआरडीओ और एचएएल जैसी सरकारी संस्थाओं के साथ-साथ लार्सन एंड टुब्रो, डायनामेटिक टेक्नोलॉजीज और VEM टेक्नोलॉजीज जैसी निजी कंपनियां पहले से ही इस क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब टैक्स छूट से इनके लिए वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करना आसान होगा।

नए टैक्स स्ट्रक्चर का असर केवल सेना पर ही नहीं बल्कि नागरिक क्षेत्रों में भी दिखाई देगा। कृषि ड्रोन, लॉजिस्टिक ड्रोन और सर्विलांस ड्रोन अब कम लागत पर उपलब्ध होंगे। इससे किसानों को सस्ती सेवाएं मिलेंगी और आपदा प्रबंधन जैसे कामों में भी मदद मिलेगी।

Emergency Defence Procurement Rules: आपातकालीन हथियार सौदों पर नई सख्ती, एक साल में डिलीवरी नहीं तो रद्द होगा कॉन्ट्रैक्ट

Emergency Defence Procurement Rules Tightened: No Delivery, No Deal

Emergency Defence Procurement Rules: भारत के रक्षा मंत्रालय ने रक्षा खरीद की प्रक्रिया में बड़ा बदलाव किया है। अब आपातकालीन खरीद यानी इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट (Emergency Procurement) के तहत किए गए किसी भी सौदे को एक साल के भीतर पूरा करना जरूरी होगा। अगर तय समयसीमा में हथियार या इक्विपमेंट्स नहीं मिलते हैं तो कॉन्ट्रैक्ट रद्द कर दिया जाएगा। यह कदम इसलिए उठाया गया है ताकि भारतीय सेना की जरूरी जरूरतें समय पर पूरी हो सकें और ऑपरेशनल तैयारियों में कोई कमी न रहे।

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Emergency Defence Procurement Rules: क्यों होती है आपातकालीन खरीद

आपातकालीन रक्षा खरीद का इस्तेमाल तब किया जाता है जब तुरंत हथियार, गोला-बारूद या सिस्टम की जरूरत होती है। सामान्य रक्षा खरीद प्रक्रिया में कई चरण होते हैं और यह पांच से छह साल तक खिंच सकती है। लेकिन आपातकालीन खरीद के जरिए सेना को जल्दी हथियार उपलब्ध कराए जा सकते हैं।

लद्दाख में चीन के साथ तनाव और पाकिस्तान से लगातार मिल रही चुनौतियों के बाद भारत ने कई बार इस रूट का इस्तेमाल किया है। 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक और 2019 के बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद भी सेना को आपातकालीन खरीद की अनुमति दी गई थी।

Emergency Defence Procurement Rules: ऑपरेशन सिंदूर के बाद बदलाव

मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर के बाद सरकार ने तीनों सेनाओं को पूंजीगत बजट का 15 फीसदी तक आपातकालीन खरीद पर खर्च करने की छूट दी थी। इसके बाद 24 जून को रक्षा मंत्रालय ने 1,981.90 करोड़ रुपये के 13 नए कॉन्ट्रैक्ट साइन किए। इनमें ड्रोन, लॉयटरिंग म्यूनिशन, काउंटर-ड्रोन सिस्टम, वी-शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस सिस्टम (VSHORADS) और रडार शामिल थे।

रक्षा मंत्रालय द्वारा हाल ही में किए गए सौदों में उन हथियारों और उपकरणों पर जोर दिया गया है जिनकी जरूरत मॉडर्न वॉरफेयर में होती है। इसमें दुश्मन के ड्रोन और मिसाइलों से निपटने के लिए कई सिस्टम शामिल किए गए हैं।

सबसे पहले, रिमोटली पायलटेड एरियल व्हीकल (RPAV) और लुटरिंग म्यूनिशन का ऑर्डर दिया गया। ये ऐसे ड्रोन हैं जो निगरानी के साथ-साथ टारगेट पर सीधा हमला करने में सक्षम होते हैं। इनके इस्तेमाल से सेना दुश्मन की पोजिशन पर तुरंत कार्रवाई कर सकेगी।

दूसरा, काउंटर-ड्रोन सिस्टम्स का कॉन्ट्रैक्ट किया गया है। हाल के वर्षों में पाकिस्तान और चीन की तरफ से ड्रोन के जरिए घुसपैठ और हथियारों की तस्करी बढ़ी है। ऐसे में सेना को ऐसे सिस्टम चाहिए जो हवा में ही दुश्मन के ड्रोन को मार गिरा सकें।

तीसरा, VSHORADS (Very Short Range Air Defence System) को शामिल किया गया है। यह मिसाइल सिस्टम नजदीक से आने वाले हेलिकॉप्टरों, ड्रोन और कम ऊंचाई पर उड़ने वाले विमानों को निशाना बना सकता है। इससे सेना की एयर डिफेंस क्षमता मजबूत होगी।

इसके अलावा, आधुनिक रडार सिस्टम भी खरीदे गए हैं, जो दुश्मन की हलचल को दूर से पकड़ सकें। यह रडार नेटवर्क युद्ध के दौरान सेना को शुरुआती चेतावनी (अर्ली वार्निंग) देगा और सही समय पर कार्रवाई में मदद करेगा।

Emergency Defence Procurement Rules: सख्ती से लागू होगा नियम

लेकिन कई बार देखा गया कि इन खरीदों की सप्लाई तय समय पर नहीं हो पाई। ऐसे में यह सवाल उठा कि अगर हथियार समय पर सेना तक पहुंचे ही नहीं, तो आपातकालीन खरीद का मकसद ही क्या रह जाएगा। इसी वजह से अब मंत्रालय ने साफ कर दिया है कि केवल वही हथियार और उपकरण खरीदे जाएंगे, जो बाजार में तुरंत उपलब्ध हों और एक साल के भीतर दिए जा सकें।

अधिकारियों ने बताया कि अब यह नियम सख्ती से लागू होगा कि हर आपातकालीन सौदा एक साल के भीतर डिलीवर होना चाहिए। अगर कंपनियां समयसीमा में हथियार देने में नाकाम रहती हैं तो उनका कॉन्ट्रैक्ट सीधे रद्द कर दिया जाएगा।

रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने हाल ही में कहा था कि सामान्य रक्षा खरीद प्रक्रिया को पांच-छह साल से घटाकर दो साल के भीतर पूरा करने पर काम चल रहा है। इसके लिए हर स्टेप की समयसीमा घटाई जा रही है।

ट्रायल्स और टेस्टिंग में बदलाव

मंत्रालय अब कोशिश कर रहा है कि फील्ड इवैल्यूएशन ट्रायल्स (FET) एक साल के भीतर ही पूरे कर लिए जाएं, जबकि अभी इसमें दो से तीन साल लग जाते हैं। इसके अलावा, अगर कोई प्लेटफॉर्म पहले से किसी मित्र देश की सेना में इस्तेमाल हो रहा है तो भारत में उसका पूरा ट्रायल दोहराने की जरूरत नहीं होगी।

अन्य चरण जैसे रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (RFP), कॉस्ट नेगोशिएशन आदि को भी तीन से छह महीने की समयसीमा में पूरा करने की कोशिश होगी, ताकि लंबी देरी से बचा जा सके।

पहले भी हुई है आपातकालीन खरीद

गलवान झड़प (जून 2020) के बाद भारत ने पहली बार 300 करोड़ रुपये तक की कैपिटल प्रोक्योरमेंट की अनुमति दी थी। इससे सेना ने मिसाइल, ड्रोन और गोला-बारूद खरीदा था।

इससे पहले 2016 की उरी सर्जिकल स्ट्राइक और 2019 के बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद भी सेना को इमरजेंसी रेवेन्यू प्रोक्योरमेंट की अनुमति दी गई थी, ताकि तुरंत गोला-बारूद और स्पेयर पार्ट्स खरीदे जा सकें।

रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया में सुधार

इसके अलावा सरकार रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया 2020 (Defence Acquisition Procedure – DAP 2020) को भी आसान बनाने की दिशा में काम कर रही है। इसके लिए एक उच्चस्तरीय पैनल बनाया गया है, जिसका नेतृत्व डायरेक्टर जनरल, एक्वीजिशन कर रहे हैं।

यह पैनल कैटेगराइजेशन, ईज ऑफ डूइंग बिजनेस, ट्रायल्स, कॉन्ट्रैक्ट मैनेजमेंट और नई तकनीकों जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को अपनाने पर सिफारिशें देगा। मई 2025 में रक्षा सचिव ने बताया था कि कई चरणों में समय पहले ही कम किया गया है और इससे कुल 69 हफ्तों की कटौती हुई है।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आपातकालीन खरीद के तहत डिलीवरी की सख्त समयसीमा जरूरी थी। अब कंपनियां तभी बोली लगाएंगी जब उनके पास तैयार माल मौजूद होगा। इससे सेना को हथियार समय पर मिलेंगे और तैयारियों में कोई रुकावट नहीं आएगी। वहीं, रक्षा मंत्रालय का यह फैसला भारतीय सशस्त्र बलों की ऑपरेशनल रेडीनेस को और मजबूत करेगा।

Spear Corps Indian Army: अरुणाचल की बेटी की कहानी; कैसे दूरदराज के गांव से सैनिक स्कूल तक पहुंची मिली याबी, भारतीय सेना ने दिखाई राह

Spear Corps Indian Army support to Milli Yabi to Sainik School – Inspiring Journey
Source: Indian Army

Spear Corps Indian Army: ईटानगर से करीब 350 किलोमीटर दूर स्थित अरुणाचल प्रदेश का सरली गांव अब सुर्खियों में है। यहां की 12 वर्षीय बच्ची मिली याबी ने सैनिक स्कूल सियांग में दाखिला लेकर इतिहास रच दिया है। एक किसान परिवार से आने वाली मिली की इस सफलता के पीछे उसकी मेहनत के साथ-साथ भारतीय सेना की स्पीयर कॉर्प्स का भी सहयोग रहा है।

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सरली एक छोटा सा सीमावर्ती गांव है, जिसकी आबादी करीब 1500 है। यहां शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं की कमी हमेशा बच्चों के सामने एक बड़ी चुनौती रही है। इसके बावजूद यहां के बच्चे सेना में शामिल होकर देश की सेवा करने का सपना देखते हैं। इसी उत्साह को देखते हुए भारतीय सेना ने एक विशेष मेंटरशिप प्रोग्राम शुरू किया, जिसने इन सपनों को हकीकत में बदलने का रास्ता दिखाया।

Spear Corps Indian Army: सेना का मेंटरशिप प्रोग्राम

भारतीय सेना की स्पीयर कॉर्प्स ने मई 2024 में सरली और आसपास के गांवों के बच्चों के लिए एक मेंटरशिप पहल शुरू की। इसका उद्देश्य बच्चों को सैनिक स्कूल में दाखिले की परीक्षा के लिए तैयार करना था।

इस कार्यक्रम में बच्चों को परामर्श, नियमित क्लास, मॉक टेस्ट और मनोबल बढ़ाने वाली गतिविधियां कराई गईं। कुल 33 बच्चों का चयन किया गया और उन्हें विशेष ट्रेनिंग दी गई। इनमें 88 क्लास, 18 मॉक टेस्ट और लगातार काउंसलिंग शामिल थी।

सेना ने केवल पढ़ाई पर ही नहीं, बल्कि बच्चों और अभिभावकों को सैनिक स्कूल की भूमिका और महत्व के बारे में भी जागरूक किया। इसके अलावा सेना ने बच्चों को डॉक्यूमेंटेशन, रजिस्ट्रेशन और परीक्षा की तैयारी से लेकर इटानगर में आयोजित एनटीए द्वारा कराई गई प्रवेश परीक्षा तक हर स्तर पर मदद की।

Spear Corps Indian Army: बच्चों के लिए नई उम्मीद

इस पहल के नतीजे चौंकाने वाले रहे। 33 बच्चों में से 32 ने राष्ट्रीय स्तर पर क्वालीफाई किया और आठ बच्चों ने एक से अधिक प्रवेश परीक्षाएं भी पास कीं। इस बीच, मिली याबी पहली बच्ची बनी जिसका सैनिक स्कूल ईस्ट सियांग में 18 अगस्त 2025 को सिलेक्शन हुआ। सेना को उम्मीद है कि आने वाले काउंसलिंग राउंड्स में 4–6 और बच्चे भी चयनित होंगे।

Spear Corps Indian Army support to Milli Yabi to Sainik School – Inspiring Journey
Source: Indian Army

Spear Corps Indian Army: मिली याबी की सफलता

मिली याबी की कहानी पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणा बन गई है। एक किसान पिता और गृहिणी मां की बेटी ने सीमित संसाधनों के बावजूद बड़ा मुकाम हासिल किया। सेना के अधिकारियों ने उसकी लगन को देखते हुए उसे विशेष मार्गदर्शन दिया।

यह सफलता सिर्फ उसकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है बल्कि पूरे समुदाय की उम्मीदों और सपनों का प्रतीक है। यह दिखाता है कि अगर सही दिशा और मार्गदर्शन मिले तो दूरदराज के गांवों के बच्चे भी राष्ट्रीय स्तर पर चमक सकते हैं।

भारतीय सेना का यह कार्यक्रम केवल शिक्षा तक सीमित नहीं रहा। बच्चों में अनुशासन, आत्मविश्वास और राष्ट्रीय गर्व की भावना भी जागृत हुई। सरली जैसे गांवों में जहां पहले बच्चों के लिए बड़े सपने देखना मुश्किल माना जाता था, अब अभिभावक भी अपनी बेटियों और बेटों को सैनिक स्कूल और आगे एनडीए खड़कवासला जैसे संस्थानों में देखते हैं।

इसमें सबसे बड़ा योगदान सेना की उस सोच का है जो सीमावर्ती इलाकों के लोगों को केवल सुरक्षा का हिस्सा ही नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण में साझेदार मानती है।

भारतीय सेना हमेशा से सीमावर्ती इलाकों में शिक्षा, स्वास्थ्य और जागरूकता से जुड़े कार्यक्रम चलाती रही है। यह पहल उसी परंपरा का हिस्सा है। सेना का मानना है कि राष्ट्र निर्माण केवल सीमाओं की रक्षा से नहीं बल्कि सीमावर्ती गांवों को विकास और अवसरों से जोड़ने से भी होता है।

मिली याबी की कहानी इस बात का प्रमाण है कि भारतीय सेना का नेशन फर्स्ट अप्रोच केवल नारे तक सीमित नहीं है बल्कि यह जमीनी स्तर पर बच्चों और परिवारों की जिंदगी बदलने का माध्यम बन रहा है।

Tejas Mk-2 Rollout: तेजस मार्क-2 का रोलआउट अब 2027 तक टला, HAL ने बताई बार-बार टलने की ये बड़ी वजह?

Tejas Mk-2 Rollout Delayed to 2027
LCA Tejas Mk-2

Tejas Mk-2 Rollout: तेजस मार्क-2 (LCA Tejas Mk-2) को लेकर बड़ी खबर सामने आई है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड सूत्रों के मुताबिक यह अब 2027 में रोलआउट होगा। पहले इसकी समयसीमा 2025 के आखिर तक तय की गई थी, जिसे बाद में 2026 की पहली तिमाही तक बढ़ाया गया। लेकिन अब हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने आधिकारिक तौर पर जानकारी दी है कि इस विमान का पहला प्रोटोटाइप 2027 में ही तैयार होगा।

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यह बदलाव भारतीय वायुसेना के लिए अहम है क्योंकि तेजस मार्क-2 को पुराने मिग-21, मिराज-2000, मिग-29 और जगुआर जैसे विमानों को रिप्लेस करने के लिए डिजाइन किया गया है। वायुसेना की स्क्वाड्रन स्ट्रेंथ बनाए रखने और मॉडर्न वॉरफेयर में यह प्रोजेक्ट निर्णायक भूमिका निभाने वाला है।

Tejas Mk-2 Rollout: बार-बार टल रही समयसीमा

तेजस मार्क-2 के शेड्यूल में यह तीसरा बड़ा बदलाव है। 2025 में इसके रोलआउट का दावा किया गया था, फिर इसे 2026 तक बढ़ा दिया गया। लेकिन तकनीकी सुधारों की वजह से अब 2027 तय किया गया है। एचएएल सूत्रों ने बताया कि उनके पास फिलहाल 10 GE-414 इंजन हैं, जो तेजस मार्क-2 में लगाए जाने हैं। ये इंजन एडवांस में मंगवा कर रख लिए गए थे।

यह इंजन तेजस मार्क-1 और मार्क-1ए में इस्तेमाल होने वाले जीई एफ-404 इंजन से कहीं अधिक ताकतवर है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड और अमेरिकी कंपनी जीई एयरोस्पेस इस इंजन को भारत में बनाने के लिए साझेदारी कर रहे हैं। इसके साथ ही, इस इंजन और विमान के सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया भी चल रही है। जिसके चलते देरी हो रही है।

Tejas Mk-2 Rollout: भारत में बनाया जाना है GE-414 इंजन

इस इंजन का निर्माण भारत में होगा, जो मेक इन इंडिया पहल का हिस्सा है। जून 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिका दौरे के दौरान एचएएल और जीई एयरोस्पेस के बीच एक समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत जीई एफ-414 इंजन का 80 पीसदी ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी भारत को मिलेगा। पहले यह तकनीकी हस्तांतरण 58 फीसदी तक सीमित था, लेकिन लंबी बातचीत के बाद इसे बढ़ाकर 80 फीसदी किया गया। यह इंजन बेंगलुरु में एचएएल की फैसिलिटी में बनाया जाएगा।

सूत्रों ने बताया कि अमेरिका से सभी जरूरी मंजूरियां मिल चुकी हैं, और जल्द ही भारत में इस इंजन का उत्पादन शुरू होगा। अगले तीन महीने में इस समझौते को अंतिम रूप दे दिया जाएगा। इस प्रक्रिया में जीई एयरोस्पेस और एचएएल मिलकर काम करेंगे, जिसमें स्थानीय इंजीनियरों और तकनीशियनों की भागीदारी होगी।

Tejas Mk-2 Rollout: AMCA में भी इस्तेमाल होगा ये इंजन

जीई एफ-414 इंजन के निर्माण के लिए एचएएल ने बेंगलुरु में एक नई प्रोडक्शन लाइन तैयार की है। यह सुविधा तेजस मार्क-1ए और मार्क-2 दोनों के लिए इंजनों और विमानों के प्रोडक्शन में मदद करेगी। सूत्रों के अनुसार, अगले तीन महीनों में इस समझौते को अंतिम रूप दिया जाएगा, जिसके बाद 2026 तक पहला प्रोटोटाइप इंजन तैयार हो सकता है। यह इंजन न केवल तेजस मार्क-2 के लिए, बल्कि भविष्य में अन्य स्वदेशी विमानों, जैसे एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA), के लिए भी उपयोगी हो सकता है।

Tejas Mk-2 Rollout: सर्टिफिकेशन है जरूरी

तेजस मार्क-2 और इसके जीई एफ-414 इंजन के सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण है। सर्टिफिकेशन का काम सेंटर फॉर मिलिट्री एयरवर्दिनेस एंड सर्टिफिकेशन (सीईएमआईएलएसी) और एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (एडीए) द्वारा किया जा रहा है। इस प्रक्रिया में इंजन और विमान की सुरक्षा, प्रदर्शन, और युद्धक क्षमताओं का कड़ाई से परीक्षण होता है। तेजस मार्क-2 का पहला प्रोटोटाइप 2027 के मध्य तक रोलआउट होने की उम्मीद है, और इसके बाद इसके टैक्सी ट्रायल होंगे। इस दौरान इंजन के ग्राउंड टेस्ट, फ्लाइट टेस्ट, और सिस्टम इंटीग्रेशन की जांच की जाएगी। सर्टिफिकेशन प्रक्रिया में यह सुनिश्चित किया जाएगा कि इंजन और विमान भारतीय वायुसेना की जरूरतों, जैसे वेपन इंटीग्रेशन और एडवांस एवियॉनिक्स को पूरा करते हैं।

सर्टिफिकेशन प्रक्रिया में कई चरण शामिल हैं। पहले चरण में इंजन का ग्राउंड टेस्ट होगा, जिसमें इसकी थ्रस्ट, फ्यूल एफिशिएंसी की जांच होगी। इसके बाद, विमान के साथ इंजन का इंटीग्रेशन और फ्लाइट टेस्ट होंगे। इन टेस्टों में विमान की रफ्तार, मैन्यूवरेबिलिटी, और हथियार प्रणालियों की सटीकता की जांच होगी। सीईएमआईएलएसी यह सुनिश्चित करेगा कि इंजन और विमान अंतरराष्ट्रीय मानकों, जैसे मिलिट्री स्टैंडर्ड (MIL-STD), को पूरा करते हैं। इस प्रक्रिया में एक-दो साल का समय लग सकता है, जिसके बाद तेजस मार्क-2 का बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू होगा।

Tejas Mk-2 Rollout: जानें कितना ताकतवर है जीई एफ-414 इंजन

तेजस मार्क-2 में लगने वाला जीई एफ-414 इंजन एक ट्विन-स्पूल, लो-बायपास टर्बोफैन इंजन है। यह इंजन 98 किलोन्यूटन का थ्रस्ट पैदा करता है, जो तेजस मार्क-1 के जीई एफ-404 इंजन (84 किलोन्यूटन) की तुलना में अधिक शक्तिशाली है। यह इंजन विमान को 2,385 किलोमीटर प्रति घंटा (मैक 1.8) की अधिकतम रफ्तार देता है। इसकी मदद से तेजस मार्क-2 2,500 किलोमीटर की रेंज और 1,500 किलोमीटर की कॉम्बैट रेंज हासिल कर सकता है। यह इंजन विमान को 56,758 फीट की ऊंचाई तक ले जाने में सक्षम है। जीई एफ-414 को कम रखरखाव लागत, और आधुनिक युद्ध की जरूरतों के लिए डिजाइन किया गया है। यह इंजन पहले से ही अमेरिकी नौसेना के एफ/ए-18ई/एफ सुपर हॉर्नेट और स्वीडन के साब जेएएस 39 ग्रिपेन जैसे विमानों में इस्तेमाल हो रहा है।

Tejas Mk-2 Rollout: तेजस मार्क-2 की खूबियां

तेजस मार्क-2, तेजस मार्क-1 और मार्क-1ए का एडवांस और ज्यादा ताकतवर वर्जन है। इसे 4.5 पीढ़ी का मल्टी-रोल सुपरसोनिक लड़ाकू विमान कहा जा रहा है। यह हवा से हवा और हवा से जमीन दोनों तरह के मिशन अंजाम देने में सक्षम होगा। इस विमान का आकार मार्क-1ए से बड़ा है। इसकी लंबाई करीब 47 फीट, विंगस्पैन 27 फीट और ऊंचाई 15 फीट रखी गई है। इसका अधिकतम टेकऑफ वजन 17,500 किलोग्राम तक होगा। तेजस मार्क-2 लगभग 6,500 किलोग्राम का पेलोड लेकर उड़ान भर सकेगा। इसमें 13 हार्ड पॉइंट होंगे जिन पर मिसाइल, बम और ईंधन टैंक लगाए जा सकते हैं।

Tejas Mk-2 Rollout: एडवांस रडार और एवियोनिक्स

तेजस मार्क-2 में स्वदेश में बना उत्तम AESA रडार लगाया जाएगा। यह रडार 150-160 किलोमीटर की दूरी से दुश्मन के विमानों और जमीनी लक्ष्यों का पता लगाने में सक्षम होगा। इसके साथ ही, इसमें आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम, डिजिटल फ्लाई-बाय-वायर सिस्टम और ग्लास कॉकपिट दिया जाएगा। कॉकपिट नाइट विजन गॉगल्स के अनुरूप होगा, जिससे पायलट रात में भी ऑपरेशन को अंजाम दे सकेगा। एवियोनिक्स पैकेज को इस तरह तैयार किया जा रहा है कि विमान किसी भी इलेक्ट्रॉनिक जामिंग या साइबर हमले के दौरान भी सुरक्षित तरीके से काम कर सके।

लगा सकेंगे ये हथियार

तेजस मार्क-2 की हथियार क्षमता इसे और भी घातक बनाती है। इसमें हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलें जैसे मेटियोर, असराम, मिका और स्वदेशी एस्ट्रा मिसाइल लगाई जा सकेंगी। इसके अलावा, हवा से जमीन पर मार करने वाली मिसाइलों में ब्रह्मोस-एनजी, स्टॉर्म शैडो और DRDO की लंबी दूरी की क्रूज मिसाइल शामिल होगी।

इसमें एंटी-रेडिएशन मिसाइल रुद्रम 1, 2 और 3 भी इंटीग्रेट की जाएंगी, जो दुश्मन के राडार और एयर डिफेंस सिस्टम को नष्ट करने में सक्षम होंगी। इसके अलावा, विमान स्मार्ट प्रिसिजन गाइडेड बम जैसे स्पाइस और डीआरडीओ के ग्लाइड बम भी ले जा सकेगा।

Tejas Mk-1A Price Hike: अब 97 नए तेजस मार्क-1ए को महंगे दामों पर बेचेगी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड! जानें HAL ने क्यों बढ़ाईं कीमतें?

New 97 Tejas Mk-1A Price Hike by Rs 102 Crore by HAL

Tejas Mk-1A Price Hike: भारतीय वायुसेना को मिलने वाले स्वदेशी लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट तेजस तेजस मार्क-1ए फाइटर जेट अब पहले से महंगे हो गए हैं। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के वरिष्ठ सूत्रों ने पुष्टि की है कि नए करार में तेजस की कीमत में लगभग 17.6 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। 2021 में हुए पिछले सौदे में एक विमान की औसत कीमत करीब 578 करोड़ रुपये थी, जबकि अब यह बढ़कर लगभग 680 करोड़ रुपये प्रति एयरक्राफ्ट हो गई है। तेजस की कीमतों में हुई बढ़ोतरी के पीछे कई वजहें बताई जा रही हैं।

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Tejas Mk-1A Price Hike: वायुसेना को मिलेगा 97 नए तेजस तेजस मार्क-1ए का बेड़ा

हाल ही में 19 अगस्त को सरकार ने भारतीय वायुसेना की ताकत बढ़ाने के लिए 97 नए तेजस मार्क-1A (मार्क वन अल्फा) फाइटर जेट्स का ऑर्डर दिया था। यह डील करीब 62,000 करोड़ रुपये की है और इसे हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड तैयार करेगी। इस सौदे की पुष्टि 21 अगस्त 2025 को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी की।

इससे पहले 2021 में वायुसेना ने 83 तेजस Mk-1A का ऑर्डर दिया था जिसकी कीमत करीब 48,000 करोड़ रुपये थी। यानी अब तक कुल 180 तेजस Mk-1A का ऑर्डर हो चुका है। ये विमान धीरे-धीरे भारतीय वायुसेना के पुराने मिग-21 जेट्स की जगह लेंगे।

Tejas Mk-1A Price Hike: एचएएल सूत्रों ने की बढ़ी हुईं कीमतों की पुष्टि

एचएएल के वरिष्ठ सूत्रों ने रक्षा समाचार को इस बात की पुष्टि की है कि नए करार में तेजस Mk-1A की प्रति विमान लागत पहले के मुकाबले बढ़ गई है। 2021 में हुए करार के मुताबिक एक विमान की औसत कीमत करीब 578 करोड़ रुपये थी। अब नए करार में यह बढ़कर लगभग 680 करोड़ रुपये प्रति एयरक्राफ्ट हो गई है।

इस तरह हर विमान की कीमत में करीब 102 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई है। आंकड़ों के अनुसार, यह बढ़ोतरी लगभग 17.6 फीसदी है।

Tejas Mk-1A Price Hike: क्यों बढ़ी कीमतें

हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के सूत्रों ने बताया कि कीमतें बढ़ने के पीछे कई कारण गिनाए हैं। उन्होंने कहा कि कीमतों में यह इजाफा न केवल महंगाई और ग्लोबल सप्लाई चेन की दिक्कतों का नतीजा है, बल्कि नए तकनीकी अपग्रेड और आधुनिक रडार सिस्टम के शामिल होने की वजह से भी हुआ है।

उन्होंने पहला कारण गिनाते हुए कहा कि ग्लोबल महंगाई और सप्लाई चेन में बाधा बड़ी वजह रही है। 2021 के बाद से कच्चे माल, एवियोनिक्स और इलेक्ट्रॉनिक चिप्स की कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। वहीं, कीमतों में बढ़ोतरी की वजह टेक्निकल अपग्रेड भी है। सूत्रों ने बताया कि नए तेजस Mk-1A विमानों में कई अत्याधुनिक फीचर्स जोड़े जाएंगे। इनमें ‘उत्तम’ AESA रडार, एडवांस इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट, और आधुनिक हथियारों को इंटीग्रेट करने की क्षमता शामिल है।

वहीं तीसरा कारण उन्होंने सपोर्ट पैकेज को बताया। इसमें ग्राउंड सपोर्ट उपकरण, पायलट और तकनीकी स्टाफ की ट्रेनिंग और स्पेयर पार्ट्स शामिल हैं। ये सभी चीजों के चलते करार की कुल लागत में बढ़ोतरी हुई है।

Tejas Mk-1A Price Hike: अतिरिक्त इंजन खरीदने पर बातचीत

97 तेजस Mk-1A को उड़ाने के लिए अतिरिक्त GE-404 इंजनों की जरूरत होगी। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड और अमेरिकी कंपनी जीई एरोस्पेस के बीच 113 अतिरिक्त इंजन खरीदने की डील पर भी बातचीत चल रही है। इस इंजन डील की कीमत करीब 1 बिलियन डॉलर (लगभग 8,300 करोड़) बताई जा रही है। जल्द ही इस डील को अंतिम स्वरूप दे दिया जाएगा।

इससे पहले 2021 में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने 99 इंजन का ऑर्डर दिया था। मार्च 2025 तक जीई ने पहला इंजन डिलीवर भी कर दिया है। अनुमान है कि हर साल लगभग 20 इंजन भारत को दिए जाएंगे।

इसके साथ ही, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड और जीई के बीच GE-414 इंजन की जॉइंट प्रोडक्शन पर भी बातचीत हो रही है। ये इंजन तेजस Mk-2 के लिए होंगे और इसमें 80 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर होगा।

अक्टूबर में दो तेजस एमके1ए की डिलीवरी

हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के सूत्रों ने बताया कि दो साल की देरी के बाद अगले महीने अक्टूबर में दो तेजस Mk-1A वायुसेना को डिलीवर कर दिए जाएंगे। सूत्रों के मुताबिक, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड इस महीने तेजस मार्क-1A का फाइनल फायरिंग टेस्ट पूरा करेगा। इन परीक्षणों में देश में विकसित बियॉन्ड विजुअल रेंज (BVR) मिसाइल अस्त्र, शॉर्ट रेंज मिसाइल ASRAAM, ब्रह्मोस एनजी और लेजर-गाइडेड बम का फायरिंग टेस्ट किया जाएगा। परीक्षण सफल रहने पर ही विमान वायुसेना को सौंपे जाएंगे।

उन्होंने बताया कि जीई अगले साल मार्च 2026 तक 10 इंजन और फिर दिसंबर 2026 तक 20 और इंजन हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को डिलीवर करेगी।

इससे पहले रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने 30 अगस्त 2025 को एक डिफेंस कॉन्क्लेव में तेजस मार्क-1ए की डिलीवरी को लेकर कहा था कि लगभग 38 तेजस विमान पहले से ही सेवा में हैं, और 80 से अधिक का निर्माण चल रहा है। इनमें से 10 विमान तैयार हैं, और दो इंजन अब तक डिलीवर किए जा चुके हैं। उम्मीद है कि इनमें से पहले दो विमान सितंबर 2025 के आखिर तक डिलीवर कर दिए जाएंगे।

उन्होंने कहा था कि हम अगले महीने 97 अतिरिक्त तेजस मार्क-1ए विमानों के लिए कॉन्ट्रैक्ट पर दस्तखत करेंगे, जिसकी कीमत 67,000 करोड़ रुपये से अधिक होगी।

वायुसेना की स्क्वॉड्रन स्ट्रेंथ

भारतीय वायुसेना चीफ एयर चीफ मार्शल एपी सिंह पहले ही कह चुके हैं कि वायुसेना को हर साल कम से कम 35-40 नए फाइटर जेट्स की जरूरत है। इस समय वायुसेना के पास केवल 31 स्क्वॉड्रन हैं।

26 सितंबर को मिग-21 के दो स्क्वॉड्रन रिटायर होने के बाद यह संख्या घटकर 29 स्क्वॉड्रन रह जाएगी। जबकि टू-फ्रंट वॉर की संभावना (पाकिस्तान और चीन) को देखते हुए वायुसेना के पास 42 स्क्वॉड्रन होना जरूरी माना गया है।

60 फीसदी स्वदेशी कंपोनेंट

तेजस मार्क-1ए कार्यक्रम में 60 फीसदी से अधिक कंपोनेंट भारत में बने हैं। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के साथ-साथ कई निजी कंपनियां भी इसमें जुड़ी हैं। लार्सन एंड टुब्रो, डायनामेटिक टेक्नोलॉजीज और VEM टेक्नोलॉजीज जैसी कंपनियां इसमें अहम योगदान दे रही हैं।

तेजस मार्क-1ए की रफ्तार और रेंज

तेजस मार्क-1ए एक सुपरसोनिक फाइटर जेट है, जिसकी अधिकतम गति मैक 1.6 यानी करीब 2,200 किलोमीटर प्रति घंटा है। यह जेट हवा में तेजी से ऊंचाई पकड़ सकता है और दुश्मन के विमान या मिसाइल को बहुत कम समय में चुनौती देने में सक्षम है। इसकी कॉम्बैट रेंज लगभग 500 किलोमीटर तक है, जबकि फेरी रेंज यानी बिना हथियार के लंबी दूरी की उड़ान क्षमता 1,700 किलोमीटर से अधिक है।

तेजस मार्क-1ए आधुनिक हथियारों से लैस है। इसमें बियॉन्ड विजुअल रेंज (BVR) मिसाइल एस्ट्रा, ASRAAM जैसी शॉर्ट-रेंज एयर-टू-एयर मिसाइलें, लेजर-गाइडेड बम और प्रिसिजन-गाइडेड म्यूनिशन (PGM) लगाए जा सकते हैं। साथ ही, इसमें ब्रह्मोस-NG (नेक्स्ट जनरेशन) जैसी सुपरसोनिक मिसाइलें भी लगाई जा सकती हैं। तेजस पर 3,500 किलोग्राम तक का हथियार लोड किया जा सकता है, जिसमें एयर-टू-एयर, एयर-टू-ग्राउंड और एंटी-शिप मिसाइलें शामिल हैं।

रडार सिस्टम की बात करें, तेजस मार्क-1ए को उत्तम AESA रडार से लैस किया गया है, जिसे डीआरडीओ ने बनाया है। यह गैलियम नाइट्राइड (GaN) तकनीक पर आधारित है, जिससे यह दुश्मन के विमानों को लंबी दूरी से ट्रैक और टारगेट करने में सक्षम है। AESA रडार एक साथ कई लक्ष्यों पर नज़र रख सकता है और इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग से भी बचाता है। इसके अलावा, विमान में एडवांस इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट है, जो दुश्मन के रडार और मिसाइल गाइडेंस को चकमा दे सकता है।

तेजस मार्क-1ए का डिजाइन हल्का और एयरोडायनामिक है, जिससे इसे एजिलिटी मिलती है। इसका फ्लाई-बाय-वायर सिस्टम इसे बेहद स्थिर और सुरक्षित बनाता है। इसके साथ ही इसमें नाइट विजन कंपैटिबल ग्लास कॉकपिट, हेलमेट-माउंटेड डिस्प्ले (HMD) और मल्टी-फंक्शनल डिस्प्ले (MFDs) लगे हैं, जिससे पायलट को मिशन के दौरान तुरंत जानकारी मिलती है।

Tejas Mk-1A delivery India: भारतीय वायुसेना को मिलेगा दीपावली गिफ्ट, अक्टूबर में मिलेंगे दो तेजस-मार्क 1A, जीई से 113 इंजनों की खरीद का सौदा जल्द

Tejas Mk1A Delivery
File Photo

Tejas Mk-1A delivery India: अगर सब कुछ ठीक रहा हो तो अक्टूबर के महीने में भारतीय वायुसेना के लिए गुड न्यूज आने वाली है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने संकेत दिया है कि इस महीने दो तेजस मार्क-1A लड़ाकू विमान इंडियन एयरफोर्स को सौंप दिए जाएंगे। यह डिलीवरी लगभग दो साल की देरी के बाद हो रही है।

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सूत्रों के अनुसार, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड इसी महीने तेजस-मार्क 1A के फायरिंग टेस्ट पूरे करेगा। इन ट्रायल्स में बियॉन्ड विजुअल रेंज मिसाइल एस्ट्रा, शॉर्ट रेंज मिसाइल ASRAAM और लेजर गाइडेड बॉम्ब का इस्तेमाल किया जाएगा। सफल परीक्षणों के बाद ही एयरफोर्स को विमान सौंपे जांएगे।

हालांकि इससे पहले भी तेजस के फायरिंग टेस्ट किए गए थे। उस दौरान शुरुआती परीक्षण सफल रहे, लेकिन बाद में तकनीकी गड़बड़ियों के चलते एक टेस्ट असफल रहा। इसके बाद सॉफ्टवेयर में अहम बदलाव किए गए। अब हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को उम्मीद है कि सभी परीक्षण सफल रहेंगे और अक्टूबर में दो तेजस एयरफोर्स के बेड़े में शामिल हो जाएंगे।

साथ ही, अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक इस वित्त वर्ष मार्च 2026 तक 10 इंजन और दिसंबर 2026 तक 20 और इंजन डिलीवर करेगी। इससे तेजस की सप्लाई में रफ्तार आएगी और इंडियन एयरफोर्स की स्क्वाड्रनों की कमी कुछ हद तक पूरी हो सकेगी।

वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने हाल ही में कहा था कि इंडियन एयरफोर्स को हर साल 35 से 40 नए लड़ाकू विमानों की जरूरत है। मौजूदा स्थिति में एयरफोर्स के पास 31 फाइटर स्क्वाड्रन हैं। 26 सितंबर को मिग-21 की दो स्क्वाड्रन रिटायर होने के बाद यह संख्या घटकर केवल 29 रह जाएगी। बता दें कि मिग-21 इस महीने 26 सितंबर को रिटायर हो जाएगा।

दरअसल, एयरफोर्स के लिए 42 स्क्वाड्रन की संख्या “सैंक्शनड स्ट्रेंथ” मानी जाती है। यह क्षमता इसलिए तय की गई थी ताकि भारत टू-फ्रंट वॉर यानी पाकिस्तान और चीन दोनों मोर्चों पर एक साथ लड़ाई की स्थिति में भी तैयार रह सके।

Tejas Mk-1A delivery India: 113 अतिरिक्त इंजनों की खरीद

सरकार ने हाल ही में 97 नए तेजस मार्क-1A लड़ाकू विमानों की खरीद को मंजूरी दी है। यह सौदा लगभग 62,000 करोड़ रुपये का है। इससे पहले फरवरी 2021 में एयरफोर्स ने 83 तेजस मार्क-1A का ऑर्डर 48,000 करोड़ रुपये में दिया था।

इन्हीं विमानों के लिए हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने पहले 99 GE-404 इंजनों का ऑर्डर किया था। जीई ने मार्च 2025 में पहला इंजन हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को सौंपा। अगले साल तक 12 इंजन और उसके बाद हर साल 20-20 इंजन डिलीवर किए जाएंगे।

अब हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड और जीई के बीच 113 अतिरिक्त इंजनों की खरीद का नया सौदा लगभग 1 बिलियन डॉलर का होने वाला है। यह ऑर्डर हाल ही में मंजूर किए गए 97 नए विमानों के लिए होगा।

GE-414 पर चल रही बात

तेजस मार्क-1A के अलावा, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड और जीई के बीच एक और अहम प्रोजेक्ट पर बातचीत चल रही है। इसमें भारत में ही GE-414 इंजन का संयुक्त उत्पादन करने की योजना है। यह इंजन तेजस मार्क-2 प्रोग्राम के लिए इस्तेमाल होगा। इस सौदे के तहत लगभग 80% तकनीक का ट्रांसफर भारत को मिलेगा। इसकी कीमत भी लगभग 1 बिलियन डॉलर मानी जा रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने स्वतंत्रता दिवस भाषण में इस प्रोजेक्ट को “मेक इन इंडिया डिफेंस सेक्टर” की दिशा में एक बड़ा कदम बताया था। उन्होंने कहा था कि भारत को आत्मनिर्भर बनने के लिए अपने जेट इंजन देश में ही बनाने होंगे।

तेजस Vs मिग-21

तेजस मार्क-1A का सबसे बड़ा रोल पुराने मिग-21 फाइटर जेट्स को रिप्लेस करना है। मिग-21, जो 1960 के दशक से इंडियन एयरफोर्स का हिस्सा रहे हैं, अब रिटायरमेंट की कगार पर हैं। 26 सितंबर को मिग-21 की अंतिम दो स्क्वाड्रन भी सेवा से बाहर हो जाएंगी।

तेजस मार्क-1A में आधुनिक एवियोनिक्स, मल्टी-रोल क्षमता और इंडिजिनस हथियार सिस्टम हैं। खासतौर पर DRDO द्वारा विकसित एस्ट्रा मिसाइल और रुद्रम मिसाइल को इसमें इंटीग्रेट किया जा रहा है। इससे एयरफोर्स की “बियॉन्ड विजुअल रेंज” क्षमता और दुश्मन के एयर डिफेंस को दबाने की ताकत कई गुना बढ़ जाएगी।

एयरफोर्स की मौजूदा चुनौती

इंडियन एयरफोर्स इस समय “नंबर गैप” की समस्या से जूझ रही है। कई पुराने विमानों को चरणबद्ध तरीके से रिटायर किया जा रहा है, जबकि नए विमानों की डिलीवरी अपेक्षित समय पर नहीं हो पा रही है। तेजस मार्क-1A की सप्लाई में देरी ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है।

हालांकि, आने वाले महीनों में तेजस की डिलीवरी बढ़ने की संभावना है। जीई इंजनों की समय पर आपूर्ति और एचएएल की उत्पादन क्षमता में सुधार से एयरफोर्स को धीरे-धीरे नई ताकत मिलेगी।

Beijing Victory Day Parade 2025: चीन ने दिखाई नई मिसाइलें, DF-61 से JL-3 तक दिखाए कई घातक हथियार, देखें लिस्ट

Beijing Victory Day Parade 2025: चीन ने द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की हार की 80वीं वर्षगांठ को बेहद भव्य अंदाज में मनाया। बीजिंग के तियानमेन स्क्वायर पर आयोजित इस विजय दिवस परेड में चीन ने न केवल अपने अतीत की यादें ताजा कीं, बल्कि भविष्य की सैन्य ताकत का भी दमखम दिखाया। इस आयोजन में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मौजूदगी के साथ रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग-उन भी शामिल हुए।

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कार्यक्रम में कंबोडिया, लाओस, थाईलैंड और म्यांमार जैसे दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के नेता भी मौजूद रहे। यूरोप से हंगरी, सर्बिया और बेलारूस जैसे देशों के प्रतिनिधियों ने भी हिस्सा लिया, जबकि अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगी इस आयोजन से दूर रहे।

Beijing Victory Day Parade 2025: प्रोपेगैंडा का अहम हिस्सा

चीन ने इस परेड को जापान की हार के तौर पर नहीं बल्कि दुनिया को अपनी बढ़ती ताकत के संदेश के तौर पर इस्तेमाल किया। बीजिंग ने इसे अपने प्रोपेगैंडा का अहम हिस्सा बनाया। हाल के दिनों में चीन ने अमेरिका की भूमिका पर सवाल उठाते हुए और खुद को जापान की हार में निर्णायक ताकत के रूप में पेश करने की कोशिश की।

ट्रंप ने अपने ट्रुथ सोशल अकाउंट पर चीन को संबोधित करते हुए लिखा, “बड़ा सवाल यह है कि क्या चीन के राष्ट्रपति शी ने अमेरिका द्वारा चीन को आजादी दिलाने के लिए दी गई बड़ी मदद और “खून” का जिक्र करेंगे, जो एक शत्रु विदेशी आक्रमणकारी से लड़ने में दी गई थी। कई अमेरिकियों ने चीन की जीत और सम्मान के लिए अपनी जान गंवाई। मुझे आशा है कि उनकी वीरता और बलिदान को सही तरीके से सम्मान और याद किया जाएगा। राष्ट्रपति शी और चीन के अद्भुत लोगों को एक शानदार और यादगार उत्सव की शुभकामनाएं। कृपया व्लादिमीर पुतिन और किम जोंग उन को मेरी गर्मजोशी भरी शुभकामनाएं दें, क्योंकि आप अमेरिका के खिलाफ साजिश रचते हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड जे. ट्रम्प।”

विशेषज्ञों का कहना है कि इस आयोजन का मकसद चीन को वैश्विक राजनीति के केंद्र में दिखाना और पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) को एक आधुनिक, तकनीकी रूप से सक्षम सेना के रूप में प्रस्तुत करना था।

Beijing Victory Day Parade 2025: सिस्टम-ऑफ-सिस्टम्स वॉरफेयर

इस परेड का सबसे अहम पहलू था PLA का सिस्टम-ऑफ-सिस्टम्स ऑपरेशन पर जोर। इसमें रडार और ऑप्टिकल सेंसर, एयरबोर्न अर्ली वॉर्निंग एयरक्राफ्ट और ड्रोन काउंटर टेक्नोलॉजी का प्रदर्शन किया गया। इसका मकसद यह दिखाना था कि चीन की सेना अब सिर्फ पारंपरिक युद्ध नहीं, बल्कि मॉडर्न मल्टीडायमेंशनल वॉरफेयर लड़ने में सक्षम है।

परेड में दिखाए गए हथियारों और मिसाइलों से साफ था कि चीन अब फुल न्यूक्लियर ट्रायड (जमीनी, हवाई और पनडुब्बी से परमाणु हमला करने की क्षमता) को मजबूती दे रहा है।

Beijing Victory Day Parade 2025: China showcases DF-61, JL-3, DF-5C and YJ missile series
DF-61 ICBM

DF-61: चीन का नया रोड-मोबाइल ICBM

बीजिंग परेड में सबसे ज्यादा चर्चा DF-61 इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) की रही। इसे 12-एक्सल ट्रांसपोर्टर-इरेक्टर-लॉन्चर (TEL) पर ले जाया गया। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह मिसाइल पुराने DF-41 की जगह ले सकती है।

DF-61 में MIRV तकनीक यानी एक साथ कई वारहेड्स ले जाने की क्षमता हो सकती है। इसका रोड-मोबाइल डिजाइन इसे दुश्मन के पहले हमले से सुरक्षित बनाता है। अमेरिकी रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीन का परमाणु भंडार 2030 तक 1,000 से ज्यादा वारहेड्स तक पहुंच सकता है और DF-61 इस रणनीति का अहम हिस्सा है।

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DF-31BJ

DF-31BJ: नया साइलो-बेस्ड मिसाइल वेरिएंट

इस परेड में DF-31BJ नाम का नया वर्जन भी दिखा, जिसे खास तौर पर साइलो से लॉन्च करने के लिए बनाया गया है। PLA के पास पहले से DF-31 के मोबाइल वर्जन हैं, लेकिन साइलो वेरिएंट से इसके लॉन्च की तैयारी का समय और भी कम हो जाएगा।

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JL3 Submarine-Launched ICBM

JL-3: पनडुब्बी से दागी जाने वाली मिसाइल

चीन की नई JL-3 सबमरीन-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल (SLBM) भी परेड में दिखाई गई। इसकी रेंज लगभग 10,000 किलोमीटर बताई जा रही है। इसका मतलब है कि चीन के पास अब ऐसी पनडुब्बियां हैं जो अपने समुद्री क्षेत्र से बाहर गए बिना ही अमेरिका तक हमला कर सकती हैं।

इसे Type 094A पनडुब्बियों से लॉन्च किया जा सकता है। यह मिसाइल Type 094A और Type 096 पनडुब्बियों से लॉन्च करने के लिए बनाई गई है, जो चीन की समुद्री परमाणु हथियारों की डिलीवरी क्षमता को बढ़ाती है। इसकी रेंज 10,000 से 12,000 किमी तक बताई जाती है, जो इसे अमेरिका के पूरे पूर्वी तट, हवाई और यूरोपीय ठिकानों तक पहुंचने की क्षमता देती है। यह मिसाइल तीन चरणों वाली ठोस ईंधन प्रणाली पर काम करती है, जो इसे तेजी से लॉन्च करने और कम प्रक्षेपण समय (10-15 मिनट) देने में सक्षम बनाती है। इसके साथ ही, यह मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टारगेटेबल री-एंट्री व्हीकल्स (MIRVs) से लैस है, यानी यह एक साथ कई परमाणु वारहेड्स (3-6) ले जा सकता है, जो अलग-अलग लक्ष्यों पर सटीक हमला कर सकते हैं।

JL-3 की सटीकता बहुत एडवांस है, जिसमें सर्कुलर एरर प्रोबेबल (CEP) 100-150 मीटर के आसपास है। इसे बाइदू नेविगेशन सिस्टम और इनर्शियल गाइडेंस के साथ जोड़ा गया है। मिसाइल की लंबाई लगभग 13-14 मीटर और वजन 40-50 टन है। इसकी मारक क्षमता में 250-500 किलोटन के परमाणु वारहेड्स शामिल हैं, जो बड़े शहरों या सैन्य ठिकानों को नष्ट करने के लिए काफी हैं।

पूर्व PLA कर्नल झोउ बो ने इसे चीन की रणनीति में बड़ी उपलब्धि बताया। RAND के विश्लेषक रेमंड कुओ के मुताबिक, JL-3 से लैस पनडुब्बियां दुश्मन के तट के पास पहुंचकर सिर्फ 5 मिनट की चेतावनी में हमला कर सकती हैं।

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DF-5C

DF-5C: 20,000 किलोमीटर तक मार करने वाली मिसाइल

चीन ने परेड में DF-5C नाम की नई लिक्विड-फ्यूल्ड इंटरकॉन्टिनेंटल मिसाइल भी पेश की। इसकी रेंज 20,000 किलोमीटर से ज्यादा बताई गई है, यानी यह पूरी दुनिया को निशाने पर ले सकती है। विशेषज्ञ यांग चेंगजुन के मुताबिक, DF-5C में DF-41 की तकनीक भी शामिल है। इसमें तेज़ी से तैनाती, हाइपरसोनिक गति, मल्टीपल वारहेड (MIRV) और बेहद सटीक गाइडेंस सिस्टम जैसी खूबियां हैं।

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YJ-17

YJ सीरीज की नई एंटी-शिप मिसाइलें

परेड में चीन ने YJ सीरीज की चार नई मिसाइलें भी पेश कीं, जिन्हें खास तौर पर समुद्र में दुश्मन के जहाज़ों और एयरक्राफ्ट कैरियर्स को निशाना बनाने के लिए तैयार किया गया है। सबसे पहले YJ-15 दिखाई गई, जो रैमजेट इंजन से चलने वाली सुपरसोनिक मिसाइल है। यह इतनी तेज है कि मैक 3 से मैक 4 की रफ्तार तक जा सकती है और अपने स्पीड से ही दुश्मन के डिफेंस सिस्टम को दबाव में ला देती है।

इसके बाद YJ-17 सामने आई, जिसे हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल (HGV) कहा जाता है। इसकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह उड़ने के दौरान लगातार दिशा बदल सकती है और दुश्मन के एडवांस्ड एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा दे सकती है।

इसी श्रृंखला में YJ-19 को सबसे खतरनाक माना जा रहा है। यह स्क्रैमजेट इंजन से लैस मिसाइल है, जो मैकh 10 तक की रफ्तार पकड़ सकती है। इसकी मारक क्षमता और गति इतनी जबरदस्त है कि इसे खास तौर पर अमेरिका के एयरक्राफ्ट कैरियर्स के लिए चुनौती बताया जा रहा है।

सबसे आखिर में चीन ने YJ-20 को दिखाया, जो एक हाइपरसोनिक बैलिस्टिक एंटी-शिप मिसाइल है। यह लंबी दूरी से लॉन्च होकर बेहद सटीक तरीके से दुश्मन के जहाज को निशाना बना सकती है और अपने हाई-एल्टीट्यूड मैन्युवरिंग के कारण रोक पाना लगभग असंभव माना जाता है।

Beijing Victory Day Parade 2025: China showcases DF-61, JL-3, DF-5C and YJ missile series
KJ-600

KJ-600 अर्ली वार्निंग एयरक्राफ्ट

यह एक नया हवाई चेतावनी और नियंत्रण विमान है, जो पहली बार सार्वजनिक रूप से दिखाया गया। यह दुश्मन विमानों और मिसाइलों का पता लगाने और वास्तविक समय में जानकारी देने में सक्षम है।इसमें एईएसए (Active Electronically Scanned Array) रडार लगा है, जो 400 किमी तक दुश्मन विमानों, ड्रोन और मिसाइलों का पता लगाने में सक्षम है। यह रीयल टाइम में डेटा प्रोसेसिंग के साथ एयर डिफेंस को मजबूत करता है और विमानवाहक पोत से ऑपरेट हो सकता है।

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J-20S twin-seat Stealth Air Superiority Fighter

J-20S फाइटर जेट (दो-सीटर)

J-20 का एडवांस दो-सीटर संस्करण, जो स्टील्थ तकनीक से लैस है। यह गति (मैक 2+) और बहुउद्देश्यीय क्षमता (हवा से हवा और हवा से जमीन हमले) के साथ PL-15 मिसाइलें और लेजर-गाइडेड बम ले सकता है। यह पहली बार परेड में प्रदर्शित हुआ और प्रशिक्षण व मल्टी-रोल मिशन के लिए डिजाइन किया गया है। -20 का यह दो-सीटर संस्करण स्टील्थ तकनीक से लैस है, जो रडार से बचने में सक्षम है। यह PL-15 हवा से हवा मिसाइलें (150+ किमी रेंज), PL-10 शॉर्ट-रेंज मिसाइलें, और लेजर-गाइडेड बम ले सकता है। दो-सीटर डिजाइन पायलट प्रशिक्षण और संयुक्त मिशन (जैसे हवा से जमीन हमले) के लिए है। यह परेड में पहली बार देखा गया।

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HQ-19, HQ-12, and HQ-29

HQ-19, HQ-12 और HQ-29 (सरफेस-टू-एयर मिसाइलें)

ये छह नई मिसाइलें एयर डिफेंस के लिए हैं। HQ-19 यह एक एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम है, जो 3000+ किमी रेंज की इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलों (ICBM) को मध्य और ऊपरी वायुमंडल में इंटरसेप्ट कर सकता है। इसमें मल्टी-लेयर रडार और हाई स्पीड (मैक 6+) है।

जबकि HQ-12 मध्यम दूरी की मिसाइल (100-150 किमी रेंज) है, जो क्रूज मिसाइलों और लो-फ्लाइंग टारगेट्स को निशाना बनाने में सक्षम है। वहीं, HQ-29 क्रूज मिसाइलों और विमानों को निशाना बनाने में सक्षम हैं। यह शॉर्ट-रेंज डिफेंस सिस्टम (50-70 किमी) है, जो ड्रोन और हेलिकॉप्टर जैसे नजदीकी खतरों से निपटने के लिए डिजाइन किया गया है।

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PCH-191 modular long-range rocket launchers

PCH-191 मॉड्यूलर लॉन्ग-रेंज रॉकेट लॉन्चर्स

ये मोबाइल लॉन्चर 300-400 किमी रेंज के रॉकेट दाग सकते हैं। इनका मॉड्यूलर डिजाइन उन्हें विभिन्न युद्धक्षेत्रों में अनुकूलित करने की अनुमति देता है, जिसमें सटीकता और तुरंत तैनाती शामिल है। PCH-191 एक 8×8 व्हील्ड हाई-मोबिलिटी ऑफ-रोड चेसिस (Wanshan WS2400) पर आधारित है, जिसका वजन लगभग 45 टन है। यह -22°C से 55°C तापमान और सभी मौसमों में संचालित हो सकता है। इसमें दो स्वतंत्र मॉड्यूलर लॉन्च सेल हैं, जो विभिन्न प्रकार के गोला-बारूद ले सकते हैं। प्रत्येक सेल को 5 × 300 मिमी रॉकेट्स, 4 × 370 मिमी रॉकेट्स, या 1 × 750 मिमी मिसाइल से लैस किया जा सकता है।

300 मिमी रॉकेट्स रेंज 70-150 किमी है, जिसमें सटीकता 10 मीटर के भीतर है। ये उच्च-विस्फोटक और क्लस्टर वारहेड्स ले सकते हैं। 370 मिमी “फायर ड्रैगन 280” गाइडेड रॉकेट्स की रेंज 280 किमी तक है, जो सटीक हमलों के लिए डिज़ाइन किए गए हैं। 750 मिमी “फायर ड्रैगन 480” टैक्टिकल बैलिस्टिक मिसाइल अधिकतम रेंज 500 किमी है, जो ताइवान जैसे क्षेत्रों को मुख्यभूमि से लक्षित करने में सक्षम है। ये परमाणु या पारंपरिक वारहेड्स ले सकते हैं। बैटरी स्तर पर 20 सेकंड और सिंगल लॉन्चर पर 15 सेकंड में हमला शुरू करने की क्षमता है। इसका रॉकेट्स के साथ सर्कुलर एरर प्रोबेबल (CEP) 50 मीटर से कम है। वहीं पूर्ण सैवलो 67 हेक्टेयर क्षेत्र को कवर कर सकता है।

India Submarine Plan: भारत को मिलने वाली हैं 9 नई पनडुब्बियां, एक लाख करोड़ से ज्यादा के दो बड़े सौदों को जल्द मिलेगी मंजूरी

India Submarine Plan: Indian Navy to Get 9 New Submarines under Project 75 and Project 75i

India Submarine Plan: भारतीय नौसेना आने वाले वर्षों में अपनी पनडुब्बी क्षमता को बड़ा उछाल देने जा रही है। रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, नौसेना को जल्द ही 9 नई डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां मिलने वाली हैं। इनमें तीन पनडुब्बियां फ्रांसीसी स्कॉर्पीन क्लास का फॉलोऑन ऑर्डर होंगी और छह पनडुब्बियां प्रोजेक्ट 75 इंडिया (P75-I) के तहत बनाई जाएंगी। इन दोनों प्रोजेक्ट्स पर कीमतों और शर्तों को लेकर बातचीत अंतिम दौर में है।

Indian Navy Submarines: भारतीय नौसेना को मिलेंगी 9 नई पनडुब्बियां, खास AIP तकनीक से होंगी लैस, चीन और पाकिस्तान के पास पहले से है ये टेक्नोलॉजी

अभी इन सौदों पर लागत और शर्तों को लेकर बातचीत चल रही है। जैसे ही कीमत तय होगी, मामला कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) के पास मंजूरी के लिए जाएगा। माना जा रहा है कि यह सौदा भारतीय नौसेना की ताकत को अगले कई दशकों तक समुद्र में रणनीतिक बढ़त देगा।

India Submarine Plan: प्रोजेक्ट पी-75 कैसे शुरू हुआ

भारत का सबमरीन प्रोग्राम काफी पुराना है। साल 1997 में रक्षा मंत्रालय ने 24 नई पनडुब्बियों की योजना बनाई थी। इसी के तहत प्रोजेक्ट 75 की शुरुआत हुई।

भारत ने 2005 में फ्रांस के नेवल ग्रुप के साथ स्कॉर्पीन क्लास पनडुब्बियों के लिए करार किया था। इसके तहत छह पनडुब्बियां बनाने का समझौता हुआ था। इनका निर्माण मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL), मुंबई में किया गया।

दिसंबर 2017 में पहली पनडुब्बी आईएनएस कलवरी नौसेना में शामिल हुई। इसके बाद सितंबर 2019 में खंडेरी, मार्च 2021 में करंज, नवंबर 2021 में वेला, जनवरी 2023 में वागीर और 2024 में छठी और आखिरी पनडुब्बी वागशीर भी नौसेना को मिल गई। इन पनडुब्बियों ने भारतीय नौसेना की पानी के भीतर अटैक कैपेबिलिटी को मजबूत किया।

ये सभी डीजल-इलेक्ट्रिक स्कॉर्पीन क्लास सबमरीन भारतीय नौसेना के लिए गहरे पानी में “साइलेंट किलर” साबित हो रही हैं। अब इन्हीं का फॉलोऑन ऑर्डर देकर भारत तीन और स्कॉर्पीन क्लास सबमरीन लेगा। जिसकी अनुमानित लागत 36,000 करोड़ रुपये है।

India Submarine Plan: प्रोजेक्ट 75 इंडिया (P75-I)

जहाँ स्कॉर्पीन क्लास मौजूदा जरूरतें पूरी कर रही हैं, वहीं प्रोजेक्ट 75 इंडिया (P75-I) भविष्य की चुनौतियों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इस प्रोजेक्ट के तहत छह अत्याधुनिक स्टेल्थ डीजल-इलेक्ट्रिक सबमरीन बनाई जाएंगी। इन पनडुब्बियों में एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) सिस्टम होगा। AIP तकनीक से पनडुब्बी को सतह पर आए बिना लंबे समय तक पानी के भीतर ऑपरेट करने की क्षमता मिलती है। यह तकनीक भारतीय महासागर जैसे विशाल क्षेत्र में ऑपरेशन के लिए बेहद जरूरी मानी जाती है।

इस प्रोजेक्ट की लागत लगभग 65,000 करोड़ रुपये आंकी गई है। जर्मनी की थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (TKMS) और MDL मिलकर इसका निर्माण करेंगे। यह भारत का अब तक का सबसे बड़ा “मेक इन इंडिया” रक्षा सहयोग माना जा रहा है।

India Submarine Plan: भारतीय नौसेना की मौजूदा क्षमता

भारत के पास इस समय 17 डीजल-इलेक्ट्रिक सबमरीन और 2 न्यूक्लियर बैलेस्टिक मिसाइल सबमरीन (SSBN) हैं। इसके अलावा, भारत ने हाल ही में दो न्यूक्लियर अटैक सबमरीन (SSN) बनाने की मंजूरी भी दी है।

स्वदेशी SSN प्रोजेक्ट पर भी काम चल रहा है, जिसे 2036-37 तक नौसेना में शामिल किया जा सकता है। इन सबमरीन के शामिल होने के बाद भारत हिंद महासागर क्षेत्र में चीन जैसी बड़ी नौसेनाओं को चुनौती देने में सक्षम होगा।

पुरानी सोवियत कालीन किलो क्लास और जर्मन HDW क्लास पनडुब्बियां अपनी सर्विस लाइफ के अंत तक पहुंच चुकी हैं।

नौसेना को अपनी ताकत बनाए रखने के लिए नई पनडुब्बियों की तत्काल जरूरत है। प्रोजेक्ट 75 और P75-I इसी रणनीति का हिस्सा हैं। भारतीय महासागर में चीन की नौसेना की मौजूदगी लगातार बढ़ रही है। चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी नेवी (PLAN) लगातार नई परमाणु और परंपरागत पनडुब्बियां बना रही है। ऐसे में भारत के लिए अपनी अंडरवॉटर वॉरफेयर कैपेबिलिटी बढ़ाना जरूरी हो गया है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि इन दोनों प्रोजेक्ट्स से भारतीय नौसेना को दुश्मन की पनडुब्बियों को रोकने और हिंद महासागर क्षेत्र में मजबूत पकड़ बनाए रखने में मदद मिलेगी।

पाकिस्तान की हंगोर पनडुब्बियां और भारत की बढ़त

पाकिस्तान के पास फिलहाल आठ पनडुब्बियां हैं। इसमें से तीन चीन में बनी हंगोर क्लास (युआन क्लास का एक्सपोर्ट वर्जन) हैं। 2015 में पाकिस्तान ने चीन से प्रोजेक्ट S-26 के तहत आठ पनडुब्बियों का सौदा किया था। इनमें से चार चीन में और बाकी चार कराची शिपयार्ड में बन रही हैं।

हालांकि, इन हंगोर क्लास पनडुब्बियों में कई खामियां हैं। इनमें लगा प्रोपल्शन सिस्टम और सेंसर भारतीय स्कॉर्पीन पनडुब्बियों जितने आधुनिक नहीं हैं। साथ ही, जर्मनी के MTU डीजल इंजन पर लगे प्रतिबंध के चलते चीन को मजबूरी में अपना CHD-620 इंजन लगाना पड़ा, जिसकी विश्वसनीयता संदिग्ध है।

पनडुब्बियों की सबसे बड़ी ताकत उनका स्टेल्थ (गुप्त रहने की क्षमता) होती है। लेकिन चीनी पनडुब्बियां अपेक्षाकृत ज्यादा शोर करती हैं, जिससे उन्हें ट्रैक करना आसान हो जाता है। भारतीय नौसेना की एंटी-सबमरीन वॉरफेयर (ASW) तकनीक के सामने ये पनडुब्बियां टिक नहीं पाएंगी।

1971 के युद्ध में भारतीय नौसेना ने पाकिस्तानी पनडुब्बी PNS गाजी को विशाखापत्तनम के पास डुबो दिया था। रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि मौजूदा हंगोर क्लास पनडुब्बियों का भी भविष्य कुछ ऐसा ही हो सकता है।

India Submarine Plan: न्यूक्लियर सबमरीन बनाने में जुटा भारत

डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों के साथ-साथ भारत न्यूक्लियर सबमरीन पर भी काम कर रहा है। सरकार ने दो न्यूक्लियर अटैक सबमरीन (SSN) बनाने को मंजूरी दी है। स्वदेशी SSN पर काम जारी है और अनुमान है कि 2036-37 तक पहली पनडुब्बी नौसेना में शामिल हो जाएगी।

Su-57E stealth fighter: रूस के 5th जनरेशन फाइटर जेट खरीदने से पहले भारत ने रखी ये बड़ी शर्त, रूसी एजेंसियों में मची खलबली!

Su-57E stealth fighter Deal- India Conditions on Radar Swap

Su-57E stealth fighter: रूस भारत में अपने पांचवी पीढ़ी के फाइटर एयरक्राफ्ट सुखोई एसयू-57 की मैन्युफैक्चरिंग लेकर निवेश की योजनाओं पर काम कर रहा है। माना जा रहा है कि भारत सरकार इस साल के आखिर में होने वाली पुतिन की भारत यात्रा के दौरान एसयू-57 बनाने की डील पर साइन कर सकती है। इस डील से पहले इस बात की भी जानकारी मिली है कि भारतीय वायुसेना की तरफ से एसयू-57 के कंपोनेंट्स में बदलाव करने की बात कही है। भारत की तरफ से शर्त रखी गई है कि इस फाइटर जेट में रूसी रडार की बजाय भारतीय रडार लगाया जाए।

Su-57 Fighter Jet: रूस का भारत को बड़ा ऑफर! फिफ्थ-जेनरेशन Su-57 के जॉइंट प्रोडक्शन की पेशकश, AMCA प्रोजेक्ट में सहयोग का वादा

Su-57E stealth fighter: लगाए जाएं स्वदेशी रडार

सूत्रों ने बताया कि भारत ने साफ कहा है कि अगर इस विमान को भारतीय वायुसेना में शामिल करना है तो इसमें लगे रूसी रडार और मिशन सिस्टम को हटाकर स्वदेशी भारतीय सिस्टम लगाया जाए। Su-57E में फिलहाल N036 “ब्येल्का” AESA रडार लगा है। यह गैलियम आर्सेनाइड (GaAs) टेक्नोलॉजी पर आधारित है। वायुसेना का कहना है कि यह रडार मॉडर्न वॉरफेयर के मुताबिक नहीं है और अगले दौर की एयर बैटल की जरूरतों को पूरी तरह नहीं पूरा कर सकता।

सूत्रों ने बताया कि इस रडार की डिटेक्शन रेंज, पावर एफिशिएंसी और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर रसिस्टेंस कैपेसिटी उतनी मजबूत नहीं है जितनी अगली पीढ़ी के विमानों में होनी चाहिए। भारत की तरफ से कहा गया है कि यह तकनीक अब पुरानी हो चुकी है और इसे नई गैलियम नाइट्राइड (GaN) तकनीक से बने रडार से बदलना चाहिए।

इलैक्ट्रॉनिक वॉरफेयर के लिए बने हैं उत्तम और विरूपाक्ष

सूत्रों का कहना है कि भारत चाहता है कि इस रडार को बदलकर डीआरडीओ के बनाए गैलियम नाइट्राइड (GaN) आधारित AESA रडार लगाए जाएं। जिनका इस्तेमाल तेजस फाइटर जेट में भी किया जा रहा है। इनमें उत्तम AESA रडार और अपग्रेड हो रहे सुखोई-30एमकेआई जेट्स के लिए तैयार किया जा रहा विरूपाक्ष रडार शामिल हैं। ये दोनों रडार गैलियम नाइट्राइड (GaN) तकनीक पर आधारित हैं, जिन्हें आधुनिक एयर कॉम्बैट के लिए अधिक कारगर माना जाता है। गैलियम नाइट्राइड तकनीक वाले इन रडारों की थर्मल हैंडलिंग और पावर एफिशिएंसी भी बेहतर है, साथ ही ये रेंज भी ज्यादा देते हैं और सिग्नल क्वॉलिटी भी बेहतर रखते हैं।

सूत्रों का कहना है कि नई दिल्ली ने रूस से यह शर्त रखी है कि अगर सौदा करना है तो Su-57E में भारतीय रडार शामिल किए जाएंगे। बता दें कि गैलियम नाइट्राइड (GaN) तकनीक पर आधारित उत्तम AESA रडार और विरूपाक्ष रडार में मॉडर्न इलैक्ट्रॉनिक वॉरफेयर की क्षमता है।

Su-57E stealth fighter: रूस के दावों पर सवाल हुए खड़े

डीआरडीओ का कहना है कि गैलियम नाइट्राइड तकनीक फ्यूचर वॉरफेयर में निर्णायक भूमिका निभाएगी। यही वजह है कि अमेरिका का F-35, चीन का J-20 और जापान का अगली पीढ़ी का J/F-X प्रोग्राम भी इसी तकनीक पर आधारित रडार का इस्तेमाल कर रहे हैं। भारत का दावा है कि उसके स्वदेशी रडार वैश्विक स्तर की तकनीक से पीछे नहीं हैं और इन्हें SU-57E जैसे विमानों पर लगाना पूरी तरह संभव है।

हालांकि रूस इस फाइटर जेट को पांचवी पीढ़ी के एयरक्राफ्ट के तौर पर प्रचारित करता आया है। वहीं भारत के यह कहने के बाद कि इसमें लगे रडार मॉडर्न वॉरफेयर के मुताबिक नहीं है, इसके बाद रूस के दावों पर सवाल खड़े हों गए हैं। जानकारों का कहना है कि अगर भारत जैसे बड़े ग्राहक ने इसके रडार सिस्टम को नकार दिया तो इसका असर दुनिया भर में रूस की छवि पर पड़ेगा।

Su-57E stealth fighter: भारत ने ली राफेल से सीख

सूत्रों का कहना है कि भारत को अपने स्वदेश में बने रडार सिस्टम पर पूरा भरोसा है। और वह अब विदेशी तकनीक पर निर्भर नहीं है। वहीं अगर एसयू-57 में भारतीय रडार का इस्तेमाल होता है कि इससे पूरी दुनिया में उसकी साख बढ़ेगी और विदेशों में निर्यात के रास्ते भी खुलेंगे। साथ ही भारत यह भी जानता है कि मॉस्को आसानी से अपने सबसे बड़े हथियार खरीदारों में से एक को नहीं खो सकता।

भारत फिलहाल Su-57E की तुलना अमेरिका के F-35A से कर रहा है, लेकिन यहां मामला केवल विमान की रेंज या स्टील्थ क्षमता का नहीं है। भारत के लिए सबसे अहम मुद्दा है – टेक्नोलॉजी पर कंट्रोल। सूत्रों का कहना है कि फ्रांस के राफेल सौदे से भारत ने बड़ी सीख ली है। राफेल का सोर्स कोड फ्रांस ने भारत को नहीं दिया, जिससे भारतीय मिसाइल सिस्टम्स को पूरी तरह इंटीग्रेट करने में दिक्कतें आईं। उनमें स्वदेशी एस्ट्रा और रुद्रम जैसे हथियारों को पूरी तरह राफेल पर इंटीग्रेट नहीं किया जा सका। यही वजह है कि अब भारत ने तय कर लिया है कि भविष्य की सभी डील्स में सोर्स कोड एक्सेस और लोकल टेक्नोलॉजी इंटीग्रेशन जरूरी होगा।

Su-57E stealth fighter: फिफ्थ जनरेशन की दो से तीन स्क्वाड्रन

भारतीय वायुसेना की योजना है कि अगले कुछ वर्षों में दो से तीन स्क्वाड्रन फिफ्थ जनरेशन विमानों की जरूरत पूरी की जाए। एसयू-57ई और अमेरिकी एफ-35 इस दौड़ में प्रमुख हैं। वहीं भारत का अपना एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) प्रोजेक्ट भी चल रहा है, जिसकी पहली उड़ान 2028 तक तय मानी जा रही है। रूस ने यह भी संकेत दिया है कि अगर भारत एसयू-57ई खरीदता है तो इसमें स्वदेशी एस्ट्रा मिसाइल और भविष्य के प्रिसीजन स्ट्राइक हथियार भी लगाए जा सकते हैं।

एसयू-57ई को भारत में बनाने की तैयारी

वहीं रूस ने भारत को लुभाने के लिए एक बड़ा प्रस्ताव रखा है। जानकारी के मुताबिक, रूसी राजदूत डेनिस अलीपोव ने हाल ही में कहा कि रूस ने भारत को फुल सोर्स कोड एक्सेस देने की पेशकश की है ताकि भारतीय सिस्टम्स को आसानी से Su-57E में इंटीग्रेट किया जा सके। इतना ही नहीं, नासिक की एचएएल की फैक्टरी में जहां पहले से ही 222 से ज्यादा सुखोई-30MKI बन चुके हैं, वहां पर एसयू-57ई का उत्पादन शुरू हो सकता है। रूसी मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक रूस भारत को पूरी तकनीकी मदद और औद्योगिक ढांचा मुहैया कराने को तैयार है।

आंकलन करने में जुटीं रूसी एजेंसियां

वहीं रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन अपनी भारत यात्रा के दौरान Su-57 विमान का ऑफर कर सकते हैं। रूसी एजेंसियां यह आंकलन भी कर रही हैं कि भारत में इन विमानों के निर्माण के लिए कितनी पूंजी और संसाधन की जरूरत होगी। इसके अलावा भारत की दूसरी फैक्ट्रियां, जहां पहले से ही रूसी उपकरण बनाए जाते हैं, उन्हें भी इस काम में इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे लागत कम करने में मदद मिलेगी। बता दें कि करीब दस साल पहले भारत रूस के फिफ्थ जेनरेशन फाइटर एयरक्राफ्ट प्रोग्राम (FGFA) का हिस्सा था, लेकिन मतभेदों के चलते उसने इससे हाथ खींच लिया था। अब मौजूदा वैश्विक हालात को देखते हुए यह प्रोजेक्ट फिर से शुरू हो सकता है।

 

MiG-21 retirement India: 63 सालों की सेवा के बाद 26 सितंबर को रिटायर होगा मिकोयान-गुरेविच-21, त्रिशूल से लेकर तलवार तक मिले कई नाम

Mig-21 Retirement: IAF’s First Supersonic Jet to Bid Farewell After 62 Years
Photo: IAF

MiG-21 retirement India: भारतीय वायुसेना (IAF) की शान रहे सुपरसोनिक लड़ाकू विमान मिग-21 अब इतिहास बनने जा रहे हैं। 62 साल तक आकाश में अपनी ताकत का परिचय देने के बाद ये विमान 26 सितंबर 2025 को चंडीगढ़ में आयोजित एक भव्य समारोह में विदाई लेंगे। वायुसेना के अधिकारियों ने पुष्टि की है कि यह दिन मिग-21 की लंबी और गौरवशाली यात्रा का अंतिम पड़ाव होगा।

Tejas Mk1 Fighters: IAF ने पाकिस्तान से सटी पश्चिमी सीमा पर तैनात किए तेजस लड़ाकू विमान, MiG-21 को अब नहीं मिलेगी लाइफलाइन!

MiG-21 retirement India: मिले ये नाम

आधिकारिक तौर पर इसे हमेशा मिकोयान-गुरेविच-21 (MiG-21) कहा गया। लेकिन भारतीय वायुसेना और पायलटों ने इसे कई नाम दिए। 2000 के दशक में रूस की मदद से अपग्रेड हुए इसके संस्करण को मिग-21 बाइसन नाम मिला, जिसमें लेटेस्ट एवियोनिक्स और नई तकनीकें जोड़ी गईं। 1971 के भारत-पाक युद्ध में जब इसने दुश्मन को मात दी, तब इसे ‘विजय’ और ‘त्रिशूल’ जैसे नामों से भी नवाजा गया। इसकी तेज रफ्तार और हमलावर क्षमता के चलते इसे ‘तलवार’ भी कहा गया। वहीं, 1971 के युद्ध में पाकिस्तानी विमानों के खिलाफ इसकी सफलता ने इसे ‘गन विद विंग्स’ यानी ‘पंखों वाली तोप’ भी नाम दिया गया था।

Mig-21 Retirement: IAF’s First Supersonic Jet to Bid Farewell After 62 Years
Photo: IAF

MiG-21 retirement India: केवल दो स्क्वॉड्रन बचे सेवा में

फिलहाल भारतीय वायुसेना के पास मिग-21 के सिर्फ दो स्क्वॉड्रन बचे हैं, नंबर 23 स्क्वॉड्रन (Panthers) और नंबर 3 स्क्वॉड्रन (Cobras)। दोनों राजस्थान के बिकानेर स्थित नल एयरबेस पर तैनात हैं। इन विमानों की जगह अब धीरे-धीरे स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमान एलसीए तेजस एमके-1ए ले रहे हैं। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी ने 97 नए तेजस एमके-1ए की खरीद के लिए 66,000 करोड़ रुपये के सौदे को मंजूरी दी है।

MiG-21 retirement India: 1963 में आया था सर्विस में

मिग-21 भारत का पहला सुपरसोनिक जेट था, जिसे 1963 में भारतीय वायुसेना में शामिल किया गया। आने वाले दशकों में वायुसेना ने इसके कई वर्जन इस्तेमाल किए, जिनमें टाइप 77 (मिग-21एफएल), टाइप 96 (मिग-21 एम), और टाइप 75 (मिग-21 पीएफ) शामिल थे। इन विमानों ने 1965 और 1971 के युद्धों में भी पाकिस्तान को करारा जवाब दिया। साथ ही, 1999 के कारगिल युद्ध में भी इन विमानों ने अहम भूमिका निभाई।

MiG-21 retirement India: जब एक मिग-21 ने चार साबरे को पछाड़ा

एयर मार्शल (रिटायर्ड) पृथ्वी सिंह बरार उस दौर को याद करते हुए कहते हैं, “1971 में मैंने पाकिस्तान के रफीकुल एयरबेस पर 500 किलो के दो बम गिराए। वापसी के दौरान देखा कि चार अमेरिकी साबरे फाइटर जेट मेरे पीछे पड़ गए। मुझे लगा अब बचना मुश्किल है, लेकिन मिग-21 की स्पीड और मेरी ट्रेनिंग ने कमाल कर दिया। पाकिस्तानी विमान पीछा नहीं कर पाए और मैं सुरक्षित लौट आया।” बरार का मानना है कि मिग-21 केवल एक फाइटर जेट नहीं था, बल्कि हर पायलट का साथी और भरोसेमंद दोस्त था।

Mig-21 Retirement: IAF’s First Supersonic Jet to Bid Farewell After 62 Years
Photo: IAF

MiG-21 retirement India: फ्लाइंग कॉफिन का टैग

मिग-21 का इतिहास गौरवशाली होने के साथ-साथ विवादों से भी घिरा रहा। बार-बार हुए हादसों के चलते मीडिया ने इसे फ्लाइंग कॉफिन और विडो मेकर जैसे नाम भी दिए। 2013 में संसद में उस समय के रक्षा मंत्री एके एंटनी ने बताया था कि 1963 से 2012 के बीच मिग-21 के 482 हादसे हुए और इनमें 171 पायलटों की जान गई। हालांकि, एयर मार्शल बरार कहते हैं, “पायलटों की शहादत दुखद है, लेकिन मिग-21 ने कभी हमें ऑपरेशन्स में निराश नहीं किया। अगर हादसे हुए, तो उनके पीछे कई वजह थीं। दुनिया की दूसरी वायु सेनाओं में भी हादसों की दर कम नहीं रही है।”

2019 में F-16 को मार गिराया

मिग-21 बाइसन की एयर पावर का एक और उदाहरण 2019 में देखने को मिला। उस समय विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान ने अपने मिग-21 से पाकिस्तान के F-16 को मार गिराया। हालांकि पाकिस्तान ने इस दावे से इंकार किया, लेकिन भारत ने असलियत दुनिया के सामने रखी। यहां तक कि इस घटना के बाद अमेरिका भी अचंभे में पड़ गया था। क्योंकि अमेरिका का मानना था कि उसके एफ-16 फााइटर जेट को गिराना इतना आसान नहीं है।

400 से अधिक मिग-21

एक समय ऐसा था जब भारतीय वायुसेना के पास 19 स्क्वॉड्रन में 400 से अधिक मिग-21 तैनात थे। 2017 से 2024 के बीच कम से कम चार स्क्वॉड्रन को चरणबद्ध तरीके से हटाया गया। असल में मिग-21 को 2022 तक रिटायर किया जाना था, लेकिन स्वदेशी लड़ाकू विमान तेजस की धीमी डिलीवरी के चलते इसे कुछ साल और सेवा में बनाए रखा गया।

मिग-21 को हमेशा उसकी तेज रफ्तार और चुस्ती के लिए पहचाना गया। यही वजह थी कि इसे लंबे समय तक भारतीय वायुसेना की रीढ़ माना गया। यह विमान इतनी रफ्तार से उड़ सकता था कि दुश्मन को पलभर में मात दे दे। इस सुपरसोनिक जेट की टॉप स्पीड 2,174 किलोमीटर प्रति घंटा थी, जिसे मैक 1.76 कहा जाता है। यानी यह ध्वनि की गति से लगभग दोगुना तेज उड़ सकता था। इसका स्ट्रक्चर 14.7 मीटर लंबा और 7.15 मीटर चौड़ा (विंगस्पैन) था। ऊंचाई की बात करें तो यह विमान 18,000 मीटर तक उड़ान भरने में सक्षम था।

ईंधन के मामले में मिग-21 में 3,831 लीटर क्षमता वाला टैंक था, जिससे यह लंबी दूरी भी तय कर सकता था। इसके अलावा, यह विमान 9,800 किलोग्राम तक का अधिकतम भार लेकर उड़ सकता था। इसमें हथियार, मिसाइल और अन्य जरूरी उपकरण शामिल रहते थे।

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Photo: IAF

HAL ने बनाया भारत का मिग-21

हालांकि यह विमान सोवियत संघ में डिजाइन हुआ था, लेकिन भारत में इसकी असेंबली और उत्पादन का जिम्मा हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने उठाया। भारत में 1,200 से अधिक मिग-21 तैयार किए गए, जो वायुसेना की रीढ़ साबित हुए।
2000 के दशक में भारतीय वायुसेना और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने मिग-21 में बड़ा अपग्रेड भी किया। पुराने इंजनों की खामियों को सुधारा गया और आधुनिक उपकरण लगाए गए। इस अपग्रेडेड संस्करण को मिग-21 बाइसन नाम दिया गया। 2001 में इसके आधुनिक रूप को पहली बार शामिल किया गया और इसकी पहली स्क्वॉड्रन बनी 3 स्क्वॉड्रन कोबरा।

क्या होती है नंबर प्लेटिंग?

वायुसेना की भाषा में नंबर प्लेटिंग का मतलब है कि कोई स्क्वॉड्रन अस्थायी तौर पर सक्रिय नहीं रहती। उसका नाम, इतिहास और परंपरा सुरक्षित रखी जाती है। जब भविष्य में नए एयरक्राफ्ट उपलब्ध होते हैं, तो उसी स्क्वॉड्रन को फिर से उसी नाम और पहचान के साथ सक्रिय किया जाता है। इस बार मिग-21 के रिटायरमेंट के बाद जब स्क्वॉड्रन को नए स्वदेशी लड़ाकू विमान तेजस एमके1ए मिलेंगे, तो वही स्क्वॉड्रन अपने गौरवशाली इतिहास और परंपराओं के साथ फिर से उड़ान भरेंगी।

वायुसेना प्रमुख ने उड़ान भर दी श्रद्धांजलि

मिग-21 की विदाई से पहले वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने खुद इस विमान में उड़ान भरी। राजस्थान के नाल एयरबेस से उन्होंने मिग-21 में उड़ान भरी। दिलचस्प बात यह है कि एयर चीफ ने अपने फ्लाइंग करियर की शुरुआत भी मिग-21 से ही की थी। इस उड़ान से पहले एयर चीफ ने एक दिन तक मिग-21 की पूरी ट्रेनिंग ली और फिर अगले दिन सोलो उड़ान भरी। उन्होंने मिग-21 को फॉर्मेशन उड़ान में भी शामिल किया। यह दो मिग-21 विमानों की फॉर्मेशन थी, जिसमें एक विमान को स्क्वॉड्रन लीडर प्रिया उड़ा रही थीं और दूसरा एयर चीफ़ खुद संभाल रहे थे। इस फॉर्मेशन की कमान स्क्वॉड्रन लीडर प्रिया के हाथों में थी। इस उड़ान के साथ एयर चीफ मार्शल सिंह ने न सिर्फ अपने करियर की यादों को ताजा किया बल्कि मिग-21 को एक सम्मानजनक विदाई भी दी।

मिग-21 उड़ाने वाले एयरफोर्स चीफ्स

भारतीय वायुसेना में मिग-21 का सफर सिर्फ पायलटों तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि वायुसेना प्रमुखों के करियर का भी सााथी रह। पूर्व एयर चीफ मार्शल आरकेएस भदौरिया ने अपने रिटायरमेंट से महज 15 दिन पहले इस लड़ाकू विमान में आखिरी उड़ान भरी थी। 13 सितंबर 2021 को उन्होंने हलवारा स्थित 23 स्क्वॉड्रन से मिग-21 उड़ाया। दिलचस्प बात यह रही कि भदौरिया का फ्लाइंग करियर भी इसी ‘पैंथर्स’ स्क्वॉड्रन से मिग-21 उड़ाते हुए शुरू हुआ था और उसी स्क्वॉड्रन, उसी एयरबेस और उसी विमान के साथ उनका करियर पूरा हुआ।

इससे पहले, सितंबर 2019 में तत्कालीन एयर चीफ मार्शल बीएस धनोआ ने भी अपने रिटायरमेंट से पहले मिग-21 में उड़ान भरी। यह उड़ान उन्होंने उस समय के विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान के साथ मिग-21 के दो-सीटर वर्जन में भरी थी। धनोआ का मिग-21 से रिश्ता करगिल युद्ध से भी जुड़ा रहा। 1999 में उन्होंने फ्रंटलाइन ग्राउंड अटैक स्क्वॉड्रन की कमान संभाली थी।

मई 2019 में, करगिल युद्ध में शहीद हुए स्क्वॉड्रन लीडर अजय आहूजा को श्रद्धांजलि देने के लिए धनोआ ने मिग-21 से ‘मिसिंग मैन’ फॉर्मेशन में उड़ान भरी थी। उस समय उन्होंने मिग-21 टाइप 96 उड़ाया। जनवरी 2017 में भी उन्होंने उत्तरलाई एयरबेस से सिंगल-सीटर मिग-21 उड़ाया था।

धनोआ से पहले, किसी एयरफोर्स चीफ ने अकेले मिग-21 उड़ान 2000-2001 में भरी थी। उस वक्त एयर चीफ मार्शल एवाई टिपनिस (सेवानिवृत्त) ने बरेली और चंडीगढ़ से मिग-21 में उड़ान भरकर यह संदेश दिया था कि डेल्टा-विंग वाला यह विमान पूरी तरह सक्षम है और अपने समय में वायुसेना की रीढ़ रहा है।